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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 8
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

कोशिका: जीवन की इकाई

कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय सभी सजीव प्राणियों के मूलभूत कोशिकीय आधार का संपूर्ण वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत करता है। इस अध्याय में रॉबर्ट हुक और एंटोनी वॉन ल्यूवेनहॉक की खोजों से लेकर श्लाइडेन, श्वान और रुडोल्फ विरचो के कोशिका सिद्धांत (ओमनिस सेल्युला-ए सेल्युला) का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक कोशिकाओं के संरचनात्मक अंतर, प्रोकैरियोट के त्रिस्तरीय आवरण, मीसोसोम, नग्न वृत्ताकार डीएनए तथा 70S राइबोसोम की व्याख्या की गई है। यूकैरियोटिक कोशिका के अंतर्गत सिंगर एवं निकोलसन का तरल मोज़ेक मॉडल, सक्रिय व निष्क्रिय झिल्ली परिवहन, पादप कोशिका भित्ति एवं मध्य पटलिका का विवेचन है। साथ ही अंतःप्रद्रव्यी जालिका, गॉल्जी उपकरण, लाइसोसोम व रसधानी युक्त अंतःझिल्लिका तंत्र, अर्ध-स्वायत्त अंगक के रूप में माइटोकॉन्ड्रिया व हरितलवक की परासंरचना, 80S राइबोसोम, कोशिकीय कंकाल, सीलिया व फ्लैजिला का 9+2 अक्षसूत्र, तारककेंद्र का 9+0 बैलगाड़ी पहिया विन्यास तथा केंद्रक, न्यूक्लियोसोम एवं गुणसूत्रों का आकारिकीय वर्गीकरण सम्मिलित है।

क्या आपने कभी सोचा है?

हमारे शरीर की प्रत्येक सूक्ष्म कोशिका एक अविश्वसनीय स्वचालित नैनो-महानगर की भांति कार्य करती है: जहां स्वचालित प्रोटीन निर्माण लाइनें हैं, प्रोटॉन पंपों द्वारा विद्युत प्रवणता उत्पन्न करने वाले जैविक विद्युत संयंत्र हैं, पते के अनुसार छंटाई करने वाला रासायनिक डाकघर है और अपशिष्ट पदार्थों को पचाकर पुनर्चक्रित करने वाले रीसाइक्लिंग कक्ष हैं। ये निर्जीव बृहदणु आपस में मिलकर जीवन की सजीव अवस्था का निर्माण कैसे करते हैं?

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

कोशिका जीवविज्ञान आधुनिक आणविक जीवविज्ञान, आनुवंशिकी, ऑन्कोलॉजी तथा औषध विज्ञान का आधार स्तंभ है। कैंसर जैसी घातक बीमारियां अनियंत्रित कोशिका विभाजन और सिग्नलिंग त्रुटियों से उत्पन्न होती हैं, जबकि लाइसोसोम के एंजाइमों में खराबी से टे-सैक्स और गौशर जैसे गंभीर संचयन रोग होते हैं। माइटोकॉन्ड्रियल आनुवंशिकी मातृ-वंशानुगत उपापचयी विकारों को समझने में सहायक है। प्लाज्मा झिल्ली का सोडियम-पोटैशियम पंप तंत्रिका आवेग संचरण तथा आधुनिक नैनोमेडिसिन में लक्षित दवा वितरण (Targeted Drug Delivery) का मुख्य आधार है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • जैव अणु: लिपिड, फॉस्फोलिपिड, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट एवं न्यूक्लिक अम्ल (DNA व RNA) की मूलभूत रासायनिक संरचना
  • जीव जगत का वर्गीकरण: मोनेरा (प्रोकैरियोट) और प्रोटिस्टा, कवक, पादप व जंतु (यूकैरियोट) के प्रमुख अंतर
  • भौतिकी के मूल सिद्धांत: सांद्रता प्रवणता, विसरण, परासरण एवं एटीपी जलअपघटन की आधारभूत समझ

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 कोशिका सिद्धांत, प्रोकैरियोटिक कोशि...
2 प्लाज्मा झिल्ली (तरल मोज़ेक मॉडल),...
3 अंतःझिल्लिका तंत्र: ER, गॉल्जी उपकर...
4 अर्ध-स्वायत्त ऊर्जा रूपांतरक अंगक:...
5 राइबोसोम, कोशिकीय कंकाल, पक्ष्माभ,...
6 केंद्रक, क्रोमैटिन, गुणसूत्र आकारिक...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

कोशिका सिद्धांत, प्रोकैरियोटिक कोशिका की संरचना एवं कोशिकीय विविधता

1. कोशिका विज्ञान के ऐतिहासिक मील के पत्थर एवं कोशिका सिद्धांत

कोशिका सभी सजीव प्राणियों की आधारभूत संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है। कोशिका विज्ञान के प्रमुख ऐतिहासिक मील के पत्थर:

  • रॉबर्ट हुक (1665): कॉर्क की पतली काट में मधुमक्खी के छत्ते जैसे खाली प्रकोष्ठ देखे जिन्हें उन्होंने 'कोशिका' (Cell) नाम दिया (यह वास्तव में मृत कोशिका भित्तियां थीं)।
  • एंटोनी वॉन ल्यूवेनहॉक (1674): अपने उन्नत एकल लेंस सूक्ष्मदर्शी द्वारा सर्वप्रथम जीवित गतिशील कोशिकाओं (जीवाणु, प्रोटोजोआ, शुक्राणु व लाल रक्त कणिकाएं) का अवलोकन किया।
  • रॉबर्ट ब्राउन (1831): आर्किड की जड़ की कोशिकाओं में सर्वप्रथम सुस्पष्ट केंद्रक (Nucleus) की खोज की।
  • मैथियास श्लाइडेन (1838) एवं थियोडोर श्वान (1839): श्लाइडेन (जर्मन वनस्पतिशास्त्री) ने पाया कि सभी पादप कोशिकाओं से बने हैं। श्वान (जर्मन प्राणीशास्त्री) ने पाया कि जंतु कोशिकाएं एक पतली बाहरी परत (प्लाज्मा झिल्ली) से घिरी होती हैं और कोशिका भित्ति पादपों का अनूठा लक्षण है। दोनों ने मिलकर क्लासिकल कोशिका सिद्धांत (Cell Theory) दिया।
  • रुडोल्फ विरचो (1855): लैटिन सूत्र 'Omnis cellula-e cellula' (सभी नई कोशिकाएं केवल पूर्व-विद्यमान जीवित कोशिकाओं के विभाजन से उत्पन्न होती हैं) जोड़कर आधुनिक कोशिका सिद्धांत को पूर्ण किया।
2. आधुनिक कोशिका सिद्धांत एवं इसके अपवाद

आधुनिक कोशिका सिद्धांत के मूलभूत नियम: (1) सभी सजीव एक या अनेक कोशिकाओं तथा उनके उत्पादों से बने हैं। (2) कोशिका जीवन की संरचनात्मक, क्रियात्मक एवं उपापचयी इकाई है। (3) सभी कोशिकाएं पूर्ववर्ती सजीव कोशिकाओं के विभाजन से बनती हैं। (4) सभी कोशिकाओं की मूलभूत रासायनिक संरचना एवं उपापचय समान होते हैं।

कोशिका सिद्धांत के अपवाद: वायरस (विषाणु), विरोइड एवं प्रियन अकोशिकीय सत्ताएं हैं जिनमें पोषी कोशिका के बाहर कोई जीवद्रव्य, अंगक या उपापचयी क्रिया नहीं होती। इसके अतिरिक्त संकोशिकीय कवक (*Rhizopus*) और शैवाल (*Vaucheria*) बहुकेंद्रकी जीवद्रव्यी द्रव्यमान होते हैं जिनमें सामान्य कोशिका विभाजन का अभाव होता है।
3. प्रोकैरियोटिक कोशिका की परासंरचना

मोनेरा जगत के जीव (जीवाणु, नील-हरित शैवाल, माइकोप्लाज्मा) प्रोकैरियोटिक होते हैं। इनमें झिल्लीयुक्त अंगक तथा सुगठित केंद्रक नहीं होता:

