तमिलनाडु का पुडुकोट्टई जिला भारत के अत्यंत पिछड़े और शुष्क क्षेत्रों में गिना जाता था। 1990 के दशक के आरंभ में यहाँ साक्षरता अभियान (अरीवोली अय्यक्कम - प्रकाश आंदोलन) चलाया गया। इस अभियान में जुटी ग्रामीण महिलाओं ने महसूस किया कि केवल अक्षर ज्ञान पर्याप्त नहीं है; जब तक उनके पास स्वयं चलने और निर्णय लेने की स्वतंत्रता नहीं होगी, तब तक वे सही अर्थों में साक्षर और स्वतंत्र नहीं हो सकतीं।
आंदोलन की मुख्य अगुआ महिलाएं
- जमील बानो: एक युवा मुस्लिम महिला जिन्होंने साइकिल चलाना शुरू करते समय कहा—"यह मेरा अधिकार है। अब हम कहीं भी जा सकते हैं। अब हमें बस का इंतजार नहीं करना पड़ता। मुझे पता है कि जब मैंने शुरुआत की तो लोगों ने फब्तियाँ कसीं, पर मैंने ध्यान नहीं दिया।"
- फातिमा: एक माध्यमिक स्कूल की अध्यापिका, जो हर शाम आधे घंटे के लिए किराए पर साइकिल लेकर चलाती थीं क्योंकि नई साइकिल खरीदने की उनकी आर्थिक स्थिति नहीं थी। उन्होंने कहा—"साइकिल चलाने में एक खास तरह की आजादी है। हमें किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। मैं इसे कभी नहीं छोड़ूँगी।"
- अव्वक्कन्नी और अन्य: 20 वर्ष की आयु के आसपास की नवसाक्षर युवतियां, जिन्होंने अपने समुदाय की अन्य युवतियों और महिलाओं को साइकिल चलाना सिखाया।
लेखक पी. साईनाथ लिखते हैं कि जब वे 1992 में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर पुडुकोट्टई पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि 1,500 से अधिक महिलाओं ने अपने हैंडल पर झंडियाँ बांधकर और घंटियाँ बजाते हुए पूरे शहर में साइकिल रैली निकाली, जिससे पूरा जिला हक्का-बक्का रह गया।