"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। / मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥"
भावार्थ: किसी सज्जन या ज्ञानी पुरुष से उसकी जाति, कुल या धर्म नहीं पूछना चाहिए, बल्कि उसके ज्ञान की कद्र करनी चाहिए। ठीक वैसे ही जैसे युद्ध में तलवार की धार और मजबूती देखी जाती है, म्यान चाहे सोने की हो या चमड़े की, उसका कोई मोल नहीं होता।
"आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक। / कह कबीर नहिं उलटिए, वही एक की एक॥"
भावार्थ: जब कोई हमें एक गाली (अपशब्द) देता है, और यदि हम क्रोध में पलटकर उत्तर देते हैं, तो वह बढ़कर अनेक हो जाती है और झगड़ा बढ़ जाता है। कबीर कहते हैं कि गाली का जवाब गाली से मत दो; शांत रहो, वह एक की एक ही रहकर स्वतः समाप्त हो जाएगी।
"माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माँहि। / मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै, यह तौ सुमिरन नाहिं॥"
भावार्थ: हाथ में मनकों की माला घूम रही है, मुँह में जीभ भगवान का नाम जप रही है, परंतु चंचल मन दसों दिशाओं में भटक रहा है। कबीर कहते हैं कि यह ढोंग ईश्वर का सच्चा स्मरण (सुमिरन) नहीं है। सच्ची भक्ति मन की एकाग्रता और पवित्रता में है।
"कबीर घास न नींदिए, जो पाँऊ तलि होइ। / उड़ी पड़ै जब आँखि में, खरी दुहेली होइ॥"
भावार्थ: पैरों के नीचे रौंदे जाने वाले छोटे से तिनके (घास) की भी कभी उपेक्षा या निंदा नहीं करनी चाहिए। वही छोटा सा तिनका जब हवा में उड़कर आँख में पड़ जाता है, तो वह अत्यंत कष्टदायक (खरी दुहेली) पीड़ा देता है। समाज के छोटे और कमजोर व्यक्ति को भी कभी निर्बल समझकर सताना नहीं चाहिए।
"जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन सीतल होइ। / या आपा को डारि दे, दया करै सब कोइ॥"
भावार्थ: यदि मनुष्य का मन शांत, शीतल और विकार-रहित है, तो इस संसार में उसका कोई भी शत्रु (बैरी) नहीं हो सकता। मनुष्य को बस अपने "आपा" (अहंकार / घमंड) को त्याग देना चाहिए, फिर पूरी दुनिया उस पर प्रेम और दया बरसाने लगेगी।