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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 16
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

शरीर द्रव और परिसंचरण

शरीर द्रव और परिसंचरण WBCHSE कक्षा 11 जीव विज्ञान के मानव कार्यिकी एकक का तृतीय अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। यह मास्टर पाठ्यक्रम रुधिर संघटन एवं संगठित पदार्थ, सीरम बनाम प्लाज्मा, ABO एवं Rh रुधिर समूह, गर्भ रक्ताणुकोरकता एवं RhoGAM रोकथाम, रुधिर स्कंदन का एंजाइम कैस्केड, लसिका एवं अंतरालीय द्रव कार्यिकी, हृदय की शारीरिक संरचना, मायोजेनिक नोडल चालन तंत्र, 0.8 सेकंड का हृदय चक्र, हृदय ध्वनियां (LUB व DUB), दोहरा परिसंचरण एवं यकृत निवाहिका तंत्र, इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ECG) तरंगें, स्वायत्त तंत्रिकीय नियमन तथा अति-तनाव, एथेरोस्क्लेरोसिस, एंजाइना व हृदय विफलता जैसे विकारों का संपूर्ण अध्ययन कराता है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

परिसंचरण तंत्र एवं तरल गतिकी के जैवभौतिकीय सिद्धांतों को समझना कोशिकीय श्वसन, पोषक तत्व वितरण, हॉर्मोनल संप्रेषण तथा प्रतिरक्षा संतुलन की रक्षा में अनिवार्य है। यह कार्डियोलॉजी, हेमेटोलॉजी, एनेस्थिसियोलॉजी, रक्ताधान चिकित्सा तथा क्रिटिकल केयर थेरेप्यूटिक्स का मूल आधार है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: रुधिर संघटन, संगठित पदार...
2 मॉड्यूल 2: ABO रुधिर समूह, Rh कारक...
3 मॉड्यूल 3: रुधिर स्कंदन की क्रियावि...
4 मॉड्यूल 4: मानव हृदय की शारीरिक संर...
5 मॉड्यूल 5: कार्डियक नोडल चालन तंत्र...
6 मॉड्यूल 6: इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ (...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: रुधिर संघटन, संगठित पदार्थ एवं प्लाज्मा प्रोटीन

रुधिर एक विशेष तरल संयोजी ऊतक है जिसमें एक तरल आधात्री होती है जिसे प्लाज्मा (~55%) कहते हैं तथा इसमें कोशिकाएं तैरती रहती हैं जिन्हें संगठित पदार्थ या रुधिर कोशिकाएं (~45%) कहते हैं। एक स्वस्थ वयस्क मनुष्य में रुधिर का कुल आयतन लगभग 5 से 5.5 लीटर होता है, जो कुल शारीरिक भार का लगभग 7-8% है तथा इसका pH हल्का क्षारीय (7.35 से 7.45) होता है।

रुधिर घटक अनुपात / मात्रा घटक एवं कार्यिकीय महत्व
1. रुधिर प्लाज्मा (Plasma) रुधिर आयतन का लगभग 55% हल्के पीले रंग का चिपचिपा तरल। इसमें 90–92% जल तथा 6–8% प्रोटीन व अन्य विलेय होते हैं:
  • एल्ब्यूमिन (4–4.5%): यकृत द्वारा निर्मित मुख्य प्रोटीन। यह केशिकाओं में कॉलॉइडी परासरणी दाब (~25 mmHg) बनाए रखकर ऊतकों में सूजन को रोकता है।
  • ग्लोब्युलिन (2–2.5%): $\alpha, \beta$ एवं $\gamma$-ग्लोब्युलिन। गामा ($\gamma$) ग्लोब्युलिन (इम्यूनोग्लोबुलिन / एंटीबॉडी) प्लाज्मा B-कोशिकाओं द्वारा प्रतिरक्षा हेतु स्रावित होते हैं।
  • फाइब्रिनोजेन (0.3%): रुधिर स्कंदन (थक्का जमने) हेतु अनिवार्य घुलनशील प्लाज्मा प्रोटीन।
  • अन्य विलेय: आयन ($\text{Na}^+, \text{Ca}^{2+}, \text{Mg}^{2+}, \text{HCO}_3^-, \text{Cl}^-$), पोषक तत्व (ग्लूकोज, अमीनो अम्ल) तथा उत्सर्जी पदार्थ (यूरिया)।
2. संगठित पदार्थ (Formed Elements) रुधिर आयतन का लगभग 45% (हेमैटोक्रिट) लाल अस्थिमज्जा में निर्मित तीन प्रकार की कोशिकाएं:
  • रक्ताणु / लाल रुधिर कणिकाएं (RBC): 50–55 लाख/घन मिमी; उभयावतल, केंद्रकविहीन; हीमोग्लोबिन द्वारा गैसों का परिवहन।
  • श्वेताणु / श्वेत रुधिर कणिकाएं (WBC): 6,000–8,000/घन मिमी; केंद्रकयुक्त; रोग प्रतिरक्षा।
  • पट्टिकाणु / प्लेटलेट्स (Thrombocytes): 1.5–3.5 लाख/घन मिमी; मेगाकैरियोसाइट्स से उत्पन्न टुकड़े जो रुधिर स्कंदन करते हैं।
सीरम की सटीक कार्यिकीय परिभाषा: रुधिर का थक्का जमने के पश्चात थक्के के सिकुड़ने से निकलने वाले हल्के पीले पारदर्शी तरल को सीरम (Serum) कहते हैं। प्लाज्मा में से फाइब्रिनोजेन सहित सभी स्कंदन कारकों को निकाल देने पर बचा हुआ तरल सीरम कहलाता है:
$$\mathbf{\text{सीरम}} = \mathbf{\text{प्लाज्मा}} - \mathbf{\text{स्कंदन कारक}}$$ सीरम कभी भी थक्का नहीं जमा सकता और नैदानिक जांचों में एंटीबॉडीज व बायोकेमिकल परीक्षणों हेतु उपयोग किया जाता है।

लाल रुधिर कणिकाएं (RBCs या एरिथ्रोसाइट्स): सूक्ष्म संरचना

स्वस्थ वयस्क पुरुष में RBCs की संख्या औसतन 50 से 55 लाख प्रति घन मिलीमीटर (तथा स्त्रियों में 45 से 50 लाख प्रति घन मिलीमीटर) होती है।

  • आकृति: गोल एवं उभयावतल (Biconcave disc) चकती के समान (व्यास ~7.2 $\mu\text{m}$)। यह विशिष्ट आकार सतह क्षेत्रफल-से-आयतन अनुपात को अधिकतम करता है जिससे गैस विसरण अत्यंत तीव्र होता है तथा संकरी केशिकाओं से लचीलापन बनाए रखता है।
  • केंद्रकविहीनता: स्तनधारियों की परिपक्व RBCs में केंद्रक, माइटोकॉन्ड्रिया एवं गॉल्जी काय नहीं पाए जाते (अपवाद: ऊँट एवं लामा)। माइटोकॉन्ड्रिया न होने के कारण RBCs अवायवीय ग्लाइकोलिसिस द्वारा ऊर्जा प्राप्त करती हैं, जिससे वे परिवहित की जा रही ऑक्सीजन को स्वयं उपयोग नहीं करतीं।
  • हीमोग्लोबिन: प्रत्येक 100 mL रुधिर में लगभग 12 से 16 ग्राम हीमोग्लोबिन होता है। यह एक संयुग्मी क्रोमोप्रोटीन है जिसमें ग्लोबिन प्रोटीन (दो $\alpha$ व दो $\beta$ श्रृंखलाएं) तथा 4 लौह-युक्त हीम (Heme) समूह होते हैं। प्रत्येक हीमोग्लोबिन अणु 4 ऑक्सीजन ($\text{O}_2$) अणुओं को उत्क्रमणीय रूप से बांध सकता है।
  • जीवनकाल एवं विनाश: इनका औसत जीवनकाल 120 दिन होता है। वृद्ध व कमजोर RBCs प्लीहा (Spleen - "RBCs का कब्रिस्तान") तथा यकृत में मैक्रोफेज द्वारा नष्ट कर दी जाती हैं। हीम का लोहा सुरक्षित रख लिया जाता है तथा शेष भाग से पित्त वर्णक (बिलिरूबिन व बिलिवर्डिन) बनते हैं।

श्वेत रुधिर कणिकाएं (WBCs या ल्यूकोसाइट्स): वर्गीकरण एवं कार्य

श्वेताणु केंद्रकयुक्त, रंगहीन कोशिकाएं हैं (संख्या 6,000–8,000/घन मिमी)। कोशिकाद्रव्य में विशिष्ट कणिकाओं की उपस्थिति के आधार पर इन्हें दो मुख्य वर्गों में बांटा गया है:

क. कणिकाणु (Granulocytes - पालियुक्त केंद्रक व विशिष्ट कणिकाएं)
  • न्यूट्रोफिल (60–65%): सर्वाधिक संख्या; 3 से 5 पालियों वाला केंद्रक (PMNL); उदासीन रंजक से अभिरंजित। भक्षकाणु क्रिया (Phagocytosis) द्वारा जीवाणुओं को भक्षण कर नष्ट करते हैं।
  • ईओसिनोफिल (2–3%): हेडफोननुमा द्विपालित केंद्रक; अम्लीय रंजक (ईओसिन) से चमकीला लाल-नारंगी रंग। हिस्टामिनेज स्रावित कर एलर्जी का शमन करते हैं तथा परजीवियों को नष्ट करते हैं।
  • बेसोफिल (0.5–1%): सबसे कम संख्या; 'S'-आकार का केंद्रक; क्षारीय रंजक (मेथिलीन ब्लू) से गहरा नीला रंग। हिस्टामिन (शोथकारी), सेरोटोनिन तथा हेपरिन (प्राकृतिक प्रतिस्कंदक) स्रावित करते हैं।
ख. अकणिकाणु (Agranulocytes - अपालित केंद्रक व कणिकारहित)
  • मोनोसाइट (6–8%): सबसे बड़ी ल्यूकोसाइट; वृक्काकार (गुर्देनुमा) केंद्रक। रक्त से ऊतकों में जाकर (डायपिडेसिस) विशाल मैक्रोफेज में रूपांतरित होकर रोगाणुओं का भक्षण करते हैं।
  • लिम्फोसाइट (20–25%): दूसरी प्रमुख WBC; बड़ा गोल केंद्रक। B-लिम्फोसाइट्स (एंटीबॉडीज बनाकर तरल प्रतिरक्षा) एवं T-लिम्फोसाइट्स (कोशिका-माध्यित प्रतिरक्षा) द्वारा शरीर की रक्षा करते हैं।

