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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 8 • Hindi (भाषा मंजरी-8) • अध्याय 12
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Sudama Charit

झारखण्ड शैक्षणिक परिषद् (JAC) एवं NCERT पाठ्यक्रम पर आधारित कक्षा 8 हिंदी का बारहवाँ पाठ "सुदामा चरित" (Sudama Charit) भक्तिकालीन ब्रजभाषा के सिद्धहस्त कवि नरोत्तमदास द्वारा रचित सवैया छंद का अत्यंत भावपूर्ण, कालजयी व अमर प्रबंध-काव्य है। यह रचना द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण और उनके दरिद्र बालसखा सुदामा के बीच की पावन, अलौकिक, निस्वार्थ और आडंबर-रहित मित्रता की सर्वोच्च पराकाष्ठा को प्रस्तुत करती है। गरीबी और बच्चों की भूख से व्याकुल होकर जब सुदामा अपनी पत्नी सुशीला के बार-बार आग्रह पर द्वारका पहुँचते हैं, तो द्वारपाल श्रीकृष्ण से उनकी दीन-दशा का वर्णन करता है—"सीस पगा न भुगा तन में, प्रभु जानै को आहि बसै केहि ग्रामा।" अपने बालसखा का नाम सुनते ही त्रिभुवन के स्वामी श्रीकृष्ण नंगे पाँव दौड़ पड़ते हैं और सुदामा को गले से लगा लेते हैं। इसके बाद का प्रसंग हिंदी साहित्य के सबसे मार्मिक करुण दृश्यों में से एक है—"पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोए।" सुदामा द्वारा संकोचवश बगल में छिपाई गई चावल की तुच्छ भेंट को श्रीकृष्ण अमृत मानकर स्वीकार करते हैं और सुदामा को बिना बताए ही उनकी झोपड़ी को सोने के महलों में बदल देते हैं। यह पाठ सच्ची मित्रता, करुणा, आत्मसम्मान और सामाजिक समरसता का दिव्य संदेश देता है।

⚡ जब फटे चीथड़ों में लिपटे एक दरिद्र ब्राह्मण के पाँवों के काँटे निकालने के लिए त्रिभुवन के स्वामी श्रीकृष्ण ने परात का पानी छुए बिना अपनी आँखों के आँसुओं से पाँव धो डाले—उस अमर मित्रता की महिमा क्या है?

क्या आज के स्वार्थी युग में ऐसी दोस्ती संभव है जहाँ एक अरबपति राजा अपने सबसे गरीब और फटेहाल मित्र को देखकर अपना राजसिंहासन छोड़ दे और नंगे पाँव दौड़कर उसे गले से लगा ले? जब सुदामा द्वारका पहुँचे, तो उनके पाँवों में बिवाइयाँ फटी थीं, पैरों में अनगिनत काँटे चुभे थे और वे मारे संकोच के अपनी फटी पोटली छिपा रहे थे। श्रीकृष्ण ने जब उनकी दुर्दशा देखी, तो वे फूट-फूटकर रो पड़े! सुदामा ने मुट्ठी भर तंदुल (चावल) क्या दिए, भगवान ने बदले में दो लोकों की संपत्ति न्योछावर कर दी! आइए, नरोत्तमदास जी के इन मधुर ब्रजभाषा सवैयों में डूबकर उस अमर मित्रता का साक्षात्कार करें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

