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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 17
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन

उत्सर्जन वह आवश्यक जैविक प्रक्रम है जिसके द्वारा शरीर में प्रोटीन एवं न्यूक्लिक अम्ल के उपापचय के फलस्वरूप उत्पन्न हानिकारक नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों—जैसे अमोनिया, यूरिया तथा यूरिक अम्ल—को शरीर से बाहर निकाला जाता है। मानव का उत्सर्जी तंत्र एक जोड़ी वृक्क, एक जोड़ी मूत्रवाहिनी, एक मूत्राशय तथा एक मूत्रमार्ग से मिलकर बना होता है। यह तंत्र न केवल अपशिष्टों का निष्कासन करता है, अपितु शरीर के परासरणी दाब, जल-संतुलन, विद्युत-अपघट्यों के स्तर, रुधिर के अम्ल-क्षार संतुलन तथा रुधिर दाब के नियमन में केंद्रीय भूमिका निभाता है। प्रत्येक वृक्क में लगभग 10 से 12 लाख सूक्ष्म वृक्काणु (नेफ्रॉन) परानिस्यंदन, चयनात्मक पुनरावशोषण तथा नलिकाकार स्रावण द्वारा मूत्र निर्माण संपन्न करते हैं। इसके अतिरिक्त हेनले लूप और वासा रेक्टा की प्रतिधारा क्रियाविधि (Counter-Current Mechanism), एंटीडाईयूरेटिक हार्मोन (ADH), रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन तंत्र (RAAS) तथा एट्रियल नैट्रियूरेटिक फैक्टर (ANF) के समन्वय से मानव शरीर जल का अत्यधिक संरक्षण करते हुए सांद्रित मूत्र का उत्सर्जन करने में सक्षम होता है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

वृक्कीय कार्यिकी का विस्तृत ज्ञान यूरीमिया, तीव्र एवं दीर्घकालिक वृक्क विफलता (Renal Failure), वृक्क अश्मरी (पथरी), डायबिटीज इंसिपिडस तथा ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस जैसे गंभीर रोगों के निदान एवं उपचार हेतु अनिवार्य है। यह हीमोडायलिसिस (अपोहन / कृत्रिम वृक्क) एवं वृक्क प्रत्यारोपण की जीवनरक्षक प्रणालियों का वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत करता है। पश्चिम बंगाल बोर्ड (WBCHSE) एवं NEET परीक्षाओं में शुद्ध निस्यंदन दाब (NFP), हेनले लूप की प्रतिधारा सांद्रण प्रणाली तथा हार्मोनल फीडबैक लूप्स से संबंधित प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण एवं उच्च अंकदायी होते हैं।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 नाइट्रोजनी अपशिष्टों के प्रकार एवं...
2 मानव उत्सर्जी तंत्र की स्थूल संरचना...
3 नेफ्रॉन की सूक्ष्म संरचना एवं जक्सट...
4 मूत्र निर्माण की क्रियाविधि: परानिस...
5 प्रतिधारा क्रियाविधि एवं मूत्र सांद...
6 तंत्रिका-अंतःस्रावी नियमन, मूत्रण ए...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

नाइट्रोजनी अपशिष्टों के प्रकार एवं अकशेरुकियों के उत्सर्जी अंग

1. नाइट्रोजनी अपशिष्टों की उत्पत्ति एवं उत्सर्जन के प्रकार

प्रोटीन (अमीनो अम्लों के वि-अमीनीकरण) तथा न्यूक्लिक अम्लों के अपचयी उपापचय के फलस्वरूप प्राणियों में हानिकारक नाइट्रोजनी अपशिष्ट बनते हैं। जल की उपलब्धता तथा अनुकूलन के आधार पर प्राणियों को तीन मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:

1. अमोनिया-उत्सर्जन (Ammonotelism):
• प्रकृति एवं विषैलापन: अमोनिया (NH3) अत्यधिक विषैली, तीव्र क्षारीय तथा जल में अत्यंत विलेय गैस है।
• जल की आवश्यकता: 1 ग्राम नाइट्रोजनी अमोनिया के निष्कासन हेतु लगभग 300 से 500 mL जल की आवश्यकता होती है।
• उत्सर्जन विधि: देह सतह या क्लोमों (गिल्स) से सरल विसरण द्वारा अमोनियम आयनों (NH4+) के रूप में विसरित होती है; वृक्कों की भूमिका नगण्य होती है।
• उदाहरण: जलीय अकशेरुकी (प्रोटोजोआ, स्पंज, सीलेन्टरेटा), अस्थिल मछलियां (Teleosts), जलीय उभयचरों के टैडपोल लार्वा।
2. यूरिया-उत्सर्जन (Ureotelism):
• प्रकृति: यूरिया [CO(NH2)2] अमोनिया की तुलना में लगभग 1,00,000 गुना कम विषैला तथा मध्यम विलेय है।
• संश्लेषण: यकृत में क्रेब्स-हेंसलीट ऑर्निथिन चक्र (Ornithine Cycle) द्वारा 3 ATP अणुओं का उपयोग कर 2 अणु NH3 तथा 1 अणु CO2 से यूरिया का निर्माण होता है।
• जल की आवश्यकता: 1 ग्राम नाइट्रोजन यूरिया के रूप में त्यागने हेतु केवल ~50 mL जल की आवश्यकता होती है।
• उदाहरण: मनुष्य सहित सभी स्तनधारी, वयस्क स्थलीय उभयचर (मेंढक, टोड), तथा उपास्थिमय समुद्री मछलियां (शार्क), जो अपने रुधिर में यूरिया संचित कर समुद्री जल के साथ समपरासारी रहती हैं।
3. यूरिक अम्ल-उत्सर्जन (Uricotelism):
• प्रकृति एवं विलेयता: यूरिक अम्ल (C5H4N4O3) व्यावहारिक रूप से अविषाक्त तथा जल में पूर्णतः अविलेय है।
• जल की आवश्यकता: 1 ग्राम नाइट्रोजन त्यागने में मात्र ~10 mL जल की हानि होती है; यह अर्ध-ठोस लेई या गोली (Pellet) के रूप में उत्सर्जित होता है।
• अनुकूलन: शुष्क स्थलीय आवासों में जल संरक्षण, पक्षियों में उड़ने हेतु शारीरिक भार कम करने, तथा अंडों के भीतर भ्रूण के संरक्षण हेतु अनिवार्य अनुकूलन है।
• उदाहरण: सरीसृप (छिपकली, सांप), पक्षी, स्थलीय घोंघे, तथा स्थलीय कीट (तिलचट्टा)।
2. अकशेरुकी प्राणियों के विभिन्न उत्सर्जी अंग
उत्सर्जी अंगसंरचनात्मक विशेषताएंप्रतिनिधि प्राणीप्रमुख कार्य
आदिवृक्कक / ज्वाला कोशिकाएं (Flame Cells)नलिकाओं के सिरों पर स्थित खोखली कोशिकाएं जिनमें सीलिया का गुच्छा ज्वाला की भांति स्पंदित होता हैप्लेटीहेल्मिन्थीज (प्लेनेरिया, फीताकृमि), रोटिफर्स, एम्फिऑक्ससमुख्यतः परासरण नियमन (द्रव व आयनिक संतुलन); द्वितीयक रूप से अपशिष्ट निष्कासन
वृक्कक (Nephridia)दोनों सिरों पर खुली कुंडलित नलिकाएं: नेफ्रोस्टोम सीलोम में तथा नेफ्रीडियोपोर बाहर खुलता हैएनेलिडा (केंचुआ: पटलीय, ग्रसनीय एवं अध्यावरणी)देहगुहीय द्रव से नाइट्रोजनी अपशिष्टों का निष्कासन एवं परासरण नियमन
मैलपिगी नलिकाएं (Malpighian Tubules)मध्य-आंत्र व पश्चांत्र के जोड़ पर स्थित 100-150 पतली, पीली अंधी नलिकाएं जो हीमोलिम्फ में तैरती हैंकीट (तिलचट्टा) एवं अन्य स्थलीय आर्थ्रोपोड्सहीमोलिम्फ से पोटेशियम यूरेट अवशोषित कर आंत्र में यूरिक अम्ल के रूप में छोड़ना
श्रृंगिक / हरित ग्रंथियां (Green Glands)स्पर्शकों के आधार पर स्थित जोड़ीदार ग्रंथियां; एंड-सैक, लेबिरिंथ, मूत्राशय एवं उत्सर्जी छिद्र युक्तक्रस्टेशिया (झींगा)रुधिर से परानिस्यंदन तथा लवण-जल संतुलन
कॉक्सल ग्रंथियां (Coxal Glands)चलने वाले पादों के आधार पर स्थित उत्सर्जी संरचनाएंअरेकनिडा (मकड़ी, बिच्छू)गुआनिन का उत्सर्जन एवं परासरण नियमन

