लेखक अपने चार मित्रों के साथ पन्ना से जबलपुर की ट्रेन पकड़ने के लिए शाम की बस में सवार होते हैं:
- लोगों की विचित्र सलाह: समझदार लोगों ने कहा कि इस शाम वाली बस से सफर मत करो। लेखक ने पूछा—क्या रास्ते में डाकू मिलते हैं? लोगों ने जवाब दिया—नहीं, बस खुद "डाकिन" है!
- वयोवृद्ध बस: बस को देखकर लेखक के मन में "श्रद्धा" उमड़ पड़ी। वह सदियों के अनुभव के निशान लिए हुए थी। लोग इसलिए सफर नहीं करना चाहते थे कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा। यह पूजा के योग्य थी, इस पर सवार कैसे हुआ जाए!
- कंपनी के हिस्सेदार का असीम विश्वास: बस कंपनी का एक साझेदार (हिस्सेदार) भी उसी बस में सफर कर रहा था। वह सीना ठोककर कह रहा था—"यह बस बहुत अच्छी चलती है, अपने आप चलेगी, आप देखते जाइए!"