एक दिन अचानक आकाश से एक घायल बाज साँप की गुफा में आ गिरा। उसकी छाती पर खून के धब्बे थे, पंख टूटे हुए थे और वह दर्द से कराह रहा था। पहले तो साँप डरकर कोने में दुबक गया, पर जब उसने देखा कि बाज अंतिम साँसें गिन रहा है, तो वह निडर होकर उसके पास आया।
बाज का अदम्य स्वाभिमान
साँप ने उपहास उड़ाते हुए कहा—"क्यों भाई, इतनी जल्दी मरने की तैयारी कर ली?" बाज ने एक गहरी साँस ली और कहा—"मुझे अपनी जिंदगी का कोई अफसोस नहीं है। मैंने असीम आकाश में अपने पंखों से उड़ान भरी है, दूर-दूर तक आजादी का आनंद लिया है। तुम्हारी इस सड़ी-गली गुफा में रहने से लाख गुना बेहतर आकाश में एक पल की उड़ान है!"
बाज ने आकाश की ओर ललचाई नजरों से देखा और कहा कि काश, वह एक अंतिम बार आकाश में उड़ पाता! साँप ने मन में सोचा कि आकाश में ऐसा क्या जादू है? उसने बाज को उकसाया—"यदि तुम्हें आकाश इतना प्यारा है, तो चट्टान के किनारे से छलांग क्यों नहीं लगाते? हो सकता है तुम्हारे पंखों में अभी थोड़ी ताकत बाकी हो।" बाज में नई जान आ गई। उसने हिम्मत जुटाई, पंख फैलाए और चट्टान से छलांग लगा दी। परंतु टूटे पंखों के कारण वह उड़ न सका और सीधा समुद्र की फेनिल लहरों में समा गया।