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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 7
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

प्राणियों में संरचनात्मक संगठन

प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय बहुकोशिकीय जीवों में कोशिकीय विभेदन, ऊतक स्तर के संगठन और आदर्श अकशेरुकी प्राणी तिलचट्टे (पेरिप्लैनेटा अमेरिकाना) की शारीरिकी का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है। इस अध्याय में चार मौलिक प्राणि ऊतकों—उपकला, संयोजी, पेशी एवं तंत्रिका ऊतक की सूक्ष्मदर्शी संरचना, बाह्यकोशिकीय आधात्री तथा विशिष्ट अंतराकोशिकीय संधियों जैसे दृढ़ संधि (टाइट जंक्शन), आसंजी संधि (डेस्मोसोम) और अंतराली संधि (गैप जंक्शन) का परीक्षण किया गया है। कंकाल ऊतकों में उपास्थि तथा स्तनधारी सघन अस्थि के हैवर्सियन तंत्र (ऑस्टिओन) का विश्लेषण किया गया है। इसके अतिरिक्त, अकशेरुकी मॉडल तिलचट्टे के काइटिनयुक्त बाह्यकंकाल, मुखांगों, अन्नपुट (क्रॉप), 6 दंतयुक्त पेषणी (गिजार्ड), यकृतीय अंधनाल, 13-कक्षीय खुले परिसंचरण तंत्र, श्वासनाल श्वसन, 100-150 मैलपीगी नलिकाओं द्वारा यूरिकोटेलिक उत्सर्जन तथा लैंगिक द्विरूपता (गुदा शूक बनाम गुदा लूम) का संपूर्ण प्रामाणिक विवरण दिया गया है।

क्या आपने कभी सोचा है?

क्या आप जानते हैं कि एक तिलचट्टा अपना सिर कट जाने के बाद भी हफ्तों तक जीवित रह सकता है? ऐसा इसलिए संभव है क्योंकि इसका तंत्रिका तंत्र केवल सिर में केंद्रित नहीं है बल्कि प्रत्येक खंड के गुच्छकों (गैंग्लिया) में फैला है, और इसका श्वसन रक्त पर निर्भर न होकर सीधे शरीर में प्रवेश करने वाली श्वासनाल प्रणाली द्वारा संचालित होता है!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

प्राणि ऊतकों और अंग प्रणालियों का ज्ञान मानव शरीर क्रिया विज्ञान, पैथोलॉजी, चिकित्सा विज्ञान और तुलनात्मक प्राणीशास्त्र की अनिवार्य आधारशिला है। उपकला की संधियों में विकार से त्वचा के छाले और आंत्रशोथ जैसे गंभीर रोग उत्पन्न होते हैं, जबकि संयोजी ऊतक के कोलेजन में उत्परिवर्तन से मार्फन सिंड्रोम और ऑस्टियोजेनेसिस इमपरफेक्टा होता है। हृदय पेशी की अंतर्विष्ट चक्रिकाओं के गैप जंक्शन हृदय की लयबद्ध धड़कन का आधार हैं। दूसरी ओर, तिलचट्टे का खुला परिसंचरण, श्वासनाल द्वारा प्रत्यक्ष ऑक्सीजन वितरण और जल-संरक्षक यूरिकोटेलिक उत्सर्जन स्थलीय आवास में सफलता के अप्रतिम उदाहरण हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • कोशिका जीवविज्ञान: प्लाज्मा झिल्ली की संरचना, फ्लूइड मोजेक मॉडल और झिल्ली परिवहन
  • प्राणी जगत: संघ आर्थ्रोपोडा के काइटिनी बाह्यकंकाल, संधित उपांग और खुले परिसंचरण तंत्र के लक्षण
  • आधारभूत ऊतक विज्ञान: बहुकोशिकीय जीवों में कोशिका से ऊतक और अंग निर्माण में श्रम विभाजन की अवधारणा
  • जैव अणु: कोलेजन, इलास्टिन, कॉन्ड्रॉइडिन सल्फेट और काइटिन की रासायनिक संरचना

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 उपकला ऊतक: सरल, संयुक्त, ग्रंथिल और...
2 संयोजी ऊतक: शिथिल, सघन और विशिष्टीक...
3 पेशी ऊतक एवं तंत्रिका ऊतक: हिस्टोलॉ...
4 तिलचट्टा (पेरिप्लैनेटा अमेरिकाना):...
5 तिलचट्टे की आंतरिक शारीरिकी: पाचन,...
6 तिलचट्टे का जनन तंत्र, पोरोमेटाबोलस...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

उपकला ऊतक: सरल, संयुक्त, ग्रंथिल और अंतराकोशिकीय संधियां

1. उपकला ऊतक के सामान्य लक्षण

उपकला ऊतक (Epithelial Tissue) शरीर के बाहरी आवरण, आंतरिक अंगों की मुक्त सतहों, गुहाओं, नलिकाओं और ग्रंथियों के स्रावी भागों का निर्माण करता है। इसके प्रमुख लक्षण हैं:

  • सघन कोशिकीय विन्यास: कोशिकाएं आपस में बहुत सटी होती हैं और अंतराकोशिकीय आधात्री नगण्य होती है।
  • अवाहिका प्रकृति (Avascularity): उपकला में रक्त वाहिकाएं नहीं होतीं। यह नीचे स्थित संयोजी ऊतक की केशिकाओं से आधार झिल्ली के माध्यम से विसरण द्वारा पोषण और ऑक्सीजन प्राप्त करता है।
  • आधार झिल्ली (Basement Membrane): उपकला कोशिकाएं एक अकोशिकीय झिल्ली पर टिकी होती हैं जो बेसल लैमिना (कोलेजन व लेमिनिन) और रेटिकुलर लैमिना (तंतु) से मिलकर बनती है।
  • तीनों जनन स्तरों से उत्पत्ति: यह एक्टोडर्म (त्वचा), एंडोडर्म (आहार नाल) और मीसोडर्म (देहगुहा व रक्त वाहिका आस्तर) तीनों से उत्पन्न होता है।
2. सरल एवं संयुक्त उपकला का वर्गीकरण
उपकला का प्रकार कोशिकीय आकृति शरीर में स्थिति प्रमुख क्रियात्मक कार्य
सरल शल्की (Simple Squamous) चपटी, पतली, अनियमित सीमाओं वाली टाइल जैसी कोशिकाएं; केंद्र में चपटा केंद्रक। फेफड़ों की कूपिकाएं (एल्वियोली), रक्त वाहिकाओं का एंडोथीलियम, बोमन संपुट। गैसों का विसरण, प्लाज्मा का निस्यंदन तथा घर्षण रोधन।
सरल घनाकार (Simple Cuboidal) घन जैसी कोशिकाएं, लंबाई-चौड़ाई समान; केंद्र में गोल केंद्रक। वृक्क नेफ्रॉन की PCT व DCT, थायरॉयड पुटिकाएं, लार ग्रंथियों की नलियां। स्रावण एवं अवशोषण। PCT में सूक्ष्मांकुर अवशोषण सतह बढ़ाते हैं।
सरल स्तंभाकार (Simple Columnar) लंबी स्तंभ जैसी कोशिकाएं; अंडाकार केंद्रक आधार के समीप स्थित। आमाशय व आंत्र का आस्तर (अपक्ष्माभी); डिंबवाहिनी व श्वसनिकाएं (पक्ष्माभी)। पाचक रसों का स्राव ও पोषक अवशोषण। पक्ष्माभ डिंब या श्लेष्मा को गति देते हैं।
कूटस्तरित (Pseudostratified) एकल परत किंतु कोशिकाओं व केंद्रकों की ऊंचाई भिन्न होने से बहुस्तरीय दिखती है। श्वासनाल (ट्रैकिया), श्वसनी (ब्रॉन्काई), एपिडीडाइमिस। पक्ष्माभों द्वारा श्लेष्मा और धूलकणों को बाहर की ओर धकेलना।
स्तरित शल्की (Stratified Squamous) बहुस्तरीय कोशिकाएं; आधार स्तर विभाजित होता है, ऊपरी कोशिकाएं चपटी शल्की। किरेटिनयुक्त: त्वचा की बाह्यत्वचा। किरेटिनहीन: मुखगुहा, ग्रसनी, ग्रसिका, योनि। यांत्रिक घर्षण, रासायनिक क्षति और रोगाणु संक्रमण से सुरक्षा।
संक्रमणकालीन (Transitional / Urothelium) लचीली, बहुस्तरीय; खिंचाव पड़ने पर कोशिकाएं चपटी हो जाती हैं। वृक्क श्रोणि (पेल्विस), मूत्रवाहिनी (यूरेटर), मूत्राशय (यूरिनरी ब्लैडर)। मूत्र भरने पर मूत्राशय की दीवार को फटने से बचाते हुए प्रसार प्रदान करना।
3. अंतराकोशिकीय संधियां (Cell Junctions)