  • कोशिका आवरण (Cell Envelope): एक सुदृढ़ त्रिस्तरीय सुरक्षात्मक आवरण:
    • ग्लाइकोकैलिक्स: सबसे बाहरी परत; ढीली होने पर अवपंक परत (Slime layer) तथा मोटी व सुदृढ़ होने पर संपुटिका (Capsule) कहलाती है (जो रोगजनक जीवाणुओं को भक्षण से बचाती है)।
    • कोशिका भित्ति: मध्यवर्ती सुदृढ़ परत जो पेप्टिडोग्लाइकन (म्यूरिन) की बनी होती है; यह कोशिका को निश्चित आकार देती है तथा परासरणी फटने से रोकती है।
    • प्लाज्मा झिल्ली: सबसे भीतरी चयनात्मक पारगम्य फॉस्फोलिपिड द्विपरत जो पदार्थों के आवागमन का नियमन करती है।
  • मीसोसोम एवं क्रोमैटोफोर: प्लाज्मा झिल्ली के कोशिकाद्रव्य में पुटिकाओं, नलिकाओं या पटलिकाओं के रूप में अंतर्वलन को मीसोसोम कहते हैं। यह कोशिकीय श्वसन, डीएनए प्रतिकृतियन, स्रावण और कोशिका भित्ति निर्माण में सहायता करता है। प्रकाश-संश्लेषी सायनोजीवाणुओं में वर्णकयुक्त अंतर्वलनों को क्रोमैटोफोर कहते हैं।
  • आनुवंशिक पदार्थ (केंद्रकाभ / Nucleoid): केंद्रक झिल्ली तथा हिस्टोन रहित एकल नग्न वृत्ताकार द्विरज्जुक डीएनए (dsDNA) जिसे केंद्रकाभ या जीनोफोर कहते हैं। इसके अतिरिक्त अनेक जीवाणुओं में मुख्य गुणसूत्र के बाहर छोटे वृत्ताकार स्व-प्रतिकृतिकारी डीएनए होते हैं जिन्हें प्लास्मिड कहते हैं (जैसे एंटीबायोटिक प्रतिरोधी R-प्लास्मिड, संयुग्मन F-प्लास्मिड)।
  • राइबोसोम: झिल्लीविहीन 70S राइबोसोम (50S बड़ी उप-इकाई तथा 30S छोटी उप-इकाई से निर्मित)। एक mRNA पर अनेक राइबोसोम मोतियों की भांति जुड़कर पॉलीसोम या पॉलीराइबोसोम बनाते हैं जो एक साथ प्रोटीन का अनुवाद करते हैं।
  • अंतर्विष्ट पिंड (Inclusion Bodies): संचित खाद्य पदार्थों को संचित रखने वाले झिल्लीरहित कण (जैसे फॉस्फेट कणिकाएं, साइनोफाइसियन कणिकाएं, ग्लाइकोजन कणिकाएं तथा जलीय जीवाणुओं में प्लवनशीलता देने वाली गैस रसधानियां)।
  • उपांग: कशाभ या फ्लैजिला (फ्लैजेलिन प्रोटीन से बने तंतु, अंकुश व आधारी काय युक्त गति अंग), रोम या पिली (पिलिन प्रोटीन की नलिकाएं जो संयुग्मन में भाग लेती हैं) तथा झालर या फिम्ब्री (चट्टानों व पोषी ऊतकों से चिपकने वाले दृढ़ रेशे)।

प्लाज्मा झिल्ली (तरल मोज़ेक मॉडल), झिल्ली परिवहन एवं पादप कोशिका भित्ति

1. सिंगर एवं निकोलसन का तरल मोज़ेक मॉडल (1972)

प्लाज्मा झिल्ली कोशिकाद्रव्य को घेरने वाली एक गतिशील एवं चयनात्मक पारगम्य सीमा है। 1972 में एस. जे. सिंगर एवं जी. एल. निकोलसन द्वारा प्रस्तुत तरल मोज़ेक मॉडल सर्वमान्य है:

  • फॉस्फोलिपिड द्विपरत: झिल्ली का मुख्य कंकाल उभयसंवेदी (amphipathic) फॉस्फोलिपिडों की दोहरी परत से बना होता है:
    • ध्रुवीय जलरागी शीर्ष: ग्लिसरॉल व फॉस्फेट युक्त भाग, जो बाहर और भीतर के जलीय माध्यम की ओर उन्मुख होता है।
    • अध्रुवीय जलविरागी पूंछ: संतृप्त व असंतृप्त वसीय अम्लों की हाइड्रोकार्बन श्रृंखलाएं, जो भीतर की ओर जल के संपर्क से सुरक्षित रहती हैं।
  • अर्ध-तरल अवस्था (Quasi-fluid Nature): सिस-द्विबंध युक्त असंतृप्त वसीय अम्लों के कारण फॉस्फोलिपिड परत चिपचिपी जैल जैसी अर्ध-तरल अवस्था में रहती है। इस तरलता के कारण प्रोटीन और लिपिड झिल्ली के तल में पार्श्व विसरण (Lateral diffusion) करते हैं। यह कोशिका वृद्धि, स्रावण, एंडोसाइटोसिस और कोशिका विभाजन के लिए आवश्यक है।
  • झिल्ली प्रोटीन: निष्कर्षण की सुगमता के आधार पर दो प्रकार की होती हैं:
    • समाकल (इंटीग्रल) प्रोटीन: लिपिड परत में आंशिक या पूर्णतः धंसी होती हैं। आर-पार फैली ट्रांसमेमब्रेन (टनल) प्रोटीन जलीय छिद्र बनाती हैं।
    • परिधीय (पेरिफेरल) प्रोटीन: लिपिड परत की बाहरी या भीतरी सतह पर ढीले रूप में स्थित होती हैं जिन्हें लवण के घोल से आसानी से अलग किया जा सकता है।
  • ग्लाइकोकैलिक्स: बाहरी सतह पर लिपिड से जुड़ी शर्करा (ग्लाइकोलिपिड) और प्रोटीन से जुड़ी शर्करा (ग्लाइकोप्रोटीन) कोशिका पहचान, आसंजन तथा प्रतिरक्षा पहचान (जैसे मानव का ABO रक्त समूह) का कार्य करती हैं।
2. झिल्ली परिवहन की क्रियाविधि

चयनात्मक पारगम्यता के कारण प्लाज्मा झिल्ली विभिन्न विधियों द्वारा अणुओं का परिवहन करती है:

परिवहन विधि चालक बल ATP ऊर्जा वाहक प्रोटीन जैविक उदाहरण
सरल विसरण (Simple Diffusion) सांद्रता प्रवणता के अनुकूल (उच्च से निम्न सांद्रता)। नहीं (निष्क्रिय)। आवश्यकता नहीं (लिपिड परत से सीधे)। लिपिड-घुलनशील अणु ($\text{O}_2, \text{CO}_2$, स्टेरॉयड, एथेनॉल)।
परासरण (Osmosis) जल विभव प्रवणता (उच्च से निम्न जल विभव)। नहीं (निष्क्रिय)। एक्वापोरिन चैनल तीव्र जल प्रवाह सुनिश्चित करते हैं। मूलरोम द्वारा जल अवशोषण एवं केशिका जल विनिमय।
सुसाध्य विसरण (Facilitated Diffusion) सांद्रता अथवा विद्युत-रासायनिक प्रवणता के अनुकूल। नहीं (निष्क्रिय)। विशिष्ट चैनल या पर्मिएज प्रोटीन आवश्यक। GLUT-4 द्वारा ग्लूकोज परिवहन, आयन चैनल।
प्राथमिक सक्रिय परिवहन (Primary Active Transport) प्रवणता के विपरीत (कम से अधिक सांद्रता की ओर)। हाँ (सीधे ATP जलअपघटन द्वारा)। विशिष्ट पंप प्रोटीन (ATPases)। $\text{Na}^+/\text{K}^+$ ATPase पंप ($3\,\text{Na}^+$ बाहर, $2\,\text{K}^+$ भीतर), $\text{Ca}^{2+}$ पंप।
3. पादप कोशिका भित्ति एवं मध्य पटलिका

पादप, कवक तथा शैवालों में प्लाज्मा झिल्ली के बाहर निर्जीव व दृढ़ रक्षात्मक आवरण कोशिका भित्ति है:

  • रासायनिक संघटन: सेलूलोज़ के सूक्ष्मरेशे जो हेमीसेलूलोज़, पेक्टिन एवं संरचनात्मक प्रोटीनों के आधात्री में धंसे होते हैं। (कवक भित्ति में काइटिन तथा शैवालों में सेलूलोज़, गैलेक्टन व मैनन होते हैं)।
  • प्राथमिक भित्ति (Primary Wall): युवा वर्धनशील कोशिकाओं में बनने वाली पतली व लचीली भित्ति जो विस्तार में सक्षम होती है; परिपक्वन के साथ यह घटती जाती है।
  • द्वितीयक भित्ति (Secondary Wall): परिपक्व अविभाजनकारी कोशिकाओं में प्राथमिक भित्ति के भीतर बनती है; यह मोटी, दृढ़ तथा जल-अभेद्य लिग्निन या सुबेरिन से संसेचित होती है (जैसे स्क्लेरेन्काइमा, वाहिनिकाएं)।
  • मध्य पटलिका (Middle Lamella): दो समीपवर्ती पादप कोशिकाओं को परस्पर जोड़ने वाली सीमेंट जैसी परत जो मुख्य रूप से कैल्शियम एवं मैग्नीशियम पेक्टेट से बनी होती है। फल पकने पर पेक्टिनेज द्वारा यह घुल जाती है जिससे फल मुलायम हो जाते हैं।
  • जीवद्रव्य तंतु (प्लाज्मोडेस्मेटा / Plasmodesmata): कोशिका भित्ति व मध्य पटलिका के आर-पार फैले सूक्ष्म कोशिकाद्रव्यी चैनल जो समीपवर्ती कोशिकाओं को जोड़ते हैं (सिम्प्लास्टिक निरंतरता)। इसके केंद्र में अंतःप्रद्रव्यी जालिका की एक सूक्ष्म नलिका होती है जिसे डेस्मोब्यूल (Desmotubule) कहते हैं।

अंतःझिल्लिका तंत्र: ER, गॉल्जी उपकरण, लाइसोसोम एवं रसधानी

1. अंतःझिल्लिका तंत्र की संकल्पना

यूकैरियोटिक कोशिका के वे झिल्लीयुक्त अंगक जो संरचना में भिन्न होने पर भी पुटिका परिवहन के माध्यम से एक समन्वित कार्यप्रणाली संपन्न करते हैं, उन्हें अंतःझिल्लिका तंत्र (Endomembrane System) कहते हैं। इसके चार मुख्य अंगक हैं: अंतःप्रद्रव्यी जालिका (ER), गॉल्जी उपकरण, लाइसोसोम (लयनकाय) एवं रसधानी (वैक्यूल)। इसके विपरीत, माइटोकॉन्ड्रिया, हरितलवक व परऑक्सीसोम असंबंधित कार्यों के कारण इस तंत्र का भाग नहीं हैं।

2. अंतःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum - ER)

कोशिकाद्रव्य में जालिका की भांति फैली चपटी सिस्टर्नी, पुटिकाओं व नलिकाओं का तंत्र जो कोशिकाद्रव्य को दो कक्षों में बांटता है: ल्यूमिनल (ER के भीतर) तथा एक्स्ट्रा-ल्यूमिनल (कोशिकाद्रव्य):

  • खुरदरी अंतःप्रद्रव्यी जालिका (RER): झिल्ली की बाहरी सतह पर राइबोफोरिन प्रोटीन द्वारा 80S राइबोसोम चिपके होते हैं। यह बाह्य केंद्रक झिल्ली से सतत जुड़ी रहती है। मुख्य कार्य: स्रावी प्रोटीनों, लाइसोसोमल एंजाइमों एवं झिल्ली प्रोटीनों का संश्लेषण तथा आरंभिक वलन। प्रोटीन स्रावी कोशिकाओं (अग्न्याशय, प्लाज्मा कोशिकाएं) में अत्यधिक विकसित होती है।
  • चिकनी अंतःप्रद्रव्यी जालिका (SER): राइबोसोम रहित तथा नलिकाओं से बनी होती है। मुख्य कार्य: लिपिड (फॉस्फोलिपिड, कोलेस्ट्रॉल) का संश्लेषण, स्टेरॉयड हार्मोन संश्लेषण (टेस्टोस्टेरोन, एस्ट्रोजन), यकृत में साइटोक्रोम P450 द्वारा औषधियों व विषैले पदार्थों का विषहरण (Detoxification), तथा पेशी कोशिकाओं में $ ext{Ca}^{2+}$ का संचयन व विमोचन (पेशियों में इसे सार्कोप्लाज्मिक रेटिकुलम कहते हैं)।
3. गॉल्जी उपकरण (गॉल्जी संकुल)

1898 में कैमिलो गॉल्जी ने उल्लू व बिल्ली की तंत्रिका कोशिकाओं में सिल्वर नाइट्रेट अभिरंजन द्वारा इसकी खोज की थी। केंद्रक के पास समांतर रूप से व्यवस्थित मुड़ी हुई चपटी थैलियों या सिस्टर्नी (0.5 से 1.0 $\mu ext{m}$ व्यास) से बना होता है:

  • कार्यात्मक ध्रुवता (Polarity):
    • सिस तल (निर्माणकारी तल / Cis face): उत्तल फलक जो केंद्रक व ER की ओर उन्मुख होता है; RER से निकली प्रोटीन पुटिकाएं यहां आकर जुड़ती हैं।
    • ट्रांस तल (परिपक्वन तल / Trans face): अवतल फलक जो प्लाज्मा झिल्ली की ओर उन्मुख होता है; संसाधित स्रावी पुटिकाएं व प्राथमिक लाइसोसोम यहां से मुकुलित होते हैं।
  • प्रमुख कार्य:
    • ग्लाइकोसिलेशन: प्रोटीनों से शर्करा जोड़कर ग्लाइकोप्रोटीन तथा लिपिडों से शर्करा जोड़कर ग्लाइकोलिपिड बनाना।
    • पदार्थों की छंटाई व संवेष्टन: स्रावी एंजाइमों को जाइमोजन कणिकाओं में पैक करना और उन्हें निश्चित गंतव्य पर भेजना (कोशिका का ट्रैफिक पुलिस)।
4. लयनकाय (लाइसोसोम)

ट्रांस-गॉल्जी जाल से मुकुलन द्वारा उत्पन्न एकल झिल्लीयुक्त गोलाकार अंगक, जिसे कोशिका का 'पाचन उपकरण' कहा जाता है:

  • अम्लीय हाइड्रोलेज एंजाइम: इसमें 50 से अधिक जलअपघटनीय एंजाइम (प्रोटीएज, लाइपेज, न्यूक्लिएज, कार्बोहाइड्रेज व एसिड फॉस्फेटेज) होते हैं। ये एंजाइम अम्लीय माध्यम (pH 4.5 से 5.0) में सर्वाधिक सक्रिय होते हैं, जिसे लाइसोसोम झिल्ली के सक्रिय प्रोटॉन ($ ext{H}^+$) पंप बनाए रखते हैं।
  • परपोषी-भक्षण एवं स्व-भक्षण: एंडोसाइटोसिस द्वारा आए बाह्य खाद्य या रोगाणुओं को नष्ट करना (हेटरोफैगी), तथा क्षतिग्रस्त या जीर्ण-शीर्ण अंगकों को पचाकर पुनर्चक्रित करना (ऑटोफैगी)।
  • स्व-लयन ('आत्मघाती थैली'): रोगावस्था या प्रोग्राम्ड कोशिका मृत्यु (एपोप्टोसिस) के समय लाइसोसोम फटकर पूरी कोशिका का ही पाचन कर देते हैं।
5. रसधानी (वैक्यूल)

पादप कोशिका के आयतन का 90% तक स्थान घेरने वाला एकल झिल्लीयुक्त तरल-भरा स्थान:

  • टोनोप्लास्ट: पादप रसधानी को घेरने वाली एकल चयनात्मक पारगम्य झिल्ली। इसमें सक्रिय पंप प्रोटीन होते हैं जो सांद्रता प्रवणता के विपरीत आयनों को रसधानी में पंप करते हैं, जिससे रसधानी में उच्च सांद्रता बनती है और जल प्रवेश कर स्फीति दाब (Turgor pressure) उत्पन्न करता है जो पौधों को दृढ़ता देता है।
  • रसधानियों के प्रकार:
    • रस रसधानी (Sap Vacuole): जल, खनिज लवण, कार्बनिक अम्ल तथा जल में घुलनशील एंथोसायनिन वर्णक (लाल, बैंगनी, नीले पुष्प वर्ण) संचित रखती है।
    • संकुचनशील रसधानी (Contractile Vacuole): मीठे जल के प्रोटोजोआ (*Amoeba*) में अतिरिक्त जल निकालकर परासरण नियमन एवं उत्सर्जन करती है।
    • खाद्य रसधानी (Food Vacuole): प्रोटोजोआ में फैगोसाइटोसिस द्वारा ग्रहण किए गए भोजन के पाचन में सहायक होती है।

