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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 2
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

जीव जगत का वर्गीकरण

जीव जगत का वर्गीकरण पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद (WBCHSE) कक्षा 11 जीव विज्ञान का अत्यंत महत्वपूर्ण एवं मूलभूत अध्याय है। इस अध्याय में पृथ्वी पर ज्ञात 17 से 18 लाख जीवों की विशाल विविधता को उनके कोशिकीय संगठन, पोषण की विधि, जनन तथा जातिवृत्तीय (विकासवादी) संबंधों के आधार पर तार्किक श्रेणियों में क्रमबद्ध करने की वैज्ञानिक पद्धतियों का गहन अध्ययन किया गया है। अरस्तू तथा कैरोलस लिनियस की द्विजगत वर्गीकरण प्रणाली की सीमाओं का विश्लेषण करते हुए सन 1969 में आर. एच. व्हिटेकर द्वारा प्रतिपादित पाँच जगत प्रणाली (मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक, पादप एवं प्राणी) को विस्तार से समझाया गया है। इसके अतिरिक्त आद्यजीवाणु, हेटरोसिस्ट युक्त सायनोबैक्टीरिया, भित्तिविहीन माइकोप्लाज्मा, डायटम और लाल तरंगें उत्पन्न करने वाले प्रोटिस्टा, कवक के लैंगिक जनन व द्विकेंद्रक प्रावस्था तथा व्हिटेकर प्रणाली से बाहर अकोशिकीय संरचनाओं जैसे विषाणु, विरोइड, प्रिओन और लाइकेन की भूमिका का विस्तृत विवरण दिया गया है।

क्या आपने कभी सोचा है?

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

रोगजनक सूक्ष्मजीवों की सटीक पहचान, उपयुक्त एंटीबायोटिक औषधियों के चयन तथा कृषि और उद्योग में सूक्ष्मजीवों के दोहन के लिए जीवों का वैज्ञानिक वर्गीकरण अपरिहार्य है। उदाहरण के लिए, माइकोप्लाज्मा में पेप्टिडोग्लाइकन कोशिका भित्ति न होने के कारण यह पेनिसिलिन के प्रति स्वाभाविक रूप से प्रतिरोधी होता है—यह वर्गीकरण विज्ञान का प्रत्यक्ष नैदानिक प्रमाण है। इसके अतिरिक्त फसलों में रस्ट और स्मट रोगों की रोकथाम तथा समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने के लिए मोनेरा और प्रोटिस्टा का ज्ञान अनिवार्य है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • प्रोकैरियोटिक बनाम यूकैरियोटिक कोशिका का मूलभूत अंतर (केंद्रकाभ बनाम झिल्लीयुक्त केंद्रक)।
  • स्वपोषी (प्रकाशसंश्लेषी) तथा विषमपोषी (मृतोपजीवी/परजीवी) पोषण की प्रारंभिक अवधारणा।
  • अध्याय 1 में पढ़ा गया वर्गिकी, द्विपद नामकरण तथा पदानुक्रम का ज्ञान।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 वर्गीकरण का इतिहास एवं व्हिटेकर की...
2 जगत मोनेरा: आद्यजीवाणु, वास्तविक जी...
3 जगत प्रोटिस्टा: एककोशिकीय यूकैरियोट...
4 जगत कवक: संरचना, लैंगिक चक्र एवं चा...
5 पादप एवं प्राणी जगत की आधारभूत रूपर...
6 अकोशिकीय जीव: विषाणु, विरोइड्स, प्र...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

वर्गीकरण का इतिहास एवं व्हिटेकर की पाँच जगत प्रणाली

सभ्यता के आरंभ से ही मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं (भोजन, वस्त्र, आवास) के अनुसार जीवों का वर्गीकरण किया। किंतु वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सबसे पहला वर्गीकरण यूनानी दार्शनिक अरस्तू (Aristotle) ने किया। उन्होंने सरल आकारिकीय लक्षणों के आधार पर पादपों को वृक्ष (Trees), झाड़ी (Shrubs) और शाक (Herbs) में विभाजित किया, तथा प्राणियों को दो समूहों—लाल रक्त वाले (इनेइमा या Enaima) और लाल रक्त रहित (अनेइमा या Anaima) में बांटा।

1. लिनियस का द्विजगत वर्गीकरण एवं उसकी कमियां

18वीं शताब्दी में कैरोलस लिनियस ने दो जगत प्रणाली विकसित की:

  1. पादप जगत (Plantae): कोशिका भित्ति युक्त सभी जीव जैसे जीवाणु, नील-हरित शैवाल, कवक, मॉस, फर्न, जिम्नोस्पर्म व एंजियोस्पर्म।
  2. प्राणी जगत (Animalia): कोशिका भित्ति रहित, प्रचलनशील तथा होलोज़ोइक पोषण वाले बहुकोशिकीय प्राणी।

द्विजगत प्रणाली की गंभीर सीमाएं:

  • प्रोकैरियोट व यूकैरियोट का एकत्रीकरण: झिल्लीयुक्त केंद्रक रहित प्रोकैरियोटिक जीवाणुओं को यूकैरियोटिक पौधों के साथ रख दिया गया।
  • एककोशिकीय व बहुकोशिकीय जीवों का सम्मिश्रण: एककोशिकीय Chlamydomonas और Amoeba को बहुकोशिकीय पौधों और जंतुओं के साथ रखा गया।
  • प्रकाशसंश्लेषी व विषमपोषी का अनुचित वर्गीकरण: हरित लवक युक्त स्वपोषी हरे शैवालों को पर्णहरित रहित तथा काइटिन भित्ति वाले मृतोपजीवी कवकों के साथ पादप जगत में मिला दिया गया।
2. आर. एच. व्हिटेकर की पाँच जगत प्रणाली (1969)

इन विसंगतियों को दूर करने के लिए अमेरिकी पारिस्थितिकी विज्ञानी रॉबर्ट एच. व्हिटेकर (1969) ने समस्त जीव जगत को पाँच जगतों में वर्गीकृत किया: मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक (Fungi), पादप (Plantae) तथा प्राणी (Animalia)।

लक्षण मोनेरा (Monera) प्रोटिस्टा (Protista) कवक (Fungi) पादप (Plantae) प्राणी (Animalia)
कोशिका प्रकार प्रोकैरियोटिक यूकैरियोटिक यूकैरियोटिक यूकैरियोटिक यूकैरियोटिक
कोशिका भित्ति असेलूलोज़ी (पेप्टिडोग्लाइकन) कुछ में उपस्थित (डायटम), कुछ में अनुपस्थित उपस्थित (काइटिन व पॉलीसैकेराइड) उपस्थित (सेलूलोज़, पेक्टिन) अनुपस्थित
केंद्रक झिल्ली अनुपस्थित उपस्थित उपस्थित उपस्थित उपस्थित
शारीरिक संगठन एककोशिकीय (कोशिकीय स्तर) एककोशिकीय (कोशिकीय स्तर) बहुकोशिकीय / शिथिल ऊतक (कवकजाल) ऊतक / अंग स्तर ऊतक / अंग / अंगतंत्र स्तर
पोषण की विधि स्वपोषी (रसायन व प्रकाशसंश्लेषी) तथा विषमपोषी (मृतजीवी / परजीवी) स्वपोषी (प्रकाशसंश्लेषी) तथा विषमपोषी / मिश्रपोषी विषमपोषी (अवशोषणकारी मृतजीवी / परजीवी) स्वपोषी (प्रकाशसंश्लेषी) विषमपोषी (होलोज़ोइक / प्राणीसम)
3. व्हिटेकर के वर्गीकरण के पाँच मुख्य आधारभूत मापदंड
  1. कोशिका संरचना की जटिलता: प्रोकैरियोटिक अथवा यूकैरियोटिक संगठन।
  2. शारीरिक संगठन की जटिलता: एककोशिकीय बनाम बहुकोशिकीय/ऊतक/अंग संगठन।
  3. पोषण की विधि: स्वपोषी संश्लेषण (पादप), अवशोषणकारी विषमपोषी (कवक) अथवा अंतर्ग्रहणकारी होलोज़ोइक (प्राणी)।
  4. जनन के प्रकार: कायिक, अलैंगिक एवं लैंगिक चक्रों का स्वरूप।
  5. जातिवृत्तीय (विकासवादी) संबंध: पूर्वज प्रोकैरियोट से आधुनिक जटिल जीवों का विकासात्मक क्रम।