उपकला कोशिकाएं तीन प्रकार की विशिष्ट संधियों द्वारा एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं:

  • दृढ़ संधि (Tight Junction / Zonula Occludens): कोशिकाओं की प्लाज्मा झिल्लियों को जलरोधी सील से बांधती है, जिससे ऊतक के आर-पार तरल का अवांछित रिसाव रुक जाता है।
  • आसंजक संधि (Desmosomes / Macula Adherens): किरेटिन तंतुओं से जुड़ी बटन जैसी संधियां, जो खिंचाव के समय कोशिकाओं को फटने से रोकती हैं।
  • अंतराली संधि (Gap Junction / Nexus): कोनेक्सॉन नामक नलाकार प्रोटीन चैनलों से बने छिद्र, जो समीपवर्ती कोशिकाओं के बीच सीधे आयन, पोषक तत्व और आवेग संचरण कराते हैं।

संयोजी ऊतक: शिथिल, सघन और विशिष्टीकृत कंकाल ऊतक (उपास्थि एवं अस्थि)

1. संयोजी ऊतक का संगठन

संयोजी ऊतक भ्रूण के मीसोडर्म से उत्पन्न होता है और शरीर के विभिन्न ऊतकों व अंगों को सहारा और बंधन प्रदान करता है। इसके तीन प्रमुख घटक हैं:

  • आधात्री (Ground Substance): हाइलूरोनिक अम्ल और म्यूकोपॉलीसैकराइड्स से युक्त जलरागी गाढ़ा माध्यम।
  • तंतु (Fibers):
    • कोलेजन तंतु (श्वेत तंतु): बंडलों में सजे, लचीले किंतु अत्यधिक मजबूत और खिंचाव-रोधी।
    • इलास्टिन तंतु (पीत तंतु): शाखित, रबर की भांति अत्यधिक प्रत्यास्थ।
    • रेटिकुलर तंतु: प्लीहा और लसिका गांठों को सहारा देने वाले महीन जालीदार तंतु।
  • कोशिकाएं: फाइब्रोब्लास्ट (तंतु व आधात्री निर्माता), मैक्रोफेज (रोगाणु भक्षक), मास्ट कोशिकाएं (हिस्टामिन, हेपेरिन स्रावी) और प्लाज्मा कोशिकाएं (एंटीबॉडी निर्माता)।
2. शिथिल एवं सघन संयोजी ऊतक
  • अंतराली ऊतक (Areolar Tissue): त्वचा के नीचे और रक्त वाहिकाओं व तंत्रिकाओं के चारों ओर पैकेजिंग ऊतक के रूप में पाया जाता है। इसमें फाइब्रोब्लास्ट, मैक्रोफेज और मास्ट कोशिकाएं प्रचुर होती हैं।
  • वसीय ऊतक (Adipose Tissue): वसा संचय करने वाला ऊतक। कोशिकाएं एडीपोसाइट्स कहलाती हैं, जिनमें एक बड़ा वसा गोलक होता है जो केंद्रक को परिधि की ओर धकेल देता है (सिगनेट रिंग रूप)। यह शरीर का ताप नियंत्रित रखता है और झटकों से बचाता है।
  • सघन नियमित संयोजी ऊतक (Dense Regular): समानांतर कोलेजन तंतुओं के सघन बंडलों से बना होता है:
    • कंडरा (Tendon): अत्यधिक मजबूत और गैर-लचीली तंतुमय रस्सी जो कंकाल पेशी को अस्थि से जोड़ती है।
    • स्नायु (Ligament): पीत इलास्टिन तंतुओं से युक्त प्रत्यास्थ रस्सी जो संधि पर एक अस्थि को दूसरी अस्थि से जोड़ती है।
3. विशिष्टीकृत कंकाल ऊतक: उपास्थि बनाम सघन अस्थि
  • उपास्थि (Cartilage): ठोस किंतु लचीली आधात्री जिसमें कॉन्ड्रॉइडिन सल्फेट होता है। उपास्थि कोशिकाएं कॉन्ड्रोसाइट्स कहलाती हैं, जो गर्तिकाओं (लैकुना) में अकेली या 2-4 के समूहों में रहती हैं। यह रक्तवाहिकाविहीन होती है; पेरिकॉन्ड्रियम से विसरण द्वारा पोषण प्राप्त करती है।
    • काचाभ (Hyaline) उपास्थि: पारदर्शी; लंबी अस्थियों के संधि सिरे, पसलियां, श्वासनाल, नासापट।
    • प्रत्यास्थ (Elastic) उपास्थि: पीत तंतु युक्त; कान का पिन्ना, एपिग्लॉटिस।
    • श्वेत तंतुमय उपास्थि: कशेरुकाओं के बीच की गद्दी (Intervertebral disc), प्यूबिक सिम्फिसिस।
  • अस्थि (Bone): कैल्शियम हाइड्रॉक्सीपैटाइट क्रिस्टलों और कोलेजन तंतुओं से युक्त अत्यधिक कठोर और गैर-लचीली आधात्री। परिपक्व अस्थि कोशिका ऑस्टियोसाइट कहलाती है।
    हैवर्सियन तंत्र (Haversian System / Osteon): स्तनधारियों की सघन अस्थि की संरचनात्मक इकाई। प्रत्येक ऑस्टिओन में केंद्रीय रक्तवाहिका-युक्त हैवर्सियन नाल, संकेंद्री पटलिकाएं, गर्तिकाओं में स्थित ऑस्टियोसाइट्स और सूक्ष्म नलिकाएं (कैनैलीकुलाई) होती हैं। वोकमैन नालें समांतर हैवर्सियन नालों को आपस में जोड़ती हैं।

पेशी ऊतक एवं तंत्रिका ऊतक: हिस्टोलॉजी, अंतर्विष्ट चक्रिकाएं और आवेग संचरण

1. पेशी ऊतक का सामान्य संगठन

पेशी ऊतक भ्रूणीय मीसोडर्म से उत्पन्न होता है और संकुचनशील प्रोटीन सूक्ष्म तंतुओं (एक्टिन और मायोसिन) से समृद्ध होता है। प्राणी शरीर में तीन प्रकार की पेशियां पाई जाती हैं:

2. तीन पेशी ऊतकों की तुलनात्मक हिस्टोलॉजी
लक्षण कंकाल पेशी (रेखित/ऐच्छिक) चिकनी पेशी (अनैच्छिक) हृदय पेशी
आकृति व शाखाएं लंबे, बेलनाकार, पूर्णतः अशाखित। तर्कुरूप (दोनों सिरे नुकीले), अशाखित। छोटे बेलनाकार, शाखित जालिका युक्त।
धारियां स्पष्ट गहरी (A) व हल्की (I) पट्टियां। धारियां अनुपस्थित (चिकनी सतह)। हल्की अनुप्रस्थ धारियां उपस्थित।
केंद्रक बहुकेंद्रकी सिंसीटियम; केंद्रक परिधि पर। एककेंद्रकी; केंद्रक मध्य में। एककेंद्रकी; केंद्रक मध्य में।
संधि स्थल कोई अंतर्विष्ट चक्रिका नहीं। कोशिकाओं के बीच गैप जंक्शन। अंतर्विष्ट चक्रिकाएं उपस्थित।
नियंत्रण व संकुचन ऐच्छिक; तीव्र संकुचन, शीघ्र थकान। अनैच्छिक; धीमा, निरंतर, थकान-रहित। अनैच्छिक; स्वचालित पेसमेकर, लयबद्ध, कभी नहीं थकती।
स्थिति अस्थियों से जुड़ी (बाइसेप्स, ट्राइसेप्स)। आमाशय, आंत्र, रक्त वाहिकाएं, मूत्राशय। केवल हृदय की मायोकार्डियम भित्ति में।
3. अंतर्विष्ट चक्रिकाओं (Intercalated Discs) का महत्व

हृदय पेशी की कोशिकाओं के सिरों के संधि स्थल पर गहरी धारियां होती हैं जिन्हें अंतर्विष्ट चक्रिकाएं कहते हैं। इनमें दो संरचनाएं होती हैं:

  • डेस्मोसोम: संकुचन के तीव्र यांत्रिक झटके में कोशिकाओं को आपस में बांधे रखते हैं।
  • गैप जंक्शन: विद्युत विभव और आयनों को तुरंत एक कोशिका से दूसरी में प्रवाहित करते हैं, जिससे संपूर्ण हृदय पेशी एक कार्यात्मक इलेक्ट्रिकल सिंसीटियम के रूप में लयबद्ध रूप से संकुचित होती है।
4. तंत्रिका ऊतक: न्यूरॉन और न्यूरोग्लिया

तंत्रिका ऊतक एक्टोडर्म से उत्पन्न होता है और उत्तेजनशीलता व चालकता का गुण प्रदर्शित करता है:

  • न्यूरॉन (Neuron): तंत्रिका तंत्र की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई। इसके भाग हैं:
    • कोशिकाकाय (Cyton / Soma): इसमें केंद्रक, न्यूरोफाइब्रिल और प्रोटीन निर्माण करने वाले क्षारकप्रिय निस्ल कण (Nissl's granules) होते हैं।
    • द्रुमाक्ष्य (Dendrites): छोटे शाखित प्रवर्ध जो उद्दीपनों को ग्रहण कर कोशिकाकाय की ओर लाते हैं।
    • तंत्रिकाक्ष (Axon): कोशिकाकाय के एक्सॉन हिलॉक से निकलने वाला लंबा प्रवर्ध। यह मायलिन आवरण से ढका होता है जिसके बीच-बीच में रैनवियर के नोड होते हैं, जो साल्टेटरी आवेग संचरण में सहायक हैं। अंतिम सिरे पर सिनेप्टिक घुंडी न्यूरोट्रांसमीटर (एसिटाइलकोलीन) संचित रखती है।
  • न्यूरोग्लिया (Neuroglia): गैर-उत्तेजनशील सहायक व पोषक कोशिकाएं जो तंत्रिका तंत्र के कुल आयतन का 50% से अधिक भाग बनाती हैं (एस्ट्रोसाइट्स, ओलिगोडेंड्रोसाइट्स, माइक्रोग्लिया)।

तिलचट्टा (पेरिप्लैनेटा अमेरिकाना): बाह्य आकारिकी, कठक एवं लैंगिक द्विरूपता

1. वर्गीकरण एवं सामान्य परिचय

पेरिप्लैनेटा अमेरिकाना (अमेरिकन तिलचट्टा) संघ आर्थ्रोपोडा, वर्ग इंसेक्टा का सदस्य है। यह एक रात्रिचर, सर्वाहारी और तेज दौड़ने वाला (कर्सोरियल) कीट है। वयस्क तिलचट्टा 34 से 53 मिमी लंबा होता है और इसके पंख नर में उदर के अंतिम सिरे से आगे तक फैले होते हैं।

2. काइटिनी बाह्यकंकाल और देहखंड (Tagmata)

संपूर्ण शरीर काइटिन के बने कठोर भूरे रंग के प्लेटों यानी कठकों (Sclerites) से ढका होता है। प्रत्येक खंड में 4 कठक होते हैं: पृष्ठीय टर्गम, अधरीय स्टर्नम और दो पार्श्वीय प्लूरा। कठक आपस में एक लचीली झिल्ली यानी आर्थ्रोडियल झिल्ली से जुड़े होते हैं। शरीर तीन भागों में बंटा होता है:

  • सिर (Head): त्रिभुजाकार, शरीर के लंबवत नीचे की ओर झुका हुआ (हाइपोग्नाथस स्थिति)। यह भ्रूण के 6 खंडों के संलयन से बनता है। प्रमुख अंग:
    • संयुक्त नेत्र: सिर के दोनों ओर एक जोड़ी बड़े वृक्काकार नेत्र। प्रत्येक नेत्र में लगभग 2000 षटकोणीय ओमाटिडिया होते हैं, जो मंद प्रकाश में अत्यधिक संवेदनशील किंतु कम स्पष्ट मोजेक दृष्टि उत्पन्न करते हैं।
    • श्रृंगिकाएं (Antennae): एक जोड़ी लंबी, धागे जैसी बहुखंडित गतिमान श्रृंगिकाएं जो स्पर्श, गंध और ताप संवेदी होती हैं।
    • नेत्रक बिंदु (Ocellar spots): संयुक्त नेत्रों के आधार पर स्थित सरल नेत्रों के अवशेष।
  • वक्ष (Thorax): तीन खंडों से बना होता है: अग्रवक्ष (प्रोटोथोरैक्स) (बड़े ढालनुमा प्रोनोटम से ढका), मध्यवक्ष (मीसोथोरैक्स) और पश्चवक्ष (मेटाथोरैक्स)।
    • टांगें: प्रत्येक वक्ष खंड पर एक-एक जोड़ी संधित टांगें होती हैं। प्रत्येक टांग में पांच खंड होते हैं: कॉक्सा, ट्रोकैंटर, फीमर, कंटकित टिबिया और 5 उपखंडों वाला टार्सस जिसमें नखर और एरोलियम होते हैं।
    • पंख: दो जोड़ी पंख पाए जाते हैं:
      • अग्र पंख (टेगमिना / प्रवार): मध्यवक्ष से निकलते हैं; चमड़े जैसे, अपारदर्शी, गहरे भूरे; उड़ने में काम नहीं आते बल्कि विश्राम के समय पश्च पंखों को ढकते हैं।
      • पश्च पंख (झिल्लीदार पंख): पश्चवक्ष से निकलते हैं; चौड़े, पतले, पारदर्शी; सक्रिय रूप से उड़ने में प्रयुक्त होते हैं।
  • उदर (Abdomen): निम्फ और वयस्क दोनों में 10 खंडों से बना होता है। वयस्क मादा में बाह्य रूप से केवल 7 खंड दिखाई देते हैं (7वां स्टर्नम नाव जैसा होकर 8वें व 9वें के साथ मिलकर जनन कोष्ठ बनाता है)। वयस्क नर में 9 खंड दिखते हैं।
3. काटने और चबाने वाले मुखांग

मुखांग मुखगुहा को घेरे रहते हैं:

  • लेब्रम (ऊपरी होंठ): भोजन को पकड़ने में सहायता करता है।
  • मैंडिबल (चिबुक/जबड़े): काइटिन के मजबूत त्रिकोणीय जबड़ों की एक जोड़ी, जिनमें भोजन चबाने के लिए तेज दांत होते हैं।
  • प्रथम मैक्सिला (जंभिका): 5-खंडित संवेदी मैक्सिलरी पाल्प वाली एक जोड़ी।
  • लेबियम (निचला होंठ): दूसरे मैक्सिला के संलयन से बना, जिसमें 3-खंडित लेबियल पाल्प होते हैं।
  • हाइपोफैरिंग्स (जिह्वा): मुखगुहा के भीतर स्थित नलाकार मांसल जिह्वा जिसके आधार पर लार नाल खुलती है।
4. तिलचट्टे में लैंगिक द्विरूपता (Sexual Dimorphism)
आकारिकीय लक्षण नर तिलचट्टा मादा तिलचट्टा
गुदा शूक (एनल स्टाइल) उपस्थित: 9वें उदर स्टर्नम पर एक जोड़ी अखंडित सुई जैसे शूक होते हैं। अनुपस्थित: गुदा शूक नहीं पाए जाते।
गुदा लूम (एनल सरकाई) 10वें टर्गम पर उपस्थित; खंडित संवेदी अंग। 10वें टर्गम पर उपस्थित; नर से लंबे व चौड़े।
उदर की आकृति उदर संकरा, चपटा व पतला। उदर चौड़ा व नाव के आकार का।
जनन कोष्ठ (Brood Pouch) छोटा, 9वें व 10वें टर्गम और 9वें स्टर्नम द्वारा निर्मित। विशाल जनन कोष्ठ; 7वें, 8वें और 9वें स्टर्नम द्वारा निर्मित।
पंखों का फैलाव पंख उदर के अंतिम सिरे से काफी आगे तक फैले होते हैं। पंख ठीक उदर के अंतिम सिरे तक होते हैं।

तिलचट्टे की आंतरिक शारीरिकी: पाचन, परिसंचरण, श्वसन एवं उत्सर्जन तंत्र

1. पाचन तंत्र (आहार नाल)

तिलचट्टे की आहार नाल तीन प्राथमिक भागों में बंटी होती है:

  • अग्रनाल (Stomodaeum): एक्टोडर्मल और अंदर से क्यूटिकल से आस्तरित।
    • मुखगुहा व ग्रसनी: मुखांगों से घिरी होती है।
    • अन्नपुट (Crop): ग्रसिका से आगे विस्तृत एक बड़ी पतली थैली जो भोजन को संचित रखती है।
    • पेषणी (Gizzard / Proventriculus): अन्नपुट के पीछे स्थित मोटी पेशीय संरचना जिसमें काइटिन के 6 मजबूत दांत भोजन को पीसते हैं।
  • मध्यनाल (Mesenteron / Midgut): एंडोडर्मल व क्यूटिकल-रहित वास्तविक पाचक भाग।
    • यकृतीय अंधनाल (Hepatic Caeca): गिजार्ड व मध्यनाल के जोड़ पर 6 से 8 अंधी नलिकाएं पाचक रस स्रावित करती हैं।
    • पेरिट्रोफिक झिल्ली: मध्यनाल कोशिकाओं द्वारा स्रावित झिल्ली जो भोजन को ढककर आंत्र की दीवार को घर्षण से बचाती है।
  • पश्चनाल (Proctodaeum): एक्टोडर्मल व क्यूटिकल-युक्त। क्षुद्रांत्र, वृहदांत्र और मलाशय में बंटी होती है। मलाशय में 6 मलाशयी अंकुर (Rectal Papillae) जल और लवणों का पुनरावशोषण करते हैं।
2. परिसंचरण तंत्र (खुला परिसंचरण)