पट्टिकाणु या प्लेटलेट्स (Platelets): अस्थिमज्जा की विशाल मेगाकैरियोसाइट कोशिकाओं के विखंडन से बने केंद्रकविहीन सूक्ष्म टुकड़े (संख्या 1.5–3.5 लाख/घन मिमी)। आयु 7–10 दिन। रुधिर वाहिनी के क्षतिग्रस्त होने पर थ्रोम्बोप्लास्टिन स्रावित कर रुधिर स्कंदन करते हैं। इनकी कमी (थ्रोम्बोसाइटोपेनिया) से अनियंत्रित रक्तस्राव होता है।

मॉड्यूल 2: ABO रुधिर समूह, Rh कारक एवं गर्भ रक्ताणुकोरकता

सुरक्षित रक्ताधान हेतु दाता एवं आदाता के रुधिर की प्रतिरक्षात्मक अनुकूलता अनिवार्य है। प्रतिकूल रक्ताधान करने पर आदाता की एंटीबॉडीज दाता की RBCs का समूहन (Agglutination) कर देती हैं जिससे रक्त वाहिकाएं अवरुद्ध हो जाती हैं और हीमोलिसिस से मृत्यु हो सकती है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण दो प्रणालियां ABO प्रणाली एवं Rh प्रणाली हैं।

रुधिर वर्ग RBCs सतह पर प्रतिजन (Agglutinogens) प्लाज्मा में प्रतिरक्षी (Agglutinins) किसे रुधिर दे सकता है किससे रुधिर ले सकता है
A प्रतिजन A एंटी-B (b) A, AB A, O
B प्रतिजन B एंटी-A (a) B, AB B, O
AB प्रतिजन A एवं B दोनों कोई प्रतिरक्षी नहीं केवल AB A, B, AB, O (सर्वग्राही)
O कोई प्रतिजन नहीं एंटी-A एवं एंटी-B दोनों A, B, AB, O (सर्वदाता) केवल O

Rh कारक (Rh Factor / Rhesus Antigen)

कार्ल लैंडस्टीनर एवं अलेक्जेंडर वीनर (1940) ने रीसस बंदर की RBCs में पहली बार इसकी खोज की थी। लगभग 80% मनुष्यों की RBCs पर Rh प्रतिजन (D-एंटीजन) पाया जाता है ($\text{Rh}^+$), जबकि शेष 20% में यह अनुपस्थित होता है ($\text{Rh}^-$)।

  • ABO समूह की तरह Rh प्रतिरक्षी सामान्यतः प्लाज्मा में पहले से नहीं पाए जाते। जब किसी $\text{Rh}^-$ व्यक्ति को $\text{Rh}^+$ रुधिर दिया जाता है, तभी उसके रुधिर में एंटी-Rh एंटीबॉडीज बनते हैं।
  • पहली बार $\text{Rh}^+$ रुधिर देने पर तत्काल गंभीर प्रतिक्रिया नहीं होती, परंतु व्यक्ति संवेदनशील हो जाता है। दूसरी बार पुनः $\text{Rh}^+$ रुधिर देने पर तीव्र हीमोलिसिस होकर मृत्यु हो सकती है।

गर्भ रक्ताणुकोरकता (Erythroblastosis Fetalis / नवजात शिशु का हीमोलिटिक रोग)

यह एक गंभीर कार्यिकीय विकार है जो $\text{Rh}^-$ माता तथा उसके $\text{Rh}^+$ भ्रूण (पिता से वंशानुगत) के बीच Rh असंगति के कारण उत्पन्न होता है:

  1. प्रथम गर्भधारण (संवेदीकरण): पहली गर्भावस्था में अपरा (प्लेसेंटा) माता व भ्रूण के रुधिर को मिलने नहीं देती। परंतु प्रसव के समय अपरा के क्षतिग्रस्त होने पर कुछ $\text{Rh}^+$ भ्रूणीय RBCs माता के रुधिर में प्रविष्ट हो जाती हैं। माता का प्रतिरक्षा तंत्र इसे पहचानकर एंटी-Rh एंटीबॉडीज (IgG वर्ग) बना लेता है। प्रथम शिशु सुरक्षित जन्म ले लेता है।
  2. द्वितीय $\text{Rh}^+$ गर्भधारण (हीमोलिटिक आक्रमण): अगली गर्भावस्था में यदि पुनः $\text{Rh}^+$ भ्रूण हो, तो माता के रुधिर से सूक्ष्म IgG एंटी-Rh प्रतिरक्षी अपरा को पार कर भ्रूण के रुधिर में पहुँच जाते हैं और भ्रूण की $\text{Rh}^+$ RBCs को तेजी से नष्ट करने लगते हैं।
  3. लक्षण एवं परिणाम: भ्रूण में गंभीर रक्ताल्पता (एनीमिया), अत्यधिक पीलिया (बिलिरूबिन जमाव से मस्तिष्क क्षति / कर्निकटेरस), रक्त में अपरिपक्व केंद्रकयुक्त एरिथ्रोब्लास्ट कोशिकाओं की उपस्थिति तथा गंभीर सूजन (Hydrops fetalis), जिससे गर्भ में ही मृत्यु हो सकती है।
  4. रोकथाम: प्रथम $\text{Rh}^+$ शिशु के जन्म के 72 घंटे के भीतर $\text{Rh}^-$ माता को एंटी-Rh एंटीबॉडीज (RhoGAM / एंटी-D इम्युनोग्लोबुलिन) का इंजेक्शन लगाया जाता है। यह माता के रुधिर में आई भ्रूणीय RBCs को नष्ट कर देता है जिससे माता में स्थायी एंटीबॉडीज नहीं बन पातीं।

मॉड्यूल 3: रुधिर स्कंदन की क्रियाविधि (क्लॉटिंग कैस्केड) एवं लसिका

रक्तस्राव रोध (Hemostasis) वह शारीरिक प्रक्रिया है जो रक्त वाहिकाओं के कटने पर अत्यधिक रक्त हानि को रोकती है। इसका मुख्य चरण रुधिर स्कंदन (Blood Coagulation) है, जिसमें तरल रुधिर एक अघुलनशील जेलीनुमा फाइब्रिन जाल में बदलकर थक्के का रूप धारण कर लेता है।

रुधिर स्कंदन का एंजाइम कैस्केड सिद्धांत (Enzyme Cascade Theory)

प्लाज्मा में 13 स्कंदन कारक अक्रिय अवस्था में घूमते रहते हैं। चोट लगने पर एक उत्प्रेरकीय शृंखला अभिक्रिया प्रारंभ होती है जो मुख्यतः तीन चरणों में संपन्न होती है:

चरण 1: थ्रोम्बोकाइनेज (प्रोथ्रोम्बीनेज) संकुल का निर्माण
क्षतिग्रस्त स्थल दो मार्गों से उद्दीप्त होता है:
  • बाह्य मार्ग (Extrinsic pathway): क्षतिग्रस्त ऊतकों से स्रावित ऊतक थ्रोम्बोप्लास्टिन (कारक III) द्वारा तीव्र गति से (15 सेकंड में) प्रारंभ होता है।
  • आंतरिक मार्ग (Intrinsic pathway): वाहिका के कटने पर कोलेजन के संपर्क में आने से कारक XII तथा विखंडित प्लेटलेट्स से निकले प्लेटलेट कारक 3 (PF3) द्वारा प्रारंभ होता है (1–6 मिनट)।
  • दोनों मार्ग मिलकर कैल्शियम आयन ($\text{Ca}^{2+}$, कारक IV) एवं कारक V की उपस्थिति में सक्रिय एंजाइम संकुल थ्रोम्बोकाइनेज (प्रोथ्रोम्बीनेज) का निर्माण करते हैं।
चरण 2: प्रोथ्रोम्बिन का थ्रोम्बिन में रूपांतरण
सक्रिय थ्रोम्बोकाइनेज संकुल $\text{Ca}^{2+}$ आयनों की सहायता से प्लाज्मा के अक्रिय ग्लोब्युलिन प्रोथ्रोम्बिन (कारक II) को सक्रिय प्रोटीयोलाइटिक एंजाइम थ्रोम्बिन में परिवर्तित कर देता है:
$$\text{प्रोथ्रोम्बिन (अक्रिय)} \xrightarrow[\text{Ca}^{2+}]{\text{थ्रोम्बोकाइनेज}} \text{थ्रोम्बिन (सक्रिय)}$$
चरण 3: फाइब्रिनोजेन से अघुलनशील फाइब्रिन जाल का निर्माण
सक्रिय थ्रोम्बिन घुलनशील फाइब्रिनोजेन (कारक I) को जल-अपघटित कर अघुलनशील फाइब्रिन मोनोमर्स में बदलता है जो बहुलीकृत होकर लंबे फाइब्रिन तंतु बनाते हैं। $\text{Ca}^{2+}$ एवं कारक XIII (फाइब्रिन स्थिरक कारक) इन तंतुओं को आपस में बांधकर एक सुदृढ़ त्रिविमीय जाल बना देते हैं:
$$\text{फाइब्रिनोजेन (घुलनशील)} \xrightarrow{\text{थ्रोम्बिन}} \text{फाइब्रिन एकलक} \xrightarrow[\text{कारक XIII}]{\text{Ca}^{2+}} \text{फाइब्रिन जाल (अघुलनशील थक्का)}$$ इस फाइब्रिन जाल में रक्त कोशिकाएं उलझ जाती हैं जिससे थक्का (Thrombus) बनकर रक्त बहना बंद हो जाता है।

