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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 4
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

प्राणी जगत

प्राणी जगत (Kingdom Animalia अथवा Metazoa) बहुकोशिकीय, परपोषी (होलोज़ोइक), यूकेरियोटिक जीवों का एक अत्यंत विशाल एवं विविधतापूर्ण संसार है, जिसमें दस लाख से अधिक जीवित जातियों का वैज्ञानिक वर्णन किया गया है। पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद (WBCHSE) कक्षा 11 जीव विज्ञान के इस मूलभूत अध्याय में प्राणियों के क्रमबद्ध वर्गीकरण के प्रमुख आधारों का गहन विश्लेषण किया गया है: कोशिकीय, ऊतक, अंग एवं अंग-तंत्र स्तरीय शारीरिक संगठन; असममित, अरीय एवं द्विपार्श्व सममिति; द्विकोरकी व त्रिकोरकी भ्रूणीय स्तर; वास्तविक प्रगुहा (अगुहीय, कूटगुहीय तथा प्रगुहीय); विखंडी खंडीभवन (मेटामेरिज्म) तथा मध्यजनस्तर जनित पृष्ठरज्जु (नोटोकॉर्ड) की उपस्थिति। आद्य स्पंज (पोरीफेरा) से प्रारंभ करके नाइडेरिया, टीनोफोरा, प्लैटीहेल्मिन्थीज, एस्केल्मिन्थीज, ऐनेलिडा, आर्थ्रोपोडा, मोलस्का, एकाइनोडर्मेटा एवं हेमीकॉर्डेटा होते हुए संघ कॉर्डेटा के प्रमुख कशेरुकी वर्गों (उपास्थिल व अस्थिल मत्स्य, उभयचर, सरीसृप, पक्षी व स्तनधारी) के विशिष्ट पहचान लक्षणों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। बोर्ड परीक्षा तथा नीट (NEET) हेतु यह अध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण है।

क्या आपने कभी सोचा है?

एक वयस्क तारा-मछली (Starfish) जेलीफिश की भांति अरीय सममिति प्रदर्शित करने के बावजूद विकासात्मक दृष्टि से केंचुए या मक्खी की तुलना में मानव के अधिक निकट क्यों मानी जाती है?

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

जंतु वर्गिकी का अध्ययन केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं है, अपितु यह चिकित्सा परजीवी विज्ञान, मत्स्य पालन, रेशम कीट पालन, मधुमक्खी पालन तथा वन्यजीव संरक्षण का आधार है। फीताकृमि (Taenia) तथा फाइलेरिया कृमि (Wuchereria) के शारीरिक संगठन को समझकर कृमिनाशक दवाओं का विकास किया जाता है। आर्थ्रोपोडा के श्वसन व मैलपीगी उत्सर्जन का ज्ञान कीटनाशक दवाओं के निर्माण में सहायक होता है। इसके अलावा, मछलियों के 2-प्रकोष्ठ वाले हृदय से स्तनधारियों के 4-प्रकोष्ठ वाले हृदय में शुद्ध व अशुद्ध रक्त के पूर्ण पृथक्करण का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि किस प्रकार समतापी (उष्णरक्ती) प्राणी उच्च उपापचयी दर तथा स्थिर आंतरिक तापमान बनाए रखते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • यूकेरियोटिक प्राणी कोशिका की आधारभूत संरचना (कोशिका भित्ति व लवक की अनुपस्थिति)।
  • भ्रूणीय जनन स्तरों की संकल्पना: बाह्यत्वचा (Ectoderm), मध्यजनस्तर (Mesoderm) एवं अंतःत्वचा (Endoderm)।
  • होलोज़ोइक (प्राणिसमभोजी) पोषण पद्धति के सामान्य नियम।
  • अकशेरुकी (केंचुआ, कीट, घोंघा) एवं कशेरुकी (मछली, मेंढक, पक्षी) प्राणियों की प्राथमिक समझ।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 प्राणी वर्गीकरण के आधारभूत लक्षण: स...
2 आद्य नॉन-कॉर्डेटा संघ: पोरीफेरा, सी...
3 कृमि संघ एवं खंडीभवन: प्लैटीहेल्मिन...
4 विकसित प्रगुही अकशेरुकी: आर्थ्रोपोड...
5 कॉर्डेटा संघ एवं आद्य कॉर्डेटा: कॉर...
6 जबड़ेदार कशेरुकी एवं चतुष्पाद: उपास...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

प्राणी वर्गीकरण के आधारभूत लक्षण: संगठन स्तर, सममिति, जनन स्तर, प्रगुहा एवं खंडीभवन

प्राणी जगत के विभिन्न सदस्यों की संरचना एवं आकार में अत्यधिक विभिन्नता होते हुए भी उनकी कोशिका व्यवस्था, शारीरिक सममिति, प्रगुहा की प्रकृति, पाचन, परिसंचरण तथा जनन तंत्र की संरचना में कुछ मूलभूत समानताएं पाई जाती हैं। इन्हीं लक्षणों को प्राणी वर्गीकरण का आधार बनाया गया है।

1. शारीरिक संगठन के स्तर (Levels of Structural Organisation)
  • कोशिकीय स्तर (Cellular Level): कोशिकाएं ढीले समूहों के रूप में व्यवस्थित होती हैं, वास्तविक ऊतकों का अभाव होता है। कोशिकाओं के मध्य श्रम विभाजन पाया जाता है। उदाहरण: संघ पोरीफेरा (स्पंज)।
  • ऊतक स्तर (Tissue Level): समान कार्य करने वाली कोशिकाएं संगठित होकर ऊतक बनाती हैं। उदाहरण: संघ सीलेन्टरेटा (नाइडेरिया) एवं टीनोफोरा।
  • अंग स्तर (Organ Level): ऊतक संगठित होकर विशिष्ट अंगों का निर्माण करते हैं, जो किसी विशेष कार्य को संपादित करते हैं। सर्वप्रथम संघ प्लैटीहेल्मिन्थीज में देखा गया।
  • अंग-तंत्र स्तर (Organ-System Level): अनेक अंग मिलकर एक कार्यात्मक तंत्र (जैसे पाचन, परिसंचरण, श्वसन, उत्सर्जन तंत्र) बनाते हैं। एस्केल्मिन्थीज, ऐनेलिडा, आर्थ्रोपोडा, मोलस्का, एकाइनोडर्मेटा, हेमीकॉर्डेटा एवं कॉर्डेटा में उपस्थित।
2. शारीरिक सममिति (Body Symmetry)
  • असममित (Asymmetrical): किसी भी केंद्रीय तल से गुजरने वाली रेखा शरीर को दो समान भागों में विभाजित नहीं कर सकती। अधिकांश स्पंज (Porifera) तथा वयस्क घोंघे असममित होते हैं।
  • अरीय सममिति (Radial Symmetry): जब किसी भी केंद्रीय अक्ष से गुजरने वाला तल प्राणी के शरीर को दो समरूप दाएँ व बाएँ भागों में बांट सके। उदाहरण: सीलेन्टरेटा, टीनोफोरा तथा वयस्क एकाइनोडर्मेटा (पंच-अरीय)।
  • द्विपार्श्व सममिति (Bilateral Symmetry): जब शरीर केवल एक ही मध्य अनुदैर्ध्य तल (Sagittal plane) द्वारा दो समरूप दाएँ व बाएँ अर्धांशों में विभाजित किया जा सके। इसके साथ शीर्षीभवन (Cephalization) जुड़ा होता है। प्लैटीहेल्मिन्थीज से कॉर्डेटा (एवं एकाइनोडर्मेटा का डिंभक) द्विपार्श्व सममित होते हैं।
3. भ्रूणीय जनन स्तर (Diploblastic vs Triploblastic)
  • द्विकोरकी प्राणी (Diploblastic): भ्रूण विकास के दौरान कोशिकाएं दो प्राथमिक स्तरों में व्यवस्थित होती हैं—बाह्य एक्टोडर्म तथा आंतरिक एंडोडर्म। इनके बीच एक अकोशिकीय जिलेटिनयुक्त स्तर मेसोग्लिया पाया जाता है। उदाहरण: पोरीफेरा, सीलेन्टरेटा एवं टीनोफोरा।
  • त्रिकोरकी प्राणी (Triploblastic): एक्टोडर्म और एंडोडर्म के मध्य तीसरा जनन स्तर मीसोडर्म बनता है। मीसोडर्म से पेशियां, संयोजी ऊतक व कंकाल तंत्र बनते हैं। प्लैटीहेल्मिन्थीज से कॉर्डेटा तक सभी प्राणी त्रिकोरकी हैं।
4. प्रगुहा या सीलोम (Nature of Coelom)

शरीर भित्ति तथा आहार नाल के मध्य मीसोडर्म द्वारा आस्तरित गुहा को प्रगुहा कहते हैं। इसके आधार पर तीन श्रेणियां हैं:

