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CBSE • कक्षा 9 • Social Science • अध्याय 15
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

संस्थाओं का कामकाज

लोकतंत्र केवल जनता द्वारा शासकों को चुन लेने भर का नाम नहीं है; वास्तविक लोकतंत्र शासकों के लिए संवैधानिक कायदे-कानूनों, संस्थाओं और मर्यादाओं के भीतर रहकर काम करने की अनिवार्य शर्त रखता है। प्रस्तुत अध्याय भारत की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के तीन प्रमुख अंगों—विधायिका (संसद), कार्यपालिका (राजनीतिक व स्थायी कार्यपालिका) तथा स्वतंत्र न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय)—के अधिकारों, पारस्परिक संबंधों तथा कार्यप्रणाली की वैज्ञानिक पड़ताल करता है। अध्याय 13 अगस्त 1990 के ऐतिहासिक सरकारी कार्यालय ज्ञापन (मंडल आयोग की सिफारिशों के तहत अन्य पिछड़ा वर्ग - OBC को 27% आरक्षण) के जीवंत केस स्टडी से प्रारंभ होता है। इसके माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि देश में कोई बड़ा नीतिगत फैसला कैसे लिया जाता है, संसद की क्या भूमिका होती है, लोकसभा और राज्यसभा की शक्तियों में क्या अंतर है (लोकसभा की सर्वोच्चता के तीन कारण), और राजनीतिक कार्यपालिका (मंत्री) स्थायी कार्यपालिका (IAS/नौकरशाही) से अधिक शक्तिशाली क्यों होती है। अध्याय में प्रधानमंत्री के व्यापक अधिकारों, मंत्रिपरिषद की संरचना, गठबंधन सरकारों की मजबूरियों, राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति, तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) और जनहित याचिका (PIL) का गहन विश्लेषण किया गया है। झारखंड बोर्ड (CBSE) परीक्षा में मंडल आयोग विवाद, लोकसभा बनाम राज्यसभा, प्रधानमंत्री की शक्तियां और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।

एक पन्ने का सरकारी आदेश और पूरे देश में हड़कंप: मंडल आयोग और 27% आरक्षण का महासंग्राम

13 अगस्त 1990 को भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के एक संयुक्त सचिव ने एक साधारण से सरकारी आदेश (कार्यालय ज्ञापन सं. 36012/31/90) पर हस्ताक्षर किए। यह आदेश केवल एक पन्ने का था, लेकिन इसके जारी होते ही मानो पूरे देश में राजनीतिक और सामाजिक भूचाल आ गया! अखबारों की सुर्खियां, रैलियां, हिंसक प्रदर्शन और अदालती मुकदमों की बाढ़ आ गई। इस आदेश ने सरकारी नौकरियों में 'सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों' (SEBC/OBC) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया था। क्या इस एक पन्ने के आदेश का फैसला उस संयुक्त सचिव ने खुद लिया था? बिल्कुल नहीं! इसके पीछे 1979 में गठित बी.पी. मंडल आयोग की रिपोर्ट, 1989 के लोकसभा चुनाव में वी.पी. सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार का चुनावी घोषणापत्र, केंद्रीय मंत्रिमंडल की गुप्त बैठक, संसद में लंबी बहसें, और अंततः सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला ('इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ, 1992') शामिल था। यह घटना सिखाती है कि लोकतंत्र में कोई भी फैसला किसी एक व्यक्ति की मर्जी से नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के एक विशाल जाल के माध्यम से आकार लेता है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