जगत मोनेरा: आद्यजीवाणु, वास्तविक जीवाणु एवं माइकोप्लाज्मा

जगत मोनेरा के अंतर्गत सभी प्रोकैरियोटिक जीव सम्मिलित हैं। जीवाणु पृथ्वी पर सबसे अधिक संख्या में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीव हैं, जो बर्फीले ध्रुवों से लेकर १०० डिग्री सेल्सियस के गर्म गंधकयुक्त झरनों में भी पनपते हैं। आकृति के आधार पर जीवाणु चार प्रकार के होते हैं: गोलाकार कोकस (Coccus), छड़ाकार बैसिलस (Bacillus), अल्पविराम के आकार के विब्रियो (Vibrio) तथा सर्पिलाकार स्पाइरिलम (Spirillum)।

1. आद्यजीवाणु (Archaebacteria - Archaea)

आद्यजीवाणु अत्यंत कठोर एवं प्रतिकूल पर्यावरण में जीवित रहते हैं। इनकी अत्यधिक सहनशीलता का रहस्य इनकी स्यूडोम्यूरिन युक्त विशिष्ट कोशिका भित्ति (सच्चे पेप्टिडोग्लाइकन रहित) तथा ईथर बंध युक्त शाखित हाइड्रोकार्बन श्रृंखला वाली प्लाज्मा झिल्ली है। यह ईथर बंध युक्त लिपिड परत अत्यधिक उच्च तापमान पर झिल्ली के पिघलने अथवा अम्ल में नष्ट होने से सुरक्षा प्रदान करती है।

  • मीथेनोजेन (Methanogens): अनॉक्सी दलदली क्षेत्रों तथा जुगाली करने वाले जंतुओं (गाय, भैंस) के आमाशय (रूमेन) में पाए जाते हैं और गोबर गैस (मीथेन, $CH_4$) का उत्पादन करते हैं। उदाहरण: Methanobacterium।
  • हैलोफाइल (Halophiles): अत्यधिक लवणीय सांद्रता वाले जलीय क्षेत्रों (मृत सागर) में रहते हैं। इनकी झिल्ली में बैक्टीरियोरोडोप्सिन वर्णक होता है जो सूर्य के प्रकाश से सीधे ATP बनाता है। उदाहरण: Halobacterium।
  • थर्मोएसिडोफाइल (Thermoacidophiles): अत्यधिक गर्म व अम्लीय गंधकयुक्त झरनों (तापमान 80-100°C, pH 2) में रहते हैं और गंधक को ऑक्सीकृत कर सल्फ्यूरिक अम्ल बनाते हैं। उदाहरण: Sulfolobus।
2. वास्तविक जीवाणु (Eubacteria)

इनकी दृढ़ कोशिका भित्ति पेप्टिडोग्लाइकन (म्यूरिन) की बनी होती है, जो एन-एसिटाइल ग्लूकोसामीन (NAG) और एन-एसिटाइल म्यूरेमिक अम्ल (NAM) के बहुलक से निर्मित होती है।

3. सायनोबैक्टीरिया (नील-हरित शैवाल / Blue-Green Algae)

ये प्रकाशसंश्लेषी प्रोकैरियोट्स हैं जिनमें उच्च पादपों के समान क्लोरोफिल-ए तथा फाइकोसायनिन वर्णक पाए जाते हैं। ये एककोशिकीय, कॉलोनीयुक्त अथवा तंतुमय होते हैं और चारों ओर से श्लेष्मी आवरण (Mucilaginous sheath) से ढके रहते हैं।

  • हेटरोसिस्ट (Heterocyst): Nostoc तथा Anabaena जैसे तंतुमय सायनोबैक्टीरिया में नाइट्रोजन स्थिरीकरण हेतु विशेष, मोटी भित्ति वाली, रंगहीन कोशिकाएं होती हैं जिन्हें हेटरोसिस्ट कहते हैं।
  • नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाला एंजाइम नाइट्रोजिनेज (Nitrogenase) ऑक्सीजन की उपस्थिति में निष्क्रिय हो जाता है। हेटरोसिस्ट में फोटोसिस्टम-2 (PS-II) अनुपस्थित होता है, जिससे ऑक्सीजन का निर्माण नहीं होता और अनॉक्सी वातावरण में नाइट्रोजिनेज वायुमंडलीय $N_2$ को अमोनिया में बदल देता है।
  • वॉटर ब्लूम (Water Bloom): सुपोषण (Eutrophication) के कारण जलाशयों में सायनोबैक्टीरिया की अत्यधिक वृद्धि से पानी विषाक्त हो जाता है और जलीय जीवों की मृत्यु होती है।
4. माइकोप्लाज्मा (Mycoplasma या PPLO)

माइकोप्लाज्मा ऐसे सूक्ष्मजीव हैं जिनमें कोशिका भित्ति पूर्णतः अनुपस्थित होती है। ये पृथ्वी पर ज्ञात सबसे छोटी जीवित कोशिकाएं हैं (आकार 0.1 से 0.3 माइक्रोमीटर)।

  • ये ऑक्सीजन के बिना भी सामान्य रूप से जीवित रह सकते हैं।
  • औषधीय महत्व: चूंकि पेनिसिलिन एंटीबायोटिक केवल कोशिका भित्ति के निर्माण को रोककर काम करता है, अतः माइकोप्लाज्मा पर पेनिसिलिन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता! इन्हें नष्ट करने के लिए टेट्रासाइक्लिन जैसी औषधियां प्रयुक्त होती हैं।
  • ये जंतुओं में प्लूरोन्यूमोनिया और पादपों में 'विचेज ब्रूम' रोग उत्पन्न करते हैं।

जगत प्रोटिस्टा: एककोशिकीय यूकैरियोट की विविधता

जगत प्रोटिस्टा में सभी एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीव शामिल हैं। यूकैरियोट होने के कारण इनमें सुगठित केंद्रक तथा झिल्लीयुक्त कोशिकांग (माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जी काय आदि) उपस्थित होते हैं। ये प्राथमिक रूप से जलीय होते हैं और प्रोकैरियोट तथा जटिल बहुकोशिकीय जीवों के बीच की विकासवादी कड़ी हैं।

1. क्राइसोफाइट (Chrysophytes - डायटम एवं सुनहरे शैवाल)

ये स्वच्छ जल एवं समुद्री पर्यावरण दोनों में पाए जाने वाले सूक्ष्म प्लवक (Plankton) हैं जो जलधारा के साथ निष्क्रिय रूप से बहते हैं।

  • साबुनदानी जैसी भित्ति (Frustule): डायटम की कोशिका भित्ति साबुनदानी की तरह दो अतिव्यापी कवचों से बनी होती है (ऊपरी एपिथिका और निचली हाइपोथिका)।
  • सिलिकामय भित्ति: इनकी भित्ति में सिलिका ($SiO_2$) जड़ा होता है, जिससे यह अत्यंत कठोर और अविनाशी होती है।
  • डायटमी मृदा (Diatomaceous Earth): मृत डायटम के सिलिकामय कवच करोड़ों वर्षों तक समुद्र तल पर जमा होकर भारी चट्टानी परत बनाते हैं जिसे डायटमी मृदा कहते हैं। इसका उपयोग तेलों, सिरप और एंटीबायोटिक के निस्यंदन तथा धातु पॉलिश में होता है।
  • डायटम को "महासागरों का प्रमुख उत्पादक" (Chief Producers in the Oceans) कहा जाता है।
2. डाइनोफ्लैजिलेट (Dinoflagellates)

ये अधिकांशतः समुद्री एवं प्रकाशसंश्लेषी होते हैं। इनकी कोशिका भित्ति कठोर सेलूलोज़ की पट्टिकाओं से ढकी होती है।

  • इनमें दो कशाभ (Flagella) होते हैं: एक अनुदैर्ध्य और दूसरा अनुप्रस्थ खांच में स्थित होता है, जो इन्हें चक्रीय घूर्णन गति प्रदान करता है।
  • लाल तरंगें (Red Tides): पोषक तत्वों से युक्त समुद्र में लाल डाइनोफ्लैजिलेट जैसे Gonyaulax के तीव्र विस्फोटकीय गुणन से समुद्र का जल रक्त जैसा लाल दिखाई देने लगता है। ये घातक न्यूरोटॉक्सिन सैक्सिटॉक्सिन (Saxitoxin) छोड़ते हैं जिससे मछलियां मर जाती हैं।
3. यूग्लीनॉइड्स (Euglenoids - यूग्लीना)