  • अगुहीय (Acoelomate): शरीर गुहा पूर्णतः अनुपस्थित होती है। शरीर भित्ति व आहार नाल के बीच का स्थान ठोस मीसोडर्मल पैरेन्काइमा ऊतक से भरा रहता है। उदाहरण: प्लैटीहेल्मिन्थीज (चपटे कृमि)।
  • कूटगुहीय (Pseudocoelomate): देहगुहा मीसोडर्म द्वारा पूर्णतः आस्तरित नहीं होती; बल्कि भ्रूणीय ब्लास्टोसील में मीसोडर्म बिखरी हुई थैलियों के रूप में पाया जाता है। उदाहरण: एस्केल्मिन्थीज (गोल कृमि)।
  • प्रगुहीय (Eucoelomate): वास्तविक देहगुहा जो मीसोडर्मल पेरिटोनियम (पैराइटल व विसरल स्तर) द्वारा दोनों ओर से आस्तरित होती है। ऐनेलिडा, आर्थ्रोपोडा, मोलस्का, एकाइनोडर्मेटा, हेमीकॉर्डेटा एवं कॉर्डेटा वास्तविक प्रगुही हैं।
5. खंडीभवन (Metamerism) एवं नोटोकॉर्ड
  • विखंडी खंडीभवन: शरीर बाह्य एवं आंतरिक दोनों ओर क्रमिक खंडों (Metameres) में बंटा होता है तथा कुछ अंगों की क्रमिक पुनरावृत्ति होती है। उदाहरण: ऐनेलिडा, आर्थ्रोपोडा एवं कॉर्डेटा।
  • नोटोकॉर्ड (पृष्ठरज्जु): भ्रूण परिवर्धन के समय मध्यजनस्तर (मीसोडर्म) से बनी पृष्ठ सतह पर स्थित छड़ जैसी लचीली रचना। नोटोकॉर्ड युक्त प्राणी कॉर्डेटा तथा नोटोकॉर्ड विहीन नॉन-कॉर्डेटा कहलाते हैं।

आद्य नॉन-कॉर्डेटा संघ: पोरीफेरा, सीलेन्टरेटा (नाइडेरिया) एवं टीनोफोरा

आद्य अकशेरुकी संघ बहुकोशिकीय जंतुओं के प्रारंभिक विकास को दर्शाते हैं। यहां ढीले कोशिकीय संगठन (स्पंज) से लेकर विशिष्ट ऊतक संगठन और शिकार पकड़ने वाली दंश कोशिकाओं (नाइडेरिया) का प्रादुर्भाव देखा जाता है।

1. संघ पोरीफेरा (स्पंज / Sponges)
  • आवास एवं संगठन: अधिकांश समुद्री (अपवाद: स्वच्छ जलीय स्पंज Spongilla), स्थानबद्ध (Sessile), कोशिकीय स्तर के असममित प्राणी।
  • जल नाल तंत्र (Water Canal System): जल शरीर भित्ति पर उपस्थित सूक्ष्म छिद्रों ऑस्टिया (Ostia) द्वारा केंद्रीय गुहा स्पंजोसील (Spongocoel) में प्रवेश करता है तथा शीर्ष पर स्थित बड़े छिद्र ऑस्कुलम (Osculum) द्वारा बाहर निकल जाता है। यह जलधारा भोजन ग्रहण करने, श्वसन गैसों के विनिमय तथा अपशिष्ट उत्सर्जन में सहायक होती है।
  • कोएनोसाइट (कॉलर कोशिकाएं): स्पंजोसील तथा नालों को आस्तरित करने वाली विशिष्ट कशाभिकायुक्त कोशिकाएं, जो जलधारा उत्पन्न करती हैं तथा भोजन के कणों का अंतःकोशिकीय पाचन करती हैं।
  • कंकाल एवं जनन: शरीर कैल्केरियस या सिलिकामय कंटिकाओं (Spicules) अथवा स्पंजिन तंतुओं के कंकाल द्वारा आलंबित होता है। ये उभयलिंगी होते हैं। अलैंगिक जनन विखंडन व जेम्यूल द्वारा; लैंगिक जनन में आंतरिक निषेचन तथा मुक्त प्रवाही डिंभक (एम्फीब्लास्टुला) बनता है।
  • उदाहरण: Sycon (साइफा), Spongilla (स्वच्छ जलीय स्पंज), Euspongia (बाथ स्पंज)।
2. संघ सीलेन्टरेटा / नाइडेरिया (Cnidaria)
  • आवास एवं सममिति: जलीय (प्रायः समुद्री), स्थानबद्ध अथवा मुक्त प्रवाही, अरीय सममित, द्विकोरकी व ऊतक स्तर के प्राणी।
  • नीडोब्लास्ट या दंश कोशिकाएं (Cnidocytes): स्पर्शकों एवं शरीर पर उपस्थित विशेष कोशिकाएं जिनमें विषैले हिप्नोटॉक्सिन द्रव से भरा नेमाटोसिस्ट (Nematocyst) होता है। यह आत्मरक्षा, शिकार पकड़ने एवं किसी आधार से चिपकने में काम आती हैं।
  • शारीरिक संरचना: केंद्रीय जठर-संवहनी गुहा (सीलेन्टरॉन) पाई जाती है जिसमें केवल एक ही मुख छिद्र (Hypostome पर) होता है जो मुख व गुदा दोनों का कार्य करता है। पाचन बहिःकोशिकीय एवं अंतःकोशिकीय दोनों प्रकार का होता है।
  • द्विरूपता (पॉलिप एवं मेड्यूसा):
    • पॉलिप (Polyp): स्थानबद्ध, बेलनाकार रूप जिसके मुख व स्पर्शक ऊपर की ओर होते हैं (उदा. Hydra, Adamsia)।
    • मेड्यूसा (Medusa): छतरीनुमा, मुक्त प्रवाही रूप जिसके मुख व स्पर्शक नीचे की ओर होते हैं (उदा. Aurelia / जेलीफिश)।
  • पीढ़ी एकांतरण (मेटाजेनेसिस): पॉलिप अलैंगिक विधि द्वारा मुकुलन से मेड्यूसा उत्पन्न करते हैं तथा मेड्यूसा लैंगिक विधि से पॉलिप उत्पन्न करते हैं (उदा. Obelia)।
  • उदाहरण: Physalia (पुर्तगाली योद्धा), Adamsia (समुद्री एनीमोन), Pennatula (समुद्री कलम), Gorgonia (समुद्री व्यंजन), Meandrina (ब्रेन कोरल)।
3. संघ टीनोफोरा (कंकतधर / Comb Jellies)
  • आवास एवं गमन: पूर्णतः समुद्री, अरीय सममित, द्विकोरकी प्राणी। गमन हेतु शरीर पर 8 बाह्य पक्ष्माभी कंकत पट्टिकाएं (Comb plates) पाई जाती हैं।
  • जैव-संदीप्ति (Bioluminescence): शरीर से शीतल प्रकाश उत्पन्न करने का गुण टीनोफोरा का विशिष्ट लक्षण है।
  • पोषण: स्पर्शकों पर दंश कोशिकाओं के स्थान पर चिपचिपी कोलोब्लास्ट कोशिकाएं (Colloblasts) पाई जाती हैं।
  • जनन: केवल लैंगिक जनन; बाह्य निषेचन तथा सिडिप्पिड डिंभक द्वारा अप्रत्यक्ष परिवर्धन।
  • उदाहरण: Pleurobrachia एवं Ctenoplana।

कृमि संघ एवं खंडीभवन: प्लैटीहेल्मिन्थीज, एस्केल्मिन्थीज एवं ऐनेलिडा

त्रिकोरकी जनन स्तर और द्विपार्श्व सममिति के विकास ने प्राणियों को अग्रगामी गमन, शीर्षीभवन तथा विशिष्ट आंतरिक अंग प्रणालियों के निर्माण की सामर्थ्य प्रदान की।

1. संघ प्लैटीहेल्मिन्थीज (चपटे कृमि / Flatworms)
  • शारीरिक लक्षण: पृष्ठ-अधर रूप से चपटे (Flatworms), द्विपार्श्व सममित, त्रिकोरकी, अंग स्तर वाले तथा अगुहीय (Acoelomate) प्राणी।
  • परजीवी अनुकूलन: पोषक के शरीर से चिपकने हेतु अंकुश (Hooks) एवं चूषक (Suckers) पाए जाते हैं। फीताकृमि में पाचन तंत्र अनुपस्थित होता है; ये पोषक की आंत से सीधे पचे भोजन का अवशोषण करते हैं।
  • उत्सर्जन तंत्र: परासरण नियंत्रण एवं उत्सर्जन हेतु पक्ष्माभयुक्त ज्वाला कोशिकाएं (Flame cells / Protonephridia) पाई जाती हैं।
  • जनन: द्विलिंगी (उभयलिंगी); आंतरिक निषेचन। Planaria में अत्यधिक पुनरुद्भवन की क्षमता (High regeneration capacity) पाई जाती है।
  • उदाहरण: Taenia solium (फीताकृमि), Fasciola hepatica (यकृत पर्णाभ कृमि), Planaria।
2. संघ एस्केल्मिन्थीज / निमैटोडा (गोल कृमि / Roundworms)
  • शारीरिक लक्षण: अनुप्रस्थ काट में गोलाकार (Roundworms), द्विपार्श्व सममित, त्रिकोरकी, अंग-तंत्र स्तर वाले।
  • कूटप्रगुहा (Pseudocoelom): देहगुहा भ्रूणीय ब्लास्टोसील से बनती है और इसमें मीसोडर्म बिखरी थैलियों के रूप में पाई जाती है।
  • पाचन तंत्र: पूर्ण आहार नाल जिसमें सुविकसित एवं पेशीय ग्रसनी (Muscular pharynx) पाई जाती है।
  • लैंगिक द्विरूपता (Sexual Dimorphism): एकलिंगी (Dioecious); मादा कृमि प्रायः नर से अधिक लंबी व मोटी होती है; नर का पश्च सिरा मुड़ा हुआ तथा पेनियल कंटिकाओं युक्त होता है।
  • उदाहरण: Ascaris lumbricoides (आंत्र गोलकृमि), Wuchereria bancrofti (फाइलेरिया कृमि - हाथीपांव रोग), Ancylostoma duodenale (अंकुश कृमि)।
3. संघ ऐनेलिडा (खंडीभूत कृमि / Segmented Worms)
  • विखंडी खंडीभवन: शरीर छल्लेनुमा खंडों (Metameres) में विभाजित होता है। त्रिकोरकी, द्विपार्श्व सममित तथा वास्तविक प्रगुहीय (Eucoelomate)।
  • गमनांग: अनुदैर्ध्य व वर्तुल पेशियां तथा काइटिन के शूक (Setae)। जलीय ऐनेलिड Nereis में तैरने हेतु चपटे पार्श्वपाद (Parapodia) पाए जाते हैं।
  • परिसंचरण एवं उत्सर्जन: बंद परिसंचरण तंत्र; रुधिर प्लाज्मा में हीमोग्लोबिन घुला रहता है। उत्सर्जन हेतु कुंडलित नलिकाकार नेफ्रीडिया (Nephridia) पाए जाते हैं।
  • जनन: Nereis एकलिंगी है और इसका डिंभक ट्रोकोफोर होता है। केंचुआ (Pheretima) व जोंक द्विलिंगी होते हैं।
  • उदाहरण: Nereis, Pheretima posthuma (केंचुआ), Hirudinaria granulosa (रक्तचोषक जोंक)।

