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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 6
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

पुष्पी पादपों का शारीर

पुष्पी पादपों का शारीर (Anatomy of Flowering Plants) आवृतबीजी (एंजियोस्पर्म) पादपों की आंतरिक सूक्ष्मदर्शीय कोशिकीय संरचना, ऊतक तंत्रों तथा उनके कार्यात्मक संगठन का वैज्ञानिक विश्लेषण है। पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद (WBCHSE) तथा एनसीईआरटी कक्षा 11 जीव विज्ञान के इस आधारभूत अध्याय में पादप ऊतकों के श्रम विभाजन—सक्रिय विभाजनशील विभज्योतक ऊतकों (शीर्षस्थ, अंतर्वेशी तथा पार्श्वीय) से लेकर विशिष्ट स्थायी ऊतकों (मृदूतक, स्थूलकोण ऊतक, दृढ़ोतक, जाइलम तथा फ्लोएम)—का क्रमबद्ध अध्ययन किया गया है। विद्यार्थी तीन समन्वित ऊतक तंत्रों: बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र (रंध्रीय तंत्र, त्वचा रोम व मूलरोम), भरण ऊतक तंत्र (वल्कुट, कैस्पेरी पट्टियों युक्त अंतस्त्वचा, परिरंभ व मज्जा), तथा संवहनी ऊतक तंत्र (अरीय बनाम संयुक्त संपाश्विक खुले/बंद बंडल) की संरचना का अन्वेषण करते हैं। द्विबीजपत्री तथा एकबीजपत्री जड़, तना और पत्ती का तुलनात्मक शारीर यांत्रिक मजबूती, जल संवहन और प्रकाश संश्लेषण के अनुकूलनों को उजागर करता है। अध्याय के अंतिम भाग में संवहनी कैम्बियम तथा कागजन (कॉर्क कैम्बियम) की सक्रियता द्वारा द्वितीयक वृद्धि, वसंत व शरद काष्ठ के संयोजन से वार्षिक वलयों का निर्माण और डेंड्रोक्रोनोलॉजी (आयु निर्धारण), टाइलोसिस युक्त टिकाऊ अंतःकाष्ठ (Heartwood) बनाम रसकाष्ठ (Sapwood), तथा परिचर्म व वातरंध्रों (Lenticels) के निर्माण का विस्तृत विवेचन किया गया है। बोर्ड परीक्षाओं तथा नीट (NEET) में पूर्ण अंक प्राप्त करने हेतु यह अध्याय अनिवार्य आधारशिला है।

क्या आपने कभी सोचा है?

किसी विशाल प्राचीन वृक्ष के कटे हुए तने को देखकर वैज्ञानिक न केवल उसकी सही आयु, बल्कि यह भी कैसे बता सकते हैं कि पचास वर्ष पूर्व क्षेत्र में भीषण सूखा पड़ा था?

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पादप शारीर का व्यावहारिक ज्ञान वानिकी, काष्ठ उद्योग (टिम्बर इंडस्ट्री), कृषि, भेषजगुण विज्ञान (Pharmacognosy) और जलवायु विज्ञान का मूल आधार है। वृक्ष के तने के आधार में वार्षिक वलयों की गिनती करके बिना पेड़ को काटे उसकी सटीक आयु और बीते सैकड़ों वर्षों के सूखे व बाढ़ के चक्र का पुनर्निर्माण किया जा सकता है (डेंड्रोक्रोनोलॉजी)। अंतःकाष्ठ और रसकाष्ठ के कोशिकीय संगठन की समझ लकड़ी के दीमक-रोधी और टिकाऊपन की पहचान करने में मदद करती है। इसके अतिरिक्त आयुर्वेदिक व एलोपैथिक दवाओं के निर्माण में कच्ची औषधियों व मसालों के चूर्ण में मिलावट की पहचान माइक्रोस्कोपिक लक्षणों—जैसे बीजचोल की अश्म कोशिकाएं (Sclereids), अंतस्त्वचा का स्टार्च आच्छद और विशिष्ट त्वचा रोमों—के आधार पर की जाती है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • पादप कोशिका की आधारभूत संरचना (कोशिका भित्ति, सेलूलोज़, रिक्तिका व लवक)।
  • भ्रूण के मूलांकुर (Radicle) से जड़ तथा प्रांकुर (Plumule) से प्ररोह के विकास का ज्ञान।
  • एकबीजपत्री (Monocot) एवं द्विबीजपत्री (Dicot) पादपों का प्राथमिक बाह्य अंतर।
  • कोशिका विभाजन (समसूत्री विभाजन) और विभज्योतक से स्थायी ऊतक बनने की प्रक्रिया।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 विभज्योतक एवं सरल स्थायी ऊतक: कोशिक...
2 जटिल स्थायी ऊतक: जाइलम एवं फ्लोएम क...
3 पादप ऊतक तंत्र: बाह्यत्वचीय, भरण एव...
4 जड़ का शारीर: द्विबीजपत्री जड़ बनाम...
5 तने एवं पत्ती का शारीर: द्विबीजपत्र...
6 द्विबीजपत्री पादपों में द्वितीयक वृ...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

विभज्योतक एवं सरल स्थायी ऊतक: कोशिकीय विभेदन एवं यांत्रिक अनुकूलन

समान उत्पत्ति, समान संरचना तथा एक निश्चित कार्य करने वाली कोशिकाओं के समूह को ऊतक (Tissue) कहते हैं। कोशिका विभाजन की क्षमता के आधार पर पादप ऊतकों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बाँटा जाता है: विभज्योतक ऊतक (Meristematic tissue) तथा स्थायी ऊतक (Permanent tissue)।

1. विभज्योतक ऊतक (Meristematic Tissues)

विभज्योतक कोशिकाएं अपरिपक्व, निरंतर समसूत्री विभाजन करने में सक्षम, पतली सेलूलोज़ भित्ति वाली, सघन जीवद्रव्य व सुस्पष्ट केंद्रक से युक्त, रिक्तिकाहीन तथा बिना किसी अंतराकोशिकीय स्थान के आपस में सटी होती हैं।

  • स्थिति के आधार पर वर्गीकरण:
    • शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical Meristem): जड़ व प्ररोह के बढ़ते हुए शीर्षों पर स्थित (Root Apical Meristem - RAM तथा Shoot Apical Meristem - SAM)। यह प्राथमिक ऊतकों का निर्माण करता है और पादप की लंबाई में प्राथमिक वृद्धि हेतु उत्तरदायी है।
    • अंतर्वेशी विभज्योतक (Intercalary Meristem): स्थायी ऊतकों के बीच स्थित, विशेष रूप से एकबीजपत्री घासों, बाँस व पुदीने के पर्वमध्यों के आधार पर पाया जाता है। यह शाकाहारी जंतुओं द्वारा खाए गए भागों का शीघ्र पुनर्जनन करता है।
    • पार्श्वीय विभज्योतक (Lateral Meristem): जड़ तथा तने के पार्श्व में अनुदैर्ध्य रूप से स्थित बेलनाकार विभज्योतक। यह परिनतिक (periclinal) विभाजन द्वारा द्वितीयक ऊतक बनाता है जिससे पादप की चौड़ाई या मोटाई में वृद्धि होती है (उदा. संवहनी कैम्बियम व कागजन / कॉर्क कैम्बियम)।
  • उत्पत्ति के आधार पर वर्गीकरण:
    • प्राथमिक विभज्योतक: भ्रूणावस्था से ही सक्रिय रहते हैं (शीर्षस्थ व अंतर्वेशी विभज्योतक)।
    • द्वितीयक विभज्योतक: परिपक्व स्थायी कोशिकाओं के पुनर्विभेदन (Dedifferentiation) द्वारा जीवन में बाद में बनते हैं (जैसे मज्जा किरणों से बना अंतरापूलीय कैम्बियम तथा वल्कुट से बना कागजन / कॉर्क कैम्बियम)।
2. सरल स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissues)

