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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 18
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

गमन एवं संचलन

संचलन सजीवों की सबसे प्रमुख एवं आधारभूत विशेषताओं में से एक है, जिसमें शरीर के अंगों का हिलना-डुलना शामिल है; जबकि प्राणी के ऐच्छिक स्थान परिवर्तन को गमन (लोकोमोशन) कहा जाता है। मानव तथा अन्य कशेरुकी जीवों में गमन और शारीरिक गतियां पेशी तंत्र, कंकाल तंत्र और तंत्रिका तंत्र के सटीक समन्वयन द्वारा संपन्न होती हैं। मानव शरीर में तीन प्रकार के पेशी ऊतक पाए जाते हैं: कंकाल पेशी (रेखित एवं ऐच्छिक), अंतरंग या चिकनी पेशी (अरेखित एवं अनैच्छिक), तथा हृद पेशी (रेखित एवं अनैच्छिक)। आण्विक स्तर पर कंकाल पेशियों का संकुचन हक्सले एवं हैनसन के विसर्पी तंतु सिद्धांत द्वारा संचालित होता है, जिसमें सार्कोप्लाज्मिक रेटिकुलम से कैल्शियम आयन मुक्त होने पर मायोसिन एटीपेज़ एंजाइम द्वारा एटीपी का जल-अपघटन होता है और पतले एक्टिन तंतु मोटे मायोसिन तंतुओं के ऊपर फिसलकर सार्कोमियर को छोटा करते हैं। वयस्क मानव कंकाल में २०६ अस्थियां होती हैं, जिन्हें अक्षीय कंकाल (८० अस्थियां) तथा उपांगीय कंकाल (१२६ अस्थियां) में वर्गीकृत किया गया है। ये अस्थियां विभिन्न संधियों (रेशेदार, उपास्थियुक्त एवं पूर्ण सचल साइनोवियल संधियों) द्वारा आपस में जुड़ी रहकर जैव-यांत्रिक उत्तोलक के रूप में कार्य करती हैं।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पेशी और कंकाल तंत्र की गहन समझ मायस्थेनिया ग्रेविस, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, टिटैनी, ऑस्टियोअर्थराइटिस, रूमेटाइड अर्थराइटिस, गाउट तथा ऑस्टियोपोरोसिस जैसे गंभीर तंत्रिका-पेशीय एवं अस्थि विकारों के निदान और उपचार में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह स्पोर्ट्स मेडिसिन, ऑर्थोपेडिक बायोमैकेनिक्स तथा भौतिक पुनर्वास चिकित्सा का आधार बनती है। पश्चिम बंगाल बोर्ड (WBCHSE) एवं नीट (NEET) परीक्षाओं में सार्कोमियर के संकुचन चरण, क्रॉस-ब्रिज चक्र, अस्थियों की संख्या एवं साइनोवियल संधियों के प्रकारों से प्रतिवर्ष सीधे उच्च अंक वाले प्रश्न पूछे जाते हैं।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 संचलन के प्रकार एवं पेशी ऊतकों की त...
2 कंकाल पेशी तंतु की परासंरचना एवं सा...
3 संकुचनशील प्रोटीन एवं विसर्पी तंतु...
4 पेशी संकुचन की ऊर्जा गतिकी, रिगर मो...
5 मानव कंकाल तंत्र: अक्षीय एवं उपांगी...
6 संधियों का वर्गीकरण एवं गमन संबंधी...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

संचलन के प्रकार एवं पेशी ऊतकों की तुलनात्मक औतिकी

१. मानव शरीर की कोशिकाओं में संचलन के प्रमुख प्रकार

शरीर के किसी अंग अथवा उपांग के हिलने-डुलने को संचलन (Movement) कहते हैं, जबकि प्राणी के संपूर्ण शरीर के एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्वैच्छिक विस्थापन को गमन (Locomotion) कहा जाता है। मानव शरीर की कोशिकाओं में मुख्य रूप से तीन प्रकार के संचलन देखे जाते हैं:

१. अमीबीय संचलन (Amoeboid Movement):
• कार्यप्रणाली: कोशिकाद्रव्य के प्रवाह (सॉल-जेल परिवर्तन) तथा कोशिकीय कंकाल के एक्टिन माइक्रोफिलामेंट्स के बहुलकीकरण से बनने वाले कूटपादों (पादभ / Pseudopodia) द्वारा होता है।
• उदाहरण: रुधिर में संचरित होने वाले श्वेताणु (मुख्यतः न्यूट्रोफिल) तथा ऊतक मैक्रोफेज, जो केशिका भित्ति को पार करके (डायपेडिसिस) रोगाणुओं का भक्षण करते हैं।
२. पक्ष्माभी एवं कशाभी संचलन (Ciliary & Flagellar Movement):
• कार्यप्रणाली: कोशिका झिल्ली से निकले रोम-सदृश पक्ष्माभों के ९+२ सूक्ष्मनलिका विन्यास में डाइनिन एटीपेज़ द्वारा उत्पन्न लयबद्ध तरंगित गति।
• मानव शरीर में स्थल:
- श्वसन मार्ग: श्वासनली (ट्रेकिया) तथा श्वसनी की पक्ष्माभी उपकला श्लेष्मा में फंसे धूलिकणों एवं जीवाणुओं को ग्रसनी की ओर बाहर निकालती है (म्यूकोसिलियरी एस्केलेटर)।
- मादा जनन मार्ग: डिंबवाहिनी (फैलोपियन नलिका) की पक्ष्माभी उपकला अचल अंडाणु अथवा युग्मनज को गर्भाशय की ओर धकेलती है।
- कशाभी गति: मानव शुक्राणु की पूंछ (कशाभ / फ्लैगेलम) चाबुक जैसी तरंगित गति द्वारा शुक्राणु को तैरकर अंडाणु तक पहुंचने में मदद करती है।
३. पेशीय संचलन (Muscular Movement):
• कार्यप्रणाली: पेशी कोशिकाओं के उत्तेजनशीलता, संकुचनशीलता तथा प्रत्यास्थता गुणों के समन्वयन से पेशी संकुचन संपन्न होता है।
• महत्व: भुजाओं व टांगों की गति, जबड़ों व जिह्वा का हिलना, डायाफ्राम द्वारा श्वसन, हृदय द्वारा रुधिर पंप करना तथा आहारनाल में क्रमानुकुंचन।
२. मानव पेशी ऊतकों की तुलनात्मक औतिकी
लक्षणकंकाल पेशी (Skeletal)चिकनी / अंतरंग पेशी (Smooth)हृद पेशी (Cardiac)
स्थितिकंकाल अस्थियों से टेंडन द्वारा जुड़ी होती हैंखोखले आंतरिक अंगों की भित्ति में (आमाशय, आंत, रुधिर वाहिनियां, मूत्राशय)केवल हृदय की मायोकार्डियम भित्ति में
कोशिका संरचनालंबी, बेलनाकार, अशाखित तंतु (१–४० मिमी)लंबी, तर्कुरूपी (फ्यूसीफॉर्म), नुकीले सिरों वालीछोटी, बेलनाकार, शाखित एवं परस्पर जुड़ी हुई
रेखण व सार्कोमियरस्पष्ट गहरे (A) तथा हल्के (I) पट्ट उपस्थित; सुस्पष्ट सार्कोमियरअरेखित (चिकनी); मायोफिलामेंट्स अनियमित जाल में व्यवस्थितरेखित; स्पष्ट गहरे व हल्के पट्ट तथा सार्कोमियर उपस्थित
केंद्रक व्यवस्थाबहुकेंद्रकी संकोशिका (Syncytium); केंद्रक परिधि की ओर स्थितएकल अंडाकार केंद्रक कोशिका के मध्य में स्थितएकल (कभी-कभी दो) केंद्रक मध्य में स्थित
अंतर्विष्ट डिस्क (Intercalated Discs)अनुपस्थितअनुपस्थितउपस्थित; डेस्मोसोम तथा गैप जंक्शन युक्त विशेष संधियां
नियंत्रण एवं तंत्रिका तंत्रऐच्छिक; कायिक तंत्रिका तंत्र (SNS) द्वारा नियंत्रितअनैच्छिक; स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (ANS) द्वारा संचालितअनैच्छिक; स्वायत्त तंत्रिका तंत्र एवं पेसमेकर द्वारा नियंत्रित
संकुचन गति व थकानअत्यंत तीव्र व शक्तिशाली; शीघ्र थक (Fatigue) जाती हैंधीमी, लयबद्ध व दीर्घकालिक; जल्दी नहीं थकतींलयबद्ध, निरंतर एवं जीवनपर्यंत बिना थके संकुचित होती हैं