तिलचट्टे का परिसंचरण खुले प्रकार का होता है:

  • हीमोसील (Haemocoel): रक्त से भरी देहगुहा जो दो झिल्लियों द्वारा तीन कोटरों में बंटी होती है: पृष्ठीय पेरिकार्डियल कोटर (हृदय युक्त), मध्य पेरिविसरल कोटर (आहार नाल युक्त) और अधरीय पेरिन्यूरल कोटर (तंत्रिका रज्जु युक्त)।
  • हृदय: पृष्ठीय मध्यरेखा पर स्थित 13-कक्षीय नलाकार हृदय (3 वक्ष में, 10 उदर में)। प्रत्येक कक्ष में पार्श्वीय कपाटिका-युक्त छिद्र यानी ऑस्टिया होते हैं। 12 जोड़ी त्रिकोणीय एलरी पेशियां हृदय के स्पंदन में सहायता करती हैं।
  • हीमोलिम्फ: रंगहीन द्रव जिसमें कोई श्वसन वर्णक नहीं होता। यह केवल पोषक तत्वों और उत्सर्जी पदार्थों का संवहन करता है।
3. श्वसन तंत्र (श्वासनाल तंत्र)

गैसों का आदान-प्रदान सीधे श्वासनाल प्रणाली द्वारा होता है:

  • श्वसन रंध्र (Spiracles): शरीर के पार्श्व में स्थित 10 जोड़ी रंध्र (2 जोड़ी वक्ष में, 8 जोड़ी उदर में)। ये कपाटों और अवरोधिनी पेशियों द्वारा नियंत्रित होते हैं।
  • श्वासनाल (Tracheae): प्रत्यास्थ नलिकाएं जिनकी भित्ति में काइटिन के वलय यानी टीनिडिया होते हैं जो नलिकाओं को पिचकने से बचाते हैं।
  • श्वासनलिकाएं (Tracheoles): अत्यंत महीन शाखाएं जो सीधे पेशी कोशिकाओं तक पहुंचती हैं। ऑक्सीजन सीधे इनके द्रव से विसरित होकर कोशिकाओं तक पहुंचती है।
4. उत्सर्जन तंत्र: मैलपीगी नलिकाएं

तिलचट्टा जल संरक्षण के लिए यूरिकोटेलिक होता है:

  • मैलपीगी नलिकाएं: मध्यनाल और पश्चनाल के जोड़ पर तैरती 100 से 150 महीन पीली रोमयुक्त नलिकाएं। ये हीमोलिम्फ से पोटेशियम यूरेट अवशोषित कर अघुलनशील यूरिक अम्ल क्रिस्टलों में बदलती हैं जो विष्ठा के साथ उत्सर्जित होते हैं।
  • सहायक उत्सर्जी अंग: वसा पिंड (यूरेट कोशिकाएं), नेफ्रोसाइट्स और क्यूटिकल निर्मोचन।

तिलचट्टे का जनन तंत्र, पोरोमेटाबोलस कायांतरण एवं मेंढक के प्रमुख अंग तंत्र

1. नर तिलचट्टे का जनन तंत्र
  • वृषण (Testes): उदर के 4थे से 6ठे खंडों में पार्श्व में स्थित एक जोड़ी 3-पालित वृषण।
  • शुक्रवाहिका एवं स्खलन वाहिनी: वृषणों से निकलने वाली शुक्रवाहिकाएं मिलकर एक मध्य स्खलन वाहिनी बनाती हैं जो नर जनन छिद्र में खुलती है।
  • मशरूम ग्रंथि (Utricular Gland): 6ठे व 7वें खंड में स्थित छत्रक सहायक ग्रंथि जो शुक्राणुओं के पोषण और शुक्राणुधानी (स्पर्मैटोफोर) के निर्माण में भाग लेती है।
  • फैलस ग्रंथि एवं फैलोमियर: जनन छिद्र को घेरे रहने वाले असममित काइटिनी बाह्य जननेंद्रिय जो मैथुन में सहायक हैं।
2. मादा तिलचट्टे का जनन तंत्र एवं ऊथीका निर्माण
  • अंडाशय (Ovaries): उदर के 2रे से 6ठे खंडों में स्थित एक जोड़ी बड़े अंडाशय। प्रत्येक अंडाशय 8 अंडाशयी नलिकाओं (ओवेरियोल) से बना होता है।
  • शुक्राणुधानी व कोलैटरल ग्रंथियां: 6ठे खंड में शुक्राणुधानी मैथुन के पश्चात शुक्राणुओं को संचित करती है। कोलैटरल ग्रंथियां कठोर आवरण स्रावित कर ऊथीका (Ootheca) बनाती हैं।
  • ऊथीका एवं निम्फ: प्रत्येक ऊथीका में 16 निषेचित अंडे दो समानांतर कतारों में होते हैं। अंडे से निम्फ निकलता है जो 13 बार निर्मोचन करके वयस्क बनता है (पोरोमेटाबोलस कायांतरण)।
3. भारतीय मेंढक (*Rana tigrina*) के प्रमुख अंग तंत्र
  • पाचन तंत्र: मांसाहारी आहार के अनुरूप छोटी आहार नाल। आगे से जुड़ी द्विशाखित चिपचिपी जिह्वा और एक उभयनिष्ठ निकास द्वार अवस्कर (Cloaca)।
  • परिसंचरण तंत्र: 3-कक्षीय हृदय (दो अलिंद, एक निलय)। सहायक कक्षों में पृष्ठीय साइनस वेनोसस और अधरीय कोनस आर्टिरिओसस होते हैं। आरबीसी केंद्रकयुक्त और अंडाकार होती हैं।
  • श्वसन: तीन प्रकार से: त्वचीय श्वसन (जल में या शीतनिष्क्रियता में नम त्वचा द्वारा), मुखग्रसनी श्वसन (भूमि पर विश्राम के समय) और फुफ्फुसीय श्वसन (गुलाबी फेफड़ों द्वारा)।
  • उत्सर्जन व जनन तंत्र: एक जोड़ी लाल मेसोनेफ्रिक वृक्क। नर में 10-12 जोड़ी शुक्र वाहिकाएं बिडर की नाल में खुलकर मूत्रवाहिनी को एक संयुक्त मूत्रजनन वाहिनी बनाती हैं। मेंढक यूरियोटेलिक (यूरिया उत्सर्जक) होता है।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