मानव उत्सर्जी तंत्र की स्थूल संरचना एवं वृक्क की आंतरिक बनावट

1. मानव वृक्क की स्थिति एवं बाह्य लक्षण

मानव उत्सर्जी तंत्र में एक जोड़ी वृक्क (Kidneys), एक जोड़ी मूत्रवाहिनी (Ureters), एक मूत्राशय (Urinary Bladder) तथा एक मूत्रमार्ग (Urethra) सम्मिलित हैं।

  • स्थिति: उदर गुहा की पृष्ठ-भित्ति पर पेरिटोनियम के पीछे (रेट्रोपेरिटोनियल / Retroperitoneal) स्थित होते हैं। यह 12वीं वक्षीय कशेरुका (T12) से तीसरी कटि कशेरुका (L3) के स्तर पर मेरुदंड के दोनों ओर स्थित होते हैं। यकृत की उपस्थिति के कारण दायां वृक्क बाएं वृक्क से लगभग 1.5-2 cm नीचे स्थित होता है।
  • माप एवं भार: सेम के बीज के आकार के, लंबाई 10–12 cm, चौड़ाई 5–7 cm, मोटाई 2–3 cm तथा औसत भार 120–170 ग्राम होता है।
  • हाइलम (Hilum): वृक्क के भीतरी अवतल किनारे पर स्थित एक गहरा खांच जिससे वृक्क धमनी, तंत्रिकाएं प्रवेश करती हैं तथा वृक्क शिरा एवं मूत्रवाहिनी बाहर निकलती हैं। हाइलम भीतर एक कीप के आकार की गुहा में खुलता है जिसे वृक्कीय श्रोणि (Renal Pelvis) कहते हैं।
  • सुरक्षात्मक आवरण (भीतर से बाहर):
    1. वृक्कीय संपुट (Renal Capsule): सबसे भीतरी पारदर्शी, दृढ़ रेशेदार झिल्ली जो वृक्क को संक्रमण व चोट से बचाती है।
    2. वसीय संपुट (Adipose Capsule): वसा की मोटी गद्दी जो झटकों को अवशोषित करती है और वृक्क को स्थिर रखती है।
    3. वृक्कीय प्रावरणी (Renal Fascia): सघन संयोजी ऊतक जो वृक्क व अधिवृक्क ग्रंथि को उदर भित्ति से जोड़ता है।
2. वृक्क की आंतरिक संरचना

वृक्क के अनुदैर्ध्य काट में दो स्पष्ट क्षेत्र दिखाई देते हैं:

1. बाह्य वृक्कीय वल्कुट (Renal Cortex): हल्का लाल-भूरा दानेदार क्षेत्र जिसमें सभी मैलपिगी काय, समीपस्थ संवलित नलिकाएं (PCT) तथा दूरस्थ संवलित नलिकाएं (DCT) स्थित होती हैं।
2. आंतरिक वृक्कीय मध्यांश (Renal Medulla): गहरा रेखित क्षेत्र जो 8 से 18 शंक्वाकार मध्यांशीय पिरामिडों (Medullary Pyramids) में बंटा होता है। पिरामिडों का चौड़ा आधार वल्कुट की ओर तथा नुकीला शीर्ष भाग—जिसे वृक्क पैपिला (Renal Papilla) कहते हैं—पेल्विस की ओर निर्देशित होता है।
3. बर्टिनी के वृक्क स्तंभ (Columns of Bertini): वल्कुट का वह ऊतक जो दो पिरामिडों के बीच मध्यांश में गहराई तक धंस जाता है, बर्टिनी के स्तंभ कहलाता है।
4. मूत्र प्रवाह मार्ग: वृक्क पैपिला → लघु कैलिक्स (Minor Calyx, 8-18) → दीर्घ कैलिक्स (Major Calyx, 2-3) → वृक्कीय श्रोणि (Pelvis) → मूत्रवाहिनी (Ureter)।
3. वृक्कीय रुधिर परिसंचरण मार्ग

वृक्क विश्राम अवस्था में कुल हृदय निकास का लगभग 20–25% (~1200 mL/min) रुधिर प्राप्त करते हैं। रुधिर प्रवाह का सही क्रम निम्नलिखित है:

महाधमनी → वृक्क धमनी → खंडीय धमनियां → अंतरापालि धमनियां → चापाकार धमनियां (Corticomedullary junction) → अंतरापालिकीय धमनियां → अभिवाही धमनिका (Afferent arteriole) → केशिकागुच्छ (Glomerulus, उच्च दाब पर परानिस्यंदन) → अपवाही धमनिका (Efferent arteriole) → परिनालिका केशिका जाल / वासा रेक्टा (पुनरावशोषण व स्रावण) → अंतरापालिकीय शिराएं → चापाकार शिराएं → अंतरापालि शिराएं → वृक्क शिरा → पश्च महाशिरा।

नेफ्रॉन की सूक्ष्म संरचना एवं जक्सटाग्लोमेरुलर उपकरण (JGA)

1. नेफ्रॉन की औतिकीय संरचना

नेफ्रॉन (वृक्काणु) वृक्क की संरचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई है (प्रत्येक वृक्क में लगभग 10 से 12 लाख)। प्रत्येक नेफ्रॉन दो प्रमुख भागों में विभेदित होता है: मैलपिगी काय (Renal Corpuscle) तथा वृक्कीय नलिका (Renal Tubule)।

क. मैलपिगी काय (Malpighian Body):
• केशिकागुच्छ (Glomerulus): चौड़ी अभिवाही धमनिका से बनी लगभग 50 शाखित केशिकाओं का उच्च-दाब युक्त गुच्छ, जो पुनः मिलकर संकरी अपवाही धमनिका बनाती है। व्यास के इस अंतर के कारण केशिकागुच्छ में उच्च द्रवस्थैतिक दाब (~60 mmHg) उत्पन्न होता है।
• बोमन संपुट (Bowman's Capsule): केशिकागुच्छ को घेरे हुए द्वि-स्तरीय प्यालेनुमा संरचना।
- भित्ति परत (Parietal layer): बाह्य परत, सरल शल्की उपकला से निर्मित।
- विसरल परत (Visceral layer): केशिकाओं को प्रत्यक्ष ढकती है। यह पोडोसाइट (पदाणु) नामक विशेष उपकला कोशिकाओं से बनी होती है। पोडोसाइट्स के पादाभ (Pedicels) आपस में मिलकर लगभग 25 nm चौड़ी निस्यंदन खांचें (Slit pores) बनाते हैं, जो नेफ्रिन प्रोटीन युक्त डायाफ्राम से ढकी होती हैं और केवल 7 nm से छोटे कणों को ही निकलने देती हैं।
ख. वृक्कीय नलिका के भाग:
• समीपस्थ संवलित नलिका (PCT): सरल घनाकार ब्रश बॉर्डर उपकला (Brush border cuboidal epithelium) द्वारा स्तरित। अत्यधिक संख्या में उपस्थित सूक्ष्मांकुर (Microvilli) अवशोषण सतह को 20 गुना बढ़ा देते हैं तथा प्रचुर माइटोकॉन्ड्रिया सक्रिय परिवहन हेतु ऊर्जा प्रदान करते हैं।
• हेनले का लूप (Loop of Henle): हेयरपिन सदृश मुड़ी हुई नलिका।
- पतली अवरोही भुजा: सरल शल्की उपकला; जल हेतु अत्यधिक पारगम्य (एक्वापोरिन-1 युक्त); लवणों एवं यूरिया हेतु अपारगम्य।
- आरोही भुजा: जल हेतु पूर्णतः अपारगम्य; मोटी आरोही भुजा घनाकार उपकला से बनी है और Na+/K+/2Cl- को-ट्रांसपोर्टर (NKCC2) द्वारा सक्रिय रूप से लवणों को बाहर निकालती है।
• दूरस्थ संवलित नलिका (DCT): ब्रश बॉर्डर रहित सरल घनाकार उपकला; हार्मोन नियंत्रित ऐच्छिक पुनरावशोषण व स्रावण का स्थल।
• संग्रह नलिका (Collecting Duct): वल्कुट से मध्यांश के मध्य से गुजरकर बेलिनी की नलिका द्वारा पैपिला में खुलती है। इसमें प्रिंसिपल कोशिकाएं (जल व लवण अवशोषण) तथा इंटरकेलेटेड कोशिकाएं (अम्ल-क्षार संतुलन) होती हैं।
2. वल्कुटीय नेफ्रॉन बनाम मध्यांश-समीपस्थ नेफ्रॉन
तुलना का आधारवल्कुटीय नेफ्रॉन (Cortical, ~80–85%)मध्यांश-समीपस्थ नेफ्रॉन (Juxtamedullary, ~15–20%)
मैलपिगी काय की स्थितिवल्कुट के बाह्य एवं मध्य भाग मेंमध्यांश के निकट वल्कुट के गहरे भाग में
हेनले लूप की लंबाईअत्यंत छोटा; मध्यांश में बहुत कम धंसता हैअत्यधिक लंबा; मध्यांश में गहराई तक पैपिला तक जाता है
वासा रेक्टा (Vasa Recta)अनुपस्थित या अत्यंत अल्पविकसित; परिनालिका जाल उपस्थितसुविकसित हेयरपिन सदृश केशिका जाल (वासा रेक्टा) उपस्थित
प्रमुख कार्यिकी भूमिकासामान्य परिस्थितियों में निस्यंदन व सामान्य अवशोषणप्रतिधारा क्रियाविधि द्वारा अतिपरासारी सांद्र मूत्र का निर्माण
3. जक्सटाग्लोमेरुलर उपकरण (JGA)