लोकतांत्रिक संस्थाएं शासन की रीढ़ हैं। कई बार छात्रों को लगता है कि संस्थाओं में बैठकों, फाइलों और बहसों के कारण फैसले लेने में बहुत देर होती है और तानाशाही ज्यादा तेज होती है। परंतु यह अध्याय सिद्ध करता है कि संस्थागत विचार-विमर्श ही लोकतंत्र की असली ढाल है जो जल्दबाजी में लिए जाने वाले विनाशकारी और तानाशाही फैसलों को रोकती है। झारखंड जैसे राज्य में प्रशासनिक नीतियों, जनजातीय भूमि कानूनों और आरक्षण के क्रियान्वयन को समझने के लिए कार्यपालिका और न्यायपालिका का यह अध्ययन अपरिहार्य है। CBSE बोर्ड परीक्षा में यह अध्याय राजनीतिक विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण और अवधारणात्मक अध्याय है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • लोकतंत्र, संसद और संविधान के बुनियादी स्वरूप की समझ।
  • संसद (सांसद), मंत्रिपरिषद (प्रधानमंत्री/मंत्री) और अदालत (जज) के कार्यों का प्रारंभिक ज्ञान।
  • आरक्षण और सामाजिक समानता की सामान्य अवधारणा।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • 13 अगस्त 1990 के मंडल आयोग कार्यालय ज्ञापन के माध्यम से सरकारी निर्णय प्रक्रिया के चरणों का विश्लेषण करना।
  • लोकतंत्र में संस्थाओं (संसद, कार्यपालिका, न्यायपालिका) की अनिवार्यता और निर्णयों में विचार-विमर्श के महत्व को सिद्ध करना।
  • संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) की संरचना, शक्तियों और लोकसभा की व्यावहारिक सर्वोच्चता के 3 कारणों की व्याख्या करना।
  • राजनीतिक कार्यपालिका (मंत्रिपरिषद) और स्थायी कार्यपालिका (नौकरशाही/सिविल सेवक) के बीच अंतर स्पष्ट करना।
  • प्रधानमंत्री के पद, शक्तियों, कैबिनेट प्रणाली और गठबंधन सरकारों में प्रधानमंत्री की बदलती भूमिका का मूल्यांकन करना।
  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता, सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियों, न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) और जनहित याचिका (PIL) के महत्व को रेखांकित करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. एक प्रमुख नीतिगत फैसला कैसे लिया...
2 2. राजनीतिक संस्थाओं की आवश्यकता और...
3 3. संसद के दोनों सदन: लोकसभा बनाम र...
4 4. राजनीतिक कार्यपालिका: प्रधानमंत्...
5 5. स्वतंत्र न्यायपालिका (Judiciary)...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. एक प्रमुख नीतिगत फैसला कैसे लिया जाता है? (मंडल आयोग केस स्टडी)

लोकतंत्र में कोई भी बड़ा नीतिगत फैसला किसी एक व्यक्ति की सनक से नहीं होता, बल्कि इसके पीछे एक लंबी संस्थागत प्रक्रिया होती है:

1. कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum - 13 अगस्त 1990):

  • भारत सरकार ने 13 अगस्त 1990 को ओ.एम. संख्या 36012/31/90 जारी किया जिसमें केंद्र सरकार की सिविल नौकरियों में 27% रिक्तियां सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) के लिए आरक्षित की गईं।
  • इस आदेश पर एक संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी ने हस्ताक्षर किए थे, परंतु वे केवल सरकार के निर्णय को औपचारिक रूप दे रहे थे।

2. इस फैसले की पृष्ठभूमि और संस्थागत श्रृंखला:

  1. मंडल आयोग (Mandal Commission - 1979): भारत सरकार ने 1979 में बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया। आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट दी और सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण की सिफारिश की।
  2. संसद में चर्चा: कई वर्षों तक सांसदों ने इस रिपोर्ट को लागू करने की मांग की।
  3. चुनावी घोषणापत्र (1989): जनता दल ने 1989 के लोकसभा चुनाव में वादा किया कि सत्ता में आने पर मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की जाएंगी।
  4. कैबिनेट का फैसला: वी.पी. सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद केंद्रीय कैबिनेट ने 6 अगस्त 1990 को औपचारिक निर्णय लिया।
  5. प्रधानमंत्री द्वारा संसद को सूचना: प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने संसद के दोनों सदनों में वक्तव्य दिया और इसके बाद संबंधित मंत्रालय ने कार्यालय ज्ञापन तैयार किया।

3. विवाद और न्यायपालिका का हस्तक्षेप:

  • इस फैसले के खिलाफ देश भर में हिंसक प्रदर्शन और विरोध हुए। इस आदेश को असंवैधानिक बताते हुए कई याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गईं।
  • 'इंदिरा साहनी एवं अन्य बनाम भारत संघ' (1992): सर्वोच्च न्यायालय की 11 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया कि सरकार का यह आदेश संवैधानिक रूप से वैध है, परंतु सरकार को इसमें संशोधन करना चाहिए ताकि पिछड़े वर्ग के संपन्न लोगों (क्रीमी लेयर - Creamy Layer) को इस आरक्षण का लाभ न मिले। सरकार ने इस संशोधन को स्वीकार कर नया आदेश जारी किया और विवाद शांत हुआ।

2. राजनीतिक संस्थाओं की आवश्यकता और संसद (Parliament) की भूमिका

सरकार के सुचारू संचालन और नागरिकों की सुरक्षा, शिक्षा व स्वास्थ्य के लिए संस्थाओं का होना अनिवार्य है:

संस्थाओं की आवश्यकता क्यों है?