अर्ध-स्वायत्त ऊर्जा रूपांतरक अंगक: माइटोकॉन्ड्रिया एवं लवक

1. अर्ध-स्वायत्त अंगक की संकल्पना एवं महत्व

माइटोकॉन्ड्रिया और हरितलवक यूकैरियोटिक कोशिका के वे अंगक हैं जो ऊर्जा को जैविक रूप से उपयोगी रासायनिक ऊर्जा (ATP) में बदलते हैं। इन्हें अर्ध-स्वायत्त अंगक (Semi-autonomous organelles) कहा जाता है; क्योंकि इनमें स्वयं का वृत्ताकार द्विरज्जुक डीएनए (dsDNA), 70S राइबोसोम और आरएनए होता है जिसकी सहायता से ये अपने कुछ आवश्यक प्रोटीन स्वयं संश्लेषित कर सकते हैं तथा जीवाणुओं की भांति द्विविखंडन द्वारा विभाजित होते हैं। तथापि अधिकांश संरचनात्मक प्रोटीनों के लिए ये केंद्रक पर निर्भर रहते हैं।

2. माइटोकॉन्ड्रिया: परासंरचना एवं ऊर्जा उत्पादन

वायवीय श्वसन द्वारा कोशिका का अधिकांश एटीपी बनाने के कारण इसे 'कोशिका का शक्तिगृह' कहते हैं। यह दोहरी झिल्ली वाला सॉसेज या बेलनाकार अंगक है:

  • बाह्य झिल्ली: चिकनी तथा पोरिन नामक बड़े प्रोटीन चैनलों के कारण छोटे अणुओं व आयनों के लिए पूर्ण पारगम्य।
  • परिसूत्रकणिकीय अवकाश (Intermembrane Space): दोनों झिल्लियों के बीच का द्रव-भरा स्थान जहां इलेक्ट्रॉन परिवहन के समय प्रोटॉन ($ ext{H}^+$) पंप होकर संचित होते हैं और प्रोटॉन प्रवणता बनाते हैं।
  • आंतरिक झिल्ली एवं क्रिस्टी: अत्यंत चयनात्मक पारगम्य झिल्ली जो आधात्री की ओर अंगुलीनुमा अनेक वलन बनाती है जिन्हें क्रिस्टी (Cristae) कहते हैं। क्रिस्टी इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (ETC) और एटीपी संश्लेषण के लिए पृष्ठीय क्षेत्रफल में अत्यधिक वृद्धि करती है।
  • ऑक्सीसोम ($F_0-F_1$ कण / ATP सिंथेस): क्रिस्टी की भीतरी सतह पर आलपिन जैसे कण धंसे होते हैं:
    • $F_0$ आधार: आंतरिक झिल्ली में धंसा हाइड्रोफोबिक प्रोटॉन चैनल जिसके रास्ते प्रोटॉन आधात्री में लौटते हैं।
    • $F_1$ शीर्ष: आधात्री की ओर उभरा हुआ गोल उत्प्रेरक भाग जो $ ext{ADP} + ext{Pi}$ से घूर्णन उत्प्रेरण द्वारा ATP का संश्लेषण करता है।
  • आधात्री (मैट्रिक्स): आंतरिक जैल जैसे तरल में क्रेब्स चक्र (TCA चक्र) के एंजाइम, एक नग्न वृत्ताकार dsDNA, 70S राइबोसोम तथा आरएनए अणु होते हैं।
3. लवक (Plastids): वर्गीकरण एवं हरितलवक की संरचना

लवक पादपों एवं यूग्लीनॉइड्स में पाए जाने वाले दोहरी झिल्ली वाले अंगक हैं। वर्णकों के आधार पर लवक तीन प्रकार के होते हैं:

  • अवर्णीलवक (ल्यूकोप्लास्ट / Leucoplasts): पौधों के सूर्य के प्रकाश से दूर भागों में पाए जाने वाले रंगहीन संचयी लवक:
    • एमाइलोप्लास्ट: कार्बोहाइड्रेट (मंड/स्टार्च) संचित करते हैं, जैसे आलू का कंद।
    • इलायोप्लास्ट: वसा, तेल एवं लिपिड संचित करते हैं, जैसे अरंडी का बीज।
    • एल्यूरोप्लास्ट (प्रोटीनोप्लास्ट): प्रोटीन कणिकाओं का संचयन करते हैं, जैसे मक्के का दाना।
  • वर्णीलवक (क्रोमोप्लास्ट / Chromoplasts): वसा-घुलनशील कैरोटीनॉयड वर्णक (कैरोटीन व जैंथोफिल) युक्त होते हैं जो पुष्पों, पके फलों (जैसे टमाटर में लाइकोपीन) को पीला, नारंगी या लाल रंग प्रदान कर परागण में सहायता करते हैं।
  • हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट / Chloroplasts): हरे वर्णक क्लोरोफिल a, b एवं कैरोटीनॉयड युक्त होते हैं जो प्रकाश संश्लेषण में प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करते हैं।
4. हरितलवक की विस्तृत परासंरचना

पादपों की पर्णमध्योतक (मीसोफिल) कोशिकाओं में पाए जाने वाले लेंस या डिस्क के आकार के अंगक (लंबाई 4–10 $\mu ext{m}$, चौड़ाई 2–4 $\mu ext{m}$) जो दो झिल्लियों से घिरे होते हैं:

  • पीठिका (स्ट्रोमा / Stroma): आंतरिक द्रव-भरा स्थान; इसमें वृत्ताकार dsDNA, 70S राइबोसोम, आरएनए तथा प्रकाश संश्लेषण की अप्रकाशीय अभिक्रिया (कैल्विन चक्र) के एंजाइम होते हैं, जिनमें मुख्य रूबिस्को (Rubisco) है जो पृथ्वी पर सर्वाधिक पाया जाने वाला एंजाइम है।
  • थाइलेकोइड (Thylakoids): पीठिका में स्थित चपटी झिल्लीदार थैलियां। थाइलेकोइड की झिल्ली में प्रकाशिक अभिक्रिया के प्रकाश तंत्र (PS I व PS II), क्लोरोफिल तथा इलेक्ट्रॉन वाहक व्यवस्थित होते हैं। थाइलेकोइड की भीतरी गुहा को ल्यूमेन कहते हैं।
  • ग्रेना (एकवचन: Granum): सिक्कों के चट्टे की भांति थाइलेकोइड एक के ऊपर एक व्यवस्थित होकर ग्रेना बनाते हैं (प्रति क्लोरोप्लास्ट 40–60 ग्रेना)। समीपवर्ती ग्रेना चपटी नलिकाकार झिल्लियों द्वारा परस्पर जुड़े रहते हैं जिन्हें पीठिका पटलिकाएं (स्ट्रोमा लैमिली / फ्रेट्स) कहते हैं।

राइबोसोम, कोशिकीय कंकाल, पक्ष्माभ, कशाभ एवं तारककाय

1. राइबोसोम (पैलाडे कण)

1953 में जॉर्ज पैलाडे ने इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी में सघन कणिकामय संरचना के रूप में इनकी खोज की थी। राइबोसोम सभी सजीव कोशिकाओं में पाए जाने वाले झिल्लीरहित राइबोन्यूक्लियोप्रोटीन कण (rRNA एवं प्रोटीन का संकुल) हैं:

  • स्वेडबर्ग इकाई (Svedberg Unit, S): अल्ट्रासेंट्रीफ्यूज में अवसादन गुणांक (Sedimentation coefficient) को मापती है, जो कण के आकार एवं घनत्व का सूचक है।
  • 70S राइबोसोम: प्रोकैरियोट, माइटोकॉन्ड्रिया एवं हरितलवक में पाए जाते हैं। यह एक 50S बड़ी उप-इकाई (23S व 5S rRNA + 34 प्रोटीन) तथा एक 30S छोटी उप-इकाई (16S rRNA + 21 प्रोटीन) से मिलकर बनते हैं।
  • 80S राइबोसोम: यूकैरियोटिक कोशिकाद्रव्य में पाए जाते हैं। यह एक 60S बड़ी उप-इकाई (28S, 5.8S व 5S rRNA + ~49 प्रोटीन) तथा एक 40S छोटी उप-इकाई (18S rRNA + ~33 प्रोटीन) से मिलकर बनते हैं।
  • संयोजन: कोशिकाद्रव्य में दोनों उप-इकाइयां अलग रहती हैं; प्रोटीन अनुवाद के समय मैग्नीशियम आयनों की उपयुक्त सांद्रता ($ ext{Mg}^{2+} pprox 0.001\, ext{M}$) में ही जुड़कर सक्रिय राइबोसोम बनाती हैं।
2. कोशिकीय कंकाल (साइटोस्केलेटन)

यूकैरियोटिक कोशिकाद्रव्य में फैला हुआ प्रोटीन तंतुओं का त्रि-आयामी आंतरिक जाल, जो कोशिका को निश्चित आकार, यांत्रिक सुदृढ़ता तथा आंतरिक गतिशीलता प्रदान करता है:

  • सूक्ष्मनालिकाएं / माइक्रोट्यूब्यूल (25 nm व्यास): $lpha$- एवं $eta$-ट्यूबुलिन प्रोटीन हेटरोडाइमर से बनी खोखली दृढ़ नलिकाएं। कार्य: कोशिका विभाजन में तुर्क तंतुओं का निर्माण, तारककेंद्र व सीलिया का अक्षसूत्र बनाना तथा मोटर प्रोटीनों (काइनेसिन व डाइनिन) हेतु परिवहन ट्रैक उपलब्ध कराना।
  • सूक्ष्मतंतु / माइक्रोफिलामेंट (7 nm व्यास): एक्टिन प्रोटीन से बने ठोस व लचीले कुंडलित तंतु। कार्य: मायोसिन के साथ पेशी संकुचन, कोशिकाद्रव्यी भ्रमण (साइक्लोसिस), अमीबीय गति तथा जंतु कोशिका विभाजन में विदलन खांच (Cleavage furrow) का निर्माण।
  • मध्यवर्ती तंतु / इंटरमीडिएट फिलामेंट (10 nm व्यास): रज्जु की भांति मजबूत रेशेदार प्रोटीन बहुलक (जैसे एपिथीलियम में केराटिन, वाइमेंटिन, न्यूरोफिलामेंट)। कार्य: कोशिका को उच्च यांत्रिक तनन सामर्थ्य प्रदान करना तथा न्यूक्लियर लैमिना बनाकर केंद्रक आवरण को सहारा देना।
3. पक्ष्माभ (सीलिया) एवं कशाभ (फ्लैजिला) - 9+2 अक्षसूत्र

प्लाज्मा झिल्ली से बाहर निकले रोम सदृश गतिशील प्रवर्ध। सीलिया छोटे व संख्या में अधिक होते हैं और पतवार की भांति समन्वित गति करते हैं; फ्लैजिला लंबे व संख्या में कम होते हैं और तरंगीय गति करते हैं:

  • अक्षसूत्र (Axoneme) की परासंरचना: प्लाज्मा झिल्ली से ढके केंद्रीय अक्ष में सूक्ष्मनालिकाओं की निश्चित व्यवस्था होती है:
    • 9 परिधीय द्विक (Doublets): परिधि पर वलय रूप में व्यवस्थित 9 द्विक सूक्ष्मनालिकाएं। प्रत्येक द्विक के उप-तंतु A से डाइनिन भुजाएं निकलती हैं जो एटीपी जलअपघटन द्वारा द्विकों के बीच फिसलने का बल उत्पन्न करती हैं।
    • 2 केंद्रीय एकल (Singlets): केंद्र में स्थित 2 एकल सूक्ष्मनालिकाएं जो एक प्रोटीनयुक्त केंद्रीय आच्छद (Central sheath) से घिरी रहती हैं।
    • अरीय स्पोक व नेक्सिन योजक: प्रत्येक परिधीय द्विक से केंद्रीय आच्छद की ओर 9 अरीय स्पोक जुड़े होते हैं। समीपवर्ती द्विक आपस में नेक्सिन प्रोटीन योजक द्वारा जुड़े रहते हैं।
  • आधारी काय (Basal Body / Kinetosome): सीलिया या फ्लैजिला कोशिका के कोर्टेक्स में धंसे तारककेंद्र सदृश आधारी काय से निकलते हैं, जिसका विन्यास 9+0 त्रिक होता है (केंद्रीय नलिकाएं अनुपस्थित)।
4. तारककाय (सेंट्रोसोम) एवं तारककेंद्र (सेंट्रिओल) - 9+0 बैलगाड़ी पहिया

जंतु कोशिकाओं में पाया जाने वाला अंगक (उच्च पादपों में अनुपस्थित) जो परस्पर लंबवत स्थित दो बेलनाकार तारककेंद्रों और चारों ओर के अक्रिस्टलीय प्रोटीन परितारककेंद्रकीय पदार्थ (PCM) से मिलकर बनता है:

  • बैलगाड़ी पहिया विन्यास (9+0 विन्यास): प्रत्येक तारककेंद्र परिधि पर समान दूरी पर व्यवस्थित 9 त्रिक सूक्ष्मनालिकाओं (A, B, C उप-तंतु) से बना होता है, केंद्र में कोई नलिका नहीं होती (0)। केंद्र में एक प्रोटीनयुक्त हब (Hub) होता है जो 9 अरीय स्पोकों द्वारा त्रिकों से जुड़कर 'बैलगाड़ी के पहिए' (Cartwheel) जैसा दिखता है।
  • कोशिकीय कार्य: तारककेंद्र जंतु कोशिका विभाजन के समय तुर्क उपकरण बनाते हैं जो गुणसूत्रों के पृथक्करण को नियंत्रित करता है, तथा सीलिया व फ्लैजिला के आधारी काय का निर्माण करता है।

केंद्रक, क्रोमैटिन, गुणसूत्र आकारिकी एवं सूक्ष्मकाय

1. यूकैरियोटिक केंद्रक की संरचना

1831 में रॉबर्ट ब्राउन द्वारा खोजा गया केंद्रक कोशिका की समस्त आनुवंशिक व उपापचयी क्रियाओं का नियंत्रण केंद्र है। एक अंतरावस्था केंद्रक के मुख्य भाग:

  • केंद्रक आवरण (Nuclear Envelope): दो समांतर झिल्लियों से बना आवरण जो केंद्रक द्रव्य को कोशिकाद्रव्य से अलग रखता है:
    • बाह्य झिल्ली: RER से सतत जुड़ी होती है और इस पर राइबोसोम उपस्थित होते हैं।
    • आंतरिक झिल्ली: आंतरिक सतह पर मध्यवर्ती तंतुओं की न्यूक्लियर लैमिना द्वारा समर्थित रहती है।
    • परिकेंद्रकीय अवकाश: दोनों झिल्लियों के बीच 10–50 nm चौड़ा तरलपूर्ण अवकाश।
  • केंद्रक छिद्र संकुल (NPCs): दोनों झिल्लियों के संलयन से बने लगभग 100 nm व्यास के अष्टकोणीय छिद्र जो न्यूक्लियोपोरिन प्रोटीन से बने होते हैं। यह केंद्रक व कोशिकाद्रव्य के बीच द्विदिशीय चयनात्मक परिवहन नियंत्रित करते हैं (rRNA, mRNA व राइबोसोम का निर्यात तथा हिस्टोन व पॉलीमरेज का आयात)।
  • केंद्रिक (Nucleolus): केंद्रक द्रव्य में स्थित एक या अधिक झिल्लीरहित सघन गोलाकार क्षेत्र, जो rRNA संश्लेषण तथा राइबोसोम निर्माण का मुख्य सक्रिय केंद्र है। प्रोटीन संश्लेषण में अत्यधिक सक्रिय कोशिकाओं (जैसे यकृत कोशिकाएं, डिंब) में केंद्रिक बहुत बड़ा होता है।
  • केंद्रक द्रव्य (Nuclear Matrix): पारदर्शी कोलॉइडी जैल जिसमें न्यूक्लियोसाइड, न्यूक्लियोटाइड, एंजाइम तथा क्रोमैटिन जालिका तैरती रहती है।
2. क्रोमैटिन संगठन एवं न्यूक्लियोसोम

1879 में वाल्थर फ्लेमिंग ने क्षारीय रंजकों से अभिरंजित होने के कारण इसे क्रोमैटिन नाम दिया:

  • न्यूक्लियोसोम कोर: क्रोमैटिन की मूलभूत पुनरावृत्त इकाई। इसमें लगभग 146 क्षारक युग्म (bp) डीएनए क्षारीय हिस्टोन अष्टक के चारों ओर 1.65 बार लिपटा रहता है। हिस्टोन अष्टक $ ext{H}_2 ext{A}, ext{H}_2 ext{B}, ext{H}_3, ext{H}_4$ की दो-दो प्रतियों से बनता है। हिस्टोन में धनावेशित क्षारीय अमीनो अम्ल (लाइसिन व आर्जिनिन) प्रचुर मात्रा में होने से ये ऋणावेशित डीएनए फॉस्फेट से सुदृढ़ता से बंधे रहते हैं।
  • योजक डीएनए एवं $ ext{H}_1$ हिस्टोन: समीपवर्ती न्यूक्लियोसोम 20–60 bp योजक डीएनए द्वारा जुड़े रहते हैं जिसे एक बाहरी $ ext{H}_1$ हिस्टोन प्रोटीन सुदृढ़ रखता है (इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी में 'डोरी पर मणके' जैसी संरचना)।
  • यूक्रोमैटिन बनाम हेटरोक्रोमैटिन:
    • यूक्रोमैटिन: ढीला कुंडलित, हल्का अभिरंजित तथा अनुलेखन में सक्रिय।
    • हेटरोक्रोमैटिन: सघन कुंडलित, गहरा अभिरंजित तथा आनुवंशिक रूप से निष्क्रिय।
3. गुणसूत्र आकारिकी एवं सेंट्रोमियर आधारित वर्गीकरण