चार मौलिक प्राणि ऊतक वर्गीकरण सूत्र
प्राणी शरीर = उपकला (एक्टो/मीसो/एंडोडर्म) + संयोजी (मीसोडर्म) + पेशी (मीसोडर्म) + तंत्रिका ऊतक (एक्टोडर्म)
उपकला ऊतक भ्रूण के तीनों जनन स्तरों से उत्पन्न होने वाला एकमात्र ऊतक है।
कोशिकीय संधि त्रयी सिद्धांत
उपकला अवरोध = दृढ़ संधि (रिसाव रोधन) + डेस्मोसोम (यांत्रिक आसंजन) + गैप जंक्शन (आयनिक तीव्र संचार)
गैप जंक्शन कोनेक्सिन प्रोटीनों द्वारा निर्मित बेलनाकार कोनेक्सॉन से बनते हैं।
स्तनधारी हैवर्सियन तंत्र (ऑस्टिओन) सूत्र
ऑस्टिओन = हैवर्सियन नाल (रक्त वाहिकाएं/तंत्रिकाएं) + संकेंद्री पटलिकाएं + गर्तिकाएं (अस्थिकोशिकाएं) + सूक्ष्म नलिकाएं (कैनैलीकुलाई)
समीपवर्ती हैवर्सियन नालें अनुप्रस्थ वोकमैन नालों (Volkmann's canals) द्वारा आपस में जुड़ी होती हैं।
पेशी तंतु तुलनात्मक सूत्र
कंकाल पेशी (रेखित / बहुकेंद्रकी / ऐच्छिक) बनाम चिकनी पेशी (अरेखित / तर्कुरूप / अनैच्छिक) बनाम हृदय पेशी (रेखित / शाखित / अंतर्विष्ट चक्रिकाएं)
हृदय पेशी की अंतर्विष्ट चक्रिकाएं डेस्मोसोम और गैप जंक्शन का अद्वितीय संयोजन हैं।
तिलचट्टे की आहार नाल का क्षेत्रीय विभाजन
आहार नाल = अग्रनाल [क्यूटिकल, अन्नपुट, पेषणी (6 दंत)] + मध्यनाल [6-8 यकृतीय अंधनाल, अवशोषण] + पश्चनाल [क्यूटिकल, मैलपीगी नलिकाएं, मलाशयी अंकुर]
अग्रनाल और पश्चनाल एक्टोडर्मल होने के कारण प्रत्येक निर्मोचन पर अपनी क्यूटिकल त्यागती हैं।
तिलचट्टे का लैंगिक द्विरूपता सूत्र
नर तिलचट्टा = 10वां टर्गम (गुदा लूम) + 9वां स्टर्नम (गुदा शूक जोड़ी); मादा तिलचट्टा = केवल 10वां टर्गम (गुदा लूम) [गुदा शूक अनुपस्थित]
गुदा लूम वायु के कंपनों को ग्रहण करते हैं; गुदा शूक मैथुन में सहायक होते हैं।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
(क) कोशिकीय आकृति के आधार पर सरल उपकला ऊतकों का वर्गीकरण कीजिए। प्रत्येक का एक स्थान और एक कार्य लिखिए। (ख) प्राणि ऊतकों में अंतराली संधि (गैप जंक्शन) की संरचना और क्रियात्मक महत्व समझाइए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) सरल उपकला ऊतक का वर्गीकरण: [3 अंक]
सरल उपकला एककोशिकीय परत होती है जो एक अकोशिकीय आधार झिल्ली पर टिकी होती है:
1. सरल शल्की उपकला (Simple Squamous): चपटी, पतली, अनियमित सीमाओं वाली टाइल जैसी कोशिकाओं की एक परत; केंद्र में चपटा केंद्रक। स्थान: फेफड़ों की कूपिकाएं (एल्वियोली), रक्त वाहिकाओं का एंडोथीलियम, बोमन संपुट। कार्य: गैसों का विसरण एवं निस्यंदन (छानना)।
2. सरल घनाकार उपकला (Simple Cuboidal): लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई में समान घन जैसी कोशिकाओं की परत; केंद्र में गोल केंद्रक। स्थान: वृक्क के नेफ्रॉन की समीपस्थ कुंडलित नलिका (PCT), लार ग्रंथियों की नलिकाएं। कार्य: स्रावण एवं अवशोषण (PCT में सूक्ष्मांकुर युक्त ब्रश बॉर्डर अवशोषण सतह को कई गुना बढ़ाता है)।
3. सरल स्तंभाकार उपकला (Simple Columnar): लंबी, पतली स्तंभ जैसी कोशिकाएं; अंडाकार केंद्रक कोशिका के आधार के समीप स्थित। स्थान: आमाशय और आंत्र का आंतरिक आस्तर (अपक्ष्माभी); डिंबवाहिनी (फैलोपियन नलिका) एवं श्वसनिकाएं (पक्ष्माभी)। कार्य: पाचक रसों का स्रावण, पोषक तत्वों का अवशोषण तथा पक्ष्माभों द्वारा डिंब या श्लेष्मा का एकदिशात्मक संचलन।

(ख) अंतराली संधि (गैप जंक्शन) की संरचना और महत्व: [2 अंक]
- संरचना: समीपवर्ती दो कोशिकाओं की प्लाज्मा झिल्लियों के मध्य छह कोनेक्सिन प्रोटीनों के संयोजन से एक नलाकार चैनल बनता है जिसे कोनेक्सॉन (Connexon) कहते हैं। दो विपरीत कोनेक्सॉन मिलकर 1.5–2.0 नैनोमीटर व्यास का एक जलीय छिद्र बनाते हैं।
- क्रियात्मक महत्व: यह छिद्र दोनों कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य को सीधे जोड़ता है। इसके माध्यम से छोटे अकार्बनिक आयन ($ ext{Na}^+, ext{K}^+, ext{Ca}^{2+}$), द्वितीयक संदेशवाहक ($ ext{cAMP}$) और छोटे उपापचयी अणु बिना किसी अवरोध के तुरंत प्रवाहित होते हैं। यह हृदय पेशी और चिकनी पेशी में विद्युत आवेगों के तीव्र प्रसार और संपूर्ण पेशी स्तर के एक इलेक्ट्रिकल सिंसीटियम के रूप में एक साथ संकुचन के लिए अत्यंत आवश्यक है।
उदाहरण 2
(क) स्तनधारी सघन अस्थि के हैवर्सियन तंत्र (ऑस्टिओन) की सूक्ष्मदर्शी संरचना का वर्णन कीजिए। (ख) आधात्री की प्रकृति, रक्त आपूर्ति और कोशिकाओं के आधार पर अस्थि एवं उपास्थि में अंतर स्पष्ट कीजिए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) स्तनधारी हैवर्सियन तंत्र (ऑस्टिओन) की संरचना: [3 अंक]
स्तनधारियों की सघन अस्थि की संरचनात्मक इकाई को हैवर्सियन तंत्र या ऑस्टिओन (Osteon) कहा जाता है:
1. हैवर्सियन नाल (Haversian Canal): प्रत्येक ऑस्टिओन के केंद्र में स्थित एक अनुदैर्ध्य केंद्रीय नाल होती है, जिसमें रक्त केशिकाएं, शिराएं, लसिका वाहिकाएं और तंत्रिका तंतु स्थित होते हैं।
2. संकेंद्री पटलिकाएं (Concentric Lamellae): हैवर्सियन नाल के चारों ओर 4 से 20 संकेंद्री वलयों में सजी कठोर पटलिकाएं पाई जाती हैं। ये कोलेजन तंतुओं और कैल्शियम फॉस्फेट (हाइड्रॉक्सीपैटाइट) के क्रिस्टलों से बनी होती हैं।
3. गर्तिकाएं (Lacunae): पटलिकाओं के बीच स्थित सूक्ष्म द्रव-भरी गुहाएं होती हैं। प्रत्येक गर्तिका के भीतर एक परिपक्व अस्थि कोशिका यानी ऑस्टियोसाइट (Osteocyte) स्थित होती है।
4. सूक्ष्म नलिकाएं (Canaliculi): गर्तिकाओं से चारों ओर निकलने वाली अत्यंत महीन, शाखित नलिकाएं होती हैं। इनके भीतर से ऑस्टियोसाइट्स के कोशिकाद्रव्यी प्रवर्ध निकलकर एक-दूसरे से और केंद्रीय नाल से जुड़ते हैं, जिससे पोषक तत्वों व ऑक्सीजन का आदान-प्रदान होता है।
5. वोकमैन नालें (Volkmann's Canals): अनुप्रस्थ या तिरछी नालें जो समांतर हैवर्सियन नालों को आपस में और बाह्य पेरिओस्टियम से जोड़ती हैं।

(ख) अस्थि एवं उपास्थि में अंतर: [2 अंक]
लक्षणअस्थि (Bone)उपास्थि (Cartilage)
आधात्री (Matrix)कैल्शियम हाइड्रॉक्सीपैटाइट और ओसीन प्रोटीन युक्त अत्यधिक कठोर व गैर-लचीली।कॉन्ड्रॉइडिन सल्फेट युक्त ठोस किंतु लचीली व प्रत्यास्थ।
सजीव कोशिकाएंऑस्टियोसाइट्स, गर्तिकाओं में अकेली होती हैं; सूक्ष्म नलिकाएं उपस्थित।कॉन्ड्रोसाइट्स, गर्तिकाओं में 1 या 2-4 के समूहों में होती हैं; सूक्ष्म नलिकाएं अनुपस्थित।
रक्त संचरणहैवर्सियन नालों द्वारा प्रचुर रक्त वाहिकाएं उपस्थित।पूर्णतः रक्तवाहिकाविहीन (अवैस्कुलर); पेरिकॉन्ड्रियम से विसरण द्वारा पोषण।
हैवर्सियन तंत्रस्तनधारियों की सघन अस्थि में उपस्थित।पूर्णतः अनुपस्थित।
उदाहरण 3
(क) कंकाल पेशी, चिकनी पेशी और हृदय पेशी में तुलनात्मक अंतर की तालिका बनाइए। (ख) अंतर्विष्ट चक्रिकाएं (Intercalated Discs) क्या हैं और हृदय पेशी में इनका क्या विशेष महत्व है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) पेशी ऊतकों की तुलनात्मक सारणी: [3 अंक]
लक्षणकंकाल पेशी (ऐच्छिक)चिकनी पेशी (अनैच्छिक)हृदय पेशी
तंतु की आकृति व शाखाएंलंबे, बेलनाकार और पूर्णतः अशाखित।तर्कुरूप (दोनों सिरे नुकीले), अशाखित।छोटे बेलनाकार, शाखित जालिका युक्त।
अनुप्रस्थ धारियांस्पष्ट गहरी (A) व हल्की (I) धारियां (सार्कोमियर) उपस्थित।अनुपस्थित (अरेखित व चिकनी)।हल्की अनुप्रस्थ धारियां उपस्थित।
केंद्रक की संख्या व स्थितिबहुकेंद्रकी सिंसीटियम; केंद्रक परिधि की ओर स्थित।एककेंद्रकी; केंद्रक मध्य में स्थित।एककेंद्रकी (कभी-कभी द्विकेंद्रकी); मध्य में स्थित।
नियंत्रण व संकुचन गतिऐच्छिक (दैहिक तंत्रिका तंत्र); तीव्र संकुचन, शीघ्र थकती हैं।अनैच्छिक (स्वायत्त तंत्रिका तंत्र); धीमा, निरंतर, थकान-रहित।अनैच्छिक (मायोजेनिक पेसमेकर); लयबद्ध, कभी नहीं थकतीं।
अंतर्विष्ट चक्रिकाएंअनुपस्थित।अनुपस्थित।उपस्थित (कोशिका जोड़ों पर)।