विकसित प्रगुही अकशेरुकी: आर्थ्रोपोडा, मोलस्का, एकाइनोडर्मेटा एवं हेमीकॉर्डेटा

वास्तविक प्रगुही अकशेरुकी प्राणी जैव विविधता और पारिस्थितिक प्रभुत्व में सबसे आगे हैं। आर्थ्रोपोडा के संधिपाद व काइटिनी कंकाल, मोलस्का का मैंटल, एकाइनोडर्मेटा का जल संवहन तंत्र तथा हेमीकॉर्डेटा की ग्रसनी संरचना इसके प्रमुख प्रमाण हैं।

1. संघ आर्थ्रोपोडा (संधिपाद प्राणी / Arthropoda)
  • पारिस्थितिक प्रभुत्व: प्राणी जगत का सबसे बड़ा संघ; पृथ्वी पर दो-तिहाई से अधिक प्राणी आर्थ्रोपोडा के अंतर्गत आते हैं। त्रिकोरकी, द्विपार्श्व सममित, खंडयुक्त प्रगुही प्राणी।
  • बाह्यकंकाल एवं संधिपाद: शरीर जलरोधी काइटिनी बाह्यकंकाल से ढका होता है जो समय-समय पर त्वचा-पतन (Ecdysis) द्वारा बदला जाता है। इनमें संधियुक्त उपांग (Jointed appendages) पाए जाते हैं।
  • शरीर विभाजन: शरीर सिर, वक्ष एवं उदर में बंटा होता है (अथवा शिरोवक्ष व उदर)।
  • श्वसन तंत्र: विविध श्वसन अंग: क्लोम (Gills) (झींगा), बुक गिल्स (किंग क्रैब / Limulus), बुक लंग्स (बिच्छू, मकड़ी), तथा श्वसन नलिकाएं / श्वासनल तंत्र (Tracheal system) (कीट वर्ग)।
  • परिसंचरण एवं उत्सर्जन: खुला परिसंचरण तंत्र; प्रगुहा रुधिर गुहा अर्थात हीमोसील (Haemocoel) में रूपांतरित हो जाती है। प्रमुख उत्सर्जी अंग मैलपीगी नलिकाएं (Malpighian tubules) हैं; झींगे में हरित ग्रंथियां (Green glands)।
  • आर्थिक महत्व: संयुक्त नेत्र (ऑमैटिडिया युक्त मोज़ेक दृष्टि)। लाभदायक कीट: Apis (मधुमक्खी), Bombyx (रेशम कीट), Laccifer (लाख कीट); रोगवाहक: Anopheles, Culex, Aedes मच्छर; जीवित जीवाश्म: Limulus (किंग क्रैब)।
2. संघ मोलस्का (कोमल शरीर वाले प्राणी / Mollusca)
  • सामान्य लक्षण: प्राणी जगत का दूसरा सबसे बड़ा संघ। कोमल, अखंडित शरीर जो प्रायः कैल्केरियस कवच ($CaCO_3$) से ढका रहता है।
  • शरीर विभाजन: शरीर तीन भागों में बंटा होता है: अग्र सिर (Head), अधर पेशीय पाद (Foot) (गमनांग), तथा पृष्ठ अंतरंग कूबड़ (Visceral hump)।
  • मैंटल (प्रवार) एवं प्रवार गुहा: कूबड़ के ऊपर त्वचा की एक कोमल व स्पंजी तह होती है जिसे मैंटल (Mantle) कहते हैं। कूबड़ व मैंटल के बीच मैंटल गुहा होती है, जिसमें पंखनुमा क्लोम टिनीडिया (Ctenidia) पाए जाते हैं जो श्वसन व उत्सर्जन का कार्य करते हैं।
  • रैडुला (Radula): मुख में भोजन चबाने अथवा रेतने हेतु आड़े काइटिनी दांतों वाला रेतीनुमा अंग रैडुला पाया जाता है।
  • उदाहरण: Pila (सेब घोंघा), Pinctada (मुक्ता शुक्ति), Sepia (कटलफिश), Loligo (स्क्विड), Octopus (डेविलफिश), Aplysia (समुद्री खरगोश), Dentalium (हाथी दांत कवच)।
3. संघ एकाइनोडर्मेटा (कंटकी बाह्यकंकाल वाले प्राणी)
  • आवास एवं कंकाल: पूर्णतः समुद्री प्राणी। त्वचा के नीचे चूनेदार पट्टिकाओं (Ossicles) अथवा कांटों से बना अंतःकंकाल पाया जाता है।
  • सममिति व्युत्क्रमण: स्वतंत्र तैरने वाला डिंभक द्विपार्श्व सममित होता है, परंतु कायांतरण के उपरांत वयस्क प्राणी पंच-अरीय सममित (Pentamerous radial) बन जाता है। सिर अनुपस्थित होता है।
  • जल संवहन तंत्र (Ambulacral System): प्रगुहा से विकसित हाइड्रोलिक नलिका तंत्र जिसमें मैड्रेपोराइट, रिंग कैनाल, रेडियल कैनाल तथा सैकड़ों संकुचनशील नालपाद (Tube feet / Podia) पाए जाते हैं। यह गमन, भोजन पकड़ने तथा श्वसन में मुख्य भूमिका निभाता है।
  • उत्सर्जन तंत्र अनुपस्थित: कोई विशिष्ट उत्सर्जी अंग नहीं होता; अमोनिया नालपाद की भित्ति से सीधे विसरित हो जाती है।
  • उदाहरण: Asterias (तारा मछली), Echinus (समुद्री अर्चिन), Antedon (समुद्री लिली), Cucumaria (समुद्री खीरा), Ophiura (भंगुर तारा)।
4. संघ हेमीकॉर्डेटा (Hemichordata)
  • वर्गीकरण स्थिति: पूर्व में इसे कॉर्डेटा का उपसंघ माना जाता था, परंतु अब इसे नॉन-कॉर्डेटा का एक स्वतंत्र संघ माना जाता है। ये कृमिरूपी समुद्री प्राणी हैं।
  • शरीर संगठन: बेलनाकार शरीर तीन भागों में बंटा होता है: अग्र शुंड (Proboscis), छोटा कॉलर (Collar), तथा लंबा धड़ (Trunk)।
  • स्टोमोकॉर्ड: कॉलर क्षेत्र में ग्रसनी की छत से निकलने वाली खोखली संरचना जिसे स्टोमोकॉर्ड कहते हैं; यह वास्तविक नोटोकॉर्ड नहीं है।
  • श्वसन एवं उत्सर्जन: अनेक जोड़े ग्रसनी क्लोम छिद्रों द्वारा श्वसन होता है। शुंड क्षेत्र में स्थित शुंड ग्रंथि (Glomerulus) द्वारा उत्सर्जन संपन्न होता है।
  • उदाहरण: Balanoglossus एवं Saccoglossus।

कॉर्डेटा संघ एवं आद्य कॉर्डेटा: कॉर्डेटा के 4 मूल लक्षण, उपसंघ एवं साइक्लोस्टोमेटा

संघ कॉर्डेटा प्राणी विकास के उच्चतम शिखर को प्रदर्शित करता है। आंतरिक कंकाल, पृष्ठीय खोखला तंत्रिका तंत्र तथा उन्नत परिसंचरण तंत्र कॉर्डेटा को तीव्र गतिशीलता और वातावरणीय प्रभुत्व प्रदान करते हैं।

