हरिशंकर परसाई (1924 - 1995)
हिंदी साहित्य में व्यंग्य को एक स्वतंत्र, गंभीर और परिवर्तनकारी साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित करने का ऐतिहासिक श्रेय हरिशंकर परसाई को जाता है। उनका जन्म मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में हुआ था। उन्होंने जबलपुर से 'वसुधा' नामक साहित्यिक पत्रिका निकाली।
- परसाई जी का व्यंग्य केवल मनोरंजन या फूहड़ हँसी नहीं है, बल्कि वह समाज के पाखंड, भ्रष्टाचार, धार्मिक अंधविश्वास और राजनीतिक अवसरवादिता पर सीधा प्रहार करता है।
- उनकी प्रमुख कृतियों में 'हँसते हैं रोते हैं', 'भूत के पाँव पीछे', 'सदाचार का ताबीज', 'वैष्णव की फिसलन', 'विकलांग श्रद्धा का दौर' (साहित्य अकादमी पुरस्कार) अत्यंत प्रसिद्ध हैं।
'प्रेमचंद के फटे जूते' का केंद्रीय विषय:
परसाई जी के सामने मुंशी प्रेमचंद की एक तस्वीर है। उस तस्वीर को देखकर परसाई जी प्रेमचंद की आर्थिक विपन्नता पर तरस नहीं खाते, बल्कि प्रेमचंद के उस असीम स्वाभिमान पर मुग्ध होते हैं जो आज के पाखंडी समाज में दुर्लभ है।