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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 8 • Hindi (भाषा मंजरी-8) • अध्याय 7
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Kya Nirash Hua Jaye

झारखण्ड शैक्षणिक परिषद् (JAC) एवं NCERT पाठ्यक्रम पर आधारित कक्षा 8 हिंदी का सातवाँ पाठ "क्या निराश हुआ जाए" (Kya Nirash Hua Jaye) मूर्धन्य निबंधकार, मानवतावादी दार्शनिक एवं आलोचक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित एक अत्यंत विचारोत्तेजक, सकारात्मक व आशावादी निबंध है। आज के समय में समाचार पत्रों, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर जब भ्रष्टाचार, ठगी, डकैती, तस्करी और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने वाली नकारात्मक खबरों की बाढ़ आ जाती है, तो आम नागरिक के मन में यह गहरी निराशा घर करने लगती है कि क्या इस देश में कोई ईमानदार व्यक्ति नहीं बचा? क्या पूरी दुनिया धोखेबाजों की हो चुकी है? आचार्य द्विवेदी इस घोर निराशा के वातावरण को चीरते हुए भारतीय संस्कृति के शाश्वत मानवीय मूल्यों—सत्य, दया, करुणा, ईमानदारी और अध्यात्म—की अमरता की घोषणा करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि भारतवर्ष कभी भी भौतिक वस्तुओं के संग्रह को महत्व नहीं देता, बल्कि मनुष्य के भीतर विद्यमान आंतरिक सद्गुणों को ही सर्वोच्च मानता है। निबंध में लेखक अपने व्यक्तिगत जीवन की दो सच्ची प्रेरक घटनाओं का उल्लेख करते हैं—पहला, रेलवे स्टेशन पर टिकट बाबू का लेखक को ट्रेन के डिब्बे में खोजकर बचे हुए 90 रुपये लौटाना, और दूसरा, रात के समय सुनसान जंगल में खराब हुई बस के कंडक्टर का अपनी जान जोखिम में डालकर साइकिल से बच्चों के लिए दूध व पानी और नई खाली बस लेकर आना। लेखक अंत में निष्कर्ष निकालते हैं कि यद्यपि बुराइयाँ बहुत हैं, परंतु अच्छाई कभी समाप्त नहीं हो सकती; इसलिए हमारे मन को निराश होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है।

⚡ जब अखबार का हर पन्ना घोटालों और बेईमानी की कालिख से रंगा हो, तब रात के 10 बजे सुनसान जंगल में खराब हुई बस के कंडक्टर ने दूध की बोतल लाकर पूरी इंसानियत का भरोसा कैसे जगाया?

क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि आप बाजार में अपना बटुआ या मोबाइल भूल गए हों और किसी अनजान व्यक्ति ने दौड़कर आपको वह सामान लौटा दिया हो? आज का समाज दूसरों के दोषों को ढोल पीट-पीटकर उजागर करने में रस लेता है, लेकिन किसी की अच्छाई को देखकर खुश होने वाले लोग कम हो गए हैं। जब स्टेशन पर टिकट बाबू ने लेखक को सौ रुपये का नोट देने के बाद बचे 90 रुपये लौटाने के लिए ट्रेन का एक-एक डिब्बा छान मारा, तो लेखक की आँखें क्यों भर आईं? जब बस खराब होने पर यात्रियों ने सोचा कि कंडक्टर डाकुओं से मिला हुआ है और वे ड्राइवर को मारने ही वाले थे, तब कंडक्टर ने ऐसा क्या किया कि सब शर्मिंदा हो गए? आइए, निराशा के इस चक्रव्यूह को तोड़कर इंसानियत के उजाले को देखें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