यह पाठ हमें सिखाता है कि सच्ची मित्रता में अमीरी-गरीबी, पद या प्रतिष्ठा की कोई दीवार नहीं होती। यह अहंकार-विहीन प्रेम, दूसरों के दुख में रो पड़ने वाली करुणा और निष्कपट दान की महान शिक्षा प्रदान करता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की सांदीपनि आश्रम की बाल-मित्रता का पौराणिक संदर्भ।
  • सवैया छंद की लय और ब्रजभाषा शब्दावली की सामान्य समझ।
  • करुण रस और सख्य भाव की भक्ति की अवधारणा।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • सुदामा चरित के सभी सवैयों का शुद्ध, भावानुकूल व रागयुक्त सस्वर गायन कर सकेंगे।
  • श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता के अलौकिक व मानवीय पक्षों का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • "नैनन के जल सों पग धोए" पंक्ति में निहित अतिशयोक्ति और करुण रस के सौंदर्य को समझ सकेंगे।
  • सुदामा के संकोच और चावल की पोटली के पीछे छिपे मनोवैज्ञानिक द्वंद्व की व्याख्या कर सकेंगे।
  • ब्रजभाषा के विशिष्ट शब्दों (पगा, झँगा, बिवाइन, पानि, परात, तंदुल, दुर्बल) का अर्थ व संदर्भ स्पष्ट कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. सुदामा का द्वारका आगमन और द्वारप...
2 2. सवैयों की सप्रसंग व्याख्या एवं क...
3 3. सुदामा का स्वदेश लौटना और दिव्य...
4 4. काव्य-सौंदर्य एवं भाषा-शिल्प (Po...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. सुदामा का द्वारका आगमन और द्वारपाल का संदेश (Arrival at Dwaraka)

नरोत्तमदास जी सुदामा की दीन-हीन दशा का अत्यंत मार्मिक चित्र खींचते हैं:

  • दरिद्रता का सजीव चित्रण: सिर पर कोई पगड़ी नहीं, शरीर पर कोई कुरता नहीं, फटी हुई धोती और दुपट्टा। पाँवों में जूते नहीं होने से बिवाइयाँ (दरारें) फटी हैं और काँटे गड़े हुए हैं।
  • द्वारपाल द्वारा श्रीकृष्ण को सूचना: द्वारपाल राजमहल में जाकर प्रभु से कहता है कि एक अत्यंत दुर्बल और चकित-सा ब्राह्मण दरवाजे पर खड़ा है। वह द्वारका के वैभव को आश्चर्य से देख रहा है और अपना नाम "सुदामा" बता रहा है।
  • श्रीकृष्ण की व्याकुलता: जैसे ही श्रीकृष्ण ने "सुदामा" नाम सुना, वे राजसिंहासन, राजमुकुट और सब कुछ छोड़कर नंगे पाँव दरवाजे की ओर दौड़ पड़े।

2. सवैयों की सप्रसंग व्याख्या एवं करुण रस (Explanation of the Stanzas)

पाठ के प्रमुख सवैयों का गहन भावार्थ:

"सीस पगा न झँगा तन में, प्रभु जानै को आहि बसै केहि ग्रामा। / धोती फटी-सी लटी दुपटी, अरु पाँय उपानह को नहिं सामा॥ / द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक, रह्यो चकिसों बसुधा अभिरामा। / पूछत दीनदयाल को धाम, बतावत आपन नाम सुदामा॥"

भावार्थ: द्वारपाल कहता है—हे प्रभु! सिर पर न पगड़ी है और न तन पर कोई कुरता। फटी हुई धोती और फटा दुपट्टा लपेटे हुए एक अत्यंत दुर्बल ब्राह्मण दरवाजे पर खड़ा है। उसके पाँवों में जूते तक नहीं हैं। वह इस सुंदर धरती और महलों को चकित होकर देख रहा है और आपका महल पूछते हुए अपना नाम सुदामा बता रहा है।

"ऐसे बेहाल बिवाइन सों पग कंटक-जाल लगे पुनि जोए। / हाय! महादुख पायो सखा तुम, आए इते न किते दिन खोए॥ / देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करि कै करुनानिधि रोए। / पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोए॥"

भावार्थ: श्रीकृष्ण ने देखा कि सुदामा के पैरों में गहरी बिवाइयाँ फटी हैं और अनगिनत काँटे चुभे हुए हैं। वे करुणा से भरकर रो पड़े और बोले—हे मित्र! तुमने इतना बड़ा दुख क्यों सहा? तुम इतने दिन मेरे पास क्यों नहीं आए, कहाँ भटकते रहे? सुदामा की ऐसी दयनीय दशा देखकर करुणानिधान श्रीकृष्ण इतने द्रवित हुए कि उन्होंने परात के पानी को हाथ भी नहीं लगाया, अपनी आँखों से बहते आँसुओं की अविरल धार से ही मित्र के पाँव धो डाले!

