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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 8 • Hindi (भाषा मंजरी-8) • अध्याय 11
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Jab Zameen Aakash Par

झारखण्ड शैक्षणिक परिषद् (JAC) एवं NCERT पाठ्यक्रम पर आधारित कक्षा 8 हिंदी का ग्यारहवाँ पाठ "जब सिनेमा ने बोलना सीखा" (Jab Cinema Ne Bolna Sikha / जब जमीन आकाश पर) वरिष्ठ सिनेमा समीक्षक व लेखक प्रदीप तिवारी द्वारा रचित भारतीय सिनेमा के इतिहास का अत्यंत ज्ञानवर्धक व रोमांचक ऐतिहासिक आलेख है। यह पाठ 14 मार्च 1931 की उस ऐतिहासिक तिथि का साक्षात्कार कराता है, जब मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में भारत की पहली सवाक् (बोलती) फिल्म "आलम आरा" (Alam Ara) प्रदर्शित हुई थी। पोस्टर पर छपी यह पंक्ति इतिहास बन गई—"वे सभी 78 जीवित हैं, सांस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, 78 मुर्दा इंसान जिंदा हो गए, उनको बोलते, बातें करते देखो!" इस फिल्म के निर्माता-निर्देशक अर्देशिर एम. ईरानी थे, जिन्होंने हॉलीवुड की सवाक् फिल्म "शो बोट" (1929) देखकर भारत में बोलती फिल्म बनाने का साहसिक स्वप्न देखा था। पारसी रंगमंच के नाटक पर आधारित इस फिल्म में साउंड रिकॉर्डिंग की तकनीकी चुनौतियाँ, दिन के शोर से बचने हेतु रात में शूटिंग, साउंड प्रूफिंग के अभाव में कृत्रिम प्रकाश का आविष्कार, तथा पहले पार्श्वगायक डब्ल्यू. एम. खान द्वारा गाया गया पहला गाना—"दे दे खुदा के नाम पे प्यारे, अगर देने की ताकत है"—का विशद विवरण मिलता है। इसके साथ ही फिल्म के नायक विट्ठल की शुद्ध उर्दू न बोल पाने के कारण निकाले जाने और प्रसिद्ध वकील मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा मुकदमा लड़कर उन्हें पुनः नायक का पद दिलाने का ऐतिहासिक प्रसंग भारतीय सिनेमा के स्वर्ण-युग की अमूल्य धरोहर है।

⚡ 14 मार्च 1931 की शाम जब मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा के रूपहले पर्दे से पहली बार इंसानी आवाज गूँजी—"दे दे खुदा के नाम पे प्यारे"—तो पूरे भारत में सिनेमा ने बोलना कैसे सीखा?

कल्पना कीजिए उस समय की जब फिल्मों में केवल अभिनेताओं के चेहरे हिलते थे, कोई आवाज नहीं आती थी, और संवादों को स्क्रीन पर लिखी पट्टियों से पढ़ना पड़ता था (मूक सिनेमा)। फिर एक दिन ऐसा चमत्कार हुआ कि पर्दे पर इंसान सचमुच बातें करने लगे, गाने गाने लगे और रोने-हँसने लगे! सिनेमा हॉल के बाहर टिकटों के लिए ऐसी दीवानगी और भगदड़ मची कि पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा! अर्देशिर ईरानी ने रात के सन्नाटे में छुप-छुपकर साउंड कैसे रिकॉर्ड किया? और अभिनेता विट्ठल ने अपना हक पाने के लिए कौन सा ऐतिहासिक मुकदमा जीता? आइए, भारतीय सिनेमा की पहली बोलती क्रांति के रोमांचक सफर पर चलें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

