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CBSE • कक्षा 9 • Social Science • अध्याय 5
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

आधुनिक विश्व में चरवाहे

जब हम आधुनिक दुनिया के इतिहास की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान प्रायः शहरों, कारखानों और स्थायी किसानों पर ही केंद्रित रहता है। परंतु मानव सभ्यता के विकास में घुमंतू चरवाहा समुदायों (Pastoral Nomads) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और पर्यावरण-अनुकूल रही है। यह अध्याय भारत और अफ्रीका के घुमंतू चरवाहों के जीवन, उनके ऋतु-प्रवास (Transhumance), मौसम के अनुसार चरागाहों की खोज, और औपनिवेशिक शासन की दमनकारी नीतियों के प्रभावों का सांगोपांग ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारत के पहाड़ों में गुर्जर बकरवाल (जम्मू-कश्मीर), गद्दी (हिमाचल प्रदेश), तथा पठारों व रेगिस्तानों में धनगर (महाराष्ट्र), कुरुमा/कुरुबा (कर्नाटक-आंध्र) और राइका (राजस्थान), तथा अफ्रीका के विख्यात मासाई (Maasai) चरवाहा समुदाय के जीवन के माध्यम से यह अध्याय औपनिवेशिक परती भूमि नियमों (Wasteland Rules), 1871 के आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act), और चराई कर (Grazing Tax) द्वारा उनकी पारंपरिक जीवनशैली को नष्ट करने के प्रयासों को उजागर करता है। झारखंड अधिविद्य परिषद् (CBSE) बोर्ड परीक्षा में 'गुर्जर बकरवाल का मौसमी चक्र', 'औपनिवेशिक नीतियों का चरवाहों पर प्रभाव', 'मासाई समाज में विभाजन' तथा 'आपराधिक जनजाति अधिनियम' पर प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।

बुग्याल से भाबर तक: 10,000 फीट की ऊंचाई पर जीवित रहने की प्राचीन कला

कल्पना कीजिए हिमालय की 12,000 फीट ऊंची बर्फीली चोटियों की, जहाँ जून के महीने में बर्फ पिघलते ही मखमली हरी घास के विशाल मैदान—'बुग्याल' (Bugyals)—खिल उठते हैं। गुर्जर बकरवाल और गद्दी चरवाहे अपने हजारों भेड़ों और बकरियों के रेवड़ के साथ पीर पंजाल के दर्रों को पार करते हुए इन स्वर्गीय चरागाहों की ओर बढ़ते हैं। सितंबर में जब बर्फबारी फिर शुरू होती है, तो वे नीचे शिवालिक की सूखी पहाड़ियों और 'भाबर' (Bhabar) के जंगलों में लौट आते हैं। प्रकृति के चक्र के साथ तालमेल बैठाकर जीने का यह अद्भुत संतुलन शताब्दियों से चला आ रहा है, जिसे औपनिवेशिक लालच की सीमाओं ने खंडित कर दिया।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण क्षरण के आज के युग में चरवाहों की जीवनशैली हमें सिखाती है कि प्रकृति का शोषण किए बिना पारिस्थितिकी तंत्र के साथ सह-अस्तित्व कैसे बनाया जाए। वे चरागाहों को कभी पूरी तरह नष्ट नहीं होने देते; एक स्थान से दूसरे स्थान जाकर वे जमीन को फिर से हरी-भरी होने का अवसर देते हैं। उनके पशु खेतों को प्राकृतिक खाद प्रदान करते हैं। यह अध्याय हमें यह दृष्टि देता है कि विकास के नाम पर पारंपरिक समुदायों की उपेक्षा कितनी विनाशकारी हो सकती है। CBSE बोर्ड परीक्षा में यह अध्याय इतिहास खंड में उच्च अंक दिलाने वाला व्यावहारिक अध्याय है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • घुमंतू चरवाहा जीवन (Nomadic Pastoralism) और स्थायी कृषि में अंतर।
  • ऋतु-प्रवास (Transhumance) की बुनियादी अवधारणा—ऋतुओं के अनुसार चरागाहों का बदलना।
  • भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों (हिमालय, दक्कन पठार, थार रेगिस्तान) की जलवायु की समझ।
  • विश्व मानचित्र पर पूर्वी अफ्रीका (केन्या और तंजानिया) की भौगोलिक स्थिति।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • भारत के पर्वतीय चरवाहों (गुर्जर बकरवाल, गद्दी, भोटिया) के मौसमी आवागमन चक्र और बुग्याल-भाबर की भूमिका को समझना।
  • पठारों, मैदानों और रेगिस्तानों के चरवाहों (धनगर, कुरुमा, बंजारे, राइका) के कृषि-पारिस्थितिक संबंधों का विश्लेषण करना।
  • औपनिवेशिक शासन के चार प्रमुख प्रहारों—परती भूमि नियमावली, वन कानून, आपराधिक जनजाति अधिनियम (1871) और चराई कर की समीक्षा करना।
  • औपनिवेशिक प्रतिबंधों के बाद चरवाहों द्वारा अपनाई गई अनुकूलन रणनीतियों (रेवड़ छोटा करना, नए चरागाह ढूंढना, व्यापार) का मूल्यांकन करना।
  • अफ्रीका के मासाई समुदाय के चरागाहों के छिनने, राष्ट्रीय उद्यानों (सेरेन्गेटी, मसाई मारा) की स्थापना और सामाजिक संरचना में बदलाव की विवेचना करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. पहाड़ों के घुमंतू चरवाहे: गुर्जर...
2 2. पठारों, मैदानों और रेगिस्तानों क...
3 3. औपनिवेशिक शासन और चरवाहों के जीव...
4 4. चरवाहों ने इन परिवर्तनों का सामन...
5 5. अफ्रीका में चरवाहा जीवन: मासाई स...
6 6. सीमाएं बंद होना और मासाई समाज मे...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. पहाड़ों के घुमंतू चरवाहे: गुर्जर बकरवाल, गद्दी और भोटिया

भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में चरवाहों का जीवन ऋतुओं के चक्र—गर्मियों और सर्दियों के बदलाव—से पूरी तरह संचालित होता है। इस मौसमी प्रवास को भूगोल में ऋतु-प्रवास (Transhumance) कहा जाता है।

गुर्जर बकरवाल (जम्मू और कश्मीर):

  • ये भेड़ों और बकरियों के बड़े-बड़े रेवड़ (Flocks) पालते हैं। 19वीं सदी में वे बेहतर चरागाहों की तलाश में कश्मीर आए थे।
  • सर्दियों का चक्र: जब ऊंची पहाड़ियां बर्फ से ढक जाती हैं, तो वे शिवालिक की निचली पहाड़ियों में आ जाते हैं। यहाँ सूखी झाड़ियां और जंगल बकरियों के लिए चारा प्रदान करते हैं।
  • गर्मियों का चक्र: अप्रैल के अंत में बर्फ पिघलने पर वे उत्तर की ओर कश्मीर घाटी के लिए कूच करते हैं। कई परिवार मिलकर यात्रा करते हैं जिसे 'काफिला' (Kafila) कहा जाता है। वे पीर पंजाल के दर्रों को पार कर ऊंची अल्पाइन चरागाहों में पहुंचते हैं, जहाँ बर्फ पिघलने से हरी-भरी पौष्टिक घास उग चुकी होती है। सितंबर के अंत में वे पुनः नीचे की ओर लौटना शुरू कर देते हैं।

गद्दी चरवाहे (हिमाचल प्रदेश):

गद्दी भी ऐसा ही मौसमी चक्र अपनाते हैं। वे सर्दियों में कांगड़ा और शिवालिक की निचली पहाड़ियों में मवेशी चराते हैं। अप्रैल तक वे उत्तर की ओर लाहौल और स्पीति की ओर बढ़ते हैं। गर्मियों में बर्फ पिघलने पर वे ऊंचे दर्रों को पार करके पट्टन घाटी की हरी चरागाहों में चले जाते हैं। सितंबर तक वे वापसी शुरू करते हैं और रास्ते में लाहौल-स्पीति के किसानों की गर्मियों की फसल (फापर) काटते और सर्दियों की फसल (गेहूं) बोते हैं।

गढ़वाल, कुमाऊं और पूर्वोत्तर के चरवाहे:

गढ़वाल और कुमाऊं के गुर्जर मवेशी पालक सर्दियों में 'भाबर' (शिवालिक की तलहटी में सूखा जंगल) में रहते हैं और गर्मियों में 10,000 फीट से अधिक ऊंचे विशाल मखमली घास के मैदानों—'बुग्याल' (Bugyals) की ओर चढ़ जाते हैं। इसी प्रकार हिमालय के अन्य समुदायों—भोटिया, शेरपा और किन्नौरी भी ऋतु-प्रवास करते हैं।

2. पठारों, मैदानों और रेगिस्तानों के चरवाहे: धनगर, कुरुमा और राइका

पठारों और रेगिस्तानों में चरवाहों की आवाजाही बर्फ और ठंड से नहीं, बल्कि मानसून और सूखे के चक्र से तय होती है।

धनगर (महाराष्ट्र):