1. कॉर्डेटा के चार मूलभूत लक्षण (Fundamental Chordate Hallmarks)
  1. पृष्ठरज्जु (Notochord): भ्रूणीय मध्यजनस्तर (मीसोडर्म) से बनी ठोस, लचीली, छड़ जैसी रचना जो आहार नाल और तंत्रिका रज्जु के बीच पृष्ठ सतह पर स्थित होती है। कशेरुकियों में यह वयस्क अवस्था में अस्थिल या उपास्थिल कशेरुक दंड (रीढ़ की हड्डी) में बदल जाती है।
  2. पृष्ठीय खोखली तंत्रिका रज्जु (Dorsal Hollow Nerve Cord): नोटोकॉर्ड के ऊपर पृष्ठ सतह पर स्थित एक्टोडर्मल नलीनुमा तंत्रिका रज्जु। कशेरुकियों में इसका अग्र भाग मस्तिष्क तथा पश्च भाग मेरुरज्जु बनाता है। (नॉन-कॉर्डेटा में तंत्रिका रज्जु अधर, ठोस व युग्मित होती है)।
  3. ग्रसनी क्लोम छिद्र (Pharyngeal Gill Slits): ग्रसनी की पार्श्व भित्ति पर उपस्थित छिद्रों के जोड़े। जलीय जीवों में ये जीवन भर श्वसन का कार्य करते हैं; स्थलीय कशेरुकियों में केवल भ्रूणावस्था में दिखाई देते हैं।
  4. पश्च-गुदा पुच्छ (Post-anal Tail): गुदा छिद्र के पीछे स्थित पेशीय व कंकालीय पूंछ, जो जल में तैरने व संतुलन बनाने में सहायक होती है। (नॉन-कॉर्डेटा में गुदा सदैव शरीर के अंतिम छोर पर होती है)।
2. कॉर्डेटा के उपसंघ (Subphyla of Chordata)
  • उपसंघ यूरोकॉर्डेटा या ट्यूनिकेटा (Urochordata): पूर्णतः समुद्री; वयस्क स्थानबद्ध तथा ट्यूनिसिन (सेलूलोज़ सदृश) आवरण से ढके होते हैं। नोटोकॉर्ड केवल स्वतंत्र तैरने वाले डिंभक की पूंछ में पाई जाती है और कायांतरण के समय लुप्त हो जाती है (प्रतिगामी कायांतरण / Retrogressive metamorphosis)। उदाहरण: Ascidia, Salpa, Doliolum।
  • उपसंघ सेफेलोकॉर्डेटा (Cephalochordata): समुद्री, मछली सदृश प्राणी। इनमें नोटोकॉर्ड सिर से पूंछ तक फैली होती है तथा जीवन पर्यंत बनी रहती है। उदाहरण: Branchiostoma (एम्फिऑक्सस / लैंसलेट)।
  • [यूरोकॉर्डेटा एवं सेफेलोकॉर्डेटा को सम्मिलित रूप से प्रोटोकॉर्डेटा (Protochordata) कहा जाता है।]
  • उपसंघ वर्टिब्रेटा या क्रेनिएटा (Vertebrata): मस्तिष्क की सुरक्षा हेतु कपाल (Cranium) पाया जाता है। भ्रूणीय नोटोकॉर्ड वयस्क में उपास्थिल अथवा अस्थिल कशेरुक दंड (Vertebral column) द्वारा प्रतिस्थापित हो जाती है। इनमें अधर पेशीय हृदय (2, 3 या 4 प्रकोष्ठ) तथा वृक्क पाए जाते हैं। अतः: 'सभी कशेरुकी कॉर्डेटा हैं, परंतु सभी कॉर्डेटा कशेरुकी नहीं हैं'।
3. जबड़ाविहीन वर्ग: साइक्लोस्टोमेटा (Class Cyclostomata)
  • संरचना एवं स्वभाव: वास्तविक मछलियों के बाह्यपरजीवी। जबड़ाविहीन, गोल व चूसक मुख वाले ईल जैसे लंबे प्राणी। युग्मित पंखों व शल्कों का अभाव होता है।
  • श्वसन एवं परिसंचरण: श्वसन हेतु 6 से 15 जोड़ी क्लोम छिद्र होते हैं। कपाल व कशेरुक दंड उपास्थिमय होते हैं। बंद परिसंचरण तथा 2-प्रकोष्ठी हृदय पाया जाता है।
  • समुद्रोपरिगामी प्रव्रजन (Anadromous Migration): ये समुद्री होते हैं परंतु अंडे देने के लिए समुद्र से सैकड़ों मील दूर मीठे पानी की नदियों में चले जाते हैं। अंडे देने के कुछ ही दिनों बाद वयस्क की मृत्यु हो जाती है। इनका डिंभक एमोसीट (Ammocoetes) नदी में कायांतरण के उपरांत पुनः समुद्र में लौट आता है।
  • उदाहरण: Petromyzon (लैम्प्रे), Myxine (हैगफिश)।

जबड़ेदार कशेरुकी एवं चतुष्पाद: उपास्थिल व अस्थिल मत्स्य, उभयचर, सरीसृप, पक्षी एवं स्तनधारी

जबड़ेदार कशेरुकी (Gnathostomata) दो प्रमुख अधिवर्गों में विभाजित हैं: अधिवर्ग पिसीज (पंखयुक्त जलीय मत्स्य) तथा अधिवर्ग टेट्रापोडा (चार पादों वाले स्थलीय कशेरुकी)। जल से स्थल की ओर यह विकास यात्रा जीवन के सबसे महान शारीरिक चमत्कारों में से एक है।

1. अधिवर्ग पिसीज: कॉन्ड्रिकथीज बनाम ऑस्टिकथीज
लक्षणवर्ग कॉन्ड्रिकथीज (उपास्थिल मत्स्य)वर्ग ऑस्टिकथीज (अस्थिल मत्स्य)
अंतःकंकालपूर्णतः उपास्थिमय; नोटोकॉर्ड जीवन पर्यंत बनी रहती हैपूर्णतः अस्थिमय कंकाल
मुख की स्थितिशरीर के अधर तल (Ventral) पर स्थितशरीर के अग्र सिरे (Terminal) पर स्थित
क्लोम छिद्र व प्रच्छद5-7 जोड़ी पृथक क्लोम छिद्र; प्रच्छद (Operculum) अनुपस्थित4 जोड़ी क्लोम; प्रच्छद (ऑपरकुलम) द्वारा ढके
शल्क का प्रकारदांतों जैसे नुकीले प्लैकॉइड शल्कपतले, गोलाकार साइक्लॉइड अथवा टीनॉइड शल्क
वाताशय (Air bladder)अनुपस्थित; डूबने से बचने हेतु निरंतर तैरना पड़ता हैउपस्थित; उत्प्लावकता नियामक द्रवस्थैतिक अंग
निषेचन एवं क्लैस्परआंतरिक; नर के श्रोणि पंख पर क्लैस्पर (Claspers); प्रायः जरायुजअधिकांश में बाह्य निषेचन; क्लैस्पर अनुपस्थित; अंडप्रजक
उदाहरणScoliodon (कुत्ता मछली / शार्क), Pristis (आरा मछली), Torpedo, TrygonLabeo rohita (रोहू), Catla, Exocoetus (उड़न मीन), Hippocampus (समुद्री घोड़ा)
2. वर्ग उभयचर (Class Amphibia)
  • उभय जीवन: प्रथम चतुष्पादी प्राणी; जल तथा थल दोनों आवासों में रह सकते हैं। शरीर सिर व धड़ में बंटा होता है (गर्दन अनुपस्थित)।
  • त्वचा एवं श्वसन: त्वचा नम, ग्रंथिमय तथा शल्कविहीन होती है। श्वसन फेफड़ों (फुफ्फुसीय), नम त्वचा (त्वचीय) तथा मुखगुहा द्वारा होता है (डिंभक में क्लोम)।
  • परिसंचरण एवं अवस्कर: हृदय 3-प्रकोष्ठी (दो अलिंद, एक निलय); शीततापी (Poikilothermous)। आहार नाल, मूत्र मार्ग व जनन वाहिनियां एक साझे कक्ष अवस्कर (Cloaca) में खुलती हैं। बाह्य निषेचन; टैडपोल डिंभक द्वारा अप्रत्यक्ष परिवर्धन।
  • उदाहरण: Bufo (टोड), Rana tigrina (मेंढक), Hyla (वृक्ष मेंढक), Salamandra, Ichthyophis (पादविहीन उभयचर)।
3. वर्ग सरीसृप (Class Reptilia)
  • रेंगने वाले स्थलीय प्राणी: मुख्य रूप से थलचर; रेंगकर या घिसटकर चलते हैं (लैटिन Repere = रेंगना)। त्वचा शुष्क एवं श्रृंगित एपिडर्मल शल्कों या स्कूट्स द्वारा ढकी होती है जो जल हानि को रोकती है।
  • हृदय: सामान्यतः 3-प्रकोष्ठी (अपूर्ण विभाजित निलय), परंतु मगरमच्छ में हृदय पूर्ण 4-प्रकोष्ठी होता है। शीततापी।
  • कशेरुकी अंडा: प्रथम वास्तविक उल्वधारी (Amniotes); भूमि पर कैल्केरियस कवच से ढके पीतकयुक्त कलीडोइक अंडे देते हैं। आंतरिक निषेचन।
  • उदाहरण: Chelone (कछुआ), Testudo, Chameleon (गिरगिट), Calotes (बगीचे की छिपकली), Crocodilus (मगरमच्छ), Hemidactylus (घरेलू छिपकली); विषैले सर्प: Naja (कोबरा), Bangarus (करैत), Vipera (वाइपर)।
4. वर्ग पक्षी (Class Aves)
  • उड्डयन अनुकूलन: अग्रपाद रूपांतरित होकर पंखों (Wings) में बदल जाते हैं; शरीर पर पर (Feathers) पाए जाते हैं। जबड़े दांतविहीन श्रृंगित चोंच में परिवर्तित होते हैं।
  • वायवीय अस्थियां (Pneumatic Bones): लंबी अस्थियां खोखली तथा वायु गुहाओं युक्त (वायवीय) होती हैं, जो भार कम करके उड़ने में सहायता करती हैं।
  • पाचन एवं श्वसन: आहार नाल में भोजन संग्रहण हेतु क्रॉप (Crop) तथा पीसने हेतु पेशीय गिज़ार्ड (Gizzard) होता है। फेफड़ों से 9 अतिरिक्त वायु कोष (Air sacs) जुड़े होते हैं जो निरंतर एकदिशीय श्वसन सुनिश्चित करते हैं।
  • हृदय एवं समतापी: हृदय पूर्णतः 4-प्रकोष्ठी तथा दायां महाधमनी चाप उपस्थित। ये समतापी (Homoiothermous / उष्णरक्ती) होते हैं—शरीर का तापमान सदैव स्थिर रहता है।
  • उदाहरण: Corvus (कौआ), Columba livia (कबूतर), Psittacula (तोता), Struthio (शुतुरमुर्ग - उड़ानहीन), Pavo cristatus (मोर - भारत का राष्ट्रीय पक्षी), Aptenodytes (पेंगुइन)।
5. वर्ग स्तनधारी (Class Mammalia)
  • विशिष्ट पहचान लक्षण:
    • स्तन ग्रंथियां (Mammary Glands): सर्वाधिक विशिष्ट लक्षण; नवजात शिशुओं को पोषण देने हेतु दुग्ध स्रावी ग्रंथियां उपस्थित होती हैं।
    • रोमयुक्त त्वचा: शरीर पर बाह्यत्वचीय रोम (Hair) पाए जाते हैं। त्वचा में स्वेद ग्रंथियां तथा तैल ग्रंथियां होती हैं।
    • कर्णपल्लव (Pinnae): बाह्य कर्ण में मांसल कर्णपल्लव उपस्थित होते हैं।
    • विषमदंती दंतविन्यास: चार प्रकार के दांत (कृंतक, रदनक, अग्रचवर्णक, चवर्णक) जबड़े की गर्तिकाओं में धंसे होते हैं (गर्तदंती / Thecodont) तथा जीवन में दो बार निकलते हैं (द्विबारदंती / Diphyodont)।
  • शरीर क्रिया विज्ञान: वक्ष व उदर गुहा के बीच पेशीय डायफ्राम (तनुपट्ट) उपस्थित होता है जो श्वसन में सहायक है। हृदय 4-प्रकोष्ठी तथा बायां महाधमनी चाप उपस्थित। वयस्क लाल रुधिर कणिकाएं (RBC) गोल, द्वि-अवतल एवं केंद्रकविहीन होती हैं (अपवाद: ऊंट व लामा)। समतापी।
  • प्रजनन: एकलिंगी; आंतरिक निषेचन। अधिकांश जरायुज (Viviparous) होते हैं तथा अपरा (Placenta) विकसित होती है। अपवाद: आद्य स्तनधारी Ornithorhynchus (प्लैटिपस) अंडे देते हैं (अंडप्रजक स्तनधारी)।
  • उदाहरण: अंडप्रजक: Ornithorhynchus (डक-बिल्ड प्लैटिपस); जरायुज: Macropus (कंगारू), Pteropus (चमगादड़), Camelus (ऊंट), Macaca (बंदर), Rattus (चूहा), Canis (कुत्ता), Felis (बिल्ली), Elephas (हाथी), Delphinus (डॉल्फिन), Balaenoptera (ब्लू व्हेल), Panthera tigris (बाघ - राष्ट्रीय पशु)।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