कैल्शियम आयन, विटामिन K एवं प्रतिस्कंदक

  • कैल्शियम आयनों ($\text{Ca}^{2+}$) की अनिवार्यता: कारक IV स्कंदन प्रक्रिया के लगभग प्रत्येक पद में एंजाइम संकुलों को जोड़ने तथा फाइब्रिन तंतुओं के स्थिरीकरण हेतु अनिवार्य अकार्बनिक सहकारक है। इसके बिना स्कंदन संभव नहीं है।
  • विटामिन K की भूमिका: यकृत में चार प्रमुख स्कंदन कारकों—कारक II (प्रोथ्रोम्बिन), कारक VII, कारक IX एवं कारक X के संश्लेषण में ग्लूटेमिक अम्ल के कार्बोक्सिलीकरण हेतु विटामिन K अनिवार्य सह-एंजाइम है। इसकी कमी से गंभीर रक्तस्राव विकार हो जाता है।
  • प्रतिस्कंदक (Anticoagulants):
    • प्राकृतिक प्रतिस्कंदक: हेपरिन (Heparin), जो बेसोफिल व मास्ट कोशिकाओं द्वारा स्रावित होकर वाहिकाओं में रक्त को जमने से रोकता है।
    • प्रयोगशाला प्रतिस्कंदक: सोडियम साइट्रेट, ऑक्सालेट एवं EDTA, जो रक्त के $\text{Ca}^{2+}$ आयनों को अवक्षेपित कर परखनली में स्कंदन रोकते हैं।

लसिका या ऊतक द्रव (Lymph / Tissue Fluid): मध्यस्थ माध्यम

जब रुधिर सूक्ष्म केशिकाओं से प्रवाहित होता है, तो उच्च द्रवस्थैतिक दाब के कारण जल एवं सूक्ष्म घुलित पदार्थ छनकर अंतराकोशिकीय अवकाश में आ जाते हैं जिसे ऊतक द्रव (अंतरालीय द्रव) कहते हैं। जब यह द्रव विशेष लसिका वाहिनियों में प्रवेश करता है, तो इसे लसिका (Lymph) कहते हैं।

  • संघटन: लसिका रंगहीन, हल्का क्षारीय द्रव है। यह प्लाज्मा जैसा ही होता है, परंतु इसमें प्रोटीन की मात्रा बहुत कम होती है, RBCs व प्लेटलेट्स नहीं होते, तथा इसमें प्रचुर मात्रा में लिम्फोसाइट्स पाए जाते हैं।
  • कार्यिकीय महत्व:
    • मध्यस्थ: रक्त एवं कोशिकाओं के बीच पोषक तत्वों, गैसों एवं हॉर्मोनों के आदान-प्रदान का माध्यम।
    • वसा अवशोषण: आंत के रसांकुरों में उपस्थित केंद्रीय लसिका वाहिनी यानी लैक्टियल (Lacteal) द्वारा वसा का काइलोमाइक्रोन रूप में अवशोषण।
    • प्रतिरक्षा: लसिका ग्रंथियों में उपस्थित लिम्फोसाइट्स रोगाणुओं को नष्ट कर शरीर की रक्षा करते हैं।
    • द्रव संतुलन: प्रतिदिन 2-4 लीटर अतिरिक्त ऊतक द्रव लसिका तंत्र द्वारा पुनः शिरा रुधिर में लौटा दिया जाता है। लसिका वाहिनी अवरुद्ध होने पर ऊतकों में द्रव भरने से भारी सूजन या शोथ (Edema / हाथीपांव) हो जाता है।

मॉड्यूल 4: मानव हृदय की शारीरिक संरचना, कपाटिकाएं एवं दोहरा परिसंचरण

मानव हृदय मध्यजनस्तर (Mesoderm) से व्युत्पन्न, खोखला, पेशीय पंप है जो वक्ष गुहा में दोनों फेफड़ों के बीच मध्यस्थानिका (Mediastinum) में बाईं ओर थोड़ा झुका हुआ स्थित होता है। इसका आकार बंद मुट्ठी के बराबर (~12 सेमी लंबा, 9 सेमी चौड़ा, भार लगभग 250–300 ग्राम) होता है तथा यह प्रतिदिन 7,000 लीटर से अधिक रुधिर पंप करता है।

हृदयावरण (Pericardium) एवं हृदय भित्ति

हृदय दोहरी झिल्ली वाले हृदयावरण (Pericardium) थैले द्वारा सुरक्षित रहता है:

  • तंतुमय हृदयावरण: बाहरी मजबूत रेशेदार परत जो हृदय को उरोस्थि व डायफ्राम से साधे रखती है।
  • सीरमी हृदयावरण: दो परतें—बाहरी पैराइटल परत तथा आंतरिक विसरल परत (एपीकार्डियम)।
  • हृदयावरणी गुहा व द्रव: इन दोनों परतों के बीच 15 से 50 mL हृदयावरणी द्रव (Pericardial fluid) भरा रहता है जो धड़कन के समय घर्षण को रोकता है।
  • हृदय भित्ति के तीन स्तर:
    • एपीकार्डियम: बाह्य पतली सीरमी परत।
    • मायोकार्डियम: मध्यवर्ती मोटी पेशी परत जो शाखित कार्डियक पेशी तंतुओं से बनी होती है। कोशिकाएं इंटरकैलेटेड डिस्क (गैप जंक्शन) द्वारा जुड़ी होकर एक संयुक्त इकाई (Syncytium) के रूप में कार्य करती हैं।
    • एंडोकार्डियम: आंतरिक चिकनी एंडोथीलियल परत जो रक्त वाहिकाओं के भीतरी अस्तर से सतत होती है।
हृदय कोष्ठ रुधिर लाने वाली वाहिकाएं (इनफ्लो) रुधिर ले जाने वाली वाहिकाएं (आउटफ्लो) संरचनात्मक एवं दाब लक्षण
दायां आलिंद (Right Atrium) अग्र व पश्च महाशिरा (SVC व IVC) तथा कोरोनरी साइनस। दाएं निलय में (त्रिवलनी कपाटिका द्वारा)। संपूर्ण शरीर से अनॉक्सीकृत रुधिर ग्रहण करता है। भित्ति पतली; अंतरा-आलिंद पट पर भ्रूणीय रंध्र का अवशेष फोसा ओवेलिस स्थित होता है।
दायां निलय (Right Ventricle) दाएं आलिंद से। फुप्फुसीय चाप (Pulmonary trunk)। कम दाब पर (25 mmHg) फेफड़ों में रुधिर भेजता है। भित्ति की मोटाई 4–5 मिमी होती है।
बायां आलिंद (Left Atrium) 4 फुप्फुसीय शिराएं (ऑक्सीकृत रुधिर लाती हैं; कपाटिकारहित)। बाएं निलय में (द्विवलनी कपाटिका द्वारा)। फेफड़ों से शुद्ध ऑक्सीकृत रुधिर प्राप्त करता है। आंतरिक भित्ति चिकनी होती है।
बायां निलय (Left Ventricle) बाएं आलिंद से। दैहिक महाधमनी (Systemic Aorta)। उच्च दाब पर (120 mmHg) पूरे शरीर में रुधिर पंप करता है। इसकी मायोकार्डियम भित्ति दाएं निलय से 3 गुना अधिक मोटी (12–15 मिमी) होती है।

कपाटिकाएं एवं कॉर्डा टेंडिनी

  • आलिंद-निलय कपाटिकाएं (AV Valves):
    • त्रिवलनी कपाटिका (Tricuspid Valve): दाएं आलिंद-निलय छिद्र पर 3 वलनों (Cusps) वाली कपाटिका।
    • द्विवलनी या मिट्रल कपाटिका (Bicuspid / Mitral Valve): बाएं आलिंद-निलय छिद्र पर 2 वलनों वाली कपाटिका।
    • कॉर्डा टेंडिनी (Chordae Tendineae): कपाटिकाओं के मुक्त सिरे मजबूत रेशेदार डोरियों द्वारा निलय भित्ति की पैपिलरी पेशियों (Papillary muscles) से जुड़े रहते हैं। निलय प्रकुंचन के समय पैपिलरी पेशियां खींचकर कपाटिकाओं को आलिंद की ओर उलटने से रोकती हैं।
  • अर्धचंद्राकार कपाटिकाएं (Semilunar Valves): फुप्फुसीय धमनी एवं महाधमनी के निकास पर 3-3 अर्धचंद्राकार पॉकेटनुमा कपाटिकाएं होती हैं जो निलय शिथिलन के समय रुधिर को पुनः निलय में लौटने से रोकती हैं।

दोहरा परिसंचरण एवं विशेष निवाहिका तंत्र

मनुष्य में पूर्ण दोहरा परिसंचरण (Double Circulation) पाया जाता है, जिसमें रुधिर एक पूर्ण चक्र में हृदय से दो बार गुजरता है तथा शुद्ध व अशुद्ध रुधिर का कोई मिश्रण नहीं होता:

  • 1. फुप्फुसीय परिसंचरण (Pulmonary Circulation): दायां निलय $\to$ फुप्फुसीय धमनी $\to$ फेफड़े (ऑक्सीजनीकरण) $\to$ 4 फुप्फुसीय शिराएं $\to$ बायां आलिंद।
  • 2. दैहिक परिसंचरण (Systemic Circulation): बायां निलय $\to$ महाधमनी $\to$ धमनियां व केशिकाएं $\to$ शारीरिक ऊतक $\to$ शिराएं ও महाशिराएं $\to$ दायां आलिंद।
  • 3. यकृत निवाहिका तंत्र (Hepatic Portal System): आमाशय, आंत, अग्न्याशय व प्लीहा से रुधिर सीधे हृदय में न जाकर यकृत निवाहिका शिरा (Hepatic Portal Vein) द्वारा पहले यकृत (Liver) में प्रवेश करता है जहाँ यह पुनः केशिकाओं (साइनसॉइड्स) में बंटता है। इससे पाचित भोजन का यकृत में सीधा संचय व विषहरण संभव होता है।
  • 4. कोरोनरी परिसंचरण (Coronary Circulation): महाधमनी के आधार से दाईं व बाईं कोरोनरी धमनियां निकलकर स्वयं हृदय पेशी को रक्त पहुंचाती हैं और कोरोनरी साइनस द्वारा दायां आलिंद में रक्त लौटाती हैं।

