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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 9 • Hindi • अध्याय 6
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Premachand Ke Phate Joote

'प्रेमचंद के फटे जूते' हिंदी साहित्य के शीर्षस्थ व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई द्वारा रचित एक अत्यंत पैना, विचारोत्तेजक और कालजयी व्यंग्य-निबंध है। यह निबंध मुंशी प्रेमचंद के एक पुराने फोटोग्राफ को देखकर लिखा गया है, जिसमें प्रेमचंद अपनी पत्नी के साथ साधारण धोती-कुर्ता और सिर पर पगड़ी पहने बैठे हैं और उनके बाएँ पैर के कैनवास के जूते का अगला हिस्सा फटा हुआ है, जिससे उनकी उँगली बाहर निकल आई है। परसाई जी ने इस फटे जूते को केवल एक साधारण गरीबी का प्रतीक नहीं माना, बल्कि इसके माध्यम से तत्कालीन और वर्तमान समाज की ढोंगी दिखावे की प्रवृत्ति, झूठी प्रतिष्ठा की चाह, समझौतावादी अवसरवादिता और सामाजिक कुरीतियों पर तीखा कटाक्ष किया है। जहाँ साधारण लोग फोटो खिंचवाने के लिए दूसरों का कोट, टाई, मोटर और यहाँ तक कि बीवी तक माँग लेते हैं, वहीं कथा-सम्राट प्रेमचंद बिना किसी संकोच के फटे जूते में पूरे स्वाभिमान से मुस्कुरा रहे हैं! इस विस्तृत अध्ययन सामग्री में JAC बोर्ड कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए निम्नलिखित आयाम समाहित हैं: लेखक एवं विधा परिचय: हरिशंकर परसाई की मारक व्यंग्य-शैली, विसंगतियों पर प्रहार और सामाजिक यथार्थ। फोटोग्राफ का जीवंत अंकन: प्रेमचंद की सादगीपूर्ण वेशभूषा, चेहरे की व्यंग्य-भरी मुस्कान और फटे जूते का यथार्थ। जूता बनाम टोपी का रूपक: समाज में योग्यता (टोपी) पर संपन्नता और चाटुकारिता (जूता) के हावी होने का दार्शनिक विश्लेषण। उँगली का इशारा: प्रेमचंद की उँगली किसी पूजनीय वस्तु की ओर नहीं, बल्कि समाज के उस घृणित पाखंड की ओर इशारा कर रही है जिसे लोग छिपाते हैं। कुंभनदास और अन्य रचनाकारों से तुलना: "संतन को कहा सीकरी सों काम, आवत-जात पनहियाँ टूटीं, बिसरि गयो हरि नाम।" JAC बोर्ड परीक्षापयोगी प्रश्न-उत्तर: NCERT अभ्यास के सभी प्रश्न, आशय-स्पष्टीकरण और मूल्यपरक निबंधात्मक विश्लेषण।

फटा हुआ जूता और स्वाभिमान की मुस्कान: जब एक तस्वीर ने पूरे समाज को नंगा कर दिया

आज हम और आप जब एक पासपोर्ट साइज फोटो भी खिंचवाने जाते हैं, तो बाल संवारते हैं, कपड़े इस्त्री करते हैं और यहाँ तक कि डिजिटल फिल्टर लगाकर चेहरा चमकाते हैं! लोग दूसरों की शादी में जाने के लिए महँगा कोट उधार माँग लाते हैं! लेकिन सोचिए, जिस इंसान को हिंदी साहित्य का 'उपन्यास सम्राट' और 'कथा-शिरोमणि' कहा जाता है, वह अपनी पत्नी के साथ फोटो खिंचवाते समय फटा हुआ कैनवास का जूता पहने बैठा है, जिसकी धज्जियाँ उड़ी हैं और अँगूठे के पास से उँगली बाहर झांक रही है! और सबसे बड़ी बात—उसके चेहरे पर कोई शर्म या झिझक नहीं, बल्कि समाज के पाखंडियों पर एक तिरछी, तीखी मुस्कान है! हरिशंकर परसाई का यह व्यंग्य हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम कपड़ों से इंसान बनते हैं या अपने चरित्र से?

