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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 8 • Hindi (भाषा मंजरी-8) • अध्याय 3
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Bus Ki Yatra

झारखण्ड शैक्षणिक परिषद् (JAC) एवं NCERT पाठ्यक्रम पर आधारित कक्षा 8 हिंदी का तीसरा पाठ "बस की यात्रा" (Bus Ki Yatra) हिंदी व्यंग्य साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर हरिशंकर परसाई द्वारा रचित एक अत्यंत लोकप्रिय, हास्य-व्यंग्य से परिपूर्ण व विचारोत्तेजक यात्रा-वृत्तांत है। इस पाठ में लेखक ने अपने चार मित्रों के साथ पन्ना से सतना जाने वाली एक अत्यंत जर्जर, खटारा और दयनीय बस की यात्रा का सजीव व चित्रात्मक वर्णन किया है। लेखक बस की जर्जर अवस्था पर ऐसा अद्भुत मानवीकरण करते हैं कि वह बस एक "वयोवृद्ध वृद्धा" की तरह प्रतीत होती है जिसे देखकर श्रद्धा उमड़ पड़ती है। कंपनी का हिस्सेदार उसी बस में सवार होकर दावा करता है कि "बस अपने आप चलेगी!" यात्रा के दौरान बस का एक-एक पुर्जा दूसरे पुर्जे से असहयोग कर रहा होता है, जो महात्मा गांधी के "सविनय अवज्ञा आंदोलन" (1930) का साक्षात रूपक बन जाता है। कभी पेट्रोल की टंकी में छेद हो जाता है, कभी हेडलाइट की रोशनी बुझ जाती है, और कभी टायर पंचर हो जाता है। यात्री अपनी जान हथेली पर लेकर सफर करते हैं और अंततः गंतव्य पर पहुँचने की उम्मीद छोड़कर केवल हँसी-मजाक में समय गुजारने लगते हैं। परसाई जी का यह व्यंग्य हमारे देश की लचर सार्वजनिक परिवहन प्रणाली और निजी मुनाफाखोर बस मालिकों के गैर-जिम्मेदाराना रवैये पर करारा तमाचा है।

⚡ "बस को देखा तो श्रद्धा उमड़ पड़ी! खूब वयोवृद्ध थी, सदियों के अनुभव के निशान लिए हुए थी"—जब एक चलती-फिरती कबाड़ बस ने यात्रियों को मौत का साक्षात्कार कराया, तो परसाई जी ने हँसी के फव्वारे कैसे छुड़ा दिए?

क्या आपने कभी किसी ऐसी बस या ऑटो में सफर किया है जिसके सारे शीशे टूटे हों, जिसकी सीट से स्प्रिंग बाहर निकलकर आपको चुभ रही हो और जिसका इंजन ऐसा शोर मचा रहा हो मानो आप इंजन के भीतर ही बैठे हों? परसाई जी जब अपने चार मित्रों के साथ शाम की बस में बैठे, तो लोगों ने सलाह दी—"समझदार आदमी इस बस से सफर नहीं करते, यह बस डाकिन नहीं, बल्कि डाकन है!" रास्ते में जब ड्राइवर ने पेट्रोल की टंकी में छेद होने पर बाल्टी में पेट्रोल भरकर नली से इंजन में पहुँचाना शुरू किया, तो यात्रियों की क्या हालत हुई होगी? आइए, हिंदी साहित्य के सबसे शानदार और गुदगुदाने वाले व्यंग्य का आनंद लें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