अभिवाही धमनिका एवं DCT के प्रारंभिक भाग के संपर्क स्थल पर निर्मित विशेष संवेदी संरचना:

  • मैकुला डेंसा (Macula Densa): DCT की भित्ति की सघन स्तंभाकार कोशिकाएं जो नलिकाकार द्रव में NaCl की सांद्रता व प्रवाह दर को मापती हैं।
  • जक्सटाग्लोमेरुलर (JG) कोशिकाएं: अभिवाही धमनिका की ट्यूनिका मीडिया की रूपांतरित चिकनी पेशी कोशिकाएं, जो रुधिर दाब कम होने पर रेनिन (Renin) एंजाइम का स्राव करती हैं।
  • लेसिस कोशिकाएं (Lacis cells): मैकुला डेंसा व जेजी कोशिकाओं के मध्य रासायनिक संदेशों का संप्रेषण करती हैं।

मूत्र निर्माण की क्रियाविधि: परानिस्यंदन, पुनरावशोषण एवं स्रावण

1. प्रथम चरण: केशिकागुच्छीय परानिस्यंदन (Glomerular Ultrafiltration)

रुधिर से प्रोटीन-रहित प्लाज्मा का बोमन संपुट की गुहा में छनना परानिस्यंदन कहलाता है। यह त्रि-स्तरीय निस्यंदन झिल्ली द्वारा होता है:

  1. केशिकागुच्छ की छिद्रित अंतःकला (Fenestrated Endothelium): 70-100 nm व्यास के छिद्र, जो रुधिर कोशिकाओं को रोकते हैं।
  2. आधार कला (Basement Membrane): ऋणावेशित हेपेरन सल्फेट युक्त परत, जो प्लाज्मा प्रोटीन (एल्ब्यूमिन) को प्रतिकर्षित करती है।
  3. पोडोसाइट्स की निस्यंदन खांचें: 25 nm चौड़े खांच छिद्र, जो नेफ्रिन डायाफ्राम से युक्त होते हैं।
शुद्ध निस्यंदन दाब (Net Filtration Pressure - NFP):
• केशिकागुच्छीय द्रवस्थैतिक दाब (GHP): अभिवाही धमनिका के चौड़े होने से उत्पन्न रक्तदाब: +60 mmHg (निस्यंदन के पक्ष में)।
• रुधिर कलॉइडी परासरणी दाब (BCOP): प्लाज्मा प्रोटीनों (एल्ब्यूमिन) का परासरणी खिंचाव: -32 mmHg (निस्यंदन के विरोध में)।
• संपुट द्रवस्थैतिक दाब (CHP): बोमन संपुट में उपस्थित निस्यंद का दाब: -18 mmHg (निस्यंदन के विरोध में)।
$$\text{शुद्ध निस्यंदन दाब (NFP)} = \text{GHP} - (\text{BCOP} + \text{CHP}) = 60 - (32 + 18) = +10\text{ mmHg}$$
• केशिकागुच्छीय निस्यंदन दर (GFR): दोनों वृक्कों द्वारा प्रति मिनट बनने वाले निस्यंद की मात्रा = 125 mL/मिनट = 180 लीटर/दिन।
• प्राथमिक निस्यंद के घटक: प्रोटीन-रहित प्लाज्मा—जल, ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, यूरिया, यूरिक अम्ल, क्रिएटिनिन, Na+, K+, Cl- एवं HCO3-।
2. द्वितीय चरण: चयनात्मक पुनरावशोषण (99% दक्षता)

प्रतिदिन निर्मित 180 लीटर निस्यंद में से लगभग 178.5 लीटर (~99%) रुधिर में पुनः अवशोषित हो जाता है, जिससे केवल 1.0 से 1.5 लीटर मूत्र बाहर निकलता है।

  • PCT में पुनरावशोषण (प्रमुख कार्यशाला): निस्यंद के 70–80% जल व विद्युत-अपघट्य यहीं अवशोषित होते हैं।
    • ग्लूकोज एवं अमीनो अम्ल (100%): Na+ के साथ द्वितीयक सक्रिय सह-परिवहन (SGLT1/SGLT2) द्वारा पूर्णतः अवशोषित। ग्लूकोज की वृक्कीय देहली (Renal threshold) 180 mg/dL होती है।
    • सोडियम, पोटेशियम व क्लोराइड: 70-80% सक्रिय व निष्क्रिय विधियों द्वारा अवशोषित।
    • बाइकार्बोनेट (HCO3-): कार्बोनिक एनहाइड्रेज एंजाइम की सहायता से 85-90% अवशोषित।
    • अनिवार्य जल पुनरावशोषण (Obligatory Water Reabsorption): विलेयों के पीछे-पीछे परासरण द्वारा उच्च घनत्व वाले एक्वापोरिन-1 (AQP-1) चैनलों से जल रुधिर में लौटता है।
  • हेनले लूप में पुनरावशोषण:
    • अवरोही भुजा: केवल जल बाहर निकलता है; लूप के मोड़ पर निस्यंद अतिपरासारी (1200 mOsm/L) हो जाता है।
    • आरोही भुजा: जल हेतु अपारगम्य; मोटी भुजा सक्रिय रूप से NaCl बाहर निकालती है, जिससे DCT में प्रवेश करते समय निस्यंद अल्पपरासारी (200 mOsm/L) हो जाता है।
  • DCT एवं संग्रह नलिका में ऐच्छिक पुनरावशोषण (Facultative):
    • एल्डोस्टेरोन के प्रभाव में: Na+ एवं जल का अवशोषण बढ़ता है तथा K+ का स्रावण होता है।
    • ADH (वेसोप्रेसिन) के प्रभाव में: संग्रह नलिका में एक्वापोरिन-2 (AQP-2) जल चैनल जुड़ते हैं, जिससे जल तेजी से अवशोषित होता है।
3. तृतीय चरण: नलिकाकार स्रावण (Tubular Secretion)

परिनालिका केशिकाओं के रुधिर से अपशिष्ट एवं हानिकारक पदार्थों का सक्रिय रूप से नलिका गुहा में भेजा जाना नलिकाकार स्रावण कहलाता है:

  • स्रावित होने वाले पदार्थ: हाइड्रोजन आयन (H+), पोटेशियम आयन (K+), अमोनियम आयन (NH4+), क्रिएटिनिन तथा औषधियां (जैसे पेनिसिलिन)।
  • स्थल: PCT में H+, NH4+ व औषधियां स्रावित होती हैं; DCT एवं संग्रह नलिका में K+ तथा H+ का नियंत्रित स्रावण होता है।
  • शारीरिक महत्व: रुधिर के सामान्य pH (7.35–7.45) को स्थिर रखना तथा घातक हाइपरकलेमिया (पोटेशियम की वृद्धि जिससे कार्डियक अरेस्ट हो सकता है) से बचाव करना।

प्रतिधारा क्रियाविधि एवं मूत्र सांद्रण प्रक्रम

1. प्रतिधारा प्रणाली का सिद्धांत

स्थलीय स्तनधारी होने के नाते मानव अपने रुधिर प्लाज्मा (300 mOsm/L) की तुलना में लगभग चार गुना अधिक सांद्र मूत्र (1200 mOsm/L) उत्सर्जित कर सकता है। इस जल संरक्षण प्रणाली का मुख्य आधार मध्यांश-समीपस्थ नेफ्रॉनों की दो विपरीत प्रवाह वाली नलिकाओं का युग्म है:

  1. प्रतिधारा गुणक (Counter-Current Multiplier): हेनले का लूप, जिसकी अवरोही व आरोही भुजाओं में निस्यंद का प्रवाह विपरीत दिशाओं में होता है।
  2. प्रतिधारा विनिमयक (Counter-Current Exchanger): वासा रेक्टा (केशिका जाल), जिसकी दोनों भुजाओं में रुधिर का प्रवाह विपरीत दिशाओं में होता है।
2. कॉर्टिकोमेडुलरी परासरणी प्रवणता (Corticomedullary Gradient)

वृक्क वल्कुट में द्रव की परासारिता 300 mOsm/L से प्रारंभ होकर आंतरिक मध्यांश के गहरे पैपिला भाग में 1200 mOsm/L तक पहुंच जाती है। इस प्रवणता को स्थापित व स्थिर रखने वाले दो प्रमुख घटक NaCl तथा यूरिया हैं।

प्रवणता निर्माण के चरण:
• सक्रिय NaCl निष्कासन: हेनले लूप की मोटी आरोही भुजा NKCC2 को-ट्रांसपोर्टर द्वारा मध्यांश के अंतराकाशी द्रव में प्रचुर मात्रा में NaCl बाहर निकालती है। चूंकि यह भुजा जल हेतु अपारगम्य है, अतः अंतराकाश खारा हो जाता है किंतु नलिका का द्रव पतला हो जाता है।
• जल का निष्कासन: लूप की अवरोही भुजा जल हेतु अत्यधिक पारगम्य होने के कारण अंतराकाशी नमक के खिंचाव से जल बाहर निकल जाता है। अतः द्रव नीचे जाते हुए सांद्र होकर लूप के मोड़ पर 1200 mOsm/L हो जाता है।
• यूरिया पुनर्चक्रण (Urea Recycling): संग्रह नलिका के गहरे भाग से यूरिया विसरित होकर मध्यांश के अंतराकाश में आता है और कुल 1200 mOsm/L में से लगभग 500 mOsm/L का योगदान देता है। यह यूरिया पुनः हेनले की पतली आरोही भुजा में प्रवेश कर चक्र के रूप में पुनः संग्रह नलिका में पहुंचता है।
• वासा रेक्टा की भूमिका: अवरोही वासा रेक्टा NaCl व यूरिया ग्रहण कर जल छोड़ती है; आरोही वासा रेक्टा जल अवशोषित कर लवण वापस अंतराकाश में छोड़ देती है। इससे मध्यांश के लवण रुधिर परिसंचरण द्वारा बहने से बच जाते हैं।
3. संग्रह नलिका में अंतिम मूत्र सांद्रण

DCT से लगभग अल्पपरासारी द्रव (~200 mOsm/L) जब संग्रह नलिका के माध्यम से 1200 mOsm/L वाले मध्यांश में नीचे उतरता है, तब ADH (वेसोप्रेसिन) हार्मोन की उपस्थिति में नलिका की भित्ति में एक्वापोरिन-2 जल चैनल खुल जाते हैं। मध्यांश के तीव्र परासरणी खिंचाव के कारण नलिका से भारी मात्रा में जल अंतराकाश व वासा रेक्टा में लौट आता है। फलस्वरूप, अत्यधिक सांद्रित मूत्र (1200 mOsm/L) पेल्विस में पहुंचता है, जिससे निर्जलीकरण के समय देह का जल सुरक्षित रहता है।

तंत्रिका-अंतःस्रावी नियमन, मूत्रण एवं उत्सर्जी तंत्र के विकार

1. वृक्क कार्य का हार्मोनल फीडबैक नियमन

शरीर में जल एवं रक्तदाब संतुलन हेतु तीन प्रमुख हार्मोनल तंत्र परस्पर मिलकर कार्य करते हैं:

1. हाइपोथैलेमस परासरणग्राही - ADH (वेसोप्रेसिन) तंत्र:
• उद्दीपन: शरीर में जल की कमी, प्लाज्मा परासारिता में वृद्धि (>300 mOsm/L) अथवा रक्त आयतन घटने पर हाइपोथैलेमस के परासरणग्राही सक्रिय होते हैं।
• कार्य: पश्च पीयूष ग्रंथि से एंटीडाईयूरेटिक हार्मोन (ADH / Vasopressin) स्रावित होता है।
• प्रभाव: संग्रह नलिका में एक्वापोरिन-2 चैनलों को जोड़कर जल का पुनरावशोषण बढ़ाता है और मूत्र की मात्रा घटाता है (मूत्रलता रोकता है)। उच्च सांद्रता में यह वाहिका-संकीर्णक बनकर रक्तदाब बढ़ाता है।
• रोग: डायबिटीज इंसिपिडस (Diabetes Insipidus): ADH की कमी से जल अवशोषण बंद हो जाता है, जिससे प्रतिदिन 5-20 लीटर अत्यधिक तनु मूत्र निष्कासित होता है (शर्कराहीन बहुमूत्र रोग)।
2. रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन तंत्र (RAAS):
• उद्दीपन: केशिकागुच्छीय रक्तदाब, रक्त आयतन या GFR कम होने पर अभिवाही धमनिका की JG कोशिकाएं सक्रिय होती हैं।
• कैनरी प्रक्रम: JG कोशिकाएं रेनिन स्रावित करती हैं → यकृत के एंजियोटेंसिनोजेन को एंजियोटेंसिन I में बदलती हैं → फेफड़ों का ACE इसे शक्तिशाली एंजियोटेंसिन II में बदलता है।
• एंजियोटेंसिन II के प्रभाव:
- शक्तिशाली वाहिका-संकीर्णक के रूप में रुधिर दाब बढ़ाता है और अपवाही धमनिका को सिकोड़कर GFR बहाल करता है।
- अधिवृक्क वल्कुट से एल्डोस्टेरोन स्रावित कराता है, जो DCT में Na+ व जल का अवशोषण बढ़ाकर रक्तदाब सामान्य करता है।
- प्यास केंद्र एवं ADH स्राव को प्रेरित करता है।
3. एट्रियल नैट्रियूरेटिक फैक्टर (ANF / ANP) - हृदय का सुरक्षात्मक तंत्र:
• उद्दीपन: रुधिर आयतन या रक्तदाब अत्यधिक बढ़ने पर हृदय के आलिंद की भित्ति खिंच जाती है।
• कार्य: आलिंद पेशी कोशिकाओं से ANF स्रावित होता है।
• प्रभाव: रक्त वाहिकाओं का विस्फारण करता है, रेनिन व एल्डोस्टेरोन का स्राव रोकता है, तथा मूत्र में सोडियम (नैट्रियूरेसिस) व जल की निकासी बढ़ाकर रक्तदाब घटाता है। यह RAAS तंत्र का सीधा विरोधी है।
2. मूत्रण प्रतिवर्त (Micturition Reflex)

मूत्राशय से मूत्रमार्ग द्वारा मूत्र को बाहर निकालने की क्रिया मूत्रण कहलाती है:

  • मूत्राशय का भरना: 300-400 mL मूत्र संचित होने पर मूत्राशय की डेट्रूसर पेशी खिंचती है और खिंचाव ग्राही उत्तेजित होते हैं।
  • संवेदी संचरण: संवेदी आवेग मेरुदंड के त्रिक मूत्रण केंद्र (S2-S4) तथा मस्तिष्क के पोन्स में भेजे जाते हैं।
  • मोटर अनुक्रिया: पैरासिम्पेथेटिक तंत्रिका डेट्रूसर पेशी में संकुचन तथा अनैच्छिक आंतरिक संकोचक पेशी में शिथिलन उत्पन्न करती है।
  • ऐच्छिक नियंत्रण: ऐच्छिक रेखित पेशी से बनी बाह्य संकोचक पेशी के शिथिल होने पर मूत्र निष्कासित होता है।
  • सामान्य मूत्र के लक्षण: पारदर्शी, हल्का पीला (यूरोक्रोम वर्णक), हल्का अम्लीय (pH ~6.0, सीमा 4.5-8.0), आपेक्षिक घनत्व 1.015-1.025; प्रतिदिन 25-30 ग्राम यूरिया उत्सर्जित होता है।
3. मानव के सहायक उत्सर्जी अंग
  • फेफड़े: उच्छ्वसन द्वारा प्रतिदिन प्रचुर मात्रा में CO2 (~200 mL/मिनट या 18 L/घंटा) तथा लगभग 400 mL जलवाष्प उत्सर्जित करते हैं।
  • यकृत: हीमोग्लोबिन के विघटन से पित्त वर्णक (बिलीरुबिन व बिलीवर्डीन) बनाता है तथा कोलेस्ट्रॉल, स्टेरॉयड हार्मोन व औषधियों को पित्त के माध्यम से आंत्र में भेजकर मल द्वारा निष्कासित करता है।
  • त्वचा: स्वेद ग्रंथियां पसीने द्वारा जल, NaCl, अल्प यूरिया व लैक्टिक अम्ल त्यागकर ताप नियमन करती हैं; तेल ग्रंथियां सीबम द्वारा स्टेरोल, हाइड्रोकार्बन व मोम का निष्कासन करती हैं।
4. उत्सर्जी तंत्र के विकार एवं हीमोडायलिसिस
विकार / प्रक्रियारोग कार्यिकी / लक्षणउपचार एवं प्रबंधन
यूरीमिया (Uremia)वृक्क विफलता के कारण रुधिर में यूरिया व नाइट्रोजनी अपशिष्टों का विषैला संचय (>40 mg/dL)जी मिचलाना, थकान, पेरीकार्डाइटिस, कोमा; तत्काल हीमोडायलिसिस आवश्यक
वृक्क अश्मरी (Renal Calculi / पथरी)वृक्क में अविलेय कैल्शियम ऑक्सालेट, फॉस्फेट या यूरिक अम्ल क्रिस्टलों का संचयपीठ व उदर में असहनीय ऐंठन युक्त दर्द (वृक्क शूल), रक्तमूत्र; अत्यधिक जलपान, लिथोट्रिपसी या शल्यक्रिया
ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिसप्रतिरक्षा जटिलताओं के कारण केशिकागुच्छों की तीव्र सूजन (जैसे स्ट्रेप्टोकोकस संक्रमण के पश्चात)रक्तमूत्र (धूमिल मूत्र), प्रोटीनमेह, उच्च रक्तदाब, चेहरे व आंखों के चारों ओर सूजन (शोथ)
वृक्क विफलता (Renal Failure)GFR में अत्यधिक गिरावट या पूर्ण समाप्ति (तीव्र अथवा दीर्घकालिक)मेटाबॉलिक एसिडोसिस, हाइपरकलेमिया; हीमोडायलिसिस या वृक्क प्रत्यारोपण
हीमोडायलिसिस (कृत्रिम वृक्क)धमनी से रुधिर लेकर सेलोफेन नलिकाओं वाले अपोहन यंत्र से प्रवाहित किया जाता हैरुधिर में हेपेरिन मिलाते हैं; अपोहन द्रव में यूरिया न होने से विसरण द्वारा बद्ध अपशिष्ट निकल जाते हैं; एंटी-हेपेरिन मिलाकर शिरा में लौटाते हैं
वृक्क प्रत्यारोपण (Kidney Transplant)स्वस्थ दाता के वृक्क को रोगी की इलियक फोसा में शल्यक्रिया द्वारा जोड़नानिकट संबंधी से HLA ऊतक मिलान अनिवार्य; निरोप अस्वीकृति रोकने हेतु आजीवन प्रतिरक्षादमनकारी औषधियां (साइक्लोस्पोरिन)

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

शुद्ध निस्यंदन दाब (Net Filtration Pressure - NFP)
$$\text{NFP} = +10\text{ mmHg}$$
GHP केशिकागुच्छीय रक्तदाब (+60 mmHg) है; BCOP प्रोटीनों का परासरणी खिंचाव (-32 mmHg) है; CHP संपुट का द्रवस्थैतिक दाब (-18 mmHg) है।
केशिकागुच्छीय निस्यंदन दर (GFR)
$$GFR = 125 mL/मिनट = 180 L/दिन$$
वृक्कीय प्लाज्मा प्रवाह (~650 mL/मिनट) का लगभग 20% छनता है; स्वतःनियमन तंत्र द्वारा स्थिर रखा जाता है।
निस्यंदन भिन्न (Filtration Fraction - FF)
$$\text{FF} \approx 20\%$$
वृक्कीय प्लाज्मा प्रवाह (RPF) = कुल वृक्क रुधिर प्रवाह (1200 mL/min) * (1 - 0.45 हेमेटोक्रिट) = 650 mL/min।
नलिकाकार पुनरावशोषण दक्षता
$$\% पुनरावशोषित ≈ 99.2\%$$
PCT अकेला 70-80% अवशोषित करता है; DCT व संग्रह नलिका हार्मोन के अधीन शेष अवशोषण करती हैं।
मध्यांशीय परासरणी प्रवणता (Corticomedullary Gradient)
$$\Delta \text{Osm} = 900\text{ mOsm/L}$$
प्रतिधारा गुणक (हेनले लूप का सक्रिय NaCl पंप) तथा संग्रह नलिका के यूरिया पुनर्चक्रण द्वारा सुरक्षित रहती है।
वृक्कीय क्लीयरेंस सूत्र (Renal Clearance)
$$C_x = {U_x × V}{P_x} mL/मिनट$$
U_x = मूत्र में सांद्रता, V = मूत्र प्रवाह दर (mL/min), P_x = प्लाज्मा में सांद्रता। इनुलिन क्लीयरेंस सीधे GFR (125 mL/min) के बराबर होता है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
(क) शुद्ध निस्यंदन दाब (NFP) की गणना कीजिए यदि: केशिकागुच्छीय द्रवस्थैतिक दाब = 62 mmHg, रुधिर कलॉइडी परासरणी दाब = 30 mmHg तथा संपुट दाब = 17 mmHg हो। (ख) एल्ब्यूमिन प्रोटीन का आणविक व्यास केशिकागुच्छ के छिद्रों से छोटा होने के बावजूद सामान्य निस्यंद में एल्ब्यूमिन क्यों अनुपस्थित रहता है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) शुद्ध निस्यंदन दाब (NFP) की गणना: [3 अंक]
• सूत्र:
$$\text{NFP} = \text{GHP} - (\text{BCOP} + \text{CHP})$$
• दिए गए मान:
- केशिकागुच्छीय द्रवस्थैतिक दाब (GHP) = 62 mmHg
- रुधिर कलॉइडी परासरणी दाब (BCOP) = 30 mmHg
- संपुट द्रवस्थैतिक दाब (CHP) = 17 mmHg
• मान रखने पर:
$$\text{NFP} = 62 - (30 + 17) = 62 - 47 = +15\text{ mmHg}$$
• उत्तर: शुद्ध निस्यंदन दाब +15 mmHg है, जो बोमन संपुट में निरंतर परानिस्यंदन को प्रेरित करता है।

(ख) सामान्य निस्यंद में एल्ब्यूमिन के अनुपस्थित रहने का वैज्ञानिक कारण: [2 अंक]
1. स्थिरवैद्युत प्रतिकर्षण: केशिकागुच्छ की अंतःकला के छिद्र (70-100 nm) एल्ब्यूमिन (~7 nm) से काफी बड़े होते हैं। किंतु वृक्कीय आधार कला (Basement Membrane) तथा पोडोसाइट्स की खांच झिल्ली ऋणावेशित हेपेरन सल्फेट व ग्लाइकोप्रोटीनों से समृद्ध होती हैं।
2. रुधिर के सामान्य pH (7.4) पर एल्ब्यूमिन अणु ऋणावेशित होते हैं। समान ऋणावेश होने के कारण आधार कला एल्ब्यूमिन को दृढ़ता से प्रतिकर्षित कर रोक देती है।
3. इसके अतिरिक्त पोडोसाइट्स की निस्यंदन खांचों का आणविक कट-ऑफ 60-70 kDa होता है; 69 kDa भार वाला एल्ब्यूमिन भौतिक व विद्युत दोनों रूपों में रुक जाता है।
उदाहरण 2
(क) मध्यांश-समीपस्थ नेफ्रॉन में हेनले लूप तथा वासा रेक्टा की प्रतिधारा क्रियाविधि द्वारा मूत्र सांद्रण समझाइए। (ख) मध्यांश की अतिपरासारिता बनाए रखने में यूरिया पुनर्चक्रण की क्या भूमिका है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) प्रतिधारा क्रियाविधि एवं मूत्र सांद्रण: [3 अंक]
1. प्रतिधारा गुणक (हेनले का लूप):
• अवरोही भुजा: जल हेतु अत्यधिक पारगम्य किंतु लवणों हेतु अपारगम्य है। नीचे उतरने पर मध्यांशीय लवणों के खिंचाव से जल बाहर निकल जाता है, जिससे मोड़ पर निस्यंद 1200 mOsm/L तक सांद्र हो जाता है।
• आरोही भुजा: जल हेतु पूर्णतः अपारगम्य है। मोटी भुजा सक्रिय रूप से NaCl बाहर निकालकर मध्यांश को खारा बनाती है, जिससे DCT में जाते समय निस्यंद तनु (200 mOsm/L) हो जाता है।
2. प्रतिधारा विनिमयक (वासा रेक्टा):
• अवरोही वासा रेक्टा NaCl व यूरिया लेकर जल छोड़ती है; आरोही वासा रेक्टा जल अवशोषित कर लवण वापस अंतराकाश में छोड़ देती है।
• इससे अवशोषित जल सामान्य रुधिर में लौट जाता है और मध्यांश की 1200 mOsm/L प्रवणता सुरक्षित रहती है।

