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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 15
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

श्वसन और गैसों का विनिमय

श्वसन और गैसों का विनिमय WBCHSE कक्षा 11 जीव विज्ञान के मानव कार्यिकी एकक का द्वितीय अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। यह मास्टर पाठ्यक्रम संवहन एवं विनिमय क्षेत्रों की संरचना, बॉयल के नियम पर आधारित अंतःश्वसन-निःश्वसन की क्रियाविधि, नैदानिक स्पाइरोमेट्री (TV, IRV, ERV, RV, VC, TLC), आंशिक दाब विसरण गतिकी, ऑक्सीहीमोग्लोबिन सहकारिता, बोहर एवंल्डेन प्रभाव, कार्बोनिक एनहाइड्रेज प्रक्रम, क्लोराइड विस्थापन (हैमबर्गर प्रक्रम), मस्तिष्क स्तंभ द्वारा श्वसन लय नियमन तथा दमा व वातस्फीति जैसे विकारों का संपूर्ण अध्ययन कराता है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

संवातन एवं गैस परिवहन के जैवभौतिकीय सिद्धांतों को समझना कोशिकीय वायवीय उपापचय को बनाए रखने, अम्ल-क्षार संतुलन की रक्षा तथा फुप्फुसीय रोगों के निदान में अपरिहार्य है। यह पल्मोनोलॉजी, क्रिटिकल केयर, एनेस्थिसियोलॉजी, खेल कार्यिकी एवं उच्च पर्वतीय चिकित्सा विज्ञान का मूल आधार है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: मानव श्वसन तंत्र की संरच...
2 मॉड्यूल 2: फुप्फुसीय संवातन की क्रि...
3 मॉड्यूल 3: स्पाइरोमेट्री: फुप्फुसीय...
4 मॉड्यूल 4: विसरण झिल्ली एवं गैसों क...
5 मॉड्यूल 5: श्वसन गैसों का परिवहन एव...
6 मॉड्यूल 6: श्वसन का तंत्रिकीय एवं र...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: मानव श्वसन तंत्र की संरचना और शारीरिक संगठन

श्वसन वह अनिवार्य जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा वायुमंडलीय ऑक्सीजन ($\text{O}_2$) को कोशिकाओं में पोषक तत्वों के ऑक्सीकरण द्वारा एटीपी ($\text{ATP}$) ऊर्जा उत्पादन हेतु पहुँचाया जाता है तथा इस उपापचयी क्रिया में उत्पन्न हानिकारक कार्बन डाइऑक्साइड ($\text{CO}_2$) को शरीर से बाहर निष्कासित किया जाता है। मानव श्वसन तंत्र को संरचनात्मक एवं कार्यात्मक आधार पर दो प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है: संवहन क्षेत्र (Conducting Zone) और श्वसन / विनिमय क्षेत्र (Respiratory / Exchange Zone)।

कार्यात्मक प्रभाग शारीरिक अंग एवं मार्ग ऊतक संरचना एवं कार्यिकी
1. संवहन क्षेत्र (Conducting Zone) बाह्य नासारंध्र $\to$ नासा कोष्ठ $\to$ आंतरिक नासारंध्र $\to$ ग्रसनी (नासाग्रसनी, मुखग्रसनी, कंठग्रसनी) $\to$ कंठ (Larynx) $\to$ श्वासनली (Trachea) $\to$ प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक श्वसनी $\to$ अंतस्थ श्वसनिकाएं (Terminal Bronchioles)। पक्ष्माभी कूटस्तरित स्तंभाकार उपकला (Pseudostratified ciliated columnar epithelium), श्लेष्मा-स्रावी गॉब्लेट कोशिकाओं एवं सघन रक्त केशिकाओं द्वारा आस्तरित। यह वायु का संवहन करता है, धूलकणों एवं रोगाणुओं को बाहर रोकता है (म्यूकोसिलियरी एस्केलेटर), वायु को 100% नम (आर्द्र) करता है तथा शरीर के तापमान ($37^\circ\text{C}$) तक गर्म करता है। यहाँ गैसों का कोई विनिमय नहीं होता।
2. श्वसन / विनिमय क्षेत्र (Respiratory Zone) श्वसन श्वसनिकाएं (Respiratory bronchioles) $\to$ कूपिका नलिकाएं $\to$ कूपिका कोष $\to$ वायु कूपिकाएं (Alveoli) (दोनों फेफड़ों में लगभग 30 करोड़ कूपिकाएं)। अत्यंत पतली सरल शल्की उपकला (Type I न्यूमोसाइट्स) द्वारा निर्मित। यह गैसों के सरल विसरण के लिए लगभग 70 से 100 वर्ग मीटर (एक टेनिस कोर्ट के बराबर) का विशाल एवं अत्यधिक संवहनी सतह क्षेत्र प्रदान करता है।

श्वासनली (Trachea) एवं T5 कशेरुका पर श्वसनी विभाजन

श्वासनली (Trachea): यह लगभग 10-12 सेमी लंबी तथा 2-2.5 सेमी व्यास की एक सीधी नलिका है जो मध्य-वक्ष गुहा तक फैली होती है। इसकी भित्ति में 16 से 20 अपूर्ण 'C'-आकार के हाइलिन उपास्थि के छल्ले होते हैं, जो अंतःश्वसन के समय ऋणात्मक दाब के कारण श्वासनली को पिचकने (collapse) से रोकते हैं।

  • विभाजन स्थल (T5): 5वीं वक्षीय कशेरुका ($T_5$) के स्तर पर श्वासनली दाईं एवं बाईं प्राथमिक श्वसनी (Primary Bronchi) में विभाजित होती है। दाईं श्वसनी बाईं की तुलना में अधिक चौड़ी, छोटी एवं सीधी होती है, इसलिए श्वास द्वारा भीतर खिंचा गया बाहरी पदार्थ प्रायः दाएं फेफड़े में प्रवेश करता है।
  • शाखा विन्यास: प्राथमिक श्वसनी $\to$ द्वितीयक (लोबार) श्वसनी (दाएं फेफड़े में 3, बाएं में 2) $\to$ तृतीयक श्वसनी $\to$ श्वसनिकाएं $\to$ अंतस्थ श्वसनिकाएं। उपास्थिमय छल्ले श्वसनिकाओं के आरंभ तक पाए जाते हैं।
  • कंठ एवं उपकंठ (Epiglottis): कंठ 9 उपास्थियों से मिलकर बना होता है। उपकंठ या घाटी ढक्कन (Epiglottis) एक पत्ती के आकार का लोचदार उपास्थिमय ढक्कन है जो भोजन निगलते समय कंठद्वार (Glottis) को ढक लेता है ताकि भोजन श्वास मार्ग में न जा सके।

वक्षीय गुहा एवं फुप्फुसावरण (Pleura)

फेफड़े एक वायुरोधी वक्षीय गुहा (Thoracic Cavity) में स्थित होते हैं जो पृष्ठ भाग में वक्षीय कशेरुकाओं, अधर भाग में उरोस्थि (Sternum), पार्श्व में 12 जोड़ी पसलियों एवं अंतरापर्शुक पेशियों तथा नीचे गुंबदाकार पेशीय तनुपट (Diaphragm) द्वारा घिरी होती है। प्रत्येक फेफड़ा दोहरी झिल्ली वाले फुप्फुसावरण (Pleura) से ढका होता है:

  • पैराइटल प्लूरा (Parietal Pleura): बाहरी झिल्ली, जो वक्ष गुहा की भीतरी दीवार एवं डायफ्राम से दृढ़ता से जुड़ी होती है।
  • विसरल प्लूरा (Visceral Pleura): भीतरी झिल्ली, जो सीधे फेफड़े की बाह्य सतह से चिपकी होती है।
  • फुप्फुसीय गुहा एवं द्रव: दोनों परतों के बीच की संकरी जगह में फुप्फुसीय द्रव (Pleural fluid) भरा होता है, जो श्वसन गतियों के समय घर्षण कम करता है तथा एक निरंतर ऋणात्मक अंतराफुप्फुसीय दाब ($-4\text{ to } -6\text{ mmHg}$) बनाए रखकर फेफड़ों को पिचकने से बचाता है।