यह पाठ हमें सिखाता है कि व्यंग्य केवल हँसाने के लिए नहीं होता, बल्कि यह समाज और प्रशासन की गंभीर खामियों, भ्रष्टाचार और नागरिकों की जान से खिलवाड़ करने वाली व्यवस्था पर सोचने को मजबूर करने वाला अचूक साहित्यिक अस्त्र है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • व्यंग्य (Satire) विधा की बुनियादी समझ और हास्य-व्यंग्य का अंतर।
  • भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी के "असहयोग" और "सविनय अवज्ञा" आंदोलनों का संदर्भ।
  • मानवीकरण अलंकार (Personification) का सामान्य परिचय।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • व्यंग्य विधा की विशेषताओं और हरिशंकर परसाई की अनूठी लेखन शैली का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • बस के मानवीकरण (वयोवृद्ध वृद्धा) और उसकी दयनीय दशा के हास्यपूर्ण प्रसंगों की व्याख्या कर सकेंगे।
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience) के रूपक के माध्यम से बस के पुर्जों के असहयोग को समझ सकेंगे।
  • मुनाफाखोर बस मालिकों के लालच और जनता की जान की उपेक्षा पर किए गए कटाक्ष का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • पाठ में प्रयुक्त मुहावरों और व्यंग्यात्मक शब्दावली (इत्तफाक, प्राणांत, उत्सर्ग, बेताबी) का भाषा में सटीक प्रयोग कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. यात्रा का आरंभ और वयोवृद्ध बस का...
2 2. सविनय अवज्ञा आंदोलन और बस के पुर...
3 3. पेट्रोल की टंकी में छेद और चांदन...
4 4. व्यंग्य का मर्म और सामाजिक संदेश...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. यात्रा का आरंभ और वयोवृद्ध बस का मानवीकरण (The Journey Begins)

लेखक अपने चार मित्रों के साथ पन्ना से जबलपुर की ट्रेन पकड़ने के लिए शाम की बस में सवार होते हैं:

  • लोगों की विचित्र सलाह: समझदार लोगों ने कहा कि इस शाम वाली बस से सफर मत करो। लेखक ने पूछा—क्या रास्ते में डाकू मिलते हैं? लोगों ने जवाब दिया—नहीं, बस खुद "डाकिन" है!
  • वयोवृद्ध बस: बस को देखकर लेखक के मन में "श्रद्धा" उमड़ पड़ी। वह सदियों के अनुभव के निशान लिए हुए थी। लोग इसलिए सफर नहीं करना चाहते थे कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा। यह पूजा के योग्य थी, इस पर सवार कैसे हुआ जाए!
  • कंपनी के हिस्सेदार का असीम विश्वास: बस कंपनी का एक साझेदार (हिस्सेदार) भी उसी बस में सफर कर रहा था। वह सीना ठोककर कह रहा था—"यह बस बहुत अच्छी चलती है, अपने आप चलेगी, आप देखते जाइए!"

2. सविनय अवज्ञा आंदोलन और बस के पुर्जे (Civil Disobedience Metaphor)

बस स्टार्ट होते ही पूरी बस ऐसे हिलने लगी मानो सारा संसार ही इंजन बन गया हो:

  • काँच से जान का खतरा: बस की खिड़कियों के बचे-खुचे काँच इतने ढीले थे कि वे यात्रियों पर कभी भी गिर सकते थे। लेखक खिड़की से दूर सरक गए ताकि काँच से बच सकें।
  • गांधीजी के आंदोलन का रूपक: लेखक कहते हैं कि यह बस पूरी तरह गांधीजी के असहयोग (1920) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) के दौर से गुजर रही थी। बस का कोई भी अंग दूसरे अंग का सहयोग नहीं कर रहा था। कभी लगता कि सीट बॉडी को छोड़कर आगे भागी जा रही है, और कभी लगता कि बॉडी सीट को छोड़कर भागी जा रही है!