(ख) यूरिया पुनर्चक्रण की भूमिका: [2 अंक]
1. संग्रह नलिका में ADH के प्रभाव से जल निकलने पर भीतर यूरिया की सांद्रता अत्यधिक बढ़ जाती है।
2. नलिका के आंतरिक भाग से यूरिया विसरित होकर मध्यांश के अंतराकाश में आता है और मध्यांश की कुल 1200 mOsm/L सांद्रता में लगभग 500 mOsm/L का योगदान देता है।
3. यह यूरिया हेनले की पतली आरोही भुजा में प्रवेश कर पुनः संग्रह नलिका में पहुंचता है, जिससे मध्यांश का खारापन निरंतर बना रहता है।
उदाहरण 3
(क) रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन तंत्र (RAAS) के सक्रियण एवं इसके शारीरिक प्रभावों का वर्णन कीजिए। (ख) डायबिटीज मेलिटस तथा डायबिटीज इंसिपिडस में कारण एवं मूत्र के लक्षणों के आधार पर अंतर स्पष्ट कीजिए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) RAAS तंत्र का सक्रियण एवं प्रभाव: [3 अंक]
1. उद्दीपन: रुधिर दाब, रक्त आयतन या GFR कम होने पर अभिवाही धमनिका की जक्सटाग्लोमेरुलर (JG) कोशिकाएं रुधिर में रेनिन एंजाइम स्रावित करती हैं।
2. एंजाइमी प्रक्रम: रेनिन यकृत के एंजियोटेंसिनोजेन को एंजियोटेंसिन I में तोड़ता है। फेफड़ों का ACE एंजाइम इसे सक्रिय एंजियोटेंसिन II में रूपांतरित करता है।
3. शारीरिक प्रभाव:
• वाहिका संकीर्णन: एंजियोटेंसिन II धमनियों को सिकोड़कर रक्तदाब बढ़ाता है तथा अपवाही धमनिका को सिकोड़कर GFR बढ़ाता है।
• एल्डोस्टेरोन स्राव: अधिवृक्क वल्कुट से एल्डोस्टेरोन निकलता है, जो DCT व संग्रह नलिका में Na+ व जल का अवशोषण बढ़ाकर रुधिर आयतन व दाब सामान्य करता है।
• प्यास व ADH: हाइपोथैलेमस के प्यास केंद्र तथा ADH स्राव को प्रेरित करता है।

(ख) डायबिटीज मेलिटस बनाम डायबिटीज इंसिपिडस: [2 अंक]
लक्षणडायबिटीज मेलिटस (मधुमेह)डायबिटीज इंसिपिडस (बहुमूत्र)
मूल कारणइंसुलिन हार्मोन की कमी या प्रतिरोधकताADH (वेसोप्रेसिन) हार्मोन की कमी या वृक्क की असंवेदनशीलता
रुधिर शर्करारुधिर शर्करा का स्तर असामान्य रूप से उच्च (हाइपरग्लाइसीमिया)रुधिर शर्करा का स्तर पूर्णतः सामान्य
मूत्र के घटकमूत्र में ग्लूकोज (ग्लाइकोसुरिया) व कीटोन काय उपस्थित; उच्च आपेक्षिक घनत्व (>1.030)मूत्र में ग्लूकोज व कीटोन काय पूर्णतः अनुपस्थित; अत्यधिक तनु मूत्र (<1.005)
दैनिक मूत्र मात्रामध्यम बहुमूत्रता (3-5 लीटर/दिन)अत्यधिक गंभीर बहुमूत्रता (5-20 लीटर/दिन)
उदाहरण 4
(क) मूत्रण प्रतिवर्त (Micturition Reflex) के मुख्य चरणों का उल्लेख कीजिए। (ख) मूत्र के चार असामान्य घटकों के नाम तथा उनका नैदानिक महत्व बताइए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) मूत्रण प्रतिवर्त (Micturition Reflex): [3 अंक]
1. मूत्राशय का भरना: मूत्राशय में 300-400 mL मूत्र भरने पर आंतरिक दाब बढ़ता है और डेट्रूसर पेशी के खिंचाव ग्राही उत्तेजित होते हैं।
2. संवेदी संचरण: संवेदी आवेग श्रोणि तंत्रिकाओं द्वारा मेरुदंड के त्रिक मूत्रण केंद्र (S2-S4) तथा मस्तिष्क के पोन्स व प्रमस्तिष्क में पहुंचते हैं।
3. मोटर अनुक्रिया व संकोचक नियंत्रण: पैरासिम्पेथेटिक तंत्रिका आवेग डेट्रूसर पेशी में संकुचन तथा अनैच्छिक आंतरिक संकोचक पेशी में शिथिलन उत्पन्न करते हैं। साथ ही ऐच्छिक पुडेंडल तंत्रिका का अवरोध होने से बाह्य संकोचक पेशी शिथिल होकर मूत्र त्याग कराती है।

(ख) मूत्र के असामान्य घटक एवं महत्व: [2 अंक]
1. ग्लाइकोसुरिया (Glycosuria): मूत्र में ग्लूकोज का उत्सर्जन; रुधिर शर्करा वृक्कीय देहली (180 mg/dL) से अधिक होने पर होता है, जो डायबिटीज मेलिटस का प्रमुख लक्षण है।
2. कीटोन्यूरिया (Ketonuria): मूत्र में कीटोन निकायों की उपस्थिति; भुखमरी या अनियंत्रित मधुमेह में वसा के अत्यधिक अपचय को दर्शाता है।
3. प्रोटीनमेह / एल्ब्यूमिन्यूरिया (Proteinuria): मूत्र में प्लाज्मा प्रोटीन की उपस्थिति; केशिकागुच्छीय निस्यंदन झिल्ली की क्षति (नेफ्राइटिस, नेफ्रोटिक सिंड्रोम) का सूचक है।
4. हेमेच्योरिया (Hematuria): मूत्र में लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) की उपस्थिति; वृक्क पथरी, मूत्रमार्ग संक्रमण या ट्यूमर का संकेत देती है।
उदाहरण 5
(क) कृत्रिम वृक्क (हीमोडायलिसिस) की कार्यप्रणाली का संक्षिप्त विवरण दीजिए। (ख) इस प्रक्रिया में हेपेरिन एवं एंटी-हेपेरिन के उपयोग का क्या महत्व है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) हीमोडायलिसिस की कार्यप्रणाली: [3 अंक]
1. रुधिर निकासी: रोगी की धमनी (जैसे रेडियल धमनी) से रुधिर लेकर पंप द्वारा डायलाइजर इकाई में भेजा जाता है।
2. अपोहन इकाई: डायलाइजर में अर्धपारगम्य सेलोफेन नलिकाएं होती हैं जो एक नियंत्रित अपोहन द्रव (Dialysate) में डूबी रहती हैं।
3. विसरण द्वारा शुद्धि: अपोहन द्रव का आयनिक संगठन प्लाज्मा जैसा ही होता है, किंतु इसमें कोई नाइट्रोजनी अपशिष्ट (यूरिया, यूरिक अम्ल) नहीं होता।
4. अतः सांद्रता प्रवणता के कारण रुधिर से विषैले अपशिष्ट सेलोफेन झिल्ली से विसरित होकर अपोहन द्रव में चले जाते हैं और रुधिर शुद्ध हो जाता है। अतिरिक्त जल द्रवस्थैतिक दाब द्वारा निकाला जाता है।