मॉड्यूल 2: फुप्फुसीय संवातन की क्रियाविधि एवं श्वसन दाब

फुप्फुसीय संवातन (Pulmonary Ventilation / सांस लेना) वह भौतिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा वायुमंडलीय वायु फेफड़ों के भीतर खींची जाती है तथा कूपिकाओं की दूषित वायु बाहर निकाली जाती है। यह वक्ष गुहा के आयतन में परिवर्तन द्वारा उत्पन्न दाब प्रवणता पर आधारित है, जो बॉयल के नियम ($P \propto \frac{1}{V}$) का पालन करती है।

1. अंतःश्वसन (Inspiration - सक्रिय प्रक्रिया, अवधि ~2 सेकंड)

अंतःश्वसन तब होता है जब अंतःफुप्फुसीय दाब ($P_{pul}$) वायुमंडलीय दाब ($P_{atm} = 760\text{ mmHg}$) से कम हो जाता है:

  • तनुपट (Diaphragm) का संकुचन: फ्रेनिक तंत्रिकाओं की प्रेरणा से गुंबदाकार डायफ्राम संकुचित होकर चपटा हो जाता है और उदर गुहा की ओर नीचे खिसकता है। इससे वक्ष गुहा का आयतन अग्र-पश्च (अनुदैर्ध्य) अक्ष में बढ़ जाता है।
  • बाह्य अंतरापर्शुक पेशियों (EICM) का संकुचन: 11 जोड़ी बाह्य अंतरापर्शुक पेशियों के संकुचन से पसलियां और उरोस्थि ऊपर और बाहर की ओर उठती हैं। इससे वक्ष गुहा का आयतन पृष्ठ-अधर अक्ष में बढ़ जाता है।
  • दाब प्रवणता: वक्ष गुहा का कुल आयतन बढ़ता है $\to$ फेफड़े फैलते हैं $\to$ अंतःफुप्फुसीय दाब घटकर वायुमंडलीय दाब से $-1\text{ mmHg}$ ($759\text{ mmHg}$) कम हो जाता है $\to$ वायु दाब संतुलन होने तक तेजी से फेफड़ों में प्रवेश करती है।
2. निःश्वसन (Expiration - विश्राम में निष्क्रिय, अवधि ~3 सेकंड)

सामान्य विश्राम अवस्था में निःश्वसन पूरी तरह एक निष्क्रिय प्रक्रिया है, जिसमें कोई एटीपी खर्च नहीं होता:

  • पेशियों का शिथिलन: डायफ्राम शिथिल होकर पुनः ऊपर उठकर अपनी पूर्व गुंबदाकार स्थिति में आ जाता है। साथ ही बाह्य अंतरापर्शुक पेशियां शिथिल हो जाती हैं जिससे पसलियां और उरोस्थि नीचे आ जाती हैं।
  • प्रत्यास्थ प्रतिक्षेप: वक्ष गुहा का आयतन घटता है $\to$ फेफड़ों के प्रत्यास्थ संकुचन (Elastic recoil) के कारण अंतःफुप्फुसीय दाब वायुमंडलीय दाब से $+1\text{ mmHg}$ ($761\text{ mmHg}$) बढ़ जाता है $\to$ वायु फेफड़ों से बाहर निकल जाती है।
  • बलपूर्वक निःश्वसन (सक्रिय): व्यायाम या खांसते समय निःश्वसन सक्रिय हो जाता है। इसमें आंतरिक अंतरापर्शुक पेशियां (IICM) (जो पसलियों को नीचे-भीतर खींचती हैं) तथा उदर पेशियां (जो उदर अंगों को डायफ्राम पर दबाती हैं) संकुचित होकर वायु को बलपूर्वक बाहर फेंकती हैं।

फुप्फुसीय सर्फेक्टेंट एवं लाप्लास का नियम

कूपिकाओं की भीतरी सतह पर उपस्थित तरल का पृष्ठ तनाव कूपिकाओं को संकुचित कर पिचकने (atelectasis) का प्रयास करता है। लाप्लास के नियम ($P = \frac{2T}{r}$) के अनुसार छोटी कूपिकाओं में पिचकने का खतरा अधिक होता है।

  • सर्फेक्टेंट का स्राव: कूपिका भित्ति की Type II न्यूमोसाइट कोशिकाओं द्वारा सर्फेक्टेंट (मुख्य रूप से डाईपाल्मिटॉयल लेसिथिन / DPPC एवं प्रोटीन) स्रावित होता है।
  • महत्व: यह पृष्ठ तनाव को अत्यधिक कम कर देता है, छोटी कूपिकाओं को पिचकने से रोकता है तथा अंतःश्वसन में फेफड़ों के प्रसार को आसान बनाता है। नवजात शिशुओं में इसकी कमी से शिशु श्वसन संकट सिंड्रोम (NRDS) हो जाता है।

मॉड्यूल 3: स्पाइरोमेट्री: फुप्फुसीय आयतन एवं क्षमताएं

श्वसन क्रिया के दौरान फेफड़ों में ली जाने वाली एवं छोड़ी जाने वाली वायु के आयतन को मापने की नैदानिक विधि को स्पाइरोमेट्री (Spirometry) तथा उपकरण को स्पाइरोमीटर कहते हैं। फुप्फुसीय मापनों को चार प्राथमिक आयतनों (Volumes) तथा चार क्षमताओं (Capacities) में वर्गीकृत किया जाता है।

फुप्फुसीय मापन संकेत सामान्य मान कार्यिकी परिभाषा एवं सूत्र
ज्वारीय आयतन (Tidal Volume) TV 500 mL सामान्य शांत श्वसन चक्र में अंतःश्वसित या निःश्वसित वायु का आयतन (स्वस्थ व्यक्ति में प्रति मिनट लगभग 6,000–8,000 mL)।
अंतःश्वसन सुरक्षित आयतन IRV 2500–3000 mL सामान्य अंतःश्वसन के पश्चात बलपूर्वक फेफड़ों में खींची जा सकने वाली अतिरिक्त वायु का आयतन।
निःश्वसन सुरक्षित आयतन ERV 1000–1100 mL सामान्य निःश्वसन के पश्चात बलपूर्वक बाहर निकाली जा सकने वाली अतिरिक्त वायु का आयतन।
अवशिष्ट आयतन (Residual Volume) RV 1100–1200 mL अधिकतम बलपूर्वक निःश्वसन के बाद भी फेफड़ों में शेष बची वायु का आयतन। इसे स्पाइरोमीटर द्वारा नहीं मापा जा सकता।
अंतःश्वसन क्षमता (Inspiratory Capacity) IC 3000–3500 mL सामान्य निःश्वसन के पश्चात भीतर खींची जा सकने वाली कुल वायु: $\text{IC} = \text{TV} + \text{IRV}$
क्रियाशील अवशिष्ट क्षमता (FRC) FRC 2100–2300 mL सामान्य निःश्वसन के पश्चात फेफड़ों में बची वायु: $\text{FRC} = \text{ERV} + \text{RV}$ (स्पाइरोमीटर से मापना असंभव)।
जैव क्षमता (Vital Capacity) VC 3500–4600 mL अधिकतम अंतःश्वसन के पश्चात बलपूर्वक बाहर निकाली जा सकने वाली अधिकतम वायु: $\text{VC} = \text{ERV} + \text{TV} + \text{IRV}$
कुल फुप्फुस क्षमता (TLC) TLC 5000–6000 mL अधिकतम अंतःश्वसन के बाद फेफड़ों में समा सकने वाली कुल वायु: $\text{TLC} = \text{VC} + \text{RV} = \text{IRV} + \text{TV} + \text{ERV} + \text{RV}$

शारीरिक मृत अवकाश एवं कूपिकीय संवातन

भीतर ली गई 500 mL ज्वारीय वायु पूरी तरह कूपिकाओं तक नहीं पहुंचती। नासारंध्र से लेकर अंतस्थ श्वसनिका तक संवहन मार्ग में लगभग 150 mL वायु रुकी रहती है जो गैस विनिमय में भाग नहीं लेती। इसे शारीरिक मृत अवकाश आयतन (Anatomical Dead Space) कहते हैं।