यह पाठ विद्यार्थियों को तकनीकी नवाचार, कला के विकास, भारतीय सिनेमा के गौरवशाली इतिहास तथा दृढ़ इच्छाशक्ति से साधनों के अभाव को मात देने की अद्भुत प्रेरणा प्रदान करता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • सिनेमा के इतिहास में मूक (Silent) और सवाक् (Talkie) फिल्मों का अंतर।
  • भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के (राजा हरिश्चंद्र - 1913) की सामान्य जानकारी।
  • ध्वनि रिकॉर्डिंग (Sound Recording) और पार्श्वगायन (Playback Singing) की बुनियादी समझ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • भारत की पहली सवाक् फिल्म "आलम आरा" (1931) के निर्माण और ऐतिहासिक महत्व का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • निर्देशक अर्देशिर एम. ईरानी के तकनीकी संघर्ष और नवाचारों की व्याख्या कर सकेंगे।
  • मूक फिल्मों से सवाक् फिल्मों के संक्रमण काल में आए बदलावों और संवाद-लेखन की आवश्यकता को समझ सकेंगे।
  • अभिनेता विट्ठल के मुकदमे और मोहम्मद अली जिन्ना की भूमिका के ऐतिहासिक संदर्भ का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • पहले पार्श्वगायक डब्ल्यू. एम. खान और भारतीय सिनेमा के सांस्कृतिक विकास को रेखांकित कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. 14 मार्च 1931: भारतीय सिनेमा का...
2 2. अर्देशिर ईरानी और आलम आरा का तकन...
3 3. नायक विट्ठल और ऐतिहासिक कानूनी ल...
4 4. सवाक् सिनेमा का दूरगामी प्रभाव (...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. 14 मार्च 1931: भारतीय सिनेमा का ऐतिहासिक मोड़ (The Historic Turning Point)

भारतीय सिनेमा के इतिहास में 14 मार्च 1931 की तिथि स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है:

  • पहली सवाक् फिल्म: मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में भारत की पहली बोलती फिल्म "आलम आरा" रिलीज हुई। इससे पहले 1913 से मूक फिल्मों (Silent Films) का दौर चल रहा था।
  • पोस्टर का क्रांतिकारी नारा: "वे सभी 78 जीवित हैं, सांस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, 78 मुर्दा इंसान जिंदा हो गए, उनको बोलते, बातें करते देखो!" यह पंक्ति मूक से सवाक के चमत्कारी परिवर्तन का प्रतीक थी।
  • जनता का उन्माद: फिल्म आठ सप्ताह तक हाउसफुल चली। भीड़ इतनी अधिक होती थी कि पुलिस के लिए नियंत्रण करना मुश्किल हो जाता था; टिकट ब्लैक में बिक रहे थे।

2. अर्देशिर ईरानी और आलम आरा का तकनीकी निर्माण (Technical Struggles & Innovations)

साधनों के भारी अभाव के बावजूद अर्देशिर ईरानी ने इस असंभव काम को संभव कर दिखाया:

पहलू / चुनौतीसमस्या का स्वरूपअर्देशिर ईरानी का समाधान
प्रेरणाहॉलीवुड की पहली सवाक् फिल्म "शो बोट" (1929) देखकर भारत में बोलती फिल्म बनाने का स्वप्न।पारसी रंगमंच के एक लोकप्रिय नाटक को आधार बनाकर पटकथा तैयार की।
साउंड रिकॉर्डिंगउस समय स्टूडियो साउंड प्रूफ नहीं थे और पास से लोकल ट्रेनें गुजरती थीं जिससे दिन में भारी शोर होता था।फिल्म की अधिकतर शूटिंग रात में की गई जब ट्रेनें बंद होती थीं।
कृत्रिम प्रकाश (Lighting)रात में प्राकृतिक सूर्य का प्रकाश उपलब्ध नहीं था।सर्चलाइट और कृत्रिम प्रकाश व्यवस्था का निर्माण किया गया, जो भारतीय सिनेमा में स्थायी प्रकाश प्रणाली बन गई।
पार्श्वगायन (Playback)न कोई गीतकार था, न संगीतकार; केवल तबला, हारमोनियम और वायलिन से संगीत बना।डब्ल्यू. एम. खान पहले पार्श्वगायक बने और गाना गाया—"दे दे खुदा के नाम पे प्यारे, अगर देने की ताकत है।"