(ख) हेपेरिन एवं एंटी-हेपेरिन की भूमिका: [2 अंक]
1. हेपेरिन: रुधिर के डायलाइजर में प्रवेश से ठीक पूर्व मिलाया जाता है ताकि कृत्रिम सेलोफेन सतह के संपर्क में आने पर रुधिर का थक्का न जमे (थ्रॉम्बोसिस से बचाव)।
2. एंटी-हेपेरिन (प्रोटामाइन सल्फेट): शुद्ध रुधिर के रोगी की शिरा में लौटने से ठीक पूर्व मिलाया जाता है। यह हेपेरिन को निष्क्रिय कर रुधिर की सामान्य स्कंदन क्षमता बहाल करता है, जिससे आंतरिक रक्तस्राव का खतरा समाप्त हो जाता है।
उदाहरण 6
(क) विषैलापन, संश्लेषण स्थल एवं जल की आवश्यकता के आधार पर अमोनिया-उत्सर्जन, यूरिया-उत्सर्जन एवं यूरिक अम्ल-उत्सर्जन की तुलना कीजिए। (ख) निम्नलिखित प्राणियों के उत्सर्जी अंगों के नाम लिखिए: (i) एम्फिऑक्सस, (ii) केंचुआ, (iii) तिलचट्टा, (iv) झींगा। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) उत्सर्जी प्रकारों की तुलना: [3 अंक]
लक्षणअमोनिया-उत्सर्जनयूरिया-उत्सर्जनयूरिक अम्ल-उत्सर्जन
आपेक्षिक विषैलापनअत्यधिक विषैला (प्रत्यक्ष तंत्रिका विष)मध्यम विषैला (अमोनिया से 1 लाख गुना कम)पूर्णतः अविषाक्त एवं अविलेय
संश्लेषण स्थल व ऊर्जासीधे ऊतकों में वि-अमीनीकरण; अतिरिक्त ATP नहीं लगतीयकृत के ऑर्निथिन चक्र में; 3 ATP प्रति यूरिया खर्चयकृत व मैलपिगी नलिकाओं में; अत्यधिक ऊर्जा-खपतकारी
1 ग्राम नाइट्रोजन पर जल हानिअत्यधिक (~300-500 mL)मध्यम (~50 mL)न्यूनतम (~10 mL; अर्ध-ठोस लेई)

(ख) प्राणियों के उत्सर्जी अंग: [2 अंक]
• (i) एम्फिऑक्सस: आदिवृक्कक / सोलेनोसाइट युक्त ज्वाला कोशिकाएं
• (ii) केंचुआ: वृक्कक (Nephridia)
• (iii) तिलचट्टा: मैलपिगी नलिकाएं (Malpighian tubules)
• (iv) झींगा: श्रृंगिक ग्रंथियां / हरित ग्रंथियां (Green glands)

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मूत्र सांद्रण में वल्कुटीय नेफ्रॉनों की मुख्य भूमिका मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वल्कुटीय नेफ्रॉन संख्या में 85% होते हैं किंतु इनके हेनले लूप छोटे होते हैं और इनमें वासा रेक्टा नहीं होती। केवल मध्यांश-समीपस्थ नेफ्रॉन (15%) अपने लंबे लूप एवं वासा रेक्टा की सहायता से मध्यांश में परासरणी प्रवणता बनाकर मूत्र सांद्रित करते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि केशिकागुच्छ में सरल विसरण द्वारा सभी पदार्थ छन जाते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

केशिकागुच्छीय परानिस्यंदन विसरण नहीं अपितु शुद्ध निस्यंदन दाब (NFP = 10 mmHg) द्वारा संचालित भौतिक प्रक्रिया है। यह आकार तथा ऋणावेशित आधार कला के प्रतिकर्षी प्रभाव से रुधिर कोशिकाओं व एल्ब्यूमिन को रोक देती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

हेनले लूप की अवरोही भुजा द्वारा सोडियम लवणों का अवशोषण मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

हेनले लूप की पतली अवरोही भुजा जल हेतु अत्यधिक पारगम्य है किंतु लवणों हेतु पूर्णतः अपारगम्य है। केवल आरोही भुजा सक्रिय रूप से NaCl बाहर निकालती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

डायबिटीज मेलिटस और डायबिटीज इंसिपिडस को एक ही रोग समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

डायबिटीज मेलिटस इंसुलिन की कमी से होता है जिसमें रुधिर में शर्करा बढ़ती है और मूत्र में ग्लूकोज निकलता है। डायबिटीज इंसिपिडस ADH की कमी से होता है जिसमें मूत्र में शर्करा नहीं होती, केवल अत्यधिक मात्रा में तनु जल उत्सर्जित होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

ANF हार्मोन को RAAS तंत्र का सहायक समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ANF वास्तव में RAAS तंत्र का सीधा शारीरिक विरोधी है। RAAS जब रक्तदाब बढ़ाने हेतु लवण व जल रोकता है, ANF तब हृदय आलिंद से निकलकर वाहिकाओं को फैलाता है और मूत्र में सोडियम त्याग कराकर रक्तदाब घटाता है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

17 उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन: नेफ्रॉन, प्रतिधारा क्रियाविधि और परासरण नियमन WBCHSE कक्षा 11 जीव विज्ञान • इकाई 5: मानव कार्यिकी • वृक्क निस्यंदन, RAAS तंत्र एवं अपोहन 1. उत्सर्जी प्रकार एवं वृक्क संरचना नाइट्रोजनी अपशिष्ट एवं उत्सर्जी श्रेणियां • अमोनिया-उत्सर्जी: NH₃ (अति विषैला; 300-500 mL जल/g N) जलीय अकशेरुकी, अस्थिल मछलियां, जलीय उभयचर • यूरिया-उत्सर्जी: यूरिया (कम विषैला; यकृत में ऑर्निथिन चक्र) स्तनधारी, स्थलीय उभयचर, उपास्थिमय समुद्री मछलियां • यूरिक अम्ल-उत्सर्जी: यूरिक अम्ल (अर्ध-ठोस लेई; 10 mL जल/g N) विभिन्न प्राणियों के उत्सर्जी अंग • ज्वाला कोशिकाएं (आदिवृक्कक): प्लेनेरिया, एम्फिऑक्सस • वृक्कक (Nephridia): केंचुआ (एनेलिडा; परासरण नियमन) • मैलपिगी नलिकाएं: तिलचट्टा एवं अन्य कीट • श्रृंगिक ग्रंथियां / हरित ग्रंथियां: झींगा (क्रस्टेशिया) मानव वृक्क की स्थूल संरचना • पृष्ठ-भित्ति पर सेम के बीज के आकार का, T₁₂–L₃ स्तर पर • हाइलम: वृक्क धमनी, शिरा, तंत्रिका एवं मूत्रवाहिनी का प्रवेश • बाह्य वल्कुट (Cortex) एवं आंतरिक मध्यांश (8-18 पिरामिड) • बर्टिनी के वृक्क स्तंभ: मध्यांश में धंसे वल्कुट के भाग मूत्र मार्ग: पैपिला → लघु कैलिक्स → दीर्घ कैलिक्स → पेल्विस → मूत्रवाहिनी नेफ्रॉन के प्रकार: वल्कुटीय बनाम मध्यांश-समीपस्थ • वल्कुटीय (~85%): हेनले का छोटा लूप, परिनालिका जाल • मध्यांश-समीपस्थ (~15%): हेनले का लंबा लूप मध्यांश में गहरा • केशिकागुच्छीय विशेष केशिका जाल (वासा रेक्टा) से युक्त अतिपरासरणी सांद्र मूत्र उत्पादन की प्रतिधारा प्रणाली हेतु अनिवार्य 2. नेफ्रॉन एवं मूत्र निर्माण 1. परानिस्यंदन (Glomerular Ultrafiltration) • 3-स्तरीय झिल्ली: छिद्रित अंतःकला + आधार कला + पोडोसाइट खांचें • केशिकागुच्छीय द्रवस्थैतिक दाब (GHP): ~60 mmHg • विरोधी दाब: रुधिर कलॉइडी परासरणी (BCOP 32) + संपुट (CHP 18) → शुद्ध निस्यंदन दाब (NFP) = 60 − (32+18) = 10 mmHg • GFR = 125 mL/मिनट = 180 L/दिन (99% पुनरावशोषित!) दैनिक उत्सर्जित मूत्र की मात्रा = लगभग 1.0 से 1.5 लीटर प्रति दिन 2. चयनात्मक पुनरावशोषण (99%) • PCT (ब्रश बॉर्डर उपकला): 70-80% निस्यंद का पुनरावशोषण 100% ग्लूकोज एवं अमीनो अम्ल (सक्रिय SGLT परिवहन) 70-80% Na⁺, K⁺, Cl⁻, HCO₃⁻ एवं जल (एक्वापोरिन-1) • हेनले का लूप: - अवरोही भुजा: जल हेतु पारगम्य; लवण हेतु अपारगम्य - लूप के शीर्ष पर परासारिता बढ़कर 1200 mOsm/L हो जाती है - आरोही भुजा: जल हेतु अपारगम्य; सक्रिय NaCl परिवहन - DCT में प्रवेश करते समय तरल अल्पपरासारी (200 mOsm/L) • DCT एवं संग्रह नलिका: ऐच्छिक Na⁺ (एल्डोस्टेरोन) व जल (ADH) 3. नलिकाकार स्रावण (अम्ल-क्षार संतुलन) • रुधिर से नलिका गुहा में अपशिष्ट पदार्थों का सक्रिय स्रावण • स्रावित घटक: H⁺, K⁺, NH₄⁺, क्रिएटिनिन एवं औषधियां • रुधिर के सामान्य pH (7.35–7.45) का नियमन करता है • आयनिक एवं अम्ल-क्षार संतुलन बनाए रखता है मूत्र = निस्यंदन − पुनरावशोषण + स्रावण 3. प्रतिधारा तंत्र एवं नियमन प्रतिधारा गुणक एवं प्रतिधारा विनिमयक • हेनले लूप (गुणक) + वासा रेक्टा (विनिमयक) • मध्यांशीय प्रवणता: 300 mOsm/L (वल्कुट) → 1200 (मध्यांश) • बनाए रखने वाले घटक: NaCl निष्कासन व यूरिया पुनर्चक्रण • संग्रह नलिका से यूरिया विसरित होकर आरोही भुजा में प्रवेश • अतिपरासारिता ADH के प्रभाव में संग्रह नलिका से जल खींचती है → 4 गुना सांद्रित मूत्र का निर्माण होता है (1200 mOsm/L) हार्मोनल नियमन: ADH, RAAS एवं ANF • ADH / वेसोप्रेसिन (हाइपोथैलेमस): निर्जलीकरण में स्रावित संग्रह नलिका में जल अवशोषण बढ़ाता है; मूत्रलता रोकता है (कमी से डायबिटीज इंसिपिडस: शर्कराहीन बहुमूत्र रोग) • RAAS तंत्र (JGA उपकरण): रुधिर दाब कम होने पर रेनिन → एंजियोटेंसिन II → एल्डोस्टेरोन → Na⁺ एवं जल अवशोषण से दाब पुनः सामान्य • ANF (हृदय आलिंद): उच्च रुधिर दाब पर वाहिका-विस्फारण सोडियम विसर्जन बढ़ाकर RAAS तंत्र का शमन करता है उत्सर्जी तंत्र के विकार एवं हीमोडायलिसिस • यूरीमिया: रुधिर में यूरिया का विषैला संचय (>40 mg/dL) • वृक्क अश्मरी (पथरी): कैल्शियम ऑक्सालेट के क्रिस्टल • ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस: केशिकागुच्छों की तीव्र सूजन • हीमोडायलिसिस (अपोहन): सेलोफेन नलिका युक्त कृत्रिम वृक्क; हेपेरिन मिलाना → विसरण द्वारा यूरिया निष्कासन → एंटी-हेपेरिन मिलाकर शुद्ध रुधिर शरीर में वापस भेजना वृक्क प्रत्यारोपण: अंतिम उपचार; निकट संबंधी से HLA मिलान आवश्यक

