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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 8 • Hindi (भाषा मंजरी-8) • अध्याय 9
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Kabir Ki Sakhiyan

झारखण्ड शैक्षणिक परिषद् (JAC) एवं NCERT पाठ्यक्रम पर आधारित कक्षा 8 हिंदी का नौवाँ पाठ "कबीर की साखियाँ" (Kabir Ki Sakhiyan) भक्ति काल की ज्ञानमार्गी शाखा के शीर्ष समाज-सुधारक संत कबीरदास द्वारा रचित पाँच अत्यंत ज्ञानवर्धक, अनुभवसिद्ध व जीवनोपयोगी दोहों का अनूठा संकलन है। "साखी" शब्द वस्तुतः संस्कृत के "साक्षी" (प्रत्यक्षदर्शी / आँखों देखा गवाह) शब्द का तद्भव रूप है। कबीर ने पुस्तकीय ज्ञान (पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ) के स्थान पर आँखों देखे व्यावहारिक जीवन-सत्य को अपनी वाणी बनाया। प्रथम साखी में वे बाह्य जाति-पांति के स्थान पर आंतरिक ज्ञान को पूजने का संदेश देते हैं ("जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥")। दूसरी साखी में अपशब्द या गाली के प्रत्युत्तर में मौन रहकर बुराई को एक ही जगह समाप्त करने की अद्भुत मनोवैज्ञानिक सीख दी गई है। तीसरी साखी में हाथ में माला फेरने और जीभ से राम-राम रटने वाले पाखंडियों पर प्रहार करते हुए मन की एकाग्रता को वास्तविक भक्ति बताया गया है। चौथी साखी में पैरों तले रौंदे जाने वाले छोटे से तिनके की भी निंदा न करने का निर्देश है, जो आँख में पड़कर असहनीय पीड़ा देता है। पाँचवीं साखी में मन का अहंकार त्यागने पर संपूर्ण संसार में कोई शत्रु न रहने और सर्वत्र प्रेम फैलने का महामंत्र दिया गया है।

⚡ "माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माँहि। मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै, यह तौ सुमिरन नाहिं॥"—कबीर के इस एक दोहे ने सदियों से चले आ रहे धार्मिक दिखावे की धज्जियाँ कैसे उड़ा दीं?

क्या कभी आपने किसी ऐसे व्यक्ति को देखा है जो हाथ में मोतियों की माला घुमा रहा हो, मुँह से मंत्र बुदबुदा रहा हो, परंतु उसकी नजरें इस बात पर टिकी हों कि पास से कौन गुजर रहा है या किसका नुकसान किया जाए? 15वीं सदी के बनारस में जुलाहे का काम करने वाले अनपढ़ संत कबीर ने किसी मंदिर या मस्जिद के आगे सिर झुकाने से पहले इंसान की अंतरात्मा को झकझोरा। उन्होंने पूछा—जब तलवार से युद्ध जीतना है, तो म्यान की सुंदरता पर रुपया क्यों बर्बाद करते हो? पैरों के नीचे दबे एक सूखे तिनके की ताकत क्या है? आइए, कबीरदास की इन अमर साखियों में छिपे जीवन के परम सत्य को समझें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