मॉड्यूल 5: कार्डियक नोडल चालन तंत्र, हृदय चक्र एवं हृदय ध्वनियां

मानव हृदय मायोजेनिक (Myogenic) होता है, अर्थात इसके स्पंदन का मूल आवेग किसी बाह्य तंत्रिका प्रेरणा के बिना हृदय के अपने रूपांतरित पेशी ऊतक यानी नोडल ऊतक में स्वतः उत्पन्न होता है। शरीर से बाहर निकाले जाने पर भी हृदय पोषक घोल में धड़कता रहता है।

नोडल चालन तंत्र एवं पेसमेकर व्यवस्था

विशिष्ट चालन तंत्र चार प्रमुख भागों से मिलकर बना है:

  • 1. साइनो-ऑरिकुलर नोड (SA नोड - प्राकृतिक पेसमेकर): दाएं आलिंद की ऊपरी भित्ति में अग्र महाशिरा के छिद्र के पास स्थित। इसकी कोशिकाएं स्वतः सर्वाधिक दर (70 से 75 स्पंदन प्रति मिनट, औसत 72 bpm) से क्रिया विभव उत्पन्न करती हैं। यह हृदय की गति तय करता है, अतः इसे हृदय का पेसमेकर (Pacemaker) कहते हैं।
  • 2. ऑरिकुलो-वेंट्रिकुलर नोड (AV नोड - पेससेटर): दाएं आलिंद के निचले बाएं कोने में अंतरा-आलिंद पट के पास स्थित। यह आवेग ग्रहण कर लगभग 0.1 सेकंड का कार्यिकीय विलंब (AV nodal delay) उत्पन्न करता है, जिससे आलिंदों का रुधिर पूरी तरह निलयों में पहुँचने के बाद ही निलय संकुचित हों।
  • 3. हिस का बंडल (Bundle of His): आलिंद-निलय पट से निकलकर अंतरा-निलय पट के ऊपर दाईं व बाईं शाखाओं में बंट जाता है।
  • 4. पुरकिंजे तंतु (Purkinje Fibers): निलय मायोकार्डियम में फैला विशेष पेशी तंतुओं का जाल। यह अत्यधिक तीव्र गति (लगभग 4 मीटर/सेकंड) से आवेग प्रसारित करता है जिससे दोनों निलयों का संकुचन एक साथ सुसंगत रूप से होता है।
SA नोड $\xrightarrow{}$ आलिंद पेशी $\xrightarrow{\text{0.1s विलंब}}$ AV नोड $\xrightarrow{}$ हिस बंडल $\xrightarrow{}$ पुरकिंजे तंतु $\xrightarrow{}$ निलय पेशी

हृदय चक्र (Cardiac Cycle: अवधि 0.8 सेकंड)

विश्राम में 72 स्पंदन/मिनट की दर पर एक एकल हृदय चक्र पूर्ण होने में ठीक 0.8 सेकंड का समय लगता है ($\frac{60\text{ सेकंड}}{72\text{ स्पंदन}} \approx 0.83\text{ s}$):

1. संयुक्त अनुशिथिलन (Joint Diastole - अवधि: 0.4 सेकंड)
हृदय के चारों कोष्ठ शिथिल अवस्था में होते हैं। त्रिवलनी व द्विवलनी कपाटिकाएं खुली तथा अर्धचंद्राकार बंद होती हैं। शिराओं से रुधिर आलिंदों से होकर सीधे निलयों में प्रवेश करता है जिससे निलयों का लगभग 70% भराव निष्क्रिय रूप से पूर्ण होता है।
2. आलिंद प्रकुंचन (Atrial Systole - अवधि: 0.1 सेकंड)
SA नोड द्वारा उद्दीप्त होकर दोनों आलिंद एक साथ संकुचित होते हैं और शेष 30% रुधिर तीव्रता से निलयों में धकेल दिया जाता है। इसके पश्चात निलय में कुल रुधिर आयतन एंड-डायस्टोलिक वॉल्यूम ($\text{EDV} \approx 120\text{ mL}$) कहलाता है।
3. निलय प्रकुंचन (Ventricular Systole - अवधि: 0.3 सेकंड)
AV नोड से पुरकिंजे तंतुओं द्वारा आवेग फैलने पर निलय संकुचित होते हैं:
  • समआयतनिक संकुचन: दाब बढ़ने पर त्रिवलनी व द्विवलनी कपाटिकाएं सवेग बंद हो जाती हैं (प्रथम हृदय ध्वनि: 'LUB' उत्पन्न होती है)।
  • रुधिर निक्षेपण: निलय दाब धमनियों के दाब (महाधमनी में 80 mmHg) से अधिक होते ही अर्धचंद्राकार कपाटिकाएं खुल जाती हैं और प्रत्येक निलय से 70 mL रुधिर धमनियों में चला जाता है (स्ट्रोक आयतन)। अंत में निलय में एंड-सिस्टोलिक वॉल्यूम ($\text{ESV} \approx 50\text{ mL}$) बचता है।
4. निलय अनुशिथिलन (Ventricular Diastole - अवधि: 0.5 सेकंड)
निलय शिथिल होते हैं और दाब घटता है। धमनियों का रुधिर वापस लौटने से अर्धचंद्राकार कपाटिकाएं सवेग बंद हो जाती हैं (द्वितीय हृदय ध्वनि: 'DUB' उत्पन्न होती है)। तत्पश्चात पुनः संयुक्त अनुशिथिलन प्रारंभ होता है।
हृदय ध्वनि ध्वनि रूप ध्वनि की विशेषताएं उत्पत्ति का भौतिक कारण चक्र में समय
प्रथम हृदय ध्वनि ($S_1$) "LUB" (लब) मंद, भारी, लंबी अवधि (~0.12 सेकंड), निम्न आवृत्ति (25–45 Hz)। निलय प्रकुंचन के प्रारंभ में आलिंद-निलय (त्रिवलनी व द्विवलनी) कपाटिकाओं के एक साथ बंद होने से। निलय प्रकुंचन के आरंभ में (ECG में R-तरंग के साथ)।
द्वितीय हृदय ध्वनि ($S_2$) "DUB" (डब) तीखी, स्पष्ट, छोटी अवधि (~0.08 सेकंड), उच्च आवृत्ति (50 Hz)। निलय अनुशिथिलन के प्रारंभ में अर्धचंद्राकार (महाधमनी व फुप्फुसीय) कपाटिकाओं के सवेग बंद होने से। निलय अनुशिथिलन के आरंभ में (ECG में T-तरंग के अंत में)।

मॉड्यूल 6: इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ (ECG), हृदय निर्गम एवं परिसंचरण तंत्र के विकार

एक इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ECG) प्रत्येक हृदय चक्र के दौरान हृदय पेशी के संकुचन एवं शिथिलन से उत्पन्न होने वाले समग्र विद्युत विभव परिवर्तनों का आलेखीय निरूपण है, जिसे शरीर की सतह पर इलेक्ट्रोड लगाकर इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ उपकरण द्वारा रिकॉर्ड किया जाता है (विलियम आइनथोवेन द्वारा खोजी गई, नोबेल पुरस्कार 1924)।

आदर्श ईसीजी तरंगें एवं नैदानिक महत्व

  • P-तरंग (P-Wave): छोटी ऊपर की ओर उठी तरंग। यह SA नोड से आवेग फैलने के कारण दोनों आलिंदों के विध्रुवण (Depolarization) को दर्शाती है, जिससे आलिंद प्रकुंचन होता है।
  • QRS सम्मिश्र (QRS Complex): तीव्र त्रिफासिक तरंग। यह दोनों निलयों के द्रुत विध्रुवण को दर्शाता है। Q तरंग के ठीक पश्चात निलय प्रकुंचन प्रारंभ होता है। प्रति मिनट QRS सम्मिश्रों की संख्या गिनकर रोगी की हृदय दर ज्ञात की जाती है।
  • T-तरंग (T-Wave): गुंबदनुमा चिकनी तरंग। यह निलयों के पुनर्ध्रुवण (Repolarization) को दर्शाती है, अर्थात उत्तेजित अवस्था से निलयों का अपनी सामान्य विश्राम स्थिति में लौटना। T-तरंग की समाप्ति निलय प्रकुंचन का अंत सूचित करती है।
  • नैदानिक उपयोग:
    • हृदय दर निर्धारण: एक मिनट में QRS तरंगों की कुल संख्या।
    • P-R अंतराल वृद्धि: 0.20 सेकंड से अधिक होना AV नोडल ब्लॉक दर्शाता है।
    • ST-खंड का उभार (ST Elevation): तीव्र मायोकार्डियल इन्फार्कशन (हार्ट अटैक) का मुख्य लक्षण।
    • T-तरंग का उलटना: हृदय पेशी में दीर्घकालिक ऑक्सीजन की कमी (इस्किमिया) दर्शाता है।

हृदय निर्गम (Cardiac Output) एवं तंत्रिकीय नियमन

हृदय निर्गम (Cardiac Output - CO) प्रत्येक निलय द्वारा प्रति मिनट पंप किए गए रुधिर का कुल आयतन है:

$$\mathbf{\text{हृदय निर्गम (CO)}} = \mathbf{\text{स्ट्रोक आयतन (SV)}} \times \mathbf{\text{हृदय दर (HR)}} = 70\text{ mL} \times 72/\text{मिनट} \approx \mathbf{5,040\text{ mL/मिनट}} \approx \mathbf{5\text{ लीटर/मिनट}}$$