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

  1. दिखावे और पाखंड की संस्कृति पर तीखा प्रहार: आज के ब्रांडेड और सोशल मीडिया दिखावे के दौर में यह पाठ सादगी, ईमानदारी और स्वाभिमान का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाता है।
  2. व्यंग्य विधा का सर्वश्रेष्ठ प्रतिमान: हरिशंकर परसाई की कलम से निकला यह निबंध हिंदी के श्रेष्ठतम व्यंग्यों में गिना जाता है, जो हँसाते हुए गहरी चोट करता है।
  3. रचनाकार का नैतिक साहस: यह स्पष्ट करना कि एक सच्चा साहित्यकार कभी सत्ता या संपत्ति के आगे सिर नहीं झुकाता, भले ही उसका जूता फट जाए।
  4. JAC बोर्ड परीक्षा में अनिवार्य प्रश्न: इस पाठ से जूता-टोपी रूपक, व्यंग्य-मुस्कान और उँगली के इशारे पर आधारित 5 से 8 अंक के प्रश्न हर वर्ष पूछे जाते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • व्यंग्य (Satire) विधा की समझ—जहाँ हँसी-हँसी में समाज की कुरीतियों पर गंभीर प्रहार किया जाता है।
  • मुंशी प्रेमचंद के अभावग्रस्त, किंतु अत्यंत स्वाभिमानी जीवन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।
  • जूता (शक्ति/दौलत) और टोपी (सम्मान/बुद्धि) के पारंपरिक सामाजिक प्रतीकार्थ की समझ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • प्रेमचंद के फटे जूते के माध्यम से उनकी सादगी और आडंबरहीनता को समझ पाना।
  • जूते और टोपी के प्रतीकात्मक अर्थ का सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण करना।
  • प्रेमचंद की रहस्यमयी मुस्कान और पैर की उँगली के इशारे का दार्शनिक आशय स्पष्ट करना।
  • भक्तिकाल के कवि कुंभनदास के प्रसंग के माध्यम से समझौतावादी प्रवृत्ति की आलोचना करना।
  • JAC बोर्ड परीक्षा के सभी विश्लेषणात्मक प्रश्नों के उत्कृष्ट और मानक उत्तर तैयार करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. लेखक परिचय एवं व्यंग्य निबंध का...
2 2. तस्वीर का यथार्थ: सादगी बनाम समा...
3 3. जूता और टोपी का ऐतिहासिक-सामाजिक...
4 4. कुंभनदास का प्रसंग और ठोकर मारने...
5 5. उँगली का इशारा और रहस्यमयी व्यंग...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. लेखक परिचय एवं व्यंग्य निबंध का साहित्यिक धरातल

हरिशंकर परसाई (1924 - 1995)

हिंदी साहित्य में व्यंग्य को एक स्वतंत्र, गंभीर और परिवर्तनकारी साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित करने का ऐतिहासिक श्रेय हरिशंकर परसाई को जाता है। उनका जन्म मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में हुआ था। उन्होंने जबलपुर से 'वसुधा' नामक साहित्यिक पत्रिका निकाली।

  • परसाई जी का व्यंग्य केवल मनोरंजन या फूहड़ हँसी नहीं है, बल्कि वह समाज के पाखंड, भ्रष्टाचार, धार्मिक अंधविश्वास और राजनीतिक अवसरवादिता पर सीधा प्रहार करता है।
  • उनकी प्रमुख कृतियों में 'हँसते हैं रोते हैं', 'भूत के पाँव पीछे', 'सदाचार का ताबीज', 'वैष्णव की फिसलन', 'विकलांग श्रद्धा का दौर' (साहित्य अकादमी पुरस्कार) अत्यंत प्रसिद्ध हैं।

'प्रेमचंद के फटे जूते' का केंद्रीय विषय:

परसाई जी के सामने मुंशी प्रेमचंद की एक तस्वीर है। उस तस्वीर को देखकर परसाई जी प्रेमचंद की आर्थिक विपन्नता पर तरस नहीं खाते, बल्कि प्रेमचंद के उस असीम स्वाभिमान पर मुग्ध होते हैं जो आज के पाखंडी समाज में दुर्लभ है।

2. तस्वीर का यथार्थ: सादगी बनाम समाज की दिखावटी मानसिकता

प्रेमचंद का फोटोग्राफ:

चित्र में प्रेमचंद एक मोटे खद्दर का कुर्ता-धोती और सिर पर किसी ग्रामीण शैली की टोपी पहने हैं। कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियाँ उभर आई हैं, पर घनी मूँछें चेहरे को भरा-भरा दिखाती हैं।

  • पैरों में कैनवास के जूते हैं, जिनके फीते बेतरतीब बंधे हैं। पत्तियाँ (लोहे की खूंटियाँ) निकल जाने से फीता कसना कठिन है।
  • बायाँ जूता फटा हुआ है: उसमें एक बड़ा छेद हो गया है, जिससे पाँव की उँगली बाहर निकल आई है!