कबीर की साखियाँ सामाजिक समरसता, जातिवाद के उन्मूलन, मानसिक शांति, सहिष्णुता और वास्तविक आध्यात्मिकता का पाठ पढ़ाती हैं। यह पाठ विद्यार्थियों को बाह्य दिखावे से दूर रहकर आंतरिक चरित्र निर्माण की शाश्वत प्रेरणा देता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • संत कबीरदास के व्यक्तित्व और भक्ति काल की ज्ञानमार्गी शाखा का सामान्य परिचय।
  • दोहा छंद की संरचना (प्रथम व तृतीय चरण में 13 मात्राएँ, द्वितीय व चतुर्थ में 11 मात्राएँ)।
  • सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी भाषा का स्वरूप।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • कबीर की सभी पाँचों साखियों का सस्वर, लयबद्ध व शुद्ध उच्चारण सहित पाठ कर सकेंगे।
  • प्रत्येक साखी के नीतिपरक और व्यावहारिक संदेश की सप्रसंग व्याख्या कर सकेंगे।
  • "साखी" शब्द के व्युत्पत्तिगत अर्थ (साक्षी / आँखों देखा सत्य) को स्पष्ट कर सकेंगे।
  • मन की एकाग्रता बनाम बाह्य आडंबर (माला फेरना) के द्वंद्व का आलोचनात्मक मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • सधुक्कड़ी भाषा के देशज शब्दों (तरवार, म्यान, गारी, दहुँ दिसि, बैरी, आपा) का अर्थ समझकर भाषा-प्रयोग कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. साखी का अर्थ एवं कबीर की दृष्टि...
2 2. साखियों की सप्रसंग व्याख्या (Det...
3 3. साखियों की तुलनात्मक समीक्षा (Co...
4 4. शब्दार्थ एवं व्याकरण (Vocabulary...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. साखी का अर्थ एवं कबीर की दृष्टि (Concept of Sakhi & Kabir’s Vision)

कबीरदास हिंदी साहित्य के सर्वाधिक निर्भीक, क्रांतिकारी और स्पष्टवादी संत कवि हैं:

  • "साखी" का वास्तविक अर्थ: साखी शब्द संस्कृत के साक्षी (Witness) का अपभ्रंश है। कबीर ने कहा था—"तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी।" वे जो कुछ कहते हैं, वह उनका अपना प्रत्यक्ष जीवन-अनुभव है।
  • जाति-पांति और पाखंड का खंडन: कबीर जन्म आधारित ऊंच-नीच के घोर विरोधी थे। वे कर्म और ज्ञान को ही मनुष्य की वास्तविक पहचान मानते थे।
  • सधुक्कड़ी भाषा: कबीर साधु-संतों के साथ घूमते रहे, इसलिए उनकी भाषा में अवधी, भोजपुरी, ब्रज, पंजाबी और राजस्थानी के शब्द घुले-मिले हैं, जिसे पंचमेल खिचड़ी या सधुक्कड़ी कहा जाता है।

2. साखियों की सप्रसंग व्याख्या (Detailed Explanation of Sakhis)

पाठ की पाँचों साखियों का क्रमवार गूढ़ भावार्थ:

"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। / मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥"

भावार्थ: किसी सज्जन या ज्ञानी पुरुष से उसकी जाति, कुल या धर्म नहीं पूछना चाहिए, बल्कि उसके ज्ञान की कद्र करनी चाहिए। ठीक वैसे ही जैसे युद्ध में तलवार की धार और मजबूती देखी जाती है, म्यान चाहे सोने की हो या चमड़े की, उसका कोई मोल नहीं होता।

"आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक। / कह कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक॥"

भावार्थ: जब कोई हमें एक गाली (अपशब्द) देता है, और यदि हम क्रोध में पलटकर उत्तर देते हैं, तो वह बढ़कर अनेक हो जाती है और झगड़ा बढ़ जाता है। कबीर कहते हैं कि गाली का जवाब गाली से मत दो; शांत रहो, वह एक की एक ही रहकर स्वतः समाप्त हो जाएगी।

"माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माँहि। / मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै, यह तौ सुमिरन नाहिं॥"

भावार्थ: हाथ में मनकों की माला घूम रही है, मुँह में जीभ भगवान का नाम जप रही है, परंतु चंचल मन दसों दिशाओं में भटक रहा है। कबीर कहते हैं कि यह ढोंग ईश्वर का सच्चा स्मरण (सुमिरन) नहीं है। सच्ची भक्ति मन की एकाग्रता और पवित्रता में है।

"कबीर घास न नींदिए, जो पाँऊ तलि होइ। / उड़ी पड़ै जब आँखि में, खरी दुहेली होइ॥"

