वनों के लुप्त होने को वन विनाश (Deforestation) कहते हैं। औपनिवेशिक काल में 1880 और 1920 के बीच भारत में खेती योग्य भूमि के विस्तार के चलते 97 लाख हेक्टेयर वन नष्ट कर दिए गए।
वनों की कटाई के प्रमुख औपनिवेशिक कारण:
- ब्रिटिश नौसेना के लिए शाही नौकाएं: 19वीं सदी की शुरुआत तक इंग्लैंड में बलूत (Oak) के जंगल खत्म हो चुके थे। ब्रिटिश शाही नौसेना के जहाजों के लिए मजबूत लकड़ी की आपूर्ति हेतु भारत की वन संपदा को खंगाला गया। 1820 और 1830 के दशकों में भारत से भारी मात्रा में ओक और टीक की लकड़ी का निर्यात किया गया।
- रेलवे का अभूतपूर्व विस्तार: 1850 के दशक से रेलवे औपनिवेशिक व्यापार और सेना की आवाजाही के लिए अपरिहार्य हो गई। रेल इंजनों को चलाने के लिए ईंधन के रूप में लकड़ी चाहिए थी और पटरियों को बांधे रखने के लिए 'स्लीपर' आवश्यक थे। 1860 में भारत में रेल पटरियों की लंबाई 1,349 किमी थी जो 1946 तक बढ़कर 7,65,000 किमी हो गई। इसके लिए लाखों पेड़ प्रतिवर्ष काटे गए।
- व्यावसायिक फसलों और बागानों का प्रसार: अंग्रेजों को कच्चा माल—जैसे पटसन (Jute), कपास, चीनी, गेहूं—चाहिए था। यूरोप की बढ़ती आबादी का पेट भरने और फैक्ट्रियों को चलाने के लिए वनों को साफ कर खेती का विस्तार किया गया। इसके अतिरिक्त चाय, कॉफी और रबर के विशाल बागान (Plantations) स्थापित करने के लिए यूरोपीय कंपनियों को बहुत सस्ती दरों पर जंगल सौंप दिए गए।
- 'अनुत्पादक वनों' की औपनिवेशिक धारणा: अंग्रेज अधिकारियों का मानना था कि जंगल जंगली और अनुत्पादक हैं; वहाँ न तो कृषि होती है और न ही सरकार को कोई भू-राजस्व (Land Revenue) मिलता है। अतः जंगलों को साफ करके कृषि भूमि में बदलना सभ्यता का कार्य माना गया।