अगुहीय (Platyhelminthes) बनाम कूटगुहीय (Aschelminthes) बनाम प्रगुहीय (Annelida-Chordata)
देहगुहा पहचान नियम: ठोस मीसोडर्मल पैरेन्काइमा से भरी गुहाविहीन संरचना = अगुहीय। भ्रूणीय ब्लास्टोसील से बनी बिखरी मीसोडर्मल थैलियों वाली गुहा = कूटगुहीय। मीसोडर्मल पेरिटोनियम से पूर्णतः आस्तरित वास्तविक गुहा = प्रगुहीय।
वयस्क पंच-अरीय सममिति + डिंभक द्विपार्श्व सममिति = संघ एकाइनोडर्मेटा
एकाइनोडर्मेटा सममिति व्युत्क्रमण प्रमेय: स्वतंत्र तैरने वाले डिंभक की द्विपार्श्व सममिति यह सिद्ध करती है कि एकाइनोडर्मेटा विकासात्मक रूप से द्विपार्श्व सममित ड्यूटेरोस्टोमिया समूह के अंतर्गत आते हैं; वयस्कों की अरीय सममिति एक द्वितीयक अनुकूलन है।
जल संवहन पथ: मैड्रेपोराइट → अश्म नाल → वलय नाल → अरीय नाल → एम्प्युला → नालपाद (Podia)
तारा-मछली हाइड्रोलिक गमन समीकरण: मैड्रेपोराइट द्वारा प्रविष्ट जल एम्प्युला के संकुचन द्वारा नालपाद में द्रवस्थैतिक दबाव उत्पन्न करता है, जिससे चट्टानों पर चूषण बल बनता है और जंतु गमन करता है।
कॉर्डेटा के 4 आधार स्तंभ: पृष्ठरज्जु + खोखली तंत्रिका रज्जु + ग्रसनी क्लोम छिद्र + पश्च-गुदा पुच्छ
कॉर्डेटा पहचान समीकरण: जीवन के किसी भी विकासात्मक चरण में इन चार संरचनाओं की उपस्थिति जीव को संपूर्ण नॉन-कॉर्डेटा संघों से पृथक कर संघ कॉर्डेटा का सदस्य बनाती है।
कॉन्ड्रिकथीज (प्लैकॉइड शल्क + अधर मुख + प्रच्छद अनुपस्थित + वाताशय अनुपस्थित) बनाम ऑस्टिकथीज (साइक्लॉइड शल्क + अग्र मुख + प्रच्छद उपस्थित + वाताशय उपस्थित)
मत्स्य द्विशाखन नियम: उपास्थिल शार्क में वाताशय न होने के कारण डूबने से बचने हेतु निरंतर तैरना अनिवार्य है; अस्थिल मछलियां वाताशय की गैस से जल स्तंभ में स्थिर तैर सकती हैं।
हृदय प्रकोष्ठ विकास: मत्स्य (2 प्रकोष्ठ, एकल परिसंचरण) → उभयचर/सरीसृप (3 प्रकोष्ठ, अपूर्ण दोहरा परिसंचरण) → पक्षी/स्तनधारी (4 प्रकोष्ठ, पूर्ण दोहरा परिसंचरण)
उष्णरक्ती होने का नियम: 4-प्रकोष्ठ वाले हृदय में ऑक्सीजनित एवं विऑक्सीजनित रक्त का पूर्ण पृथक्करण ऊतकों को अधिकतम ऑक्सीजन उपलब्ध कराता है, जिससे उच्च उपापचयी ऊष्मा व समतापी स्वभाव बना रहता है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
(क) अगुहीय (Acoelomate), कूटगुहीय (Pseudocoelomate) तथा प्रगुहीय (Eucoelomate) शारीरिक योजना में सारणीबद्ध अंतर लिखिए। (ख) विखंडी खंडीभवन (Metamerism) क्या है और यह किन संघों में पाया जाता है? [अंक विभाजन: 3 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) देहगुहा या प्रगुहा के आधार पर तुलना (3 अंक)
लक्षणअगुहीय (Acoelomate)कूटगुहीय (Pseudocoelomate)प्रगुहीय (Eucoelomate)
परिभाषादेहगुहा पूर्णतः अनुपस्थित; आहार नाल व देहभित्ति के बीच ठोस मीसोडर्मल पैरेन्काइमा होता है।देहगुहा उपस्थित परंतु मीसोडर्मल पेरिटोनियम से आस्तरित नहीं होती; मीसोडर्म बिखरी थैलियों के रूप में होती है।वास्तविक देहगुहा जो दोनों ओर से मीसोडर्मल पेरिटोनियम स्तर द्वारा आस्तरित होती है।
भ्रूणीय उत्पत्तिब्लास्टोसील मीसोडर्मल कोशिकाओं द्वारा पूर्णतः भर जाती है।भ्रूणीय ब्लास्टोसील स्थायी देहगुहा के रूप में बनी रहती है।मीसोडर्म के फटने से (Schizocoely) अथवा आद्य आंत्र की थैलियों से (Enterocoely) निर्मित।
आंतरिक गतिठोस ऊतक के कारण आंतरिक अंगों की स्वतंत्र गति संभव नहीं।अंग तरलपूर्ण कूटगुहा में ढीले पड़े रहते हैं।अंग आंत्रयोजनी (Mesenteries) द्वारा लटके रहते हैं तथा स्वतंत्र क्रमाकुंचन करते हैं।
संघ उदाहरणसंघ प्लैटीहेल्मिन्थीज (उदा. फीताकृमि, लिवर फ्लूक)।संघ एस्केल्मिन्थीज (उदा. एस्केरिस, फाइलेरिया)।ऐनेलिडा, आर्थ्रोपोडा, मोलस्का, एकाइनोडर्मेटा, कॉर्डेटा।
(ख) विखंडी खंडीभवन एवं उदाहरण (2 अंक)