प्रशिक्षित एथलीटों में स्ट्रोक आयतन अधिक (~100 mL) तथा विश्राम हृदय दर कम (~50 bpm) होती है, जिससे कठिन व्यायाम में वे अपना हृदय निर्गम 25 से 35 लीटर/मिनट तक बढ़ा सकते हैं (कार्डियक रिजर्व)।

मेडुला ऑबलांगाटा के हृदय केंद्र द्वारा नियमन:

  • अनुकंपी तंत्रिका तंत्र (SNS): नॉरएड्रेनेलिन स्रावित कर SA नोड को उद्दीप्त करता है, जिससे हृदय दर, निलय संकुचन बल तथा हृदय निर्गम बढ़ जाता है।
  • परानुकंपी तंत्रिका तंत्र (PNS - वैगस तंत्रिका, X-वीं कपालीय तंत्रिका): एसिटाइलकोलिन (ACh) स्रावित कर SA नोड को शिथिल करता है जिससे हृदय दर और हृदय निर्गम घट जाता है।
  • हॉर्मोनल नियमन: एड्रीनल मेडुला से स्रावित एड्रीनेलिन व नॉरएड्रीनेलिन संकटकालीन परिस्थितियों में हृदय दर एवं निर्गम बढ़ाते हैं।

परिसंचरण तंत्र के प्रमुख विकार

  • अति-तनाव या उच्च रक्तदाब (Hypertension): सामान्य रक्तदाब 120/80 mmHg की तुलना में लगातार 140/90 mmHg या अधिक बना रहना। इससे बायां निलय बड़ा हो जाता है, मस्तिष्क में स्ट्रोक तथा गुर्दे खराब हो सकते हैं।
  • कोरोनरी धमनी रोग (CAD) या एथेरोस्क्लेरोसिस (Atherosclerosis): हृदय पेशी को रक्त पहुंचाने वाली कोरोनरी धमनियों की आंतरिक भित्ति में कोलेस्ट्रॉल, वसा, कैल्शियम व तंतुमय ऊतक जमा होकर 'प्लाक' बना देते हैं जिससे धमनियां संकरी हो जाती हैं।
  • हृदशूल (Angina Pectoris): हृदय पेशी में अस्थायी रूप से रक्त व ऑक्सीजन की भारी कमी के कारण सीने के मध्य में तीव्र, दम घोंटू दर्द जो बाएं कंधे व बांह में फैलता है। इसमें हृदय पेशी की स्थायी मृत्यु नहीं होती। विश्राम व नाइट्रोग्लिसरीन से दर्द ठीक हो जाता है।
  • हृदयाघात या हार्ट अटैक (Myocardial Infarction): कोरोनरी धमनी में थक्का फंसकर रक्त प्रवाह पूरी तरह रुक जाने से संबंधित हृदय पेशी की ऑक्सीजन अभाव में स्थायी मृत्यु (नेक्रोसिस) हो जाती है। सीने में असहनीय दर्द, पसीना व ईसीजी में ST उभार दिखता है।
  • हृदय विफलता (Heart Failure): वह स्थिति जिसमें हृदय शरीर की आवश्यकताओं के अनुरूप पर्याप्त रुधिर पंप नहीं कर पाता। फेफड़ों में रक्त का जमाव होने के कारण इसे कंजेस्टिव हार्ट फेलियर (CHF) कहते हैं।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण अंतर:
  • हृदय विफलता (Heart Failure): हृदय द्वारा अप्रभावी पंपिंग (पंप की कमजोरी)।
  • कार्डियक अरेस्ट (Cardiac Arrest): हृदय की धड़कन का पूरी तरह रुक जाना।
  • हार्ट अटैक (Myocardial Infarction): रक्त अवरोध से हृदय पेशी ऊतक का नष्ट होना।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

हृदय निर्गम (Cardiac Output) का मूल समीकरण
विश्राम में स्वस्थ वयस्क में 5.0 से 5.5 लीटर/मिनट
प्रति मिनट हृदय के प्रत्येक निलय द्वारा दैहिक या फुप्फुसीय परिसंचरण में पंप किए गए रुधिर का कुल आयतन।
स्ट्रोक आयतन (Stroke Volume) समीकरण
प्रति स्पंदन प्रत्येक निलय से 70 mL रुधिर निकलता है
एकल निलय प्रकुंचन के समय निलय से धमनियों में निक्षेपित रुधिर का आयतन।
माध्य धमनी दाब (Mean Arterial Pressure - MAP) सूत्र
93.3 mmHg (सामान्य सीमा: 70–105 mmHg)
संपूर्ण हृदय चक्र में केशिकाओं में रुधिर प्रवाह बनाए रखने वाला औसत प्रभावी दाब।
नाड़ी दाब (Pulse Pressure) समीकरण
40 mmHg (वयस्क सामान्य मान)
प्रकुंचन एवं अनुशिथिलन के बीच धमनी रक्तदाब के उतार-चढ़ाव का विस्तार।
रुधिर स्कंदन कैस्केड का रासायनिक समीकरण
मनुष्य में रुधिर स्कंदन काल सामान्यतः 3 से 8 मिनट होता है
घुलनशील फाइब्रिनोजेन को अघुलनशील फाइब्रिन जाल में बदलने वाली एंजाइम कैस्केड अभिक्रिया।
सीरम की समीकरण परिभाषा
थक्का बनने के बाद निकला पारदर्शी हल्का पीला तरल
स्कंदन कारकों से रहित प्लाज्मा जो स्वयं कभी भी थक्का नहीं बना सकता।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
मानव रुधिर के कोशिकीय संघटन का विवरण दीजिए। उत्पत्ति, केंद्रक की संरचना, अभिरंजन तथा प्रतिरक्षात्मक कार्य के आधार पर कणिकाणु एवं अकणिकाणु में अंतर स्पष्ट कीजिए। [2 + 3 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
पहला भाग: रुधिर का कोशिकीय संघटन (2 अंक):
रुधिर के कुल आयतन का लगभग 45% भाग संगठित पदार्थों यानी रुधिर कोशिकाओं से बना होता है, जो तीन प्रकार की होती हैं:
1. रक्ताणु (RBCs): 50 से 55 लाख/घन मिमी; उभयावतल, केंद्रकविहीन; हीमोग्लोबिन द्वारा ऑक्सीजन व कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन।
2. श्वेताणु (WBCs): 6,000 से 8,000/घन मिमी; केंद्रकयुक्त कोशिकाएं जो रोगाणुओं से शरीर की रक्षा करती हैं।
3. पट्टिकाणु (Platelets): 1.5 से 3.5 लाख/घन मिमी; अस्थिमज्जा की मेगाकैरियोसाइट कोशिकाओं के विखंडन से बने टुकड़े जो रुधिर स्कंदन करते हैं।

दूसरा भाग: कणिकाणु एवं अकणिकाणु में तुलनात्मक अंतर (3 अंक):
लक्षण कणिकाणु (Granulocytes) अकणिकाणु (Agranulocytes)
कोशिकाद्रव्यी कणिकाएं कोशिकाद्रव्य में विशिष्ट रंजकग्राही कणिकाएं उपस्थित होती हैं। कोशिकाद्रव्य में कोई विशिष्ट कणिकाएं नहीं पाई जातीं।
केंद्रक की आकृति केंद्रक बहुरूपी तथा 2 से 5 पालियों (Lobes) में बंटा होता है (PMNL)। केंद्रक एकल, अपालित तथा गोल अथवा गुर्देनुमा (वृक्काकार) होता है।
प्रकार व अभिरंजन • न्यूट्रोफिल (60-65%): उदासीन रंजक; 3-5 पालियां।
• ईओसिनोफिल (2-3%): अम्लीय रंजक (ईओसिन); द्विपालित।
• बेसोफिल (0.5-1%): क्षारीय रंजक (मेथिलीन ब्लू); S-आकार।
• लिम्फोसाइट (20-25%): बड़ा गोल केंद्रक।
• मोनोसाइट (6-8%): गुर्देनुमा केंद्रक; सबसे बड़ी WBC।
कार्यिकीय भूमिका जीवाणु भक्षण (न्यूट्रोफिल), एलर्जी व कृमि शमन (ईओसिनोफिल), शोथ में हिस्टामिन/हेपरिन स्राव (बेसोफिल)। B व T कोशिकाओं द्वारा एंटीबॉडी निर्माण व प्रतिरक्षा (लिम्फोसाइट); ऊतकों में मैक्रोफेज बनकर भक्षण (मोनोसाइट)।
उदाहरण 2
ABO रुधिर समूह तथा सर्वदाता व सर्वग्राही के जैविक आधार की व्याख्या कीजिए। गर्भ रक्ताणुकोरकता (Erythroblastosis Fetalis) क्या है तथा इसका चिकित्सीय निवारण कैसे किया जाता है? [2.5 + 2.5 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
पहला भाग: ABO रुधिर समूह एवं सर्वदाता/सर्वग्राही (2.5 अंक):
कार्ल लैंडस्टीनर (1900) ने RBCs सतह पर उपस्थित दो ग्लाइकोलिपिड प्रतिजनों (प्रतिजन A व प्रतिजन B) तथा प्लाज्मा की दो प्राकृतिक प्रतिरक्षियों (एंटी-A व एंटी-B) के आधार पर रुधिर को 4 वर्गों में बांटा:
• A वर्ग: RBCs पर प्रतिजन A; प्लाज्मा में एंटी-B।
• B वर्ग: RBCs पर प्रतिजन B; प्लाज्मा में एंटी-A।
• AB वर्ग: RBCs पर प्रतिजन A एवं B दोनों; प्लाज्मा में कोई प्रतिरक्षी नहीं। चूँकि आदाता के प्लाज्मा में कोई एंटीबॉडी नहीं होती जो दाता की कोशिकाओं को नष्ट करे, अतः AB व्यक्ति किसी भी वर्ग से रुधिर ले सकता है, इसलिए इसे सर्वग्राही (Universal Recipient) कहते हैं।
• O वर्ग: RBCs पर कोई प्रतिजन नहीं; प्लाज्मा में एंटी-A व एंटी-B दोनों। चूँकि O वर्ग की RBCs पर कोई बाहरी प्रतिजन नहीं होता जिसे आदाता की एंटीबॉडीज पहचानें, अतः O रुधिर किसी भी वर्ग को दिया जा सकता है, इसलिए इसे सर्वदाता (Universal Donor) कहते हैं।