3. पेट्रोल की टंकी में छेद और चांदनी रात का रोमांच (The Breakdown & Breakdown again)

कुछ दूर चलने के बाद बस अचानक रुक गई और एक नया हास्यास्पद तमाशा शुरू हुआ:

घटना / प्रसंगचालक व हिस्सेदार की प्रतिक्रियाव्यंग्यात्मक प्रभाव
टंकी में छेद होनाड्राइवर ने बाल्टी में पेट्रोल निकाला और नली से इंजन में पहुँचाने लगा।जैसे कोई माँ अपने बच्चे के मुँह में दूध की शीशी लगाती है!
हेडलाइट का बुझनाचांदनी रात में बस रेंगती हुई चल रही थी; सामने कोई गाड़ी आती तो रुक जाती।जैसे कोई बुढ़िया थककर सड़क किनारे बैठ गई हो और कह रही हो—"बेटी, तुम निकल जाओ!"
पुलिया पर टायर पंचरबस जोर से हिलकर नाले में गिरते-गिरते बची। घिसा हुआ दूसरा टायर लगाया गया।कंपनी के हिस्सेदार के बलिदान और त्याग की भावना पर तीखा कटाक्ष।

4. व्यंग्य का मर्म और सामाजिक संदेश (The Core Satire)

इस हास्य-यात्रा के पीछे हरिशंकर परसाई का तीखा सामाजिक व प्रशासनिक संदेश छिपा है:

  • उत्सर्ग की अनुपम भावना: परसाई जी हिस्सेदार पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं कि उस आदमी में आत्म-बलिदान की जो भावना है, उसकी सही जगह किसी क्रांतिकारी आंदोलन में होनी चाहिए थी। वह जानता था कि टायर घिसा हुआ है और जान जा सकती है, फिर भी वह उसी बस में बैठा था!
  • चिंता का अंत: जब यात्रियों को यकीन हो गया कि अब वे समय पर पन्ना या कहीं भी नहीं पहुँच सकते, तो उन्होंने अपनी सारी चिंता, बेताबी और गुस्सा छोड़ दिया और घर की तरह इत्मीनान से बैठकर गपशप करने लगे।
  • सार्वजनिक व्यवस्था पर चोट: यह पाठ दिखाता है कि कैसे मुनाफाखोर मालिक और भ्रष्ट परिवहन विभाग आम नागरिकों की जान हथेली पर रखवाकर कबाड़ गाड़ियों को सड़कों पर दौड़ाते हैं।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

लेखक परिचय
हरिशंकर परसाई (1924-1995) | जन्म: जमानी, होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)
हिंदी साहित्य के शीर्ष व्यंग्यकार; "विकलांग श्रद्धा का दौर" हेतु साहित्य अकादमी पुरस्कार।
साहित्यिक विधा
व्यंग्यात्मक यात्रा-वृत्तांत (Satirical Travelogue)
हास्य और विडंबना के माध्यम से व्यवस्था की खामियों को उजागर करना।
केंद्रीय रूपक
खटारा बस = जर्जर प्रशासनिक तंत्र | सविनय अवज्ञा = पुर्जों का असहयोग
गांधीजी के 1920 व 1930 के ऐतिहासिक आंदोलनों का प्रतीकात्मक प्रयोग।
प्रमुख पात्र / प्रतीक
लेखक व 4 मित्र + बस कंपनी का हिस्सेदार + ड्राइवर + वयोवृद्ध बस
कंपनी का हिस्सेदार मुनाफाखोरी और अंधी लालच का जीवंत प्रतीक है।
भाषा-शैली
सहज, बोलचाल की हिंदी + उर्दू व अंग्रेजी शब्दावली (इत्तफाक, फर्स्ट क्लास)
व्यंग्य की तीक्ष्णता और पाठकों को गुदगुदाने वाली चुटीली शैली।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1: "कारण बताओ"—लोगों ने लेखक को शाम वाली बस से सफर न करने की सलाह क्यों दी थी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: लोगों ने लेखक को शाम वाली बस से सफर न करने की सलाह इसलिए दी थी क्योंकि:

  1. वे बस की अत्यंत जर्जर, खटारा और दयनीय हालत से भली-भांति परिचित थे।
  2. यह बस रास्ते में कब, कहाँ और किस जंगल में खराब होकर खड़ी हो जाएगी, इसका कोई भरोसा नहीं था।
  3. यात्रियों को रात भर सुनसान रास्ते में भटकना पड़ सकता था। लोगों के अनुसार बस डाकुओं से कम नहीं थी, बल्कि वह खुद ही "डाकिन" की तरह यात्रियों को कष्ट पहुँचाने वाली थी।
उदाहरण 2
प्रश्न 2: "ऐसा जैसे सारी बस ही इंजन है और हम इंजन के भीतर बैठे हैं"—लेखक को ऐसा क्यों लगा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: लेखक को ऐसा इसलिए लगा क्योंकि:

  1. जब ड्राइवर ने बस के पुराने और खटारा इंजन को स्टार्ट किया, तो पूरा का पूरा इंजन भयंकर आवाज और कंपन के साथ धड़कने लगा।
  2. उस कंपन से बस की खिड़कियों के ढीले काँच, छत, फर्श और सीटें इतनी जोर-जोर से हिलने लगीं कि यात्रियों के पूरे शरीर में झनझनाहट होने लगी।
  3. बस के भीतर धुँआ और शोर इस कदर भर गया कि यात्रियों को लगा मानो वे बस की सीट पर नहीं, बल्कि सीधे चालू इंजन के भीतर ही बैठे हुए हैं।
उदाहरण 3
प्रश्न 3: गांधीजी के "असहयोग आंदोलन" और "सविनय अवज्ञा आंदोलन" का उपयोग लेखक ने बस के संदर्भ में किस प्रकार किया है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: परसाई जी ने ऐतिहासिक आंदोलनों का बड़ा ही चुटीला व व्यंग्यात्मक प्रयोग किया है:

  1. जिस प्रकार 1920 के असहयोग आंदोलन में भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार के किसी भी काम में सहयोग न करने का फैसला किया था, उसी प्रकार बस का एक-एक पुर्जा दूसरे पुर्जे के साथ असहयोग कर रहा था।
  2. जिस प्रकार 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में जनता ने बिना हिंसा किए विनयपूर्वक अंग्रेजों के कानूनों को मानने से इनकार कर दिया था, उसी प्रकार बस की सीट, स्टीयरिंग, ब्रेक और बॉडी बिना किसी झगड़े के बड़ी शालीनता और विनय के साथ ड्राइवर की आज्ञा मानने से इनकार कर रहे थे!
उदाहरण 4
प्रश्न 4: कंपनी के हिस्सेदार के प्रति लेखक के मन में "श्रद्धा" क्यों जाग गई? इस व्यंग्य का मर्म समझाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: व्यंग्य का मर्म:

  1. लेखक ने हिस्सेदार के प्रति "श्रद्धा" शब्द का प्रयोग शुद्ध व्यंग्य (कटाक्ष) के रूप में किया है।
  2. हिस्सेदार भली-भांति जानता था कि बस का टायर बिल्कुल घिस चुका है और वह कभी भी फट सकता है, जिससे बस नाले में गिरकर सभी की जान ले सकती है।
  3. इसके बावजूद केवल थोड़े से मुनाफे के लालच में वह अपनी जान हथेली पर रखकर उसी बस में यात्रा कर रहा था।
  4. लेखक कहते हैं कि जान की ऐसी बाजी लगाने वाले और त्याग व उत्सर्ग की ऐसी अंधी भावना वाले व्यक्ति को बस चलाने के बजाय किसी आत्मघाती क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व करना चाहिए था!
उदाहरण 5
प्रश्न 5: यात्रा के अंत में लेखक और उनके मित्रों ने अपनी "बेताबी और तनाव" क्यों छोड़ दिया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: लेखक और मित्रों द्वारा तनाव छोड़ने का कारण:

  1. जब एक के बाद एक रुकावटें आईं—पहले टंकी में छेद हुआ, फिर हेडलाइट गई, फिर टायर फटा—तो यात्रियों को पूरी तरह यकीन हो गया कि अब वे समय पर पन्ना या कहीं भी नहीं पहुँच सकते।
  2. जब मृत्यु या दुर्घटना सामने दिखाई देने लगी, तो भविष्य की सारी चिंताएं और समय पर पहुँचने की हड़बड़ाहट व्यर्थ लगने लगी।
  3. उन्होंने मान लिया कि जो होगा देखा जाएगा। वे अपनी सारी बेताबी और गुस्सा त्यागकर शांत हो गए और आपस में हँसी-मजाक व गपशप करते हुए समय बिताने लगे, जैसे वे अपने ही घर के बैठकखाने में बैठे हों।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

छात्र अक्सर मान लेते हैं कि लेखक सचमुच बस के प्रति भक्ति भाव (श्रद्धा) रखता था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यहाँ "श्रद्धा" शब्द का प्रयोग शुद्ध व्यंग्य (Irony) के रूप में किया गया है, जिसका वास्तविक अर्थ बस की अत्यंत दयनीय, जीर्ण-शीर्ण और हास्यास्पद स्थिति पर कटाक्ष करना है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि बस डाकुओं से भरी हुई थी क्योंकि लोगों ने उसे "डाकिन" कहा था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

डाकिन का अर्थ यहाँ किसी महिला डाकू से नहीं है; यह बस की उस प्रकृति की ओर इशारा है जो यात्रियों का समय, पैसा और शांति सब कुछ लूट लेती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गांधीजी के आंदोलनों के उल्लेख को केवल एक ऐतिहासिक तथ्य समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह एक अद्भुत साहित्यिक रूपक है जहाँ बस के कलपुर्जों के आपसी तालमेल के अभाव को राजनीतिक आंदोलन की शब्दावली से जोड़कर व्यंग्य की धार को तेज किया गया है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