मध्यावस्था में क्रोमैटिन सघन होकर निश्चित गुणसूत्रों का रूप ले लेता है। प्रत्येक गुणसूत्र में दो अर्धगुणसूत्र (क्रोमैटिड) प्राथमिक संकीर्णन पर जुड़े होते हैं:

  • सेंट्रोमियर एवं काइनेटोकोर: प्राथमिक संकीर्णन को सेंट्रोमियर (गुणसूत्रबिंदु) कहते हैं। इसके दोनों ओर डिस्क के आकार की त्रिस्तरीय प्रोटीन संरचनाएं होती हैं जिन्हें काइनेटोकोर कहते हैं; विभाजन के समय तुर्क तंतु यहीं जुड़ते हैं।
  • सेंट्रोमियर की स्थिति के आधार पर वर्गीकरण:
    • मध्यकेंद्री (Metacentric): सेंट्रोमियर ठीक मध्य में होता है जिससे दो बराबर भुजाएं ($p = q$) बनती हैं; पश्चावस्था में 'V'-आकार दिखता है।
    • उप-मध्यकेंद्री (Sub-metacentric): सेंट्रोमियर केंद्र से थोड़ा हटकर होता है जिससे एक छोटी ($p$) और एक लंबी भुजा ($q$) बनती है; पश्चावस्था में 'L'-आकार दिखता है।
    • अग्रकेंद्री (Acrocentric): सेंट्रोमियर एक सिरे के अत्यंत निकट होता है जिससे एक अत्यंत छोटी और एक बहुत लंबी भुजा बनती है; पश्चावस्था में 'J'-आकार दिखता है।
    • अंत्यकेंद्री (Telocentric): सेंट्रोमियर बिल्कुल अंतिम सिरे पर होता है जिससे केवल एक ही भुजा दिखती है; पश्चावस्था में छड़ या 'i'-आकार दिखता है।
  • द्वितीयक संकीर्णन एवं सैटेलाइट गुणसूत्र: कुछ गुणसूत्रों में एक निश्चित स्थान पर दूसरा संकीर्णन होता है जो केंद्रिक संगठक क्षेत्र (NOR) के रूप में कार्य करता है। इसके आगे स्थित घुंडीनुमा सिरे को सैटेलाइट (SAT गुणसूत्र) कहते हैं।
4. सूक्ष्मकाय (Microbodies)

कोशिकाद्रव्य में पाई जाने वाली एकल झिल्लीयुक्त सूक्ष्म पुटिकाएं जिनमें विशिष्ट उपापचयी एंजाइम होते हैं:

  • परऑक्सीसोम: हाइड्रोजन परॉक्साइड उत्पादक ऑक्सीडेज तथा विषैले $ ext{H}_2 ext{O}_2$ को जल व ऑक्सीजन में तोड़ने वाला कैटालेज एंजाइम रखते हैं ($2\, ext{H}_2 ext{O}_2 o 2\, ext{H}_2 ext{O} + ext{O}_2$ [कैटालेज])। पौधों की हरी पत्तियों में यह क्लोरोप्लास्ट व माइटोकॉन्ड्रिया के साथ मिलकर प्रकाश-श्वसन ($C_2$ चक्र) संपन्न करता है।
  • ग्लाइऑक्सीसोम: अंकुरित होते वसायुक्त बीजों (अरंडी, सूरजमुखी) में पाए जाते हैं; इनमें ग्लाइऑक्सीलेट चक्र के एंजाइम होते हैं जो संचित वसीय अम्लों को शर्करा में बदलकर भ्रूण को पोषण देते हैं।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

विरचो का जीवजनन नियम (Virchow's Law of Biogenesis)
Omnis cellula-e cellula (सभी नई जीवित कोशिकाएं केवल पूर्ववर्ती जीवित कोशिकाओं के विभाजन द्वारा ही उत्पन्न होती हैं)
इसने कोशिकीय स्तर पर स्वतः जनन (Abiogenesis) को अमान्य किया; अकोशिकीय वायरस इसका एकमात्र अपवाद हैं।
सिंगर-निकोलसन झिल्ली तरलता मापदंड (Membrane Fluidity Metric)
अर्ध-तरल अवस्था (Quasi-fluid State) = फॉस्फोलिपिड द्विपरत तरलता (असंतृप्त वसीय अम्ल) + प्रोटीनों का पार्श्व विसरण
झिल्ली की तरलता कोशिका वृद्धि, अंतरकोशिकीय संधियों के निर्माण, स्रावण, एंडोसाइटोसिस तथा कोशिका विभाजन के लिए अनिवार्य है।
अंतःझिल्लिका तंत्र कार्यात्मक प्रवाह (Endomembrane Cascade)
अंतःझिल्लिका प्रवाह = RER/SER (संश्लेषण) -> परिवहन पुटिकाएं -> गॉल्जी संकुल (ग्लाइकोसिलेशन/छंटाई) -> लाइसोसोम / रसधानी / बहिःस्रावण
माइटोकॉन्ड्रिया, हरितलवक तथा परऑक्सीसोम इस पुटिका प्रवाह से बाहर होने के कारण अंतःझिल्लिका तंत्र का हिस्सा नहीं हैं।
अर्ध-स्वायत्त अंगक कसौटी (Semi-Autonomous Criteria)
अर्ध-स्वायत्तता = दोहरी झिल्ली आवरण + वृत्ताकार dsDNA + 70S राइबोसोम + द्विविखंडन क्षमता
यद्यपि ये अपने कुछ प्रोटीन स्वयं बनाते हैं, फिर भी अधिकांश संरचनात्मक प्रोटीनों के लिए केंद्रक जीनों पर निर्भर रहते हैं।
सूक्ष्मनालिका संरचनात्मक संगठन नियम (Microtubule Organization)
अक्षसूत्र (सीलिया / फ्लैजिला) = 9 द्विक (परिधीय) + 2 एकल (केंद्रीय) [9 + 2] बनाम तारककेंद्र = 9 त्रिक (परिधीय) + 0 केंद्रीय [9 + 0]
डाइनिन मोटर प्रोटीन द्विकों के बीच एटीपी चालित गति उत्पन्न कर सीलिया के स्पंदन का कारण बनती है।
गुणसूत्र आकारिकी वर्गीकरण सूत्र (Chromosome Morphology Classification)
मेटासेंट्रिक (मध्य सेंट्रोमियर, V-आकार) बनाम सब-मेटासेंट्रिक (उप-मध्य, L-आकार) बनाम एक्रोसेंट्रिक (उप-अंत्य, J-आकार) बनाम टेलोसेंट्रिक (अंत्य, i-आकार)
द्वितीयक संकीर्णन के आगे स्थित सिरे को सैटेलाइट (SAT गुणसूत्र) कहते हैं, जो केंद्रिक संगठक क्षेत्र (NOR) से जुड़ा होता है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
(क) सिंगर एवं निकोलसन (1972) द्वारा प्रस्तुत प्लाज्मा झिल्ली के तरल मोज़ेक मॉडल का वर्णन कीजिए। लिपिड द्विपरत को 'अर्ध-तरल' (Quasi-fluid) क्यों कहा जाता है? (ख) सक्रिय परिवहन एवं सुसाध्य विसरण में अंतर स्पष्ट कीजिए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) प्लाज्मा झिल्ली का तरल मोज़ेक मॉडल: [3 अंक]
1972 में एस. जे. सिंगर और जी. एल. निकोलसन ने जैव झिल्लियों का सर्वमान्य तरल मोज़ेक मॉडल प्रस्तुत किया:
1. फॉस्फोलिपिड द्विपरत: झिल्ली की मुख्य संरचना उभयसंवेदी (amphipathic) फॉस्फोलिपिड की सतत दोहरी परत से बनती है। प्रत्येक फॉस्फोलिपिड अणु का एक ध्रुवीय जलरागी (hydrophilic) ग्लिसरॉल-फॉस्फेट 'शीर्ष' होता है जो बाहर व भीतर के जलीय माध्यम की ओर रहता है, तथा दो अध्रुवीय जलविरागी (hydrophobic) वसीय अम्ल 'पूंछ' होती हैं जो भीतर की ओर जल के संपर्क से सुरक्षित रहती हैं।
2. झिल्ली प्रोटीन: प्रोटीन अणु लिपिड समुद्र में तैरते हुए हिमखंडों की भांति मोज़ेक रूप में वितरित रहते हैं:
- समाकल (इंटीग्रल) प्रोटीन: लिपिड परत में गहराई से धंसी होती हैं; ट्रांसमेमब्रेन (टनल) प्रोटीन पूरी परत के आर-पार फैली होकर जलीय चैनल बनाती हैं।
- परिधीय (पेरिफेरल) प्रोटीन: लिपिड परत की बाह्य या आंतरिक सतह पर स्थिर वैद्युत बलों द्वारा शिथिल रूप से जुड़ी होती हैं।
3. अर्ध-तरल (Quasi-fluid) प्रकृति: फॉस्फोलिपिड में सिस-द्विबंध युक्त असंतृप्त वसीय अम्लों की उपस्थिति हाइड्रोकार्बन पूंछों को सघन जमने से रोकती है, जिससे झिल्ली न तो ठोस होती है और न पूर्ण तरल, बल्कि चिपचिपे अर्ध-तरल रूप में रहती है। इस तरलता के कारण प्रोटीन और लिपिड झिल्ली के तल में तीव्र पार्श्व विसरण (Lateral diffusion) कर सकते हैं। यह कोशिका वृद्धि, स्रावण, एंडोसाइटोसिस, कोशिका विभाजन तथा अंतरकोशिकीय संधियों के निर्माण के लिए अनिवार्य है।