(ख) अंतर्विष्ट चक्रिकाएं (Intercalated Discs) और उनका महत्व: [2 अंक]
- संरचना: अंतर्विष्ट चक्रिकाएं समीपवर्ती हृदय पेशी कोशिकाओं के सिरों के संधि स्थल पर पाई जाने वाली गहरी, टेढ़ी-मेढ़ी अनुप्रस्थ पट्टियां हैं। इनमें दो प्रमुख घटक होते हैं: (1) डेस्मोसोम, जो तीव्र संकुचन के दौरान कोशिकाओं को एक-दूसरे से अलग होने से रोकते हैं, और (2) गैप जंक्शन, जो कोशिकाओं के मध्य विद्युत आवेगों के लिए कम प्रतिरोध वाले मार्ग प्रदान करते हैं।
- महत्व: गैप जंक्शनों के कारण विद्युत विभव पलक झपकते ही एक हृदय कोशिका से दूसरी कोशिका में फैल जाता है। इसके फलस्वरूप हृदय पेशी अलग-अलग कोशिकाओं के रूप में कार्य न करके एक एकीकृत कार्यात्मक इलेक्ट्रिकल सिंसीटियम (Electrical Syncytium) के रूप में एक साथ संकुचित होती है, जिससे हृदय प्रभावी रूप से रक्त पंप करता है।
उदाहरण 4
(क) तिलचट्टे (पेरिप्लैनेटा अमेरिकाना) की आहार नाल की संरचना का वर्णन कीजिए। अन्नपुट (क्रॉप), पेषणी (गिजार्ड), यकृतीय अंधनाल और मलाशयी अंकुरों का कार्य बताइए। (ख) तिलचट्टे के उत्सर्जन में मैलपीगी नलिकाओं की भूमिका स्पष्ट कीजिए। [3.5 + 1.5 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) तिलचट्टे की आहार नाल का विवरण: [3.5 अंक]
तिलचट्टे की आहार नाल तीन स्पष्ट भागों में विभाजित होती है:
1. अग्रनाल (Stomodaeum): यह एक्टोडर्मल होती है और अंदर से काइटिन की क्यूटिकल से ढकी होती है। मुखगुहा से प्रारंभ होकर छोटी ग्रसनी, संकरी ग्रसिका और उसके बाद:
- अन्नपुट (Crop): ग्रसिका से आगे विस्तृत एक बड़ी, पतली भित्ति वाली थैली जो वक्ष और उदर में फैली होती है। यह भोजन का संचय करती है और लार द्वारा आंशिक पाचन करती है।
- पेषणी (Gizzard / Proventriculus): अन्नपुट के ठीक पीछे स्थित एक मोटी पेशीय शंक्वाकार संरचना। इसकी भीतरी क्यूटिकल रूपांतरित होकर काइटिन के 6 नुकीले दांत बनाती है। ये दांत ठोस भोजन को बारीक पीसते हैं और पीछे स्थित रोम छननी का कार्य करते हैं।
2. मध्यनाल (Mesenteron / Midgut): एंडोडर्मल व क्यूटिकल-रहित वास्तविक पाचक भाग।
- यकृतीय अंधनाल (Hepatic Caeca): पेषणी और मध्यनाल के संधि स्थल पर 6 से 8 उंगली जैसी अंधी नलिकाएं पाई जाती हैं। ये पाचक रस स्रावित करती हैं। मध्यनाल में पचे भोजन का अवशोषण होता है।
3. पश्चनाल (Proctodaeum): एक्टोडर्मल व क्यूटिकल-युक्त। यह क्षुद्रांत्र (इलीयम), वृहदांत्र (कोलन) और चौड़े मलाशय (रेक्टम) में बंटी होती है।
- मलाशयी अंकुर (Rectal Papillae): मलाशय की आंतरिक दीवार पर 6 अनुदैर्ध्य ग्रंथिल उभार होते हैं, जो अपचित भोजन से जल और अकार्बनिक लवणों का पुनरावशोषण कर ठोस विष्ठा की गोलियां बनाते हैं।

(ख) मैलपीगी नलिकाओं द्वारा उत्सर्जन: [1.5 अंक]
- संरचना व स्थिति: मध्यनाल और पश्चनाल के जोड़ पर लगभग 100 से 150 महीन, पीली, रोमयुक्त अंधी नलिकाएं हीमोलिम्फ में तैरती रहती हैं।
- उत्सर्जन क्रियाविधि: ये नलिकाएं हीमोलिम्फ से घुलनशील पोटेशियम यूरेट और जल अवशोषित करती हैं। नलिका के भीतर रासायनिक क्रिया द्वारा यह अघुलनशील यूरिक अम्ल क्रिस्टलों में बदल दिया जाता है। यह यूरिक अम्ल पश्चनाल के रास्ते विष्ठा के साथ बाहर निकाल दिया जाता है। यह यूरिकोटेलिक व्यवस्था जल की बूंद-बूंद की बचत कर स्थलीय आवास में जीवित रहने के लिए सर्वोत्तम अनुकूलन है।
उदाहरण 5
(क) तिलचट्टे के खुले परिसंचरण तंत्र का सचित्र वर्णन कीजिए। 13-कक्षीय हृदय के कार्य स्पष्ट कीजिए। (ख) नर एवं मादा तिलचट्टे में तीन प्रमुख बाह्य आकारिकीय अंतर लिखिए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) तिलचट्टे का परिसंचरण तंत्र: [3 अंक]
- खुला परिसंचरण: तिलचट्टे का रक्त किसी बंद वाहिका में प्रवाहित न होकर सीधे देहगुहा यानी हीमोसील (Haemocoel) के बड़े कोटरों में बहता है और आंतरिक अंग सीधे रक्त में डूबे रहते हैं।
- कोटर (Sinuses): दो छिद्रित झिल्लियों (पृष्ठीय व अधरीय मध्यच्छदा) द्वारा हीमोसील तीन कोटरों में बंटा होता है: पृष्ठीय पेरिकार्डियल कोटर (हृदय युक्त), मध्य पेरिविसरल कोटर (आहार नाल व जननांग युक्त) और अधरीय पेरिन्यूरल कोटर (तंत्रिका रज्जु युक्त)।
- 13-कक्षीय हृदय: पृष्ठीय टर्गम के नीचे मध्यरेखा पर एक लंबा, संकुचनशील नलाकार हृदय होता है, जो 13 कीप-आकार के कक्षों (3 वक्ष में, 10 उदर में) से बना होता है। प्रत्येक कक्ष में दोनों ओर कपाटिका-युक्त छिद्र यानी ऑस्टिया (Ostia) होते हैं।
- एलरी पेशियां: 12 जोड़ी त्रिभुजाकार एलरी पेशियां पृष्ठीय मध्यच्छदा को टर्गम से जोड़ती हैं। इनके संकुचन से पेरिकार्डियल कोटर फैलता है और ऑस्टिया द्वारा रक्त हृदय में प्रवेश कर आगे की ओर पंप होता है।