समाज की उधार संस्कृति पर करारा व्यंग्य:

परसाई जी लिखते हैं कि यदि फोटो खिंचवाने की यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? फिर वे स्वयं कहते हैं—नहीं, इस आदमी के पास बदलने की दूसरी पोशाकें नहीं थीं। यह जैसा भीतर था, वैसा ही बाहर! इसके विपरीत आधुनिक समाज का पाखंड देखिए:

  • लोग फोटो खिंचवाने के लिए दूसरे का कोट माँग लाते हैं ताकि ठाठ दिख सके।
  • लोग दूसरों की कार (मोटर) में बैठकर शान बघारते हैं।
  • यहाँ तक कि लोग वर-यात्रा के लिए दूसरों की बीवी तक माँग लेते हैं!
  • फोटो में खुशबू लाने के लिए लोग इत्र छिड़कते हैं ताकि तस्वीर से भी सुगंध आए! किंतु करोड़ों दिलों पर राज करने वाले प्रेमचंद इतने निश्छल हैं कि फटे जूते को छिपाने की रत्ती भर चेष्टा नहीं करते!

3. जूता और टोपी का ऐतिहासिक-सामाजिक रूपक

जूता बनाम टोपी:

परसाई जी ने जूते (पैरों में पहने जाने वाले) और टोपी (सिर पर धारण की जाने वाली) के माध्यम से हमारे समाज के विकृत शक्ति-समीकरण पर गहरा दार्शनिक व्यंग्य किया है:

  1. परंपरागत मर्यादा: टोपी सम्मान, विद्वता, संस्कृति और स्वाभिमान का प्रतीक है, जो सिर पर पहनी जाती है। जूता सामर्थ्य, धन-बल और सत्ता का प्रतीक है, जो पैरों में रहता है।
  2. संसार की कटु विडंबना: संसार में सदैव जूते की कीमत टोपी से कहीं अधिक रही है! आज तो जूते की कीमत इतनी बढ़ गई है कि एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर हो जाती हैं!
  3. साहित्यकार की स्थिति: प्रेमचंद जैसे महान युग-प्रवर्तक और 'कथा-सम्राट' का जूता फटा हुआ है, जबकि आज के दो कौड़ी के चाटुकार और भ्रष्ट लोग कीमती जूतों में चमक रहे हैं। यह देखकर लेखक का हृदय रो पड़ता है।

4. कुंभनदास का प्रसंग और ठोकर मारने का रहस्य

कुंभनदास का जूता कैसे घिसा था?

परसाई जी भक्ति काल के प्रसिद्ध अष्टछाप कवि कुंभनदास का प्रसंग याद करते हैं:

  • जब मुगल बादशाह अकबर ने उन्हें फतेहपुर सीकरी बुलाया, तो कुंभनदास पैदल ही सीकरी गए। आने-जाने में उनके जूते घिस गए और वे बहुत लज्जित हुए। उन्होंने लिखा था:

    "संतन को कहा सीकरी सों काम? आवत जात पनहियाँ टूटीं, बिसरि गयो हरि नाम।"

  • कुंभनदास का जूता चलने से घिसा था (तला घिसा था)।

प्रेमचंद का जूता फटा क्यों?

परसाई जी एक अत्यंत गहरा निष्कर्ष निकालते हैं:

  • प्रेमचंद का जूता चलने से नीचे से नहीं घिसा, बल्कि ऊपर से फटा है!
  • इसका अर्थ यह है कि प्रेमचंद जीवन भर किसी मंजिल की ओर सीधे चलते रहे, और रास्ते में जो टीले (सामाजिक रूढ़ियाँ, जाति-पांति, अंधविश्वास, छुआछूत, शोषण) आए, उनसे बचकर निकलने के बजाय प्रेमचंद ने उन टीलों पर जूते से ठोकर मारी!
  • वे टीलों से समझौता कर सकते थे, किनारे से निकल सकते थे; पर वे प्रेमचंद थे—जो कभी किसी कुरीति से समझौता नहीं कर सके। बार-बार ठोकर मारने से उनका जूता ऊपर से फट गया और उँगली बाहर निकल आई!