यह पाठ हमें नकारात्मकता और निराशा के दलदल से बाहर निकालकर आशावादी दृष्टिकोण अपनाने, समाज में फैली अच्छाइयों को देखने व उनका उत्सव मनाने तथा जीवन में ईमानदारी व सेवाभाव बनाए रखने की अमूल्य प्रेरणा देता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • निबंध विधा और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के मानवतावादी विचारों की समझ।
  • भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों (सत्य, ईमानदारी, संतोष, परोपकार) का सामान्य परिचय।
  • कानून और धर्म के बीच के अंतर की अवधारणा।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • निबंध के केंद्रीय संदेश और आशावादी जीवन-दृष्टि का आलोचनात्मक विश्लेषण कर सकेंगे।
  • दूसरों के दोषों का उद्घाटन करने (दोषोद्घाटन) की विकृति और अच्छाई को अनदेखा करने के दुष्परिणामों को समझ सकेंगे।
  • रेलवे टिकट बाबू और बस कंडक्टर के प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • भारतवर्ष की सांस्कृतिक विशेषता (भौतिक संग्रह के स्थान पर आंतरिक गुणों की महत्ता) की व्याख्या कर सकेंगे।
  • धर्म को कानून से बड़ा मानने के दार्शनिक आधार को स्पष्ट कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. समाज का वर्तमान वातावरण और निराश...
2 2. भारतवर्ष का शाश्वत सांस्कृतिक आद...
3 3. जीवन के दो सच्चे प्रेरक प्रसंग (...
4 4. निबंध का निष्कर्ष: "मन, निराश हो...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. समाज का वर्तमान वातावरण और निराशा (Current Gloomy Atmosphere)

लेखक निबंध की शुरुआत में समाज में व्याप्त निराशाजनक मानसिकता का यथार्थवादी चित्रण करते हैं:

  • अखबारों की नकारात्मकता: हर रोज अखबार चोरी, डकैती, तस्करी, रिश्वतखोरी और घोटालों के समाचारों से भरे रहते हैं। ऐसा लगता है जैसे देश में कोई ईमानदार आदमी रह ही नहीं गया है।
  • आरोप-प्रत्यारोप की होड़: जो व्यक्ति जितना ऊंचे पद पर है, उसमें उतने ही अधिक दोष खोजे जाते हैं। लोग किसी के गुणों को देखने के बजाय उसके अवगुणों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने में रस लेने लगे हैं।
  • दोषोद्घाटन का रस: लेखक कहते हैं कि बुराई में रस लेना बुरी बात है, परंतु किसी की अच्छाई को जानकर भी रस न लेना और उसे दबा देना उससे भी ज्यादा बदतर और खतरनाक बुराई है।

2. भारतवर्ष का शाश्वत सांस्कृतिक आदर्श (India’s Spiritual Heritage)

हजारी प्रसाद जी याद दिलाते हैं कि भारत की नींव भौतिकता पर नहीं, बल्कि आध्यात्मिकता पर टिकी है:

  • महान मनीषियों का स्वप्न: तिलक, गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर और मदन मोहन मालवीय का भारतवर्ष कभी भी नैतिक रूप से दिवालिया नहीं हो सकता। यह आर्य और द्रविड़, हिंदू और मुस्लिम, यूरोपीय और प्राच्य संस्कृतियों के मिलन का "महामानव समुद्र" है।
  • लोभ और वासना पर संयम: भारत ने कभी भौतिक वस्तुओं के असीम संग्रह को महत्व नहीं दिया। काम, क्रोध, लोभ, मोह मनुष्य के स्वाभाविक विकार हैं, परंतु भारतीय संस्कृति ने सदा उन्हें बुद्धि के संयम के बंधन से बाँधकर रखने का संदेश दिया है।
  • धर्म और कानून: भारत में धर्म को हमेशा कानून से बड़ा माना गया है। कानून में कमियाँ हो सकती हैं जिनका फायदा चालाक लोग उठा लेते हैं, परंतु धर्म आंतरिक नैतिकता, भय और सेवा से जुड़ा है। आज भी सेवा, सच्चाई और प्रेम के मूल्य दबे अवश्य हैं, परंतु नष्ट नहीं हुए हैं।

3. जीवन के दो सच्चे प्रेरक प्रसंग (Two Real Inspiring Incidents)