"कछू भाबी हमैं दियो, सो तुम काहे न देत। / चाँपि पोटरी काँख में, रहे कहो केहि हेत॥"

भावार्थ: श्रीकृष्ण सुदामा से कहते हैं कि भाभी ने मेरे लिए कुछ उपहार अवश्य भेजा होगा, तुम उसे मुझे क्यों नहीं दे रहे हो? तुम उस चावल की छोटी सी पोटली को अपनी काँख (बगल) में क्यों छिपा रहे हो? श्रीकृष्ण ने वह पोटली झपट ली और दो मुट्ठी चावल खाकर सुदामा को दो लोकों का वैभव बिना बताए ही दान कर दिया।

3. सुदामा का स्वदेश लौटना और दिव्य चमत्कार (The Return & Miracle)

सुदामा जब विदा होकर अपने गाँव लौटे, तो एक अद्भुत दृश्य सामने था:

पहलूसुदामा की सोच (जाते समय)वास्तविक ईश्वरीय चमत्कार (पहुँचने पर)
मनोदशामन में मलाल था कि कृष्ण ने तो कुछ भी हाथ में नहीं दिया, केवल खाली हाथ विदा कर दिया।अपने गाँव पहुँचकर देखा कि जहाँ टूटी झोपड़ी थी, वहाँ सोने का विशाल राजमहल खड़ा था।
वैभव व संपत्तिघर में एक दाना अन्न नहीं था; पत्नी और बच्चे भूखे रहते थे।हाथी, घोड़े, दास-दासियाँ और स्वर्ण आभूषणों से सजी पत्नी सुशीला ने उनका स्वागत किया।
सुदामा का विरक्त भावसोचा कि कहीं मैं रास्ता भूलकर वापस द्वारका तो नहीं आ गया!सुदामा समझ गए कि यह सब बालसखा श्रीकृष्ण की असीम कृपा है; वे राजसी सुख पाकर भी प्रभु की भक्ति में लीन रहे।

4. काव्य-सौंदर्य एवं भाषा-शिल्प (Poetic Craft & Braj Bhasha)

नरोत्तमदास जी के काव्य-शिल्प की प्रमुख विशेषताएं:

  • छंद: सवैया छंद (प्रत्येक चरण में 22 से 26 वर्ण; अत्यंत गेय और मधुर)।
  • रस: करुण रस (मित्र की दशा पर रोना) तथा वात्सल्य/सख्य भाव की पराकाष्ठा।
  • अलंकार: अतिशयोक्ति अलंकार ("पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोए"—आँसुओं से पाँव धुलना अतिशयोक्ति का अनुपम उदाहरण है), अनुप्रास अलंकार।
  • भाषा: माधुर्य गुण से युक्त विशुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

कवि परिचय
नरोत्तमदास (16वीं सदी) | जन्म: सीतापुर (उत्तर प्रदेश)
भक्तिकाल के प्रसिद्ध कवि; प्रबंध काव्य "सुदामा चरित" उनकी अमर कीर्ति का आधार है।
काव्य विधा व छंद
प्रबंध काव्य | सवैया छंद (Braj Bhasha Sawaiya)
सवैयों की संगीतात्मकता और भावुकता सहृदय पाठकों को मुग्ध कर देती है।
मुख्य रस एवं भाव
करुण रस + सख्य भाव (निस्वार्थ मैत्री)
ईश्वर और भक्त के बीच बराबरी और प्रेम का सर्वोच्च आदर्श।
प्रमुख अलंकार
अतिशयोक्ति अलंकार ("नैनन के जल सों पग धोए") + अनुप्रास अलंकार
करुणा के अतिरेक को दर्शाने हेतु आँसुओं की धारा से पाँव धोने का वर्णन।
कथा का मूल संदेश
सच्ची मित्रता में धन और पद का कोई भेद नहीं होता
बिना माँगे सब कुछ दे देना ही सच्चे मित्र और ईश्वर की पहचान है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
प्रश्न 1: द्वारपाल द्वारा सुदामा की वेशभूषा का वर्णन सुनकर श्रीकृष्ण की क्या प्रतिक्रिया हुई?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: श्रीकृष्ण की भावुक प्रतिक्रिया:

  1. जैसे ही द्वारपाल ने सुदामा के फटेहाल वस्त्रों, पाँवों की बिवाइयों और उनके "सुदामा" नाम का उल्लेख किया, श्रीकृष्ण सिंहासन छोड़कर पागलों की तरह नंगे पाँव दौड़ पड़े।
  2. उन्होंने अपने बालसखा को दोनों हाथों से छाती से चिपका लिया और उनकी आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी।
  3. वे अपने सभी राजसी वस्त्रों और मर्यादाओं को भूलकर सुदामा को आदरपूर्वक अपने महल में ले गए और अपने सिंहासन पर बैठाकर स्वयं उनके पाँव पखारने लगे।
उदाहरण 2
प्रश्न 2: "पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोए"—इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है और इसका भाव स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: 1. अलंकार: इस पंक्ति में "अतिशयोक्ति अलंकार" (Hyperbole) है। 2. भावार्थ: श्रीकृष्ण ने सुदामा के पैरों में चुभे काँटे और फटी हुई बिवाइयाँ देखीं, तो मित्र के इस भयंकर कष्ट को देखकर वे करुणा से द्रवित होकर इतने फूट-फूटकर रोए कि उनके नेत्रों से आँसुओं की नदी बह निकली। उन्होंने पाँव धोने के लिए परात में रखे जल को छुआ तक नहीं; उनके पवित्र आँसुओं से ही सुदामा के दोनों पाँव पूरी तरह धुल गए। यहाँ कवि ने मित्र के प्रति असीम प्रेम और करुणा के अतिरेक को व्यक्त किया है।

उदाहरण 3
प्रश्न 3: सुदामा चावल की पोटली को अपनी काँख (बगल) में क्यों छिपा रहे थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: सुदामा द्वारा पोटली छिपाने का कारण:

  1. संकोच और हीन भावना: सुदामा की पत्नी ने पड़ोस से मांगकर केवल मुट्ठी भर तंदुल (कच्चे टूटे चावल) एक फटे चिथड़े में बाँधकर श्रीकृष्ण के लिए भेंट स्वरूप दिए थे।
  2. राजसी वैभव का संकोच: जब सुदामा ने द्वारकाधीश के सोने-चाँदी के विशाल महल, रत्नजड़ित सिंहासन और छप्पन भोग के ठाठ-बाट देखे, तो उन्हें लगा कि इतने बड़े राजा के सामने यह तुच्छ चावल भेंट करना अत्यंत लज्जाजनक होगा। इसी संकोच और झिझक के कारण वे पोटली को छिपा रहे थे।
उदाहरण 4
प्रश्न 4: द्वारका से लौटते समय सुदामा के मन में क्या विचार आ रहे थे और गाँव पहुँचकर वे क्यों भ्रमित हो गए?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: 1. लौटते समय विचार: सुदामा मन ही मन श्रीकृष्ण के प्रति थोड़ा असंतुष्ट और दुखी थे कि कृष्ण ने प्रेम तो बहुत दिखाया, गले भी लगाया, लेकिन हाथ में एक धेला भी नहीं दिया और खाली हाथ विदा कर दिया। वे सोच रहे थे कि अब मैं घर जाकर अपनी पत्नी को क्या मुँह दिखाऊँगा? 2. गाँव पहुँचकर भ्रम: जब वे अपने गाँव पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि जहाँ उनकी टूटी झोपड़ी थी, वहाँ सोने के विशाल महल खड़े थे, हाथी-घोड़े झूम रहे थे और उनकी पत्नी राजरानी की तरह सजी खड़ी थी। सुदामा को लगा कि कहीं वे रास्ता भूलकर दोबारा द्वारका तो नहीं लौट आए हैं!

