Follow Us
झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 8 • Hindi (भाषा मंजरी-8) • अध्याय 14
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Akbari Lota

झारखण्ड शैक्षणिक परिषद् (JAC) एवं NCERT पाठ्यक्रम पर आधारित कक्षा 8 हिंदी का चौदहवाँ पाठ "अकबरी लोटा" (Akbari Lota) हास्य और व्यंग्य के प्रसिद्ध लेखक अन्नपूर्णानन्द वर्मा द्वारा रचित एक अत्यंत रोचक, मनोरंजक और बुद्धिमत्तापूर्ण कहानी है। कहानी काशी (वाराणसी) के एक प्रतिष्ठित नागरिक लाला झाऊलाल के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनकी पत्नी अचानक उनसे 250 रुपये की मांग कर बैठती हैं। आर्थिक तंगी के बावजूद अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए झाऊलाल एक सप्ताह में रुपये देने का वादा तो कर लेते हैं, परंतु पाँच दिन बीत जाने पर भी रुपयों का प्रबंध नहीं हो पाता। छठे दिन वे अपने परम मित्र पंडित बिलवासी मिश्र से मदद मांगते हैं। सातवें दिन शाम को छत पर टहलते समय झाऊलाल के हाथ से एक बेढंगा, बदसूरत लोटा छूटकर नीचे गली में खड़े एक अंग्रेज अधिकारी पर गिर पड़ता है। अंग्रेज क्रोध से आगबबूला होकर लालाजी को पीटने पर आमादा हो जाता है। तभी पंडित बिलवासी मिश्र मौके पर पहुँचते हैं और अपनी गजब की वाक्पटुता, कूटनीतिक चातुर्य और मनोवैज्ञानिक सूझबूझ से उस भद्दे लोटे को "सोलहवीं सदी का ऐतिहासिक अकबरी लोटा" बताकर उसी अंग्रेज को पूरे 500 रुपये में बेच देते हैं। यह कहानी हास्य के साथ-साथ सच्ची मित्रता, संकटकाल में प्रत्युत्पन्नमतित्व (Quick Wit) और अंग्रेजों के अंध-ऐतिहासिक शौक पर करारा व्यंग्य करती है।

⚡ एक बेढंगा और बदसूरत लोटा कैसे बना 16वीं सदी का "अकबरी लोटा" और बिका पूरे ₹500 में?

क्या कभी आपने सोचा है कि छत से गिरा एक पुराना लोटा, जिससे एक अंग्रेज सिपाही ऊपर से नीचे तक भीग गया हो, किसी को जेल भिजवाने के बजाय 500 रुपये का भारी इनाम दिलवा सकता है? जब लाला झाऊलाल के सामने 250 रुपये न दे पाने पर पत्नी के सामने अपनी शेखी और मान-मर्यादा मिट्टी में मिलने का खतरा मंडरा रहा था, तभी उनके मित्र पंडित बिलवासी मिश्र ने मैदान में उतरकर एक ऐसा पासा फेंका कि क्रोध से उबलता अंग्रेज ठगा-सा रह गया और खुशी-खुशी लोटे के बदले अपनी जेब खाली कर दी। आइए, हिंदी साहित्य की इस सर्वाधिक हास्य-व्यंग्यपूर्ण और चतुर कहानी का आनंद लें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

यह पाठ विद्यार्थियों में संकट के समय विवेक और प्रत्युत्पन्नमतित्व बनाए रखने, निस्वार्थ मित्रता की महत्ता को समझने और हास्य-व्यंग्य के माध्यम से मानवीय कमजोरियों (जैसे पुरानी चीजों के प्रति अंधा मोह) को परखने की क्षमता विकसित करता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • हास्य और व्यंग्य विधा की बुनियादी समझ।
  • ब्रिटिश कालीन भारत के सामाजिक व आर्थिक परिवेश का सामान्य परिचय।
  • मुहावरों और कहावतों के अर्थ व प्रयोग की जानकारी।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • लाला झाऊलाल, पंडित बिलवासी मिश्र और अंग्रेज पात्र के चरित्र की विशिष्टताओं का विश्लेषण करना।
  • कहानी के मुख्य संघर्ष (250 रुपये की समस्या और लोटा गिरने की घटना) के समाधान में बिलवासी जी के चातुर्य को समझना।
  • जहांगीरी अंडा और अकबरी लोटा के प्रसंग द्वारा अंग्रेजों की पुरानी कलाकृतियों के प्रति अंधविश्वास पर व्यंग्य को स्पष्ट करना।
  • सच्ची मित्रता के नैतिक मूल्यों और संकट समाधान की कला को आत्मसात करना।
  • पाठ के आधार पर व्याकरण, मुहावरों और परीक्षा-उपयोगी प्रश्नों के सटीक उत्तर लिखना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. लाला झाऊलाल की पारिवारिक प्रतिष्...
2 2. बेढंगा लोटा, छत से पतन और अंग्रे...
3 3. पंडित बिलवासी मिश्र का कूटनीतिक...
4 4. लोटे की ऐतिहासिक नीलामी, मेजर डग...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. लाला झाऊलाल की पारिवारिक प्रतिष्ठा का संकट और ₹250 की चुनौती