(ख) सक्रिय परिवहन बनाम सुसाध्य विसरण: [2 अंक]
मापदंडसक्रिय परिवहन (Active Transport)सुसाध्य विसरण (Facilitated Diffusion)
सांद्रता प्रवणताप्रवणता के विपरीत (कम सांद्रता से अधिक सांद्रता की ओर चढ़ाई परिवहन)।सांद्रता या विद्युत-रासायनिक प्रवणता के अनुकूल (अधिक से कम सांद्रता की ओर)।
ऊर्जा (ATP) की आवश्यकतासीधे एटीपी (ATP) के जलअपघटन से उपापचयी ऊर्जा की आवश्यकता होती है।निष्क्रिय प्रक्रिया; किसी भी एटीपी ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती।
वाहक / पंप प्रोटीनविशिष्ट पंप प्रोटीनों की आवश्यकता होती है (जैसे $\text{Na}^+/\text{K}^+$ ATPase पंप)।विशिष्ट चैनल प्रोटीन या पर्मिएज की आवश्यकता होती है (जैसे GLUT-4, एक्वापोरिन)।
उपापचयी संदमकएटीपी उत्पादन रोकने वाले संदमकों (साइनाइड, ओवाबैन) से अवरुद्ध हो जाता है।उपापचयी संदमकों से सीधे प्रभावित नहीं होता।
उदाहरण 2
(क) अंतःझिल्लिका तंत्र (Endomembrane System) क्या है? इसके घटकों के नाम लिखिए और समझाइए कि माइटोकॉन्ड्रिया, हरितलवक व परऑक्सीसोम इससे क्यों बाहर हैं। (ख) गॉल्जी उपकरण की ध्रुवता और प्रोटीन के रूपांतरण में इसकी भूमिका लिखिए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) अंतःझिल्लिका तंत्र: [3 अंक]
- परिभाषा: यूकैरियोटिक कोशिका के वे झिल्लीयुक्त अंगक जो संरचनात्मक रूप से अलग होते हुए भी पुटिका परिवहन (vesicular transport) द्वारा परस्पर समन्वित होकर एक कार्यप्रणाली के रूप में कार्य करते हैं, उन्हें अंतःझिल्लिका तंत्र कहते हैं।
- घटक अंगक:
1. अंतःप्रद्रव्यी जालिका (ER): स्रावी प्रोटीन (RER) तथा लिपिड/स्टेरॉयड (SER) का संश्लेषण करती है।
2. गॉल्जी उपकरण: ER से आए पदार्थों का रूपांतरण, संवेष्टन (पैकेजिंग) तथा छंटाई करता है।
3. लाइसोसोम: गॉल्जी से मुकुलन द्वारा बनते हैं और अम्लीय हाइड्रोलेज द्वारा अंतःकोशिकीय पाचन करते हैं।
4. रसधानी (वैक्यूल): जल, उत्सर्जी पदार्थ एवं रसों का संचयन कर स्फीति बनाए रखती है।
- माइटोकॉन्ड्रिया, हरितलवक व परऑक्सीसोम क्यों बाहर हैं:
यद्यपि ये झिल्लीयुक्त हैं, फिर भी इनकी संरचनात्मक उत्पत्ति और कार्य ER-गॉल्जी पुटिका तंत्र के साथ समन्वित नहीं होते। माइटोकॉन्ड्रिया और हरितलवक प्रोकैरियोटिक अंतःसहजीविता उद्भव वाले अर्ध-स्वायत्त अंगक हैं जिनका अपना वृत्ताकार डीएनए और 70S राइबोसोम होता है। परऑक्सीसोम कैटालेज एंजाइम द्वारा हाइड्रोजन परॉक्साइड का स्वतंत्र अपघटन करता है।

(ख) गॉल्जी उपकरण की ध्रुवता एवं भूमिका: [2 अंक]
- संरचनात्मक ध्रुवता (Polarity): गॉल्जी उपकरण चपटी मुड़ी हुई सिस्टर्नी का बना होता है जिसके दो स्पष्ट विपरीत फलक होते हैं:
1. सिस तल (निर्माणकारी तल / Cis face): उत्तल फलक जो केंद्रक और RER की ओर उन्मुख होता है; RER से निकली संक्रमण पुटिकाएं सिस तल से जुड़ती हैं।
2. ट्रांस तल (परिपक्वन तल / Trans face): अवतल फलक जो प्लाज्मा झिल्ली की ओर उन्मुख होता है; यहां से रूपांतरित स्रावी पुटिकाएं और प्राथमिक लाइसोसोम मुकुलित होकर निकलते हैं।
- रूपांतरण भूमिका (ग्लाइकोसिलेशन): प्रोटीन और लिपिड जब सिस से ट्रांस सिस्टर्नी से होकर गुजरते हैं, तो गॉल्जी एंजाइम उनसे ओलिगोसैकेराइड जोड़कर प्रोटीनों को ग्लाइकोप्रोटीन में तथा लिपिडों को ग्लाइकोलिपिड में रूपांतरित करते हैं। यह प्रो-हार्मोन को सक्रिय हार्मोन में भी संसाधित करता है (जैसे प्रो-इंसुलिन से इंसुलिन)।
उदाहरण 3
(क) माइटोकॉन्ड्रिया की परासंरचना का वर्णन कीजिए। इसे 'अर्ध-स्वायत्त अंगक' एवं 'कोशिका का शक्तिगृह' क्यों कहा जाता है? (ख) माइटोकॉन्ड्रियल क्रिस्टी एवं क्लोरोप्लास्ट थाइलेकोइड में तुलनात्मक अंतर लिखिए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) माइटोकॉन्ड्रिया की परासंरचना एवं महत्व: [3 अंक]
माइटोकॉन्ड्रिया सॉसेज के आकार या बेलनाकार दोहरी झिल्ली वाला अंगक है (व्यास 0.2–1.0 $\mu\text{m}$, लंबाई 1.0–4.1 $\mu\text{m}$):
1. बाह्य झिल्ली: चिकनी एवं पोरिन प्रोटीन चैनलों की उपस्थिति के कारण छोटे अणुओं व आयनों के लिए स्वतंत्र रूप से पारगम्य होती है।
2. आंतरिक झिल्ली व क्रिस्टी: यह चयनात्मक पारगम्य होती है और आधात्री (मैट्रिक्स) की ओर अनेक अंगुलीनुमा या पटलिका जैसे वलन बनाती है जिन्हें क्रिस्टी (Cristae) कहते हैं। क्रिस्टी इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (ETC) और एटीपी संश्लेषण के लिए पृष्ठीय क्षेत्रफल में अत्यधिक वृद्धि करती है।
3. ऑक्सीसोम ($F_0-F_1$ कण / एलीमेंटरी कण): क्रिस्टी की आंतरिक सतह पर आलपिन के आकार के कण धंसे होते हैं। इसका आधार ($F_0$) झिल्ली में धंसा प्रोटॉन चैनल है तथा गोल शीर्ष ($F_1$) आधात्री की ओर उभरा ATP सिंथेस एंजाइम का उत्प्रेरक भाग है।
4. आधात्री (मैट्रिक्स): आंतरिक जैल जैसे तरल में क्रेब्स चक्र के एंजाइम, एक नग्न वृत्ताकार द्विरज्जुक डीएनए (dsDNA), 70S राइबोसोम, आरएनए तथा द्विसंयोजी धनायन ($\text{Mg}^{2+}, \text{Ca}^{2+}$) होते हैं।
- 'कोशिका का शक्तिगृह' क्यों: यह वायवीय श्वसन में पाइरुवेट व वसीय अम्लों के ऑक्सीकरण तथा ऑक्सीडेटिव फॉस्फोराइलेशन द्वारा कोशिका की अधिकांश रासायनिक ऊर्जा (ATP) उत्पन्न करता है।
- 'अर्ध-स्वायत्त' क्यों: अपना वृत्ताकार डीएनए, 70S राइबोसोम और आरएनए होने से यह अपने कुछ प्रोटीन स्वयं बना सकता है और द्विविखंडन द्वारा विभाजित होता है; किंतु अधिकांश प्रोटीनों के लिए केंद्रक पर निर्भर रहता है।