  • प्रधानमंत्री और कैबिनेट नीतिगत फैसले लेते हैं।
  • सिविल सेवक (नौकरशाह) इन फैसलों को धरातल पर लागू करते हैं।
  • यदि नागरिकों और सरकार के बीच कोई विवाद हो, तो सर्वोच्च न्यायालय उसका निष्पक्ष समाधान करता है।
  • संस्थाओं में देरी का लाभ: संस्थाओं में कायदे-कानूनों, बैठकों और परामर्श के कारण फैसले लेने में समय अवश्य लगता है, परंतु यही प्रक्रिया किसी खराब और गैर-जिम्मेदाराना फैसले को जल्दबाजी में लागू होने से रोकती है।

संसद (Parliament) की सर्वोच्च शक्तियां:

भारत में निर्वाचित प्रतिनिधियों की राष्ट्रीय सभा को संसद कहा जाता है (राज्यों में इसे विधानमंडल कहते हैं)। संसद के पास निम्नलिखित प्रमुख शक्तियां हैं:

  1. कानून बनाने की सर्वोच्च संस्था: देश में नए कानून बनाना, पुराने कानूनों को बदलना या समाप्त करना संसद का अनन्य अधिकार है।
  2. सरकार पर नियंत्रण: संसद सरकार (मंत्रिपरिषद) पर सीधा नियंत्रण रखती है; सरकार केवल तभी तक सत्ता में रह सकती है जब तक उसे संसद का विश्वास प्राप्त हो।
  3. सरकारी धन पर नियंत्रण: जनता के टैक्स से आने वाले पैसे का एक-एक रुपया संसद की मंजूरी के बिना खर्च नहीं किया जा सकता। देश का वार्षिक बजट संसद द्वारा ही पारित होता है।
  4. सार्वजनिक बहस का सर्वोच्च मंच: देश की किसी भी समस्या, विदेश नीति या जनहित के मुद्दे पर खुली चर्चा और बहस का यह सर्वोच्च राष्ट्रीय मंच है।

3. संसद के दोनों सदन: लोकसभा बनाम राज्यसभा (शक्तियों की तुलना)

भारतीय संसद के दो सदन हैं: लोकसभा (House of the People / निचला सदन) तथा राज्यसभा (Council of States / उच्च सदन)। भारत के राष्ट्रपति भी संसद के अभिन्न अंग होते हैं।

आधार लोकसभा (निचला सदन) राज्यसभा (उच्च सदन)
सदस्य संख्या एवं चुनाव कुल 543 सदस्य। जनता द्वारा प्रत्यक्ष मतदान से चुने जाते हैं। अधिकतम 250 सदस्य (238 राज्यों की विधानसभाओं के विधायकों द्वारा अप्रत्यक्ष चुने + 12 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत)।
कार्यकाल एवं स्थायित्व 5 वर्ष (समय से पहले भी भंग की जा सकती है)। स्थायी सदन (कभी भंग नहीं होती); प्रत्येक 2 वर्ष पर एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं (सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष)।
संयुक्त अधिवेशन में प्रभाव साधारण विधेयक पर मतभेद होने पर संयुक्त बैठक बुलाई जाती है। लोकसभा की सदस्य संख्या (543) अधिक होने से लोकसभा की राय ही भारी पड़ती है। सदस्य संख्या (245) कम होने के कारण संयुक्त बैठक में अपनी बात मनवा पाना कठिन होता है।
धन विधेयक (Money Bill) बजट और धन विधेयक केवल लोकसभा में पेश हो सकते हैं। लोकसभा द्वारा पास होने पर राज्यसभा इसे खारिज नहीं कर सकती। धन विधेयक को अधिकतम 14 दिनों तक रोक सकती है या सुझाव दे सकती है, जिसे मानना लोकसभा पर निर्भर है।
सरकार पर नियंत्रण मंत्रिपरिषद केवल लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। यदि लोकसभा 'अविश्वास प्रस्ताव' (No-Confidence Motion) पास कर दे तो प्रधानमंत्री सहित पूरी सरकार को इस्तीफा देना पड़ता है। राज्यसभा अविश्वास प्रस्ताव पास करके सरकार को नहीं गिरा सकती।

