गवरइया (मादा गौरैया) और गवरा (नर गौरैया) में गहरा प्रेम था। वे दिन भर साथ चुगते और रात में घोंसले में विश्राम करते। एक शाम गवरइया ने देखा कि मनुष्य रंग-बिरंगे सुंदर वस्त्र और सिर पर टोपी पहनते हैं। उसने गवरे से कहा कि उसे भी सिर पर टोपी पहननी है।
गवरा का यथार्थवादी दृष्टिकोण बनाम गवरइया का संकल्प
गवरे ने समझाया कि कपड़े पहनने से मनुष्य की कुदरती सुंदरता ढक जाती है और ठंड-गर्मी सहने की शक्ति कम हो जाती है। उसने कहा—"टोपी पहनने के चक्कर में कितनों का “टाट उलट” जाता है। टोपी तो राजा और बड़े आदमियों की शान है; एक टोपी के लिए कितने सिर कुचल दिए जाते हैं।" परंतु गवरइया अपनी जिद पर अड़ी रही। अगले दिन घूरा चुगते समय उसे अचानक रुई का एक फाहा मिल गया। उसने खुशी से पंख फड़फड़ाते हुए कहा—"मिल गया! मिल गया! टोपी का जुगाड़ मिल गया!"