अधिकांशतः स्थिर स्वच्छ जल में पाए जाते हैं (जैसे Euglena)।

  • इनमें सेलूलोज़ की कोशिका भित्ति नहीं होती, बल्कि प्लाज्मा झिल्ली के नीचे प्रोटीन युक्त लचीला आवरण होता है जिसे पेलिकल (Pellicle) कहते हैं।
  • इनमें दो असमान कशाभ होते हैं—एक लंबा और दूसरा छोटा।
  • मिश्रपोषी पोषण (Mixotrophic Nutrition): सूर्य के प्रकाश में ये पौधों की तरह प्रकाशसंश्लेषण करते हैं (क्लोरोफिल-ए व बी युक्त), किंतु अंधेरे में ये छोटे जीवों का शिकार कर परपोषी बन जाते हैं!
4. अवपंक कवक (Slime Moulds)

ये मृतोपजीवी प्रोटिस्ट हैं जो सड़ती हुई पत्तियों और टहनियों के कार्बनिक पदार्थों को ग्रहण करते हैं।

  • अनुकूल परिस्थितियों में ये समूहित होकर भित्तिविहीन बहुकेंद्रकी जीवद्रव्य पुंज बनाते हैं जिसे प्लाज्मोडियम (Plasmodium) कहते हैं।
  • प्रतिकूल परिस्थितियों में प्लाज्मोडियम से बीजाणुधानी बनती है जिनके शीर्ष पर स्थित बीजाणुओं के चारों ओर वास्तविक सेलूलोज़ भित्ति पाई जाती है, जिससे ये अत्यधिक सहनशील होते हैं और वायु द्वारा प्रकीर्णित होते हैं।
5. प्रोटोजोआ (Protozoans)

ये विषमपोषी एककोशिकीय प्राणीसम जीव हैं:

  1. अमीबीय प्रोटोजोआ: कूटपादों (Pseudopodia) द्वारा गमन व शिकार (उदा. Amoeba, तथा पेचिश रोगजनक Entamoeba histolytica)।
  2. कशाभीय प्रोटोजोआ: कशाभ युक्त परजीवी; Trypanosoma gambiense जो सीसी मक्खी द्वारा निद्रारोग (Sleeping sickness) उत्पन्न करता है।
  3. पक्ष्माभी प्रोटोजोआ: हजारों पक्ष्माभों द्वारा गतिशील; Paramecium (गुरु व लघु केंद्रक युक्त)।
  4. स्पोरोजोआ: संक्रामक बीजाणु जैसी प्रावस्था वाले अंतःपरजीवी; मलेरिया परजीवी Plasmodium vivax।

जगत कवक: संरचना, लैंगिक चक्र एवं चार प्रमुख वर्ग

जगत कवक (Kingdom Fungi) पर्णहरित रहित, विषमपोषी यूकैरियोटिक जीवों का एक विशाल समूह है। एककोशिकीय यीस्ट (Saccharomyces) को छोड़कर शेष सभी कवक तंतुमय होते हैं। इनके शरीर में धागेनुमा पतले तंतु पाए जाते हैं जिन्हें कवकतंतु (Hyphae) कहते हैं, और कवकतंतुओं के जाल को कवकजाल (Mycelium) कहा जाता है।

1. कवकतंतु की प्रकृति एवं कोशिका भित्ति
  • सीनोसाइटिक कवकतंतु: पटविहीन (Aseptate) नलिकाकार तंतु जिसमें बहुकेंद्रकी जीवद्रव्य भरा रहता है (जैसे फाइकोमाइसिटीज)।
  • पटयुक्त कवकतंतु: अनुप्रस्थ पटों (Septa) द्वारा विभाजित तंतु जिसमें सरल अथवा डोलिपोर छिद्र होते हैं।
  • कोशिका भित्ति: पौधों के विपरीत कवक की कोशिका भित्ति काइटिन (Chitin - N-एसिटाइल ग्लूकोसामीन का बहुलक) तथा ग्लूकैन पॉलीसैकेराइड से बनी होती है।
  • पोषण: बाह्यकोशिकीय एंजाइम स्रावित कर भोजन को पचाकर अवशोषित करते हैं (मृतोपजीवी, परजीवी अथवा लाइकेन व माइकोराइजा सहजीवी)।
2. कवक का लैंगिक चक्र एवं द्विकेंद्रक प्रावस्था

कवक का लैंगिक चक्र तीन सुनिश्चित चरणों में संपन्न होता है:

  1. जीवद्रव्य संलयन (Plasmogamy): दो संगत जनन कोशिकाओं अथवा कवकतंतुओं के जीवद्रव्य का संलयन, किंतु केंद्रक तुरंत संलयित नहीं होते।
  2. केंद्रक संलयन (Karyogamy): दोनों अगुणित केंद्रकों का संलयन ($n + n ightarrow 2n$) होकर द्विगुणित युग्मनज केंद्रक बनता है।
  3. अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis): द्विगुणित केंद्रक में न्यूनकारी विभाजन होकर पुनः अगुणित ($n$) लैंगिक बीजाणु बनते हैं।

द्विकेंद्रक प्रावस्था ($n + n$): उच्च कवकों यानी एस्कोमाइसिटीज और बेसिडियोमाइसिटीज में जीवद्रव्य संलयन के तुरंत बाद केंद्रक संलयन नहीं होता! फलस्वरूप प्रत्येक कोशिका में दो अगुणित केंद्रक ($n + n$) साथ-साथ रहते हैं। इस अवस्था को द्विकेंद्रक (Dikaryon) तथा इस प्रावस्था को द्विकेंद्रक प्रावस्था कहते हैं।

3. कवक के चार प्रमुख वर्ग
वर्ग कवकजाल अलैंगिक बीजाणु लैंगिक बीजाणु एवं उत्पत्ति प्रमुख उदाहरण
फाइकोमाइसिटीज
(शैवाल कवक)
पटरहित एवं सीनोसाइटिक बीजाणुधानी में अंतर्जात चलबीजाणु (Zoospores) अथवा अचलबीजाणु युग्मकों के संलयन से बना जाइगोस्पोर (Zygospore) Mucor, Rhizopus (रोटी की फफूंद), Albugo candida (सरसों का श्वेत किट्ट रोग)
एस्कोमाइसिटीज
(थैली कवक)
शाखित एवं पटयुक्त कोनिडियोफोर के शीर्ष पर बहिर्जात कोनिडिया थैलीनुमा एस्कस (Ascus) के भीतर अंतर्जात 8 एस्कोबीजाणु; फलनकाय एस्कोकार्प Penicillium (एंटीबायोटिक), Aspergillus, Claviceps (अरगट), Neurospora crassa ("पादप जगत की ड्रोसोफिला"), मोरेल व ट्रफल
बेसिडियोमाइसिटीज
(क्लब कवक)
शाखित एवं पटयुक्त (डोलिपोर पट व क्लैंप कनेक्शन) प्रायः अनुपस्थित; विखंडन द्वारा कायिक जनन क्लब के आकार के बेसिडियम (Basidium) के शीर्ष पर बहिर्जात 4 बेसिडियोबीजाणु; फलनकाय बेसिडियोकार्प Agaricus bisporus (खाने योग्य मशरूम), Puccinia graminis (गेहूं का काला किट्ट रोग), Ustilago (कंड रोग)
ड्यूटेरोमाइसिटीज
(अपूर्ण कवक)
शाखित एवं पटयुक्त कोनिडिया अनुपस्थित अथवा अज्ञात (लैंगिक अवस्था ज्ञात होते ही इन्हें एस्को या बेसिडियोमाइसिटीज में स्थानांतरित किया जाता है) Alternaria solani (आलू का अगेती अंगमारी रोग), Colletotrichum falcatum (गन्ने का लाल सड़न रोग), Trichoderma

पादप एवं प्राणी जगत की आधारभूत रूपरेखा

व्हिटेकर की प्रणाली में बहुकोशिकीय यूकैरियोटिक जीवों को पोषण के आधार पर क्रमशः पादप जगत (Plantae) एवं प्राणी जगत (Animalia) में रखा गया है।