निष्कर्ष: बोलचाल में राज्यसभा को 'उच्च सदन' कहा जाता है, परंतु वास्तविक और व्यावहारिक रूप में लोकसभा ही अधिक शक्तिशाली सदन है क्योंकि यह जनता की सीधी प्रतिनिधि सभा है।

4. राजनीतिक कार्यपालिका: प्रधानमंत्री, कैबिनेट और राष्ट्रपति

सरकार की नीतियों को अमली जामा पहनाने वाले तंत्र को कार्यपालिका (Executive) कहते हैं। इसके दो रूप हैं:

  1. राजनीतिक कार्यपालिका (Political Executive): जनता द्वारा एक निश्चित अवधि के लिए चुने गए मंत्री (जैसे प्रधानमंत्री, गृह मंत्री)। ये बड़े नीतिगत फैसले लेते हैं।
  2. स्थायी कार्यपालिका (Permanent Executive / Civil Services): प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC) द्वारा चुने गए सिविल सेवक (IAS, IPS आदि)। ये सरकार बदलने पर भी पद पर बने रहते हैं और मंत्रियों को नीति निर्माण में तकनीकी सलाह देते हैं।
मंत्री नौकरशाह से अधिक शक्तिशाली क्यों होता है?
अक्सर सिविल सेवक (IAS) संबंधित विषय (अर्थशास्त्र, रक्षा) में मंत्री से कहीं अधिक शिक्षित और विशेषज्ञ होते हैं। फिर भी अंतिम निर्णय मंत्री ही लेता है क्योंकि लोकतंत्र में जनता की इच्छा सर्वोपरि है। मंत्री जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि होता है और उसे जनता के प्रति जवाबदेह होना पड़ता है; विशेषज्ञ केवल विकल्प बताते हैं, निर्णय जनहित को ध्यान में रखकर जनता का प्रतिनिधि ही करता है।

प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद (Prime Minister & Council of Ministers):

  • प्रधानमंत्री देश की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संस्था हैं। राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं।
  • मंत्रिपरिषद के तीन स्तर होते हैं:
    1. कैबिनेट मंत्री (Cabinet Ministers - लगभग 25): सत्तारूढ़ दल के शीर्ष नेता जो प्रमुख मंत्रालयों (गृह, वित्त, रक्षा, विदेश) के प्रभारी होते हैं। कैबिनेट सरकार की मुख्य निर्णयकारी धुरी है।
    2. स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री: प्रायः छोटे मंत्रालयों के प्रभारी।
    3. राज्य मंत्री (Deputy Ministers): कैबिनेट मंत्रियों को उनके कार्य में सहायता देने वाले।
  • प्रधानमंत्री की शक्तियां: वे कैबिनेट की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय बनाते हैं, मंत्रियों के विभागों का बंटवारा व फेरबदल करते हैं, और किसी भी मंत्री को बर्खास्त कर सकते हैं। यदि प्रधानमंत्री इस्तीफा दे दें, तो पूरी मंत्रिपरिषद का स्वतः पतन हो जाता है।
  • गठबंधन सरकार की सीमाएं: 1989 के बाद भारत में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री अपने मनमुताबिक फैसले नहीं ले सकते; उन्हें सहयोगी दलों के नेताओं की राय और शर्तों का सम्मान करना पड़ता है।

भारत के राष्ट्रपति (The President):

  • राष्ट्रपति देश के राष्ट्राध्यक्ष (Head of the State) होते हैं, जबकि प्रधानमंत्री सरकार के प्रमुख (Head of the Government) होते हैं।
  • राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता नहीं करती, बल्कि संसद (सांसद) और राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य (विधायक) करते हैं।
  • राष्ट्रपति राज्य के केवल नाममात्र के प्रमुख (Nominal Executive) हैं। संविधान के अनुसार राष्ट्रपति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही अपने अधिकारों का प्रयोग करते हैं।
  • विवेकाधीन शक्ति: जब किसी चुनाव में किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो राष्ट्रपति अपने विवेक से उस नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं जो उनकी राय में सदन में बहुमत साबित कर सकता हो।

5. स्वतंत्र न्यायपालिका (Judiciary) एवं न्यायिक समीक्षा

भारत में एक एकीकृत और स्वतंत्र न्यायपालिका (Integrated & Independent Judiciary) है, जिसका शीर्ष न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) है जो नई दिल्ली में स्थित है। इसके अधीन राज्यों में उच्च न्यायालय (High Courts) और जिला अदालतें होती हैं।