दूसरा भाग: गर्भ रक्ताणुकोरकता एवं निवारण (2.5 अंक):
• कारण: जब एक $\text{Rh}^-$ माता एक $\text{Rh}^+$ भ्रूण को धारण करती है। प्रथम प्रसव के समय अपरा के क्षतिग्रस्त होने पर भ्रूण की $\text{Rh}^+$ RBCs माता के रक्त में मिल जाती हैं, जिससे माता का शरीर एंटी-Rh एंटीबॉडीज (IgG वर्ग) बना लेता है। प्रथम शिशु सुरक्षित जन्म लेता है।
• परंतु द्वितीय $\text{Rh}^+$ गर्भधारण में माता की ये सूक्ष्म IgG एंटीबॉडीज अपरा को पार कर भ्रूण के रुधिर में पहुँच जाती हैं और भ्रूण की RBCs का समूहन कर उन्हें नष्ट कर देती हैं।
• लक्षण: गंभीर एनीमिया, घातक पीलिया (मस्तिष्क क्षति / कर्निकटेरस), तथा गर्भ में ही भ्रूण की मृत्यु (Hydrops fetalis)।
• निवारण: प्रथम $\text{Rh}^+$ शिशु के जन्म के 72 घंटे के भीतर $\text{Rh}^-$ माता को एंटी-Rh एंटीबॉडीज (RhoGAM / एंटी-D) का इंजेक्शन लगाया जाता है। यह माता के रुधिर में आई भ्रूणीय RBCs को नष्ट कर देता है जिससे माता का शरीर स्वयं एंटीबॉडीज नहीं बना पाता।
उदाहरण 3
बेस्ट एवं टेलर की परिकल्पना के अनुसार मानव में रुधिर स्कंदन के एंजाइम कैस्केड प्रक्रम का वर्णन कीजिए। कैल्शियम आयन तथा विटामिन K की विशिष्ट भूमिका क्या है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पहला भाग: रुधिर स्कंदन के तीन चरण (3 अंक):
रक्त वाहिका के कटने पर शृंखलाबद्ध उत्प्रेरकीय अभिक्रियाओं द्वारा रक्त का थक्का बनता है:

  1. चरण 1: थ्रोम्बोकाइनेज संकुल का निर्माण:
    क्षतिग्रस्त ऊतक से स्रावित ऊतक थ्रोम्बोप्लास्टिन (कारक III) तथा विखंडित प्लेटलेट्स से स्रावित प्लेटलेट कारक 3 (PF3) प्लाज्मा कारकों (XII, X, V) एवं कैल्शियम आयनों ($\text{Ca}^{2+}$, कारक IV) के साथ मिलकर सक्रिय एंजाइम संकुल थ्रोम्बोकाइनेज (प्रोथ्रोम्बीनेज) का निर्माण करते हैं।
  2. चरण 2: प्रोथ्रोम्बिन से थ्रोम्बिन का निर्माण:
    थ्रोम्बोकाइनेज संकुल $\text{Ca}^{2+}$ की उपस्थिति में प्लाज्मा के अक्रिय प्रोथ्रोम्बिन (कारक II) को सक्रिय प्रोटीयोलाइटिक एंजाइम थ्रोम्बिन में बदल देता है:

$$\text{प्रोथ्रोम्बिन} \xrightarrow[\text{Ca}^{2+}]{\text{थ्रोम्बोकाइनेज}} \text{थ्रोम्बिन}$$


3. चरण 3: फाइब्रिनोजेन से अघुलनशील फाइब्रिन जाल का निर्माण:
सक्रिय थ्रोम्बिन घुलनशील फाइब्रिनोजेन (कारक I) को जल-अपघटित कर अघुलनशील फाइब्रिन एकलक (Monomers) में बदलता है। ये एकलक बहुलीकृत होकर फाइब्रिन तंतु बनाते हैं। कारक XIII एवं $\text{Ca}^{2+}$ इन तंतुओं को आपस में समसंयोजी बंधों द्वारा जोड़कर एक अभेद्य जाल बनाते हैं:

$$\text{फाइब्रिनोजेन (घुलनशील)} \xrightarrow{\text{थ्रोम्बिन}} \text{फाइब्रिन एकलक} \xrightarrow[\text{कारक XIII}]{\text{Ca}^{2+}} \text{फाइब्रिन जाल (अघुलनशील थक्का)}$$

इस जाल में रक्त कोशिकाएं फंसकर थक्का बना देती हैं और रक्त बहना बंद हो जाता है।

दूसरा भाग: कैल्शियम एवं विटामिन K की भूमिका (2 अंक):
• कैल्शियम आयन ($\text{Ca}^{2+}$, कारक IV): स्कंदन के लगभग सभी चरणों में आवश्यक अकार्बनिक सहकारक है। यह प्रोथ्रोम्बिन व कारक X को प्लेटलेट झिल्ली से जोड़कर संकुल बनाने में तथा कारक XIII द्वारा फाइब्रिन तंतुओं के स्थिरीकरण में अपरिहार्य है।
• विटामिन K: यकृत में चार प्रमुख स्कंदन कारकों—कारक II (प्रोथ्रोम्बिन), कारक VII, कारक IX एवं कारक X के संश्लेषण में ग्लूटेमिक अम्ल के $\gamma$-कार्बोक्सिलीकरण हेतु अनिवार्य सह-एंजाइम है। विटामिन K के बिना ये कारक कैल्शियम से नहीं जुड़ पाते और अक्रिय रहते हैं, जिससे गंभीर रक्तस्राव होता है।

उदाहरण 4
कोष्ठों, कपाटिकाओं एवं नोडल चालन ऊतक के संदर्भ में मानव हृदय की आंतरिक संरचना का वर्णन कीजिए। साइनो-ऑरिकुलर नोड (SAN) को पेसमेकर क्यों कहा जाता है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पहला भाग: मानव हृदय की आंतरिक संरचना (3 अंक):
मानव हृदय 4 कोष्ठों वाला एक पेशीय पंप है जो पटों द्वारा दाएं व बाएं भागों में विभाजित रहता है:

  1. हृदय कोष्ठ:
    • दो आलिंद (दायां व बायां): पतली भित्ति वाले रुधिर संग्रह कोष्ठ। अंतरा-आलिंद पट पर फोसा ओवेलिस होता है। दायां आलिंद महाशिराओं से अशुद्ध रुधिर तथा बायां आलिंद 4 फुप्फुसीय शिराओं से शुद्ध रुधिर लेता है।
    • दो निलय (दायां व बायां): मोटी भित्ति वाले रुधिर निक्षेपण कोष्ठ। इसमें पैपिलरी पेशियां होती हैं। बाएं निलय की भित्ति दाएं निलय से 3 गुना अधिक मोटी होती है, क्योंकि इसे उच्च दाब (120 mmHg) पर पूरे शरीर में रुधिर पंप करना होता है।
  2. कपाटिकाएं:
    • त्रिवलनी कपाटिका: दाएं आलिंद व दाएं निलय के बीच 3 वलनों वाली कपाटिका।
    • द्विवलनी (मिट्रल) कपाटिका: बाएं आलिंद व बाएं निलय के बीच 2 वलनों वाली कपाटिका।
    • कॉर्डा टेंडिनी: कपाटिकाओं के वलनों को निलय की पैपिलरी पेशियों से बांधती हैं और निलय प्रकुंचन में कपाटिका को आलिंद में उलटने से रोकती हैं।
    • अर्धचंद्राकार कपाटिकाएं: फुप्फुसीय धमनी एवं महाधमनी के निकास पर स्थित 3-3 पॉकेटनुमा कपाटिकाएं जो रक्त की उल्टी वापसी रोकती हैं।

    दूसरा भाग: नोडल ऊतक एवं SAN को पेसमेकर कहने का कारण (2 अंक):
    • नोडल चालन मार्ग: SA नोड $\to$ आलिंद $\to$ AV नोड (0.1s विलंब) $\to$ हिस का बंडल $\to$ पुरकिंजे तंतु $\to$ निलय।
    • SAN पेसमेकर क्यों है: हृदय के नोडल ऊतकों में स्वतः लयबद्ध क्रिया विभव उत्पन्न करने की क्षमता होती है। इनमें से SA नोड सर्वाधिक दर (70 से 75 स्पंदन प्रति मिनट) से क्रिया विभव उत्पन्न करता है (जबकि AV नोड 40-60 तथा पुरकिंजे तंतु 20-40 ही बना पाते हैं)। SA नोड के तीव्रतम आवेग शेष सभी नोडल भागों को अपने नियंत्रण में ले लेते हैं और संपूर्ण हृदय की धड़कन की मूल लय तय करते हैं। अतः इसे हृदय का प्राकृतिक पेसमेकर कहते हैं।
उदाहरण 5
मानव हृदय चक्र की विभिन्न प्रावस्थाओं को समय अवधि सहित समझाइए। स्ट्रोक आयतन व हृदय दर से हृदय निर्गम की गणना कीजिए तथा दोनों हृदय ध्वनियों (LUB व DUB) की उत्पत्ति बताइए। [2.5 + 2.5 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पहला भाग: हृदय चक्र की प्रावस्थाएं (अवधि: 0.8 सेकंड) (2.5 अंक):
72 स्पंदन प्रति मिनट की दर पर प्रत्येक हृदय चक्र 0.8 सेकंड में पूर्ण होता है:

  1. संयुक्त अनुशिथिलन (0.4 सेकंड): चारों कोष्ठ शिथिल होते हैं। AV कपाटिकाएं खुली होती हैं। शिराओं से आलिंदों में आया रुधिर सीधे निलयों में बहता है जिससे निलयों का लगभग 70% भराव निष्क्रिय रूप से हो जाता है।
  2. आलिंद प्रकुंचन (0.1 सेकंड): SA नोड से आवेग फैलने पर दोनों आलिंद संकुचित होते हैं और शेष 30% रुधिर निलयों में धकेल दिया जाता है। इस समय प्रत्येक निलय में रुधिर आयतन एंड-डायस्टोलिक वॉल्यूम ($\text{EDV} \approx 120\text{ mL}$) तक पहुँचता है।
  3. निलय प्रकुंचन (0.3 सेकंड): निलय संकुचित होते हैं:
    • दाब बढ़ने पर त्रिवलनी व द्विवलनी कपाटिकाएं सवेग बंद हो जाती हैं (प्रथम ध्वनि, LUB)।
    • दाब अधिक बढ़ने पर अर्धचंद्राकार कपाटिकाएं खुलती हैं और प्रत्येक निलय से 70 mL रुधिर धमनियों में पंप होता है (स्ट्रोक आयतन)। अंत में निलय में एंड-सिस्टोलिक वॉल्यूम ($\text{ESV} \approx 50\text{ mL}$) बचता है।
  4. निलय अनुशिथिलन: निलय शिथिल होते हैं, दाब घटता है और धमनियों का रक्त वापस लौटने से अर्धचंद्राकार कपाटिकाएं सवेग बंद हो जाती हैं (द्वितीय ध्वनि, DUB)।

    दूसरा भाग: हृदय निर्गम एवं हृदय ध्वनियां (2.5 अंक):
    • हृदय निर्गम (CO) की गणना: प्रति मिनट प्रत्येक निलय द्वारा पंप किया गया कुल रुधिर:

$$\text{CO} = \text{स्ट्रोक आयतन (SV)} \times \text{हृदय दर (HR)} = 70\text{ mL} \times 72/\text{मिनट} = \mathbf{5,040\text{ mL/मिनट}} \approx \mathbf{5.0\text{ लीटर/मिनट}}$$


• प्रथम हृदय ध्वनि ("LUB" या $S_1$): निलय प्रकुंचन के प्रारंभ में रुधिर दाब के धक्के से आलिंद-निलय (त्रिवलनी व द्विवलनी) कपाटिकाओं के सवेग बंद होने से उत्पन्न होती है। यह मंद, भारी व लंबी अवधि (~0.12s) की होती है।
• द्वितीय हृदय ध्वनि ("DUB" या $S_2$): निलय अनुशिथिलन के प्रारंभ में धमनियों से रुधिर की वापसी रुकने पर अर्धचंद्राकार कपाटिकाओं के सवेग बंद होने से उत्पन्न होती है। यह तीखी, स्पष्ट व छोटी अवधि (~0.08s) की होती है।
उदाहरण 6
एक आदर्श इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ECG) का चित्र बनाइए। P-तरंग, QRS सम्मिश्र तथा T-तरंग के कार्यिकीय महत्व का वर्णन कीजिए। अति-तनाव (Hypertension), एथेरोस्क्लेरोसिस एवं एंजाइना पेक्टोरिस का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। [2.5 + 2.5 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

पहला भाग: आदर्श ईसीजी तरंगें एवं कार्यिकीय महत्व (2.5 अंक):
ईसीजी हृदय पेशी के संकुचन-शिथिलन के विद्युत विभव परिवर्तनों का आलेखीय चित्रण है:

  1. P-तरंग (P-Wave): छोटी ऊपर उठी तरंग। यह SA नोड से आवेग फैलने पर दोनों आलिंदों के विध्रुवण (Depolarization) को दर्शाती है, जिससे आलिंद प्रकुंचन होता है।
  2. QRS सम्मिश्र: तीव्र व नुकीली त्रिफासिक तरंग। यह दोनों निलयों के द्रुत विध्रुवण को दर्शाता है। Q तरंग के ठीक बाद निलय प्रकुंचन प्रारंभ होता है। प्रति मिनट QRS की संख्या रोगी की हृदय दर बताती है।
  3. T-तरंग (T-Wave): गुंबदनुमा तरंग। यह निलयों के पुनर्ध्रुवण (Repolarization) को दर्शाती है, जो निलयों के उत्तेजित अवस्था से विश्राम में लौटने का प्रतीक है। इसकी समाप्ति पर निलय प्रकुंचन समाप्त होता है।
    • नैदानिक महत्व: ईसीजी में ST-खंड का ऊपर उठना (ST Elevation) सीधे तौर पर तीव्र मायोकार्डियल इन्फार्कशन (हार्ट अटैक) की पुष्टि करता है।

    दूसरा भाग: परिसंचरण तंत्र के प्रमुख विकार (2.5 अंक):
  4. अति-तनाव (Hypertension): रक्तदाब का लगातार 140/90 mmHg या अधिक बना रहना (सामान्य 120/80 mmHg)। इसके कारण बायां निलय बड़ा हो जाता है, मस्तिष्क में पक्षाघात (स्ट्रोक) तथा वृक्क विफलता हो सकती है।
  5. कोरोनरी धमनी रोग (CAD) या एथेरोस्क्लेरोसिस: हृदय पेशी को रक्त ले जाने वाली कोरोनरी धमनियों की आंतरिक भित्ति में कोलेस्ट्रॉल, वसा, कैल्शियम व तंतुमय ऊतक जमा होकर 'प्लाक' बना देते हैं जिससे धमनियां संकरी हो जाती हैं और रक्त प्रवाह बाधित होता है।
  6. हृदशूल (Angina Pectoris): हृदय पेशी में अस्थायी रूप से ऑक्सीजन की भारी कमी होने पर सीने के मध्य में तीव्र, दम घोंटने वाला दर्द जो बाएं कंधे व बांह में फैलता है। इसमें ऊतक की स्थायी मृत्यु नहीं होती। विश्राम करने पर दर्द शांत हो जाता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

हृदय विफलता (Heart Failure), कार्डियक अरेस्ट तथा हार्ट अटैक (मायोकार्डियल इन्फार्कशन) को एक ही बीमारी समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मान लेना कि रुधिर सीरम में भी फाइब्रिनोजेन जैसे स्कंदन कारक पाए जाते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गर्भ रक्ताणुकोरकता में माता को Rh+ तथा भ्रूण को Rh- मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

प्रथम हृदय ध्वनि (LUB) को निलय में रुधिर के तेज बहाव की आवाज समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

AV नोड को हृदय का प्राथमिक पेसमेकर मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