  • कूपिकीय संवातन दर (Alveolar Ventilation Rate): प्रति मिनट वास्तव में कूपिकाओं में गैस विनिमय हेतु पहुँचने वाली ताजी वायु:
    $$\text{Alveolar Ventilation Rate} = (\text{TV} - \text{Dead Space}) \times \text{Respiratory Rate} = (500 - 150)\text{ mL} \times 12 = \mathbf{4,200\text{ mL/min}}$$
  • नैदानिक तथ्य: उथले और तेज श्वसन की तुलना में गहरा और धीमा श्वसन कूपिकीय संवातन के दृष्टिकोण से अत्यधिक प्रभावी होता है।

मॉड्यूल 4: विसरण झिल्ली एवं गैसों के विनिमय के जैवभौतिक सिद्धांत

कूपिकाओं एवं फुप्फुसीय रक्त केशिकाओं के बीच गैसों का विनिमय पूरी तरह एक निष्क्रिय प्रक्रिया है जो सरल विसरण (Simple Diffusion) द्वारा सम्पन्न होती है। विसरण की दर मुख्यतः तीन कारकों पर निर्भर करती है: (1) गैसों की आंशिक दाब प्रवणता, (2) माध्यम में गैस की विलेयता, तथा (3) विसरण झिल्ली की मोटाई एवं सतह क्षेत्रफल।

श्वसन या विसरण झिल्ली की त्रिस्तरीय संरचना (Respiratory Membrane)

कूपिका वायु तथा रक्त केशिका के बीच उपस्थित विसरण झिल्ली अत्यंत महीन होती है (इसकी कुल मोटाई 0.5 माइक्रोमीटर या $\mathbf{<0.5\ \mu m}$ से भी कम होती है), जो निम्नलिखित तीन परतों से मिलकर बनी है:

  1. कूपिका की सरल शल्की उपकला (Alveolar Squamous Epithelium): Type I न्यूमोसाइट्स की बनी एकल कोशिका परत।
  2. रक्त केशिका की एंडोथीलियम (Capillary Endothelium): फुप्फुसीय केशिकाओं की आंतरिक एकल स्तरीय भित्ति।
  3. संयुग्मित आधारभूत पदार्थ (Fused Basement Substance): उपर्युक्त दोनों उपकला परतों के बीच स्थित आधार झिल्लियों का महीन मैट्रिक्स।
श्वसन गैस वायुमंडलीय वायु (mmHg) कूपिका वायु (Alveoli, mmHg) अनॉक्सीकृत रुधिर (Venous, mmHg) ऑक्सीकृत रुधिर (Arterial, mmHg) शारीरिक ऊतक (Tissues, mmHg)
ऑक्सीजन ($p\text{O}_2$) 159 104 40 95 40
कार्बन डाइऑक्साइड ($p\text{CO}_2$) 0.3 40 45 40 45

CO2 की उच्च विलेयता एवं तीव्र विसरण का कारण

कूपिका से रुधिर में ऑक्सीजन का आंशिक दाब अंतर $104 - 40 = \mathbf{64\text{ mmHg}}$ है, जो काफी अधिक है। परंतु रुधिर से कूपिका में कार्बन डाइऑक्साइड का आंशिक दाब अंतर मात्र $45 - 40 = \mathbf{5\text{ mmHg}}$ है, जो अत्यंत कम है।

जैवभौतिक व्याख्या: हेनरी के नियम के अनुसार विसरण दर दाब प्रवणता एवं विलेयता दोनों पर निर्भर करती है। रुधिर प्लाज्मा में कार्बन डाइऑक्साइड की विलेयता ऑक्सीजन की तुलना में 20 से 25 गुना अधिक ($\mathbf{20-25\times}$) होती है। अतः मात्र 5 mmHg के अल्प दाब प्रवणता पर भी प्रति मिनट विसरित होने वाली $\text{CO}_2$ की मात्रा ऑक्सीजन के बराबर ही तीव्र गति से विसरित हो जाती है।

मॉड्यूल 5: श्वसन गैसों का परिवहन एवं जैव रासायनिक प्रक्रम: बोहर एवंल्डेन प्रभाव

रुधिर फेफड़ों से ऊतकों तक ऑक्सीजन पहुँचाने तथा ऊतकों से फेफड़ों तक कार्बन डाइऑक्साइड वापस लाने का कार्य करता है। इस परिवहन में लाल रुधिर कणिकाएं (RBC), हीमोग्लोबिन एवं रुधिर प्लाज्मा विशिष्ट जैव रासायनिक भूमिका निभाते हैं।

1. ऑक्सीजन ($\text{O}_2$) का परिवहन एवं वियोजन वक्र

ऑक्सीजन रुधिर में दो रूपों में परिवहित होती है: (1) रुधिर प्लाज्मा में घुलित अवस्था में (~3%) तथा (2) ऑक्सीहीमोग्लोबिन ($\text{Hb}_4\text{O}_8$) के रूप में (~97%)।

  • सहकारिता (Cooperativity) एवं सिग्मॉइड वक्र: हीमोग्लोबिन के चार हीम समूहों से 4 ऑक्सीजन अणु जुड़ सकते हैं ($\text{Hb}_4 + 4\text{O}_2 \rightleftharpoons \text{Hb}_4\text{O}_8$)। एक अणु के जुड़ने से शेष अणुओं के जुड़ने की बंधुता बढ़ जाती है (धनात्मक सहकारिता)। अतः $p\text{O}_2$ के विरुद्ध हीमोग्लोबिन संतृप्ति का वक्र सिग्मॉइड या 'S'-आकार (Sigmoid Curve) का होता है।
  • $P_{50}$ मान: वह ऑक्सीजन आंशिक दाब जिस पर हीमोग्लोबिन 50% संतृप्त होता है, $P_{50}$ कहलाता है (सामान्य मान $26 - 28\text{ mmHg}$)।
  • बोहर प्रभाव (Bohr Effect): सक्रिय ऊतकों में जब (1) उच्च $p\text{CO}_2$, (2) उच्च $[\text{H}^+]$ (निम्न pH / अम्लीयता), (3) उच्च तापमान, तथा (4) उच्च $2,3\text{-BPG}$ होता है, तब हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन के प्रति बंधुता कम हो जाती है। परिणामस्वरूप वक्र दाईं ओर विस्थापित (Right Shift) हो जाता है और ऑक्सीजन सुगमता से ऊतकों में मुक्त हो जाती है।
  • परिवहित मात्रा: सामान्य विश्राम अवस्था में प्रत्येक 100 mL ऑक्सीकृत धमनी रुधिर ऊतकों को लगभग 5 mL $\text{O}_2$ प्रदान करता है।

2. कार्बन डाइऑक्साइड ($\text{CO}_2$) का परिवहन एवं क्लोराइड विस्थापन

ऊतकों में उत्पन्न $\text{CO}_2$ शिरा रुधिर द्वारा तीन रूपों में फेफड़ों तक ले जाई जाती है:

  1. प्लाज्मा में घुलित अवस्था में (~7%): प्लाज्मा के जल में सीधे भौतिक रूप से घुलकर।
  2. कार्बेमीनो-हीमोग्लोबिन के रूप में (~20 से 25%): $\text{CO}_2$ हीमोग्लोबिन के ग्लोबिन प्रोटीन के मुक्त अमीनो समूह ($-\text{NH}_2$) से जुड़कर कार्बेमीनो यौगिक बनाती है ($\text{Hb-NH}_2 + \text{CO}_2 \rightleftharpoons \text{Hb-NH-COO}^- + \text{H}^+$)। ऊतकों में विऑक्सीकृत हीमोग्लोबिन $\text{CO}_2$ को अधिक आसानी से बांधता है (हैल्डेन प्रभाव / Haldane Effect)।
  3. बाइकार्बोनेट आयन के रूप में ($\text{HCO}_3^-$, ~70% - मुख्य रूप): RBCs में जिंक युक्त कार्बोनिक एनहाइड्रेज (Carbonic Anhydrase) एंजाइम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है (प्लाज्मा में अत्यंत कम)। ऊतकों में उच्च $p\text{CO}_2$ की उपस्थिति में यह $\text{CO}_2$ व जल को जोड़कर कार्बोनिक अम्ल बनाता है, जो वियोजित होकर $\text{H}^+$ व $\text{HCO}_3^-$ देता है:
    $$\text{CO}_2 + \text{H}_2\text{O} \underset{\text{Carbonic Anhydrase}}{\overset{\text{ऊतकों पर}}{\rightleftharpoons}} \text{H}_2\text{CO}_3 \rightleftharpoons \text{H}^+ + \text{HCO}_3^-$$
क्लोराइड विस्थापन या हैमबर्गर प्रक्रम (Chloride Shift / Hamburger Phenomenon)