5. उँगली का इशारा और रहस्यमयी व्यंग्य-मुस्कान

पैर की उँगली का दार्शनिक इशारा:

साधारणतः मनुष्य हाथ की उँगली से किसी पूजनीय या सुंदर वस्तु की ओर संकेत करता है। किंतु प्रेमचंद अपने दाएँ पाँव की उँगली से इशारा कर रहे हैं!

  • वे समाज के उस वर्ग की ओर इशारा कर रहे हैं जो अपने पैरों के नीचे के तलवे को घिस रहे हैं (अंदर से खोखले हो रहे हैं), पर ऊपर से अपना फटापन छिपाए रखकर मुस्कुरा रहे हैं!
  • प्रेमचंद कहते हैं: "मेरा पाँव तो सुरक्षित है, केवल उँगली बाहर निकली है। मैं जमीन पर मजबूती से चल रहा हूँ। परंतु तुम जो अपना तलवा घिसकर चल रहे हो, तुम्हारा तो पैर ही लहूलुहान हो रहा है, तुम चलोगे कैसे?"

चेहरे की रहस्यमयी मुस्कान:

प्रेमचंद के चेहरे पर एक अधूरी, तिरछी मुस्कान है। यह कोई साधारण खुशी की मुस्कान नहीं, बल्कि समाज के पाखंडियों, दिखावे के प्रेमियों और अवसरवादियों पर की गई एक निर्मम, तीखी व्यंग्य-मुस्कान है! मानो वे कह रहे हों: "तुम मुझ पर क्या हँसते हो? मैं तो जैसा हूँ वैसा दिख रहा हूँ, लेकिन तुम अपनी असलियत को कब तक छिपाओगे?"

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

व्यंग्य का मूल आधार
प्रेमचंद का अपनी पत्नी के साथ खिंचवाया गया ऐतिहासिक फोटोग्राफ जिसमें बायाँ कैनवास का जूता फटा हुआ है।
जूता और टोपी का प्रतीकार्थ
टोपी = सिर का मान, सम्मान व बौद्धिक गरिमा; जूता = भौतिक संपन्नता, धन-बल और सत्ता का अहंकार।
जूता फटने का दार्शनिक कारण
रास्ते के सामाजिक टीलों (कुरीतियों, शोषण, पाखंड) पर लगातार ठोकरें मारना और समझौता न करना।
प्रेमचंद की मुस्कान का संदेश
दिखावे और पाखंड में जीने वाले खोखले समाज पर तीखा, बेबाक और निर्भीक व्यंग्य।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
हरिशंकर परसाई ने प्रेमचंद का जो शब्द-चित्र हमारे सामने प्रस्तुत किया है, उससे प्रेमचंद के व्यक्तित्व की कौन-सी विशेषताएँ उभरकर आती हैं? (NCERT अभ्यास प्रश्न)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: परसाई जी द्वारा प्रस्तुत शब्द-चित्र से मुंशी प्रेमचंद के व्यक्तित्व की निम्नलिखित उदात्त विशेषताएँ उभरकर सामने आती हैं:

  1. सादगी और आडंबरहीनता: प्रेमचंद दिखावे की दुनिया से कोसों दूर थे। वे जैसे भीतर थे, वैसे ही बाहर थे। फोटो खिंचवाने जैसे औपचारिक अवसर पर भी वे साधारण खद्दर का कुर्ता-धोती और फटा जूता पहनकर बिना किसी संकोच के बैठ गए।
  2. अगाध स्वाभिमान और फक्कड़पन: वे अभावों में जिए, पर कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया, न ही किसी से उधार कपड़े माँगे। अपने फटे हाल पर भी उनके चेहरे पर कोई दीनता नहीं, बल्कि स्वाभिमान की चमक थी।
  3. अन्याय और कुरीतियों से न झुकने वाले विद्रोही: वे जीवन भर सामाजिक कुरीतियों, शोषण और अंधविश्वासों पर प्रहार करते रहे। उन्होंने टीलों से समझौता करने के बजाय उन्हें ठोकर मारना चुना।
  4. सच्चे और निष्कपट इंसान: उनके व्यक्तित्व में दोहरेपन का लेशमात्र भी नहीं था। वे बनावटी मुस्कान के बजाय पाखंडी समाज पर तीखा व्यंग्य करने का नैतिक साहस रखते थे।
उदाहरण 2
आशय स्पष्ट कीजिए: 'जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो जूते की कीमत और बढ़ गई है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं।' (JAC Board High-Yield Question)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: प्रतीकात्मक अर्थ:

  • टोपी: विद्वता, बुद्धि, मान-मर्यादा, स्वाभिमान और नैतिक गुणों का प्रतीक है, जो शरीर के सर्वोच्च अंग 'सिर' पर धारण की जाती है।
  • जूता: धन-दौलत, भौतिक संपन्नता, सत्ता और बाहुबल का प्रतीक है, जो पैरों में पहना जाता है।

आशय: समाज का यह कटु सत्य है कि इस भौतिकवादी संसार में गुणी, विद्वान और स्वाभिमानी व्यक्तियों (टोपी) की तुलना में भ्रष्ट, धनी और सत्ताधारी लोगों (जूते) को अधिक प्रतिष्ठा और शक्ति मिलती है। आज की भ्रष्ट व्यवस्था में विद्वानों और बुद्धिजीवियों को सत्ता और धन के आगे सिर झुकाना पड़ता है (एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं)। यह हमारे सामाजिक मूल्यों के पतन पर परसाई जी का अत्यंत मारक व्यंग्य है।

उदाहरण 3
'तुम पर्दे का महत्व ही नहीं जानते, हम पर्दे पर कुर्बान हो रहे हैं!'—परसाई जी ने यह व्यंग्य किस पर और क्यों किया है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: व्यंग्य का पात्र: यह व्यंग्य आधुनिक दिखावटी, ढोंगी और पाखंडी समाज के लोगों पर किया गया है।

कारण:

  • पर्दे का अर्थ: अपनी कमियों, कमजोरियों, दरिद्रता और बुराइयों को बाहरी चकाचौंध से छिपाकर रखना।
  • आधुनिक समाज अपनी हर कमजोरी को छिपाकर समाज में अपनी झूठी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए सर्वस्व (चरित्र, नैतिकता और धन) कुर्बान करने को तैयार रहता है।
  • इसके विपरीत प्रेमचंद निश्छल और पारदर्शी थे। उन्हें अपनी गरीबी या फटे जूते को छिपाने की कोई चिंता नहीं थी। वे बिना पर्दे के जीते थे, जबकि दुनिया पर्दे (दिखावे) की गुलाम बनी हुई थी।
उदाहरण 4
पाठ में 'टीले' शब्द का प्रयोग किन संदर्भों को इंगित करने के लिए किया गया होगा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: पाठ में 'टीले' शब्द का प्रयोग उन सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक बाधाओं तथा कुरीतियों के लिए किया गया है जो मनुष्य की प्रगति और समानता के मार्ग में रुकावट बनती हैं:

  1. रूढ़ियाँ और कुरीतियाँ: जाति-प्रथा, छुआछूत, ऊँच-नीच, दहेज प्रथा और धार्मिक पाखंड।
  2. शोषण की व्यवस्था: सामंतवाद, जमींदारी प्रथा और महाजनों द्वारा गरीब किसानों का शोषण।
  3. समझौताहीन संघर्ष: साधारण लोग ऐसे टीलों से बचकर किनारे से निकल जाते हैं ताकि कष्ट न हो; परंतु प्रेमचंद जैसे क्रांतिकारी लेखक इन कुरीतियों से टकराते हैं और अपनी लेखनी रूपी जूते से इन पर लगातार प्रहार करते हैं।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि लेखक प्रेमचंद की गरीबी का मजाक उड़ा रहा है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

लेखक प्रेमचंद की गरीबी का नहीं, बल्कि समाज के पाखंड और दिखावे की प्रवृत्ति का मजाक उड़ा रहा है और प्रेमचंद की सादगी व स्वाभिमान को नमन कर रहा है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

जूता फटने का कारण अधिक चलना समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कुंभनदास का जूता चलने से घिसा था, पर प्रेमचंद का जूता सामाजिक कुरीतियों (टीलों) पर बार-बार ठोकर मारने के कारण ऊपर से फटा था।