कंकाल पेशी तंतु की परासंरचना एवं सार्कोमियर

१. कंकाल पेशी का संगठनात्मक पदानुक्रम

एक संपूर्ण कंकाल पेशी संयोजी ऊतक के तीन सुरक्षात्मक आवरणों द्वारा व्यवस्थित होती है:

  • एपीमायसियम (Epimysium): संपूर्ण पेशी को घेरने वाला सघन कोलेजनयुक्त बाहरी आवरण।
  • पेरीमायसियम (Perimysium): पेशी तंतुओं के बंडलों (Fascicles) को ढकने वाला आवरण।
  • एंडोमायसियम (Endomysium): प्रत्येक एकल पेशी तंतु (पेशी कोशिका) की प्लाज्मा झिल्ली के बाहर स्थित महीन आवरण।
२. सार्कोप्लाज्मिक त्रिक एवं T-नलिका तंत्र

कंकाल पेशी कोशिका की प्लाज्मा झिल्ली को सार्कोलेमा (Sarcolemma) तथा कोशिकाद्रव्य को सार्कोप्लाज्म (Sarcoplasm) कहते हैं। सार्कोलेमा भीतर की ओर धंसकर T-नलिकाएं (अनुप्रस्थ नलिकाएं) बनाती है, जो A-बैंड और I-बैंड के संधि स्थल पर सार्कोप्लाज्मिक रेटिकुलम की दो सिस्टर्नी के साथ मिलकर त्रिक (Triad) बनाती हैं। यह त्रिक तंत्रिका आवेग को पेशी तंतु के भीतर तीव्रता से पहुंचाकर Ca2+ का स्राव कराता है।

३. सार्कोमियर की सूक्ष्म संरचना एवं इसके विभिन्न क्षेत्र

मायोफाइब्रिल पर दो क्रमागत Z-रेखाओं (Z-disc) के बीच के भाग को सार्कोमियर (Sarcomere) कहते हैं। यह कंकाल पेशी की प्राथमिक संरचनात्मक एवं संकुचनशील इकाई है (विश्राम अवस्था में लंबाई लगभग २.५ μm)। सार्कोमियर में निम्नलिखित क्षेत्र पाए जाते हैं:

क्षेत्र / पट्टआण्विक संगठन एवं विशेषताएंसंकुचन में भूमिका
A-बैंड (विषमदैशिक / Anisotropic)गहरा पट्ट; मोटे मायोसिन तंतुओं की पूरी लंबाई दर्शाता है और दोनों किनारों पर पतले एक्टिन से आच्छादित होता है (लंबाई १.६ μm)।संकुचन के दौरान इसकी लंबाई पूर्णतः अपरिवर्तित रहती है।
I-बैंड (समदैशिक / Isotropic)हल्का पट्ट; केवल पतले एक्टिन तंतुओं से बना होता है, जिसके ठीक मध्य से Z-रेखा गुजरती है।संकुचन के दौरान एक्टिन के भीतर खिसकने से यह छोटा हो जाता है।
H-क्षेत्र (Hensen's Zone)A-बैंड के केंद्र में स्थित हल्का क्षेत्र जहां एक्टिन का कोई अतिव्यापन नहीं होता (केवल मायोसिन उपस्थित)।संकुचन के दौरान एक्टिन तंतुओं के परस्पर मिलने से यह पूर्णतः लुप्त हो जाता है।
M-रेखा (M-line)H-क्षेत्र के ठीक मध्य में मायोसिन तंतुओं को स्थिर रखने वाली महीन अनुदैर्ध्य प्रोटीन पट्टी।संकुचन के दौरान तंतुओं को अक्षीय स्थिरता प्रदान करती है।
Z-रेखा (Z-line)I-बैंड के मध्य स्थित प्रोटीन प्लेट जिससे एक्टिन तंतु मजबूती से बंधे रहते हैं।संकुचन के दौरान दोनों Z-रेखाएं परस्पर समीप आ जाती हैं।

संकुचनशील प्रोटीन एवं विसर्पी तंतु सिद्धांत

१. संकुचनशील एवं नियामक प्रोटीनों का आण्विक संगठन

पेशी संकुचन की आण्विक प्रणाली में मुख्यतः दो प्रकार के प्रोटीन तंतु भाग लेते हैं:

१. पतला तंतु (Thin / Actin Filament): व्यास ५–८ nm। यह तीन प्रोटीनों से मिलकर बनता है:
• F-एक्टिन (तंतुमय एक्टिन): दो परस्पर कुंडलित रज्जुओं की संरचना, जो गोलाकार G-एक्टिन मोनोमर्स के बहुलकीकरण से बनती है। प्रत्येक G-एक्टिन पर मायोसिन बंधन स्थल होता है।
• ट्रोपोमायोसिन (Tropomyosin): दो तंतुमय प्रोटीन जो एक्टिन हेलिक्स की खांच में स्थित होकर विश्राम अवस्था में एक्टिन के सक्रिय स्थलों को ढके रखते हैं।
• ट्रोपोनिन ट्राइमर (Troponin Complex): नियमित अंतराल पर स्थित तीन उप-इकाइयों वाला प्रोटीन:
- Troponin T (TnT): ट्रोपोनिन को ट्रोपोमायोसिन से बांधता है।
- Troponin I (TnI): विश्राम अवस्था में एक्टिन-मायोसिन अंतःक्रिया को रोकता है।
- Troponin C (TnC): इसमें चार Ca2+ बंधन स्थल होते हैं; कैल्शियम बंधने पर यह संरचनात्मक परिवर्तन लाता है।
२. मोटा तंतु (Thick / Myosin Filament): व्यास १५ nm। यह लगभग ३०० मायोसिन अणुओं का बहुलक है:
• प्रत्येक मायोसिन अणु दो समरूप मेरोमायोसिन (Meromyosin) इकाइयों से बना होता है:
- भारी मेरोमायोसिन (HMM): गोलाकार शीर्ष एवं छोटी लचीली ग्रीवा से बना होता है। शीर्ष पर (क) एक्टिन-बंधन स्थल तथा (ख) एटीपेज़ एंजाइम स्थल होता है जो Mg2+ की उपस्थिति में ATP का जल-अपघटन करता है।
- हल्का मेरोमायोसिन (LMM): लंबी कुंडलित अल्फा-हेलिक्स पुच्छ, जो तंतु के अक्ष पर परस्पर बंधी रहती है।
२. विसर्पी तंतु सिद्धांत एवं क्रॉस-ब्रिज चक्र के चार प्रमुख चरण

सन् १९५४ में एच. ई. हक्सले एवं ए. एफ. हक्सले ने स्वतंत्र रूप से विसर्पी तंतु सिद्धांत (Sliding Filament Theory) प्रस्तुत किया। इसके अनुसार संकुचन के दौरान तंतु स्वयं नहीं सिकुड़ते, बल्कि पतले एक्टिन तंतु मोटे मायोसिन तंतुओं के ऊपर भीतर की ओर फिसलते हैं।

क्रॉस-ब्रिज चक्र के चरण:
चरण १: मायोसिन शीर्ष का सक्रियण (ATP Hydrolysis):
मायोसिन शीर्ष पर स्थित एटीपेज़ एंजाइम ATP को ADP और अकार्बनिक फॉस्फेट (Pi) में तोड़ता है। विमुक्त ऊर्जा शीर्ष को ९० डिग्री के उच्च-ऊर्जा कोण पर खड़ा करती है।

चरण २: क्रॉस-ब्रिज निर्माण (Cross-Bridge Attachment):
सार्कोप्लाज्म में मुक्त Ca2+ ट्रोपोनिन C (TnC) से जुड़ता है। इससे ट्रोपोमायोसिन हट जाता है और एक्टिन के सक्रिय स्थल अनावृत हो जाते हैं। सक्रिय मायोसिन शीर्ष एक्टिन से जुड़कर एक्टोमायोसिन क्रॉस-ब्रिज बनाता है।

चरण ३: पावर स्ट्रोक (The Power Stroke):
एक्टिन से जुड़ते ही Pi और ADP मुक्त हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप मायोसिन शीर्ष अपनी ग्रीवा पर ४५ डिग्री के कोण पर मुड़ता है (पावर स्ट्रोक)। इससे एक्टिन तंतु M-रेखा की ओर लगभग १० nm भीतर खिंच जाता है।