लेखक अपने व्यक्तिगत अनुभवों से सिद्ध करते हैं कि समाज में ईमानदारी आज भी जीवित है:

प्रसंगघटना व संकटमानवता और ईमानदारी का प्रकटीकरण
1. रेलवे टिकट बाबू की ईमानदारीलेखक ने जल्दी में 10 रुपये के टिकट के बदले 100 रुपये का नोट दिया और ट्रेन में जाकर बैठ गए।टिकट बाबू डिब्बे के प्रत्येक यात्री के चेहरे को पहचानता हुआ आया और उसने अत्यंत संकोच व विनम्रता से लेखक को बचे हुए 90 रुपये लौटाए। उसके चेहरे पर ईमानदारी की अनूठी चमक थी।
2. बस कंडक्टर की कर्तव्यनिष्ठारात 10 बजे सुनसान जंगल में बस खराब हो गई। कंडक्टर साइकिल लेकर चला गया। यात्रियों ने समझा कि वह डाकुओं को बुलाने गया है और वे भय व गुस्से में ड्राइवर को पीटने के लिए तैयार हो गए।कंडक्टर रात के सन्नाटे में अड्डा जाकर दूसरी खाली बस लेकर आया, साथ ही लेखक के रोते हुए बच्चों के लिए लोटे में थोड़ा दूध और पानी लेकर आया और बोला—"मुझसे बच्चों का रोना नहीं देखा गया!" सब यात्री लज्जित हो गए।

4. निबंध का निष्कर्ष: "मन, निराश होने की ज़रूरत नहीं" (The Final Triumph of Hope)

निबंध का चरमोत्कर्ष हमें आत्म-विश्वास और सकारात्मकता की ओर ले जाता है:

  • धोखे के बावजूद विश्वास: लेखक कहते हैं कि उन्हें जीवन में कई बार ठगा गया है, विश्वासघात भी हुआ है; परंतु यदि वे केवल उन्हीं कड़वे अनुभवों को याद रखेंगे तो जीवन कष्टप्रद हो जाएगा। अनगिनत बार लोगों ने बिना किसी कारण के उनकी सहायता भी की है।
  • कवि रवींद्रनाथ टैगोर की प्रार्थना: टैगोर ने अपने प्रार्थना-गीत में भगवान से यह नहीं माँगा कि उन पर कोई विपत्ति न आए, बल्कि यह माँगा कि—"हे प्रभु! चाहे कितनी भी विपत्ति आए या संसार मुझे ठगे, पर मेरे मन में तेरे प्रति और मनुष्यता के प्रति संशय व अविश्वास न पैदा हो!"
  • अंतिम निष्कर्ष: भारतवर्ष को पुनः महान बनाने की संभावनाएं बनी हुई हैं और बनी रहेंगी। इसलिए हे मेरे मन, निराश होने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है!

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

लेखक परिचय
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (1907-1979) | जन्म: बलिया (उत्तर प्रदेश)
हिंदी के मूर्धन्य निबंधकार, आलोचक व उपन्यासकार ("बाणभट्ट की आत्मकथा", "अशोक के फूल")।
निबंध का मुख्य स्वर
आशावादिता (Optimism) + नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना + सकारात्मक दृष्टिकोण
नकारात्मक समाचारों के बीच मनुष्यता के जीवित रहने का जीवंत उद्घोष।
भारतीय संस्कृति का महासमुद्र
"महामानव समुद्र" (रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा भारतवर्ष के लिए प्रयुक्त संज्ञा)
समस्त जातियों, धर्मों और विचारधाराओं का समन्वयकारी मिलन स्थल।
धर्म बनाम कानून
भारत में धर्म (आंतरिक नैतिकता) को सदा कानून से ऊंचा माना गया है
कानून की कमजोरियों का लोग लाभ उठाते हैं, पर धर्म छल और झूठ से रोकता है।
पाठ का अंतिम महामंत्र
"मेरे मन, निराश होने की ज़रूरत नहीं है!"
सच्चाई, सेवा और परोपकार आज भी समाज में अक्षुण्ण और अजेय हैं।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1: लेखक ने यह क्यों कहा कि "दोषों का पर्दाफाश करना बुरी बात नहीं है, परंतु बुराई में रस लेना बुरी बात है"?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: लेखक के इस कथन का गहरा सामाजिक अर्थ है:

  1. दोषों का पर्दाफाश करना: यदि किसी गलत काम, भ्रष्टाचार या अपराध को समाज के सामने लाया जाता है ताकि उसमें सुधार हो सके, तो यह एक जागरूक नागरिक का कर्तव्य है और यह बुरी बात नहीं है।
  2. बुराई में रस लेना: जब लोग किसी व्यक्ति के दोषों या गलतियों को चटखारे ले-लेकर, उसका उपहास उड़ाने और अपनी हीन भावना को छिपाने के लिए प्रचारित करते हैं, तो यह अत्यंत निंदनीय है।
  3. सबसे बड़ी बुराई: लेखक कहते हैं कि किसी के अवगुणों में मग्न रहना और उसकी अच्छाइयों को देखकर भी चुप रहना या उन्हें दबा देना सबसे घिनौनी सामाजिक विकृति है।
उदाहरण 2
प्रश्न 2: रेलवे स्टेशन पर टिकट बाबू ने अपनी ईमानदारी का परिचय किस प्रकार दिया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: टिकट बाबू की ईमानदारी का प्रसंग:

  1. लेखक जल्दी में टिकट खरीदते समय 10 रुपये के टिकट के बदले गलती से 100 रुपये का नोट देकर अपनी ट्रेन के डिब्बे में जाकर बैठ गए।
  2. टिकट बाबू बेईमान नहीं था; उसने नोट देखा तो वह बचे हुए 90 रुपये लेकर सेकंड क्लास के डिब्बे में लेखक को ढूँढने निकल पड़ा।
  3. उसने हर यात्री के चेहरे को ध्यान से देखा और लेखक को पहचानकर बड़ी शालीनता और विनम्रता से 90 रुपये लौटाते हुए कहा—"यह बहुत बड़ी गलती हो गई थी, आपने भी नहीं देखा और मैंने भी नहीं देखा।" उसके चेहरे पर सच्चा आत्म-संतोष था।
उदाहरण 3
प्रश्न 3: रात में सुनसान जंगल में बस खराब होने पर यात्रियों की क्या प्रतिक्रिया थी और कंडक्टर ने उन्हें कैसे गलत साबित किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: 1. यात्रियों की प्रतिक्रिया: बस एक निर्जन और सुनसान स्थान पर खराब हो गई। जब कंडक्टर तुरंत साइकिल लेकर चुपचाप निकल गया, तो भयभीत यात्रियों को लगा कि वह डाकुओं से मिला हुआ है और बस को लुटवाने गया है। यात्रियों ने गुस्से में ड्राइवर को घेर लिया और उसे मारने-पीटने की योजना बनाने लगे। 2. कंडक्टर द्वारा गलत साबित करना: कुछ देर बाद यात्रियों ने देखा कि कंडक्टर खाली बस लेकर आ रहा था ताकि सभी सुरक्षित पहुँच सकें। इसके अलावा वह लेखक के भूख-प्यास से रोते बच्चों के लिए एक लोटे में दूध और पानी भी लेकर आया था। कंडक्टर की इस असीम सहृदयता को देखकर सभी यात्री शर्मिंदा हो गए और उन्होंने ड्राइवर व कंडक्टर से माफी माँगी।

उदाहरण 4
प्रश्न 4: भारतवर्ष में "धर्म को कानून से बड़ा" क्यों माना गया है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: भारतवर्ष में धर्म और कानून का संबंध:

  1. कानून बाह्य नियमों पर आधारित होता है। जो लोग चतुर और धूर्त होते हैं, वे कानून की बारीकियों और कमियों का फायदा उठाकर दूसरों को ठगते हैं और सजा से बच निकलते हैं।
  2. इसके विपरीत, धर्म मनुष्य की अंतरात्मा, दया, सत्य और परमात्मा के भय से जुड़ा आंतरिक नियम है। धर्म सिखाता है कि किसी को धोखा देना, झूठ बोलना और दूसरों को कष्ट देना पाप है।
  3. इसलिए भारत में सेवा, ईमानदारी, प्रेम और सच्चाई को कानून से ऊपर "आध्यात्मिक धर्म" मानकर आदर दिया जाता है।
उदाहरण 5
प्रश्न 5: निबंध का शीर्षक "क्या निराश हुआ जाए" लेखक ने क्यों रखा? क्या आप इस शीर्षक से सहमत हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: 1. शीर्षक का औचित्य: आज का सामान्य व्यक्ति समाज में फैली बुराइयों और भ्रष्टाचार को देखकर यह मान बैठता है कि अब इस देश का कुछ नहीं हो सकता और केवल निराशा ही शेष है। लेखक प्रश्नवाचक शैली में पूछते हैं—"क्या सचमुच निराश होने की जरूरत है?" और फिर तर्क व वास्तविक घटनाओं से सिद्ध करते हैं कि अच्छाई आज भी जिंदा है। 2. सहमति: हम इस शीर्षक से पूर्णतः सहमत हैं। यह शीर्षक पाठक को आत्म-मंथन करने को प्रेरित करता है और निराशा के अंधकार से निकालकर आशा और विश्वास की नई किरण दिखाता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

छात्र अक्सर सोचते हैं कि लेखक देश में फैले भ्रष्टाचार और बुराइयों से पूरी तरह अनजान या बेपरवाह है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

लेखक बुराइयों को पूरी तरह स्वीकार करते हैं, परंतु उनका कहना है कि केवल बुराइयों पर ध्यान केंद्रित करके हम अपने मन को विषाक्त न करें; अच्छाइयों को पहचानना और बढ़ाना अधिक जरूरी है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

धर्म शब्द को केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड तक सीमित समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यहाँ "धर्म" का अर्थ संकीर्ण मजहब नहीं, बल्कि सार्वभौमिक मानवीय मूल्य—दया, करुणा, सत्य, ईमानदारी और परोपकार है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

बस यात्रियों द्वारा ड्राइवर को पीटने के प्रयास को केवल एक हास्य प्रसंग मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह भय और अविश्वास से उत्पन्न मानवीय मनोविज्ञान का गंभीर उदाहरण है, जो दिखाता है कि अफवाहें और डर कैसे निर्दोष लोगों पर हिंसा करवा सकते हैं।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी: "क्या निराश हुआ जाए" — आशावादिता की विजय "बुराई में रस लेना बुरी बात है, अच्छाई में रस लेकर उजागर न करना और भी बुरी बात है" 1. समाज में व्याप्त कृत्रिम निराशा • समाचार पत्रों की नकारात्मकता: चोरी, डकैती, घोटालों व ठगी का अंधाधुंध प्रचार भ्रम: "देश में कोई भी ईमानदार आदमी नहीं बचा!" • दोषोद्घाटन की घातक आदत: दूसरों की कमियों को ढोल पीट-पीटकर उछालना सच्चाई, सेवा और करुणा के मूल्यों को अनदेखा करना सावधानी: नकारात्मकता मन को पंगु बना देती है 2. इंसानियत के दो अमर उदाहरण • रेलवे टिकट बाबू (90 रुपये लौटाना): डिब्बे में ढूँढकर ईमानदारी से पैसे वापस करना चेहरे पर सच्चा आत्म-संतोष और विनम्रता • बस कंडक्टर की कर्तव्यनिष्ठा: रात में जंगल से दूसरी बस व बच्चों हेतु दूध लाना यात्रियों के अविश्वास और शक पर सेवा की विजय सत्य: मानवता और दया आज भी जीवंत हैं द्विवेदी जी का पावन निष्कर्ष • भारतवर्ष का आध्यात्मिक आधार "महामानव समुद्र" है; आंतरिक सद्गुण कभी नष्ट नहीं हो सकते। • रवींद्रनाथ टैगोर की प्रार्थना: हे प्रभु, विपत्ति में भी मनुष्यता और ईश्वर के प्रति मेरा विश्वास न डिगे। • महामंत्र: "भारतवर्ष को पाने की संभावना बनी हुई है और बनी रहेगी; मेरे मन, निराश होने की ज़रूरत नहीं है!"