उदाहरण 5
प्रश्न 5: "सुदामा चरित" हमें मित्रता के संबंध में क्या शाश्वत शिक्षा देता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: शाश्वत शिक्षा:

  1. समानता का भाव: सच्ची मित्रता में अमीरी, गरीबी, जाति, पद या सामाजिक प्रतिष्ठा की कोई दीवार नहीं होती। एक चक्रवर्ती राजा और एक दरिद्र भिक्षुक भी सच्चे मित्र हो सकते हैं।
  2. निस्वार्थ भाव: सच्चा मित्र कभी अपने मित्र के सामने अपने किए गए उपकार का ढिंढोरा नहीं पीटता। श्रीकृष्ण ने सुदामा को दो लोकों का वैभव दे दिया, परंतु सुदामा को इसका तनिक भी अहसास नहीं होने दिया।
  3. संवेदना और करुणा: मित्र के दुख को अपना दुख समझना और विपत्ति में बिना माँगे उसकी सहायता करना ही सच्ची मित्रता की कसौटी है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

छात्र अक्सर मान लेते हैं कि श्रीकृष्ण ने सुदामा के पाँव सचमुच बिना पानी के केवल आँसुओं से धोए थे।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यह कवि का "अतिशयोक्ति अलंकार" है जो श्रीकृष्ण की मित्र के प्रति अगाध करुणा और अत्यधिक रोने के भाव को तीव्रता से दर्शाने के लिए प्रयुक्त हुआ है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सुदामा को लालची समझ लेना कि वे केवल धन माँगने गए थे।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सुदामा स्वाभिमानी ब्राह्मण थे; वे स्वयं कभी नहीं जाना चाहते थे। वे केवल अपनी पत्नी के बार-बार अनुनय-विनय और बच्चों की भूख देखकर मित्र से मिलने गए थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सवैये की भाषा को अवधी समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

"सुदामा चरित" की भाषा विशुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा है, अवधी नहीं।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

नरोत्तमदास: "सुदामा चरित" — पावन मित्रता एवं करुणा की पराकाष्ठा "पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोए" 1. सुदामा का आगमन एवं अश्रुओं से चरण-प्रक्षालन • दीन-हीन वेशभूषा: सीस पगा न झँगा तन में • फटी धोती, लटी दुपटी पाँवों में फटी बिवाइयाँ व चुभे काँटों का जाल • करुणानिधि का विलाप: "हाय! महादुख पायो सखा तुम, आए इते न किते दिन खोए" परात के पानी को छुए बिना केवल आँसुओं से पाँव धोए अतिशयोक्ति अलंकार: करुणा का सर्वोच्च शिखर 2. तंदुल की पोटली एवं गुप्त दान • संकोच में छिपाई पोटली: काँख में छिपाई भाभी की भेजी तुच्छ तंदुल पोटली प्रभु ने छीना और दो मुट्ठी खाकर दो लोक न्योछावर किए • गाँव में स्वर्ण महल: टूटी झोंपड़ी की जगह कंचन के महल, गज-बाजी की कतार सुदामा चकित: बिना माँगे ही सब कुछ प्रदान किया सच्ची मित्रता: उपकार का ढोल नहीं, गुप्त कृपा "सुदामा चरित" के तीन अमर संदेश 1. निस्वार्थ मैत्री अमीरी-गरीबी के भेद से परे 2. ईश्वरीय करुणा दीनबंधु का शरणागत वत्सल भाव 3. निष्काम दान बिना जताए सर्वस्व न्योछावर करना

