मूल पद 1:
"मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी?
किती बेर मोहिं दूध पिवत भई, यह अजहूँ है छोटी॥
तू जो कहति बल की बेनी ज्यों, ह्वैहै लाँबी-मोटी।
काढ़त-गुहत न्हवावत जैहै, नागिनि-सी भुइँ लोटी॥
काचो दूध पियावति पचि-पचि, देति न माखन-रोटी।
सूरज चिरजीवौ दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी॥"
व्याख्या: बालक कृष्ण अपनी माता यशोदा से रूठकर शिकायत करते हैं कि हे माँ! मेरी यह चोटी कब बढ़ेगी? मुझे दूध पीते हुए कितना लंबा समय बीत गया, परंतु यह आज भी वैसी ही छोटी है। तू तो कहती थी कि यह बलराम भैया की चोटी की तरह लंबी और मोटी हो जाएगी और बाल गूंथते व कंघी करते समय नागिन की तरह जमीन पर लोटने लगेगी। इसी लालच में तू मुझे बार-बार कच्चा दूध पिलाती है और मेरा मनपसंद माखन-रोटी खाने को नहीं देती। सूरदास जी कहते हैं कि दोनों भाइयों की इस बाललीला को देखकर माता यशोदा मुग्ध हो जाती हैं और प्रार्थना करती हैं कि कृष्ण और बलराम की यह सुंदर जोड़ी चिरंजीवी (दीर्घायु) रहे।