3. नायक विट्ठल और ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई (Hero Vithal & Legal Battle)

फिल्म के मुख्य अभिनेता के चयन में एक रोचक और ऐतिहासिक कानूनी विवाद हुआ:

  • विट्ठल का चयन व निष्कासन: विट्ठल उस दौर के सबसे लोकप्रिय स्टंट नायक थे। उन्हें नायक चुना गया, परंतु चूंकि उन्हें शुद्ध उर्दू बोलने में परेशानी होती थी, इसलिए उन्हें हटाकर महबूब को नायक बना दिया गया।
  • अदालती मुकदमा: विट्ठल ने अपने अनुबंध के उल्लंघन के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया। उस समय के भारत के सबसे बड़े और मशहूर वकील मोहम्मद अली जिन्ना ने विट्ठल का मुकदमा लड़ा।
  • विट्ठल की जीत: जिन्ना की अकाट्य दलीलों के आगे अदालत ने विट्ठल के पक्ष में फैसला सुनाया और वे भारत की पहली बोलती फिल्म के अमर नायक बने। अभिनेत्री जुबैदा थीं।

4. सवाक् सिनेमा का दूरगामी प्रभाव (Far-reaching Cultural Impact)

बोलती फिल्मों के आने से भारतीय समाज और कला जगत में युगांतरकारी बदलाव आए:

  • पढ़े-लिखे अभिनेताओं की आवश्यकता: मूक फिल्मों में केवल पहलवानों या स्टंट करने वालों से काम चल जाता था। सवाक् फिल्मों के आने से ऐसे कलाकारों की मांग बढ़ी जो संवाद बोल सकें, जिनकी आवाज दमदार हो और जो गा सकें।
  • हिंदुस्तानी भाषा का प्रसार: फिल्मों में जनसामान्य द्वारा बोली जाने वाली हिंदी और उर्दू के मिले-जुले रूप (हिंदुस्तानी) का प्रयोग हुआ, जिसने देश भर में भाषाई एकता को मजबूत किया।
  • फैशन और सामाजिक प्रभाव: फिल्मों की अभिनेत्रियों के केश-विन्यास (हेयर स्टाइल) और पहनावे की नकल आम महिलाएं करने लगीं (जैसे फिल्म माधुरी में अभिनेत्री सुलोचना का हेयर स्टाइल पूरे भारत में लोकप्रिय हुआ)।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

लेखक परिचय
प्रदीप तिवारी | विधा: ऐतिहासिक व सिनेमाई आलेख
भारतीय सिनेमा के प्रारंभिक विकास और दुर्लभ दस्तावेजी तथ्यों का प्रामाणिक संकलन।
भारत की पहली सवाक् फिल्म
आलम आरा (Alam Ara) | प्रदर्शन तिथि: 14 मार्च 1931
मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में रिलीज; निर्देशक: अर्देशिर एम. ईरानी।
फिल्म के मुख्य कलाकार
नायक: विट्ठल | नायिका: जुबैदा | खलनायक: सोहराब मोदी
विट्ठल ने वकील मोहम्मद अली जिन्ना की मदद से मुकदमा जीतकर नायक का पद पाया।
भारतीय सिनेमा का पहला गीत
"दे दे खुदा के नाम पे प्यारे, अगर देने की ताकत है"
गायक: डब्ल्यू. एम. खान (W. M. Khan - भारत के पहले पार्श्वगायक)।
तकनीकी नवाचार
रात में शूटिंग + कृत्रिम प्रकाश व्यवस्था (Artificial Lighting)
लोकल ट्रेन के शोर से बचने के लिए रात में साउंड रिकॉर्डिंग की मजबूरी ने लाइटिंग का आविष्कार किया।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1: 14 मार्च 1931 का दिन भारतीय सिनेमा के इतिहास में क्यों अमर और महत्वपूर्ण माना जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: 14 मार्च 1931 का दिन ऐतिहासिक माना जाता है क्योंकि:

  1. पहली बोलती फिल्म: इसी दिन मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में भारत की पहली सवाक् (बोलती) फिल्म "आलम आरा" का प्रथम सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ था।
  2. मूक युग का अंत: इससे पहले 1913 से सिनेमा मूक (गूँगा) था जिसमें कलाकार केवल अभिनय करते थे और संवाद पट्टियों पर लिखे होते थे। 14 मार्च 1931 को पहली बार भारतीय सिनेमा ने "बोलना सीखा" और पात्रों की वास्तविक आवाज दर्शकों के कानों तक पहुँची। इसने भारतीय फिल्म उद्योग में एक नई क्रांति का सूत्रपात किया।
उदाहरण 2
प्रश्न 2: अर्देशिर ईरानी को सवाक् फिल्म बनाने की प्रेरणा कहाँ से मिली और उन्होंने किन तकनीकी कठिनाइयों का सामना किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: 1. प्रेरणा: अर्देशिर ईरानी ने 1929 में हॉलीवुड की पहली बोलती फिल्म "शो बोट" देखी थी। उसी फिल्म को देखकर उनके मन में भारत में पहली बोलती फिल्म बनाने का सपना जागा। 2. तकनीकी कठिनाइयाँ:

  • साउंड प्रूफिंग का अभाव: उस समय स्टूडियो साउंड प्रूफ नहीं थे और पास से लोकल ट्रेनें गुजरती थीं, जिसके शोर के कारण दिन में रिकॉर्डिंग असंभव थी। अतः उन्हें रात में शूटिंग करनी पड़ी।
  • प्रकाश की समस्या: रात में प्राकृतिक प्रकाश नहीं होता था, इसलिए उन्हें कृत्रिम प्रकाश (आर्टिफिशियल लाइटिंग) की विशेष व्यवस्था करनी पड़ी।
  • संगीतकार व गीतकार की कमी: उस समय कोई तैयार संगीतकार नहीं था; उन्होंने केवल तीन वाद्यों (हारमोनियम, तबला और वायलिन) की मदद से स्वयं धुनें तैयार कीं।
उदाहरण 3
प्रश्न 3: फिल्म "आलम आरा" के नायक विट्ठल को पहले क्यों हटाया गया और उन्होंने पुनः नायक का पद कैसे हासिल किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: 1. हटाने का कारण: विट्ठल उस समय के सबसे बड़े स्टंट स्टार थे, परंतु उन्हें उर्दू बोलने में कठिनाई होती थी। बोलती फिल्म होने के कारण शुद्ध संवाद अदायगी जरूरी थी, इसलिए निर्देशक ने उन्हें हटाकर महबूब को नायक बना दिया। 2. पुनः पद हासिल करना: विट्ठल ने अन्याय के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। उस दौर के सबसे प्रसिद्ध और काबिल वकील मोहम्मद अली जिन्ना ने विट्ठल का मुकदमा लड़ा। जिन्ना की अकाट्य कानूनी दलीलों के कारण विट्ठल मुकदमा जीत गए और उन्हें पुनः आलम आरा का नायक बनाया गया।

उदाहरण 4
प्रश्न 4: पहली बोलती फिल्म के पोस्टर पर क्या लिखा था और इसका क्या अर्थ था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: 1. पोस्टर पर लिखा कथन: "वे सभी 78 जीवित हैं, सांस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं, 78 मुर्दा इंसान जिंदा हो गए, उनको बोलते, बातें करते देखो!" 2. इसका अर्थ: मूक सिनेमा के दौर में पर्दे पर दिखने वाले कलाकार बोलते नहीं थे, इसलिए वे मूक (निष्प्राण जैसे) लगते थे। पहली बार जब उन 78 पात्रों ने पर्दे पर अपनी आवाज में संवाद बोले और गाने गाए, तो दर्शकों को लगा कि बेजान मूर्तियाँ सचमुच जीवित हो उठी हैं और सांस ले रही हैं। यह सवाक् सिनेमा के जीवंत होने का उद्घोष था।