1. न्यायपालिका की स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित की गई है:

  • न्यायाधीशों की नियुक्ति: सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और वरिष्ठ न्यायाधीशों की सलाह (कॉलेजियम प्रणाली) से की जाती है। इसमें कार्यपालिका की राजनीतिक दखलअंदाजी नगण्य होती है।
  • हटाने की जटिल प्रक्रिया (महाभियोग - Impeachment): किसी न्यायाधीश को पद से हटाना लगभग असंभव है। उन्हें केवल संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग दो-तिहाई (2/3) बहुमत से महाभियोग प्रस्ताव पारित करके ही हटाया जा सकता है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में आज तक किसी भी न्यायाधीश को महाभियोग द्वारा नहीं हटाया गया है।

2. न्यायपालिका के प्रमुख अधिकार एवं शक्तियां:

  1. विवादों का निपटारा: देश के नागरिकों के बीच, नागरिकों और सरकार के बीच, दो या अधिक राज्य सरकारों के बीच, तथा केंद्र और राज्य सरकार के बीच उत्पन्न विवादों का अंतिम निपटारा सर्वोच्च न्यायालय करता है।
  2. संवैधानिक व्याख्या और न्यायिक समीक्षा (Judicial Review): सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को देश के संविधान की व्याख्या करने का सर्वोच्च अधिकार है। यदि संसद या कार्यपालिका द्वारा बनाया गया कोई कानून संविधान के बुनियादी सिद्धांतों के विरुद्ध है, तो अदालत उस कानून को अवैध और असंवैधानिक (Null & Void) घोषित कर सकती है।
  3. मूल अधिकारों का संरक्षक: नागरिक अपने मौलिक अधिकारों के हनन पर सीधे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जा सकते हैं।
  4. जनहित याचिका (Public Interest Litigation - PIL): यदि सरकार की किसी नीति या विफलता से व्यापक जनहित या गरीबों के अधिकारों का हनन हो रहा हो, तो कोई भी नागरिक या संस्था अदालत में जनहित याचिका (PIL) दायर कर सकती है। अदालतें जनहित की रक्षा के लिए सरकार को तत्काल आदेश जारी करती हैं।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

मंडल आयोग (Mandal Commission)
अध्यक्ष: बी.पी. मंडल (1979) | रिपोर्ट: 1980
सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC/SEBC) हेतु 27% आरक्षण की ऐतिहासिक सिफारिश।
कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum)
13 अगस्त 1990 (O.M. No. 36012/31/90)
प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह के नेतृत्व में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का आदेश।
इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992)
सर्वोच्च न्यायालय का 11 जजों का ऐतिहासिक फैसला
27% आरक्षण को वैध ठहराया गया, परंतु क्रीमी लेयर (संपन्न पिछड़े) को बाहर करने का निर्देश दिया गया।
लोकसभा बनाम राज्यसभा
लोकसभा: 543 सदस्य (प्रत्यक्ष चुनाव) | राज्यसभा: 250 सदस्य (अप्रत्यक्ष चुनाव)
धन विधेयक व अविश्वास प्रस्ताव में लोकसभा को अनन्य सर्वोच्च अधिकार प्राप्त हैं।
महाभियोग (Impeachment)
संसद के दोनों सदनों में 2/3 विशेष बहुमत
सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को पद से हटाने की एकमात्र संवैधानिक प्रक्रिया।
न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) व PIL
संविधान के मूल ढांचे की रक्षा एवं जनहित याचिका
संसद द्वारा बनाए असंवैधानिक कानूनों को निरस्त करने की न्यायपालिका की शक्ति।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1 (दीर्घ उत्तरीय): लोकसभा राज्यसभा की तुलना में अधिक शक्तिशाली सदन क्यों है? इसके समर्थन में किन्हीं तीन मुख्य कारणों का सविस्तार वर्णन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: यद्यपि राज्यसभा को औपचारिक रूप से 'उच्च सदन' कहा जाता है, परंतु भारतीय संविधान के तहत व्यावहारिक और वित्तीय मामलों में लोकसभा ही अधिक शक्तिशाली सदन है। इसके तीन प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  1. संयुक्त अधिवेशन में निर्णायक बहुमत (Joint Sitting): किसी साधारण विधेयक पर दोनों सदनों के बीच मतभेद होने की स्थिति में राष्ट्रपति दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाते हैं। चूंकि लोकसभा की सदस्य संख्या (543) राज्यसभा (245) से दोगुनी से भी अधिक है, अतः संयुक्त बैठक में हमेशा लोकसभा की राय ही विजयी होती है।
  2. वित्तीय मामलों और बजट में सर्वोच्चता (Money Bills): लोकसभा द्वारा एक बार देश का बजट या कोई अन्य धन विधेयक (Money Bill) पास कर दिया जाए, तो राज्यसभा उसे खारिज नहीं कर सकती। राज्यसभा उसे केवल अधिकतम 14 दिनों तक रोक सकती है या केवल संशोधन का सुझाव दे सकती है। लोकसभा उन सुझावों को मानने के लिए बिल्कुल बाध्य नहीं है।
  3. कार्यपालिका और सरकार पर वास्तविक नियंत्रण (अविश्वास प्रस्ताव): सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मंत्रिपरिषद केवल लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। यदि लोकसभा के सदस्यों का बहुमत सरकार के खिलाफ 'अविश्वास प्रस्ताव' (No-Confidence Motion) पारित कर दे, तो प्रधानमंत्री और उनके पूरे मंत्रिमंडल को तुरंत त्यागपत्र देना पड़ता है। राज्यसभा के पास सरकार गिराने की ऐसी कोई शक्ति नहीं है।