ऊतक केशिकाओं में RBC के भीतर $\text{HCO}_3^-$ की सांद्रता तेजी से बढ़ती है और यह एनायन एक्सचेंजर (Band 3 प्रोटीन) द्वारा प्लाज्मा में विसरित हो जाता है। इससे RBC के भीतर ऋणायनों की कमी हो जाती है। विद्युत तटस्थता बनाए रखने के लिए प्लाज्मा से क्लोराइड आयन ($\text{Cl}^-$) तेजी से RBC के भीतर प्रवेश करते हैं। इसे क्लोराइड विस्थापन कहते हैं। फेफड़ों में इसकी विपरीत प्रक्रिया होती है तथा प्रत्येक 100 mL अशुद्ध रुधिर कूपिकाओं को 4 mL $\text{CO}_2$ मुक्त करता है।

मॉड्यूल 6: श्वसन का तंत्रिकीय एवं रासायनिक नियमन तथा फुप्फुसीय विकार

मानव शरीर में श्वसन की दर और लय का नियमन तंत्रिका तंत्र एवं रासायनिक संवेदकों द्वारा अनैच्छिक रूप से नियंत्रित किया जाता है, जिससे विभिन्न उपापचयी स्थितियों में रुधिर में गैसों एवं अम्ल-क्षार का संतुलन स्थिर बना रहे।

नियामक केंद्र मस्तिष्क में स्थिति कार्यिकी एवं कार्यपद्धति
श्वसन लय केंद्र (Respiratory Rhythm Center) मेडुला ऑबलांगाटा (मस्तिष्क स्तंभ) मुख्य नियंत्रक। पृष्ठीय श्वसन समूह (DRG) अंतःश्वसन की लय उत्पन्न कर डायफ्राम व EICM को संकुचित करता है; अधरीय श्वसन समूह (VRG) बलपूर्वक श्वसन के समय सक्रिय होता है।
न्यूमोटैक्सिक केंद्र (Pneumotaxic Center) पोंस के ऊपरी पृष्ठीय भाग में मेडुला के अंतःश्वसन केंद्र को निरोधी संकेत भेजकर अंतःश्वसन को बंद करने वाले "ऑफ-स्विच" का कार्य करता है। यह अंतःश्वसन की अवधि कम कर श्वसन दर बढ़ा सकता है।
केंद्रीय रसायन-संवेदी क्षेत्र मेडुला के अधर तल पर मस्तिष्क-मेरुद्रव ($\text{CSF}$) के संपर्क में। धमनी रुधिर में $p\text{CO}_2$ एवं $[\text{H}^+]$ वृद्धि के प्रति अत्यंत संवेदनशील। उद्दीप्त होकर लय केंद्र को तीव्र श्वसन का आदेश देता है।
परिधीय रसायन-संवेदी ग्राही महाधमनी पिंड (Aortic body) एवं ग्रीवा पिंड (Carotid body) वैगस एवं ग्लोसोफैरिंजियल तंत्रिकाओं द्वारा जुड़े। रुधिर में $p\text{CO}_2$, अम्लता ($[\text{H}^+]$) तथा गंभीर हाइपोक्सिया ($p\text{O}_2 < 60\text{ mmHg}$) को पहचानते हैं।
बोर्ड परीक्षा हेतु अति महत्वपूर्ण तथ्य: सामान्य शांत श्वसन के नियमन में ऑक्सीजन ($\text{O}_2$) की भूमिका सर्वथा नगण्य होती है। श्वसन का प्राथमिक प्रेरक रुधिर में कार्बन डाइऑक्साइड ($p\text{CO}_2$) एवं हाइड्रोजन आयन सांद्रता ($[\text{H}^+]$) की वृद्धि है।

प्रमुख श्वसन एवं फुप्फुसीय विकार

  • दमा / अस्थमा (Asthma): श्वसनी एवं श्वसनिकाओं का दीर्घकालिक एलर्जी जन्य शोथ (सूजन)। इसमें श्वास मार्ग की चिकनी पेशियों में ऐंठन (Bronchospasm), श्लेष्मा झिल्ली की सूजन तथा अत्यधिक चिपचिपा कफ बनता है, जिससे निःश्वसन के समय सीटी जैसी आवाज (Wheezing) तथा गंभीर श्वास कष्ट होता है। यह धूल, परागकण जैसे एलर्जेंस से भड़कता है।
  • वातस्फीति (Emphysema): यह एक दीर्घकालिक अवरोधक फुप्फुसीय रोग (COPD) है जिसमें कूपिका भित्तियां स्थायी रूप से नष्ट हो जाती हैं और फेफड़ों का प्रत्यास्थ खिंचाव समाप्त हो जाता है। कूपिकाएं मिलकर बड़े-बड़े वायु कोष्ठ बना लेती हैं जिससे गैस विनिमय की सतह अत्यधिक घट जाती है। निःश्वसन में वायु फेफड़ों में फंस जाती है (बैरल चेस्ट)। मुख्य कारण: अत्यधिक धूम्रपान (सिगरेट पीना)।
  • व्यावसायिक श्वसन विकार (Occupational Lung Diseases / Pneumoconiosis): खदानों, पत्थर तोड़ने के कारखानों में धूल के लंबे समय तक अंतःश्वसन से फेफड़ों में रेशेदार ऊतक की अत्यधिक वृद्धि (रेशामयता / फाइब्रोसिस) हो जाती है:
    • सिलिकोसिस (Silicosis): सिलिका ($\text{SiO}_2$) धूल के सांस में जाने से फुप्फुसीय फाइब्रोसिस होता है।
    • एस्बेस्टॉसिस (Asbestosis): एस्बेस्टस रेशों के कारण फाइब्रोसिस एवं मेसोथीलियोमा कैंसर का जोखिम बढ़ता है।
  • तुंगता बीमारी (Mountain Sickness): उच्च पर्वतीय क्षेत्रों ($>2,500$ मीटर) पर कम वायुमंडलीय दाब के कारण ऑक्सीजन आंशिक दाब घट जाता है (हाइपोक्सिया)। इससे सिरदर्द, मतली, अनिद्रा व थकान होती है। अनुकूलन: वृक्क एरिथ्रोपॉइटिन (EPO) हॉर्मोन स्रावित करता है जो अस्थिमज्जा को RBC संख्या बढ़ाने (पॉलीसाइथीमिया) एवं हीमोग्लोबिन स्तर बढ़ाने हेतु प्रेरित करता है।
  • कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) विषाक्तता: हीमोग्लोबिन के प्रति CO की बंधुता ऑक्सीजन से 200 से 250 गुना अधिक होती है। यह स्थायी कार्बॉक्सीहीमोग्लोबिन (COHb) बनाकर ऑक्सीजन परिवहन को पूरी तरह ठप कर देती है, जिससे ऊतकों में ऑक्सीजन की भारी कमी से व्यक्ति अचेत होकर दम घुटने से मर जाता है।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