लाला झाऊलाल काशी के पक्के महाल में रहते थे। उनकी आर्थिक स्थिति सामान्य थी—खाने-पहनने की कोई कमी न थी, किराये के सौ रुपये मासिक आते थे, परंतु एक साथ ढाई सौ रुपये देखना उनके लिए बड़ी बात थी। एक दिन उनकी पत्नी ने अचानक ₹250 की मांग कर दी।

पारिवारिक प्रतिष्ठा का प्रश्न

जब पत्नी ने कहा—"यदि आपके पास न हों तो मैं अपने भाई से माँग लूँ?" तो झाऊलाल के पुरुषार्थ और प्रतिष्ठा को गहरी चोट लगी। उन्होंने शान से कहा—"मुझसे ही ले लेना... आज से सातवें दिन मुझसे ढाई सौ रुपये ले लेना।" परंतु चार दिन बीत गए और रुपयों का कोई प्रबंध नहीं हुआ। पाँचवें दिन घबराकर वे अपने मित्र पंडित बिलवासी मिश्र के पास गए। बिलवासी जी के पास भी उस समय पैसे नहीं थे, पर उन्होंने कहीं से व्यवस्था करने का आश्वासन दिया।

2. बेढंगा लोटा, छत से पतन और अंग्रेज का उग्र क्रोध

सप्ताह का अंतिम दिन आ गया। लाला झाऊलाल अपनी छत पर चिंतामग्न टहल रहे थे। उन्हें प्यास लगी, तो उन्होंने नौकर को आवाज दी। नौकर नहीं था, इसलिए पत्नी ही पानी लेकर आई।

पत्नी पानी तो लाई, पर उस बेढंगे लोटे में, जिसे झाऊलाल अपनी सूरत की तरह नापसंद करते थे। लोटे की बनावट अजीब थी—उसका गढ़ा कुछ ऐसा था जैसे उसका बाप डमरू और माँ चिलम रही हो। लालाजी ने पत्नी के प्रति लिहाज से चुपचाप पानी पीना शुरू किया। अभी दो ही घूँट पिए थे कि हाथ हिला और लोटा छूट गया।

घटनाक्रम विवरण परिणाम
लोटे की उड़ान लोटा उल्का की तरह तीव्र गति से नीचे गली की ओर गिरा। नीचे एक दुकान पर खड़े अंग्रेज पर लोटा गिरा, जिससे वह सिर से पैर तक भीग गया।
अंग्रेज का आक्रोश अंग्रेज पैर पर चोट खाकर एक पैर पर नाचने लगा और अंग्रेजी में गालियाँ देने लगा। लालाजी समझ गए कि आज उनकी खैर नहीं है; पूरी भीड़ उनके आंगन में घुस आई।
बिलवासी जी का प्रवेश पंडित बिलवासी मिश्र भीड़ को चीरते हुए आगे आए। उन्होंने अंग्रेज को कुर्सी पर बैठाया और लालाजी को पहचानने से साफ इनकार कर दिया।

3. पंडित बिलवासी मिश्र का कूटनीतिक नाटक और अकबरी लोटा की मनगढ़ंत कहानी

पंडित बिलवासी मिश्र ने लाला झाऊलाल को देखकर अंग्रेज के सामने ऐसा ढोंग रचा जैसे वे लालाजी को बिल्कुल नहीं जानते। उन्होंने अंग्रेज से कहा—"मैं ऐसे बेवकूफ आदमी को बिल्कुल नहीं जानता जो राह चलते लोगों पर लोटे फेंकता है। मेरी राय में यह खतरनाक पागल है।"