चरण ४: क्रॉस-ब्रिज का पृथक्करण एवं विश्रांति (Detachment):
मायोसिन शीर्ष से एक नया ताज़ा ATP अणु जुड़ता है, जिससे मायोसिन का एक्टिन के प्रति आकर्षण समाप्त हो जाता है और क्रॉस-ब्रिज टूट जाता है। पुनः ATP जल-अपघटन होने पर यह चक्र दोहराया जाता है।

पेशी संकुचन की ऊर्जा गतिकी, रिगर मोर्टिस तथा लाल बनाम श्वेत पेशी तंतु

१. पेशी संकुचन के लिए जैव-रासायनिक ऊर्जा स्रोत

पेशी संकुचन के यांत्रिक कार्य हेतु निरंतर ATP की आवश्यकता होती है। पेशी में संचित ATP मात्र कुछ सेकंड ही चल पाता है। इसका पुनर्जनन तीन मार्गों से होता है:

  • क्रिएटिन फॉस्फेट तंत्र (Phosphagen System): अचानक तीव्र कार्य के समय क्रिएटिन काइनेज एंजाइम क्रिएटिन फॉस्फेट से फॉस्फेट समूह ADP को देकर तुरंत ATP बनाता है (१०–१५ सेकंड की ऊर्जा)।
  • अवायवीय ग्लाइकोलिसिस (Anaerobic Glycolysis): ऑक्सीजन की कमी में पेशी का ग्लाइकोजन तेजी से टूटकर लैक्टिक अम्ल बनाता है (१–२ मिनट का तीव्र श्रम)। अत्यधिक लैक्टिक अम्ल जमा होने से पेशी थकान (Muscle Fatigue) होती है। यह आगे चलकर कोरी चक्र द्वारा यकृत में ग्लूकोज में परिवर्तित होता है।
  • वायवीय श्वसन (Aerobic Respiration): दीर्घकालिक सहनीय कार्यों में माइटोकॉन्ड्रिया में क्रेब्स चक्र एवं ऑक्सीडेटिव फॉस्फोराइलेशन द्वारा फैटी एसिड व ग्लूकोज का ऑक्सीकरण होकर विपुल मात्रा में ATP उत्पन्न होता है।
२. रिगर मोर्टिस (Rigor Mortis / शव संकोच) का कार्यिकीय कारण

प्राणी की मृत्यु के कुछ घंटे पश्चात संपूर्ण कंकाल पेशियां अत्यंत कठोर एवं अकड़ जाती हैं, जिसे रिगर मोर्टिस कहते हैं।

  • कारण: मृत्यु के पश्चात श्वसन व परिसंचरण रुकने से ATP का संश्लेषण पूर्णतः समाप्त हो जाता है। ATP के अभाव में सार्कोप्लाज्मिक रेटिकुलम के Ca2+ पंप कार्य नहीं कर पाते, जिससे सार्कोप्लाज्म में कैल्शियम बना रहता है और एक्टिन के सक्रिय स्थल खुले रहते हैं। मायोसिन शीर्ष एक्टिन से जुड़कर क्रॉस-ब्रिज बना लेते हैं। परंतु क्रॉस-ब्रिज को तोड़ने के लिए नए ATP अणु का जुड़ना अनिवार्य है। ATP न होने के कारण एक्टोमायोसिन कॉम्प्लेक्स स्थायी रूप से फंसा रह जाता है और पेशियां अकड़ जाती हैं।
  • समाप्ति: मृत्यु के २४–३६ घंटे बाद लाइसोसोम के प्रोटीयोलाइटिक एंजाइम एक्टिन व मायोसिन प्रोटीन को विघटित कर देते हैं, जिससे रिगर मोर्टिस स्वतः समाप्त हो जाता है।
३. लाल पेशी तंतु बनाम श्वेत पेशी तंतु में तुलनात्मक अंतर
लक्षणलाल पेशी तंतु (Red / Type I)श्वेत पेशी तंतु (White / Type II)
मायोग्लोबिन व रंगमायोग्लोबिन की उच्च मात्रा; गहरा लाल रंगमायोग्लोबिन की अत्यंत अल्प मात्रा; पीला-श्वेत रंग
माइटोकॉन्ड्रिया व श्वसनअत्यधिक संख्या में बड़े माइटोकॉन्ड्रिया; वायवीय श्वसन प्रधानअत्यल्प माइटोकॉन्ड्रिया; अवायवीय ग्लाइकोलिसिस प्रधान
केशिका आपूर्तिसघन केशिका जाल उपस्थितअपेक्षाकृत कम केशिका आपूर्ति
सार्कोप्लाज्मिक रेटिकुलममध्यम विकसित; Ca2+ का मंद स्रावअत्यधिक विस्तृत; Ca2+ का तीव्र स्राव
संकुचन गतिधीमा संकुचन (Slow-twitch)अत्यंत तीव्र संकुचन (Fast-twitch)
थकान प्रतिरोधकताउच्च थकान प्रतिरोधकता; बिना थके लंबे समय तक कार्यशीघ्र लैक्टिक अम्ल जमने से जल्दी थक जाते हैं
मानव शरीर में उदाहरणपीठ की रीढ़ पेशियां, पिंडली की सोलियस पेशी (शारीरिक संतुलन)नेत्रगोलक पेशियां (Eyeball), अंगुलियों की तीव्र गति पेशियां

मानव कंकाल तंत्र: अक्षीय एवं उपांगीय कंकाल

१. मानव कंकाल तंत्र का सामान्य संगठन (कुल २०६ अस्थियां)

वयस्क मानव शरीर का अस्थि-कंकाल कुल २०६ अस्थियों से मिलकर बनता है, जिन्हें दो प्रमुख भागों में बांटा गया है:

  • १. अक्षीय कंकाल (Axial Skeleton): शरीर के केंद्रीय अनुदैर्ध्य अक्ष पर स्थित कुल ८० अस्थियां।
  • २. उपांगीय कंकाल (Appendicular Skeleton): अग्रपाद, पश्चपाद तथा उनकी मेखलाओं की कुल १२६ अस्थियां।
२. अक्षीय कंकाल का विस्तृत वितरण (८० अस्थियां)
भागअस्थियों के नाम एवं संख्याकुल
खोपड़ी (Skull)• कपाल अस्थियां (Cranial - ८): फ्रंटल १, पैराइटल २, ऑक्सीपिटल १, टेम्पोरल २, स्फेनॉइड १, एथमाइड १
• आननी / चेहरे की अस्थियां (Facial - १४): नासास्थि २, मैक्सिला २, जाइगोमैटिक २, लैक्रिमल २, पैलेटाइन २, इन्फीरियर नेजल कोंका २, वोमर १, मैंडिबल १
२२
हायॉइड (Hyoid)जिह्वा के आधार पर ग्रसनी के ऊपर स्थित U-आकार की एकल अस्थि१
कर्णस्थियां (Ear Ossicles)दोनों मध्यकर्णों में: मैलियस २, इंकस २, स्टेपीज २ (स्टेपीज शरीर की सबसे छोटी अस्थि है)६
कशेरुक दंड (Vertebral Column)ग्रीवा (Cervical) ७, वक्षीय (Thoracic) १२, कटि (Lumbar) ५, त्रिक (Sacrum) १ (५ संलयित), अनुत्रिक (Coccyx) १ (४ संलयित)
कशेरुक सूत्र: C7 T12 L5 S1 Co1 = २६
२६
उरोस्थि (Sternum)वक्ष के मध्य स्थित खंजर जैसी चपटी अस्थि (मैनुब्रियम, देह व जिफाइड प्रवर्ध)१
पसलियां (Ribs)१२ जोड़ी वक्षीय पिंजर की अस्थियां:
• वास्तविक पसलियां (True Ribs - जोड़ी १–७): सीधे स्टर्नम से जुड़ी (१४)
• अवास्तविक पसलियां (False Ribs - जोड़ी ८–१०): सातवीं पसली की उपास्थि से जुड़ी (६)
• प्लावी पसलियां (Floating Ribs - जोड़ी ११–१२): आगे से पूर्णतः स्वतंत्र (४)
२४
अक्षीय कंकाल की कुल अस्थियां८०
३. उपांगीय कंकाल का विस्तृत वितरण (१२६ अस्थियां)
भागअस्थियों का विवरण एवं नामकुल
अंस मेखला (Pectoral Girdle)क्लैविकल (हंसली) २ + स्कैपुला (अंसफलक, जिसमें ग्लेनॉइड गुहा होती है) २४
अग्रपाद (Upper Limbs - दोनों हाथ)प्रत्येक हाथ में ३० अस्थियां:
ह्यूमरस १, रेडियस १, अल्ना १, कार्पल्स (कलाई की अस्थियां) ८, मेटाकार्पल्स (हथेली) ५, फैलैंजेस (अंगुलियां: २,३,३,३,३) १४ = कुल ३० × २
६०
श्रोणि मेखला (Pelvic Girdle)दो नितंब अस्थियां (Coxal bones); प्रत्येक इलियम, इस्चियम व प्यूबिस के संलयन से बनती है और इसमें एसिटाबुलम गुहा होती है२
पश्चपाद (Lower Limbs - दोनों पैर)प्रत्येक पैर में ३० अस्थियां:
फीमर (शरीर की सबसे लंबी व मजबूत अस्थि) १, पटेला (जानुफलक / सीसामॉइड अस्थि) १, टिबिया १, फिबुला १, टार्सल्स (टखने की अस्थियां) ७, मेटाटार्सल्स ५, फैलैंजेस (पैर की अंगुलियां: २,३,३,३,३) १४ = कुल ३० × २
६०
उपांगीय कंकाल की कुल अस्थियां१२६