विखंडी खंडीभवन (Metameric Segmentation): वह शारीरिक संरचना जिसमें जंतु का शरीर बाह्य एवं आंतरिक दोनों ओर एकरेखीय क्रम में सजे समान खंडों (Metameres) में विभाजित होता है तथा प्रत्येक खंड में कम से कम कुछ अंगों (जैसे रक्त वाहिनियां, तंत्रिकाएं, नेफ्रीडिया) की क्रमिक पुनरावृत्ति पाई जाती है।

उपस्थिति: यह प्राणी जगत के तीन प्रमुख संघों में पाया जाता है—

  1. संघ ऐनेलिडा: जैसे केंचुआ (Pheretima)—स्पष्ट बाह्य व आंतरिक खंड।
  2. संघ आर्थ्रोपोडा: जैसे शतपाद (Centipede), तिलचट्टा—बाह्य खंडीभवन।
  3. संघ कॉर्डेटा: जैसे मानव—आंतरिक खंडीभवन (कशेरुक दंड, पसलियां, मेरुरज्जु तंत्रिकाएं)।
उदाहरण 2
(क) चित्र सहित दंश कोशिका (नीडोब्लास्ट) की संरचना एवं कार्यप्रणाली समझाइए। (ख) ओबिलिया में पीढ़ी एकांतरण (मेटाजेनेसिस) की प्रक्रिया स्पष्ट कीजिए। [अंक विभाजन: 2.5 + 2.5 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) दंश कोशिका की संरचना एवं कार्यप्रणाली (2.5 अंक)

दंश कोशिका (Cnidocyte / Cnidoblast): नाइडेरिया संघ के स्पर्शकों तथा बाह्यत्वचा पर पाई जाने वाली शिकार पकड़ने व आत्मरक्षा की विशिष्ट कोशिका।

  • संरचना: इसमें एक तरल से भरी कैप्सूल होती है जिसे नेमाटोसिस्ट कहते हैं। इसमें प्रोटीन व फीनॉल युक्त विषैला द्रव हिप्नोटॉक्सिन भरा होता है। कैप्सूल के भीतर एक कुंडलित खोखला धागा (सूत्रक) होता है जिसके आधार पर नुकीले कांटे (Barbs) होते हैं। कोशिका के मुख पर एक ढक्कन (Operculum) तथा बाहर की ओर संवेदी प्रवर्ध नीडोसिल (Cnidocil) होता है।
  • कार्यप्रणाली: जैसे ही कोई शिकार नीडोसिल को स्पर्श करता है, कोशिका के भीतर परासरण दाब तीव्र गति से बढ़ जाता है। ढक्कन खुल जाता है और कुंडलित सूत्रक अत्यंत वेग से उलटकर बाहर निकलता है तथा शिकार के शरीर में धंसकर हिप्नोटॉक्सिन छोड़ देता है, जिससे शिकार तुरंत लकवाग्रस्त हो जाता है। एक बार उपयोग के बाद यह नष्ट हो जाती है तथा नई कोशिका बनती है।
(ख) ओबिलिया में मेटाजेनेसिस (2.5 अंक)

मेटाजेनेसिस: संघ नाइडेरिया के कुछ सदस्यों (जैसे Obelia) में अलैंगिक स्थानबद्ध पॉलिप तथा लैंगिक मुक्त प्रवाही मेड्यूसा प्रावस्थाओं के मध्य होने वाले चक्रीय एकांतरण को मेटाजेनेसिस कहते हैं।

  • पॉलिप कॉलोनी के ब्लास्टोस्टाइल से अलैंगिक मुकुलन (Strobilation) द्वारा छतरीनुमा मुक्त मेड्यूसा बनते हैं।
  • मेड्यूसा एकलिंगी होते हैं; ये शुक्राणु व अंडाणु जल में छोड़ते हैं तथा लैंगिक जनन द्वारा युग्मनज (Zygote) बनाते हैं।
  • युग्मनज से पक्ष्माभी प्लैनुला डिंभक (Planula larva) बनता है, जो किसी ठोस आधार पर चिपककर कायांतरण द्वारा पुनः नई शाखित पॉलिप कॉलोनी बना देता है।
ओबिलिया का चक्र: पॉलिप (अलैंगिक, 2n) $\xrightarrow{\text{मुकुलन}}$ मेड्यूसा (लैंगिक, 2n) $\xrightarrow{\text{युग्मक}}$ युग्मनज $\to$ प्लैनुला डिंभक $\to$ पॉलिप कॉलोनी
उदाहरण 3
(क) प्राणी जगत में संघ आर्थ्रोपोडा के सबसे बड़ा संघ होने तथा व्यापक सफलता के तीन कारण बताइए। (ख) झींगा, बिच्छू, तिलचट्टा तथा किंग क्रैब के श्वसन अंगों के नाम लिखिए। [अंक विभाजन: 3 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) आर्थ्रोपोडा के प्रभुत्व के कारण (3 अंक)
  1. काइटिनी बाह्यकंकाल: शरीर काइटिन तथा प्रोटीन से बने जलरोधी मजबूत बाह्यकंकाल से ढका होता है। यह स्थलीय आवास में शरीर से जल वाष्पीकरण (शुष्कन) को रोकता है तथा शिकारियों से आंतरिक अंगों की सुरक्षा करता है।
  2. संधियुक्त उपांग एवं टैग्मेटाइजेशन: संधियुक्त उपांग गमन, भोजन पकड़ने, चबाने व संवेदी कार्यों हेतु रूपांतरित हो सकते हैं। खंड आपस में संगठित होकर सिर, वक्ष व उदर—तीन विशिष्ट कार्यात्मक क्षेत्रों का निर्माण करते हैं।
  3. उच्च प्रजनन क्षमता एवं यूरिकोटेलिक उत्सर्जन: भारी संख्या में अंडे देना, रूपांतरण चक्र जो लार्वा व वयस्क के बीच भोजन हेतु प्रतिस्पर्धा समाप्त करता है, तथा जल संरक्षण करने वाली मैलपीगी नलिकाएं (यूरिक अम्ल उत्सर्जन) इन्हें स्थलीय जीवन में अपार सफलता देती हैं।
(ख) चार आर्थ्रोपोडा जंतुओं के श्वसन अंग (2 अंक)
जंतुवर्ग / समूहश्वसन अंग
झींगा (Prawn)Crustaceaक्लोम / गिल्स (Branchiae)
किंग क्रैब (Limulus)Merostomataबुक गिल्स (Book Gills)
बिच्छू / मकड़ी (Scorpion)Arachnidaबुक लंग्स (Book Lungs)
तिलचट्टा / कीट (Insecta)Insectaश्वासनल तंत्र (Tracheal system)
उदाहरण 4
(क) एकाइनोडर्मेटा के जल संवहन तंत्र (Ambulacral system) का मार्ग आरेख बनाकर दर्शाइए तथा इसके दो प्रमुख कार्य लिखिए। (ख) स्पंज के जल नाल तंत्र और एकाइनोडर्मेटा के जल संवहन तंत्र में दो अंतर बताइए। [अंक विभाजन: 3 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) एकाइनोडर्मेटा का जल संवहन तंत्र (3 अंक)

जल प्रवाह का क्रमबद्ध मार्ग: समुद्री जल छिद्रित मैड्रेपोराइट (Madreporite) $\to$ S-आकार की अश्म नाल (Stone canal) $\to$ मुख के चारों ओर स्थित वलय नाल (Ring canal) $\to$ पांचों भुजाओं में जाने वाली अरीय नाल (Radial canals) $\to$ पार्श्व नालियां $\to$ संकुचनशील एम्प्युला (Ampullae) $\to$ चूषकयुक्त नालपाद (Tube feet / Podia)।

दो प्रमुख कार्य:

  1. चलन (Locomotion): एम्प्युला के संकुचन से नालपाद में जल का दबाव बढ़ता है और चूषक चट्टानों पर चिपककर जंतु को आगे खींचते हैं।
  2. भोजन पकड़ना एवं श्वसन: नालपाद द्विकपाटी मोलस्का के कवचों को बलपूर्वक खोल देते हैं और इनकी पतली भित्ति से गैसों का विनिमय संपन्न होता है।
(ख) स्पंज नाल तंत्र बनाम एकाइनोडर्मेटा संवहन तंत्र (2 अंक)
लक्षणस्पंज का नाल तंत्र (Water Canal)एकाइनोडर्मेटा का संवहन तंत्र (Water Vascular)
उत्पत्तिदेहभित्ति के वलन से निर्मित; प्रगुहीय नहीं है।वास्तविक प्रगुहा (एन्टेरोसील) से व्युत्पन्न हाइड्रोलिक तंत्र।
आस्तरित कोशिकाएंकशाभिकायुक्त कोएनोसाइट (कॉलर कोशिकाओं) द्वारा आस्तरित।पक्ष्माभी पेरिटोनियम उपकला द्वारा आस्तरित।
प्रवेश व निकासहजारों ऑस्टिया से प्रवेश, एक ऑस्कुलम से निकास।एकल मैड्रेपोराइट द्वारा जल का प्रवेश एवं निकास।
चलन में भूमिकाचलन में कोई भूमिका नहीं (स्पंज स्थानबद्ध होते हैं)।नालपादों द्वारा प्राथमिक गमनांग का कार्य करता है।
उदाहरण 5
(क) उपास्थिल मत्स्य (Chondrichthyes) तथा अस्थिल मत्स्य (Osteichthyes) में पांच प्रमुख अंतरों की तालिका बनाइए। (ख) क्लैस्पर (Claspers) क्या हैं और ये किस लिंग में पाए जाते हैं? [अंक विभाजन: 4 + 1 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) कॉन्ड्रिकथीज बनाम ऑस्टिकथीज (4 अंक)
लक्षणकॉन्ड्रिकथीज (उपास्थिल मत्स्य)ऑस्टिकथीज (अस्थिल मत्स्य)
1. अंतःकंकालपूर्णतः उपास्थिमय; नोटोकॉर्ड जीवन भर बनी रहती है।पूर्णतः अस्थिमय; कशेरुक दंड विकसित होता है।
2. मुख की स्थितिशरीर के अधर तल (Ventral) पर स्थित।शरीर के अग्र सिरे (Terminal) पर स्थित।
3. क्लोम व प्रच्छद5-7 जोड़ी पृथक क्लोम छिद्र; प्रच्छद (ऑपरकुलम) अनुपस्थित।4 जोड़ी क्लोम; प्रच्छद (Operculum) द्वारा ढके।
4. शल्कदांतों जैसे नुकीले प्लैकॉइड शल्क।पतले, गोलाकार साइक्लॉइड अथवा टीनॉइड शल्क।
5. वाताशय (Air bladder)अनुपस्थित; डूबने से बचने हेतु निरंतर तैरना पड़ता है।उपस्थित; उत्प्लावकता नियामक द्रवस्थैतिक अंग।
6. निषेचनआंतरिक निषेचन; अधिकांश जरायुज होते हैं।अधिकांश में बाह्य निषेचन; अंडप्रजक।
(ख) क्लैस्पर (1 अंक)