मिनट श्वसन आयतन (Minute Respiratory Volume)
विश्राम में स्वस्थ वयस्क में 6.0 से 8.0 लीटर/मिनट
प्रति मिनट फेफड़ों में अंतःश्वसित या निःश्वसित कुल वायु का आयतन, जो ज्वारीय आयतन को श्वसन दर से गुणा करके प्राप्त होता है।
कूपिकीय संवातन दर (Alveolar Ventilation Rate)
4,200 mL/मिनट (गैस विनिमय में भाग लेने वाली वास्तविक प्रभावी वायु)
संवहन मार्ग के मृत अवकाश को घटाकर प्रति मिनट वास्तव में कूपिकाओं तक पहुँचने वाली ताजी वायु की मात्रा।
जैव क्षमता (Vital Capacity - VC) योग सूत्र
3,500 से 4,600 mL (वयस्क सामान्य मान)
अधिकतम अंतःश्वसन के पश्चात बलपूर्वक बाहर निकाली जा सकने वाली अधिकतम वायु। फेफड़ों की कार्यक्षमता का मुख्य नैदानिक पैमाना।
कुल फुप्फुस क्षमता (Total Lung Capacity - TLC)
5,000 से 6,000 mL (वयस्क)
अधिकतम अंतःश्वसन के बाद फेफड़ों में समा सकने वाली कुल वायु। इसे स्पाइरोमीटर द्वारा सीधे नहीं मापा जा सकता।
कार्बोनिक एनहाइड्रेज बाइकार्बोनेट रूपांतरण अभिक्रिया
रुधिर में कुल CO2 का लगभग 70% बाइकार्बोनेट रूप में परिवहित होता है
RBC में जिंक युक्त कार्बोनिक एनहाइड्रेज एंजाइम द्वारा संचालित उत्क्रमणीय अभिक्रिया जो रुधिर का pH संतुलन बनाए रखती है।
श्वसन गैस आपूर्ति रससमीकरणमिति (विश्राम मान)
O2 आपूर्ति: 5 mL/dL | CO2 मुक्ति: 4 mL/dL
सामान्य विश्राम अवस्था में परिसंचरण तंत्र द्वारा प्रति 100 mL रुधिर में परिवहित गैसों की शुद्ध मात्रा।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
मनुष्य में सामान्य अंतःश्वसन एवं निःश्वसन की जैवभौतिक क्रियाविधि समझाइए। बलपूर्वक निःश्वसन सामान्य निःश्वसन से किस प्रकार भिन्न है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पहला भाग: सामान्य अंतःश्वसन एवं निःश्वसन की क्रियाविधि (3 अंक):
मनुष्य में फुप्फुसीय संवातन बॉयल के नियम ($P \propto \frac{1}{V}$) के अनुसार वक्ष गुहा के आयतन परिवर्तन द्वारा उत्पन्न दाब प्रवणता पर निर्भर करता है:

  1. अंतःश्वसन (सक्रिय प्रक्रिया, अवधि ~2 सेकंड):
    • तनुपट (डायफ्राम) का संकुचन: फ्रेनिक तंत्रिकाओं की प्रेरणा से गुंबदाकार डायफ्राम संकुचित होकर चपटा हो जाता है, जिससे वक्ष गुहा का आयतन अग्र-पश्च अक्ष में बढ़ जाता है।
    • बाह्य अंतरापर्शुक पेशियों (EICM) का संकुचन: EICM के संकुचन से पसलियां और उरोस्थि ऊपर और बाहर उठती हैं, जिससे वक्ष गुहा पृष्ठ-अधर अक्ष में फैलती है।
    • दाब प्रवणता: वक्ष गुहा का आयतन बढ़ने से फेफड़े फैलते हैं और अंतःफुप्फुसीय दाब वायुमंडलीय दाब से $-1\text{ mmHg}$ ($759\text{ mmHg}$) कम हो जाता है, जिससे वायु बाहर से फेफड़ों में प्रवेश कर जाती है।
  2. निःश्वसन (निष्क्रिय प्रक्रिया, अवधि ~3 सेकंड):
    • डायफ्राम शिथिल होकर पुनः गुंबदाकार हो जाता है तथा बाह्य अंतरापर्शुक पेशियां शिथिल होकर पसलियों को नीचे लाती हैं।
    • फेफड़ों के प्रत्यास्थ प्रतिक्षेप से अंतःफुप्फुसीय दाब $+1\text{ mmHg}$ ($761\text{ mmHg}$) बढ़ जाता है और वायु बिना किसी ऊर्जा व्यय के बाहर निकल जाती है।

    दूसरा भाग: बलपूर्वक निःश्वसन से अंतर (2 अंक):
    • सामान्य निःश्वसन पेशियों के शिथिलन पर आधारित एक निष्क्रिय प्रक्रम है, जबकि बलपूर्वक निःश्वसन (व्यायाम, खांसने आदि में) एक सक्रिय प्रक्रम (एटीपी व्ययकारी) है।
    • बलपूर्वक निःश्वसन में आंतरिक अंतरापर्शुक पेशियां (IICM) संकुचित होकर पसलियों को नीचे व भीतर खींचती हैं तथा उदर पेशियां संकुचित होकर उदर अंगों को डायफ्राम पर ऊपर दबाती हैं, जिससे अंतःफुप्फुसीय दाब $+20\text{ से }+30\text{ mmHg}$ तक बढ़कर वायु को तीव्रता से बाहर निकालता है।
उदाहरण 2
ज्वारीय आयतन (TV), अवशिष्ट आयतन (RV), जैव क्षमता (VC) तथा कुल फुप्फुस क्षमता (TLC) को परिभाषित कीजिए। साधारण स्पाइरोमीटर द्वारा अवशिष्ट आयतन क्यों नहीं मापा जा सकता? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पहला भाग: परिभाषाएं एवं सामान्य मान (3 अंक):

  1. ज्वारीय आयतन (TV): सामान्य शांत श्वसन में अंतःश्वसित या निःश्वसित वायु का आयतन। सामान्य मान = 500 mL।
  2. अवशिष्ट आयतन (RV): अधिकतम बलपूर्वक निःश्वसन के बाद भी फेफड़ों में शेष रहने वाली वायु का आयतन। सामान्य मान = 1100 – 1200 mL। यह फेफड़ों को पिचकने से रोकता है।
  3. जैव क्षमता (VC): अधिकतम अंतःश्वसन के पश्चात बलपूर्वक बाहर निकाली जा सकने वाली अधिकतम वायु:

$$\text{VC} = \text{ERV} + \text{TV} + \text{IRV} = 1100 + 500 + 3000 = \mathbf{3,500 - 4,600\text{ mL}}$$


4. कुल फुप्फुस क्षमता (TLC): अधिकतम अंतःश्वसन के बाद फेफड़ों में समा सकने वाली कुल वायु:

$$\text{TLC} = \text{VC} + \text{RV} = \mathbf{5,000 - 6,000\text{ mL}}$$



दूसरा भाग: स्पाइरोमीटर द्वारा RV न मापे जाने का कारण (2 अंक):
• स्पाइरोमीटर उपकरण केवल उसी वायु के आयतन को माप सकता है जो मुख मार्ग से फेफड़ों के भीतर जाती है या बाहर निकलती है।
• अवशिष्ट आयतन (RV) वह वायु है जो कूपिकाओं एवं श्वास मार्गों में स्थायी रूप से बंधी रहती है और मनुष्य अधिकतम बल लगाकर भी इसे कभी बाहर नहीं निकाल सकता।
• चूँकि यह वायु कभी भी फेफड़ों से बाहर निकलकर स्पाइरोमीटर के कक्ष में प्रवेश नहीं करती, अतः इसे स्पाइरोमीटर द्वारा सीधे मापना असंभव है। इसी कारण RV युक्त FRC एवं TLC को भी साधारण स्पाइरोमीटर से नहीं मापा जा सकता (इसके लिए हीलियम तनुकरण विधि का उपयोग किया जाता है)।