अंग्रेज को अपनी ओर मिलाने के बाद बिलवासी जी ने लोटे की ओर बड़े कौतूहल से देखा और बोले—

"यह एक अत्यंत ऐतिहासिक और दुर्लभ लोटा है! इसका नाम है अकबरी लोटा! 1539 में चौसा के युद्ध में जब शेरशाह सूरी से हारकर हुमायूँ रेगिस्तान में जान बचाकर भाग रहा था, तब एक ब्राह्मण ने इसी लोटे से पानी पिलाकर हुमायूँ की जान बचाई थी। बाद में अकबर ने उस ब्राह्मण का पता लगाकर इस लोटे के बदले उसे 10 सोने के लोटे दिए थे। यह लोटा शाही घराने में सुरक्षित था, पर 1857 के बाद गायब हो गया। दुनिया के सारे अजायबघर (Museums) इसकी तलाश में हैं!"

इस मनगढ़ंत कहानी ने अंग्रेज के मन में ऐतिहासिक वस्तुओं को इकट्ठा करने के पुराने लोभ को भड़का दिया।

4. लोटे की ऐतिहासिक नीलामी, मेजर डगलस की ईर्ष्या और ₹500 में बिक्री

अंग्रेज अधिकारी पुरानी और ऐतिहासिक चीजें संग्रह करने का शौकीन था। उसके पड़ोसी मेजर डगलस ने पिछले वर्ष दिल्ली से तीन सौ रुपये में एक जहांगीरी अंडा (नूरजहाँ के कबूतर का अंडा) खरीदा था, जिसका घमंड वह अक्सर इस अंग्रेज के सामने झाड़ता था।

अंग्रेज ने सोचा कि यदि वह यह अकबरी लोटा खरीद ले, तो वह मेजर डगलस को नीचा दिखा सकता है। बिलवासी जी ने नीलामी का नाटक शुरू किया:

  • बिलवासी जी ने अपनी जेब से ₹250 निकाले और कहा कि वे खुद इस लोटे को खरीदेंगे।
  • अंग्रेज ने ₹300 की बोली लगाई।
  • बिलवासी जी ने ₹350 कहे। अंग्रेज ने ₹400 कहे।
  • बिलवासी जी ने बोली बढ़ाकर ₹450 कर दी।
  • अंततः अंग्रेज ने गुस्से और जोश में आकर ₹500 का नोट निकाल दिया!

बिलवासी जी ने उदास होने का नाटक करते हुए अपने ₹250 समेट लिए। अंग्रेज खुशी-खुशी ₹500 में वह बदसूरत लोटा लेकर रवाना हो गया। झाऊलाल की ₹250 की समस्या भी हल हो गई और ₹250 का अतिरिक्त लाभ भी हो गया। रात में बिलवासी जी ने अपनी पत्नी के सो जाने पर उसके संदूक से चुराए हुए ₹250 चुपचाप वापस रख दिए, जो वे मित्र की मदद के लिए लाए थे!

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

झाऊलाल की मूल समस्या
पत्नी को सातवें दिन ₹250 देने का वचन
पैसे न देने पर अपनी प्रतिष्ठा और मान-मर्यादा नष्ट होने का भय।
संकटमोचक पात्र
पंडित बिलवासी मिश्र (लालाजी के मित्र)
जिन्होंने अपनी प्रत्युत्पन्नमतित्व और वाकपटुता से संकट को अवसर में बदल दिया।
लोटे का काल्पनिक इतिहास
हुमायूँ की जान बचाने वाला 16वीं सदी का अकबरी लोटा
शेरशाह सूरी से पराजित हुमायूँ को रेगिस्तान में पानी पिलाने वाला लोटा बताया गया।
अंग्रेज का प्रतिद्वंद्वी संदर्भ
मेजर डगलस का ₹300 वाला जहांगीरी अंडा
डगलस को मात देने के लिए अंग्रेज ने लोटे के लिए ₹500 की अंतिम बोली लगाई।
लोटे का अंतिम विक्रय मूल्य
₹500 (लालाजी को ₹250 का शुद्ध लाभ)
मित्रता, बुद्धिमत्ता और प्रत्युत्पन्नमतित्व की अनुपम विजय।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1: "लाला झाऊलाल जी ने फौरन दो और दो जोड़कर स्थिति को समझ लिया।" आपके विचार से लालाजी ने कौन-सी स्थिति भांप ली थी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: जब लाला झाऊलाल के हाथ से छूटा लोटा नीचे गली में खड़े एक अंग्रेज के पैर पर गिरा, तो अंग्रेज लंगड़ाता हुआ और अंग्रेजी में गालियाँ बकता हुआ भीड़ के साथ लालाजी के आंगन में आ धमका। लालाजी ने "दो और दो जोड़कर" तुरंत भांप लिया कि:

  1. लोटा सीधा अंग्रेज के ऊपर गिरा है और उसके पैर में गंभीर चोट लगी है।
  2. अंग्रेज अत्यधिक क्रोधित है और उसके साथ भारी भीड़ है।
  3. इस समय कोई भी बहाना या बहस करना मार खाने और पुलिस में पकड़े जाने का कारण बन सकता है। अतः मौन रहकर ही इस संकट से बचा जा सकता है।
उदाहरण 2
प्रश्न 2: पंडित बिलवासी मिश्र ने अंग्रेज के सामने लाला झाऊलाल को पहचानने से इनकार क्यों किया और उन्हें "खतरनाक पागल" क्यों कहा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: पंडित बिलवासी मिश्र अत्यंत चतुर और व्यावहारिक बुद्धि के धनी थे। उन्होंने स्थिति को देखते ही समझ लिया कि यदि वे लाला झाऊलाल का मित्र बनकर बोलेंगे, तो अंग्रेज और अधिक भड़क जाएगा और पुलिस में शिकायत कर देगा। अतः उन्होंने एक कूटनीतिक चाल चली:

  1. लालाजी को पहचानने से इनकार करके और उन्हें "पागल" कहकर उन्होंने पहले अंग्रेज का विश्वास जीत लिया और उसका क्रोध शांत किया।
  2. अंग्रेज को सहानुभूति देकर अपनी बातों के जाल में फंसाया, ताकि वे लोटे की मनगढ़ंत कहानी सुनाकर उसे ऊँचे दाम में बेच सकें। यह उनकी योजना का एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक हिस्सा था।
उदाहरण 3
प्रश्न 3: अंग्रेज ने उस बेढंगे और बदसूरत लोटे को पूरे ₹500 में क्यों खरीदा? उसके पीछे क्या मनोविज्ञान था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: अंग्रेज द्वारा उस भद्दे लोटे को ₹500 में खरीदने के पीछे निम्नलिखित मनोवैज्ञानिक कारण थे:

  1. पुरानी और ऐतिहासिक चीजों का संग्रह करने का शौक: अंग्रेज को प्राचीन ऐतिहासिक अवशेष जमा करने का तीव्र शौक था।
  2. मेजर डगलस से ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा: मेजर डगलस ने पिछले साल दिल्ली से ₹300 में जहांगीरी अंडा खरीदा था और उसका रौब झाड़ता था। अंग्रेज उस लोटे को खरीदकर मेजर डगलस को नीचा दिखाना चाहता था, क्योंकि अकबर जहाँगीर का पिता था, अतः अकबरी लोटा जहाँगीरी अंडे से पुराना और श्रेष्ठ था!
  3. बिलवासी जी की प्रामाणिक वाकपटुता: बिलवासी जी द्वारा गढ़ी गई हुमायूँ और शेरशाह सूरी की कहानी पर अंग्रेज ने पूर्ण विश्वास कर लिया था।
उदाहरण 4
प्रश्न 4: "बिलवासी जी ने जिस समय ₹500 अंग्रेज से लिए, उस समय उनकी मानसिक स्थिति कैसी थी और उन्होंने रात में क्या किया?"
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: जब बिलवासी जी ने अंग्रेज से ₹500 लिए, तो वे मन ही मन अपनी योजना की अप्रत्याशित सफलता पर अत्यंत प्रसन्न और आश्चर्यचकित थे। वे समझ गए कि लालाजी की प्रतिष्ठा भी बच गई और ₹250 का अतिरिक्त लाभ भी हो गया। रात में जब उनकी पत्नी गहरी नींद में सो गईं, तो बिलवासी जी ने दबे पाँव जाकर पत्नी के गले से चाबी निकाली, संदूक खोला और उसमें से निकाले गए ₹250 चुपचाप वहीं रख दिए जो वे लालाजी की सहायता के लिए चुराकर लाए थे। इसके बाद उन्होंने चैन की नींद ली।
उदाहरण 5
प्रश्न 5: "अकबरी लोटा" कहानी से हमें क्या नैतिक और व्यावहारिक सीख मिलती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: इस कहानी से हमें निम्नलिखित प्रमुख सीख मिलती हैं:

  1. संकट में धैर्य और प्रत्युत्पन्नमतित्व (उपस्थित बुद्धि): विकट से विकट संकट के समय घबराने के बजाय शांत रहकर बुद्धि और चातुर्य से काम लेने पर हर समस्या का समाधान निकल सकता है।
  2. सच्ची मित्रता: सच्चा मित्र वही है जो बिना बताए और बिना अहसान जताए मित्र के संकट में ढाल बनकर खड़ा हो जाए, जैसा बिलवासी जी ने किया।
  3. अंधानुकरण और झूठी शान पर व्यंग्य: पुरानी चीजों के नाम पर अंधविश्वास और दूसरों को नीचा दिखाने की होड़ (जैसे अंग्रेज का मेजर डगलस से मुकाबला) मनुष्य को हास्यास्पद बना देती है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: छात्र सोचते हैं कि वह लोटा वास्तव में सम्राट अकबर का ऐतिहासिक लोटा था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

तथ्य: वह लोटा बिल्कुल साधारण, बेढंगा और बदसूरत था। उसे "अकबरी लोटा" केवल पंडित बिलवासी मिश्र ने अपनी कल्पनाशक्ति और चतुराई से मनगढ़ंत कहानी बनाकर सिद्ध किया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: यह समझना कि बिलवासी जी ने ₹500 खुद रख लिए।

सही वैज्ञानिक तथ्य

तथ्य: बिलवासी जी ने पूरे ₹500 लाला झाऊलाल को सौंप दिए, जिससे लालाजी ने अपनी पत्नी को ₹250 दिए और शेष ₹250 बचा लिए।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: मेजर डगलस और अंग्रेज को एक ही व्यक्ति समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

तथ्य: मेजर डगलस अंग्रेज अधिकारी का पड़ोसी और प्रतिद्वंद्वी था, जिसने जहांगीरी अंडा खरीदा था; लोटा खरीदने वाला अंग्रेज अधिकारी अलग था।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

अकबरी लोटा — हास्य, व्यंग्य और प्रत्युत्पन्नमतित्व लेखक: अन्नपूर्णानन्द वर्मा | मुख्य पात्र: लाला झाऊलाल, पंडित बिलवासी मिश्र, अंग्रेज अधिकारी ऐतिहासिक अकबरी लोटा बिक्री मूल्य: ₹500 लाला झाऊलाल का संकट • पत्नी को ₹250 देने का वादा • मान-मर्यादा पर बना संकट • छत से बेढंगे लोटे का गिरना बिलवासी जी का चातुर्य • झाऊलाल को पहचानने से इनकार • हुमायूँ-अकबर की मनगढ़ंत कथा • संकटमोचक निस्वार्थ मित्रता अंग्रेज का अंध-लोभ • पुरानी चीजों के संग्रह का शौक • मेजर डगलस से प्रतिस्पर्धा • जहांगीरी अंडे को मात देने की जिद शानदार परिणाम • लोटा ₹500 में बिका • झाऊलाल की प्रतिष्ठा सुरक्षित • ₹250 की बचत व आनंद की नींद उपस्थित बुद्धि (प्रत्युत्पन्नमतित्व) और सच्ची मित्रता से हर संकट टल जाता है