संधियों का वर्गीकरण एवं गमन संबंधी विकार

१. मानव शरीर की संधियों का संरचनात्मक एवं क्रियात्मक वर्गीकरण

दो या दो से अधिक अस्थियों के जोड़ को संधि (Joint) कहते हैं। गतिशीलता के आधार पर संधियां तीन प्रकार की होती हैं:

१. रेशेदार या अचल संधि (Fibrous / Synarthrosis):
• अस्थियों के सिरे घने श्वेत कोलेजन रेशेदार संयोजी ऊतक द्वारा मजबूती से जुड़े रहते हैं; कोई गति संभव नहीं होती।
• उदाहरण: कपाल की अस्थियों के बीच के सीवन (Sutures) तथा दांत व जबड़े के गड्ढे के बीच की संधि (Gomphosis)।
२. उपास्थियुक्त या अल्प सचल संधि (Cartilaginous / Amphiarthrosis):
• अस्थियां हाइलाइन या फाइब्रोकार्टिलेज द्वारा जुड़ी होती हैं; सीमित लचीली गति की अनुमति देती हैं।
• उदाहरण: कशेरुकाओं के बीच की अंतरकशेरुक डिस्क (Intervertebral discs) तथा प्यूबिक सिम्फिसिस।
३. साइनोवियल या पूर्ण सचल संधि (Synovial / Diarthrosis):
• अस्थियों के संधि स्थलों पर हाइलाइन उपास्थि से ढकी आर्टिकुलर उपास्थि तथा साइनोवियल झिल्ली द्वारा घिरी साइनोवियल तरल से भरी गुहा होती है। यह घर्षणहीन स्वतंत्र संचलन सुनिश्चित करती है।
साइनोवियल संधियों के प्रमुख प्रकार एवं उदाहरण
साइनोवियल संधि का प्रकारयांत्रिक संचलन की प्रकृतिमानव शरीर में महत्वपूर्ण उदाहरण
कंदुक-खल्लिका संधि (Ball and Socket)सर्वाधिक गतिशील बहुअक्षीय संचलन (घूर्णन, आकुंचन, प्रसार, अपवर्तन)• स्कैपुला की ग्लेनॉइड गुहा में ह्यूमरस का सिर (कंधे का जोड़)
• श्रोणि मेखला के एसिटाबुलम में फीमर का सिर (कूल्हे का जोड़)
कोर संधि (Hinge Joint)दरवाजे के कब्जे की तरह एक ही तल में एकदिशीय आकुंचन व प्रसार• कोहनी का जोड़ (ह्यूमरस व अल्ना)
• घुटने का जोड़ (फीमर व टिबिया)
• अंगुलियों के इंटरफलैंजियल जोड़
धुराग्र संधि (Pivot Joint)एक अस्थि का नुकीला प्रवर्ध दूसरी अस्थि के छल्ले में अनुदैर्ध्य अक्ष पर घूमता है• एटलस (C1) तथा एक्सिस (C2) के डेन्स के बीच का जोड़ (सिर की 'नहीं' सूचक गति)
• रेडियो-अल्नर संधि
विसर्पी संधि (Gliding Joint)दो समतल अस्थि सतहें एक-दूसरे पर फिसलती हैं• कलाई की कार्पल्स के बीच इंटरकार्पल जोड़
• टखने की टार्सल्स के बीच इंटरटार्सल जोड़
काठी / सैडल संधि (Saddle Joint)काठी के समान अवतल-उत्तल सतहें; द्विअक्षीय संचलनअंगूठे के कार्पल (ट्रेपेजियम) तथा प्रथम मेटाकार्पल के बीच का जोड़
कंडीलॉयड संधि (Condyloid Joint)अंडाकार उभार अवतल गुहा में बैठता है; बिना घूर्णन के द्विअक्षीय गति• ऑक्सीपिटल कोंडाइल तथा एटलस के बीच का जोड़ (सिर की 'हाँ' सूचक गति)
• रेडियोकार्पल जोड़
२. पेशी एवं कंकाल तंत्र के प्रमुख विकार (Disorders)
विकार का नामकारण एवं रोगजननलक्षण एवं प्रभाव
मायस्थेनिया ग्रेविस (Myasthenia Gravis)स्वप्रतिरक्षी विकार (Autoimmune); स्वप्रतिरक्षी एंटीबॉडी तंत्रिका-पेशी संधि के निकोटिनिक एसिटिलकोलीन ग्राही (AChR) को नष्ट कर देती हैं।पेशियों की अत्यधिक दुर्बलता, शीघ्र थकान, पलकों का झुकना (Ptosis), निगलने में कठिनाई तथा अंततः श्वसन पेशियों का पक्षाघात।
पेशीय दुष्पोषण (Muscular Dystrophy)X-सहलग्न अप्रभावी आनुवंशिक विकार (उदा. ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी); साइटोस्केलेटन प्रोटीन डिस्ट्रॉफिन (Dystrophin) के जीन में उत्परिवर्तन।कंकाल पेशियों का क्रमिक क्षय, पेशी तंतुओं का विघटन एवं वसा में रूपांतरण, बाल्यावस्था में ही चलने की क्षमता खोना तथा श्वसन विफलता से मृत्यु।
अपतानिका (Tetany)रुधिर में आयनिक कैल्शियम का असामान्य रूप से गिरना (Hypocalcemia); पैराथाइरॉइड हार्मोन की कमी अथवा एल्कालोसिस।तंत्रिका-पेशी की अत्यधिक अति-उत्तेजनशीलता; हाथ व पैरों की उंगलियों में ऐच्छिक दर्दनाक ऐंठन (Carpopedal spasm), लैरिंजियल स्पाज्म।
ऑस्टियोअर्थराइटिस (Osteoarthritis)आयु-संबंधी घिसावट विकार (Wear-and-tear); संधियों की हाइलाइन आर्टिकुलर उपास्थि का क्रमिक क्षरण एवं नष्ट होना।संधि में तीव्र दर्द, जकड़न, संचलन पर आवाज (Crepitus), अस्थि कंटक (Osteophytes) बनना; घुटनों व कूल्हों में अत्यधिक सामान्य।
आमवातीय संधिशोथ (Rheumatoid Arthritis)दीर्घकालिक स्वप्रतिरक्षी रोग; रूमेटाइड फैक्टर (IgM एंटीबॉडी) साइनोवियल झिल्ली को नष्ट करते हैं।संधियों की साइनोवियल झिल्ली में गंभीर सूजन, संक्षारक कणिका ऊतक (Pannus) बनना, उपास्थि विनाश तथा अस्थियों के संलयन से अंगों का टेढ़ा होना।
गाउट / वातरक्त (Gout)प्यूरीन उपापचय का विकार; रुधिर में यूरिक अम्ल का स्तर बढ़ना (>७ mg/dL) (Hyperuricemia)।साइनोवियल तरल में सुई जैसे मोनोसोडियम यूरेट क्रिस्टल का जमा होना; संधियों में अचानक असहनीय दर्द, सूजन व लालिमा (विशेषकर पैर के अंगूठे में - Podagra)।
ऑस्टियोपोरोसिस / अस्थिसुषिरता (Osteoporosis)आयु-संबंधी अस्थि उपापचय विकार जिसमें अस्थि निर्माण की तुलना में अस्थि अवशोषण (विघटन) अधिक होता है।अस्थि खनिज घनत्व (BMD) में अत्यधिक कमी, अस्थियां छिद्रित व भंगुर होना; मामूली झटके से कशेरुकाओं व फीमर की ग्रीवा का टूटना। रजोनिवृत्ति पश्चात महिलाओं में एस्ट्रोजन की कमी से अत्यंत सामान्य।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