वे स्थायी ऊतक जो केवल एक ही प्रकार की समरूप कोशिकाओं से मिलकर बने होते हैं, सरल स्थायी ऊतक कहलाते हैं:

  • मृदूतक (Parenchyma):
    • संरचना: जीवित, समव्यासी, गोलाकार या अंडाकार कोशिकाएं; पतली सेलूलोज़ भित्ति व बड़ी केंद्रीय रिक्तिका युक्त। इनके बीच सुस्पष्ट अंतराकोशिकीय स्थान पाए जाते हैं।
    • रूपांतरण व कार्य: प्रकाश संश्लेषण, खाद्य भंडारण व स्राव। क्लोरोप्लास्टयुक्त मृदूतक को हरित ऊतक (Chlorenchyma) तथा जलमग्न पौधों में बड़े वायु कोष्ठों वाले मृदूतक को वात ऊतक (Aerenchyma) कहते हैं जो प्लवनशीलता व गैस विनिमय प्रदान करता है।
  • स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma):
    • संरचना: जीवित लंबी कोशिकाएं, जिनका सबसे विशिष्ट लक्षण यह है कि कोशिकाओं के कोनों पर पेक्टिन, सेलूलोज़ तथा हेमीसेलूलोज़ का असमान स्थूलन पाया जाता है। इनमें अंतराकोशिकीय स्थान पूर्णतः अनुपस्थित होते हैं।
    • उपस्थिति व कार्य: द्विबीजपत्री शाकीय तनों व पर्णवृंतों की अधस्त्वचा (hypodermis) में 3-4 परतों में मिलता है। यह पादप के बढ़ते अंगों को लचीला यांत्रिक सहारा (Tensile strength without brittleness) देता है, जिससे तेज हवा में पौधे बिना टूटे मुड़ जाते हैं। (यह एकबीजपत्री तनों और जड़ों में पूर्णतः अनुपस्थित होता है)।
  • दृढ़ोतक (Sclerenchyma):
    • संरचना: परिपक्वता पर पूर्णतः मृत एवं जीवद्रव्यहीन। कोशिका भित्ति अत्यधिक मोटी तथा कठोर लिग्निन द्वारा स्थूलित होती है। केंद्रीय गुहा (lumen) अत्यंत संकीर्ण होती है और भित्ति पर गर्त (pits) पाए जाते हैं।
    • प्रकार:
      1. दृढ़ोतकी रेशे (Fibres): लंबे, पतले, दोनों सिरों पर नुकीले रेशे जो गुच्छों में पाए जाते हैं (उदा. फ्लोएम के बास्ट रेशे)।
      2. अश्म कोशिकाएं या स्क्लेरीड्स (Sclereids / Stone Cells): अत्यधिक मोटी भित्ति वाली गोलाकार या अंडाकार कोशिकाएं जिनकी गुहा अत्यंत संकीर्ण होती है। ये अमरूद, नाशपाती, चीकू के गूदे की खुरदरी कणिकाओं, अखरोट के छिलके और दालों के बीजचोल में पाई जाती हैं।

जटिल स्थायी ऊतक: जाइलम एवं फ्लोएम की सूक्ष्मदर्शीय संरचना

एक से अधिक प्रकार की भिन्न कोशिकाओं से मिलकर बने ऊतक जो एक इकाई के रूप में मिलकर संवहन का कार्य संपन्न करते हैं, जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissues) कहलाते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं: जाइलम तथा फ्लोएम।

1. जाइलम (Xylem / दारू)

जाइलम जड़ों द्वारा अवशोषित जल और खनिज लवणों का पौधों के वायवीय भागों तक एकदिशीय संवहन करता है तथा यांत्रिक दृढ़ता प्रदान करता है। इसके 4 घटक हैं:

  • वाहिनिकाएं (Tracheids): जीवद्रव्यहीन मृत, लंबी, दोनों सिरों पर नुकीली नलाकार कोशिकाएं। भित्ति लिग्निनयुक्त तथा परिवेशित गर्तों (bordered pits) से युक्त होती है। जिम्नोस्पर्म व टेरिडोफाइट्स का मुख्य जल संवहनी तत्व।
  • वाहिकाएं (Vessels / Tracheae): अनेक वाहिका तत्वों के परस्पर सिरे से सिरा जुड़ने से बनी एक लंबी सतत नली। इनकी अनुप्रस्थ अंतःभित्तियाँ विघटित होकर छिद्रित पट्टिका (Perforation plate) बनाती हैं। इनकी गुहा वाहिनिकाओं से अधिक चौड़ी होती है। एंजियोस्पर्म का लाक्षणिक लक्षण: वाहिकाएं लगभग सभी आवृतबीजी पादपों में उपस्थित होती हैं, परंतु अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म, नीटम को छोड़कर) व टेरिडोफाइट्स में अनुपस्थित होती हैं।
  • जाइलम रेशे (Xylem Fibres): अत्यधिक मोटी लिग्निनयुक्त भित्ति और संकीर्ण गुहा वाले मृत रेशे; यांत्रिक सहारा देते हैं।
  • जाइलम मृदूतक (Xylem Parenchyma): जाइलम का एकमात्र जीवित घटक। पतली सेलूलोज़ भित्ति युक्त कोशिकाएं जो मंड, वसा व टैनिन का संचय करती हैं। इसकी मज्जा किरण कोशिकाएं जल का अरीय (त्रिज्यीय) संवहन करती हैं।
2. प्राथमिक जाइलम: मध्यादिरुक (Endarch) बनाम बाह्यादिरुक (Exarch)
शारीरिकी स्थितिप्रोटोजाइलम की स्थितिमेटाजाइलम की स्थितिपादप अंग
मध्यादिरुक (Endarch)केंद्र (मज्जा) की ओर स्थितपरिधि (वल्कुट) की ओर स्थितद्विबीजपत्री व एकबीजपत्री तना
बाह्यादिरुक (Exarch)परिधि (परिरंभ) की ओर स्थितकेंद्र की ओर स्थितद्विबीजपत्री व एकबीजपत्री जड़
3. फ्लोएम (Phloem / पोषवाह / बास्ट)

फ्लोएम पत्तियों में बने कार्बनिक भोज्य पदार्थों को पौधे के विभिन्न भागों में द्विदिशीय संवहित करता है। इसके 4 घटक हैं:

  • चालनी नलिका तत्व (Sieve Tube Elements): लंबी नलाकार कोशिकाएं जो लंबवत कतार में जुड़ी होती हैं। इनकी अनुप्रस्थ अंतःभित्ति चालनी जैसी छिद्रित होकर चालनी पट्टिका (Sieve plate) बनाती है। कोशिकावैज्ञानिक विशेषता: परिपक्व चालनी नलिका में परिधीय जीवद्रव्य और बड़ी रिक्तिका होती है, परंतु कोई केंद्रक नहीं होता! इसके सभी कार्यों का नियंत्रण पास की सहकोशिका के केंद्रक द्वारा किया जाता है।
  • सहकोशिकाएं (Companion Cells): चालनी तत्वों से सटी हुई सजीव, पतली भित्ति, सघन जीवद्रव्य व सुस्पष्ट बड़े केंद्रक वाली विशिष्ट मृदूतक कोशिकाएं। चालनी तत्व और सहकोशिका दोनों एक ही मातृ कोशिका से उत्पन्न बहन कोशिकाएं होती हैं। प्लाज्मोडेस्मेटा द्वारा जुड़कर ये चालनी नलिकाओं में दाब प्रवणता बनाए रखती हैं। (जिम्नोस्पर्म में इनके स्थान पर एल्ब्यूमिनस कोशिकाएं पाई जाती हैं)।
  • फ्लोएम मृदूतक: सजीव लंबी कोशिकाएं जो रंजक, लेटेक्स और श्लेष्म का संचय करती हैं। अधिकांश एकबीजपत्री पौधों में यह अनुपस्थित होता है।
  • फ्लोएम रेशे या बास्ट रेशे (Bast Fibres): फ्लोएम का एकमात्र मृत घटक। अत्यधिक लंबे, बिना शाखा वाले, लिग्निनयुक्त मोटी भित्ति वाले दृढ़ोतकी रेशे। वाणिज्यिक रूप से जूट (Corchorus), सन (Flax) तथा पटसन (Hemp) से बास्ट रेशे प्राप्त किए जाते हैं।

पादप ऊतक तंत्र: बाह्यत्वचीय, भरण एवं संवहनी ऊतक तंत्र

पादप शरीर में स्थिति और कार्य के आधार पर जूलियस वॉन सैक्स (1875) ने पादप ऊतकों को तीन सुव्यवस्थित ऊतक तंत्रों में वर्गीकृत किया: बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र, भरण ऊतक तंत्र तथा संवहनी ऊतक तंत्र।

1. बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र (Epidermal Tissue System)

पौधे के प्राथमिक शरीर का सबसे बाहरी सुरक्षात्मक आवरण बनाता है:

  • बाह्यत्वचा (Epidermis): अंतरकोशिकीय स्थान रहित एकल परत। तने व पत्ती की बाहरी भित्ति पर जलरोधी मोमी परत क्यूटिकल (Cuticle) पाई जाती है जो वाष्पोत्सर्जन को रोकती है (जड़ों में क्यूटिकल अनुपस्थित होती है)।
  • रंध्री तंत्र (Stomatal Apparatus): पत्ती की बाह्यत्वचा पर गैसीय विनिमय तथा वाष्पोत्सर्जन हेतु पाए जाने वाले सूक्ष्म छिद्र। प्रत्येक रंध्र दो विशिष्ट द्वार कोशिकाओं (Guard cells) द्वारा घिरा होता है:
    • द्विबीजपत्री पौधों में: द्वार कोशिकाएं वृक्काकार या सेम के बीज के आकार की (Kidney-shaped) होती हैं।
    • एकबीजपत्री घासों में: द्वार कोशिकाएं डम्बल-आकार की (Dumb-bell-shaped) होती हैं।
    • द्वार कोशिकाओं के चारों ओर स्थित रूपांतरित बाह्यत्वचीय कोशिकाओं को सहायक कोशिकाएं (Subsidiary cells) कहते हैं। रंध्र, द्वार कोशिकाएं व सहायक कोशिकाएं मिलकर रंध्री तंत्र बनाती हैं।
  • त्वचीय उपांग: तने की त्वचा पर पाए जाने वाले बहुकोशिकीय रोम त्वचा रोम (Trichomes) कहलाते हैं (वाष्पोत्सर्जन रोकते हैं व स्रावी होते हैं); जड़ के परिपक्वता क्षेत्र से निकलने वाले एककोशिकीय प्रवर्ध मूलरोम (Root hairs) कहलाते हैं (जल व खनिज अवशोषित करते हैं)।
2. भरण ऊतक तंत्र (Ground Tissue System)

बाह्यत्वचा और संवहन बंडलों को छोड़कर पौधे का संपूर्ण आंतरिक भाग भरण ऊतक तंत्र कहलाता है:

  • वल्कुट (Cortex): बाह्यत्वचा के नीचे स्थित बहुपरतीय भाग। द्विबीजपत्री तने में यह अधस्त्वचा (Hypodermis - स्थूलकोण ऊतक), सामान्य वल्कुट (मृदूतक), तथा अंतस्त्वचा (Endodermis) में विभेदित होता है।
  • अंतस्त्वचा: वल्कुट की सबसे भीतरी एकल परत। द्विबीजपत्री तने में इसमें प्रचुर मंड कण होते हैं, अतः इसे मंड आच्छद (Starch sheath) कहते हैं। जड़ों में अंतस्त्वचा की अरीय व स्पर्शरेखीय भित्तियों पर जलरोधी सुबेरिन की कैस्पेरी पट्टियाँ (Casparian strips) पाई जाती हैं।
  • परिरंभ (Pericycle): अंतस्त्वचा के भीतर स्थित परत। द्विबीजपत्री जड़ में यह पार्श्वीय जड़ों तथा संवहनी कैम्बियम को जन्म देती है; द्विबीजपत्री तने में दृढ़ोतक की अर्धचंद्राकार टोपी बनाती है।
  • मज्जा (Pith) व मज्जा किरणें: केंद्र में स्थित मृदूतकीय भाग मज्जा कहलाता है; संवहन बंडलों के बीच की अरीय पट्टियाँ मज्जा किरणें कहलाती हैं।
3. संवहनी ऊतक तंत्र (Vascular Tissue System)

जाइलम और फ्लोएम परस्पर संगठित होकर संवहन बंडल (Vascular Bundles) बनाते हैं:

  • अरीय संवहन बंडल (Radial Bundle): जाइलम तथा फ्लोएम अलग-अलग त्रिज्याओं (radii) पर एकांतर क्रम में व्यवस्थित होते हैं। यह सभी जड़ों (द्विबीजपत्री एवं एकबीजपत्री जड़) का लाक्षणिक लक्षण है।
  • संयुक्त संपाश्विक बंडल (Conjoint Collateral Bundle): जाइलम और फ्लोएम एक ही त्रिज्या पर एक साथ स्थित होते हैं (फ्लोएम बाहर, जाइलम अंदर)। यह तने तथा पत्तियों में पाया जाता है:
    • खुला (Open): जाइलम व फ्लोएम के बीच विभाज्य कैम्बियम की पट्टी पाई जाती है, जिससे द्वितीयक वृद्धि संभव होती है (द्विबीजपत्री तना)।
    • बंद (Closed): जाइलम व फ्लोएम के बीच कैम्बियम अनुपस्थित होता है, द्वितीयक वृद्धि नहीं होती (एकबीजपत्री तना व पत्तियाँ)।
    • उभयफ्लोएमी (Bicollateral): जाइलम के दोनों ओर (बाहर व भीतर) फ्लोएम और दो कैम्बियम पट्टियाँ पाई जाती हैं (उदा. कद्दू कुल—Cucurbitaceae)।

जड़ का शारीर: द्विबीजपत्री जड़ बनाम एकबीजपत्री जड़ की तुलनात्मक संरचना

पादपों की जड़ें जल व खनिजों का अवशोषण करती हैं तथा पौधे को भूमि में स्थिर रखती हैं। द्विबीजपत्री एवं एकबीजपत्री जड़ों में बुनियादी ऊतक व्यवस्था समान होते हुए भी जाइलम बंडलों की संख्या तथा मज्जा के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर होते हैं।

