लाला झाऊलाल काशी के पक्के महाल में रहते थे। उनकी आर्थिक स्थिति सामान्य थी—खाने-पहनने की कोई कमी न थी, किराये के सौ रुपये मासिक आते थे, परंतु एक साथ ढाई सौ रुपये देखना उनके लिए बड़ी बात थी। एक दिन उनकी पत्नी ने अचानक ₹250 की मांग कर दी।
पारिवारिक प्रतिष्ठा का प्रश्न
जब पत्नी ने कहा—"यदि आपके पास न हों तो मैं अपने भाई से माँग लूँ?" तो झाऊलाल के पुरुषार्थ और प्रतिष्ठा को गहरी चोट लगी। उन्होंने शान से कहा—"मुझसे ही ले लेना... आज से सातवें दिन मुझसे ढाई सौ रुपये ले लेना।" परंतु चार दिन बीत गए और रुपयों का कोई प्रबंध नहीं हुआ। पाँचवें दिन घबराकर वे अपने मित्र पंडित बिलवासी मिश्र के पास गए। बिलवासी जी के पास भी उस समय पैसे नहीं थे, पर उन्होंने कहीं से व्यवस्था करने का आश्वासन दिया।