  • 20वीं सदी के आरंभ में महाराष्ट्र में धनगरों की आबादी 4,67,000 से अधिक थी। अधिकांश गड़रिये थे, कुछ कंबल और चादर बुनते थे और कुछ भैंस पालते थे।
  • मानसून में वे महाराष्ट्र के मध्य पठार (अर्ध-शुष्क इलाका) में रहते थे जहाँ केवल बाजरा उगता था। अक्टूबर के आसपास बाजरा काटकर वे पश्चिम में कोंकण के उपजाऊ इलाके की ओर कूच करते थे।
  • कोंकणी किसानों से परस्पर लाभ का संबंध: कोंकण के किसान उनका स्वागत करते थे। जिस समय धनगर कोंकण पहुंचते थे, उस समय खरीफ की फसल (चावल) कट चुकी होती थी और रबी की फसल के लिए खेतों को तैयार करना होता था। धनगरों के मवेशी ठूंठों को चरते थे और उनके गोबर से खेतों को प्राकृतिक खाद (Fertiliser) मिलती थी। इसके बदले कोंकणी किसान धनगरों को चावल देते थे जिसे वे वापस पठार ले जाते थे जहाँ अनाज की कमी होती थी।
  • मानसून शुरू होते ही धनगर कोंकण छोड़ देते थे क्योंकि उनके भेड़ गीले मानसूनी मौसम को सहन नहीं कर सकते थे।

कुरुमा, कुरुबा और गोल्ला (कर्नाटक और आंध्र प्रदेश):

यहाँ के सूखे मध्य पठारों में गोल्ला मवेशी पालते थे, जबकि कुरुमा और कुरुबा भेड़-बकरियां पालते थे और बुने हुए कंबल बेचते थे। वे जंगल और छोटे-छोटे खेतों के पास रहते थे और शुष्क व मानसूनी मौसम के अनुसार तटवर्ती इलाकों की ओर आवागमन करते थे।

राइका (राजस्थान):

थार रेगिस्तान में वर्षा बहुत कम और अनिश्चित थी। जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर और बीकानेर के राइका खेती के साथ-साथ चरवाहा जीवन जीते थे।

  • मानसून में (जुलाई-अक्टूबर) वे अपने गृह गांवों में रहते थे जहाँ चरागाह उपलब्ध होते थे। अक्टूबर तक ये चरागाह सूख जाते थे, अतः वे नए पानी और चरागाहों की तलाश में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और हरियाणा की ओर पलायन करते थे।
  • मारू राइका: राइकाओं का एक उपसमूह केवल ऊंट पालता था और उनकी बस्ती को 'ढांडी' कहा जाता था। वे पुष्कर और तिलवाड़ा के मेलों में ऊंट बेचते थे।

3. औपनिवेशिक शासन और चरवाहों के जीवन पर चार भीषण प्रहार

अंग्रेज शासक घुमंतू लोगों पर गहरा अविश्वास करते थे। वे चाहते थे कि ग्रामीण एक ही स्थान पर स्थायी रूप से बसें ताकि उन पर नजर रखी जा सके और उनसे आसानी से भू-राजस्व वसूला जा सके। ब्रिटिश सरकार ने चरवाहों के जीवन को तहस-नहस करने वाले चार बड़े कदम उठाए:

1. परती भूमि नियमावली (Waste Land Rules):

अंग्रेजों की नजर में जिस भूमि पर खेती नहीं होती थी, वह 'बेकार' या 'परती' (Waste) थी। उससे न तो राजस्व मिलता था और न ही कृषि उपज। अतः 19वीं सदी के मध्य से विभिन्न प्रांतों में परती भूमि नियम बनाए गए। इसके तहत गैर-कृषि भूमि को अधिग्रहित करके चुनिंदा लोगों को सौंप दिया गया और उन्हें खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इससे चरवाहों के पारंपरिक चरागाह तेजी से घटने लगे।

2. वन अधिनियम (Forest Acts):

1878 के वन अधिनियम द्वारा वनों को आरक्षित और सुरक्षित घोषित किया गया। चरवाहों को मूल्यवान लकड़ी वाले आरक्षित वनों में जाने से पूरी तरह रोक दिया गया। सुरक्षित वनों में उन्हें कड़ी निगरानी, सीमित समय और विशेष परमिट (Permit) के साथ ही प्रवेश मिलता था। यदि वे तय तिथि के बाद जंगल में रुकते थे, तो उन पर भारी जुर्माना लगाया जाता था।

3. आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act - 1871):

1871 में औपनिवेशिक सरकार ने एक अत्यंत अमानवीय कानून पारित किया। इसके तहत दस्तकारों, व्यापारियों और घुमंतू चरवाहों के कई समुदायों को 'जन्मजात अपराधी' घोषित कर दिया गया। उन्हें बिना सरकारी परमिट के अपनी अधिसूचित बस्तियों से बाहर निकलने की मनाही थी और स्थानीय पुलिस उन पर 24 घंटे कड़ी निगरानी रखती थी।

4. चराई कर (Grazing Tax):

अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए अंग्रेजों ने जमीन, पानी, नमक और यहाँ तक कि चरागाहों में चरने वाले प्रत्येक पशु पर चराई कर लगा दिया। 1850 से 1880 के दशकों में यह कर वसूलने का ठेका ठेकेदारों (Contractors) को नीलाम किया जाने लगा। ठेकेदार अधिक मुनाफा कमाने के लिए चरवाहों से बेरहमी से अत्यधिक कर वसूलते थे। प्रत्येक चरवाहे को अपने पशुओं की संख्या के अनुसार पास दिखाना पड़ता था।

4. चरवाहों ने इन परिवर्तनों का सामना किस प्रकार किया?