1. पादप जगत (Kingdom Plantae)
  • ये पर्णहरित युक्त बहुकोशिकीय यूकैरियोटिक स्वपोषी जीव हैं। इनकी कोशिका भित्ति मुख्य रूप से सेलूलोज़ व पेक्टिन की बनी होती है।
  • कुछ कीटभक्षी पौधे आंशिक रूप से विषमपोषी होते हैं, जैसे घटपर्णी (Nepenthes), ड्रोसेरा तथा यूट्रीकुलेरिया। अमरबेल (Cuscuta) पूर्ण परजीवी पौधा है।
  • पीढ़ी एकांतरण (Alternation of Generations): पादपों के जीवन चक्र में द्विगुणित बीजाणुद्भिद् प्रावस्था ($2n$) तथा अगुणित युग्मकोद्भिद् प्रावस्था ($n$) का चक्रीय एकांतरण होता है।
2. प्राणी जगत (Kingdom Animalia)
  • ये बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक, पूर्णतः कोशिका भित्ति रहित विषमपोषी प्राणी हैं।
  • होलोज़ोइक पोषण: ये भोजन का अंतर्ग्रहण कर आंतरिक पाचन तंत्र में पाचन करते हैं। संचित भोजन ग्लाइकोजन अथवा वसा के रूप में रहता है।
  • इनमें विकसित तंत्रिका तंत्र व संवेदी अंग पाए जाते हैं जिससे ये उद्दीपनों के प्रति तीव्र अनुक्रिया करते हैं और सक्रिय प्रचलन दर्शाते हैं।
  • जनन मुख्यतः लैंगिक होता है जिसमें नर व मादा युग्मकों के संलयन से बने युग्मनज से भ्रूणीय विकास होता है।

अकोशिकीय जीव: विषाणु, विरोइड्स, प्रिओन्स एवं लाइकेन

व्हिटेकर के पाँच जगत वर्गीकरण में अकोशिकीय संरचनाओं जैसे विषाणु (Virus), विरोइड्स (Viroids) तथा प्रिओन्स (Prions) और मिश्रित जीव लाइकेन का कोई उल्लेख नहीं है। चूंकि इनमें कोशिकीय संगठन नहीं होता और ये कोशिका सिद्धांत का पालन नहीं करते, इसलिए इनका अध्ययन पृथक रूप से किया जाता है।

1. विषाणु (Viruses - सजीव व निर्जीव के बीच की कड़ी)

विषाणु अविकल्पी अंतःकोशिकीय परजीवी हैं जो पोषक कोशिका के बाहर अक्रिय क्रिस्टल के समान होते हैं, किंतु पोषक कोशिका में प्रवेश करते ही उसकी जैव-संश्लेषण मशीनरी पर अधिकार कर अपनी प्रतिलिपियां बनाते हैं।

खोज का इतिहास:

  • डी. जे. इवानोवस्की (1892): तंबाकू के मोजेक रोग के कारक की खोज की और सिद्ध किया कि ये जीवाणु निस्यंदक (Bacterial filters) से छन जाते हैं, अतः जीवाणु से भी सूक्ष्म हैं।
  • एम. डब्ल्यू. बेइजेरिंक (1898): संक्रमित तंबाकू के रस द्वारा स्वस्थ पौधों में संक्रमण फैलाया और इस संक्रामक रस को "Contagium vivum fluidum" (जीवित संक्रामक तरल) नाम दिया।
  • डब्ल्यू. एम. स्टेनली (1935): सर्वप्रथम तंबाकू मोजेक विषाणु (TMV) को क्रिस्टलीकृत किया और दिखाया कि क्रिस्टल मुख्यतः प्रोटीन के बने होते हैं।

संरचना एवं आनुवंशिक पदार्थ:

  • विषाणु न्यूक्लियोप्रोटीन कण हैं: भीतर आनुवंशिक पदार्थ और बाहर प्रोटीन का रक्षात्मक आवरण कैप्सिड (Capsid) होता है। कैप्सिड की उप-इकाइयों को कैप्सोमियर (Capsomeres) कहते हैं।
  • सार्वभौमिक नियम: किसी भी विषाणु में DNA और RNA दोनों एक साथ कभी नहीं पाए जाते; केवल एक ही उपस्थित होता है।
    • पादप विषाणु: प्रायः एकल रज्जुक RNA (ssRNA), जैसे TMV।
    • प्राणी विषाणु: एकल अथवा द्विरज्जुक RNA, अथवा द्विरज्जुक DNA (जैसे चेचक, हर्पीस, पोलियो, रेबीज, HIV)।
    • जीवाणुभोजी (बैक्टीरियोफेज - जीवाणुओं को संक्रमित करने वाले विषाणु): प्रायः द्विरज्जुक DNA (dsDNA) युक्त होते हैं।
2. विरोइड्स (Viroids - आवरणहीन संक्रामक RNA)

1971 में टी. ओ. डाइनर (T.O. Diener) ने विषाणुओं से भी छोटे नए संक्रामक कारक की खोज की।

  • प्रोटीन आवरण रहित: इनमें कोई प्रोटीन कैप्सिड नहीं होता; ये केवल मुक्त, कम अणुभार वाले एकल रज्जुक वृत्ताकार RNA होते हैं।
  • रोग: ये आलू में तुर्क कंद रोग (Potato Spindle Tuber Disease - PSTD) उत्पन्न करते हैं।
3. प्रिओन्स (Prions - संक्रामक प्रोटीन कण)

प्रिओन्स असामान्य रूप से मुड़े हुए संक्रामक प्रोटीन अणु हैं जिनमें कोई न्यूक्लिक अम्ल (DNA या RNA) नहीं होता।

  • ये मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं में स्पंज जैसे छिद्र बनाकर तंत्रिका अपघटन करते हैं।
  • रोग: मवेशियों में मैड काउ रोग (Bovine Spongiform Encephalopathy - BSE) तथा मनुष्यों में क्रूट्ज़फेल्ड-जैकब रोग (CJD) उत्पन्न करते हैं।
4. लाइकेन (Lichens - सहजीविता एवं प्रदूषण सूचक)

लाइकेन शैवाल (शैवालांश / Phycobiont) तथा कवक (कवकांश / Mycobiont) का अनिवार्य सहजीवी संबंध है।

  • श्रम विभाजन: शैवालांश प्रकाशसंश्लेषण द्वारा भोजन बनाकर कवक को देता है; कवकांश आश्रय देता है और जल व खनिज लवण अवशोषित कर शैवाल को उपलब्ध कराता है।
  • पारिस्थितिक अग्रदूत: नग्न चट्टानों पर कार्बनिक अम्ल स्रावित कर चट्टान तोड़ते हैं और मृदा बनाकर पादप अनुक्रमण की नींव रखते हैं।
  • वायु प्रदूषण के सूचक: लाइकेन में कोई क्यूटिकल नहीं होती। हवा में सल्फर डाइऑक्साइड ($SO_2$) की थोड़ी भी सांद्रता इनके क्लोरोफिल को नष्ट कर देती है। अतः औद्योगिक शहरों व प्रदूषित क्षेत्रों में लाइकेन कभी नहीं उगते!

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

व्हिटेकर की 5 जगत मापदंड मैट्रिक्स (Whittaker's 5 Kingdom Criteria)
5 आधार = कोशिका जटिलता (प्रो/यू) + शारीरिक संगठन (एक/बहु) + पोषण विधि + जनन प्रकार + जातिवृत्तीय संबंध
1969 में आर. एच. व्हिटेकर ने लिनियस की द्विजगत प्रणाली की कमियों को दूर करने हेतु इस पाँच स्तरीय प्रणाली का प्रतिपादन किया।
आद्यजीवाणु चरम सहनशीलता सिद्धांत
झिल्ली संरचना = ईथर बंध युक्त शाखित फाइटेनिल श्रृंखलाएं (सामान्य जीवाणुओं के एस्टर बंध के विपरीत) + स्यूडोम्यूरिन भित्ति
ईथर बंध अम्लीय जल-अपघटन तथा 80-100°C ताप पर झिल्ली को पिघलने से रोकता है, जिससे ये उबलते गंधक झरनों में जीवित रहते हैं।
कवक लैंगिक चक्र का क्रमिक समीकरण
जीवद्रव्य संलयन (Plasmogamy) → द्विकेंद्रक प्रावस्था (n + n) → केंद्रक संलयन (2n) → अर्धसूत्री विभाजन → अगुणित बीजाणु (n)
एस्कोमाइसिटीज और बेसिडियोमाइसिटीज में विलंबित केंद्रक संलयन के कारण विशिष्ट द्विकेंद्रक प्रावस्था (n + n) बनती है।
डायटमी मृदा संचयन नियम
कवच संरचना = एपिथिका + हाइपोथिका (अक्रिस्टलीय सिलिका SiO₂·nH₂O)
जैविक सिलिका का एंजाइमों द्वारा क्षय न होने के कारण करोड़ों वर्षों में समुद्र तल पर अविनाशी डायटमी मृदा संचित होती है।
अकोशिकीय रोगजनकों का तुलनात्मक वर्णक्रम
जीवाणु (कोशिकीय + DNA व RNA) > विषाणु (कैप्सिड + DNA या RNA) > विरोइड (केवल मुक्त RNA) > प्रिओन (केवल संक्रामक प्रोटीन)
स्वतंत्र कोशिकीय जीवन से संक्रामक सूक्ष्म आणविक संरचना की ओर घटती हुई जटिलता का क्रम।
लाइकेन SO₂ संवेदनशीलता एवं प्रदूषण सूचक नियम
लाइकेन = शैवालांश (भोजन) + कवकांश (आश्रय/जल); क्यूटिकल रहित होने से SO₂ सीधे अवशोषित होकर पर्णहरित नष्ट करता है
हवा में सल्फर डाइऑक्साइड की उपस्थिति में लाइकेन नष्ट हो जाते हैं; इसलिए ये वायु प्रदूषण के विश्वसनीय प्राकृतिक सूचक हैं।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
(क) आर. एच. व्हिटेकर द्वारा प्रतिपादित पाँच जगत वर्गीकरण के पाँच मुख्य मापदंड बताइए। (ख) लिनियस की द्विजगत प्रणाली की तुलना में व्हिटेकर की प्रणाली को अधिक वैज्ञानिक एवं श्रेष्ठ क्यों माना जाता है? [अंक विभाजन: 3 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) व्हिटेकर के पाँच जगत वर्गीकरण के पाँच मुख्य मापदंड (3 अंक)