क्लैस्पर (Claspers): नर उपास्थिल मछलियों (जैसे नर शार्क या डॉगफिश) के श्रोणि पंखों (Pelvic fins) के आंतरिक किनारों के रूपांतरण से बने उपास्थिमय मैथुनी अंग हैं। आंतरिक निषेचन के समय ये शुक्राणुओं को मादा के अवस्कर में स्थानांतरित करने का कार्य करते हैं।

उदाहरण 6
(क) मत्स्य से स्तनधारी तक कशेरुकियों के हृदय के प्रकोष्ठों के विकास एवं रक्त पृथक्करण की तुलनात्मक सारणी बनाइए। (ख) पक्षी एवं स्तनधारी अपने शरीर का तापमान स्थिर (समतापी) रखने में कैसे सक्षम होते हैं? [अंक विभाजन: 3 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) कशेरुकी हृदय का क्रमिक विकास (3 अंक)
कशेरुकी वर्गप्रकोष्ठ संख्यापरिसंचरण प्रकाररक्त का पृथक्करण / मिश्रण
मत्स्य (Pisces)2 प्रकोष्ठ (1 अलिंद + 1 निलय)एकल परिसंचरण (हृदय $\to$ क्लोम $\to$ शरीर $\to$ हृदय)कोई पृथक्करण नहीं; हृदय में केवल अशुद्ध (विऑक्सीजनित) रक्त बहता है।
उभयचर (Amphibia)3 प्रकोष्ठ (2 अलिंद + 1 निलय)अपूर्ण दोहरा परिसंचरणआंशिक मिश्रण; एकल निलय में शुद्ध व अशुद्ध रक्त मिश्रित हो जाता है।
सरीसृप (Reptilia)3 प्रकोष्ठ (निलय अपूर्ण विभाजित; मगरमच्छ में 4 प्रकोष्ठ)अपूर्ण दोहरा परिसंचरणअपूर्ण पट के कारण मिश्रण कम; मगरमच्छ में पूर्ण पृथक्करण।
पक्षी एवं स्तनधारी4 प्रकोष्ठ (2 अलिंद + 2 पूर्णतः पृथक निलय)पूर्ण दोहरा परिसंचरण (फुफ्फुसीय व दैहिक)पूर्ण पृथक्करण; शुद्ध व अशुद्ध रक्त का कोई मिश्रण नहीं होता।
(ख) पक्षियों व स्तनधारियों में समतापी (Homoiothermy) स्वभाव का कारण (2 अंक)
  1. पूर्ण 4-प्रकोष्ठी हृदय: ऑक्सीजनित और विऑक्सीजनित रक्त पूर्णतः पृथक रहने से शरीर के ऊतकों को उच्च दाब पर अधिकतम ऑक्सीजन युक्त रक्त प्राप्त होता है।
  2. उच्च उपापचयी दर (High Metabolic Rate): प्रचुर ऑक्सीजन की उपस्थिति में माइटोकॉन्ड्रिया में तीव्र गति से ग्लूकोज व वसा का श्वसन ऑक्सीकरण होता है, जिससे पर्याप्त उपापचयी ऊष्मा उत्पन्न होती है।
  3. ऊष्मारोधी आवरण: पक्षियों के पंख तथा स्तनधारियों के रोम व त्वचा के नीचे स्थित वसा का स्तर (Blubber) शरीर की ऊष्मा को बाहर जाने से रोकते हैं, जिससे आंतरिक तापमान (~37°-42°C) स्थिर बना रहता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

तारा-मछली को वयस्क अवस्था में अरीय सममिति देखकर सीलेन्टरेटा की भांति आद्य अरीय प्राणी समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

एकाइनोडर्मेटा के डिंभक पूर्णतः द्विपार्श्व सममित होते हैं और ये त्रिकोरकी ड्यूटेरोस्टोम प्राणी हैं। ये कीटों या घोंघों की तुलना में कॉर्डेटा के अधिक निकट संबंधी हैं। वयस्क तारा-मछली की पंच-अरीय सममिति एक द्वितीयक रूपांतरण है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मान लेना कि सभी कॉर्डेटा प्राणियों में रीढ़ की हड्डी (कशेरुक दंड) पाई जाती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

प्रोटोकॉर्डेटा (जैसे यूरोकॉर्डेटा व सेफेलोकॉर्डेटा) में नोटोकॉर्ड पाई जाती है परंतु कशेरुक दंड और कपाल नहीं होते। कशेरुक दंड केवल उपसंघ वर्टिब्रेटा में बनता है। अतः: 'सभी कशेरुकी कॉर्डेटा हैं, परंतु सभी कॉर्डेटा कशेरुकी नहीं हैं'।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गोल कृमियों (एस्केल्मिन्थीज) को चपटे कृमियों की भांति अगुहीय (Acoelomate) समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चपटे कृमि अगुहीय होते हैं (मीसोडर्म ठोस पैरेन्काइमा बनाती है)। गोल कृमियों में भ्रूणीय ब्लास्टोसील से बनी एक स्पष्ट देहगुहा पाई जाती है, जिसे कूटप्रगुहा (Pseudocoelom) कहते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सभी सरीसृपों के हृदय को 3-प्रकोष्ठी मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

छिपकली, सांप तथा कछुए में हृदय 3-प्रकोष्ठी होता है, परंतु मगरमच्छ (Crocodilia) में हृदय पूर्ण रूप से 4-प्रकोष्ठी (दो अलिंद तथा दो पूर्ण निलय) होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सभी स्तनधारियों को केवल सजीव बच्चे जन्म देने वाला (जरायुज) समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

आद्य प्रोटोथीरिया उपवर्ग के सदस्य जैसे डक-बिल्ड प्लैटिपस (Ornithorhynchus) तथा एकिडना अंडे देते हैं (अंडप्रजक), परंतु नवजात को स्तन ग्रंथियों से दूध पिलाने के कारण ये स्तनधारी वर्ग में आते हैं।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

AK प्राणी जगत: वर्गीकरण के आधार एवं प्रमुख संघ WBCHSE कक्षा 11 जीव विज्ञान — इकाई 1: जीव जगत में विविधता (अध्याय 4) 1. वर्गीकरण के आधारभूत लक्षण (Basis of Classification) • संगठन स्तर: कोशिकीय (Porifera) → ऊतक (Cnidaria) → अंग (Platyhelminthes) → अंग-तंत्र • सममिति: असममित (स्पंज) | अरीय (सीलेन्टरेटा, टीनोफोरा, वयस्क एकाइनोडर्म) | द्विपार्श्व • प्रगुहा (Coelom): अगुहीय (चपटे कृमि) | कूटगुहीय (गोल कृमि) | प्रगुहीय (ऐनेलिडा से कॉर्डेटा) 2. नॉन-कॉर्डेटा संघों के विशिष्ट लक्षण (Non-Chordata Phyla) • Porifera & Cnidaria: कोएनोसाइट (कॉलर कोशिकाएं) व दंश कोशिकाएं (Cnidoblasts; पॉलिप व मेड्यूसा) • कृमि संघ: ज्वाला कोशिकाएं (Platyhelminthes) | कूटप्रगुहा एवं लैंगिक द्विरूपता (Aschelminthes) • Annelida & Arthropoda: विखंडी खंडीभवन व नेफ्रीडिया | सबसे बड़ा संघ, संधिपाद, मैलपीगी नलिकाएं • Mollusca & Echinodermata: प्रवार (Mantle) व रैडुला | जल संवहन तंत्र (Ambulacral), कंटकी बाह्यकंकाल 3. कॉर्डेटा संघ एवं कशेरुकी वर्ग (Chordata & Vertebrata) • कॉर्डेटा के 4 मूल लक्षण: पृष्ठ रज्जु (Notochord), खोखली तंत्रिका रज्जु, ग्रसनी क्लोम छिद्र, पश्च-गुदा पुच्छ • प्रोटोकॉर्डेटा: यूरोकॉर्डेटा (डिंभक पूंछ में नोटोकॉर्ड) | सेफेलोकॉर्डेटा (आजीवन सिर से पूंछ तक नोटोकॉर्ड) • कशेरुकी (Vertebrata): उपास्थिल/अस्थिल मत्स्य → उभयचर → सरीसृप → पक्षी → स्तनधारी (स्तन ग्रंथियां) WBCHSE • प्राणी जगत