औपनिवेशिक नीतियों के कारण चरागाहों की भारी कमी हो गई। बचे हुए चरागाहों में मवेशियों की संख्या बढ़ने से चरागाहों की गुणवत्ता गिर गई, भुखमरी फैली और दुर्बल मवेशी बड़ी संख्या में मरने लगे। परंतु चरवाहों ने हार नहीं मानी; उन्होंने बदलती परिस्थितियों का चतुराई से सामना किया:

  • रेवड़ में मवेशियों की संख्या घटाना: बहुत से चरवाहों ने अपने पशुओं की संख्या कम कर दी क्योंकि वे अत्यधिक चराई कर और चारे की कमी नहीं झेल सकते थे।
  • नए चरागाहों की खोज: जब पुराने रास्ते बंद हो गए, तो उन्होंने नए क्षेत्रों की खोज की। उदाहरण के लिए, 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद जब राइका सिंध (अब पाकिस्तान) में सिंधु नदी के तटवर्ती चरागाहों में नहीं जा सके, तो उन्होंने हरियाणा और पंजाब के उन खेतों का रुख किया जहाँ गेहूं कटने के बाद खेतों को खाद की जरूरत होती थी।
  • व्यवसाय में बदलाव: संपन्न चरवाहों ने जमीनें खरीदकर एक जगह स्थायी रूप से बसना शुरू कर दिया और खेती व व्यापार करने लगे।
  • मजदूरी अपनाना: निर्धन चरवाहे जिनके पशु मर चुके थे, उन्होंने शहरों में निर्माण कार्य, ईंट-भट्ठों और खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करना शुरू कर दिया।

इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद चरवाहा जीवन आज भी समाप्त नहीं हुआ है; शुष्क और पर्वतीय क्षेत्रों में यह आज भी सबसे पर्यावरण-अनुकूल आर्थिक गतिविधि है।

5. अफ्रीका में चरवाहा जीवन: मासाई समुदाय का संकट

विश्व की कुल चरवाहा आबादी का आधा हिस्सा अफ्रीका में रहता है—लगभग 2.2 करोड़ लोग। इनमें बेदुइन, बर्बर, मासाई, सोमाली, बोरान और तुर्काना प्रमुख हैं। इनमें से अधिकांश अर्ध-शुष्क रेगिस्तानों या सवाना के घास के मैदानों में रहते हैं जहाँ वर्षा बहुत कम होती है।

मासाई समुदाय (The Maasai Community):

मासाई मुख्य रूप से पूर्वी अफ्रीका—दक्षिणी केन्या और उत्तरी तंजानिया—में रहते हैं। औपनिवेशिक काल से पूर्व मासाई साम्राज्य उत्तर में उत्तरी केन्या से लेकर दक्षिण में तंजानिया के विशाल घास के मैदानों तक फैला हुआ था।

मासाई चरागाहों का छिनना:

  1. अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा का बंटवारा (1885): 19वीं सदी के अंत में यूरोपीय शक्तियों ने अफ्रीका का आपस में बंटवारा कर लिया। 1885 में ब्रिटिश केन्या और जर्मन तांगानियका के बीच एक अंतरराष्ट्रीय सीमा खींचकर मासाई क्षेत्र को दो टुकड़ों में बांट दिया गया। मासाइयों को उनके 60% सर्वश्रेष्ठ चरागाहों से बेदखल कर दिया गया और उन्हें दक्षिणी केन्या व तंजानिया के एक छोटे से सूखे इलाके में धकेल दिया गया जहाँ बहुत कम वर्षा होती थी।
  2. श्वेत बस्तियों और कृषि का विस्तार: अंग्रेजों ने स्थानीय अफ्रीकी किसानों को खेती बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया। चरागाहों को खेतों में बदल दिया गया। मासाई, जो कभी अपने पड़ोसी किसानों पर भारी पड़ते थे, अब सीमित क्षेत्रों में सिमट गए।
  3. गेम रिजर्व और राष्ट्रीय उद्यान (Game Reserves): विशाल चरागाहों को राष्ट्रीय उद्यानों में बदल दिया गया—जैसे केन्या में मासाई मारा (Maasai Mara) और संबुरु तथा तंजानिया में सेरेन्गेटी पार्क (Serengeti Park)। इन पार्कों में चरवाहों के प्रवेश, मवेशी चराने और शिकार करने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया। अकेले सेरेन्गेटी पार्क के निर्माण के लिए 14,760 वर्ग किमी मासाई चरागाह छीन लिए गए।