सार्कोमियर संकुचन का ज्यामितीय नियम
$$L_{A-band} = स्थिरांक = १.६\ $$
विश्राम में सार्कोमियर की लंबाई ~२.५ माइक्रोमीटर होती है; अधिकतम संकुचन में H-क्षेत्र शून्य हो जाता है और लंबाई ~१.८ माइक्रोमीटर रह जाती है।
वयस्क मानव कशेरुक सूत्र
$$C_7\ T_{12}\ L_5\ S_1\ Co_1 = २६$$
शिशु में अस्थि संलयन से पूर्व कुल ३३ कशेरुकाएं होती हैं (५ पृथक त्रिक व ४ अनुत्रिक)।
वक्षीय पसली आव्यूह
$$७ जोड़ी वास्तविक + ३ जोड़ी अवास्तविक + २ जोड़ी प्लावी = १२ जोड़ी = २४ पसलियां$$
जोड़ी १–७ सीधे स्टर्नम से जुड़ती हैं; जोड़ी ८–१० सातवीं पसली की उपास्थि से जुड़ती हैं; जोड़ी ११–१२ आगे से स्वतंत्र होती हैं।
हस्त एवं पाद अंगुलास्थि सूत्र
$$१४ फैलैंजेस × ४ पाद = ५६ फैलैंजेस कुल$$
अंगूठे में केवल समीपस्थ व दूरस्थ फैलैंजेस होती हैं; अन्य अंगुलियों में समीपस्थ, मध्य व दूरस्थ होती हैं।
मानव कंकाल तंत्र का कुल अस्थि संतुलन
$$८० (अक्षीय) + १२६ (उपांगीय) = २०६ अस्थियां$$
अक्षीय: खोपड़ी २२ + हायॉइड १ + कर्णस्थियां ६ + कशेरुक दंड २६ + स्टर्नम १ + पसलियां २४ = ८०। उपांगीय: अंस मेखला ४ + अग्रपाद ६० + श्रोणि मेखला २ + पश्चपाद ६० = १२६।
क्रॉस-ब्रिज यांत्रिक कार्य समीकरण
$$d_{step} ≈ १० nm प्रति पावर स्ट्रोक$$
कंकाल पेशी में ATP जल-अपघटन की ऊर्जा लगभग ४०-५०% दक्षता के साथ यांत्रिक कार्य में परिवर्तित होती है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
(क) विसर्पी तंतु सिद्धांत के अनुसार कंकाल पेशी के पूर्ण संकुचन के समय सार्कोमियर में होने वाले संरचनात्मक परिवर्तनों का वर्णन कीजिए। (ख) पेशी संकुचन के समय A-बैंड की लंबाई क्यों स्थिर रहती है जबकि I-बैंड तथा H-क्षेत्र छोटे हो जाते हैं? [३ + २ = ५ अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) संकुचन के दौरान सार्कोमियर में परिवर्तन: [३ अंक]
सन् १९५४ में हक्सले एवं हैनसन के विसर्पी तंतु सिद्धांत के अनुसार संकुचन के समय निम्नलिखित घटनाएं होती हैं:
१. एक्टिन तंतुओं का अंतर्मुखी विसर्पण: उत्तेजित मायोसिन क्रॉस-ब्रिज शीर्ष एक्टिन से जुड़कर ४५ डिग्री कोण पर मुड़ते हैं (पावर स्ट्रोक), जिससे पतले एक्टिन तंतु मायोसिन के ऊपर M-रेखा की ओर भीतर खींच लिए जाते हैं।
२. सार्कोमियर का छोटा होना: एक्टिन तंतु Z-रेखा से दृढ़ता से जुड़े होने के कारण दोनों Z-रेखाएं एक-दूसरे के निकट आ जाती हैं। फलस्वरूप सार्कोमियर की लंबाई ~२.५ μm से घटकर ~१.८ μm रह जाती है।
३. I-बैंड का संकुचन: केवल एक्टिन युक्त समदैशिक I-बैंड संकुचित होकर छोटा हो जाता है क्योंकि एक्टिन तंतु A-बैंड के भीतर गहराई तक प्रवेश कर जाते हैं।
४. H-क्षेत्र का विलोपन: मायोसिन युक्त केंद्रीय H-क्षेत्र दोनों ओर से एक्टिन तंतुओं के परस्पर अतिव्यापन के कारण संकुचित होता हुआ पूर्ण संकुचन पर पूर्णतः लुप्त हो जाता है।

(ख) A-बैंड की लंबाई स्थिर रहने का कारण: [२ अंक]
१. A-बैंड पूर्णतः मोटे मायोसिन तंतुओं की वास्तविक भौतिक लंबाई (~१.६ μm) को निरूपित करता है।
२. पेशी संकुचन के दौरान किसी भी प्रोटीन तंतु की अपनी लंबाई में कोई सिकुड़न, तह या परिवर्तन नहीं होता; यह केवल तंतुओं का परस्पर फिसलना मात्र है।
३. चूंकि मायोसिन तंतुओं की लंबाई अपरिवर्तित रहती है, इसलिए विश्राम अथवा पूर्ण संकुचन—दोनों अवस्थाओं में A-बैंड की लंबाई सदैव पूर्णतः स्थिर (१.६ μm) रहती है।
उदाहरण 2
(क) पेशी संकुचन के उत्तेजन-संकुचन युग्मन में कैल्शियम आयन (Ca2+) तथा ट्रोपोनिन C की भूमिका समझाइए। (ख) मृत्यु के पश्चात रिगर मोर्टिस उत्पन्न होने एवं उसके बाद समाप्त होने का जैव-रासायनिक कारण स्पष्ट कीजिए। [३ + २ = ५ अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) Ca2+ तथा ट्रोपोनिन C की भूमिका: [३ अंक]
१. कैल्शियम का स्राव: तंत्रिका आवेग T-नलिकाओं में पहुंचते ही सार्कोप्लाज्मिक रेटिकुलम के सिस्टर्नी से प्रचुर मात्रा में Ca2+ सार्कोप्लाज्म में विमुक्त होता है।
२. ट्रोपोनिन C से बंधन: मुक्त Ca2+ पतले एक्टिन तंतु पर स्थित ट्रोपोनिन C (TnC) से उच्च बंधुता के साथ जुड़ जाता है।
३. सक्रिय स्थलों का अनावृत होना: Ca2+-TnC बंधन से ट्रोपोनिन में संरचनात्मक परिवर्तन होता है, जो ट्रोपोमायोसिन को एक्टिन की खांच से खींच लेता है। इससे एक्टिन के मायोसिन-बंधन स्थल अनावृत हो जाते हैं और मायोसिन शीर्ष जुड़कर क्रॉस-ब्रिज बना लेता है।

(ख) रिगर मोर्टिस का कारण एवं समाप्ति: [२ अंक]
१. उत्पत्ति का कारण: मृत्यु के बाद श्वसन रुकने से ATP का निर्माण बंद हो जाता है। ATP न होने से सार्कोप्लाज्मिक रेटिकुलम के Ca2+ पंप कार्य नहीं करते, जिससे कैल्शियम सार्कोप्लाज्म में बना रहता है और मायोसिन शीर्ष एक्टिन से जुड़कर क्रॉस-ब्रिज बना लेते हैं। परंतु क्रॉस-ब्रिज को अलग करने हेतु नए ATP का जुड़ना अनिवार्य है। ATP के अभाव में क्रॉस-ब्रिज टूट नहीं पाते और पेशियां स्थायी रूप से अकड़कर कठोर हो जाती हैं (रिगर मोर्टिस)।
२. समाप्ति: मृत्यु के २४–३६ घंटे बाद लाइसोसोम के पाचक एंजाइम एक्टिन व मायोसिन प्रोटीन का अपघटन कर देते हैं, जिससे रिगर मोर्टिस स्वतः समाप्त हो जाता है।
उदाहरण 3
(क) लाल पेशी तंतुओं (Type I) तथा श्वेत पेशी तंतुओं (Type II) के बीच तीन प्रमुख औतिकीय एवं कार्यिकीय अंतरों की सारणी बनाइए। (ख) मानव शरीर की सोलियस पेशी तथा नेत्रगोलक पेशी में किस प्रकार के तंतुओं की प्रधानता होती है और क्यों? [३ + २ = ५ अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) लाल बनाम श्वेत पेशी तंतु में अंतर: [३ अंक]
लक्षणलाल पेशी तंतु (Type I)श्वेत पेशी तंतु (Type II)
मायोग्लोबिन व रंगमायोग्लोबिन की प्रचुरता; गहरा लाल रंगमायोग्लोबिन अत्यंत कम; पीला-सफेद रंग
माइटोकॉन्ड्रिया व उपापचयअनेक बड़े माइटोकॉन्ड्रिया; वायवीय ऑक्सीडेटिव श्वसनअल्प माइटोकॉन्ड्रिया; अवायवीय ग्लाइकोलिसिस प्रधान
संकुचन गति व थकानधीमा संकुचन; थकान-प्रतिरोधी (बिना थके दीर्घ कार्य)अति तीव्र संकुचन; लैक्टिक अम्ल बनने से शीघ्र थकान