भावार्थ: पैरों के नीचे रौंदे जाने वाले छोटे से तिनके (घास) की भी कभी उपेक्षा या निंदा नहीं करनी चाहिए। वही छोटा सा तिनका जब हवा में उड़कर आँख में पड़ जाता है, तो वह अत्यंत कष्टदायक (खरी दुहेली) पीड़ा देता है। समाज के छोटे और कमजोर व्यक्ति को भी कभी निर्बल समझकर सताना नहीं चाहिए।

"जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन सीतल होइ। / या आपा को डारि दे, दया करै सब कोइ॥"

भावार्थ: यदि मनुष्य का मन शांत, शीतल और विकार-रहित है, तो इस संसार में उसका कोई भी शत्रु (बैरी) नहीं हो सकता। मनुष्य को बस अपने "आपा" (अहंकार / घमंड) को त्याग देना चाहिए, फिर पूरी दुनिया उस पर प्रेम और दया बरसाने लगेगी।

3. साखियों की तुलनात्मक समीक्षा (Comparative Analysis)

पाँचों साखियों के मुख्य व्यावहारिक संदेश:

साखी क्रममुख्य विषयदैनिक जीवन में उपयोगिता
साखी 1ज्ञान की महत्ता बनाम जातिवादयोग्यता और गुणों का सम्मान करना, बाह्य आवरण पर ध्यान न देना।
साखी 2क्रोध पर नियंत्रण व सहिष्णुताअपशब्दों का उत्तर मौन से देना, विवादों को बढ़ने से रोकना।
साखी 3आंतरिक भक्ति बनाम बाह्याडंबरदिखावे की पूजा छोड़कर एकाग्रचित्त होकर कार्य व ईश्वर-चिंतन करना।
साखी 4कमजोर का सम्मानकिसी गरीब या छोटे व्यक्ति को तुच्छ न समझना; सबका आत्मसम्मान होता है।
साखी 5अहंकार का त्यागघमंड मिटाकर विनम्रता अपनाना, जिससे सभी मित्र बन जाते हैं।

4. शब्दार्थ एवं व्याकरण (Vocabulary & Grammar)

सधुक्कड़ी भाषा के प्रमुख देशज व तत्सम शब्द:

  • मोल (Mol): मूल्य, कीमत (उदा. समय का मोल पहचानो)।
  • तरवार (Tarwar): तलवार (तद्भव रूप)।
  • म्यान (Myaan): तलवार रखने का खोल।
  • गारी (Gaari): गाली, अपशब्द।
  • उलटत (Ulatat): पलटकर जवाब देने पर।
  • कर (Kar): हाथ (संस्कृत: कर)।
  • मनुवाँ (Manuwa): मन, अंतःकरण।
  • दहुँ दिसि (Dahun Disi): दसों दिशाओं में (चारों ओर)।
  • सुमिरन (Sumiran): स्मरण, प्रभु की सच्ची भक्ति।
  • नींदिए (Neendiye): निंदा करना, अपमान करना।
  • पाँऊ तलि (Paaon Tali): पैरों के नीचे।
  • खरी दुहेली (Khari Duheli): बहुत अधिक दुखदायी या कष्टप्रद।
  • बैरी (Bairi): शत्रु, दुश्मन।
  • सीतल (Seetal): शीतल, शांत, क्रोधरहित।
  • आपा (Aapa): अहंकार, घमंड, स्वार्थ की भावना।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