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. "क्या निराश हुआ जाए" आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित एक अत्यंत विचारोत्तेजक और आशावादी निबंध है।
मुख्य बिंदु 2
  1. लेखक बताते हैं कि अखबारों में छपने वाली नकारात्मक खबरों को देखकर लगता है कि समाज से ईमानदारी खत्म हो चुकी है।
मुख्य बिंदु 3
  1. समाज में दूसरों के अवगुणों में रस लेने और उनकी अच्छाइयों को दबाने की खतरनाक प्रवृत्ति बढ़ रही है।
मुख्य बिंदु 4
  1. भारतवर्ष का सांस्कृतिक आदर्श कभी भी भौतिक वस्तुओं के संचय को नहीं, बल्कि आंतरिक सद्गुणों को सर्वोच्च मानता है।
मुख्य बिंदु 5
  1. भारत में धर्म को हमेशा कानून से बड़ा माना गया है क्योंकि धर्म मनुष्य की अंतरात्मा और नैतिकता पर आधारित होता है।
मुख्य बिंदु 6
  1. रेलवे स्टेशन पर टिकट बाबू द्वारा लेखक को खोजकर बचे 90 रुपये लौटाना ईमानदारी का अप्रतिम उदाहरण है।
मुख्य बिंदु 7
  1. रात में जंगल में खराब बस के कंडक्टर द्वारा दूसरी बस और बच्चों के लिए दूध लाना सेवाभाव का सर्वोच्च प्रमाण है।
मुख्य बिंदु 8
  1. जीवन में धोखे खाने के बावजूद अकारण सहायता करने वाले लोगों की संख्या भी बहुत अधिक है।
मुख्य बिंदु 9
  1. गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने भगवान से प्रार्थना की थी कि विपत्ति में भी उनका ईश्वर और मनुष्यता पर से विश्वास न डिगे।
मुख्य बिंदु 10
  1. निबंध का अंतिम संदेश है कि भारत के उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएं अक्षुण्ण हैं, अतः मन को निराश होने की आवश्यकता नहीं है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
"क्या निराश हुआ जाए" निबंध के लेखक कौन हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार, निबंधकार और आलोचक हैं।
2
लेखक के अनुसार समाज में कौन-सी प्रवृत्ति सबसे बुरी है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अच्छाई को जानकर भी रस न लेना और उसे उजागर न करना
लेखक कहते हैं कि बुराई में रस लेना तो बुरा है ही, पर अच्छाई को दबाना उससे भी बदतर बुराई है।
3
रेलवे स्टेशन पर टिकट बाबू ने लेखक को कितने रुपये लौटाए थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 90 रुपये
लेखक ने 10 रुपये के टिकट के बदले 100 रुपये का नोट दिया था, जिसे बाबू ने ईमानदारी से लौटाया।
4
रात में जंगल में बस खराब होने पर कंडक्टर साइकिल लेकर क्या करने गया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: नई खाली बस और बच्चों के लिए दूध व पानी लाने
कंडक्टर यात्रियों की सुरक्षा हेतु दूसरी बस लाने और बच्चों की भूख मिटाने दूध-पानी लाने गया था।
5
रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने प्रार्थना-गीत में ईश्वर से क्या माँगा था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: विपत्तियों में भी ईश्वर और मनुष्यता पर विश्वास बना रहे
टैगोर ने प्रार्थना की थी कि चाहे संसार मुझे ठगे, पर मन में कभी संशय व अविश्वास पैदा न हो।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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