16 शरीर द्रव और परिसंचरण: रुधिर घटक, नोडल तंत्र एवं हृदय चक्र WBCHSE कक्षा 11 जीव विज्ञान • इकाई 5: मानव कार्यिकी • संपूर्ण परिसंचरण तंत्र का विवरण 1. रुधिर संघटन एवं स्कंदन प्लाज्मा (55%) एवं संगठित पदार्थ (45%) • प्लाज्मा (90-92% जल): एल्ब्यूमिन (परासरणी दाब), ग्लोब्युलिन, फाइब्रिनोजेन • सीरम = प्लाज्मा − स्कंदन कारक • RBC (50-55 लाख) | WBC (6-8 हजार) | प्लेटलेट्स (1.5-3.5 लाख) कणिकाणु (न्यूट्रोफिल, ईओसिनोफिल, बेसोफिल) बनाम अकणिकाणु (लिम्फोसाइट, मोनोसाइट) ABO रुधिर समूह एवं गर्भ रक्ताणुकोरकता • O समूह: सर्वदाता | AB समूह: सर्वग्राही • गर्भ रक्ताणुकोरकता (HDN): Rh⁻ माता + Rh⁺ भ्रूण माता की एंटी-Rh IgG भ्रूण की RBCs नष्ट करती है → RhoGAM द्वारा रोकथाम रुधिर स्कंदन प्रक्रम (Ca²⁺ आयन) क्षतिग्रस्त ऊतक / प्लेटलेट्स → थ्रोम्बोकाइनेज प्रोथ्रोम्बिन (अक्रिय) → थ्रोम्बिन (सक्रिय) (Ca²⁺ की उपस्थिति में) फाइब्रिनोजेन (घुलनशील) → फाइब्रिन जाल (अघुलनशील) फाइब्रिन तंतु + उलझी रुधिर कोशिकाएं = थक्का (Thrombus) यकृत में कारक II, VII, IX, X के निर्माण हेतु विटामिन K अनिवार्य है लसिका या ऊतक द्रव (मध्यस्थ तरल) • केशिकाओं से छनकर अंतरालीय अवकाश में आया द्रव • RBC व प्लेटलेट्स विहीन, प्रोटीन कम, लिम्फोसाइट्स से भरपूर • आंत्र के लैक्टियल द्वारा काइलोमाइक्रोन रूप में वसा का अवशोषण • लसिका वाहिनियों → वक्षीय वाहिनी → सबक्लेवियन शिरा में प्रवेश लसिका ग्रंथियों में B व T लिम्फोसाइट्स द्वारा रोगाणु प्रतिरक्षा 2. नोडल तंत्र एवं हृदय चक्र हृदय कोष्ठ एवं कपाटिकाओं की व्यवस्था • 4 कोष्ठ: दायां/बायां आलिंद, दायां/बायां निलय (बायां निलय 3 गुना मोटा) • त्रिवलनी कपाटिका: दायां आलिंद-निलय | द्विवलनी (मिट्रल): बायां आलिंद-निलय • कॉर्डा टेंडिनी कपाटिकाओं को पैपिलरी पेशियों से जोड़ती है • अर्धचंद्राकार कपाटिकाएं: फुप्फुसीय धमनी एवं महाधमनी के निकास पर हृदयावरण (Pericardium): पैराइटल व विसरल परतें एवं हृदयावरणी द्रव स्वचालित नोडल चालन मार्ग • SA नोड (पेसमेकर): दाएं आलिंद में, 70-75 स्पंदन/मिनट • AV नोड (पेससेटर): आलिंद-निलय पट में, 0.1 सेकंड का विलंब • हिस का बंडल: अंतरा-निलय पट में दाईं व बाईं शाखाओं में विभक्त • पुरकिंजे तंतु: निलय भित्ति में तीव्र वेग (4 m/s) से आवेग फैलाते हैं आवेग अनुक्रम: SAN → आलिंद → AVN → हिस बंडल → पुरकिंजे → निलय मायोजेनिक हृदय: विशेष पेशीय ऊतकों द्वारा स्वतः आवेग उत्पत्ति हृदय चक्र (Cardiac Cycle - अवधि = 0.8 सेकंड) • संयुक्त अनुशिथिलन (0.4s): सभी कोष्ठ शिथिल; 70% रुधिर प्रवेश • आलिंद प्रकुंचन (0.1s): आलिंद संकुचन; शेष 30% रुधिर निलयों में • निलय प्रकुंचन (0.3s): निलय संकुचन → रुधिर का धमनियों में निक्षेपण स्ट्रोक आयतन (SV) = EDV (120 mL) − ESV (50 mL) = 70 mL/स्पंदन हृदय ध्वनियां (Heart Sounds): • LUB (S₁): AV (द्विवलनी/त्रिवलनी) कपाटिकाएं बंद होने पर मंद, लंबी ध्वनि • DUB (S₂): अर्धचंद्राकार कपाटिकाएं बंद होने पर तीक्ष्ण, छोटी ध्वनि कपाटिका विकृति से असामान्य फुसफुसाहट (Heart Murmur) सुनाई देती है 3. ईसीजी, दोहरा परिसंचरण व विकार इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ (ECG तरंगें) P R Q S T • P: आलिंद विध्रुवण | QRS: निलय विध्रुवण | T: निलय पुनर्ध्रुवण QRS संख्या = हृदय दर | ST खंड उभार = मायोकार्डियल इन्फार्कशन (हार्ट अटैक) दोहरा परिसंचरण एवं हृदय निर्गम • फुप्फुसीय: दायां निलय → फुप्फुसीय धमनी → फेफड़े → शिरा → बायां आलिंद • दैहिक: बायां निलय → महाधमनी → ऊतक → महाशिरा → दायां आलिंद • यकृत निवाहिका तंत्र: आंत्र → यकृत निवाहिका शिरा → यकृत हृदय निर्गम = स्ट्रोक आयतन × हृदय दर = 70 mL × 72/मिनट = 5,040 mL/मिनट (~5 लीटर/मिनट) अनुकंपी (नॉरएड्रेनेलिन ↑) बनाम परानुकंपी (वैगस ACh ↓ CO) परिसंचरण तंत्र के विकार • अति-तनाव (Hypertension): रक्तदाब > 140/90 mmHg • CAD (एथेरोस्क्लेरोसिस): वसा/कैल्शियम जमाव से धमनी संकरी • हृदशूल (Angina Pectoris): सीने में तीव्र दर्द (ऑक्सीजन की भारी कमी) • हृदयाघात (Myocardial Infarction): हार्ट अटैक; पेशी ऊतक की मृत्यु • हृदय विफलता (Heart Failure): पर्याप्त पंप न करना (रक्त संचय) हृदय विफलता ≠ कार्डियक अरेस्ट (धड़कन रुकना) ≠ हार्ट अटैक (ऊतक मृत्यु) सामान्य धमनी रक्तदाब = 120/80 mmHg (प्रकुंचन/अनुशिथिलन) नाड़ी दाब = प्रकुंचन − अनुशिथिलन = 120 − 80 = 40 mmHg

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
रुधिर 55% प्लाज्मा (जल, एल्ब्यूमिन, ग्लोब्युलिन, फाइब्रिनोजेन) एवं 45% संगठित पदार्थों से बना तरल संयोजी ऊतक है।
मुख्य बिंदु 2
सीरम स्कंदन कारकों से रहित प्लाज्मा है (सीरम = प्लाज्मा - स्कंदन कारक)।
मुख्य बिंदु 3
RBCs (50-55 लाख/घन मिमी) उभयावतल, केंद्रकविहीन होती हैं; जीवनकाल 120 दिन है; इसमें हीमोग्लोबिन (12-16 g/dL) होता है।
मुख्य बिंदु 4
WBCs (6,000-8,000/घन मिमी) में कणिकाणु (न्यूट्रोफिल, ईओसिनोफिल, बेसोफिल) तथा अकणिकाणु (लिम्फोसाइट, मोनोसाइट) होते हैं; प्लेटलेट्स स्कंदन करती हैं।
मुख्य बिंदु 5
ABO रुधिर समूह प्रतिजन A व B पर आधारित है; O वर्ग सर्वदाता तथा AB वर्ग सर्वग्राही होता है।
मुख्य बिंदु 6
Rh- माता में Rh+ भ्रूण होने पर गर्भ रक्ताणुकोरकता होती है; प्रसव के 72 घंटे में RhoGAM (एंटी-D) देकर रोकथाम की जाती है।
मुख्य बिंदु 7
रुधिर स्कंदन 3 चरणों का कैस्केड है: थ्रोम्बोप्लास्टिन -> थ्रोम्बोकाइनेज -> प्रोथ्रोम्बिन से थ्रोम्बिन (Ca²⁺ द्वारा) -> फाइब्रिनोजेन से फाइब्रिन जाल।
मुख्य बिंदु 8
मानव हृदय में 4 कोष्ठ (बाएं निलय की भित्ति 3 गुना मोटी), त्रिवलनी व द्विवलनी कपाटिकाएं कॉर्डा टेंडिनी द्वारा पैपिलरी पेशियों से जुड़ी होती हैं।
मुख्य बिंदु 9
हृदय चक्र (0.8s): संयुक्त अनुशिथिलन (0.4s), आलिंद प्रकुंचन (0.1s), निलय प्रकुंचन (0.3s); स्ट्रोक आयतन = 70 mL; हृदय निर्गम = लगभग 5 लीटर/मिनट।
मुख्य बिंदु 10
ECG में P-तरंग आलिंद विध्रुवण, QRS सम्मिश्र निलय विध्रुवण तथा T-तरंग निलय पुनर्ध्रुवण दर्शाती है; LUB ध्वनि AV कपाटिकाएं बंद होने पर तथा DUB ध्वनि अर्धचंद्राकार बंद होने पर बनती है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
दाएं निलय की तुलना में बाएं निलय की मायोकार्डियम भित्ति 3 गुना अधिक मोटी क्यों होती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: दायां निलय रुधिर को निकट स्थित कम प्रतिरोध वाले फुप्फुसीय परिसंचरण में पंप करता है (दाब ~25 mmHg)। इसके विपरीत बाएं निलय को संपूर्ण शरीर के उच्च प्रतिरोध वाले दैहिक परिसंचरण में रुधिर पंप करना होता है (दाब ~120 mmHg)। इस विशाल संवहनी प्रतिरोध पर विजय पाने के लिए आवश्यक अत्यधिक संकुचन बल उत्पन्न करने हेतु बाएं निलय की भित्ति 3 गुना मोटी होती है।
2
यदि हृदय का साइनो-ऑरिकुलर नोड (SAN) क्षतिग्रस्त हो जाए तो हृदय की धड़कन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: SA नोड नष्ट होने पर द्वितीयक नोडल ऊतक यानी AV नोड पेसमेकर का कार्यभार संभाल लेता है (नोडल लय)। परंतु AV नोड के स्वतः आवेग उत्पन्न करने की दर बहुत कम (40–60 स्पंदन/मिनट) होती है। परिणामस्वरूप रोगी को गंभीर ब्रैडीकार्डिया (मंद स्पंदन) हो जाएगा और जीवन रक्षा हेतु कृत्रिम इलेक्ट्रॉनिक पेसमेकर प्रत्यारोपित करना पड़ेगा।
3
Rh-नेगेटिव माता के प्रथम Rh-पॉजिटिव शिशु में गर्भ रक्ताणुकोरकता क्यों नहीं होती?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्रथम गर्भावस्था के दौरान अपरा (प्लेसेंटा) की अभेद्यता के कारण भ्रूण व माता का रुधिर आपस में नहीं मिलता। प्रसव के समय अपरा के कटने पर ही कुछ भ्रूणीय RBCs माता के रक्त में प्रवेश करती हैं। माता के शरीर में प्राथमिक एंटी-Rh एंटीबॉडीज बनने में जो समय लगता है, उससे पहले ही शिशु सुरक्षित जन्म ले चुका होता है।
4
AV नोड द्वारा उत्पन्न 0.1 सेकंड का विलंब हृदय की पंपिंग कार्यकुशलता में कैसे सहायक है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 0.1 सेकंड का यह विराम आवेग को निलय में पहुँचने से पहले थोड़ी देर रोककर रखता है, जिससे आलिंद प्रकुंचन पूरी तरह समाप्त हो सके। इससे आलिंदों का शेष 30% रुधिर भी निलयों में भर जाता है और निलय अधिकतम आयतन (EDV) प्राप्त करते हैं। यदि यह विलंब न होता तो आलिंद और निलय एक साथ संकुचित होते और प्रभावी पंपिंग विफल हो जाती।
5
यकृत सिरोसिस के रोगी में एक ही समय पर शरीर में सूजन (इडीमा) तथा अनियंत्रित रक्तस्राव की प्रवृत्ति क्यों दिखती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: यकृत लगभग सभी प्रमुख प्लाज्मा प्रोटीनों का निर्माण करता है। सिरोसिस में यकृत एल्ब्यूमिन नहीं बना पाता जिससे रुधिर का कॉलॉइडी परासरणी दाब घट जाता है और जल ऊतकों में रिसकर सूजन (इडीमा) पैदा करता है। साथ ही यकृत स्कंदन कारक (फाइब्रिनोजेन, प्रोथ्रोम्बिन आदि) बनाने में विफल रहता है, जिससे रुधिर स्कंदन रुक जाता है और अनियंत्रित रक्तस्राव होता है।
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अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

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