"पक्षी और बादल, / ये भगवान के डाकिए हैं, / जो एक महादेश से दूसरे महादेश को जाते हैं। / हम तो समझ नहीं पाते हैं / मगर उनकी लाई चिट्ठियाँ / पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ / बाँचते हैं।"
व्याख्या: कवि कहते हैं कि पक्षी और बादल परमात्मा के डाकिया हैं। वे किसी इंसान की व्यक्तिगत चिट्ठी नहीं लाते, बल्कि पूरे विश्व के लिए प्रेम, सद्भाव और एकता का अमर पैगाम लाते हैं। हम इंसान अपने अज्ञान के कारण उस संदेश को नहीं पढ़ पाते, परंतु प्रकृति के अन्य अंग—पेड़, पौधे, नदियाँ और पर्वत—उस भाषा को भली-भांति "बाँचते" (पढ़ते व समझते) हैं और बिना किसी भेदभाव के सबको अपनी छाया, फल और जल देते हैं।
"हम तो केवल यह आँकते हैं / कि एक देश की धरती / दूसरे देश को सुगंध भेजती है। / और वह सौरभ हवा में तैरते हुए / पक्षियों की पाँखों पर तिरता है। / और एक देश का भाप / दूसरे देश में पानी बनकर गिरता है।"
व्याख्या: कवि कहते हैं कि हम तो केवल यह सामान्य अनुमान लगा पाते हैं कि एक देश के फूलों की खुशबू (सौरभ) हवा में उड़कर पक्षियों के पंखों (पाँखों) पर तैरती हुई बिना किसी रोक के दूसरे देश की सीमा में चली जाती है। इसी प्रकार एक देश के समुद्र और नदियों से उठा भाप बादलों का रूप लेकर दूसरे देश में जाकर मूसलाधार बारिश बनकर बरसता है। प्रकृति सीमाओं को नहीं मानती, वह पूरी पृथ्वी को एक सूत्र में पिरोती है।