6. सीमाएं बंद होना और मासाई समाज में सामाजिक विभाजन

19वीं सदी तक चरवाहे सूखे के समय नए इलाकों में जाकर अपने पशुओं को बचा लेते थे। परंतु औपनिवेशिक सरकार ने उनके आने-जाने पर सख्त पाबंदियां लगा दीं। उन्हें विशेष परमिट दिए बिना अपनी आरक्षित बस्तियों से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी।

सूखे और अकाल का प्रभाव:

जब 1933 और 1934 में पूर्वी अफ्रीका में भीषण सूखा पड़ा, तो मासाई अपने पशुओं को चारे वाले इलाकों में नहीं ले जा सके। परिणामस्वरूप मात्र दो वर्षों में मासाई रिजर्व के आधे से अधिक (50%+) मवेशी भूख और प्यास से तड़पकर मर गए।

मासाई समाज में सामाजिक पदानुक्रम:

औपनिवेशिक काल से पूर्व मासाई समाज दो श्रेणियों में बंटा था:

  • एल्डर्स (Elders - वरिष्ठ जन): यह बुजुर्गों का समूह था जो समुदाय के शासन की देखरेख करता था, विचार-विमर्श करता था और विवादों का निपटारा करता था।
  • वॉरियर्स (Warriors - योद्धा): इसमें युवा वर्ग शामिल था जो समुदाय की सुरक्षा करता था और मवेशियों की रक्षा व छापों (Raids) का नेतृत्व करता था। मवेशी ही उनकी संपत्ति थे, अतः दूसरे कबीलों से मवेशी छीनना वीरता का प्रमाण माना जाता था।

औपनिवेशिक काल में नए अंतर:

अंग्रेजों ने मासाई उपसमूहों के मामलों की देखरेख के लिए अपने कठपुतली 'प्रमुख' (Chiefs) नियुक्त किए। इन प्रमुखों को नियमित आमदनी होती थी, जिससे वे जमीन, जानवर और दुकानें खरीद लेते थे। जब सूखा पड़ता, तो ये धनी प्रमुख बच जाते थे क्योंकि उनके पास गैर-चरवाहा आय थी।

इसके विपरीत, गरीब चरवाहे पूरी तरह अपने मवेशियों पर निर्भर थे। युद्ध और सूखे में जब उनके मवेशी मर जाते, तो उनके पास कुछ नहीं बचता था। उन्हें मजदूरी करने शहरों में जाना पड़ा या सड़कों और कोयला खदानों में खटना पड़ा। इस प्रकार औपनिवेशिक नीतियों ने पारंपरिक बुजुर्ग-योद्धा व्यवस्था को तोड़कर अमीर और गरीब चरवाहों के बीच एक गहरी खाई पैदा कर दी।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

ऋतु-प्रवास (Transhumance)
मौसम के अनुसार चरागाहों का चक्रीय प्रवास
गर्मियों में बुग्याल (ऊंचे पहाड़) और सर्दियों में भाबर (तलहटी जंगल) का चक्र।
1871 ई.
आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act)
घुमंतू चरवाहों व कारीगरों को कानूनन 'जन्मजात अपराधी' घोषित किया गया।
1850-1880
चराई कर की ठेकेदारी प्रणाली (Grazing Tax)
प्रति मवेशी कर वसूली; ठेकेदारों द्वारा चरवाहों का निर्मम शोषण।
1885 ई.
मासाईलैंड का अंतरराष्ट्रीय विभाजन
ब्रिटिश केन्या व जर्मन तांगानियका के बीच बंटवारा; मासाइयों के 60% चरागाह छिने।
बुग्याल (Bugyals)
10,000+ फीट की ऊंचाई पर स्थित अल्पाइन घास के मैदान
गर्मियों में बर्फ पिघलने पर उगने वाली पौष्टिक हरी घास।
भाबर (Bhabar)
शिवालिक की तलहटी में स्थित सूखा वनों का क्षेत्र
गुर्जर चरवाहों के लिए सर्दियों का सुरक्षित आश्रय स्थल।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1 (लघु उत्तरीय): जम्मू-कश्मीर के 'गुर्जर बकरवाल' चरवाहों के मौसमी प्रवास (आवागमन चक्र) का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: गुर्जर बकरवाल भेड़ों और बकरियों के बड़े रेवड़ पालते हैं और उनका जीवन गर्मियों व सर्दियों के चक्र से संचालित होता है:

  • सर्दियों में (अक्टूबर से मार्च): जब ऊंचे पहाड़ बर्फ से ढक जाते हैं, तो वे नीचे शिवालिक की पहाड़ियों के सूखे जंगलों में डेरा डालते हैं जहाँ बकरियों के लिए झाड़ियां व चारा उपलब्ध होता है।
  • गर्मियों में (अप्रैल से सितंबर): अप्रैल में बर्फ पिघलते ही वे कई परिवार मिलकर 'काफिला' बनाकर पीर पंजाल के दर्रों को पार करते हुए कश्मीर घाटी की ओर बढ़ते हैं। गर्मियों में वे ऊंचे अल्पाइन चरागाहों में रहते हैं जहाँ हरी और पौष्टिक घास उपलब्ध होती है।
  • सितंबर के अंत में वे दोबारा नीचे की ओर अपनी वापसी यात्रा शुरू करते हैं।
उदाहरण 2
प्रश्न 2 (दीर्घ उत्तरीय): औपनिवेशिक शासनकाल में ब्रिटिश सरकार की नीतियों ने भारतीय चरवाहों के जीवन को किस प्रकार प्रभावित किया? किन्हीं चार कारणों की विवेचना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: ब्रिटिश नीतियों ने भारतीय चरवाहों की आजीविका और स्वतंत्रता पर गहरा प्रहार किया:

1. परती भूमि नियमावली (Waste Land Rules):

अंग्रेज गैर-कृषि भूमि को अनुत्पादक मानते थे क्योंकि उससे भू-राजस्व नहीं मिलता था। उन्होंने चरागाहों को परती भूमि घोषित कर कृषि के लिए आवंटित कर दिया, जिससे चरवाहों के चरागाह सिकुड़ गए।

2. वन अधिनियम (1878):

वनों को आरक्षित और सुरक्षित घोषित कर चरवाहों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई। सुरक्षित वनों में केवल सीमित समय व परमिट से जाने की अनुमति थी; देर होने पर भारी जुर्माना लगता था।

3. आपराधिक जनजाति अधिनियम (1871):

घुमंतू चरवाहों को जन्म से 'अपराधी' घोषित कर दिया गया। उन्हें बिना परमिट बस्तियों से बाहर जाने की मनाही थी और पुलिस उन पर चौबीसों घंटे निगरानी रखती थी।

4. चराई कर (Grazing Tax):

प्रत्येक मवेशी पर चराई कर लगाया गया और वसूली का काम निजी ठेकेदारों को सौंपा गया। ठेकेदारों ने अधिक लाभ के लिए चरवाहों का अमानवीय शोषण किया।

परिणाम:

चरागाहों की कमी से भुखमरी फैली, पशु मरने लगे और कई चरवाहों को शहरों में मजदूरी करने पर मजबूर होना पड़ा।

उदाहरण 3
प्रश्न 3 (विश्लेषणात्मक): महाराष्ट्र के 'धनगर' चरवाहों और कोंकण के किसानों के बीच परस्पर लाभकारी सहजीवी संबंध (Symbiotic Relationship) को स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: महाराष्ट्र के धनगर चरवाहे और कोंकण के किसान एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा करने वाले अनूठे संबंध में बंधे थे:

  • धनगरों का आगमन: मानसूनी बारिश के बाद अक्टूबर के आसपास धनगर मध्य महाराष्ट्र के अर्ध-शुष्क पठार से पश्चिम में कोंकण की ओर बढ़ते थे।
  • किसानों को लाभ (प्राकृतिक खाद): इस समय कोंकण के किसानों की खरीफ की फसल (चावल) कट चुकी होती थी और खेतों को रबी की फसल के लिए तैयार करना होता था। धनगरों की भेड़ें खेतों के ठूंठों को चरती थीं और उनके गोबर से खेतों को उत्तम प्राकृतिक खाद (Fertiliser) मिलती थी।
  • धनगरों को लाभ (चावल की आपूर्ति): इसके बदले कोंकणी किसान धनगरों को चावल का अनाज देते थे, जिसे वे अपने सूखे पठारी इलाकों में ले जाते थे जहाँ चावल की भारी कमी होती थी।
  • मानसून में वापसी: मानसून शुरू होते ही धनगर कोंकण छोड़ देते थे क्योंकि भेड़ें अत्यधिक गीले वातावरण को सहन नहीं कर पाती थीं।
उदाहरण 4
प्रश्न 4 (लघु उत्तरीय): औपनिवेशिक शासन के दौरान अफ्रीका के 'मासाई' (Maasai) चरवाहों के चरागाह किस प्रकार छिन गए?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: औपनिवेशिक नीतियों ने मासाई समुदाय के समृद्ध चरागाहों को नष्ट कर दिया:

  1. 1885 का अंतरराष्ट्रीय विभाजन: अंग्रेजों और जर्मनों ने मासाई क्षेत्र का बंटवारा कर उन्हें उनके 60% सर्वश्रेष्ठ चरागाहों से बेदखल कर दिया और एक छोटे सूखे इलाके में धकेल दिया।
  2. कृषि भूमि का विस्तार: अंग्रेजों ने श्वेत किसानों और स्थानीय कृषकों को चरागाहों पर खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया।
  3. राष्ट्रीय उद्यानों (Game Reserves) का निर्माण: विशाल चरागाहों को 'मासाई मारा' (केन्या) और 'सेरेन्गेटी नेशनल पार्क' (तंजानिया) में बदल दिया गया, जहाँ चरवाहों का प्रवेश और मवेशी चराना पूरी तरह वर्जित कर दिया गया।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