(ख) नर एवं मादा तिलचट्टे में आकारिकीय अंतर (लैंगिक द्विरूपता): [2 अंक]
लक्षणनर तिलचट्टामादा तिलचट्टा
गुदा शूक (एनल स्टाइल)उपस्थित: 9वें उदर स्टर्नम पर एक जोड़ी छोटे अखंडित शूक होते हैं।अनुपस्थित: गुदा शूक नहीं पाए जाते।
गुदा लूम (एनल सरकाई)10वें टर्गम पर उपस्थित, आकार में अपेक्षाकृत छोटे।10वें टर्गम पर उपस्थित, अपेक्षाकृत लंबे व चौड़े।
उदर की आकृतिउदर संकरा, चपटा व पतला होता है।उदर चौड़ा व नाव के आकार का होता है (7वां, 8वां, 9वां स्टर्नम जनन कोष्ठ बनाते हैं)।
पंखों का फैलावपंख उदर के अंतिम सिरे से काफी आगे तक फैले होते हैं।पंख ठीक उदर के अंतिम सिरे तक होते हैं।
उदाहरण 6
निम्नलिखित विवरणों से संबंधित ऊतक अथवा संरचना की पहचान कीजिए: (i) उपकला कोशिकाओं के मध्य तरल के रिसाव को रोकने वाली विशिष्ट अंतराकोशिकीय संधि। (ii) अंतराली संयोजी ऊतक की कोशिकाएं जो हिस्टामिन, सेरोटोनिन और हेपेरिन स्रावित करती हैं। (iii) रक्त वाहिकाओं और आंत्र की भित्ति में पाई जाने वाली तर्कुरूप अनैच्छिक पेशी। (iv) मादा तिलचट्टे की वह सहायक ग्रंथि जो अंडकवच (ऊथीका) का कड़ा खोल बनाती है। (v) मेंढक के मुखगुहा का आर्द्र, रक्तवाहिनीयुक्त श्वसन आस्तर। [1 x 5 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
सटीक पहचान: [प्रत्येक पर 1 अंक]
1. दृढ़ संधि (Tight Junction / Zonula Occludens): यह कोशिकाओं की प्लाज्मा झिल्लियों को जलरोधी रूप से जोड़कर ऊतकों में तरल के पराकोशिकीय रिसाव को रोकती है।
2. मास्ट कोशिकाएं (Mast Cells): अंतराली संयोजी ऊतक की दानेदार कोशिकाएं जो एलर्जी व सूजन में हिस्टामिन, सेरोटोनिन और हेपेरिन का स्राव करती हैं।
3. चिकनी पेशी ऊतक (Smooth Muscle Tissue): एककेंद्रकी, अरेखित, तर्कुरूप अनैच्छिक पेशी तंतु जो अंतरंग अंगों की दीवार बनाते हैं।
4. कोलैटरल ग्रंथियां (Collateral Glands): मादा तिलचट्टे की एक जोड़ी शाखित सहायक ग्रंथियां जो प्रोटीन स्रावित कर अंडकवच (ऊथीका) का कड़ा खोल बनाती हैं।
5. मुखग्रसनी उपकला (Buccopharyngeal Epithelium): मेंढक (*Rana tigrina*) के मुखगुहा का आर्द्र, महीन, प्रचुर रक्तवाहिका-युक्त आस्तर जो भूमि पर विश्राम के समय सीधे गैसों के विसरण द्वारा श्वसन करता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

कंडरा (टेंडन) और स्नायु (लिगामेंट) के संयोजन और कार्य में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कंडरा सघन श्वेत कोलेजन तंतुओं की बनी होती है और यह कंकाल पेशी को अस्थि से जोड़ती है। स्नायु सघन पीत इलास्टिन तंतुओं का बना प्रत्यास्थ ऊतक है जो अस्थि को दूसरी अस्थि से संधि पर जोड़ता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गुदा शूक (एनल स्टाइल) और गुदा लूम (एनल सरकाई) की स्थिति और उपस्थिति को एक समान समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

गुदा लूम (एनल सरकाई) बहुखंडित संवेदी अंग हैं जो नर और मादा दोनों तिलचट्टों के 10वें टर्गम पर होते हैं। जबकि गुदा शूक (एनल स्टाइल) अखंडित सुई जैसे उपांग हैं जो केवल नर तिलचट्टे के 9वें स्टर्नम पर पाए जाते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि उपास्थि और अस्थि दोनों की आधात्री समान रूप से लचीली होती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

उपास्थि की आधात्री कॉन्ड्रॉइडिन लवणों के कारण ठोस किंतु लचीली होती है। अस्थि की आधात्री में अकार्बनिक कैल्शियम हाइड्रॉक्सीपैटाइट क्रिस्टलों के सघन निक्षेपण के कारण यह अत्यंत कठोर और पूर्णतः गैर-लचीली होती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि तिलचट्टे का हीमोलिम्फ कशेरुकियों के रुधिर की भांति ऑक्सीजन का परिवहन करता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

तिलचट्टे का हीमोलिम्फ रंगहीन होता है और इसमें हीमोग्लोबिन जैसा कोई श्वसन वर्णक नहीं होता। ऊतकों तक ऑक्सीजन का परिवहन सीधे श्वासनाल (ट्रैकिया) और श्वासनलिकाओं (ट्रैकियोल) के माध्यम से गैसीय रूप में होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

उपकला ऊतक की उत्पत्ति को केवल एक्टोडर्म तक सीमित मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

उपकला ऊतक भ्रूण के तीनों जनन स्तरों से उत्पन्न हो सकता है: एक्टोडर्म (त्वचा की बाह्यत्वचा), एंडोडर्म (आहार नाल का आंतरिक आस्तर) और मीसोडर्म (देहगुहा और रुधिर वाहिकाओं का एंडोथीलियम)।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

प्राणियों में संरचनात्मक संगठन (अध्याय 7) - ऊतक विज्ञान एवं तिलचट्टा शारीर उपकला, संयोजी, पेशी एवं तंत्रिका ऊतक | हैवर्सियन तंत्र | कॉकरोच (पेरिप्लैनेटा) आकारिकी 1. प्राणि ऊतक एवं कोशिकीय संधियां Epithelial Tissue (আবরণী) उपकला ऊतक (सरल, संयुक्त, ग्रंथिल) Connective Tissue (যোগ কলা) संयोजी ऊतक (अंतराली, वसीय, उपास्थि, अस्थि) Muscular Tissue (পেশী কলা) पेशी ऊतक (कंकाल, चिकनी, हृदय पेशी) Nervous Tissue (স্নায়ু কলা) तंत्रिका ऊतक (न्यूरॉन एवं न्यूरोग्लिया) Cell Junctions (কোষীয় সংযোগস্থল) दृढ़ संधि (Tight): रिसाव रोकना अंतराली संधि (Gap): तीव्र संचार आसंजी संधि (Desmosome): यांत्रिक शक्ति 2. हैवर्सियन तंत्र एवं न्यूरॉन संरचना अस्थि का ऑस्टिओन (Haversian System) Canal केंद्रीय नाल + पटलिकाएं + ऑस्टियोसाइट बहुध्रुवीय न्यूरॉन: द्रुमाक्ष्य + तंत्रिकाक्ष मायलिन आवरण एवं रैनवियर के नोड सूक्ष्म नलिकाएं (Canaliculi) युग्मानुबंधन (Synapse): न्यूरोट्रांसमीटर 3. तिलचट्टा (कॉकरोच) पाचन एवं परिसंचरण Alimentary Canal (পৌষ্টিক নালী) CROP GIZZARD अग्रनाल: ग्रसिका, क्रॉप, पेषणी (6 दंत) यकृतीय अंधनाल (6-8) + मध्यनाल मैलपीगी नलिकाएं (100-150): यूरिकोटेलिक 13-कक्षीय पृष्ठीय हृदय एवं एलरी पेशियां Sexual Dimorphism (যৌন রূপভেদ) Male Cockroach (পুরুষ আরশোলা) लैंगिक द्विरूपता: गुदा शूक (नर में) Female Cockroach (স্ত্রী আরশোলা) गुदा लूम (नर व मादा दोनों में) - No Anal Styles