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. "अकबरी लोटा" अन्नपूर्णानन्द वर्मा द्वारा रचित हिंदी साहित्य की एक कालजयी हास्य-व्यंग्य कहानी है।
मुख्य बिंदु 2
  1. काशी के लाला झाऊलाल की पत्नी द्वारा अचानक ₹250 मांगने पर वे अपनी प्रतिष्ठा के लिए सात दिन में देने का वादा करते हैं।
मुख्य बिंदु 3
  1. आर्थिक तंगी के कारण जब पांच दिन तक धन की व्यवस्था नहीं हुई, तो वे अपने मित्र पंडित बिलवासी मिश्र के पास गए।
मुख्य बिंदु 4
  1. सातवें दिन छत पर टहलते समय झाऊलाल के हाथ से एक बदसूरत लोटा छूटकर नीचे गली में खड़े अंग्रेज पर जा गिरा।
मुख्य बिंदु 5
  1. लोटे से भीगे और चोटिल अंग्रेज ने क्रोध में आकर गली में हंगामा मचा दिया और भीड़ झाऊलाल के आंगन में आ गई।
मुख्य बिंदु 6
  1. मौके पर पहुंचे पंडित बिलवासी मिश्र ने लालाजी को पागल बताकर अंग्रेज की सहानुभूति और विश्वास हासिल कर लिया।
मुख्य बिंदु 7
  1. बिलवासी जी ने लोटे को 16वीं सदी का शेरशाह सूरी और हुमायूँ के समय का ऐतिहासिक "अकबरी लोटा" बताया।
मुख्य बिंदु 8
  1. मेजर डगलस के "जहांगीरी अंडे" से प्रतिस्पर्धा के कारण अंग्रेज ने उस लोटे को पूरे ₹500 में खरीद लिया।
मुख्य बिंदु 9
  1. लाला झाऊलाल की ₹250 की मूल समस्या हल हो गई और ₹250 का अतिरिक्त लाभ प्राप्त हुआ।
मुख्य बिंदु 10
  1. रात में बिलवासी जी ने अपनी सोती पत्नी के संदूक में वे ₹250 चुपचाप रख दिए जो वे मित्र की मदद के लिए लाए थे।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
लाला झाऊलाल की पत्नी ने उनसे कितने रुपयों की मांग की थी और झाऊलाल ने कितने दिन का समय मांगा था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पत्नी ने ₹250 की मांग की थी और झाऊलाल ने एक सप्ताह (सात दिन) का समय मांगा था।
पत्नी के यह कहने पर कि वह अपने भाई से मांग ले, झाऊलाल ने प्रतिष्ठा की खातिर सात दिन में पैसे देने का वचन दिया।
2
बिलवासी जी ने अंग्रेज के सामने उस बेढंगे लोटे का क्या नाम और इतिहास बताया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: उन्होंने इसे "अकबरी लोटा" बताया जिससे चौसा के युद्ध के बाद हुमायूँ की जान बचाई गई थी।
शेरशाह सूरी से पराजित हुमायूँ को रेगिस्तान में इसी लोटे से पानी पिलाया गया था, जिसके बदले अकबर ने 10 सोने के लोटे दिए थे।
3
अंग्रेज अधिकारी किस वस्तु की प्रतिद्वंद्विता में अकबरी लोटा खरीदने के लिए बेताब हो उठा?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मेजर डगलस के ₹300 वाले "जहांगीरी अंडे" की प्रतिद्वंद्विता में।
अकबर जहाँगीर का पिता था, अतः अकबरी लोटे से वह डगलस के जहाँगीरी अंडे को मात देना चाहता था।
4
लोटा अंततः कितने रुपये में बिका?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: लोटा पूरे ₹500 में बिका।
बिलवासी जी द्वारा ₹450 की नकली बोली लगाने पर अंग्रेज ने झटके में ₹500 का नोट निकाल दिया।
5
कहानी के अंत में बिलवासी जी ने अपनी पत्नी के संदूक में क्या और क्यों रखा?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: उन्होंने अपनी पत्नी के संदूक से निकाले गए ₹250 चुपचाप वापस रख दिए।
वे मित्र की सहायता के लिए पत्नी के संदूक से पैसे चुराकर लाए थे, जिसकी अब आवश्यकता नहीं रही थी।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

ऑनलाइन CBT टेस्ट देकर तैयारी का मूल्यांकन करें

झारखण्ड बोर्ड परीक्षा पैटर्न पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्नों का ऑनलाइन टेस्ट दें। तुरंत परिणाम, समय विश्लेषण और प्रत्येक प्रश्न का विस्तृत हल प्राप्त करें।