'बुग्याल' (Bugyal) और 'भाबर' (Bhabar) की भौगोलिक अवस्थिति में भ्रम होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

'बुग्याल' हिमालय में 10,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित अल्पाइन घास के मैदान हैं (गर्मियों के चरागाह), जबकि 'भाबर' शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में स्थित शुष्क वनीय क्षेत्र है (सर्दियों का चरागाह)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

आपराधिक जनजाति अधिनियम (1871) को केवल साधारण अपराधियों से संबंधित कानून समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह कानून विशेष रूप से औपनिवेशिक सरकार द्वारा घुमंतू चरवाहों, शिकारियों और कारीगरों को स्थायी बस्तियों में कैद करने और उन पर नियंत्रण रखने के लिए बनाया गया था, जिसमें पूरे समुदाय को जन्म से अपराधी घोषित किया गया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि औपनिवेशिक काल में अफ्रीका के सभी मासाई एक समान रूप से प्रभावित हुए।

सही वैज्ञानिक तथ्य

औपनिवेशिक सरकार द्वारा नियुक्त कठपुतली 'प्रमुख' (Chiefs) अमीर हो गए क्योंकि उनके पास गैर-चरवाहा आय थी, जबकि निर्धन चरवाहे पशुओं की मौत के बाद पूरी तरह बर्बाद होकर शहरों में दिहाड़ी मजदूर बन गए।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

धनगरों को केवल राजस्थान का समुदाय मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

धनगर महाराष्ट्र का एक प्रमुख गड़रिया व चरवाहा समुदाय है; राजस्थान के प्रमुख चरवाहे 'राइका' हैं।

भारत एवं अफ्रीका के प्रमुख चरवाहा समुदाय एवं औपनिवेशिक प्रहार चक्र

आधुनिक विश्व में चरवाहे: भारत एवं अफ्रीका के समुदाय तथा औपनिवेशिक संकट 1. भारत के प्रमुख चरवाहे • पर्वतीय ऋतु-प्रवास (Transhumance): - गुर्जर बकरवाल (जम्मू-कश्मीर) - गद्दी (हिमाचल प्रदेश) - बुग्याल (ऊंचे घास मैदान) ↔ भाबर • पठारी व मैदानी चरवाहे: - धनगर (महाराष्ट्र - कोंकण खाद संबंध) - गोल्ला, कुरुमा, कुरुबा (दक्कन पठार) - बंजारे (उत्तर भारत) • रेगिस्तानी चरवाहे (थार): - राइका (राजस्थान - मारू ऊंट पालक) - वर्षा के बाद म.प्र. व हरियाणा प्रवास पारिस्थितिक संतुलन के संरक्षक 2. औपनिवेशिक 4 भीषण प्रहार 1. परती भूमि नियम (Waste Land): चरागाहों को कृषि भूमि में बदलना 2. 1878 वन अधिनियम: आरक्षित वनों में चराई पर पूर्ण प्रतिबंध 3. आपराधिक जनजाति अधिनियम (1871): चरवाहों को 'जन्मजात अपराधी' घोषित करना 4. चराई कर (Grazing Tax): प्रति मवेशी कर व ठेकेदारों का दमन चरागाहों की अत्यधिक कमी मवेशियों की मौत व मजदूरी अपनाने की विवशता 3. अफ्रीका: मासाई समुदाय • 1885 अंतरराष्ट्रीय सीमा विभाजन: केन्या व तंजानिया के बीच बंटवारा 60% सर्वश्रेष्ठ चरागाह छिन गए • नेशनल पार्क (चराई वर्जित): - सेरेन्गेटी पार्क (14,760 वर्ग किमी) - मासाई मारा रिजर्व (केन्या) • समाज में नया विभाजन: - एल्डर्स (वरिष्ठ) ↔ वॉरियर्स (योद्धा) - औपनिवेशिक प्रमुख (Chiefs) अमीर बने - निर्धन चरवाहे सूखे में बर्बाद 1933-34 का महा-अकाल: 50%+ मवेशियों की भूख-प्यास से मौत