उदाहरण 3
वायुमंडलीय वायु, कूपिका, अनॉक्सीकृत रुधिर, ऑक्सीकृत रुधिर तथा ऊतकों में ऑक्सीजन (pO2) एवं कार्बन डाइऑक्साइड (pCO2) के आंशिक दाब की तुलनात्मक तालिका बनाइए। अल्प दाब प्रवणता के बावजूद CO2 का विसरण तीव्र क्यों होता है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
पहला भाग: आंशिक दाब की तुलनात्मक तालिका (3 अंक):
श्वसन गैस वायुमंडल (mmHg) कूपिका वायु (mmHg) अनॉक्सीकृत रुधिर (mmHg) ऑक्सीकृत रुधिर (mmHg) ऊतक (mmHg)
ऑक्सीजन ($p\text{O}_2$) 159 104 40 95 40
कार्बन डाइऑक्साइड ($p\text{CO}_2$) 0.3 40 45 40 45

दूसरा भाग: अल्प दाब प्रवणता पर भी CO2 के तीव्र विसरण का कारण (2 अंक):
• कूपिका और रुधिर के बीच ऑक्सीजन का आंशिक दाब अंतर $104 - 40 = \mathbf{64\text{ mmHg}}$ है, जो काफी अधिक है।
• जबकि रुधिर और कूपिका के बीच कार्बन डाइऑक्साइड का आंशिक दाब अंतर मात्र $45 - 40 = \mathbf{5\text{ mmHg}}$ है।
• जैवभौतिक कारण: विसरण दर दाब प्रवणता एवं गैस की विलेयता दोनों पर निर्भर करती है।
• रुधिर प्लाज्मा में कार्बन डाइऑक्साइड की विलेयता ऑक्सीजन से 20 से 25 गुना अधिक ($\mathbf{20-25\times}$) होती है। इस अत्यधिक विलेयता के कारण मात्र 5 mmHg के अल्प दाब अंतर पर भी प्रति मिनट विसरित होने वाली $\text{CO}_2$ की मात्रा ऑक्सीजन के बराबर ही प्रभावी रूप से विसरित हो जाती है।
उदाहरण 4
कार्बोनिक एनहाइड्रेज की भूमिका एवं क्लोराइड विस्थापन (हैमबर्गर प्रक्रम) का उल्लेख करते हुए रुधिर में कार्बन डाइऑक्साइड के परिवहन का वर्णन कीजिए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पहला भाग: कार्बन डाइऑक्साइड परिवहन के तीन रूप (3 अंक):
ऊतकों में उत्पन्न $\text{CO}_2$ रुधिर द्वारा तीन रूपों में फेफड़ों तक ले जाई जाती है:

  1. प्लाज्मा में घुलित अवस्था में (~7%): प्लाज्मा जल में सीधे भौतिक रूप से घुलकर।
  2. कार्बेमीनो-हीमोग्लोबिन के रूप में (~20 से 25%): RBCs में $\text{CO}_2$ हीमोग्लोबिन के ग्लोबिन के अमीनो समूह से जुड़ती है (हैल्डेन प्रभाव के कारण ऊतकों में विऑक्सीकृत हीमोग्लोबिन इसे अधिक बांधता है):

$$\text{Hb-NH}_2 + \text{CO}_2 \rightleftharpoons \text{Hb-NH-COO}^- + \text{H}^+$$


3. बाइकार्बोनेट आयन के रूप में ($\text{HCO}_3^-$, ~70% - मुख्य रूप): RBCs में जिंक युक्त कार्बोनिक एनहाइड्रेज (Carbonic Anhydrase) एंजाइम प्रचुर मात्रा में होता है। ऊतकों पर उच्च $p\text{CO}_2$ पर यह $\text{CO}_2$ व जल से कार्बोनिक अम्ल बनाता है जो वियोजित होकर $\text{H}^+$ व $\text{HCO}_3^-$ देता है:

$$\text{CO}_2 + \text{H}_2\text{O} \underset{\text{Carbonic Anhydrase}}{\overset{\text{ऊतकों पर}}{\rightleftharpoons}} \text{H}_2\text{CO}_3 \rightleftharpoons \text{H}^+ + \text{HCO}_3^-$$



दूसरा भाग: क्लोराइड विस्थापन या हैमबर्गर प्रक्रम (2 अंक):
• ऊतकों में RBC के भीतर निर्मित $\text{HCO}_3^-$ आयन सांद्रता प्रवणता के कारण Band 3 एनायन एक्सचेंजर द्वारा प्लाज्मा में बाहर आ जाते हैं।
• इससे RBC के भीतर ऋणायनों की कमी हो जाती है जिससे विद्युत संतुलन बिगड़ता है।
• विद्युत तटस्थता बनाए रखने के लिए रुधिर प्लाज्मा से क्लोराइड आयन ($\text{Cl}^-$) तेजी से RBC के भीतर प्रवेश करते हैं।
• इस प्रक्रिया को क्लोराइड विस्थापन या हैमबर्गर प्रक्रम (Hamburger Phenomenon) कहते हैं। फेफड़ों में यह प्रक्रम विपरीत होता है तथा प्रति 100 mL रुधिर कूपिकाओं को 4 mL $\text{CO}_2$ प्रदान करता है।

उदाहरण 5
ऑक्सीजन-हीमोग्लोबिन वियोजन वक्र का वर्णन कीजिए। वक्र को दाईं ओर विस्थापित करने वाले कारक (बोहर प्रभाव) कौन-से हैं और ऊतक श्वसन में इसका क्या महत्व है? [2 + 3 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पहला भाग: ऑक्सीजन-हीमोग्लोबिन वियोजन वक्र (2 अंक):
• ऑक्सीजन के आंशिक दाब ($p\text{O}_2$) और हीमोग्लोबिन की प्रतिशत संतृप्ति के बीच खींचा गया आलेख एक विशिष्ट सिग्मॉइड या 'S'-आकार का वक्र (Sigmoid Curve) होता है।
• सहकारिता (Cooperativity): हीमोग्लोबिन से पहले ऑक्सीजन अणु का जुड़ना शेष तीन हीम समूहों की ऑक्सीजन के प्रति बंधुता को उत्तरोत्तर बढ़ाता है, जिसके कारण वक्र सिग्मॉइड रूप लेता है।
• $P_{50}$ मान: वह आंशिक दाब जिस पर हीमोग्लोबिन 50% संतृप्त होता है (सामान्य मान $26 - 28\text{ mmHg}$)।

दूसरा भाग: दाईं ओर विस्थापन के कारक (बोहर प्रभाव) एवं महत्व (3 अंक):
वक्र का दाईं ओर विस्थापित होना (Right Shift) यह दर्शाता है कि हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन के प्रति बंधुता घट गई है (अर्थात $P_{50}$ बढ़ गया है) और ऑक्सीजन आसानी से मुक्त हो रही है। क्रिश्चियन बोहर (1904) के अनुसार ऊतकों पर निम्नलिखित चार कारकों द्वारा यह विस्थापन होता है जिसे बोहर प्रभाव (Bohr Effect) कहते हैं:

  1. उच्च $p\text{CO}_2$: सक्रिय ऊतकों में अधिक $\text{CO}_2$ का उत्पादन ($45\text{ mmHg}$)।
  2. उच्च $[\text{H}^+]$ या कम pH (अम्लीयता): कार्बोनिक व लैक्टिक अम्लों की वृद्धि।
  3. उच्च तापमान: पेशी संकुचन व उपापचय से उत्पन्न ऊष्मा।
  4. उच्च $2,3\text{-बिसफॉस्फोग्लिसरेट (2,3-BPG)}$: RBCs के ग्लाइकोलिसिस का उप-उत्पाद।
    • कार्यिकी महत्व: फेफड़ों में उच्च $p\text{O}_2$ पर वक्र बाईं ओर रहकर ऑक्सीजन ग्रहण करता है, परंतु सक्रिय ऊतकों में बोहर प्रभाव के कारण वक्र दाईं ओर खिसक जाता है, जिससे हीमोग्लोबिन तीव्रता से ऑक्सीजन छोड़ता है। इस प्रकार प्रति 100 mL रुधिर द्वारा लगभग 5 mL $\text{O}_2$ सीधे उपापचयी ऊतकों को उपलब्ध कराई जाती है।
उदाहरण 6
मनुष्य में श्वसन के तंत्रिकीय एवं रासायनिक नियमन की विवेचना कीजिए। न्यूमोटैक्सिक केंद्र तथा रसायन-संवेदी ग्राहियों की क्या भूमिका है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पहला भाग: श्वसन का तंत्रिकीय नियमन (3 अंक):
मनुष्य में श्वसन मस्तिष्क स्तंभ के तंत्रिका केंद्रों द्वारा अनैच्छिक रूप से नियंत्रित होता है:

  1. श्वसन लय केंद्र (Respiratory Rhythm Center - RRC): यह मेडुला ऑबलांगाटा में स्थित प्राथमिक केंद्र है। इसमें दो समूह होते हैं: पृष्ठीय श्वसन समूह (DRG), जो अंतःश्वसन की मूल लय बनाकर डायफ्राम व EICM को संकुचित करता है; तथा अधरीय श्वसन समूह (VRG), जो सामान्यतः शांत श्वसन में निष्क्रिय रहता है परंतु बलपूर्वक श्वसन में अंतःश्वसन व निःश्वसन दोनों को सक्रिय करता है।
  2. एप्न्यूस्टिक केंद्र: पोंस के निचले भाग में स्थित, जो अंतःश्वसन को प्रदीर्घ करता है।

    दूसरा भाग: न्यूमोटैक्सिक केंद्र एवं रसायन-संवेदी ग्राहियों की भूमिका (2 अंक):
  3. न्यूमोटैक्सिक केंद्र (Pneumotaxic Center):
    • यह पोंस के ऊपरी पृष्ठीय भाग में स्थित होता है।
    • यह मेडुला के अंतःश्वसन केंद्र को निरोधी संकेत भेजकर अंतःश्वसन को बंद करने वाले "स्विच" (Off-switch) के रूप में कार्य करता है।
    • इसके मजबूत संकेत अंतःश्वसन की अवधि को घटा देते हैं, जिससे फेफड़े अधिक नहीं फैलते और श्वसन की दर बढ़ जाती है।
  4. रसायन-संवेदी ग्राहियों की भूमिका:
    • केंद्रीय ग्राही: मेडुला के अधर तल पर CSF में स्थित। यह धमनी रुधिर में $p\text{CO}_2$ एवं $[\text{H}^+]$ वृद्धि के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं।
    • परिधीय ग्राही: कैरोटिड एवं एओर्टिक पिंडों में स्थित। यह $p\text{CO}_2$, अम्लता तथा गंभीर हाइपोक्सिया ($p\text{O}_2 < 60\text{ mmHg}$) को पहचानकर लय केंद्र को उद्दीप्त करते हैं।
    • स्मरण रहे: सामान्य शांत श्वसन नियमन में $\text{O}_2$ की भूमिका नगण्य होती है; $\text{CO}_2$ एवं $\text{H}^+$ ही मुख्य नियामक हैं।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि सामान्य शांत श्वसन के नियमन हेतु रुधिर में ऑक्सीजन (O2) का स्तर प्राथमिक नियामक संकेत है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मान लेना कि अवशिष्ट आयतन (RV), FRC या कुल फुप्फुस क्षमता (TLC) को साधारण स्पाइरोमीटर से मापा जा सकता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

दमा (Asthma) और वातस्फीति (Emphysema) के रोग-क्रियात्मक अंतर में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि कार्बेमीनो-हीमोग्लोबिन बनते समय CO2 हीम के लोहे (Fe2+) से जुड़ती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सामान्य निःश्वसन को भी सक्रिय पेशीय संकुचन प्रक्रिया समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

15 श्वसन और गैसों का विनिमय: संवातन क्रियाविधि, स्पाइरोमेट्री एवं गैस परिवहन पश्चिम बंगाल बोर्ड कक्षा 11 जीव विज्ञान • इकाई 5: मानव कार्यिकी • संपूर्ण वैचारिक संकल्पना मानचित्र 1. श्वसन मार्ग की संरचना एवं संवातन श्वसन मार्ग एवं द्विशाखन • श्वासनली (Trachea): 16-20 C-आकार के उपास्थि वलय • 5वीं वक्षीय कशेरुका (T₅) पर प्राथमिक श्वसनी में विभाजन चालन भाग (वायु का निस्पंदन/आर्द्रन) बनाम विनिमय भाग (कूपिकाएं) संवातन (श्वास लेने) की क्रियाविधि: अंतःश्वसन / प्रश्वसन (सक्रिय, ~2 सेकंड) • डायफ्राम का संकुचन (चपटा होना → अग्र-पश्च आयतन ↑) • बाह्य अंतरापर्शुक पेशियां संकुचित → पसलियां ऊपर/बाहर वक्षीय आयतन ↑ → अंतःफुप्फुसी दाब वायुमंडलीय से कम (-1 mmHg) उच्छ्वसन / निःश्वसन (निष्क्रिय, ~3 सेकंड) • डायफ्राम एवं पेशियों का शिथिलन (डायफ्राम गुंबदाकार) • वक्षीय आयतन घटता है → फेफड़ों का दाब बढ़ता है (+1 mmHg) बलपूर्वक उच्छ्वसन: आंतरिक अंतरापर्शुक व उदर पेशियां संकुचित विसरण झिल्ली (मोटाई < 0.5 माइक्रोमीटर) 1. कूपिका की पतली सरल शल्की उपकला (टाइप-1) 2. फुप्फुसीय रक्त केशिका का अंतःस्तर (एंडोथीलियम) 3. दोनों के मध्य स्थित आधारीय द्रव्य (Basement substance) टाइप-2 कोशिकाएं सर्फेक्टेंट स्रावित कर पिचकने से रोकती हैं फुप्फुसावरण (प्लूरल गुहा) का ऋणात्मक दाब: पैराइटल व विसरल प्लूरा के बीच का तरल घर्षणहीन संचलन देता है 2. फुप्फुसीय आयतन एवं धारिताएं (स्पाइरोमेट्री) श्वसन आयतन (स्पाइरोमीटर द्वारा मापने योग्य) • ज्वारीय आयतन (Tidal Volume - TV): 500 mL (6-8 L/min) सामान्य शांत श्वसन में ली गई या छोड़ी गई वायु • अंतःश्वसन सुरक्षित आयतन (IRV): 2500 - 3000 mL सामान्य अंतःश्वसन के बाद बलपूर्वक खींची गई अतिरिक्त वायु • निःश्वसन सुरक्षित आयतन (ERV): 1000 - 1100 mL सामान्य निःश्वसन के बाद बलपूर्वक बाहर निकाली गई अतिरिक्त वायु • अवशिष्ट आयतन (Residual Volume - RV): 1100-1200 mL अधिकतम निःश्वसन के बाद बची वायु • स्पाइरोमीटर से नहीं माप सकते! मृत अवकाश आयतन (Dead Space) = 150 mL फुप्फुसीय धारिताएं (आयतन का योग) 1. अंतःश्वसन क्षमता (IC): TV + IRV → 3000 से 3500 mL (सामान्य निःश्वसन के बाद अधिकतम वायु) 2. निःश्वसन क्षमता (EC): TV + ERV → 1500 से 1600 mL (सामान्य अंतःश्वसन के बाद छोड़ी वायु) 3. क्रियाशील अवशिष्ट क्षमता (FRC): ERV + RV → 2100 से 2300 mL (शांत निःश्वसन के बाद शेष वायु) 4. जैव क्षमता (VITAL CAPACITY - VC): ERV + TV + IRV → 3500 से 4600 mL (अधिकतम संवातन वायु) 5. कुल फेफड़ों की क्षमता (TLC): VC + RV → 5000 से 6000 mL (फेफड़ों में समा सकने वाली अधिकतम वायु) ध्यान दें: FRC और TLC को स्पाइरोमीटर द्वारा नहीं मापा जा सकता 3. गैस विनिमय, परिवहन एवं नियमन आंशिक दाब (mmHg) एवं विसरण प्रवणता कूपिका वायु: pO₂ = 104, pCO₂ = 40 अनॉक्सीकृत रुधिर: pO₂ = 40, pCO₂ = 45 ऑक्सीकृत रुधिर: pO₂ = 95, pCO₂ = 40 प्लाज्मा में CO₂ की विलेयता O₂ से 20-25 गुना अधिक है! श्वसन गैसों का परिवहन ऑक्सीजन (O₂) का परिवहन: • 97% ऑक्सीहीमोग्लोबिन (Hb₄O₈) + 3% प्लाज्मा में घुली • सिग्मॉइड वक्र; 100 mL रुधिर ऊतकों को 5 mL O₂ देता है बोहर प्रभाव: pCO₂, H⁺, ताप बढ़ने पर वक्र दाईं ओर विस्थापित कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का परिवहन: • 70% बाइकार्बोनेट (HCO₃⁻) रूप में (कार्बोनिक एनहाइड्रेज) • क्लोराइड विस्थापन (हैमबर्गर): ऊतकों पर Cl⁻ RBC में प्रवेश • 20-25% कार्बेमीनो-हीमोग्लोबिन + 7% प्लाज्मा में घुली • 100 mL अशुद्ध रुधिर कूपिकाओं को 4 mL CO₂ देता है श्वसन नियमन एवं फुप्फुसीय विकार • मेडुला: श्वसन लय केंद्र (Respiratory Rhythm Center) • पोंस: न्यूमोटैक्सिक केंद्र (अंतःश्वसन अवधि कम करता है) • रसायन-संवेदी क्षेत्र CO₂ व H⁺ पहचानता है (O₂ नगण्य!) • वातस्फीति (Emphysema): कूपिका भित्ति नष्ट (धूम्रपान) • दमा (Asthma): श्वसनियों में सूजन व ऐंठन (एलर्जी) • सिलिकोसिस / एस्बेस्टॉसिस: व्यावसायिक फुप्फुस तंतुमयता