1. द्विबीजपत्री जड़ का शारीर (सूरजमुखी जड़ - Helianthus Root)
  1. एपिब्लेमा या मूलत्वचा: सबसे बाहरी एकल परत; क्यूटिकल व रंध्र अनुपस्थित। जल अवशोषण हेतु अनेक एककोशिकीय मूलरोम पाए जाते हैं।
  2. वल्कुट (Cortex): पतली भित्ति वाली गोल मृदूतक कोशिकाओं की कई परतें, जिनमें अंतराकोशिकीय स्थान होते हैं।
  3. अंतस्त्वचा (Endodermis): ढोलाकार (barrel-shaped) कोशिकाओं की एकल परत। अरीय भित्तियों पर जलरोधी सुबेरिन की कैस्पेरी पट्टियाँ पाई जाती हैं। प्रोटोजाइलम के सामने पतली भित्ति वाली मार्ग कोशिकाएं (Passage cells) स्थित होती हैं।
  4. परिरंभ (Pericycle): अंतस्त्वचा के नीचे स्थित परत। यह पूर्णतः विभज्योतकी क्षमता रखती है और यहीं से सभी पार्श्वीय जड़ें तथा द्वितीयक संवहनी कैम्बियम उत्पन्न होते हैं।
  5. संवहन बंडल: अरीय तथा बाह्यादिरुक (Exarch) जाइलम (प्रोटोजाइलम बाहर परिधि की ओर, मेटाजाइलम केंद्र की ओर)। बंडलों की संख्या प्रायः २ से ६ (द्वि-आर्क से षट्-आर्क - Diarch to Hexarch) होती है। जाइलम व फ्लोएम के बीच संयोजी मृदूतक ऊतक पाया जाता है।
  6. मज्जा (Pith): अत्यंत छोटी, संकुचित या प्रायः अनुपस्थित होती है।
2. एकबीजपत्री जड़ का शारीर (मक्का जड़ - Zea mays Root)

एकबीजपत्री जड़ की बाह्य संरचना द्विबीजपत्री जड़ के समान होती है, परंतु आंतरिक रूप से निम्नलिखित निर्णायक अंतर होते हैं:

  • बहु-आर्क जाइलम (Polyarch Condition): संवहन बंडलों की संख्या हमेशा ६ से अधिक (प्रायः ८ से २० या अधिक) होती है।
  • विशाल सुविकसित मज्जा: केंद्र में एक अत्यंत बड़ी, सुस्पष्ट और सुविकसित मृदूतकीय मज्जा (Large well-developed pith) उपस्थित होती है।
  • द्वितीयक वृद्धि का अभाव: कैम्बियम का निर्माण न होने के कारण एकबीजपत्री जड़ में कभी भी द्वितीयक वृद्धि नहीं होती।
3. द्विबीजपत्री जड़ बनाम एकबीजपत्री जड़ का तुलनात्मक चार्ट
शारीरिकी लक्षणद्विबीजपत्री जड़ (सूरजमुखी जड़)एकबीजपत्री जड़ (मक्का जड़)
संवहन बंडलों की संख्या२ से ६ बंडल (द्वि-आर्क से षट्-आर्क)६ से अधिक; बहुत सारे (बहु-आर्क / পলিয়ার্ক, ८-२०+)
मज्जा (Pith)अत्यंत छोटी, संकुचित या अनुपस्थितअत्यंत बड़ी, सुस्पष्ट एवं सुविकसित
कैम्बियम व द्वितीयक वृद्धिपरिरंभ व संयोजी ऊतक से कैम्बियम बनता है; द्वितीयक वृद्धि होती हैकैम्बियम कभी नहीं बनता; द्वितीयक वृद्धि पूर्णतः अनुपस्थित

तने एवं पत्ती का शारीर: द्विबीजपत्री बनाम एकबीजपत्री तुलनात्मक परिदृश्य

द्विबीजपत्री एवं एकबीजपत्री तनों और पत्तियों का आंतरिक शारीर उनके यांत्रिक सहारे, संवहन व्यवस्था तथा प्रकाश संश्लेषी गैस विनिमय के आधार पर मूलभूत भिन्नता प्रदर्शित करता है।

1. द्विबीजपत्री तने का शारीर (सूरजमुखी तना)
  • बाह्यत्वचा: क्यूटिकल से ढकी एकल परत; इस पर बहुकोशिकीय त्वचा रोम (Trichomes) तथा रंध्र पाए जाते हैं।
  • अधस्त्वचा (Hypodermis): बाह्यत्वचा के नीचे स्थित ३-५ परत मोटा स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma) जो तने को लचीली यांत्रिक मजबूती देता है।
  • अंतस्त्वचा (मंड आच्छद): प्रचुर स्टार्च कणों से भरी तरंगित एकल परत।
  • परिरंभ: अंतस्त्वचा के नीचे स्थित; प्रत्येक संवहन बंडल के ऊपर दृढ़ोतक की अर्धचंद्राकार टोपी (Hard bast) पाई जाती है।
  • संवहन बंडल: एक सुंदर वृत्ताकार वलय (Eustele) में व्यवस्थित होते हैं। प्रत्येक बंडल संयुक्त, संपाश्विक, खुला (Open - कैम्बियमयुक्त) तथा मध्यादिरुक (Endarch) होता है। बंडलों के बीच मृदूतकीय मज्जा किरणें होती हैं। केंद्र में बड़ी मज्जा होती है।
2. एकबीजपत्री तने का शारीर (मक्का तना)
  • बाह्यत्वचा: क्यूटिकल युक्त एकल परत; त्वचा रोम पूर्णतः अनुपस्थित होते हैं।
  • अधस्त्वचा (Hypodermis): २-३ परत मोटा अत्यधिक कठोर दृढ़ोतक (Sclerenchyma)।
  • भरण ऊतक: वल्कुट, अंतस्त्वचा, परिरंभ और मज्जा में अविभेदित; अधस्त्वचा से केंद्र तक फैला एक सतत मृदूतक पुंज।
  • संवहन बंडल: भरण ऊतक में बिखरे हुए (Atactostele) होते हैं। परिधि के बंडल छोटे व घने होते हैं, केंद्र के बंडल बड़े व दूर-दूर होते हैं।
  • बंडल संरचना: संयुक्त, संपाश्विक, बंद (Closed - कैम्बियमरहित) तथा प्रत्येक बंडल एक दृढ़ोतकी बंडल आच्छद (Bundle sheath) से घिरा होता है। प्रोटोजाइलम कोशिकाएं टूटकर एक जल धारण करने वाली प्रोटोजाइलम गुहा (Lysigenous water cavity) बनाती हैं। फ्लोएम मृदूतक अनुपस्थित होता है।
3. पृष्ठाधारी पत्ती (द्विबीजपत्री) बनाम समद्विपार्श्विक पत्ती (एकबीजपत्री)
शारीरिकी लक्षणपृष्ठाधारी पत्ती (द्विबीजपत्री - आम/सूरजमुखी)समद्विपार्श्विक पत्ती (एकबीजपत्री - घास/मक्का)
रंध्रों का वितरणअधोरंध्री (Hypostomatic): रंध्र मुख्य रूप से निचली बाह्यत्वचा (abaxial) पर स्थित होते हैं; ऊपरी सतह पर बहुत कम या अनुपस्थित।उभयरंध्री (Amphistomatic): रंध्र दोनों सतहों (ऊपरी व निचली) पर समान संख्या में पाए जाते हैं।
द्वार कोशिकाओं का आकारवृक्काकार या सेम के बीज जैसी (Kidney-shaped)डम्बल-आकार की (Dumb-bell-shaped)
मेसोफिल (पर्णमध्योतक) का विभेदनदो स्पष्ट परतों में विभेदित:
1. खंभ मृदूतक (Palisade): ऊपरी सतह के नीचे लंबवत खंभ जैसी कोशिकाएं, क्लोरोप्लास्ट से भरपूर।
2. स्पंजी मृदूतक: निचली सतह के पास ढीली गोल कोशिकाएं, बड़े वायु कोष्ठों से युक्त।
पूर्णतः अविभेदित; सभी मेसोफिल कोशिकाएं एक समान गोल या अंडाकार क्लोरेनकाइमा द्वारा बनी होती हैं।
बुलीफॉर्म कोशिकाएं (Bulliform Cells)पूर्णतः अनुपस्थितउपस्थित: घासों की ऊपरी बाह्यत्वचा में कुछ कोशिकाएं बड़ी, पतली भित्ति वाली व जल संचयी होकर बुलीफॉर्म या प्रवर्धक कोशिकाएं बनाती हैं। जल की कमी होने पर ये शिथिल होकर पत्ती को अंदर की ओर मोड़ लेती हैं, जिससे वाष्पोत्सर्जन घट जाता है।