अमेरिकी वैज्ञानिक आर. एच. व्हिटेकर (1969) ने समस्त सजीवों को पाँच जगतों में वर्गीकृत करने हेतु निम्नलिखित पाँच मूलभूत मापदंडों का उपयोग किया था:

  1. कोशिका संरचना की जटिलता (Complexity of Cell Structure): केंद्रक झिल्ली रहित प्रोकैरियोटिक कोशिका (जगत मोनेरा) तथा सुगठित केंद्रक युक्त यूकैरियोटिक कोशिका (प्रोटिस्टा, कवक, पादप, प्राणी) के मध्य स्पष्ट विभेदन।
  2. शारीरिक संगठन की जटिलता (Complexity of Body Organization): एककोशिकीय संगठन (मोनेरा व प्रोटिस्टा) बनाम बहुकोशिकीय/शिथिल कवकजाल ऊतक (कवक) तथा जटिल ऊतक/अंग/तंत्र स्तर (पादप व प्राणी)।
  3. पोषण की विधि (Mode of Nutrition): स्वपोषी प्रकाशसंश्लेषण (पादप), बाह्यकोशिकीय पाचक एंजाइमों द्वारा अवशोषणकारी विषमपोषण (कवक), तथा अंतर्ग्रहणकारी प्राणीसम पोषण (प्राणी)।
  4. जनन के प्रकार (Modes of Reproduction): कायिक, अलैंगिक एवं लैंगिक जनन के प्रकार तथा भ्रूणीय अवस्थाओं की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति।
  5. जातिवृत्तीय (विकासवादी) संबंध (Phylogenetic Relationships): सरल प्रोकैरियोट्स से एककोशिकीय यूकैरियोट्स और उनसे पादपों, कवकों तथा प्राणियों के स्वतंत्र विकास का विकासात्मक इतिहास।
(ख) द्विजगत प्रणाली की तुलना में व्हिटेकर की श्रेष्ठता (2 अंक)

लिनियस की द्विजगत (पादप व प्राणी) प्रणाली की तुलना में व्हिटेकर की प्रणाली निम्नलिखित कारणों से श्रेष्ठ है:

  • प्रोकैरियोट्स का पृथक्करण: लिनियस ने केवल कोशिका भित्ति होने के कारण जीवाणुओं और नील-हरित शैवालों को पौधों के साथ रखा था। व्हिटेकर ने समस्त प्रोकैरियोट्स को अलग कर मोनेरा जगत में स्थान दिया।
  • कवक को स्वतंत्र जगत का दर्जा: कवक पर्णहरित रहित, काइटिन भित्तियुक्त विषमपोषी जीव हैं। इन्हें स्वपोषी पौधों के साथ रखना गलत था। व्हिटेकर ने कवक को स्वतंत्र जगत बनाया।
  • एककोशिकीय यूकैरियोट्स का एकत्रीकरण: लिनियस की प्रणाली में एककोशिकीय शैवाल पौधों में और प्रोटोजोआ प्राणियों में थे। व्हिटेकर ने समस्त एककोशिकीय यूकैरियोट्स को प्रोटिस्टा जगत में संगठित किया।
उदाहरण 2
(क) सायनोबैक्टीरिया के संरचनात्मक लक्षण लिखिए। इनकी 'हेटरोसिस्ट' कोशिकाएं नाइट्रोजन स्थिरीकरण कैसे करती हैं? (ख) आद्यजीवाणु चरम प्रतिकूल परिस्थितियों में कैसे जीवित रहते हैं? [अंक विभाजन: 3 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) सायनोबैक्टीरिया एवं हेटरोसिस्ट द्वारा नाइट्रोजन स्थिरीकरण (3 अंक)

1. सायनोबैक्टीरिया के संरचनात्मक लक्षण:

  • ये प्रकाशसंश्लेषी प्रोकैरियोट्स हैं जिनमें उच्च पादपों के समान क्लोरोफिल-ए, कैरोटीनॉइड तथा फाइकोबिलिन (फाइकोसायनिन व फाइकोइरिथ्रिन) वर्णक पाए जाते हैं।
  • इनका शरीर एककोशिकीय, कॉलोनीयुक्त अथवा तंतुमय होता है और चारों ओर से जिलेटिनी श्लेष्मी आवरण (Mucilaginous sheath) से ढका रहता है।

2. हेटरोसिस्ट द्वारा नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्रियाविधि:

  • Nostoc तथा Anabaena जैसे तंतुमय सायनोबैक्टीरिया में नाइट्रोजन स्थिरीकरण हेतु विशेष, बड़ी, मोटी भित्ति वाली कोशिकाएं पाई जाती हैं जिन्हें हेटरोसिस्ट कहते हैं।
  • नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाला एंजाइम नाइट्रोजिनेज (Nitrogenase) ऑक्सीजन की उपस्थिति में स्थायी रूप से निष्क्रिय हो जाता है। हेटरोसिस्ट ऑक्सीजन रहित वातावरण बनाए रखता है क्योंकि:
    1. इसकी कोशिका भित्ति अत्यधिक मोटी तथा ऑक्सीजन के लिए अपारगम्य होती है।
    2. इसमें फोटोसिस्टम-2 (PS-II) अनुपस्थित होता है; अतः जल का प्रकाशिक अपघटन नहीं होता और ऑक्सीजन उत्पन्न नहीं होती (केवल PS-I द्वारा ATP बनता है)।
  • इस अनॉक्सी सूक्ष्म-पर्यावरण में नाइट्रोजिनेज एंजाइम वायुमंडलीय $N_2$ को अमोनिया में अपचयित कर देता है।
(ख) आद्यजीवाणु (Archaea) के चरम पर्यावरण में जीवित रहने के कारण (2 अंक)

आद्यजीवाणु उबलते तापीय झरनों (थर्मोएसिडोफाइल) तथा अत्यधिक लवणीय झीलों (हैलोफाइल) में दो मुख्य अनुकूलनों के कारण जीवित रहते हैं:

  1. ईथर बंध युक्त शाखित लिपिड झिल्ली: सामान्य जीवाणुओं में एस्टर बंध होते हैं, किंतु आद्यजीवाणु की प्लाज्मा झिल्ली में ईथर बंध द्वारा ग्लिसरॉल से जुड़ी शाखित हाइड्रोकार्बन (फाइटेनिल) श्रृंखलाएं पाई जाती हैं। ईथर बंध अम्लीय जल-अपघटन का प्रतिरोध करते हैं तथा शाखित लिपिड की एकलक परत (Monolayer) 80-100°C पर भी झिल्ली को पिघलने से रोकती है।
  2. स्यूडोम्यूरिन भित्ति: इनकी कोशिका भित्ति में सामान्य पेप्टिडोग्लाइकन के स्थान पर स्यूडोम्यूरिन या जटिल ग्लाइकोप्रोटीन होते हैं जो लाइसोजाइम एंजाइम और परासरणी दाब से अप्रभावित रहते हैं।
उदाहरण 3
(क) डायटम की कोशिका भित्ति की संरचना बताइए। 'डायटमी मृदा' क्या है एवं इसके दो औद्योगिक उपयोग लिखिए। (ख) समुद्र में 'लाल तरंगें' (Red Tides) क्यों उत्पन्न होती हैं? इसका क्या दुष्प्रभाव होता है? [अंक विभाजन: 3 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) डायटम फ्रस्टुल एवं डायटमी मृदा (3 अंक)