चूंकि लोकतंत्र में जनता द्वारा प्रत्यक्ष चुने गए प्रतिनिधियों (लोकसभा) की इच्छा ही सर्वोपरि होनी चाहिए, इसलिए संविधान ने लोकसभा को ये सर्वोच्च शक्तियां प्रदान की हैं।

उदाहरण 2
प्रश्न 2 (लघु उत्तरीय): राजनीतिक कार्यपालिका (Political Executive) और स्थायी कार्यपालिका (Permanent Executive) में अंतर स्पष्ट कीजिए। मंत्री सिविल सेवक से अधिक शक्तिशाली क्यों होता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

1. दोनों में मुख्य अंतर:

राजनीतिक कार्यपालिका स्थायी कार्यपालिका
जनता द्वारा एक निश्चित अवधि (5 वर्ष) के लिए निर्वाचित होते हैं (जैसे प्रधानमंत्री, मंत्री)। सिविल सेवा परीक्षाओं द्वारा दीर्घकाल के लिए नियुक्त होते हैं और सेवानिवृत्ति तक पद पर रहते हैं (जैसे IAS, IPS)।
ये बड़े नीतिगत फैसले लेते हैं और जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। ये मंत्रियों की नीतियों को क्रियान्वित करते हैं और तटस्थ रहकर काम करते हैं।

2. मंत्री के अधिक शक्तिशाली होने का कारण:

लोकतंत्र में जनता की इच्छा सर्वोपरि होती है। मंत्री जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि होता है और उसे अगले चुनाव में जनता को जवाब देना होता है। सिविल सेवक भले ही अधिक शिक्षित या तकनीकी विशेषज्ञ हों, परंतु विशेषज्ञ केवल तकनीकी सलाह देते हैं; समग्र दृष्टिकोण और जनहित को ध्यान में रखकर अंतिम निर्णय जनता का निर्वाचित प्रतिनिधि (मंत्री) ही करता है।

उदाहरण 3
प्रश्न 3 (लघु उत्तरीय): मंडल आयोग (Mandal Commission) क्या था? इसकी प्रमुख सिफारिश क्या थी और इसे किस प्रकार लागू किया गया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. गठन: भारत सरकार ने 1979 में बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में 'दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग' गठित किया जिसे आमतौर पर मंडल आयोग कहा जाता है। इसका कार्य भारत में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करना था।
  2. सिफारिश: आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और सिफारिश की कि केंद्र सरकार की सिविल नौकरियों में 27 प्रतिशत रिक्तियां अन्य पिछड़े वर्गों (OBC/SEBC) के लिए आरक्षित की जाएं।
  3. क्रियान्वयन: 1989 में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनने पर प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने 13 अगस्त 1990 को कार्यालय ज्ञापन द्वारा इस सिफारिश को लागू करने की घोषणा की। सर्वोच्च न्यायालय ने 1992 में 'इंदिरा साहनी केस' में क्रीमी लेयर को छोड़कर इस आरक्षण को वैध ठहराया।
उदाहरण 4
प्रश्न 4 (लघु उत्तरीय): न्यायपालिका की स्वतंत्रता से क्या तात्पर्य है? भारतीय न्यायपालिका को स्वतंत्र बनाए रखने के लिए संविधान में क्या प्रावधान हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

