मौसम (Weather): किसी स्थान की एक विशेष समय में वायुमंडल की क्षणिक अवस्था को मौसम कहते हैं। मौसम के तत्व—तापमान, वायुमंडलीय दबाव, पवन, आर्द्रता और वर्षण—दिन में कई बार बदल सकते हैं (जैसे सुबह धूप और दोपहर में बारिश)।
जलवायु (Climate): एक विशाल क्षेत्र में लंबी कालावधि (कम से कम 30 वर्ष से अधिक) के मौसम की दशाओं के कुल योग और औसत को जलवायु कहते हैं। भारत की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु है।
जलवायु नियंत्रण के 6 प्रमुख कारक (Climatic Controls):
- अक्षांश (Latitude): पृथ्वी की गोलाई के कारण भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर सौर ऊर्जा की मात्रा घटती जाती है, अतः तापमान घटता है। भारत के मध्य से कर्क रेखा (23°30' N) गुजरती है, जिससे इसका दक्षिणी भाग उष्णकटिबंधीय और उत्तरी भाग उपोष्णकटिबंधीय है।
- तुंगता या ऊंचाई (Altitude): जैसे-जैसे हम समुद्र तल से वायुमंडल में ऊपर उठते हैं, वायु विरल होती जाती है और तापमान घटता है (प्रति 165 मीटर पर 1°C की कमी)। यही कारण है कि गर्मियों में भी शिमला, दार्जिलिंग और नैनीताल जैसे पहाड़ी स्थान ठंडे रहते हैं।
- वायुदाब एवं पवन तंत्र (Pressure and Wind System): किसी क्षेत्र का वायुदाब और पवनें उस स्थान के अक्षांश और ऊंचाई पर निर्भर करती हैं, जो तापमान और वर्षा के वितरण को निर्धारित करती हैं।
- समुद्र से दूरी (महाद्वीपीयता - Continentality): समुद्र तापमान पर समकारी (Moderating) प्रभाव डालता है। जैसे-जैसे समुद्र से दूरी बढ़ती है, यह प्रभाव घटता है और मौसम चरम (Extreme) हो जाता है—अर्थात गर्मियों में बहुत अधिक गर्मी और सर्दियों में भीषण ठंड। इसे महाद्वीपीय अवस्था कहते हैं (उदा. दिल्ली बनाम मुंबई)।
- महासागरीय धाराएं (Ocean Currents): गर्म या ठंडी महासागरीय धाराएं तटीय पवनों के साथ मिलकर तट के तापमान को गर्म या ठंडा कर देती हैं।
- उच्चावच लक्षण (Relief Features): ऊंचे पर्वत ठंडी या गर्म हवाओं के लिए प्राकृतिक अवरोधक का कार्य करते हैं। यदि पर्वत मानसूनी हवाओं के मार्ग में हों, तो वे उन्हें ऊपर उठने पर विवश करते हैं और पर्वतीय वर्षा (Orographic Rain) कराते हैं (जैसे पश्चिमी घाट और मेघालय की पहाड़ियां); जबकि पर्वत का दूसरा भाग वृष्टि छाया क्षेत्र (Rain Shadow Area) रह जाता है।