1. डायटम की कोशिका भित्ति की संरचना:

  • डायटम की कोशिका भित्ति दो पतले अतिव्यापी कवचों से बनी होती है जो साबुनदानी के ढक्कन की भांति एक-दूसरे पर फिट होते हैं: ऊपरी बड़े ढक्कन को एपिथिका (Epitheca) तथा निचले छोटे कवच को हाइपोथिका (Hypotheca) कहते हैं।
  • भित्ति में अक्रिस्टलीय सिलिका ($SiO_2$) जड़ा होता है जिससे यह कांच की तरह अत्यंत कठोर, अविनाशी एवं अपघटन-प्रतिरोधी होती है।

2. डायटमी मृदा एवं उसके उपयोग:

  • करोड़ों वर्षों तक समुद्र तल पर मृत डायटमों के सिलिकामय कवचों के भारी संचयन से जो चट्टानी रेत जैसी परत बनती है, उसे डायटमी मृदा (Diatomaceous Earth) कहते हैं।
  • औद्योगिक उपयोग:
    1. औद्योगिक निस्यंदन: अत्यधिक छिद्रयुक्त और रासायनिक रूप से अक्रिय होने के कारण इसका उपयोग तेलों, सिरप, शराब तथा एंटीबायोटिक के शुद्ध निस्यंदन में होता है।
    2. पॉलिश व घर्षक: टूथपेस्ट तथा धातु की पॉलिश में सूक्ष्म घर्षक (Abrasive) के रूप में प्रयुक्त होती है।
(ख) लाल तरंगें एवं उनका दुष्प्रभाव (2 अंक)

1. लाल तरंगों का कारण:

  • पोषक तत्वों से भरपूर गर्म समुद्री जल में लाल रंग के डाइनोफ्लैजिलेट्स, विशेषकर Gonyaulax polyedra की संख्या में अचानक विस्फोटक वृद्धि (Algal bloom) होने से समुद्र का पानी लाल रंग का दिखने लगता है। इसे लाल तरंगें (Red Tides) कहते हैं।

2. दुष्प्रभाव:

  • ये जीव अत्यधिक विषैला न्यूरोटॉक्सिन सैक्सिटॉक्सिन (Saxitoxin) स्रावित करते हैं।
  • यह विष समुद्री मछलियों और अन्य जलीय जीवों के तंत्रिका तंत्र को लकवाग्रस्त कर भारी संख्या में उनकी मृत्यु का कारण बनता है। दूषित सीप और शंबुक खाने से मनुष्यों में जानलेवा पैरालिटिक शेलफिश पॉइजनिंग (PSP) हो सकती है।
उदाहरण 4
(क) कवक के लैंगिक चक्र के तीन चरण संक्षेप में लिखिए। (ख) 'द्विकेंद्रक' (Dikaryon) क्या है और यह किन दो वर्गों में पाया जाता है? (ग) एस्कोमाइसिटीज और बेसिडियोमाइसिटीज में बीजाणु निर्माण के दो अंतर लिखिए। [अंक विभाजन: 2 + 1 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) कवक के लैंगिक चक्र के तीन चरण (2 अंक)

कवक में लैंगिक जनन तीन सुनिश्चित कोशिकीय चरणों में पूर्ण होता है:

  1. जीवद्रव्य संलयन (Plasmogamy): दो संगत युग्मकों अथवा कायिक कवकतंतुओं के जीवद्रव्य का संलयन, जिसमें केंद्रक तुरंत नहीं मिलते।
  2. केंद्रक संलयन (Karyogamy): दोनों अगुणित केंद्रकों का संलयन ($n + n ightarrow 2n$) होकर द्विगुणित युग्मनज केंद्रक का निर्माण।
  3. अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis): द्विगुणित युग्मनज केंद्रक में न्यूनकारी विभाजन होकर अगुणित ($n$) लैंगिक बीजाणुओं का निर्माण।
(ख) द्विकेंद्रक प्रावस्था (1 अंक)

वह विशिष्ट कोशिकीय अवस्था जिसमें जीवद्रव्य संलयन के तुरंत बाद केंद्रक संलयन नहीं होता, बल्कि प्रत्येक कोशिका में दो अलग-अलग अगुणित केंद्रक ($n + n$) जोड़े के रूप में उपस्थित रहते हैं, उसे द्विकेंद्रक (Dikaryon) कहते हैं। यह एस्कोमाइसिटीज तथा बेसिडियोमाइसिटीज में पाई जाती है।

(ग) एस्कोमाइसिटीज और बेसिडियोमाइसिटीज में बीजाणु निर्माण (2 अंक)
लक्षण एस्कोमाइसिटीज (थैली कवक) बेसिडियोमाइसिटीज (क्लब कवक)
लैंगिक बीजाणु एवं संख्या एस्कोबीजाणु; प्रायः प्रति एस्कस 8 बनते हैं। बेसिडियोबीजाणु; प्रायः प्रति बेसिडियम 4 बनते हैं।
उत्पत्ति का प्रकार थैलीनुमा एस्कस के भीतर अंतर्जात (Endogenous) रूप से निर्मित। क्लब के आकार के बेसिडियम के शीर्ष पर बहिर्जात (Exogenous) रूप से निर्मित।
उदाहरण 5
(क) विषाणु की खोज में इवानोवस्की, बेइजेरिंक तथा स्टेनली के योगदान का उल्लेख कीजिए। (ख) तंबाकू मोजेक विषाणु (TMV) एवं बैक्टीरियोफेज की रासायनिक संरचना बताइए। (ग) विषाणुओं को व्हिटेकर की पाँच जगत प्रणाली में स्थान क्यों नहीं दिया गया? [अंक विभाजन: 2 + 2 + 1 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) विषाणु विज्ञान में प्रमुख खोजें (2 अंक)
  • डी. जे. इवानोवस्की (1892): तंबाकू के मोजेक रोगजनक की खोज की और सिद्ध किया कि यह जीवाणु निस्यंदक (बैक्टीरियल फिल्टर) से छन जाता है, अतः जीवाणुओं से भी छोटा है।
  • एम. डब्ल्यू. बेइजेरिंक (1898): संक्रमित पौधे के निस्यंदित रस से स्वस्थ तंबाकू में संक्रमण फैलाकर इसे "Contagium vivum fluidum" (जीवित संक्रामक तरल) नाम दिया।
  • डब्ल्यू. एम. स्टेनली (1935): सर्वप्रथम TMV को क्रिस्टलीकृत किया और सिद्ध किया कि क्रिस्टल मुख्य रूप से अक्रिय प्रोटीन के बने होते हैं।
(ख) TMV एवं बैक्टीरियोफेज की संरचना (2 अंक)

1. तंबाकू मोजेक विषाणु (TMV):

  • यह छड़ाकार (Rod-shaped) हेलिकल विषाणु है। इसके केंद्र में एक एकल रज्जुक आरएनए (ssRNA) का अणु होता है (लगभग 6,400 न्यूक्लियोटाइड्स)।
  • बाहर प्रोटीन का कैप्सिड आवरण होता है जो ठीक 2,130 समान कैप्सोमियर्स से बना होता है।

2. बैक्टीरियोफेज (जीवाणुभोजी T-4):

  • यह टैडपोल (मेंढक के लार्वा) के आकार का होता है जिसका शरीर शीर्ष, कॉलर तथा पुच्छ में बंटा होता है।
  • षट्कोणीय प्रिज़्मीय शीर्ष में कसकर लिपटा हुआ द्विरज्जुक डीएनए (dsDNA) पाया जाता है। पुच्छ के आधार पर 6 पुच्छ तंतु (Tail fibers) होते हैं जो जीवाणु की सतह से चिपकते हैं।
(ग) पाँच जगत में स्थान न मिलने का कारण (1 अंक)

विषाणु पूर्णतः अकोशिकीय (Acellular) होते हैं। इनमें कोई कोशिका द्रव्य, राइबोसोम अथवा उपापचयी एंजाइम प्रणाली नहीं होती। पोषक कोशिका के बाहर ये अक्रिय रासायनिक क्रिस्टल होते हैं। इसलिए कोशिका सिद्धांत पर आधारित व्हिटेकर की प्रणाली में इन्हें कोई स्थान नहीं मिला।