द्विबीजपत्री पादपों में द्वितीयक वृद्धि: कैम्बियम वलय, काष्ठ संरचना एवं परिचर्म

पार्श्वीय विभज्योतकों (संवहनी कैम्बियम तथा कागजन) की सक्रियता द्वारा पादप के तने तथा जड़ की मोटाई (परिधि) में होने वाली वृद्धि को द्वितीयक वृद्धि (Secondary Growth) कहते हैं। यह अनावृतबीजी तथा काष्ठीय द्विबीजपत्री पौधों का लाक्षणिक गुण है, परंतु एकबीजपत्री पौधों में अनुपस्थित होती है।

1. संवहनी कैम्बियम वलय का निर्माण एवं सक्रियता
  1. कैम्बियम वलय का बनना: संवहन बंडल के अंदर उपस्थित कैम्बियम को अंतःपूलीय कैम्बियम (Intrafascicular cambium) कहते हैं। द्वितीयक वृद्धि के समय इसके समीप स्थित मज्जा किरणों की मृदूतक कोशिकाएं पुनर्विभेदित होकर अंतरापूलीय कैम्बियम (Interfascicular cambium) बनाती हैं। ये दोनों मिलकर एक सतत गोलाकार संवहनी कैम्बियम वलय बनाते हैं।
  2. द्विदिशीय कोशिका उत्पादन: कैम्बियम वलय दोनों ओर कोशिकाएं काटता है: अंदर की ओर बनने वाली कोशिकाएं द्वितीयक जाइलम (काष्ठ) तथा बाहर की ओर बनने वाली कोशिकाएं द्वितीयक फ्लोएम बनाती हैं। कैम्बियम अंदर की ओर अधिक सक्रिय होता है, अतः द्वितीयक फ्लोएम की तुलना में ८-१० गुना अधिक द्वितीयक जाइलम बनता है। इसके दबाव से प्राथमिक फ्लोएम और वल्कुट कुचल जाते हैं।
2. काष्ठ की प्रकृति एवं वार्षिक वलय (Annual Rings)
  • वसंत काष्ठ या अग्र दारू (Spring Wood / Early Wood): वसंत ऋतु में अनुकूल मौसम के कारण कैम्बियम अत्यधिक सक्रिय रहता है। यह चौड़ी गुहा तथा पतली भित्ति वाली प्रचुर जाइलम वाहिकाएं बनाता है। इसका रंग हल्का तथा घनत्व कम होता है।
  • शरद काष्ठ या पश्च दारू (Autumn Wood / Late Wood): शीतकाल में प्रतिकूल परिस्थितियों में कैम्बियम की सक्रियता कम हो जाती है। यह संकीर्ण गुहा तथा मोटी भित्ति वाली कम वाहिकाएं बनाता है। इसका रंग गहरा तथा घनत्व अधिक होता है।
  • वार्षिक वलय (Annual Rings): एक वर्ष में निर्मित एक हल्की वसंत काष्ठ तथा एक गहरी शरद काष्ठ की पट्टी मिलकर एक वार्षिक वलय बनाती हैं। वृक्ष के तने के आधार में वार्षिक वलयों की संख्या गिनकर उसकी सही आयु ज्ञात करने के विज्ञान को वृक्षकलन या डेंड्रोक्रोनोलॉजी (Dendrochronology) कहते हैं।
3. अंतःकाष्ठ (Heartwood) बनाम रसकाष्ठ (Sapwood)
तुलनात्मक लक्षणअंतःकाष्ठ या सारकाष्ठ (Heartwood / Duramen)रसकाष्ठ (Sapwood / Alburnum)
स्थितिपुराने तने के केंद्र में स्थित सबसे भीतरी प्राचीन काष्ठतने की परिधि पर संवहनी कैम्बियम से सटा काष्ठ
रंग एवं घनत्वटैनिन, रंजक, गोंद, तेल जमा होने से गहरा भूरा या काला; अत्यंत भारी व सघनहल्का पीला या बादामी रंग; कम घनत्व वाला
सजीवतापूर्णतः मृत; कोई जीवित कोशिका उपस्थित नहीं होतीजीवित जाइलम मृदूतक व मज्जा किरण कोशिकाएं उपस्थित
टाइलोसिस (Tyloses)उपस्थित: पास की मृदूतक कोशिकाएं गुब्बारे जैसी फूलकर वाहिकाओं की गुहा को बंद कर देती हैंअनुपस्थित: वाहिकाओं की गुहा पूर्णतः खुली रहती है
कार्यजल संवहन नहीं करता; तने को अपार यांत्रिक सहारा देता है और दीमक व कवक प्रतिरोधी (सर्वश्रेष्ठ इमारती लकड़ी) हैजड़ों से पत्तियों तक जल व खनिज लवणों का सक्रिय संवहन करता है
4. कागजन (कॉर्क कैम्बियम) तथा परिचर्म (Periderm)

द्वितीयक जाइलम के निरंतर दबाव से जब प्राथमिक बाह्यत्वचा व वल्कुट फट जाते हैं, तो सुरक्षा हेतु बाहरी वल्कुट में एक नया द्वितीयक पार्श्वीय विभज्योतक विकसित होता है, जिसे कागजन या कॉर्क कैम्बियम (Phellogen) कहते हैं।

  • कागजन की सक्रियता:
    • बाहर की ओर: कोशिकाएं विभाजित होकर काग या कॉर्क (Phellem) बनाती हैं। कॉर्क कोशिकाएं मृत, सुबेरिनयुक्त तथा जल व गैस के लिए पूर्णतः अपारगम्य होती हैं।
    • अंदर की ओर: सजीव मृदूतक कोशिकाएं बनाती हैं जिन्हें द्वितीयक वल्कुट या कागस्तर (Phelloderm) कहते हैं।
  • परिचर्म (Periderm): काग (Phellem) + कागजन (Phellogen) + कागस्तर (Phelloderm)—इन तीनों परतों को संयुक्त रूप से परिचर्म कहते हैं: $$\text{Periderm} = \text{Phellem (Cork)} + \text{Phellogen (Cork Cambium)} + \text{Phelloderm (Secondary Cortex)}$$
  • छाल या बाकल (Bark): संवहनी कैम्बियम के बाहर स्थित सभी ऊतकों को सामूहिक रूप से छाल कहते हैं, जिसमें परिचर्म और फ्लोएम दोनों शामिल हैं: $$\text{Bark} = \text{Periderm} + \text{Secondary Phloem} + \text{Primary Phloem}$$
  • वातरंध्र (Lenticels): कॉर्क की कुछ जगहों पर कागजन सुबेरिनयुक्त कॉर्क बनाने के स्थान पर पतली भित्ति वाली ढीली पूरक कोशिकाएं (Complementary cells) बनाता है, जो बाह्यत्वचा को फाड़कर लेंस के आकार के छिद्र बनाती हैं। इनके द्वारा काष्ठीय तनों में श्वसन गैसों ($O_2/CO_2$) का विनिमय होता है।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