1. न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ:

इसका अर्थ है कि अदालतें कार्यपालिका (सरकार) या विधायिका (संसद) के दबाव या नियंत्रण में काम नहीं करतीं और न्यायाधीश बिना किसी राजनीतिक भय या पक्षपात के संविधान के अनुसार निष्पक्ष न्याय करते हैं।

2. स्वतंत्रता के प्रमुख संवैधानिक प्रावधान:

  • नियुक्ति में स्वतंत्रता: न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश (CJI) और कॉलेजियम की राय अनिवार्य होती है; सरकार अपनी मर्जी से किसी राजनीतिक व्यक्ति को जज नहीं बना सकती।
  • पद की सुरक्षा (महाभियोग): किसी न्यायाधीश को उसके पद से हटाना लगभग असंभव है। उन्हें केवल संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग दो-तिहाई विशेष बहुमत से महाभियोग (Impeachment) प्रस्ताव पारित करके ही कदाचार के आधार पर हटाया जा सकता है।
  • वेतन और भत्ते: न्यायाधीशों के वेतन-भत्ते भारत की संचित निधि से दिए जाते हैं जिन पर संसद में मतदान नहीं हो सकता।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

राज्यसभा को 'उच्च सदन' मानकर यह समझ लेना कि यह लोकसभा से अधिक शक्तिशाली है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह केवल ऐतिहासिक औपनिवेशिक शब्दावली है। भारतीय संविधान में वित्तीय मामलों और सरकार पर नियंत्रण के मामले में लोकसभा, राज्यसभा से कहीं अधिक शक्तिशाली है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की शक्तियों में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

राष्ट्रपति 'राष्ट्राध्यक्ष' (Head of State) और नाममात्र के प्रमुख हैं, जबकि वास्तविक शासक और 'सरकार के प्रमुख' (Head of Government) प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट होती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि संसद का कोई भी सदस्य सीधे किसी भी कानून को लागू कर सकता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

संसद कानून बनाती है, परंतु उसे लागू करने का दायित्व कार्यपालिका (मंत्रियों और सिविल सेवकों) का होता है।

लोकतांत्रिक शासन के तीन प्रमुख अंग एवं शक्ति संतुलन

लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तंभ: विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका Working of Institutions: Separation of Powers, Checks & Balances Architecture भारत का संविधान सर्वोच्च विधान विधायिका (संसद / Parliament) • कानून बनाने की सर्वोच्च संस्था लोकसभा: 543 सदस्य (प्रत्यक्ष चुनाव) धन विधेयक व अविश्वास में सर्वोच्च। राज्यसभा: 250 सदस्य (स्थायी सदन) राज्यों के हितों का प्रतिनिधित्व। ✓ राष्ट्रीय बजट व करों पर पूर्ण नियंत्रण कार्य: कानून निर्माण व सरकार पर नियंत्रण कार्यपालिका (Executive) • नीतियों को लागू करने वाली संस्था राष्ट्रपति: राष्ट्राध्यक्ष (नाममात्र) प्रधानमंत्री: सरकार का प्रमुख (वास्तविक) कैबिनेट: प्रमुख मंत्रालयों के 25 मंत्री स्थायी कार्यपालिका: सिविल सेवक (IAS) ✓ मंत्री जनता के प्रति जवाबदेह कार्य: नीति निर्माण एवं दैनिक प्रशासन स्वतंत्र न्यायपालिका (Judiciary - Supreme Court) ✓ संविधान की व्याख्याता एवं मूल अधिकारों की रक्षक ✓ न्यायिक समीक्षा (Judicial Review): असंवैधानिक कानूनों को रद्द करने की शक्ति। ✓ जनहित याचिका (PIL): जनहित के उल्लंघन पर तुरंत न्यायिक हस्तक्षेप। ✓ सुरक्षा: महाभियोग (2/3 संसद बहुमत) के बिना न्यायाधीश को हटाना असंभव। संसद सरकार पर अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है न्यायिक समीक्षा द्वारा कानूनों व आदेशों की जांच CBSE Class 9 Civics • संस्थाओं का कामकाज: शक्ति पृथक्करण और नियंत्रण एवं संतुलन का जीवंत तंत्र