उदाहरण 5
प्रश्न 5: मूक फिल्मों से सवाक् फिल्मों के दौर में आने पर अभिनेताओं और भाषा के चयन में क्या क्रांतिकारी बदलाव आए?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: प्रमुख बदलाव:

  1. अभिनेताओं की योग्यता: मूक फिल्मों में केवल शारीरिक सुंदरता, पहलवानी या स्टंट करने वाले अभिनेता चल जाते थे। परंतु सवाक् फिल्मों में ऐसे सुशिक्षित अभिनेताओं की मांग बढ़ी जो शुद्ध उच्चारण के साथ धाराप्रवाह संवाद बोल सकें और जिनका स्वर सुरीला व प्रभावशाली हो।
  2. भाषा का स्वरूप: फिल्मों ने जनसामान्य से जुड़ने के लिए हिंदी और उर्दू के मिले-जुले रूप "हिंदुस्तानी भाषा" को अपनाया, जिससे सिनेमा पूरे देश के विभिन्न भाषाई क्षेत्रों में लोकप्रिय हुआ।
  3. गायन कला का प्रवेश: फिल्मों में गीत-संगीत का अभिन्न प्रवेश हुआ और पहले गायक डब्ल्यू. एम. खान जैसे पार्श्वगायकों का युग शुरू हुआ।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

छात्र अक्सर "राजा हरिश्चंद्र" और "आलम आरा" में भ्रमित हो जाते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

"राजा हरिश्चंद्र" (1913, दादा साहेब फाल्के) भारत की पहली मूक (Silent) फिल्म थी, जबकि "आलम आरा" (1931, अर्देशिर ईरानी) भारत की पहली सवाक् (बोलती - Talkie) फिल्म थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि आलम आरा में बहुत बड़ा ऑर्केस्ट्रा या दर्जनों वाद्य यंत्र थे।

सही वैज्ञानिक तथ्य

आलम आरा में केवल तीन मूल वाद्य यंत्रों—हारमोनियम, तबला और वायलिन—का ही प्रयोग किया गया था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मोहम्मद अली जिन्ना के संदर्भ को केवल राजनीतिक समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

1931 में जिन्ना मुंबई के एक अत्यंत विख्यात और सफल बैरिस्टर (वकील) थे जिन्होंने अभिनेता विट्ठल के अनुबंध अधिकार की कानूनी लड़ाई लड़ी थी।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

प्रदीप तिवारी: "जब सिनेमा ने बोलना सीखा" — भारतीय सवाक् सिनेमा का उदय 14 मार्च 1931: मैजेस्टिक सिनेमा, मुंबई • भारत की प्रथम बोलती फिल्म "आलम आरा" 1. "आलम आरा" का ऐतिहासिक आगाज • निर्देशक: अर्देशिर एम. ईरानी: हॉलीवुड की "शो बोट" (1929) से मिली अमर प्रेरणा पारसी रंगमंच के लोकप्रिय नाटक पर आधारित कथा • पहला गीत व गायक: गायक: डब्ल्यू. एम. खान (W. M. Khan) "दे दे खुदा के नाम पे प्यारे, अगर देने की ताकत है" पोस्टर: "78 मुर्दा इंसान जिंदा हो गए, बोलते देखो!" 2. तकनीकी नवाचार एवं नायक विट्ठल • रात में शूटिंग व कृत्रिम प्रकाश: लोकल ट्रेनों के शोर से बचने हेतु रात में रिकॉर्डिंग अंधेरे के कारण भारत में पहली बार कृत्रिम लाइटिंग • नायक विट्ठल का मुकदमा: उर्दू न बोल पाने पर हटाया; मशहूर वकील जिन्ना ने मुकदमा लड़ा और विट्ठल को पुनः नायक बनवाया सांस्कृतिक प्रभाव: आम जनभाषा “हिंदुस्तानी” का प्रसार भारतीय सिनेमा की विकास यात्रा 1913: मूक सिनेमा युग राजा हरिश्चंद्र (दादा साहेब फाल्के) 14 मार्च 1931: सवाक् क्रांति आलम आरा (अर्देशिर ईरानी) आधुनिक स्वर्ण युग गीत, संगीत, संवाद व वैश्विक प्रभाव