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
घुमंतू चरवाहे पर्यावरण के साथ गहरा तालमेल बैठाकर रहते हैं और मौसम व चरागाहों की उपलब्धता के अनुसार ऋतु-प्रवास (Transhumance) करते हैं।
मुख्य बिंदु 2
जम्मू-कश्मीर के गुर्जर बकरवाल गर्मियों में पीर पंजाल पार कर अल्पाइन चरागाहों में और सर्दियों में शिवालिक की निचली पहाड़ियों में रहते हैं।
मुख्य बिंदु 3
हिमाचल के गद्दी और उत्तराखंड के गुर्जर चरवाहे गर्मियों में ऊंचे मखमली घास के मैदानों (बुग्याल) और सर्दियों में तलहटी के जंगलों (भाबर) का रुख करते हैं।
मुख्य बिंदु 4
महाराष्ट्र के धनगर अक्टूबर में कोंकण जाकर किसानों के खेतों को प्राकृतिक खाद देते हैं और बदले में चावल लेकर अपने सूखे पठारों में लौटते हैं।
मुख्य बिंदु 5
राजस्थान के राइका थार रेगिस्तान में रहते हैं और उनके मारू उपसमूह पुष्कर मेले में ऊंटों का व्यापार करते हैं।
मुख्य बिंदु 6
औपनिवेशिक परती भूमि नियमावली (Waste Land Rules) ने चरागाहों को कृषि भूमि में बदलकर चरवाहों के पारंपरिक अधिकार छीने।
मुख्य बिंदु 7
1878 के वन अधिनियम ने आरक्षित वनों में चराई पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया और परमिट व्यवस्था लागू की।
मुख्य बिंदु 8
1871 के आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act) ने चरवाहों को कानूनन 'जन्मजात अपराधी' घोषित कर उनकी आवाजाही पर कड़ी निगरानी रखी।
मुख्य बिंदु 9
चराई कर (Grazing Tax) के तहत अंग्रेजों ने प्रति मवेशी कर लगाया और निजी ठेकेदारों द्वारा चरवाहों का निर्मम आर्थिक शोषण कराया।
मुख्य बिंदु 10
अफ्रीका में 1885 के बंटवारे ने मासाई समुदाय के 60% सर्वश्रेष्ठ चरागाह छीन लिए और सेरेन्गेटी जैसे पार्कों में चरवाहों का प्रवेश रोककर उन्हें बर्बाद किया।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
हिमालय के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र में 10,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित विशाल प्राकृतिक मखमली घास के मैदानों को क्या कहा जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
हिमालय के ऊंचे पर्वतीय ढलानों पर स्थित हरे-भरे अल्पाइन घास के मैदानों को 'बुग्याल' कहा जाता है, जहाँ गर्मियों में बर्फ पिघलने पर पौष्टिक घास उगती है।
2
ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने किस वर्ष 'आपराधिक जनजाति अधिनियम' (Criminal Tribes Act) पारित कर घुमंतू चरवाहों को जन्मजात अपराधी घोषित किया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
1871 में ब्रिटिश संसद ने कुख्यात आपराधिक जनजाति अधिनियम पारित किया जिसके तहत चरवाहों और घुमंतू कारीगरों को कानूनन अपराधी घोषित कर अधिसूचित गांवों में कैद किया गया।
3
महाराष्ट्र के 'धनगर' चरवाहे मानसूनी बारिश के बाद अक्टूबर के महीने में किस तटीय कृषि क्षेत्र की ओर प्रवास करते थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
धनगर अक्टूबर में कोंकण जाते थे जहाँ उनकी भेड़ें खेतों के ठूंठों को चरती थीं और उनके गोबर से खेतों को खाद मिलती थी, जिसके बदले किसान उन्हें चावल देते थे।
4
1885 में यूरोपीय शक्तियों द्वारा सीमा निर्धारण के बाद अफ्रीका के 'मासाई' (Maasai) चरवाहों ने अपने चरागाहों का कितना प्रतिशत हिस्सा खो दिया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C
1885 में ब्रिटिश केन्या और जर्मन तांगानियका के बीच बंटवारे के बाद मासाई समुदाय ने अपने लगभग 60% सर्वश्रेष्ठ चरागाह खो दिए थे।
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अध्याय 1: फ्रांसीसी क्रांति अध्याय 2: यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति अध्याय 3: नात्सीवाद और हिटलर का उदय अध्याय 4: वन्य समाज एवं उपनिवेशवाद अध्याय 5: आधुनिक विश्व में चरवाहे अध्याय 6: भारत - आकार और स्थिति अध्याय 7: भारत का भौतिक स्वरूप अध्याय 8: अपवाह अध्याय 9: जलवायु अध्याय 10: प्राकृतिक वनस्पति तथा वन्य प्राणी अध्याय 11: जनसंख्या अध्याय 12: लोकतंत्र क्या? लोकतंत्र क्यों? अध्याय 13: संविधान निर्माण अध्याय 14: चुनावी राजनीति अध्याय 15: संस्थाओं का कामकाज अध्याय 16: लोकतांत्रिक अधिकार अध्याय 17: पालमपुर गाँव की कहानी अध्याय 18: संसाधन के रूप में लोग अध्याय 19: निर्धनता: एक चुनौती अध्याय 20: भारत में खाद्य सुरक्षा

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