दक्षिण अफ्रीका का संविधान निर्माण समकालीन विश्व में दमनकारी शासन से समावेशी लोकतंत्र में संक्रमण का सबसे उत्कृष्ट ऐतिहासिक उदाहरण है।
रंगभेद की व्यवस्था (Apartheid Regime):
- 17वीं और 18वीं सदी में यूरोप के व्यापारिक देशों (ब्रिटेन व हॉलैंड) ने दक्षिण अफ्रीका को हथियारों के बल पर गुलाम बनाया और गोरे अल्पसंख्यक शासक बन बैठे।
- इन्होंने रंगभेद (Apartheid) की व्यवस्था लागू की, जिसके तहत लोगों को उनकी चमड़ी के रंग के आधार पर विभाजित किया गया: श्वेत (गोरे), अश्वेत (काले - 3/4 जनसंख्या) और रंगीन चमड़ी वाले (भारतीय व मिश्रित नस्ल)।
- क्रूर भेदभाव: अश्वेतों को गोरों की बस्तियों में रहने, उनके स्कूलों, अस्पतालों, बसों, ट्रेनों, यहाँ तक कि उनके चर्चों और समुद्र तटों (Separate Beaches) पर जाने की पूर्ण मनाही थी। इसे 'पृथक्करण' (Segregation) की नीति कहा गया। अश्वेतों को मतदान और संगठन बनाने का अधिकार नहीं था।
नेल्सन मंडेला और अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (ANC) का संघर्ष:
- 1950 से ही अश्वेतों, रंगीन चमड़ी वालों और भारतीयों ने रंगभेद के विरुद्ध प्रदर्शन शुरू किए। इसका नेतृत्व अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (ANC) ने किया। अनेक संवेदनशील गोरे लोग भी इसमें शामिल हुए।
- नेल्सन मंडेला और सात अन्य प्रमुख नेताओं को 1964 में रंगभेदी शासन का विरोध करने के अपराध में आजीवन कारावास दिया गया और उन्हें कुख्यात रोबेन द्वीप (Robben Island) की जेल में 28 वर्षों तक कैद रखा गया।
एक नए संविधान का उदय (1994):
विश्वव्यापी विरोध और आंतरिक जनविद्रोह के आगे झुकते हुए गोरी सरकार ने रंगभेदी कानून वापस लिए, राजनीतिक दलों से प्रतिबंध हटाया और 28 वर्षों बाद नेल्सन मंडेला जेल से रिहा हुए। 26 अप्रैल 1994 की आधी रात को दक्षिण अफ्रीका गणराज्य का नया झंडा फहराया गया।
- अश्वेत नेताओं ने कहा कि वे गोरों पर बदला नहीं लेंगे, बल्कि सभी नस्लों की समानता, लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों पर आधारित एक नया दक्षिण अफ्रीका बनाएंगे।
- दो वर्षों की व्यापक चर्चा के बाद एक ऐसा संविधान बना जिसने नागरिकों को दुनिया में सबसे व्यापक अधिकार दिए। जो देश कल तक 'अछूत' और दमनकारी माना जाता था, वह 'इंद्रधनुषी राष्ट्र' (Rainbow Nation) के रूप में लोकतंत्र का आदर्श बन गया।