उदाहरण 6
(क) विषाणु, विरोइड तथा प्रिओन में तालिका बनाकर अंतर स्पष्ट कीजिए। (ख) लाइकेन को 'द्वैत जीव' क्यों कहते हैं? वायु प्रदूषण के सूचक के रूप में इनकी भूमिका समझाइए। [अंक विभाजन: 3 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) विषाणु, विरोइड तथा प्रिओन में तुलना (3 अंक)
लक्षण विषाणु (Virus) विरोइड (Viroid) प्रिओन (Prion)
खोजकर्ता इवानोवस्की (1892) व बेइजेरिंक (1898) टी. ओ. डाइनर (1971) स्टैनली प्रूसिनर (1982)
रासायनिक प्रकृति न्यूक्लियोप्रोटीन (न्यूक्लिक अम्ल + प्रोटीन कैप्सिड) केवल मुक्त RNA; कोई प्रोटीन आवरण नहीं केवल संक्रामक विकृत प्रोटीन; कोई न्यूक्लिक अम्ल नहीं
आनुवंशिक पदार्थ या तो DNA या RNA (दोनों नहीं) अल्प अणुभार वाला एकल रज्जुक वृत्ताकार RNA अनुपस्थित
आकार अतिसूक्ष्म (20-300 nm) विषाणुओं से भी अत्यंत छोटा (~10 nm) छोटे विषाणुओं के समान
उत्पन्न रोग एड्स (HIV), पोलियो, चेचक, TMV आलू का तुर्क कंद रोग (PSTD) मैड काउ रोग (BSE), मनुष्यों में CJD
(ख) लाइकेन: द्वैत जीव एवं प्रदूषण सूचक (2 अंक)

1. लाइकेन को द्वैत जीव क्यों कहते हैं:

  • लाइकेन कोई एकल जीव नहीं है; यह एक शैवाल (शैवालांश / Phycobiont) तथा एक कवक (कवकांश / Mycobiont) का परस्पर अनिवार्य सहजीवी सहवास है।
  • शैवाल प्रकाशसंश्लेषण कर भोजन बनाता है; कवक सुरक्षा देता है तथा जल व खनिज लवण अवशोषित कर शैवाल को प्रदान करता है। दोनों में से कोई भी इस कठोर वास में अकेला जीवित नहीं रह सकता।

2. वायु प्रदूषण के प्राकृतिक सूचक:

  • लाइकेन में कोई सुरक्षात्मक क्यूटिकल या रंध्र नहीं होते; ये वातावरण से जल और गैसें सीधे अवशोषित करते हैं।
  • हवा में सल्फर डाइऑक्साइड ($SO_2$) की थोड़ी भी सांद्रता इनके शैवाल घटक के पर्णहरित को नष्ट कर देती है जिससे ये तुरंत मर जाते हैं।
  • अतः जिन नगरों या औद्योगिक क्षेत्रों में वायु प्रदूषण अधिक होता है, वहां लाइकेन कभी नहीं पाए जाते ("लाइकेन मरुस्थल")। इनका उपस्थित होना शुद्ध वायु का प्रमाण है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

माइकोप्लाज्मा संक्रमण के उपचार हेतु पेनिसिलिन को प्रभावी मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पेनिसिलिन केवल पेप्टिडोग्लाइकन कोशिका भित्ति के संश्लेषण को बाधित करके कार्य करती है। चूंकि माइकोप्लाज्मा में कोशिका भित्ति होती ही नहीं, अतः यह पेनिसिलिन के प्रति पूर्णतः प्रतिरोधी है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

एस्कोबीजाणु और बेसिडियोबीजाणु की उत्पत्ति (अंतर्जात बनाम बहिर्जात) में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

एस्कोबीजाणु एस्कस थैली के भीतर अंतर्जात (Endogenous) रूप से तथा बेसिडियोबीजाणु बेसिडियम के शीर्ष पर बहिर्जात (Exogenous) रूप से बनते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि विषाणु में DNA तथा RNA दोनों न्यूक्लिक अम्ल एक साथ पाए जा सकते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

किसी भी विषाणु में DNA और RNA दोनों एक साथ कभी नहीं होते; इनमें या तो केवल DNA होगा या केवल RNA।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

विरोइड्स को छोटा विषाणु मानकर इनके चारों ओर प्रोटीन आवरण की कल्पना करना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

विरोइड्स में प्रोटीन कैप्सिड पूर्णतः अनुपस्थित होता है; ये केवल मुक्त, कम अणुभार वाले एकल रज्जुक RNA होते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

नाम में 'मोल्ड' देखकर अवपंक कवक (Slime Moulds) को जगत कवक का सदस्य मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

अवपंक कवक जगत प्रोटिस्टा के अंतर्गत आते हैं क्योंकि इनकी कायिक प्रावस्था भित्तिविहीन अमीबीय प्लाज्मोडियम होती है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

5K जीव जगत का वर्गीकरण: व्हिटेकर की पाँच जगत प्रणाली एवं अकोशिकीय जीव WBCHSE कक्षा 11 जीव विज्ञान — इकाई 1: जीव जगत में विविधता (अध्याय 2) 1. आर. एच. व्हिटेकर का पाँच जगत वर्गीकरण (1969) • Monera: प्रोकैरियोटिक, एककोशिकीय, पेप्टिडोग्लाइकन भित्ति (जीवाणु, नॉस्टॉक) • Protista: यूकैरियोटिक, एककोशिकीय, सिलिका/पेलिकल (डायटम, अमीबा, यूग्लीना) • Fungi: यूकैरियोटिक, काइटिन भित्ति, अवशोषणकारी मृतजीवी (म्यूकर, एगेरिकस) • Plantae: यूकैरियोटिक, बहुकोशिकीय, सेलूलोज़ भित्ति, स्वपोषी प्रकाशसंश्लेषी • Animalia: यूकैरियोटिक, बहुकोशिकीय, भित्तिविहीन, होलोज़ोइक परपोषी 2. कवक के 4 वर्ग एवं लैंगिक जनन चक्र • Phycomycetes: पटरहित सीनोसाइटिक कवकजाल (म्यूकर, राइजोपस, एल्बुगो) • Ascomycetes: थैली कवक, अंतर्जात एस्कोबीजाणु (पेनिसिलियम, न्यूरोस्पोरा) • Basidiomycetes: क्लब कवक, बहिर्जात बेसिडियोबीजाणु (मशरूम, पक्सीनिया) • Deuteromycetes: अपूर्ण कवक, लैंगिक अवस्था अनुपस्थित (अल्टरनेरिया, ट्राइकोडर्मा) जनन चक्र: जीवद्रव्य संलयन (Plasmogamy) → द्विकेंद्रक (n+n) → केंद्रक संलयन → अर्धसूत्री 3. मोनेरा एवं प्रोटिस्टा के विशिष्ट लक्षण • Archaebacteria: शाखित लिपिड झिल्ली; मीथेनोजेन, थर्मोएसिडोफाइल • Cyanobacteria: N₂ स्थिरीकरण हेतु विशिष्ट 'हेटरोसिस्ट' कोशिकाएं (Heterocyst) • Mycoplasma: सबसे छोटी भित्तिविहीन जीवित कोशिकाएं (0.1-0.3 µm), पेनिसिलिन प्रतिरोधी • Diatoms: साबुनदानी जैसी सिलिकामय भित्ति → डायटमी मृदा (Diatomaceous Earth) • Protists: लाल तरंगें (Red Tide); मिश्रपोषी (Mixotrophic) पोषण 4. अकोशिकीय संरचनाएं (व्हिटेकर प्रणाली से बाहर) • Viruses: प्रोटीन आवरण (कैप्सिड) + DNA या RNA; 'संक्रामक जीवित तरल' • Viroids: आवरणहीन मुक्त अल्प अणुभार RNA; आलू कंद रोग • Prions: असामान्य रूप से मुड़े संक्रामक प्रोटीन; मैड काउ रोग (BSE) व CJD • Lichens: शैवाल (शैवालांश) + कवक (कवकांश) सहजीविता; SO₂ वायु प्रदूषण के उत्कृष्ट सूचक Whittaker (1969) excluded viruses & viroids due to their acellular nature.