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
  1. "सुदामा चरित" भक्तिकालीन कवि नरोत्तमदास द्वारा रचित सवैया छंद का अमर और अत्यंत भावुक प्रबंध काव्य है।
मुख्य बिंदु 2
  1. यह रचना भगवान श्रीकृष्ण और उनके दरिद्र बालसखा सुदामा की निस्वार्थ और अलौकिक मित्रता को प्रस्तुत करती है।
मुख्य बिंदु 3
  1. दरिद्रता से तंग आकर अपनी पत्नी के बार-बार आग्रह पर सुदामा द्वारका में श्रीकृष्ण से मिलने पहुँचते हैं।
मुख्य बिंदु 4
  1. द्वारपाल द्वारा सुदामा के फटेहाल वस्त्रों और नाम का संदेश पाते ही श्रीकृष्ण नंगे पाँव दौड़कर मित्र को गले लगा लेते हैं।
मुख्य बिंदु 5
  1. सुदामा के पैरों में बिवाइयों और काँटों का जाल देखकर श्रीकृष्ण इतने दुखी हुए कि उन्होंने परात के पानी को छुए बिना केवल अपने आँसुओं से पाँव धोए।
मुख्य बिंदु 6
  1. "पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोए"—यह पंक्ति करुण रस और अतिशयोक्ति अलंकार का अनुपम उदाहरण है।
मुख्य बिंदु 7
  1. सुदामा संकोचवश अपनी बगल में पत्नी द्वारा भेजे गए कच्चे चावल की तुच्छ पोटली छिपा रहे थे।
मुख्य बिंदु 8
  1. श्रीकृष्ण ने वह पोटली छीन ली और दो मुट्ठी चावल खाकर सुदामा को दो लोकों का संपूर्ण वैभव गुप्त रूप से दान कर दिया।
मुख्य बिंदु 9
  1. गाँव लौटने पर सुदामा ने देखा कि उनकी टूटी झोपड़ी की जगह कंचन के महल खड़े थे और चारों ओर राजसी ठाठ-बाट था।
मुख्य बिंदु 10
  1. सुदामा चरित यह शाश्वत संदेश देता है कि सच्ची मित्रता में अमीरी-गरीबी का कोई भेद नहीं होता और सच्चा मित्र बिना जताए मदद करता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
"सुदामा चरित" काव्य के रचयिता कौन हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: नरोत्तमदास
नरोत्तमदास भक्तिकाल के प्रसिद्ध ब्रजभाषा कवि हैं जिनकी अमर कृति "सुदामा चरित" है।
2
सुदामा की दीन-दशा देखकर श्रीकृष्ण ने उनके पाँव किस प्रकार धोए?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अपनी आँखों के आँसुओं के जल से
श्रीकृष्ण करुणा से इतने द्रवित हुए कि उन्होंने परात का पानी छुए बिना केवल अपने आंसुओं से पाँव धो दिए।
3
सुदामा संकोच के कारण अपनी बगल में क्या छिपा रहे थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: चावल (तंदुल) की छोटी सी पोटली
सुदामा की पत्नी ने भेंट स्वरूप जो मुट्ठी भर चावल दिए थे, सुदामा मारे संकोच के उसे छिपा रहे थे।
4
"सुदामा चरित" की रचना किस मुख्य छंद और भाषा में की गई है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सवैया छंद और ब्रजभाषा में
यह रचना ब्रजभाषा के अत्यंत मधुर और गेय सवैया छंद में रची गई है।
5
गाँव लौटने पर सुदामा को अपनी टूटी झोपड़ी के स्थान पर क्या दिखाई दिया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सोने का भव्य राजमहल (कंचन के महल)
श्रीकृष्ण ने सुदामा को बिना बताए ही उनकी दरिद्रता दूर कर उन्हें दो लोकों का वैभव प्रदान कर दिया था।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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