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. "जब सिनेमा ने बोलना सीखा" प्रदीप तिवारी द्वारा रचित भारतीय सवाक् सिनेमा के इतिहास का अत्यंत ज्ञानवर्धक आलेख है।
मुख्य बिंदु 2
  1. 14 मार्च 1931 को मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में भारत की पहली बोलती फिल्म "आलम आरा" रिलीज हुई थी।
मुख्य बिंदु 3
  1. फिल्म के निर्माता-निर्देशक अर्देशिर एम. ईरानी थे, जिन्होंने 1929 की हॉलीवुड फिल्म "शो बोट" देखकर प्रेरणा ली थी।
मुख्य बिंदु 4
  1. पोस्टर पर लिखा था—"78 मुर्दा इंसान जिंदा हो गए, उनको बोलते, बातें करते देखो!" जिसने दर्शकों में भारी उन्माद पैदा किया।
मुख्य बिंदु 5
  1. साउंड प्रूफ स्टूडियो न होने और ट्रेनों के शोर के कारण फिल्म की अधिकांश शूटिंग रात में की गई।
मुख्य बिंदु 6
  1. रात में शूटिंग के कारण भारतीय सिनेमा में पहली बार कृत्रिम प्रकाश (Artificial Lighting) व्यवस्था का आविष्कार हुआ।
मुख्य बिंदु 7
  1. फिल्म के मुख्य नायक विट्ठल और नायिका जुबैदा थीं; विट्ठल ने वकील मोहम्मद अली जिन्ना की मदद से मुकदमा जीतकर नायक का पद पाया।
मुख्य बिंदु 8
  1. भारत के पहले पार्श्वगायक डब्ल्यू. एम. खान बने और पहला गाना था—"दे दे खुदा के नाम पे प्यारे, अगर देने की ताकत है।"
मुख्य बिंदु 9
  1. सवाक् फिल्मों के आने से फिल्मों में आम जनभाषा "हिंदुस्तानी" (हिंदी-उर्दू मिश्रित) और गीत-संगीत का व्यापक प्रसार हुआ।
मुख्य बिंदु 10
  1. "आलम आरा" ने मूक फिल्मों के दौर को समाप्त कर भारतीय सिनेमा को दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योग में बदलने की नींव रखी।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
भारत की पहली सवाक् (बोलती) फिल्म का क्या नाम था और यह कब प्रदर्शित हुई थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: आलम आरा (14 मार्च 1931 को)
आलम आरा का प्रथम प्रदर्शन 14 मार्च 1931 को मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में हुआ था।
2
फिल्म "आलम आरा" के निर्माता-निर्देशक कौन थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अर्देशिर एम. ईरानी
अर्देशिर ईरानी ने हॉलीवुड की "शो बोट" देखकर भारत में पहली बोलती फिल्म का निर्माण किया।
3
भारतीय सिनेमा का पहला पार्श्वगीत (Playback song) कौन-सा था और इसे किसने गाया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: "दे दे खुदा के नाम पे प्यारे" (डब्ल्यू. एम. खान द्वारा)
डब्ल्यू. एम. खान भारत के पहले पार्श्वगायक बने और उन्होंने यह अमर गीत गाया था।
4
आलम आरा की शूटिंग दिन के बजाय रात में क्यों की जाती थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पास से गुजरने वाली लोकल ट्रेनों के शोर से बचने के लिए
स्टूडियो साउंड प्रूफ नहीं था, इसलिए रात के सन्नाटे में साउंड रिकॉर्ड किया जाता था।
5
फिल्म के नायक विट्ठल का मुकदमा किस प्रसिद्ध बैरिस्टर ने लड़ा था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मोहम्मद अली जिन्ना ने
मशहूर वकील मोहम्मद अली जिन्ना ने विट्ठल का मुकदमा लड़कर उन्हें पुनः नायक का पद दिलाया था।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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