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
मानव श्वसन तंत्र संवहन क्षेत्र (वायु संवहन, शोधन, आर्द्रता व तापन) तथा विनिमय क्षेत्र (30 करोड़ कूपिकाएं, 70-100 वर्ग मीटर सतह) में बंटा है।
मुख्य बिंदु 2
श्वासनली 16-20 C-आकार के हाइलिन उपास्थि छल्लों द्वारा सुरक्षित रहती है तथा 5वीं वक्षीय कशेरुका (T5) पर प्राथमिक श्वसनियों में विभाजित होती है।
मुख्य बिंदु 3
सामान्य अंतःश्वसन सक्रिय है: डायफ्राम चपटा होता है एवं EICM पसलियां उठाती हैं, जिससे अंतःफुप्फुसीय दाब -1 mmHg कम होकर वायु भीतर आती है।
मुख्य बिंदु 4
सामान्य निःश्वसन निष्क्रिय है: पेशी शिथिलन व प्रत्यास्थ प्रतिक्षेप से दाब +1 mmHg बढ़ता है। बलपूर्वक निःश्वसन IICM व उदर पेशियों द्वारा सक्रिय होता है।
मुख्य बिंदु 5
Type II न्यूमोसाइट्स द्वारा स्रावित फुप्फुसीय सर्फेक्टेंट (DPPC) पृष्ठ तनाव घटाकर कूपिकाओं को पिचकने (atelectasis) से बचाता है।
मुख्य बिंदु 6
ज्वारीय आयतन 500 mL; जैव क्षमता 3500-4600 mL; कुल फुप्फुस क्षमता 5000-6000 mL होती है।
मुख्य बिंदु 7
अवशिष्ट आयतन (RV = 1100-1200 mL) बाहर न निकाले जाने के कारण स्पाइरोमीटर द्वारा RV, FRC एवं TLC नहीं मापे जा सकते।
मुख्य बिंदु 8
विसरण झिल्ली 0.5 माइक्रोमीटर से पतली होती है। प्लाज्मा में CO2 की विलेयता O2 से 20-25 गुना अधिक होने से मात्र 5 mmHg अंतर पर भी CO2 तीव्रता से विसरित होती है।
मुख्य बिंदु 9
ऑक्सीजन 97% ऑक्सीहीमोग्लोबिन के रूप में परिवहित होती है; बोहर प्रभाव में उच्च pCO2, अम्लता व ताप पर वक्र दाईं ओर खिसककर ऊतकों में O2 मुक्त करता है।
मुख्य बिंदु 10
कार्बन डाइऑक्साइड 70% बाइकार्बोनेट (कार्बोनिक एनहाइड्रेज व क्लोराइड विस्थापन द्वारा), 20-25% कार्बेमीनो-हीमोग्लोबिन तथा 7% प्लाज्मा में घुलित रूप में परिवहित होती है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
मुख की अपेक्षा नाक से सांस लेना कार्यिकीय रूप से अधिक स्वास्थ्यवर्धक क्यों है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: नासा गुहा कूटस्तरित पक्ष्माभी उपकला, गॉब्लेट कोशिकाओं एवं सघन रक्त जालकों से युक्त होती है। यह श्लेष्मा व पक्ष्माभों द्वारा धूल-जीवाणुओं को छानती है (म्यूकोसिलियरी एस्केलेटर), वायु को 100% आर्द्र करती है तथा फेफड़ों तक पहुँचने से पूर्व शरीर के तापमान (37°C) पर लाती है। मुख से सांस लेने पर यह शोधन व अनुकूलन नहीं हो पाता।
2
वक्ष भित्ति पर छुरा लगने से यदि पैराइटल प्लूरा में छेद हो जाए तो फेफड़े पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्लूरल गुहा में वायुमंडलीय वायु (760 mmHg) प्रवेश कर सामान्य ऋणात्मक अंतराफुप्फुसीय दाब (-4 mmHg) को समाप्त कर देगी। इस स्थिति को न्यूमोथोरैक्स (Pneumothorax) कहते हैं। वक्ष भित्ति से फेफड़े को साधे रखने वाला खिंचाव समाप्त होने से उस तरफ का लोचदार फेफड़ा तुरंत पूरी तरह पिचक (atelectasis) जाएगा।
3
शारीरिक ऊतकों की केशिकाओं में क्लोराइड विस्थापन RBCs की विद्युत तटस्थता को कैसे बनाए रखता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: ऊतकों में RBC के भीतर कार्बोनिक एनहाइड्रेज द्वारा अत्यधिक मात्रा में HCO3- व H+ बनते हैं। ऋणायन HCO3- सांद्रता प्रवणता के कारण RBC से प्लाज्मा में विसरित हो जाते हैं, जिससे RBC के भीतर धनायनों की अधिकता हो जाती है। विद्युत तटस्थता बनाए रखने के लिए प्लाज्मा से Cl- आयन एनायन चैनल द्वारा RBC के भीतर प्रवेश करते हैं।
4
वातस्फीति (Emphysema) रोग में धूम्रपान करने वालों की छाती बैरल जैसी (Barrel Chest) क्यों फूल जाती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सिगरेट के धुएं के कारण कूपिका भित्तियां व इलास्टिन तंतु नष्ट हो जाते हैं। इससे कूपिकाओं का विसरण क्षेत्र घट जाता है तथा फेफड़ों का प्रत्यास्थ खिंचाव समाप्त होने से निःश्वसन में वायु फेफड़ों में ही फंसी रह जाती है। इस वायु संचय व अति-प्रसार के कारण वक्ष गुहा स्थायी रूप से फूलकर बैरल चेस्ट का रूप ले लेती है।
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पानी के भीतर गोता लगाने से ठीक पहले अत्यधिक तेज श्वसन (Hyperventilation) करने से बेहोश होने का खतरा क्यों बढ़ जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अति-संवातन शरीर से भारी मात्रा में CO2 निकाल देता है (हाइपोकैपनिया), जबकि ऑक्सीजन में कोई खास वृद्धि नहीं होती (Hb पहले से ही ~98% संतृप्त होता है)। मस्तिष्क का श्वसन केंद्र CO2 द्वारा उद्दीप्त होता है। रुधिर में CO2 कम होने से गोताखोर को सांस लेने की इच्छा महसूस नहीं होती और पानी के भीतर ऑक्सीजन समाप्त होते ही वह अचानक बेहोश (Shallow-water blackout) हो जाता है।
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अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

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