प्राथमिक जाइलम विन्यास नियम (Endarch vs Exarch)
तने में: मध्यादिरुक (केंद्र से परिधि की ओर) | जड़ में: बाह्यादिरुक (परिधि से केंद्र की ओर)
प्रोटोजाइलम की वाहिकाएं संकीर्ण व वलयाकार/सर्पिलाकार होती हैं; मेटाजाइलम की वाहिकाएं चौड़ी व गर्तयुक्त होती हैं।
कैस्पेरी पट्टी एवं सिमप्लास्टिक प्रवाह समीकरण
अंतस्त्वचा में सुबेरिन पट्टी = एपोप्लास्ट अवरोध -> अनिवार्य सिमप्लास्टिक प्रवेश
सुबेरिन एक जलरोधी मोमी पदार्थ है जो कोशिका भित्ति से होकर अनियंत्रित जल व लवणों के प्रवेश को रोकता है।
वार्षिक वलय समीकरण एवं डेंड्रोक्रोनोलॉजी सिद्धांत
१ वार्षिक वलय = १ वसंत काष्ठ + १ शरद काष्ठ
वृक्ष की आयु (वर्ष) = तने के आधार में वार्षिक वलयों की कुल संख्या। भूमध्यरेखीय वर्षावनों में स्पष्ट वार्षिक वलय नहीं बनते।
परिचर्म संघटन समीकरण (Periderm Formula)
परिचर्म = काग (कॉर्क) + कागजन (कॉर्क कैम्बियम) + कागस्तर (द्वितीयक वल्कुट)
काग कोशिकाएं मृत व सुबेरिनयुक्त होती हैं; कागजन द्वितीयक विभज्योतक है; कागस्तर जीवित मृदूतक कोशिकाओं से बनता है।
छाल या बाकल संघटन समीकरण (Bark Formula)
छाल = परिचर्म + द्वितीयक फ्लोएम + प्राथमिक फ्लोएम
ऋतु के आरंभ में बनी छाल को कोमल छाल और अंत में बनी छाल को कठोर छाल कहते हैं। वलय छालन (Girdling) से पौधा नष्ट हो जाता है।
संवहन बंडल निदान सूत्र
जड़: अरीय | द्विबीजपत्री तना: संयुक्त संपाश्विक खुला | एकबीजपत्री तना: संयुक्त संपाश्विक बंद
खुले बंडल में कैम्बियम होने से द्वितीयक वृद्धि होती है; बंद बंडल में कैम्बियम न होने से द्वितीयक वृद्धि नहीं होती।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
एक द्विबीजपत्री तने (सूरजमुखी) तथा एक एकबीजपत्री तने (मक्का) के आंतरिक शारीर में निम्नलिखित लक्षणों के आधार पर अंतर स्पष्ट कीजिए: (i) अधस्त्वचा, (ii) भरण ऊतक का विभेदन, (iii) संवहन बंडलों की व्यवस्था व आच्छद, तथा (iv) कैम्बियम की उपस्थिति। [अंक विभाजन: 1 + 1 + 2 + 1 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
सूरजमुखी तने में स्थूलकोण ऊतक अधस्त्वचा, विभेदित भरण ऊतक (वल्कुट, अंतस्त्वचा, मज्जा) और वलय में व्यवस्थित खुले कैम्बियमयुक्त संवहन बंडल होते हैं। मक्का तने में दृढ़ोतक अधस्त्वचा, अविभेदित भरण ऊतक और दृढ़ोतकी आच्छद व जल गुहा युक्त बिखरे बंद बंडल होते हैं जिनमें कैम्बियम नहीं होता।
उदाहरण 2
कैस्पेरी पट्टियाँ (Casparian Strips) क्या हैं? इनका रासायनिक संघटन एवं स्थिति बताइए। जड़ की अंतस्त्वचा से जाइलम में जल व खनिजों के परिवहन में ये किस प्रकार कार्य करती हैं? [अंक विभाजन: 2 + 1 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
कैस्पेरी पट्टियाँ जड़ की अंतस्त्वचा की अरीय भित्तियों पर स्थित सुबेरिनयुक्त जलरोधी पट्टियाँ हैं। ये कोशिका भित्तियों से होने वाले एपोप्लास्ट जल प्रवाह को रोककर जल व खनिजों को कोशिका झिल्ली पार कर सिमप्लास्ट मार्ग से जाइलम में जाने को विवश करती हैं, जिससे खनिजों का चयनात्मक अवशोषण सुनिश्चित होता है।
उदाहरण 3
वसंत काष्ठ (Early Wood) तथा शरद काष्ठ (Late Wood) की तुलना कीजिए। ये मिलकर वार्षिक वलय का निर्माण किस प्रकार करते हैं? डेंड्रोक्रोनोलॉजी क्या है? [अंक विभाजन: 2.5 + 1.5 + 1 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
वसंत काष्ठ में चौड़ी गुहा वाली हल्की कम घनत्व की वाहिकाएं वसंत के सक्रिय कैम्बियम से बनती हैं; शरद काष्ठ में संकीर्ण गुहा वाली गहरी अधिक घनत्व की वाहिकाएं शीतकाल के मंद कैम्बियम से बनती हैं। ये दोनों मिलकर एक वार्षिक वलय बनाती हैं। वार्षिक वलयों से पेड़ की आयु और प्राचीन जलवायु जानने को डेंड्रोक्रोनोलॉजी कहते हैं।
उदाहरण 4
अंतःकाष्ठ (Heartwood) एवं रसकाष्ठ (Sapwood) में निम्नलिखित लक्षणों के आधार पर भेद स्पष्ट कीजिए: (i) तने में स्थिति, (ii) रंग व घनत्व, (iii) जीवित कोशिकाओं की उपस्थिति, (iv) टाइलोसिस की उपस्थिति, तथा (v) संवहन क्षमता बनाम स्थायित्व। [अंक विभाजन: प्रत्येक बिंदु 1 अंक = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
अंतःकाष्ठ तने का केंद्रीय गहरा, भारी, मृत, टाइलोसिस द्वारा अवरुद्ध काष्ठ है जो जल संवहन नहीं करता किंतु इमारती लकड़ी के लिए अत्यंत टिकाऊ व कीट-रोधी है। रसकाष्ठ परिधि का हल्का, जीवित, टाइलोसिसरहित काष्ठ है जो सक्रिय रूप से जल व खनिज संवहन करता है।
उदाहरण 5
कागजन (कॉर्क कैम्बियम) का निर्माण कैसे होता है तथा इसके कार्य क्या हैं? परिचर्म (Periderm) एवं छाल (Bark) को परिभाषित कीजिए। वातरंध्र (Lenticels) क्या हैं और काष्ठीय तनों में इनका क्या महत्व है? [अंक विभाजन: 2 + 1.5 + 1.5 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
कागजन वल्कुट से उत्पन्न द्वितीयक विभज्योतक है जो बाहर कॉर्क (काग) और अंदर कागस्तर बनाता है। परिचर्म = काग + कागजन + कागस्तर। छाल संवहनी कैम्बियम के बाहर के सभी ऊतक (परिचर्म + फ्लोएम) हैं। वातरंध्र कॉर्क में स्थित पूरक कोशिकाओं वाले छिद्र हैं जो काष्ठीय तने में गैसीय विनिमय कराते हैं।
उदाहरण 6
एक पृष्ठाधारी पत्ती (द्विबीजपत्री) तथा एक समद्विपार्श्विक पत्ती (एकबीजपत्री) के आंतरिक शारीर में निम्नलिखित लक्षणों के आधार पर तुलना कीजिए: (i) रंध्रों का वितरण, (ii) द्वार कोशिकाओं की आकृति, (iii) पर्णमध्योतक (Mesophyll) का विभेदन, तथा (iv) बुलीफॉर्म कोशिकाओं की उपस्थिति व कार्य। [अंक विभाजन: 1 + 1 + 2 + 1 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
द्विबीजपत्री पृष्ठाधारी पत्ती अधोरंध्री, सेम-के-बीज जैसी द्वार कोशिकाओं वाली तथा खंभ व स्पंजी मृदूतक में विभेदित मेसोफिल वाली होती है। एकबीजपत्री समद्विपार्श्विक पत्ती उभयरंध्री, डम्बल-आकार की द्वार कोशिकाओं वाली, अविभेदित मेसोफिल वाली तथा जल तनाव में पत्ती मोड़ने वाली बुलीफॉर्म कोशिकाओं से युक्त होती है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma) को दृढ़ोतक की तरह लिग्निनयुक्त मृत ऊतक समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