हरिशंकर परसाई: "बस की यात्रा" — व्यवस्था पर तीखा हास्य-व्यंग्य "बस सचमुच चल पड़ी और हमें लगा कि यह गाँधीजी के असहयोग आंदोलन के दौर से गुजर रही है" 1. वयोवृद्ध बस का मानवीकरण • श्रद्धा की पात्र वृद्धा: सदियों के अनुभव के निशान • यात्रा से कष्ट होगा सवारी के नहीं, केवल पूजा के योग्य! • काँच और इंजन का आतंक: काँच इतने बचे थे कि उनसे यात्रियों को बचना था "ऐसा लगा कि सारी बस ही इंजन है!" सविनय अवज्ञा: पुर्जों का परस्पर असहयोग 2. हिस्सेदार का लालच व उत्सर्ग • बाल्टी और नली से पेट्रोल: टंकी फूटी तो माँ की तरह नली से पेट्रोल पिलाया रेंगती बस: "बेटी तुम निकलो, अपनी तो उम्र ही नहीं" • जान हथेली पर रख सफर: घिसा टायर फटा, नाले में गिरने से बची हिस्सेदार के "उत्सर्ग" पर परसाई जी का करारा तंज जनता की जान से खिलवाड़ पर चोट व्यंग्य का दार्शनिक निष्कर्ष: तनाव से मुक्ति • जब समय पर पहुँचने की सारी उम्मीदें टूट गईं, तो मृत्यु का भय और गंतव्य की हड़बड़ाहट समाप्त हो गई। • यात्री इत्मीनान से बैठकर घर की तरह गपशप करने लगे; हँसी-मजाक में ही सारा संकट तिरोहित हो गया। • सीख: परसाई जी का व्यंग्य हमें लचर सार्वजनिक व्यवस्था के विरुद्ध जागरूक नागरिक बनने का आह्वान करता है।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. "बस की यात्रा" मूर्धन्य व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई द्वारा रचित एक अत्यंत लोकप्रिय और विचारोत्तेजक हास्य-व्यंग्य निबंध है।
मुख्य बिंदु 2
  1. लेखक अपने चार मित्रों के साथ पन्ना से सतना जाने वाली शाम की बस में यात्रा करते हैं जिसे लोग "डाकिन" कहते थे।
मुख्य बिंदु 3
  1. बस की अत्यंत जीर्ण-शीर्ण और खटारा अवस्था को देखकर लेखक के मन में उसके प्रति व्यंग्यात्मक "श्रद्धा" उमड़ पड़ती है।
मुख्य बिंदु 4
  1. बस कंपनी का हिस्सेदार भी उसी बस में सवार था और वह बड़े आत्मविश्वास से दावा कर रहा था कि बस अपने आप चलेगी।
मुख्य बिंदु 5
  1. बस के चालू होते ही इंजन इतना शोर और कंपन करता है कि यात्रियों को लगता है मानो वे इंजन के भीतर ही बैठे हों।
मुख्य बिंदु 6
  1. लेखक बस के पुर्जों के आपसी तालमेल के अभाव की तुलना गांधीजी के "असहयोग" और "सविनय अवज्ञा" आंदोलनों से करते हैं।
मुख्य बिंदु 7
  1. बीच रास्ते में पेट्रोल की टंकी में छेद हो जाने पर ड्राइवर बाल्टी में पेट्रोल भरकर नली से इंजन में पहुँचाता है।
मुख्य बिंदु 8
  1. चांदनी रात में जब बस की हेडलाइट बुझ जाती है, तो वह किसी थकी हुई बुढ़िया की तरह सड़क किनारे रेंगने लगती है।
मुख्य बिंदु 9
  1. पुलिया पर टायर पंचर होने पर लेखक हिस्सेदार के लालच और अंधी मुनाफाखोरी पर तीखा कटाक्ष करते हैं।
मुख्य बिंदु 10
  1. अंततः समय पर पहुँचने की उम्मीद छोड़कर सभी यात्री चिंतामुक्त होकर हँसी-मजाक में समय गुजारने लगते हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
"बस की यात्रा" पाठ के लेखक कौन हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: हरिशंकर परसाई
हरिशंकर परसाई हिंदी साहित्य के मूर्धन्य व्यंग्यकार हैं जिन्होंने सामाजिक व राजनीतिक विसंगतियों पर कालजयी व्यंग्य लिखे।
2
लेखक ने बस की जीर्ण-शीर्ण हालत देखकर उसकी तुलना किससे की?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: एक वयोवृद्ध वृद्धा से
लेखक ने बस का मानवीकरण करते हुए उसे सदियों के अनुभव से भरी एक वयोवृद्ध वृद्धा कहा जो केवल पूजा के योग्य थी।
3
बस के कलपुर्जों के आपसी असहयोग की तुलना लेखक ने किस ऐतिहासिक आंदोलन से की?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: गांधीजी के सविनय अवज्ञा एवं असहयोग आंदोलन से
लेखक ने रूपक बांधा कि बस की सीट और बॉडी सविनय अवज्ञा आंदोलन की तरह एक-दूसरे का साथ नहीं दे रहे थे।
4
पेट्रोल की टंकी में छेद होने पर ड्राइवर ने क्या जुगाड़ किया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: बाल्टी में पेट्रोल निकालकर नली से इंजन में पहुँचाया
ड्राइवर ने बाल्टी में पेट्रोल निकाला और नली लगाकर बच्चे को दूध पिलाने की तरह इंजन में ईंधन पहुँचाया।
5
लेखक ने कंपनी के हिस्सेदार के त्याग को किस आंदोलन के योग्य बताया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्रांतिकारी आंदोलन के योग्य
लेखक ने व्यंग्य किया कि जान हथेली पर रखकर खटारा बस में बैठने वाले हिस्सेदार का उत्सर्ग किसी क्रांतिकारी आंदोलन में होना चाहिए था।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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