"सीस पगा न झँगा तन में, प्रभु जानै को आहि बसै केहि ग्रामा। / धोती फटी-सी लटी दुपटी, अरु पाँय उपानह को नहिं सामा॥ / द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक, रह्यो चकिसों बसुधा अभिरामा। / पूछत दीनदयाल को धाम, बतावत आपन नाम सुदामा॥"
भावार्थ: द्वारपाल कहता है—हे प्रभु! सिर पर न पगड़ी है और न तन पर कोई कुरता। फटी हुई धोती और फटा दुपट्टा लपेटे हुए एक अत्यंत दुर्बल ब्राह्मण दरवाजे पर खड़ा है। उसके पाँवों में जूते तक नहीं हैं। वह इस सुंदर धरती और महलों को चकित होकर देख रहा है और आपका महल पूछते हुए अपना नाम सुदामा बता रहा है।
"ऐसे बेहाल बिवाइन सों पग कंटक-जाल लगे पुनि जोए। / हाय! महादुख पायो सखा तुम, आए इते न किते दिन खोए॥ / देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करि कै करुनानिधि रोए। / पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोए॥"
भावार्थ: श्रीकृष्ण ने देखा कि सुदामा के पैरों में गहरी बिवाइयाँ फटी हैं और अनगिनत काँटे चुभे हुए हैं। वे करुणा से भरकर रो पड़े और बोले—हे मित्र! तुमने इतना बड़ा दुख क्यों सहा? तुम इतने दिन मेरे पास क्यों नहीं आए, कहाँ भटकते रहे? सुदामा की ऐसी दयनीय दशा देखकर करुणानिधान श्रीकृष्ण इतने द्रवित हुए कि उन्होंने परात के पानी को हाथ भी नहीं लगाया, अपनी आँखों से बहते आँसुओं की अविरल धार से ही मित्र के पाँव धो डाले!
"कछू भाबी हमैं दियो, सो तुम काहे न देत। / चाँपि पोटरी काँख में, रहे कहो केहि हेत॥"
भावार्थ: श्रीकृष्ण सुदामा से कहते हैं कि भाभी ने मेरे लिए कुछ उपहार अवश्य भेजा होगा, तुम उसे मुझे क्यों नहीं दे रहे हो? तुम उस चावल की छोटी सी पोटली को अपनी काँख (बगल) में क्यों छिपा रहे हो? श्रीकृष्ण ने वह पोटली झपट ली और दो मुट्ठी चावल खाकर सुदामा को दो लोकों का वैभव बिना बताए ही दान कर दिया।