स्थूलकोण ऊतक एक सजीव ऊतक है और इसकी भित्ति के कोनों पर केवल पेक्टिन, सेलूलोज़ तथा हेमीसेलूलोज़ का जमाव होता है। इसमें लिग्निन बिल्कुल नहीं होता। दृढ़ोतक (Sclerenchyma) मृत होता है और उसकी भित्ति लिग्निनयुक्त होती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

तने के एंडार्क (मध्यादिरुक) और जड़ के एक्सार्क (बाह्यादिरुक) जाइलम विन्यास में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

तने में प्राथमिक जाइलम मध्यादिरुक या एंडार्क होता है (प्रोटोजाइलम केंद्र की ओर और मेटाजाइलम परिधि की ओर)। जड़ में प्राथमिक जाइलम बाह्यादिरुक या एक्सार्क होता है (प्रोटोजाइलम परिधि की ओर और मेटाजाइलम केंद्र की ओर)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

चालनी नलिका तत्वों (Sieve tubes) के सजीव होने के कारण इनमें केंद्रक उपस्थित मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

परिपक्व चालनी नलिकाएं सजीव होने के बावजूद पूर्णतः केंद्रकविहीन होती हैं! इनके सभी उपापचयी कार्यों का नियंत्रण इनसे सटी सहकोशिकाओं के केंद्रक द्वारा होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

पेड़ की छाल (Bark) और कॉर्क (Cork) को एक ही वस्तु समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कॉर्क (फेलम) केवल कागजन से बाहर की ओर बनी सुबेरिनयुक्त मृत परत है। छाल (Bark) एक व्यापक वानस्पतिक शब्द है जिसमें संवहनी कैम्बियम के बाहर स्थित सभी ऊतक (परिचर्म + द्वितीयक/प्राथमिक फ्लोएम) सम्मिलित होते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

एकबीजपत्री जड़ में द्विबीजपत्री जड़ की तरह कम संवहन बंडल मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

द्विबीजपत्री जड़ में जाइलम बंडल २ से ६ (द्वि-आर्क से षट्-आर्क) होते हैं और मज्जा नगण्य होती है। एकबीजपत्री जड़ में जाइलम बंडल ६ से अधिक (बहु-आर्क, ८ से २०+) होते हैं और केंद्र में एक विशाल सुविकसित मज्जा होती है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

पुष्पी पादपों का शारीर (Anatomy of Flowering Plants) पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद (WBCHSE) • कक्षा 11 जीव विज्ञान • इकाई 2 1 1. पादप ऊतक एवं ऊतक तंत्र Meristems (विभज्योतक / ভাজক) विभज्योतक ऊतक (शीर्षस्थ, अंतर्वेशी, पार्श्वीय) Simple Tissues (সরল / सरल) सरल स्थायी ऊतक (मृदूतक, स्थूलकोण ऊतक, दृढ़ोतक/स्क्लेरेन्काइमा) Complex Tissues (জটিল / जटिल) जटिल ऊतक (जाइलम: वाहिनिका, वाहिका; फ्लोएम: चालनी नलिका, सहकोशिका) Vascular Bundles (সংবহন / संवहन) संवहनी ऊतक तंत्र (अरीय, संयुक्त संपाश्विक खुला/बंद) 2 2. द्विबीजपत्री बनाम एकबीजपत्री शारीर Root Anatomy (মূল / जड़) जड़ (Root): द्वि-आर्क से षट्-आर्क (द्विबीजपत्री) बनाम बहु-आर्क (एकबीजपत्री) Stem Anatomy (কাণ্ড / तना) तना (Stem): वलय में खुले बंडल (द्विबीजपत्री) बनाम बिखरे बंद बंडल (एकबीजपत्री) Leaf Anatomy (পাতা / पत्ती) पत्ती (Leaf): पृष्ठाधारी (खंभ/स्पंजी) बनाम समद्विपार्श्विक (बुलीफॉर्म कोशिकाएं) Casparian Strip (সুবেরিন পট্টি) कैस्पेरी पट्टियाँ (अंतस्त्वचा में सुबेरिन) एवं जल परिवहन नियंत्रण 3 3. द्वितीयक वृद्धि एवं काष्ठ का निर्माण Cambial Ring (ক্যাম্বিয়াম বলয়) कैम्बियम वलय: अंतःपूलीय + अंतरापूलीय कैम्बियम Annual Rings (বর্ষবলয় / वलय) वसंत काष्ठ (चौड़ी गुहा) + शरद काष्ठ (संकीर्ण) = वार्षिक वलय Heartwood vs Sapwood (কাষ্ঠ) अंतःकाष्ठ (Heartwood - टाइलोसिस) बनाम रसकाष्ठ (Sapwood) Periderm & Lenticels (বাকল) परिचर्म (काग + कागजन + द्वितीयक वल्कुट) एवं वातरंध्र (Lenticels) WBCHSE Class 11 Biology • Unit II • Concept & Examination Visual Roadmap