(ख) विशिष्ट पेशियों में वितरण एवं औचित्य: [२ अंक]
१. सोलियस पेशी (पिंडली की संतुलन पेशी): इसमें लाल पेशी तंतुओं (Type I) की प्रधानता होती है। औचित्य: गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध शरीर को घंटों सीधा रखने हेतु निरंतर, धीमी और थकान-रहित संकुचन की आवश्यकता होती है, जो लाल तंतु प्रदान करते हैं।
२. नेत्रगोलक पेशियां (Extraocular Muscles): इनमें श्वेत पेशी तंतुओं (Type II) की प्रधानता होती है। औचित्य: दृष्टि को तुरंत एक बिंदु से दूसरे बिंदु पर केंद्रित करने हेतु मिली-सेकंड में अत्यधिक तीव्र गति की आवश्यकता होती है, जो तीव्र-संकुचनशील श्वेत तंतु उत्पन्न करते हैं।
उदाहरण 4
(क) मानव शरीर की १२ जोड़ी पसलियों को तीन वर्गों में विभाजित कीजिए तथा स्टर्नम से उनके जुड़ाव का वर्णन कीजिए। (ख) मानव अक्षीय कंकाल किन अस्थियों से मिलकर बना है तथा वयस्क कशेरुक सूत्र लिखिए। [३ + २ = ५ अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) पसलियों का वर्गीकरण एवं जुड़ाव: [३ अंक]
मानव की १२ जोड़ी (कुल २४) पसलियों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है:
१. वास्तविक पसलियां (True Ribs - १ली से ७वीं जोड़ी): ये पृष्ठ भाग में वक्षीय कशेरुकाओं से तथा अग्र भाग में अपनी हाइलाइन उपास्थि द्वारा सीधे स्टर्नम से जुड़ी होती हैं।
२. अवास्तविक पसलियां (False Ribs - ८वीं, ९वीं व १०वीं जोड़ी): ये स्टर्नम से सीधे नहीं जुड़तीं; इनकी उपास्थियां सातवीं पसली की उपास्थि से जुड़कर सब-कोस्टल आर्क बनाती हैं।
३. प्लावी पसलियां (Floating Ribs - ११वीं व १२वीं जोड़ी): ये पृष्ठ भाग में कशेरुका से जुड़ी होती हैं परंतु आगे किसी अस्थि से नहीं जुड़तीं और उदर भित्ति की पेशियों में स्वतंत्र रहती हैं।

(ख) अक्षीय कंकाल के घटक एवं कशेरुक सूत्र: [२ अंक]
१. अक्षीय कंकाल केंद्रीय अक्ष की कुल ८० अस्थियों से बना है: खोपड़ी (२२: कपाल ८ + चेहरा १४), हायॉइड (१), कर्णस्थियां (६), कशेरुक दंड (२६), स्टर्नम (१) तथा पसलियां (२४)।
२. वयस्क मानव कशेरुक सूत्र:
$$\text{C}_7\ \text{T}_{12}\ \text{L}_5\ \text{S}_1\ \text{Co}_1 = २६$$
(जहाँ C = ग्रीवा ७, T = वक्षीय १२, L = कटि ५, S = त्रिक १ [५ संलयित], Co = अनुत्रिक १ [४ संलयित])।
उदाहरण 5
(क) साइनोवियल संधि की संरचना के चार प्रमुख लक्षण लिखिए। (ख) कंदुक-खल्लिका संधि तथा धुराग्र संधि का एक-एक उदाहरण दीजिए एवं उनकी गतिशीलता समझाइए। [३ + २ = ५ अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) साइनोवियल संधि के प्रमुख लक्षण: [३ अंक]
१. आर्टिकुलर उपास्थि: जुड़ने वाली अस्थियों के सिरे चिकनी एवं लचीली हाइलाइन उपास्थि से ढके रहते हैं जो घर्षण को कम करती है।
२. साइनोवियल गुहा: दोनों अस्थियों के बीच एक तरल से भरी स्पष्ट गुहा उपस्थित होती है।
३. साइनोवियल झिल्ली एवं तरल: आंतरिक भित्ति पर स्थित साइनोवियल झिल्ली चिकना हाइलूरोनिक अम्ल युक्त साइनोवियल तरल स्रावित करती है जो जोड़ को चिकनाई व उपास्थि को पोषण प्रदान करता है।
४. कैप्सूल एवं स्नायु (Ligaments): सघन कोलेजन का आर्टिकुलर कैप्सूल तथा मजबूत स्नायु अस्थियों को यथास्थान बांधे रखते हैं।

(ख) संधि उदाहरण एवं गतिशीलता: [२ अंक]
१. कंदुक-खल्लिका संधि: उदाहरण—कंधे का जोड़ (स्कैपुला की ग्लेनॉइड गुहा में ह्यूमरस का सिर) अथवा कूल्हे का जोड़ (एसिटाबुलम में फीमर का सिर)। गतिशीलता: यह सर्वाधिक गतिशील जोड़ है जो सभी तलों में (आकुंचन, प्रसार, घूर्णन, चक्रीय गति) स्वतंत्र संचलन देता है।
२. धुराग्र संधि: उदाहरण—प्रथम कशेरुका एटलस (C1) तथा द्वितीय कशेरुका एक्सिस (C2) के डेन्स के बीच का जोड़। गतिशीलता: यह अनुदैर्ध्य अक्ष पर घूर्णन कराता है, जिससे सिर का दायें-बायें घूमना ('नहीं' सूचक गति) संभव होता है।
उदाहरण 6
(क) मायस्थेनिया ग्रेविस तथा मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के बीच दो आधारभूत अंतर स्पष्ट कीजिए। (ख) गाउट तथा ऑस्टियोपोरोसिस के कारण एवं प्रमुख लक्षण लिखिए। [२.५ + २.५ = ५ अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) मायस्थेनिया ग्रेविस बनाम मस्कुलर डिस्ट्रॉफी: [२.५ अंक]
लक्षणमायस्थेनिया ग्रेविस (Myasthenia Gravis)मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (Muscular Dystrophy)
प्रकृतिस्वप्रतिरक्षी विकार; एंटीबॉडी तंत्रिका-पेशी संधि के AChR को नष्ट करती हैंआनुवंशिक विकार (X-सहलग्न अप्रभावी); डिस्ट्रॉफिन जीन उत्परिवर्तन से होता है
पेशी विकृतिपेशी तंतु नष्ट नहीं होते; ग्राही अवरुद्ध होने से दुर्बलता व पक्षाघात होता हैपेशी तंतुओं का क्रमिक अपघटन व विनाश होता है और पेशी वसा में बदल जाती है

(ख) गाउट एवं ऑस्टियोपोरोसिस के कारण व लक्षण: [२.५ अंक]
१. गाउट (वातरक्त):
• कारण: प्यूरीन उपापचय विकार से रुधिर में यूरिक अम्ल का स्तर बढ़ना (Hyperuricemia)।
• लक्षण: साइनोवियल संधियों में सुई जैसे मोनोसोडियम यूरेट क्रिस्टल का जमाव; जोड़ों में असहनीय दर्द, सूजन व लालिमा (विशेषकर पैर के अंगूठे में)।
२. ऑस्टियोपोरोसिस (अस्थिसुषिरता):
• कारण: अस्थि क्षरण करने वाले ऑस्टियोक्लास्ट की अत्यधिक सक्रियता तथा महिलाओं में रजोनिवृत्ति पश्चात एस्ट्रोजन की कमी अथवा कैल्शियम की कमी।
• लक्षण: अस्थि खनिज घनत्व का घटना, अस्थियों का भुरभुरा व छिद्रित होना तथा मामूली झटके से कशेरुकाओं व फीमर की ग्रीवा का टूटना।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि पेशी संकुचन के दौरान A-बैंड छोटा हो जाता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