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
उत्सर्जन हानिकारक नाइट्रोजनी अपशिष्टों का निष्कासन है; प्राणी अमोनिया-उत्सर्जी (जलीय), यूरिया-उत्सर्जी (स्तनधारी/उभयचर) तथा यूरिक अम्ल-उत्सर्जी (पक्षी, सरीसृप, कीट) होते हैं।
मुख्य बिंदु 2
अकशेरुकियों के प्रमुख अंग: ज्वाला कोशिकाएं (प्लेनेरिया), वृक्कक (केंचुआ), मैलपिगी नलिकाएं (तिलचट्टा) तथा हरित ग्रंथियां (झींगा)।
मुख्य बिंदु 3
मानव वृक्क रेट्रोपेरिटोनियल स्थिति (T12-L3) में पृष्ठ-भित्ति पर होते हैं; बाह्य वल्कुट तथा आंतरिक मध्यांश 8-18 पिरामिडों में विभक्त होता है।
मुख्य बिंदु 4
प्रत्येक वृक्क में 10-12 लाख नेफ्रॉन होते हैं; मध्यांश-समीपस्थ नेफ्रॉन (15%) लंबे लूप व वासा रेक्टा से मध्यांशीय प्रवणता स्थापित करते हैं।
मुख्य बिंदु 5
मूत्र निर्माण के तीन चरण हैं: (1) परानिस्यंदन (NFP = 10 mmHg, GFR = 125 mL/min = 180 L/दिन), (2) चयनात्मक पुनरावशोषण (99% वापस), तथा (3) नलिकाकार स्रावण (H+, K+, NH4+)।
मुख्य बिंदु 6
PCT ब्रश बॉर्डर घनाकार उपकला द्वारा ग्लूकोज व अमीनो अम्लों का 100% तथा जल व लवणों का 70-80% अवशोषित करती है।
मुख्य बिंदु 7
प्रतिधारा गुणक (हेनले लूप) तथा विनिमयक (वासा रेक्टा) मध्यांश में 300 से 1200 mOsm/L की परासरणी प्रवणता बनाते हैं।
मुख्य बिंदु 8
यूरिया पुनर्चक्रण संग्रह नलिका व हेनले लूप के मध्य यूरिया का संचलन कर मध्यांशीय अंतराकाश की सांद्रता को सुरक्षित रखता है।
मुख्य बिंदु 9
वृक्क कार्य का नियमन ADH (जल अवशोषण वृद्धि), RAAS (रेनिन -> एंजियोटेंसिन II -> एल्डोस्टेरोन) तथा ANF (सोडियम विसर्जक विरोधी) द्वारा होता है।
मुख्य बिंदु 10
उत्सर्जी विकार: यूरीमिया (रुधिर में यूरिया वृद्धि), वृक्क अश्मरी (पथरी) तथा ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस; गंभीर स्थिति में हीमोडायलिसिस या वृक्क प्रत्यारोपण किया जाता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
केशिकागुच्छीय निस्यंदन झिल्ली की तीनों परतों के नाम बताइए तथा कौन सी परत प्लाज्मा प्रोटीनों को स्थिरवैद्युत रूप से रोकती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: तीन परतें हैं: (1) छिद्रित अंतःकला (Fenestrated endothelium), (2) वृक्कीय आधार कला (Basement membrane), तथा (3) पोडोसाइट्स की निस्यंदन खांचें। इनमें से ऋणावेशित हेपेरन सल्फेट से युक्त आधार कला एल्ब्यूमिन जैसे ऋणावेशित प्लाज्मा प्रोटीनों को स्थिरवैद्युत प्रतिकर्षण द्वारा रोकती है।
2
हेनले लूप की अवरोही भुजा जल हेतु पारगम्य किंतु आरोही भुजा जल हेतु पूर्णतः अपारगम्य क्यों होती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अवरोही भुजा की कोशिकाओं में उच्च घनत्व वाले एक्वापोरिन-1 (AQP-1) जल चैनल होते हैं तथा कोई सक्रिय लवण पंप नहीं होता। इसके विपरीत आरोही भुजा की कोशिकाओं में एक्वापोरिन जल चैनल नहीं होते और कोशिकाएं अति-सघन संधियों से जुड़ी होती हैं, जिससे जल नहीं गुजर सकता, यद्यपि इसमें सक्रिय Na+/K+/2Cl- को-ट्रांसपोर्टर उपस्थित होते हैं।
3
रक्तदाब कम होने पर जक्सटाग्लोमेरुलर (JG) कोशिकाओं से रेनिन का स्राव कैसे प्रेरित होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: रक्तदाब घटने से अभिवाही धमनिका में रक्त प्रवाह व दाब कम होता है, जिससे भित्ति के दाबग्राही सक्रिय होते हैं। साथ ही GFR कम होने से DCT में NaCl का प्रवाह धीमा हो जाता है, जिसे मैकुला डेंसा कोशिकाएं पहचानकर समीपवर्ती JG कोशिकाओं को रेनिन स्रावित करने का रासायनिक संदेश भेजती हैं।
4
डायबिटीज इंसिपिडस तथा डायबिटीज मेलिटस के रोगी के मूत्र परीक्षण में क्या प्रमुख अंतर पाया जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: डायबिटीज इंसिपिडस के रोगी के मूत्र में ग्लूकोज व कीटोन काय पूर्णतः अनुपस्थित होते हैं और मूत्र अत्यधिक तनु (आपेक्षिक घनत्व <1.005) होता है। डायबिटीज मेलिटस के मूत्र में ग्लूकोज (ग्लाइकोसुरिया) व कीटोन काय उपस्थित होते हैं और मूत्र का आपेक्षिक घनत्व उच्च (>1.030) होता है।
5
हीमोडायलिसिस के दौरान हेपेरिन एवं एंटी-हेपेरिन किस-किस समय और क्यों प्रयुक्त किए जाते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: हेपेरिन रुधिर के डायलाइजर में प्रवेश से ठीक पहले मिलाया जाता है ताकि कृत्रिम सेलोफेन सतह पर रुधिर का थक्का न जमे। एंटी-हेपेरिन (प्रोटामाइन सल्फेट) शुद्धिकरण के बाद रुधिर के रोगी की शिरा में लौटने से ठीक पहले मिलाया जाता है ताकि हेपेरिन निष्प्रभावी हो जाए और सामान्य रक्त स्कंदन क्षमता बहाल हो सके।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

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