संत कबीरदास परिचय
जन्म: 1398 ई. (काशी) | देहावसान: 1518 ई. (मगहर)
भक्ति काल की निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि कवि; मुख्य ग्रंथ: "बीजक" (साखी, सबद, रमैनी)।
काव्य विधा
दोहा छंद (साखी - साक्षी का तद्भव रूप)
मात्रिक छंद: 13-11 मात्राओं के विश्राम से रचित नीतिपरक दोहा।
भाषा-शैली
सधुक्कड़ी / पंचमेल खिचड़ी (अवधी, ब्रज, राजस्थानी, भोजपुरी मिश्रित)
सरल, जनभाषा जो सीधे जन-हृदय में उतर जाती है।
मुख्य रस
शांत रस (भक्ति व वैराग्य) | नीति व उपदेश प्रधान
मन के विकारों को शांत कर आध्यात्मिक शांति प्रदान करने वाला काव्य।
कबीर का महामंत्र
"या आपा को डारि दे, दया करै सब कोइ"
अहंकार का त्याग ही संसार में सर्वप्रिय और ईश्वर-प्रिय बनने का एकमात्र मार्ग है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1: "तलवार का महत्व होता है, म्यान का नहीं"—उक्त उदाहरण से कबीर क्या समझाना चाहते हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: कबीरदास इस दृष्टांत के माध्यम से यह समझाना चाहते हैं कि:

  1. किसी भी व्यक्ति का वास्तविक मूल्य उसके गुणों, चरित्र और ज्ञान से आँका जाना चाहिए, न कि उसकी बाह्य जाति, वेशभूषा, कुल या आर्थिक स्थिति से।
  2. जिस प्रकार युद्ध के मैदान में केवल तलवार की धार और मजबूती काम आती है और म्यान चाहे सोने की बनी हो, उसकी कोई उपयोगिता नहीं होती; उसी प्रकार संकट और जीवन में मनुष्य का सच्चा ज्ञान ही काम आता है, उसकी जाति नहीं। अतः हमें जातिवाद को छोड़कर केवल ज्ञान का आदर करना चाहिए।
उदाहरण 2
प्रश्न 2: पाठ की तीसरी साखी में कबीर बाह्याडंबर और पाखंड पर किस प्रकार प्रहार करते हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: तीसरी साखी: "माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माँहि। मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै, यह तौ सुमिरन नाहिं॥" प्रहार:

  1. कबीर कहते हैं कि जो लोग हाथ में मोतियों की माला घुमाते हैं और मुँह से ईश्वर का नाम जपते हैं, परंतु जिनका मन संसार की विषय-वासनाओं और दसों दिशाओं में भटकता रहता है, वे वास्तव में भक्ति नहीं बल्कि ढोंग (पाखंड) कर रहे हैं।
  2. जब तक मन एकाग्र, पवित्र और स्थिर नहीं होगा, तब तक केवल शारीरिक क्रियाओं से भगवान को प्राप्त नहीं किया जा सकता। सच्ची भक्ति मन की एकाग्रता में है।
उदाहरण 3
प्रश्न 3: कबीर घास की निंदा करने से क्यों मना करते हैं? इसका हमारे सामाजिक जीवन में क्या महत्व है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: 1. मना करने का कारण: कबीर कहते हैं कि पैरों के नीचे दबे छोटे से तिनके की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जब वही तिनका हवा में उड़कर आँख में पड़ जाता है, तो वह अत्यंत भयंकर पीड़ा देता है और मनुष्य को बेहाल कर देता है। 2. सामाजिक महत्व: इसका गहरा सामाजिक संदेश यह है कि समाज के किसी भी गरीब, कमजोर, शोषित या छोटे व्यक्ति को कभी तुच्छ समझकर उसका अपमान नहीं करना चाहिए। यदि कमजोर व्यक्ति का आत्मसम्मान जाग जाए और वह संगठित होकर विद्रोह कर दे, तो वह बड़े-बड़े अत्याचारियों और सामंतों की सत्ता को हिला सकता है।

उदाहरण 4
प्रश्न 4: "आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक"—इस साखी के माध्यम से कबीर विवादों को समाप्त करने का क्या व्यावहारिक उपाय बताते हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: कबीरदास विवादों को सुलझाने का अत्यंत सटीक मनोवैज्ञानिक उपाय बताते हैं:

  1. जब कोई व्यक्ति क्रोध में आकर किसी को एक गाली (अपशब्द) देता है, तो वह केवल एक होती है।
  2. यदि दूसरा व्यक्ति भी पलटकर उसे गाली देता है, तो गाली-गलौज और मारपीट बढ़ जाती है और बात बिगड़ जाती है।
  3. कबीर कहते हैं कि यदि सामने वाला गाली दे, तो तुम शांत रहकर मौन धारण कर लो। जब गाली का कोई जवाब नहीं मिलेगा, तो वह एक की एक ही रहकर वहीं निष्प्रभावी होकर समाप्त हो जाएगी। मौन और क्षमा ही क्रोध को जीतने का अचूक अस्त्र है।
उदाहरण 5
प्रश्न 5: मनुष्य के भीतर का कौन-सा दुर्गुण उसे पूरे संसार का शत्रु बना देता है और उसका समाधान क्या है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: 1. दुर्गुण: मनुष्य के भीतर का "आपा" अर्थात उसका अहंकार, घमंड और स्वार्थ की भावना ही उसे पूरे संसार का शत्रु बना देती है। जब व्यक्ति अपने आगे दूसरों को तुच्छ समझता है, तो लोग उससे दूर होने लगते हैं और उसके दुश्मन बन जाते हैं। 2. समाधान: कबीर कहते हैं कि मनुष्य को अपने मन से घमंड और अहंकार को पूरी तरह निकाल फेंकना चाहिए और अपने मन को शीतल (शांत व विनम्र) बना लेना चाहिए। जब मन में विनम्रता और प्रेम होगा, तो पूरी दुनिया में उसका कोई शत्रु नहीं रहेगा और सभी उस पर दया व स्नेह बरसाएंगे।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

छात्र अक्सर "आपा" शब्द का अर्थ "आप" (स्वयं) समझ लेते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कबीर के साहित्य में "आपा" का अर्थ अहंकार, घमंड और मिथ्या अभिमान (Ego) होता है, न कि आदरसूचक "आप"।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि कबीरदास संन्यास लेकर जंगल में जाने की बात कर रहे हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कबीर गृहस्थ संत थे; वे दुनिया छोड़ने की नहीं, बल्कि संसार में रहकर मन के अहंकार और पाखंड को त्यागने की शिक्षा देते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

"साखी" को केवल एक साधारण कविता मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

साखी का अर्थ साक्षी (प्रत्यक्षदर्शी सत्य) है, जो जीवन के शाश्वत सत्य को अत्यंत संक्षेप और सारगर्भित रूप में प्रस्तुत करती है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

संत कबीरदास: "कबीर की साखियाँ" — लोक-व्यवहार एवं ज्ञान का दर्पण "जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥" 1. ज्ञान की महिमा एवं संयम • तलवार बनाम म्यान: साधु की जाति मत पूछो, केवल ज्ञान की परख करो मूल्य तलवार की धार का होता है, म्यान का नहीं • अपशब्द पर मौन का संयम: "आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक" गाली का जवाब न दो, वह एक की एक ही रह जाएगी सीख: जातिवाद का त्याग व क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण 2. एकाग्रता, समता एवं निरहंकार • पाखंड पर प्रहार: माला हाथ में, जीभ मुँह में, पर मन दसों दिशा में भटके दिखावे की पूजा व्यर्थ; मन की एकाग्रता ही सच्ची भक्ति • तिनके की शक्ति व अहंकार त्याग: पैरों तले दबे तिनके को तुच्छ न समझो; आँख में पड़ा तो कष्ट मन शीतल रखो और आपा छोड़ो, कोई बैरी नहीं रहेगा महामंत्र: "या आपा को डारि दे, दया करै सब कोइ" कबीर की पाँच साखियों के जीवन-मूल्य 1. ज्ञान की पूजा जातिवाद से मुक्ति 2. क्षमा व मौन गाली का अंत 3. मन की शुद्धि पाखंड का त्याग 4. कमजोर का मान तिनके की शक्ति 5. अहंकार मुक्ति मन की शीतलता