A-बैंड मोटे मायोसिन तंतुओं की वास्तविक भौतिक लंबाई (१.६ माइक्रोमीटर) है। संकुचन के समय तंतुओं की लंबाई नहीं बदलती, केवल एक्टिन तंतु फिसलते हैं। अतः A-बैंड सदैव स्थिर रहता है; केवल I-बैंड तथा H-क्षेत्र छोटे होते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि ATP की आवश्यकता केवल संकुचन के पावर स्ट्रोक के लिए होती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पेशी विश्रांति के लिए भी ATP अनिवार्य है। मायोसिन शीर्ष से नया ATP जुड़े बिना क्रॉस-ब्रिज एक्टिन से अलग नहीं हो सकता। इसी कारण मृत्यु के बाद ATP की कमी से रिगर मोर्टिस हो जाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

एटलस (C1) तथा एक्सिस (C2) कशेरुकाओं के कार्य एवं गति में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

एटलस खोपड़ी के ऑक्सीपिटल कोंडाइल से जुड़कर सिर की 'हाँ' सूचक ऊपर-नीचे गति कराता है। जबकि एक्सिस के डेन्स प्रवर्ध के चारों ओर एटलस घूमकर सिर की 'नहीं' सूचक दायें-बायें धुराग्र गति कराता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मानव शरीर में पसलियों की कुल संख्या व उनके वर्गीकरण में त्रुटि करना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मानव में १२ पसलियां नहीं, बल्कि १२ जोड़ी यानी कुल २४ पसलियां होती हैं। जोड़ी १–७ वास्तविक (True), जोड़ी ८–१० अवास्तविक (False), तथा जोड़ी ११–१२ प्लावी (Floating) पसलियां हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गाउट (वातरक्त) और ऑस्टियोअर्थराइटिस को एक ही प्रक्रिया मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ऑस्टियोअर्थराइटिस आयु-संबंधी उपास्थि की घिसावट का रोग है। जबकि गाउट एक उपापचयी रोग है जिसमें रुधिर में यूरिक अम्ल बढ़ने से संधियों में तीक्ष्ण यूरेट क्रिस्टल जमा हो जाते हैं।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

18 गमन एवं संचलन: सार्कोमियर, विसर्पी तंतु सिद्धांत एवं कंकाल तंत्र WBCHSE कक्षा 11 जीव विज्ञान • इकाई 5: मानव कार्यिकी • क्रॉस-सेतु गतिकी, 206 अस्थियां एवं संधियां 1. पेशी प्रकार एवं सार्कोमियर पेशी ऊतकों का औतिकीय वर्गीकरण • कंकाल पेशी: रेखित, ऐच्छिक, बहुकेंद्रकी (प्रद्रव्यलयी / Syncytial) अस्थियों से जुड़ी; तीव्र संकुचन, शीघ्र थकान-प्रवण • चिकनी (अरेखित) पेशी: रेखितहीन, अनैच्छिक, तर्कुरूपी आंत्र, रक्त वाहिकाओं में; मंद, लयबद्ध, थकान-रहित • हृद पेशी: रेखित, अनैच्छिक, शाखित, अंतर्विष्ट डिस्क युक्त सार्कोमियर (Z-रेखा से Z-रेखा) • पेशी तंतुक की संरचनात्मक एवं संकुचनशील कार्यात्मक इकाई • A-बैंड (गहरा / विषमदैशिक): मायोसिन + अतिव्यापी एक्टिन तंतु • I-बैंड (हल्का / समदैशिक): केवल एक्टिन; मध्य में Z-रेखा स्थित • H-क्षेत्र: A-बैंड का मध्य भाग जहां केवल मोटे मायोसिन होते हैं M-रेखा: H-क्षेत्र के मध्य से गुजरने वाली महीन रेशेदार झिल्ली पतला (एक्टिन) एवं मोटा (मायोसिन) तंतु • एक्टिन तंतु: F-एक्टिन का दोहरा हेलिक्स (G-एक्टिन बहुलक) • ट्रोपोमायोसिन: मायोसिन सक्रिय स्थलों को ढकने वाले दो रेशे • ट्रोपोनिन संकुल: TnT (ट्रोपोमायोसिन), TnI (अवरोधक), एवं TnC (Ca²⁺ बांधकर स्थलों को अनावृत करता है) • मायोसिन तंतु: मेरोमायोसिन (HMM शीर्ष व LMM पुच्छ) लाल पेशी तंतु बनाम श्वेत पेशी तंतु • लाल तंतु: उच्च मायोग्लोबिन, माइटोकॉन्ड्रिया, ऑक्सी, थकान-मुक्त • श्वेत तंतु: कम मायोग्लोबिन, प्रचुर SR, तीव्र ग्लाइकोलिसिस लैक्टिक अम्ल संचय के कारण श्वेत तंतु शीघ्र थक जाते हैं 2. विसर्पी तंतु एवं पेशी संकुचन 1. उत्तेजन-संकुचन युग्मन (Coupling) • प्रेरक तंत्रिका का क्रिया विभव तंत्रिका-पेशी संधि पर पहुंचता है • ऐसीटिलकोलीन (ACh) स्रावित होकर सार्कोलेमा को विध्रुवित करता है • क्रिया विभव T-नलिकाओं द्वारा सार्कोप्लाज्मिक जालिका में पहुंचता है → सिस्टर्नी से सार्कोप्लाज्म में प्रचुर Ca²⁺ मुक्त होता है • Ca²⁺ जुड़ता है TnC से → ट्रोपोमायोसिन सक्रिय स्थलों से हटता है एक्टिन के मायोसिन-बंधन सक्रिय स्थल अनावृत हो जाते हैं 2. क्रॉस-सेतु चक्र (शक्ति आघात) 1. बंधन: सक्रिय मायोसिन शीर्ष (ADP+Pi) एक्टिन से जुड़ता है 2. शक्ति आघात: Pi मुक्त; शीर्ष 45° झुककर एक्टिन तंतु को M-रेखा की दिशा में भीतर खींचता है → I-बैंड घटता है, H-क्षेत्र लुप्त होता है, A-बैंड स्थिर रहता है! 3. पृथक्करण: नया ATP जुड़ते ही क्रॉस-सेतु टूट जाता है 4. पुनःतनाव: मायोसिन ATPase द्वारा ATP → ADP+Pi में टूटता है, शीर्ष पुनः 90° उच्च-ऊर्जा अवस्था में लौट आता है • राइगर मॉर्टिस: मृत्यु के पश्चात ATP अभाव में सेतु जुड़े रहते हैं विश्राम: SERCA पंप Ca²⁺ को वापस जालिका में खींच लेता है संकुचन के समय सार्कोमियर का व्यवहार • Z-रेखाएं पास आती हैं (सार्कोमियर की लंबाई घटती है) • I-बैंड: क्रमशः छोटा हो जाता है • H-क्षेत्र: संकुचित होकर पूर्णतः लुप्त हो जाता है • A-बैंड: संकुचन के दौरान लंबाई अपरिवर्तित रहती है! तंतु अपनी लंबाई बदले बिना एक-दूसरे के ऊपर फिसलते हैं 3. कंकाल तंत्र (206), संधियां व विकार मानव कंकाल: अक्षीय (80) एवं उपांगीय (126) • अक्षीय (80): करोटी (22: 8 कपालीय + 14 आननी) + हायॉइड (1) + कर्णास्थियां (6) + मेरुदंड (26: C7, T12, L5, S1, Co1) + उरोस्थि (1) + पसलियां (24: 7 वास्तविक, 3 कूट, 2 प्लावी) • उपांगीय (126): अंस मेखला (4: जत्रुक व अंशफलक) अग्र पाद (60: प्रगंडिका, बहिःप्रकोष्ठिका, अंतःप्रकोष्ठिका, 8 मणिबंध, 5 करभ, 14 अंगुलास्थियां) श्रोणि मेखला (2 नितंबास्थि) + पश्च पाद (60: ऊर्वस्थि, जानुक, टिबिया, फिबुला, 7 गुल्फ, 5 प्रपद, 14 अंगुलास्थियां) साइनोवियल संधियों का वर्गीकरण • कंदुक-खल्लिका: कंधा संधि (ग्लीनॉइड) व कूल्हा संधि (एसिटाबुलम) • कब्जा संधि (Hinge): घुटना संधि, कोहनी संधि, अंगुलियों की संधियां • धुराग्र संधि (Pivot): एटलस व एक्सिस (सिर घुमाने की संधि) • विसर्पी संधि (Gliding): कलाई की मणिबंध अस्थियों के मध्य • काठी (सैडल) संधि: अंगूठे की मणिबंध व करभास्थि के मध्य विशेषताएं: साइनोवियल द्रव, काचाभ उपास्थि एवं संपुट पेशी एवं कंकाल तंत्र के विकार • मायस्थेनिया ग्रेविस: स्वप्रतिरक्षा रोग; ACh ग्राही अवरुद्ध; कंकाल पेशियों की प्रगतिशील कमजोरी एवं पक्षाघात • पेशीय दुष्पोषण: आनुवंशिक प्रोटीन (डिस्ट्रोफिन) दोष से क्षय • टिटैनी: देह तरल में Ca²⁺ की कमी से पेशियों में तीव्र ऐंठन • गठिया (गाउट): संधियों में यूरिक अम्ल क्रिस्टलों का संचय • अस्थिसुषिरता (ऑस्टियोपोरोसिस): अस्थि घनत्व में भारी कमी; रजोनिवृत्ति के बाद एस्ट्रोजन कमी से महिलाओं में अस्थिभंग का खतरा

