लोकतंत्र में कोई भी बड़ा नीतिगत फैसला किसी एक व्यक्ति की सनक से नहीं होता, बल्कि इसके पीछे एक लंबी संस्थागत प्रक्रिया होती है:
1. कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum - 13 अगस्त 1990):
- भारत सरकार ने 13 अगस्त 1990 को ओ.एम. संख्या 36012/31/90 जारी किया जिसमें केंद्र सरकार की सिविल नौकरियों में 27% रिक्तियां सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) के लिए आरक्षित की गईं।
- इस आदेश पर एक संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी ने हस्ताक्षर किए थे, परंतु वे केवल सरकार के निर्णय को औपचारिक रूप दे रहे थे।
2. इस फैसले की पृष्ठभूमि और संस्थागत श्रृंखला:
- मंडल आयोग (Mandal Commission - 1979): भारत सरकार ने 1979 में बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया। आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट दी और सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण की सिफारिश की।
- संसद में चर्चा: कई वर्षों तक सांसदों ने इस रिपोर्ट को लागू करने की मांग की।
- चुनावी घोषणापत्र (1989): जनता दल ने 1989 के लोकसभा चुनाव में वादा किया कि सत्ता में आने पर मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की जाएंगी।
- कैबिनेट का फैसला: वी.पी. सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद केंद्रीय कैबिनेट ने 6 अगस्त 1990 को औपचारिक निर्णय लिया।
- प्रधानमंत्री द्वारा संसद को सूचना: प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने संसद के दोनों सदनों में वक्तव्य दिया और इसके बाद संबंधित मंत्रालय ने कार्यालय ज्ञापन तैयार किया।
3. विवाद और न्यायपालिका का हस्तक्षेप:
- इस फैसले के खिलाफ देश भर में हिंसक प्रदर्शन और विरोध हुए। इस आदेश को असंवैधानिक बताते हुए कई याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गईं।
- 'इंदिरा साहनी एवं अन्य बनाम भारत संघ' (1992): सर्वोच्च न्यायालय की 11 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया कि सरकार का यह आदेश संवैधानिक रूप से वैध है, परंतु सरकार को इसमें संशोधन करना चाहिए ताकि पिछड़े वर्ग के संपन्न लोगों (क्रीमी लेयर - Creamy Layer) को इस आरक्षण का लाभ न मिले। सरकार ने इस संशोधन को स्वीकार कर नया आदेश जारी किया और विवाद शांत हुआ।