कविता के प्रथम दो पद्यांशों में दीवानों की फक्कड़ और मस्तमौला जीवन-शैली का मनोहारी चित्रण है:
- हम दीवानों की क्या हस्ती: दीवाने अत्यंत विनम्र होते हैं। वे अपने धन, पद या शक्ति का कभी अहंकार नहीं करते। उनका कोई एक निश्चित ठिकाना नहीं होता; वे आज यहाँ हैं तो कल दूसरी जगह चले जाते हैं।
- मस्ती का आलम: वे जहाँ भी कदम रखते हैं, अपने साथ आनंद, उत्साह और उल्लास की हवा लेकर आते हैं। वे अपनी ही धुन में मस्त होकर धूल उड़ाते हुए चलते हैं।
- आँसू बनकर बह चलना: जब वे किसी स्थान पर पहुँचते हैं तो लोग खुशियों से भर जाते हैं। परंतु जब उनका कर्तव्य उन्हें आगे बुलाता है और वे विदा होते हैं, तो लोग उनके वियोग में रो पड़ते हैं और कहते हैं—"तुम इतनी जल्दी कहाँ चले?"