प्रेमचंद के फटे जूते: सादगी बनाम पाखंड एवं जूता-टोपी का सामाजिक व्यंग्य

तस्वीर का अद्भुत सच • सादा खद्दर का कुर्ता-धोती • बायाँ कैनवास का जूता फटा • अँगूठे के पास से उँगली बाहर • कोई झिझक या संकोच नहीं • चेहरे पर तीखी व्यंग्य-मुस्कान आडंबरहीन संपूर्ण व्यक्तित्व जूता बनाम टोपी का रूपक 1. टोपी (सम्मान & विद्वता): • सिर का ताज, मान-मर्यादा का प्रतीक। 2. जूता (दौलत & सत्ता): • पैरों की वस्तु, पर समाज में अति-मूल्यवान। • एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर। 3. परसाई का तीखा प्रहार: • भौतिकता के आगे मूल्यों का आत्मसमर्पण। सामाजिक विसंगति पर कटाक्ष टीलों पर ठोकरों का रहस्य • कुंभनदास का जूता: सीकरी जाने में नीचे से घिसा। • प्रेमचंद का जूता: कुरीतियों पर ठोकर से ऊपर फटा। • टीलों से समझौता न करना • पाँव सुरक्षित, उँगली का इशारा अविचल क्रांतिकारी रचनाकार

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
हरिशंकर परसाई ने मुंशी प्रेमचंद के फटे जूते वाले फोटोग्राफ को देखकर यह कालजयी व्यंग्य निबंध लिखा।
मुख्य बिंदु 2
चित्र में प्रेमचंद की पत्नी के साथ सादी वेशभूषा है और उनके बाएँ पैर के कैनवास के जूते से उँगली बाहर झांक रही है।
मुख्य बिंदु 3
लेखक ने समाज की उधार संस्कृति और दिखावे की अंधी दौड़ पर तीखा व्यंग्य किया है जहाँ लोग फोटो के लिए मोटर और कोट माँग लाते हैं।
मुख्य बिंदु 4
प्रेमचंद जैसे महान उपन्यास सम्राट में दिखावे का लेशमात्र नहीं था; वे जैसे भीतर थे, वैसे ही बाहर दिखाई देते थे।
मुख्य बिंदु 5
जूता (दौलत/सत्ता) और टोपी (सम्मान/बुद्धि) के रूपक द्वारा लेखक ने समाज में धन-बल के आगे विद्वता के झुकने पर कटाक्ष किया है।
मुख्य बिंदु 6
भक्त कवि कुंभनदास का जूता फतेहपुर सीकरी आने-जाने में नीचे से घिसा था, जबकि प्रेमचंद का जूता ऊपर से फटा था।
मुख्य बिंदु 7
प्रेमचंद का जूता फटने का कारण यह था कि वे रास्ते की सामाजिक बुराइयों और कुरीतियों (टीलों) से बचकर नहीं निकले, बल्कि ठोकर मारते रहे।
मुख्य बिंदु 8
प्रेमचंद ने कभी अन्यायी व्यवस्था से समझौता नहीं किया, भले ही उनका जूता फट गया।
मुख्य बिंदु 9
प्रेमचंद की बाहर निकली उँगली उन पाखंडियों की ओर इशारा करती है जो अपना तलवा घिसकर चल रहे हैं और लहूलुहान हो रहे हैं।
मुख्य बिंदु 10
प्रेमचंद की रहस्यमयी मुस्कान समाज के उन लोगों पर करारा तमाचा है जो पर्दे और दिखावे के पीछे अपनी असलियत छिपाते हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
प्रेमचंद के फटे जूते व्यंग्य निबंध के लेखक कौन हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

इस निबंध के लेखक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई हैं।


2
प्रेमचंद के किस पैर का जूता फटा हुआ था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

प्रेमचंद के बाएँ पैर का कैनवास का जूता फटा हुआ था, जिससे उँगली बाहर निकल आई थी।


3
पाठ में 'जूता' और 'टोपी' किसके प्रतीक हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

'टोपी' सम्मान, विद्वता और स्वाभिमान का प्रतीक है तथा 'जूता' दौलत, शक्ति और भौतिक संपन्नता का प्रतीक है।


4
प्रेमचंद का जूता नीचे से घिसने के बजाय ऊपर से क्यों फटा था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

क्योंकि उन्होंने रास्ते की सामाजिक कुरीतियों और बुराइयों (टीलों) से समझौता करने के बजाय उन पर लगातार ठोकरें मारी थीं।


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