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
कोशिकीय संचलन अमीबीय (श्वेताणु), पक्ष्माभी (श्वसन मार्ग, डिंबवाहिनी), कशाभी (शुक्राणु) एवं पेशीय विधियों से होता है। गमन संपूर्ण जीव का ऐच्छिक विस्थापन है।
मुख्य बिंदु 2
पेशियां तीन प्रकार की होती हैं: कंकाल पेशी (रेखित, ऐच्छिक, बहुकेंद्रकी), चिकनी पेशी (अरेखित, अनैच्छिक, तर्कुरूपी), तथा हृद पेशी (रेखित, अनैच्छिक, अंतर्विष्ट डिस्क युक्त)।
मुख्य बिंदु 3
सार्कोमियर दो क्रमागत Z-रेखाओं के बीच की संकुचनशील इकाई है; इसमें गहरा A-बैंड (मायोसिन + एक्टिन), मध्यवर्ती H-क्षेत्र, M-रेखा तथा हल्का I-बैंड होता है।
मुख्य बिंदु 4
पतले तंतु में F-एक्टिन, ट्रोपोमायोसिन व ट्रोपोनिन ट्राइमर (TnT, TnI, TnC) होते हैं; मोटे तंतु में मायोसिन का HMM शीर्ष (ATP-पाचक) व LMM पुच्छ होता है।
मुख्य बिंदु 5
विसर्पी तंतु सिद्धांत के अनुसार एक्टिन तंतु मायोसिन पर M-रेखा की ओर फिसलते हैं; सार्कोमियर, I-बैंड व H-क्षेत्र छोटे होते हैं, किंतु A-बैंड सदैव १.६ माइक्रोमीटर स्थिर रहता है।
मुख्य बिंदु 6
उत्तेजन-संकुचन युग्मन: तंत्रिका आवेग -> एसिटिलकोलीन स्राव -> T-नलिका विध्रुवण -> सार्कोप्लाज्मिक रेटिकुलम से Ca2+ विमुक्ति -> TnC से Ca2+ बंधन -> ट्रोपोमायोसिन हटना -> क्रॉस-ब्रिज चक्र।
मुख्य बिंदु 7
पावर स्ट्रोक, क्रॉस-ब्रिज पृथक्करण तथा Ca2+ पंप करने हेतु ATP अनिवार्य है; मृत्यु के बाद ATP समाप्त होने पर रिगर मोर्टिस होता है।
मुख्य बिंदु 8
लाल पेशी तंतु (Type I) मायोग्लोबिन व माइटोकॉन्ड्रिया से समृद्ध होकर वायवीय श्वसन से थकान-रहित रहते हैं; श्वेत तंतु (Type II) अवायवीय ग्लाइकोलिसिस से शीघ्र थक जाते हैं।
मुख्य बिंदु 9
वयस्क मानव कंकाल में २०६ अस्थियां हैं: अक्षीय (८०: खोपड़ी २२, हायॉइड १, कर्णस्थियां ६, कशेरुक दंड २६, स्टर्नम १, पसलियां २४) तथा उपांगीय (१२६: मेखलाएं व पाद)।
मुख्य बिंदु 10
साइनोवियल संधियां मुक्त संचलन देती हैं (कंदुक-खल्लिका, कोर, धुराग्र, काठी)। प्रमुख विकार: मायस्थेनिया ग्रेविस, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, टिटैनी, गाउट एवं ऑस्टियोपोरोसिस।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
पतले (एक्टिन) तथा मोटे (मायोसिन) मायोफिलामेंट्स के विशिष्ट आण्विक घटकों के नाम लिखिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पतला तंतु दो कुंडलित F-एक्टिन बहुलकों, दो ट्रोपोमायोसिन रज्जुओं तथा तीन उप-इकाइयों वाले ट्रोपोनिन ट्राइमर (TnT, TnI, TnC) से बना होता है। मोटा तंतु बहुलकीकृत मेरोमायोसिन से बना होता है, जिसमें भारी मेरोमायोसिन (HMM) शीर्ष (एक्टिन-बंधन स्थल व एटीपेज़ उत्प्रेरक स्थल युक्त) तथा हल्का मेरोमायोसिन (LMM) पुच्छ होता है।
2
पेशी संकुचन के दौरान सार्कोमियर का कौन सा पट्ट अथवा क्षेत्र पूर्णतः अपरिवर्तित रहता है और क्यों?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A-बैंड की लंबाई पूर्णतः अपरिवर्तित (~१.६ माइक्रोमीटर) रहती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि A-बैंड मोटे मायोसिन तंतुओं की वास्तविक भौतिक लंबाई को दर्शाता है और विसर्पी तंतु सिद्धांत के अनुसार संकुचन में तंतु छोटे नहीं होते, केवल एक्टिन तंतु मायोसिन के ऊपर फिसलते हैं।
3
पेशी विश्रांति के लिए ताज़ा ATP जुड़ना क्यों आवश्यक है और इसके अभाव में रिगर मोर्टिस कैसे होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मायोसिन शीर्ष से एक नया ATP अणु जुड़ने पर ही एक्टिन के प्रति मायोसिन का आकर्षण घटता है और क्रॉस-ब्रिज अलग होता है। मृत्यु के बाद ATP पूर्णतः समाप्त हो जाने पर क्रॉस-ब्रिज अलग नहीं हो पाते, जिससे एक्टिन और मायोसिन स्थायी रूप से जुड़कर कठोर रिगर मोर्टिस स्थिति उत्पन्न करते हैं।
4
अग्र भाग में स्टर्नम से जुड़ाव के आधार पर वास्तविक पसलियों, अवास्तविक पसलियों एवं प्लावी पसलियों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: वास्तविक पसलियां (जोड़ी १–७) सीधे अपनी उपास्थि द्वारा स्टर्नम से जुड़ती हैं। अवास्तविक पसलियां (जोड़ी ८–१०) स्टर्नम से सीधे न जुड़कर ७वीं पसली की उपास्थि से जुड़ती हैं। प्लावी पसलियां (जोड़ी ११–१२) आगे किसी अस्थि से नहीं जुड़तीं और स्वतंत्र रहती हैं।
5
काठी (सैडल) संधि तथा धुराग्र (पिवट) संधि की यांत्रिक संरचना समझाइए तथा मानव शरीर का एक-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: काठी संधि की सतहें अवतल-उत्तल काठी जैसी होती हैं और द्विअक्षीय गति देती हैं (जैसे: अंगूठे के ट्रेपेजियम कार्पल व प्रथम मेटाकार्पल के बीच की संधि)। धुराग्र संधि में एक अस्थि का प्रवर्ध दूसरी अस्थि के छल्ले में अनुदैर्ध्य अक्ष पर घूमता है (जैसे: एटलस व एक्सिस के डेन्स के बीच की संधि जो सिर की 'नहीं' सूचक गति कराती है)।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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कक्षा 11 Biology के सभी अध्याय

अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

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