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
प्राणि ऊतक मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं: उपकला ऊतक (आवरण व स्रावण), संयोजी ऊतक (संयोजन व अवलंबन), पेशी ऊतक (संकुचन व गति) और तंत्रिका ऊतक (आवेग संचरण व नियंत्रण)।
मुख्य बिंदु 2
उपकला ऊतक एक अकोशिकीय आधार झिल्ली पर टिका होता है और इसमें रक्त वाहिकाएं नहीं होतीं। सरल उपकला एककोशिकीय परत होती है: शल्की (विसरण), घनाकार (स्रावण व अवशोषण), स्तंभाकार (अवशोषण व गति) और पक्ष्माभी (श्लेष्मा या कणों का संचलन)। संयुक्त उपकला घर्षण से सुरक्षा प्रदान करती है।
मुख्य बिंदु 3
उपकला में अंतरकोशिकीय संधियों में दृढ़ संधि (रिसाव रोकना), आसंजी संधि या डेस्मोसोम (यांत्रिक मजबूती) और अंतराली संधि या गैप जंक्शन (आयनों और अणुओं का त्वरित विनिमय) शामिल हैं।
मुख्य बिंदु 4
संयोजी ऊतक आधात्री, तंतुओं (कोलेजन, इलास्टिन) और कोशिकाओं से बना होता है। शिथिल संयोजी ऊतक में अंतराली और वसीय ऊतक होते हैं। सघन नियमित ऊतक में कंडरा (पेशी को अस्थि से जोड़ना) और स्नायु (अस्थि को अस्थि से जोड़ना) आते हैं।
मुख्य बिंदु 5
कंकाल ऊतकों में उपास्थि की आधात्री ठोस व लचीली (कॉन्ड्रोसाइट्स युक्त) होती है। अस्थि की आधात्री कठोर व गैर-लचीली होती है जिसमें कैल्शियम हाइड्रॉक्सीपैटाइट होता है। स्तनधारी सघन अस्थि की मुख्य इकाई हैवर्सियन तंत्र (ऑस्टिओन) है जिसमें केंद्रीय नाल, संकेंद्री पटलिकाएं, गर्तिकाएं, अस्थिकोशिकाएं और सूक्ष्म नलिकाएं होती हैं।
मुख्य बिंदु 6
पेशी ऊतक तीन प्रकार के होते हैं: कंकाल पेशी (रेखित, बहुकेंद्रकी सिंसीटियम, ऐच्छिक), चिकनी पेशी (अरेखित, तर्कुरूप, एककेंद्रकी, अनैच्छिक) और हृदय पेशी (रेखित, शाखित, एककेंद्रकी, अनैच्छिक, अंतर्विष्ट चक्रिकाओं युक्त)।
मुख्य बिंदु 7
तंत्रिका ऊतक में उत्तेजनशील न्यूरॉन (कोशिकाकाय, द्रुमाक्ष्य, तंत्रिकाक्ष व रैनवियर के नोड) और गैर-उत्तेजनशील सहायक न्यूरोग्लिया कोशिकाएं होती हैं, जो तंत्रिका ऊतक के आधे से अधिक आयतन का निर्माण करती हैं।
मुख्य बिंदु 8
पेरिप्लैनेटा अमेरिकाना (तिलचट्टा) का शरीर काइटिनयुक्त कठकों (पृष्ठीय टर्गम, अधरीय स्टर्नम, पार्श्वीय प्लूरा) से ढका होता है। इसका सिर अधोमुखी (हाइपोग्नाथस) होता है, जिसमें 2000 ओमाटिडिया युक्त संयुक्त नेत्र और काटने-चबाने वाले मुखांग होते हैं।
मुख्य बिंदु 9
तिलचट्टे की आहार नाल अग्रनाल (मुख, ग्रसनी, ग्रसिका, अन्नपुट/क्रॉप और 6 दांतों वाली पेषणी/गिजार्ड), 6-8 यकृतीय अंधनाल, मध्यनाल और पश्चनाल (क्षुद्रांत्र, वृहदांत्र, मलाशय व 6 मलाशयी अंकुर) में बंटी होती है।
मुख्य बिंदु 10
मध्यनाल और पश्चनाल के जोड़ पर 100-150 महीन पीली मैलपीगी नलिकाएं पाई जाती हैं, जो हीमोलिम्फ से पोटेशियम यूरेट अवशोषित कर यूरिक अम्ल का उत्सर्जन करती हैं (यूरिकोटेलिक अनुकूलन)।
मुख्य बिंदु 11
परिसंचरण तंत्र खुला होता है; हीमोसील में रंगहीन हीमोलिम्फ भरा होता है और पृष्ठीय मध्यरेखा पर 13-कक्षीय नलाकार हृदय स्थित होता है जो एलरी पेशियों की सहायता से स्पंदित होता है। श्वसन 10 जोड़ी श्वसन रंध्रों और श्वासनाल जाल द्वारा होता है।
मुख्य बिंदु 12
लैंगिक द्विरूपता स्पष्ट होती है: नर तिलचट्टे के 9वें स्टर्नम पर एक जोड़ी अखंडित गुदा शूक (एनल स्टाइल) होते हैं, जो मादा में अनुपस्थित होते हैं। 10वें टर्गम पर दोनों लिंगों में खंडित गुदा लूम (एनल सरकाई) उपस्थित होते हैं। मादा अंडकवच (ऊथीका) में 16 अंडे देती है और 13 बार निर्मोचन द्वारा वयस्क बनती है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
सामान्य परिसंचरण की अवस्था में कोई दृश्य तंतु न होने पर भी रुधिर को उपकला या पेशी के स्थान पर विशिष्ट संयोजी ऊतक क्यों माना जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: रुधिर को विशिष्ट संयोजी ऊतक माना जाता है क्योंकि: (1) यह अन्य सभी संयोजी ऊतकों की भांति भ्रूण के मीसोडर्मल मीसेनकाइम से उत्पन्न होता है। (2) इसमें संयोजी ऊतक का मूलभूत लक्षण होता है, जिसमें प्रचुर बाह्यकोशिकीय आधात्री (प्लाज्मा) में कोशिकाएं (आरबीसी, डब्ल्यूबीसी, प्लेटलेट्स) फैली रहती हैं। (3) यद्यपि द्रव अवस्था में इसमें तंतु नहीं दिखते, परंतु प्लाज्मा में घुलनशील फाइब्रिनोजेन प्रोटीन होता है, जो रक्त का थक्का जमते समय अघुलनशील फाइब्रिन तंतुओं के घने जाल में बदल जाता है।
2
कूटस्तरित (Pseudostratified) स्तंभाकार उपकला सूक्ष्मदर्शी के नीचे बहुस्तरीय होने का भ्रम क्यों उत्पन्न करती है और यह मानव शरीर में कहां अनिवार्य है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: कूटस्तरित उपकला में कोशिकाओं की ऊंचाई असमान होती है और उनके केंद्रक अलग-अलग स्तरों पर स्थित होते हैं, जिससे यह बहुस्तरीय प्रतीत होती है। परंतु वास्तव में प्रत्येक कोशिका सीधे आधार झिल्ली पर टिकी होती है, अतः यह एकल-स्तरीय सरल उपकला ही है। यह मानव के श्वसन मार्ग (श्वासनाल व श्वसनी) में पाई जाती है, जहां इसके पक्ष्माभ (सिलिया) श्लेष्मा में फंसे धूलकणों और रोगाणुओं को बाहर की ओर गति कराते हैं।
3
वयस्क मानव में अस्थि के टूटने पर वह शीघ्र जुड़ जाती है, परंतु जोड़ों की उपास्थि क्षतिग्रस्त होने पर बहुत धीमी गति से अथवा कभी ठीक क्यों नहीं होती?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: उपास्थि पूर्णतः रक्तवाहिकाविहीन (अवैस्कुलर) ऊतक है। इसके कॉन्ड्रोसाइट्स ठोस कॉन्ड्रॉइडिन आधात्री की गर्तिकाओं में बंद रहते हैं और दूरस्थ पेरिकॉन्ड्रियम या साइनोवियल द्रव से धीमी विसरण क्रिया द्वारा पोषण प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत, अस्थि में हैवर्सियन और वोकमैन नालों का सघन रक्त संचरण होता है, जो अस्थि टूटने पर शीघ्र ऑस्टियोब्लास्ट कोशिकाएं, कोलेजन और कैल्शियम पहुंचाकर रिपेयर कैलस बना देता है।
4
रंगहीन रक्त और खुला परिसंचरण तंत्र होने के बाद भी तिलचट्टा अत्यधिक शारीरिक फुर्ती और तीव्र दौड़ने की क्षमता कैसे बनाए रखता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: कशेरुकी जीवों में शारीरिक सक्रियता रक्त में हीमोग्लोबिन द्वारा ऑक्सीजन परिवहन की दर से बंधी होती है। परंतु तिलचट्टे में गैस विनिमय रक्त पर बिल्कुल निर्भर नहीं करता। 10 जोड़ी श्वसन रंध्रों से वायु सीधे श्वासनाल जाल में प्रवेश करती है और सूक्ष्म श्वासनलिकाओं (ट्रैकियोल) द्वारा सीधे प्रत्येक पेशी कोशिका के कोशिकाद्रव्य तक गैसीय रूप में ऑक्सीजन पहुंचा दी जाती है। इस तीव्र और प्रत्यक्ष विसरण व्यवस्था के कारण तिलचट्टा बिना श्वसन वर्णक के भी अत्यधिक ऊर्जा उत्पादित कर लेता है।
5
तिलचट्टे के पोरोमेटाबोलस कायांतरण का क्या महत्व है और इसका निम्फ वयस्क पेरिप्लैनेटा से किन दो प्रमुख बातों में भिन्न होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: तिलचट्टे में क्रमिक या अधूरा कायांतरण (पोरोमेटाबोलस) होता है, जिसमें कोई प्यूपा अवस्था नहीं होती। अंडे से निकलने वाले शिशु को निम्फ कहते हैं, जो दिखने में छोटे वयस्क जैसा होता है। यह निम्फ 13 बार निर्मोचन (Ecdysis) करके वयस्क बनता है। निम्फ वयस्क से दो प्रमुख बातों में भिन्न होता है: (1) निम्फ में उड़ने योग्य पंख नहीं होते (केवल अंतिम निम्फ अवस्थाओं में पंख पैड दिखते हैं; वास्तविक पंख केवल वयस्क अवस्था में आते हैं), और (2) निम्फ में जनन अंग और बाह्य जननेंद्रियां अपरिपक्व व निष्क्रिय होती हैं।
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अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

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