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. "कबीर की साखियाँ" संत कबीरदास द्वारा रचित लोक-व्यवहार, नीति और आध्यात्मिकता का अनूठा काव्य-संग्रह हैं।
मुख्य बिंदु 2
  1. "साखी" शब्द संस्कृत के "साक्षी" का तद्भव रूप है, जिसका अर्थ है प्रत्यक्ष आँखों देखा यथार्थ सत्य।
मुख्य बिंदु 3
  1. प्रथम साखी में कबीर कहते हैं कि किसी सज्जन की जाति न पूछकर केवल उसके ज्ञान का मोल करना चाहिए, जैसे तलवार का मोल होता है म्यान का नहीं।
मुख्य बिंदु 4
  1. दूसरी साखी में सिखाया गया है कि गाली का जवाब गाली से देने पर झगड़ा बढ़ता है; मौन रहने पर अपशब्द स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है।
मुख्य बिंदु 5
  1. तीसरी साखी में हाथ में माला फेरने और मुँह से राम रटने वाले पाखंडियों पर कटाक्ष करते हुए मन की एकाग्रता को सच्ची भक्ति बताया गया है।
मुख्य बिंदु 6
  1. चौथी साखी में पैरों तले रौंदे जाने वाले छोटे से तिनके की भी उपेक्षा न करने की चेतावनी दी गई है, क्योंकि आँख में पड़ने पर वह असहनीय दर्द देता है।
मुख्य बिंदु 7
  1. यह साखी समाज के कमजोर और निर्बल लोगों को न सताने और उनके स्वाभिमान का सम्मान करने की सीख देती है।
मुख्य बिंदु 8
  1. पाँचवीं साखी में मन को शीतल रखने और "आपा" (अहंकार) का त्याग करने का महामंत्र दिया गया है, जिससे संसार में कोई शत्रु नहीं रहता।
मुख्य बिंदु 9
  1. कबीर की भाषा सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी है, जिसमें अवधी, ब्रज, भोजपुरी और राजस्थानी के शब्द घुले-मिले हैं।
मुख्य बिंदु 10
  1. ये साखियाँ सामाजिक समरसता, बाह्याडंबरों के विरोध और सार्वभौमिक मानवीय प्रेम की आधारशिला हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
"कबीर की साखियाँ" में "साखी" शब्द किस मूल संस्कृत शब्द का तद्भव रूप है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: साक्षी (प्रत्यक्षदर्शी / आँखों देखा)
साखी का अर्थ साक्षी है, जो यह दर्शाता है कि कबीर के दोहे उनके प्रत्यक्ष जीवन-अनुभवों पर आधारित हैं।
2
मोल किसका करना चाहिए—तलवार का या म्यान का?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: तलवार का (ज्ञान का)
कबीर कहते हैं कि बाह्य म्यान के बजाय भीतर की तलवार और मनुष्य के ज्ञान का मोल करना चाहिए।
3
"आपा" शब्द का कबीर के दोहे में क्या अर्थ है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अहंकार (घमंड / मिथ्या अभिमान)
आपा का अर्थ अहंकार है; अहंकार त्याग देने से मन शीतल हो जाता है और कोई शत्रु नहीं रहता।
4
कबीरदास ने घास (तिनके) की निंदा करने से क्यों मना किया है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि आँख में पड़ने पर वह अत्यधिक पीड़ा देता है
यह रूपक सिखाता है कि किसी कमजोर व्यक्ति को तुच्छ समझकर नहीं सताना चाहिए।
5
कबीर के अनुसार हाथ में माला फेरना और जीभ से नाम जपना सच्चा सुमिरन क्यों नहीं है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि उस समय चंचल मन दसों दिशाओं में भटक रहा होता है
बिना मन की एकाग्रता के केवल शारीरिक क्रियाओं द्वारा की गई पूजा सच्चा स्मरण नहीं है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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