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
13 अगस्त 1990 का कार्यालय ज्ञापन (मंडल आयोग की सिफारिश पर अन्य पिछड़े वर्गों हेतु 27% आरक्षण) संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का ऐतिहासिक उदाहरण है।
मुख्य बिंदु 2
लोकतंत्र में संस्थाएं (संसद, कार्यपालिका, न्यायपालिका) निर्णयों में व्यापक परामर्श सुनिश्चित करती हैं और किसी तानाशाही फैसले को रोकती हैं।
मुख्य बिंदु 3
संसद सर्वोच्च कानून बनाने वाली, राष्ट्रीय बजट पर नियंत्रण रखने वाली और सरकार से जवाबदेही मांगने वाली संस्था है।
मुख्य बिंदु 4
लोकसभा (543 सदस्य) प्रत्यक्ष रूप से चुनी जाती है, जबकि राज्यसभा (250 सदस्य) राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाला स्थायी उच्च सदन है।
मुख्य बिंदु 5
लोकसभा तीन कारणों से राज्यसभा से अधिक शक्तिशाली है: संयुक्त अधिवेशन में निर्णायक संख्याबल, धन विधेयक/बजट पर अनन्य अधिकार, और अविश्वास प्रस्ताव द्वारा सरकार गिराने की शक्ति।
मुख्य बिंदु 6
राजनीतिक कार्यपालिका (मंत्री) जनता द्वारा चुनी जाती है और नीतिगत फैसले लेती है; स्थायी कार्यपालिका (सिविल सेवक/IAS) विशेषज्ञ होते हैं जो नीतियों को क्रियान्वित करते हैं।
मुख्य बिंदु 7
लोकतंत्र में जनता की इच्छा सर्वोपरि होने के कारण मंत्री (जनप्रतिनिधि) तकनीकी विशेषज्ञ नौकरशाह से अधिक शक्तिशाली होता है।
मुख्य बिंदु 8
प्रधानमंत्री सरकार के वास्तविक प्रमुख होते हैं; वे कैबिनेट की अध्यक्षता करते हैं और पूरे मंत्रिमंडल का संचालन करते हैं।
मुख्य बिंदु 9
राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष (नाममात्र के प्रमुख) हैं जो प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हैं।
मुख्य बिंदु 10
भारत की न्यायपालिका स्वतंत्र और एकीकृत है; सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक, न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का धारक और मौलिक अधिकारों का रक्षक है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
मंडल आयोग (Mandal Commission) ने सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के लिए कितने प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C
बी.पी. मंडल आयोग ने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC/OBC) के लिए 27% आरक्षण की सिफारिश की थी।
2
भारत में किसी भी धन विधेयक (Money Bill) और वार्षिक बजट को पारित करने का अंतिम अधिकार किस सदन के पास है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
धन विधेयक केवल लोकसभा में पेश और पारित किया जा सकता है; राज्यसभा इसे केवल 14 दिनों तक रोक सकती है।
3
यदि लोकसभा में सरकार के खिलाफ कौन-सा प्रस्ताव पारित हो जाए तो प्रधानमंत्री सहित पूरे मंत्रिमंडल को इस्तीफा देना पड़ता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
लोकसभा में 'अविश्वास प्रस्ताव' पारित होने पर सरकार गिर जाती है और प्रधानमंत्री को त्यागपत्र देना होता है।
4
सर्वोच्च न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए संसद में किस प्रक्रिया की आवश्यकता होती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
न्यायाधीश को केवल संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग दो-तिहाई विशेष बहुमत से महाभियोग पारित करके ही हटाया जा सकता है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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कक्षा 9 Social Science के सभी अध्याय

अध्याय 1: फ्रांसीसी क्रांति अध्याय 2: यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति अध्याय 3: नात्सीवाद और हिटलर का उदय अध्याय 4: वन्य समाज एवं उपनिवेशवाद अध्याय 5: आधुनिक विश्व में चरवाहे अध्याय 6: भारत - आकार और स्थिति अध्याय 7: भारत का भौतिक स्वरूप अध्याय 8: अपवाह अध्याय 9: जलवायु अध्याय 10: प्राकृतिक वनस्पति तथा वन्य प्राणी अध्याय 11: जनसंख्या अध्याय 12: लोकतंत्र क्या? लोकतंत्र क्यों? अध्याय 13: संविधान निर्माण अध्याय 14: चुनावी राजनीति अध्याय 15: संस्थाओं का कामकाज अध्याय 16: लोकतांत्रिक अधिकार अध्याय 17: पालमपुर गाँव की कहानी अध्याय 18: संसाधन के रूप में लोग अध्याय 19: निर्धनता: एक चुनौती अध्याय 20: भारत में खाद्य सुरक्षा

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