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
प्राणी वर्गीकरण के प्रमुख आधार संगठन स्तर (कोशिकीय, ऊतक, अंग, अंग-तंत्र), सममिति (असममित, अरीय, द्विपार्श्व), जनन स्तर (द्विकोरकी व त्रिकोरकी), और प्रगुहा (अगुहीय, कूटगुहीय, प्रगुहीय) हैं।
मुख्य बिंदु 2
पोरीफेरा (स्पंज) कोशिकीय स्तर के असममित प्राणी हैं, जिनमें ऑस्टिया, ऑस्कुलम तथा कोएनोसाइट (कॉलर कोशिकाओं) से युक्त जल नाल तंत्र पाया जाता है।
मुख्य बिंदु 3
सीलेन्टरेटा (नाइडेरिया) में दंश कोशिकाएं (नीडोब्लास्ट), पॉलिप व मेड्यूसा रूपभेद और ओबिलिया में पीढ़ी एकांतरण (मेटाजेनेसिस) पाया जाता है।
मुख्य बिंदु 4
टीनोफोरा पूर्णतः समुद्री, जैव-संदीप्ति (Bioluminescence) प्रदर्शित करने वाले तथा 8 कशाभिकायुक्त कंकत पट्टिकाओं द्वारा गमन करने वाले प्राणी हैं।
मुख्य बिंदु 5
प्लैटीहेल्मिन्थीज पृष्ठ-अधर रूप से चपटे, त्रिकोरकी तथा अगुहीय (Acoelomate) होते हैं, जिनमें परासरण नियंत्रण एवं उत्सर्जन हेतु ज्वाला कोशिकाएं (Flame cells) पाई जाती हैं।
मुख्य बिंदु 6
एस्केल्मिन्थीज (गोल कृमि) अंग-तंत्र स्तर वाले होते हैं और इनमें भ्रूणीय ब्लास्टोसील से बनी कूटप्रगुहा (Pseudocoelom) पाई जाती है।
मुख्य बिंदु 7
ऐनेलिडा में वास्तविक विखंडी खंडीभवन (मेटामेरिज्म), बंद परिसंचरण तंत्र तथा उत्सर्जन हेतु खंडीय नेफ्रीडिया पाए जाते हैं।
मुख्य बिंदु 8
आर्थ्रोपोडा प्राणी जगत का सबसे बड़ा संघ है (>80% जातियां); इनमें संधिपाद, काइटिनी बाह्यकंकाल, हीमोसील एवं मैलपीगी नलिकाएं पाई जाती हैं।
मुख्य बिंदु 9
मोलस्का कोमल शरीर वाले प्राणी हैं, जिनका शरीर सिर, पेशीय पाद एवं अंतरंग कूबड़ में बंटा होता है तथा इनमें मैंटल व भोजन चबाने हेतु रैडुला होता है।
मुख्य बिंदु 10
एकाइनोडर्मेटा का डिंभक द्विपार्श्व सममित होता है परंतु वयस्क पंच-अरीय सममित होता है; इनमें नालपाद युक्त जल संवहन तंत्र (Ambulacral system) होता है।
मुख्य बिंदु 11
कॉर्डेटा संघ के 4 मूल लक्षण हैं: पृष्ठरज्जु (Notochord), खोखली पृष्ठ तंत्रिका रज्जु, ग्रसनी क्लोम छिद्र तथा पश्च-गुदा पुच्छ।
मुख्य बिंदु 12
कॉन्ड्रिकथीज उपास्थिल मछलियां हैं (प्लैकॉइड शल्क, वाताशय अनुपस्थित); ऑस्टिकथीज अस्थिल मछलियां हैं (साइक्लॉइड/टीनॉइड शल्क, ऑपरकुलम व वाताशय उपस्थित)।
मुख्य बिंदु 13
चतुष्पादियों में उभयचर (3-प्रकोष्ठी हृदय, नम त्वचा), सरीसृप (शुष्क शल्की त्वचा, 3-प्रकोष्ठी हृदय; मगरमच्छ में 4-प्रकोष्ठी), पक्षी (वायवीय अस्थियां, पंख, समतापी, 4-प्रकोष्ठी हृदय), और स्तनधारी (स्तन ग्रंथियां, त्वचा पर रोम, 4-प्रकोष्ठी हृदय, जरायुजता) सम्मिलित हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
गोल कृमियों (एस्केल्मिन्थीज) की देहगुहा को वास्तविक प्रगुहा न कहकर 'कूटप्रगुहा' (Pseudocoelom) क्यों कहा जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: वास्तविक प्रगुहा (Eucoelom) दोनों ओर (बाह्य देहभित्ति तथा आंतरिक आहार नाल) से मीसोडर्मल पेरिटोनियम उपकला द्वारा पूर्णतः आस्तरित होती है। एस्केल्मिन्थीज में देहगुहा भ्रूणीय ब्लास्टोसील का अवशेष होती है और मीसोडर्म केवल देहभित्ति के नीचे बिखरी हुई थैलियों के रूप में पाई जाती है तथा आहार नाल पर कोई मीसोडर्मल आवरण नहीं होता। इस अधूरी व्यवस्था के कारण इसे 'कूटप्रगुहा' (झूठी देहगुहा) कहते हैं।
2
'सभी कशेरुकी कॉर्डेटा हैं, परंतु सभी कॉर्डेटा कशेरुकी नहीं हैं'—इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: उपसंघ वर्टिब्रेटा (कशेरुकी) के सभी सदस्यों में भ्रूणावस्था में कॉर्डेटा के मूल लक्षण (नोटोकॉर्ड, खोखली तंत्रिका रज्जु, क्लोम छिद्र) उपस्थित होते हैं, जो वयस्क में कशेरुक दंड द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते हैं; अतः सभी कशेरुकी कॉर्डेटा हैं। परंतु प्रोटोकॉर्डेटा (यूरोकॉर्डेटा एवं सेफेलोकॉर्डेटा) में नोटोकॉर्ड पाई जाती है परंतु कशेरुक दंड तथा कपाल कभी नहीं बनते। कशेरुक दंड विहीन इन कॉर्डेटा सदस्यों की उपस्थिति के कारण सभी कॉर्डेटा कशेरुकी नहीं होते।
3
प्रतिगामी कायांतरण (Retrogressive Metamorphosis) क्या है और यह किस उपसंघ में पाया जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्रतिगामी कायांतरण वह विकासात्मक प्रक्रिया है जिसमें एक सक्रिय, उन्नत एवं जटिल लक्षणों वाला डिंभक कायांतरित होकर अपेक्षाकृत सरल, अंगहीन एवं स्थानबद्ध वयस्क में परिवर्तित हो जाता है। यह उपसंघ यूरोकॉर्डेटा (जैसे एसिडिया) में पाया जाता है। इनके स्वतंत्र तैरने वाले डिंभक की पूंछ में नोटोकॉर्ड, खोखली तंत्रिका रज्जु व संवेदी अंग होते हैं, परंतु कायांतरण के समय पूंछ, नोटोकॉर्ड व तंत्रिका रज्जु लुप्त हो जाते हैं और वह स्थानबद्ध थैलेनुमा वयस्क बन जाता है।
4
उभयचर प्राणी सरीसृपों अथवा पक्षियों की भांति सूखी भूमि पर अंडे क्यों नहीं दे सकते?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: उभयचरों के अंडों पर कोई जलरोधी चूनेदार खोल (कलीडोइक कवच) नहीं होता और भ्रूण को सूखने से बचाने वाली अतिरिक्त भ्रूणीय झिल्लियां (एम्नियन, कोरियॉन) अनुपस्थित होती हैं। हवा और धूप में इनके अंडे तुरंत सूखकर नष्ट हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त उभयचरों के शुक्राणु कशाभिकायुक्त होते हैं जिन्हें बाह्य निषेचन हेतु तैरने के लिए तरल जल माध्यम अनिवार्य होता है। अतः ये प्रजनन हेतु जल पर निर्भर हैं।
5
आर्थ्रोपोडा के जीवित जीवाश्म का नाम बताइए तथा इसका चिकित्सा विज्ञान में क्या महत्व है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: आर्थ्रोपोडा का जीवित जीवाश्म लिमुलस (Limulus) अथवा किंग क्रैब (अश्वनाल केकड़ा) है, जो 40 करोड़ वर्षों से अपरिवर्तित रहा है। इसके तांबेयुक्त नीले रक्त की अमीबोसाइट कोशिकाओं से 'लिमुलस अमीबोसाइट लाइसेंट' (LAL) तैयार किया जाता है। मानव शरीर में प्रयुक्त होने वाली सभी दवाओं, अंतःशिरा टीकों, ग्लूकोज बोतलों तथा शल्य चिकित्सा उपकरणों की जीवाणु एंडोटॉक्सिन मुक्तता का त्वरित परीक्षण करने हेतु LAL विश्व का आधिकारिक स्वर्ण-मानक है।
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अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

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