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
जीव वर्गीकरण जीवित प्राणियों को उनकी संरचनात्मक, कार्यिकीय तथा विकासवादी समानताओं के आधार पर पदानुक्रमित समूहों में व्यवस्थित करने की वैज्ञानिक पद्धति है।
मुख्य बिंदु 2
अरस्तू ने सरल आकारिकीय लक्षणों के आधार पर पादपों को वृक्ष, झाड़ी तथा शाक में और प्राणियों को लाल रक्त युक्त (इनेइमा) तथा लाल रक्त विहीन (अनेइमा) में वर्गीकृत किया था।
मुख्य बिंदु 3
कैरोलस लिनियस ने द्विजगत प्रणाली (पादप व प्राणी) दी; लेकिन यह प्रोकैरियोट-यूकैरियोट तथा स्वपोषी शैवाल व विषमपोषी कवक के बीच अंतर करने में पूरी तरह असमर्थ रही।
मुख्य बिंदु 4
आर. एच. व्हिटेकर (1969) ने पाँच जगत वर्गीकरण प्रतिपादित किया: मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक (Fungi), पादप (Plantae) तथा प्राणी (Animalia)।
मुख्य बिंदु 5
व्हिटेकर के पाँच मुख्य मापदंड थे: (1) कोशिका संरचना की जटिलता, (2) शारीरिक संगठन की जटिलता, (3) पोषण की विधि, (4) जनन के प्रकार, और (5) जातिवृत्तीय (विकासवादी) संबंध।
मुख्य बिंदु 6
जगत मोनेरा में सभी प्रोकैरियोटिक एककोशिकीय जीव शामिल हैं, जिनकी कोशिका भित्ति पेप्टिडोग्लाइकन की बनी होती है; इसमें आद्यजीवाणु, वास्तविक जीवाणु, सायनोबैक्टीरिया तथा माइकोप्लाज्मा आते हैं।
मुख्य बिंदु 7
आद्यजीवाणु (Archaea) की प्लाज्मा झिल्ली में ईथर बंध युक्त शाखित लिपिड श्रृंखलाएं पाई जाती हैं, जो उन्हें उबलते तापीय झरनों और अत्यधिक लवणीय वातावरण में जीवित रखती हैं।
मुख्य बिंदु 8
सायनोबैक्टीरिया (नील-हरित शैवाल) में क्लोरोफिल-ए होता है और इनमें नाइट्रोजन स्थिरीकरण हेतु मोटी भित्ति वाली विशिष्ट कोशिकाएं पाई जाती हैं जिन्हें 'हेटरोसिस्ट' कहते हैं।
मुख्य बिंदु 9
माइकोप्लाज्मा सबसे छोटी (0.1-0.3 µm) भित्तिविहीन जीवित कोशिकाएं हैं, जो बिना ऑक्सीजन के जीवित रह सकती हैं और स्वाभाविक रूप से पेनिसिलिन के प्रति प्रतिरोधी होती हैं।
मुख्य बिंदु 10
जगत प्रोटिस्टा में सभी एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीव सम्मिलित हैं: क्राइसोफाइट (डायटम), डाइनोफ्लैजिलेट (लाल तरंगें), यूग्लीनॉइड्स (पेलिकल व मिश्रपोषी), अवपंक कवक (प्लाज्मोडियम), तथा प्रोटोजोआ।
मुख्य बिंदु 11
डायटम की कोशिका भित्ति साबुनदानी की तरह दो अतिव्यापी कवचों से बनी होती है जिसमें सिलिका जड़ा होता है; समुद्र तल पर इनके जमाव से डायटमी मृदा बनती है।
मुख्य बिंदु 12
कवक जगत पर्णहरित रहित, काइटिन भित्तियुक्त, अवशोषणकारी विषमपोषी यूकैरियोटिक जीवों का समूह है जिनका शरीर कवकतंतुओं (हाइफी) के जाल यानी माइसेलियम से बनता है।
मुख्य बिंदु 13
कवक के लैंगिक चक्र के 3 चरण हैं: प्लास्मोगैमी (जीवद्रव्य संलयन), कैरियौगैमी (केंद्रक संलयन), तथा अर्धसूत्री विभाजन; एस्कोमाइसिटीज और बेसिडियोमाइसिटीज में द्विकेंद्रक प्रावस्था (n + n) पाई जाती है।
मुख्य बिंदु 14
कवक के चार वर्ग हैं: फाइकोमाइसिटीज (सीनोसाइटिक, जाइगोस्पोर), एस्कोमाइसिटीज (थैली कवक, अंतर्जात एस्कोबीजाणु), बेसिडियोमाइसिटीज (क्लब कवक, बहिर्जात बेसिडियोबीजाणु), और ड्यूटेरोमाइसिटीज (अपूर्ण कवक)।
मुख्य बिंदु 15
विषाणु, विरोइड्स तथा प्रिओन्स अकोशिकीय संरचनाएं हैं, इसलिए इन्हें व्हिटेकर की पाँच जगत प्रणाली में कोई स्थान नहीं दिया गया।
मुख्य बिंदु 16
विषाणु न्यूक्लियोप्रोटीन कण हैं (या तो DNA या RNA + प्रोटीन आवरण कैप्सिड); 1935 में डब्ल्यू. एम. स्टेनली ने सर्वप्रथम TMV का क्रिस्टलीकरण किया था।
मुख्य बिंदु 17
विरोइड्स (टी. ओ. डाइनर, 1971) प्रोटीन आवरण रहित केवल मुक्त, कम अणुभार वाले एकल रज्जुक RNA होते हैं, जो आलू में तुर्क कंद रोग (PSTD) उत्पन्न करते हैं।
मुख्य बिंदु 18
प्रिओन्स असामान्य रूप से मुड़े हुए संक्रामक प्रोटीन अणु हैं जिनमें न्यूक्लिक अम्ल नहीं होता; ये मवेशियों में मैड काउ रोग (BSE) तथा मनुष्यों में CJD रोग उत्पन्न करते हैं।
मुख्य बिंदु 19
लाइकेन शैवाल (शैवालांश) तथा कवक (कवकांश) का परस्पर अनिवार्य सहजीवी संबंध है; ये चट्टानों पर प्राथमिक अनुक्रमण के अग्रदूत तथा SO₂ वायु प्रदूषण के संवेदनशील प्राकृतिक सूचक हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
यूग्लीना में क्लोरोफिल-ए होने पर भी व्हिटेकर ने इसे पादप जगत में न रखकर प्रोटिस्टा में क्यों रखा?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: यूग्लीना एककोशिकीय है, इसमें सेलूलोज़ भित्ति नहीं होती (प्रोटीन पेलिकल होती है) तथा अंधेरे में यह प्रकाशसंश्लेषण छोड़कर छोटे जीवों का शिकार करता है (मिश्रपोषी पोषण)। व्हिटेकर ने समस्त एककोशिकीय यूकैरियोट्स को प्रोटिस्टा में रखा।
2
बेसिडियोमाइसिटीज कवक में डोलिपोर पट (Dolipore Septum) का क्या कार्य है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: डोलिपोर पट ढोलक के आकार का फूला हुआ पट छिद्र है जो जीवद्रव्य व पोषक तत्वों के प्रवाह की अनुमति देता है किंतु केंद्रकों के अनियंत्रित आवागमन को रोककर द्विकेंद्रक प्रावस्था की स्थिरता बनाए रखता है।
3
ड्यूटेरोमाइसिटीज को 'अपूर्ण कवक' (Fungi Imperfecti) क्यों कहा जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि इनमें केवल कायिक अथवा अलैंगिक प्रावस्थाएं ही ज्ञात हैं; कोई लैंगिक प्रावस्था नहीं खोजी गई है। लैंगिक प्रावस्था ज्ञात होते ही इन्हें एस्कोमाइसिटीज या बेसिडियोमाइसिटीज में स्थानांतरित कर दिया जाता है।
4
क्या प्रयोगशाला में कृत्रिम एगार-पेप्टोन संवर्धन माध्यम में विषाणु को उगाया जा सकता है? समझाइए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: नहीं। विषाणु अविकल्पी अंतःकोशिकीय परजीवी हैं। इनमें राइबोसोम अथवा ऊर्जा बनाने वाले उपापचयी एंजाइम नहीं होते। ये केवल जीवित पोषक कोशिका की जैव-संश्लेषण मशीनरी का उपयोग करके ही गुणन कर सकते हैं।
5
नग्न चट्टानों पर पादप अनुक्रमण में लाइकेन को अग्रदूत (Pioneer) क्यों माना जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: लाइकेन शुष्क एवं मिट्टी रहित चट्टानों पर उगने में सक्षम होते हैं। ये उसनिक अम्ल जैसे कार्बनिक अम्ल स्रावित कर कठोर चट्टान को तोड़कर मृदा में बदलते हैं, जिससे मॉस और पौधों के उगने का मार्ग प्रशस्त होता है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

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