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
पादप ऊतक दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित हैं: विभज्योतक ऊतक (सक्रिय रूप से विभाजित होने वाली कोशिकाएं) और स्थायी ऊतक (विभाजन क्षमता खो चुकी परिपक्व कोशिकाएं)।
मुख्य बिंदु 2
स्थिति के आधार पर विभज्योतक तीन प्रकार के होते हैं: शीर्षस्थ (जड़ व तने के शीर्ष पर लंबाई वृद्धि), अंतर्वेशी (घासों के पर्वमध्य में उपस्थित, चरने के बाद पुनर्जनन), और पार्श्वीय विभज्योतक (संवहनी कैम्बियम व कागजन, जो मोटाई में द्वितीयक वृद्धि करते हैं)।
मुख्य बिंदु 3
सरल स्थायी ऊतकों में मृदूतक (जीवित, पतली भित्ति, संचयी/हरित ऊतक/वात ऊतक), स्थूलकोण ऊतक (जीवित, कोनों पर पेक्टिन का स्थूलन, द्विबीजपत्री तने को लचीला यांत्रिक सहारा), और दृढ़ोतक (मृत, लिग्निनयुक्त मोटी भित्ति; रेशे व अश्म कोशिकाएं/स्क्लेरीड्स) शामिल हैं।
मुख्य बिंदु 4
जटिल स्थायी ऊतक: जाइलम (जल व खनिज संवहन; वाहिनिकाएं, वाहिकाएं, जाइलम रेशे, जीवित जाइलम मृदूतक) तथा फ्लोएम (कार्बनिक भोजन संवहन; चालनी नलिकाएं, सहकोशिकाएं, फ्लोएम मृदूतक, मृत फ्लोएम रेशे/बास्ट रेशे)।
मुख्य बिंदु 5
प्राथमिक जाइलम विन्यास: तने में मध्यादिरुक या एंडार্ক (प्रोटोजाइलम केंद्र में, मेटाजाइलम परिधि पर) तथा जड़ में बाह्यादिरुक या एक्सार्क (प्रोटोजाइलम परिधि पर, मेटाजाइलम केंद्र में)।
मुख्य बिंदु 6
ऊतक तंत्र तीन प्रकार के होते हैं: बाह्यत्वचीय (क्यूटिकल, वृक्काकार या डम्बल-आकार की द्वार कोशिकाओं वाले रंध्र, त्वचा रोम व मूलरोम), भरण ऊतक तंत्र (वल्कुट, सुबेरिनयुक्त कैस्पेरी पट्टियों वाली अंतस्त्वचा, परिरंभ, मज्जा), तथा संवहनी ऊतक तंत्र (जड़ में अरीय; द्विबीजपत्री तने में संयुक्त संपाश्विक खुला; एकबीजपत्री तने में संयुक्त संपाश्विक बंद)।
मुख्य बिंदु 7
द्विबीजपत्री जड़ में २ से ६ (द्वि-आर्क से षट्-आर्क) जाइलम बंडल व छोटी मज्जा होती है; एकबीजपत्री जड़ में ६ से अधिक (बहु-आर्क) जाइलम बंडल और एक बड़ी सुविकसित मज्जा होती है।
मुख्य बिंदु 8
द्विबीजपत्री तने में संवहन बंडल एक वलय में व्यवस्थित तथा खुले (कैम्बियमयुक्त) होते हैं; एकबीजपत्री तने में संवहन बंडल भरण ऊतक में बिखरे हुए, बंद (कैम्बियमरहित), दृढ़ोतकी बंडल आच्छद तथा प्रोटोजाइलम जल गुहा से युक्त होते हैं।
मुख्य बिंदु 9
द्विबीजपत्री पत्ती पृष्ठाधारी (मेसोफिल खंभ व स्पंजी मृदूतक में विभेदित) होती है; एकबीजपत्री पत्ती समद्विपार्श्विक (अविभेदित मेसोफिल तथा घासों में जल संचयी बुलीफॉर्म कोशिकाएं) होती है।
मुख्य बिंदु 10
द्विबीजपत्री तने में द्वितीयक वृद्धि संवहनी कैम्बियम (अंदर द्वितीयक जाइलम/काष्ठ और बाहर द्वितीयक फ्लोएम बनाता है) तथा कागजन (बाहर काग/कॉर्क और अंदर द्वितीयक वल्कुट बनाता है) द्वारा होती है।
मुख्य बिंदु 11
प्रतिवर्ष गठित एक हल्की वसंत काष्ठ और एक गहरी शरद काष्ठ मिलकर एक वार्षिक वलय बनाती हैं; वार्षिक वलयों को गिनकर वृक्ष की आयु ज्ञात करने की विधि को डेंड्रोक्रोनोलॉजी कहते हैं।
मुख्य बिंदु 12
अंतःकाष्ठ (Heartwood) तने का केंद्रीय गहरा, मृत, टाइलोसिस व टैनिनयुक्त जल परिवहन रहित परंतु अत्यंत टिकाऊ काष्ठ है; रसकाष्ठ (Sapwood) परिधीय हल्का, जीवित जल संवहनकारी काष्ठ है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
जिम्नोस्पर्म की लकड़ी को 'मुलायम लकड़ी' (Softwood) और आवृतबीजी द्विबीजपत्री लकड़ी को 'कठोर लकड़ी' (Hardwood) क्यों कहा जाता है, भले ही उनका वास्तविक यांत्रिक घनत्व कुछ भी हो?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: शारीरिक रूप से जिम्नोस्पर्म लकड़ी में जाइलम वाहिकाएं (Vessels) पूर्णतः अनुपस्थित होती हैं, केवल वाहिनिकाएं (Tracheids) पाई जाती हैं, इसलिए इसे अरंध्री या सॉफ्टवुड कहते हैं। आवृतबीजी द्विबीजपत्री काष्ठ में छिद्रित पट्टिकाओं वाली चौड़ी जाइलम वाहिकाएं (छिद्र) पाई जाती हैं, इसलिए इसे रंध्री या हार्डवुड कहा जाता है।
2
द्विबीजपत्री जड़ में संवहनी कैम्बियम की उत्पत्ति कैसे होती है और इसके वलय का आकार कैसे बदलता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: द्विबीजपत्री जड़ में संवहनी कैम्बियम पूर्णतः एक द्वितीयक विभज्योतक है। यह फ्लोएम बंडलों के ठीक नीचे स्थित संयोजी मृदूतक तथा प्रोटोजाइलम बंडलों के बाहर स्थित परिरंभ की कोशिकाओं के पुनर्विभेदन से बनता है। आरंभ में यह एक लहरदार (wavy) वलय बनाता है, परंतु फ्लोएम के नीचे तेजी से द्वितीयक जाइलम बनने के बाद यह अंततः पूर्ण गोलाकार हो जाता है।
3
भूमध्य रेखा के निकट उगने वाले उष्णकटिबंधीय वर्षावनों के वृक्षों में स्पष्ट वार्षिक वलय क्यों नहीं दिखाई देते?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: वार्षिक वलय बनने के लिए स्पष्ट मौसमी जलवायु परिवर्तन (अनुकूल वसंत बनाम ठंडा शीतकाल) आवश्यक है जो कैम्बियम की सक्रियता में भिन्नता लाते हैं। भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में वर्ष भर तापमान और वर्षा लगभग एक समान रहती है, जिससे कैम्बियम वर्ष भर निरंतर समान सक्रियता से कार्य करता है और वसंत व शरद काष्ठ के अलग-अलग वलय नहीं बन पाते।
4
टाइलोसिस (Tyloses) क्या हैं, ये काष्ठ के किस भाग में बनते हैं और इनका जल संवहन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: टाइलोसिस जाइलम मृदूतक और मज्जा किरणों की कोशिकाओं के गुब्बारे जैसे प्रवर्ध हैं जो गर्तों से होकर जाइलम वाहिकाओं की गुहा में प्रवेश कर जाते हैं। ये केवल अंतःकाष्ठ (Heartwood) में बनते हैं। ये वाहिकाओं की गुहा को पूरी तरह अवरुद्ध कर देते हैं, जिससे अंतःकाष्ठ की जल संवहन क्षमता पूर्णतः समाप्त हो जाती है।
5
किसी काष्ठीय वृक्ष के तने की छाल को गोलाकार रूप में काटकर अलग कर देने पर (Girdling) वृक्ष क्यों मर जाता है और कौन सा अंग पहले नष्ट होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: छाल में द्वितीयक फ्लोएम सम्मिलित होता है। छाल को वलयाकार हटाने से पत्तियों से जड़ों की ओर कार्बनिक भोजन का संवहन रुक जाता है। फलस्वरूप भोजन के अभाव में सबसे पहले जड़ें नष्ट हो जाती हैं। जड़ों के मरने पर जल अवशोषण बंद हो जाता है और अंततः पूरा वृक्ष सूखकर मर जाता है।
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अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

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