(ख) माइटोकॉन्ड्रियल क्रिस्टी बनाम क्लोरोप्लास्ट थाइलेकोइड: [2 अंक]
तुलनात्मक बिंदुमाइटोकॉन्ड्रियल क्रिस्टीक्लोरोप्लास्ट थाइलेकोइड
उत्पत्ति एवं संरचनाआंतरिक माइटोकॉन्ड्रियल झिल्ली के आधात्री में अंतर्वलन से बनती है।पीठिका (स्ट्रोमा) में स्थित स्वतंत्र चपटी झिल्लीदार थैलियां जो ढेर लगकर ग्रेना बनाती हैं।
वर्णक उपस्थितिकोई प्रकाश-संश्लेषी वर्णक नहीं होता; साइटोक्रोम व इलेक्ट्रॉन वाहक होते हैं।क्लोरोफिल a, b एवं कैरोटीनॉयड वर्णक प्रकाश तंत्रों (PS I, PS II) में उपस्थित होते हैं।
प्रमुख कार्यऑक्सीडेटिव फॉस्फोराइलेशन: $\text{O}_2$ ग्रहण कर एटीपी बनाती है।प्रकाश-फॉस्फोराइलेशन: जल का प्रकाशिक अपघटन कर $\text{O}_2$ मुक्त करती है और ATP + NADPH बनाती है।
आंतरिक गुहाइंट्राक्रिस्टल अवकाश जो अंतरझिल्लिका अवकाश से जुड़ा होता है।थाइलेकोइड ल्यूमेन जहां प्रोटॉन संचित होकर प्रोटॉन प्रवणता उत्पन्न करते हैं।
उदाहरण 4
(क) यूकैरियोटिक पक्ष्माभ (सीलिया) एवं कशाभ (फ्लैजिला) के अक्षसूत्र (Axoneme) के 9+2 विन्यास का वर्णन कीजिए तथा तारककेंद्र के 9+0 विन्यास से तुलना कीजिए। (ख) कोशिकीय कंकाल (साइटोस्केलेटन) के तीन घटकों और उनके कार्यों का उल्लेख कीजिए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) सीलिया/फ्लैजिला का 9+2 अक्षसूत्र बनाम तारककेंद्र का 9+0 विन्यास: [3 अंक]
- सीलिया एवं फ्लैजिला का 9+2 अक्षसूत्र:
1. परिधीय द्विक (Peripheral Doublets): अक्षसूत्र (कोर) प्लाज्मा झिल्ली से ढका होता है और परिधि पर 9 द्विक सूक्ष्मनालिकाएं वलय रूप में व्यवस्थित होती हैं। प्रत्येक द्विक में उप-तंतु A (पूर्ण, 13 प्रोटोफिलामेंट) और उप-तंतु B (अपूर्ण, 10 प्रोटोफिलामेंट) होते हैं। उप-तंतु A पर डाइनिन प्रोटीन की दो भुजाएं होती हैं जो एटीपी ऊर्जा से द्विकों के बीच फिसलने का बल उत्पन्न करती हैं।
2. केंद्रीय एकल (Central Singlets): केंद्र में 2 एकल सूक्ष्मनालिकाएं होती हैं जो प्रोटीनयुक्त केंद्रीय आच्छद (Central sheath) से घिरी रहती हैं।
3. अरीय स्पोक व नेक्सिन योजक: प्रत्येक परिधीय द्विक से केंद्रीय आच्छद की ओर 9 अरीय स्पोक जुड़े होते हैं। समीपवर्ती द्विक आपस में नेक्सिन प्रोटीन बंधों द्वारा जुड़े रहते हैं।
- तारककेंद्र का 9+0 बैलगाड़ी पहिया (Cartwheel) विन्यास:
तारककाय के दोनों तारककेंद्र परस्पर लंबवत स्थित होते हैं। तारककेंद्र में कोई केंद्रीय सूक्ष्मनालिका नहीं होती (0); परिधि पर समान दूरी पर 9 त्रिक सूक्ष्मनालिकाएं (A, B, C उप-तंतु) पाई जाती हैं। केंद्र में एक प्रोटीनयुक्त हब (Hub) होता है जो 9 अरीय स्पोकों द्वारा त्रिकों से जुड़कर 'बैलगाड़ी के पहिए' जैसी संरचना बनाता है। तारककेंद्र विभाजन के समय तुर्क उपकरण तथा सीलिया/फ्लैजिला का आधारी काय बनाते हैं।

(ख) कोशिकीय कंकाल के घटक एवं कार्य: [2 अंक]
कोशिकीय कंकाल कोशिकाद्रव्य में फैला हुआ प्रोटीन तंतुओं का जाल है:
1. सूक्ष्मनालिकाएं / माइक्रोट्यूब्यूल (25 nm व्यास): $\alpha$- एवं $\beta$-ट्यूबुलिन प्रोटीन हेटरोडाइमर से बनी खोखली नलिकाएं। कार्य: तुर्क तंतुओं का निर्माण, तारककेंद्र व सीलिया का अक्षसूत्र बनाना तथा अंगकों के आवागमन हेतु ट्रैक प्रदान करना।
2. सूक्ष्मतंतु / माइक्रोफिलामेंट (7 nm व्यास): एक्टिन प्रोटीन से बने ठोस व लचीले तंतु। कार्य: मायोसिन के साथ पेशी संकुचन, कोशिकाद्रव्यी भ्रमण (साइक्लोसिस), अमीबीय गति तथा कोशिकाद्रव्य विभाजन में खांच निर्माण।
3. मध्यवर्ती तंतु / इंटरमीडिएट फिलामेंट (10 nm व्यास): केराटिन, वाइमेंटिन व लैमिन जैसे रेशेदार प्रोटीन से बने रज्जु जैसे मजबूत तंतु। कार्य: उच्च यांत्रिक दृढ़ता प्रदान करना, केंद्रक झिल्ली को सुदृढ़ रखना (न्यूक्लियर लैमिना) तथा अंगकों को स्थिर रखना।
उदाहरण 5
(क) यूकैरियोटिक केंद्रक की संरचना का वर्णन कीजिए: केंद्रक झिल्ली, केंद्रक छिद्र संकुल तथा केंद्रिक। (ख) गुणसूत्रबिंदु (सेंट्रोमियर) की स्थिति के आधार पर गुणसूत्रों का वर्गीकरण कीजिए और पश्चावस्था (ऐनाफेज) में इनके आकार दर्शाइए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) यूकैरियोटिक केंद्रक की संरचना: [3 अंक]
1831 में रॉबर्ट ब्राउन द्वारा खोजा गया केंद्रक कोशिका का नियंत्रण एवं आनुवंशिक केंद्र है:
1. केंद्रक आवरण (Nuclear Envelope): दो समांतर झिल्लियों से बना होता है; बाह्य झिल्ली RER से जुड़ी होती है और उस पर राइबोसोम होते हैं। आंतरिक झिल्ली पर मध्यवर्ती तंतुओं की न्यूक्लियर लैमिना होती है जो क्रोमैटिन को व्यवस्थित रखती है। दोनों झिल्लियों के बीच 10 से 50 nm चौड़ा तरलपूर्ण परिकेंद्रकीय अवकाश होता है जो केंद्रक द्रव्य को कोशिकाद्रव्य से अलग रखता है।
2. केंद्रक छिद्र संकुल (NPCs): दोनों झिल्लियों के संलयन से बने लगभग 100 nm व्यास के अष्टकोणीय छिद्र, जो न्यूक्लियोपोरिन प्रोटीन से बने होते हैं। ये अणुओं के द्विदिशीय चयनात्मक परिवहन का नियमन करते हैं: केंद्रक से mRNA, tRNA व राइबोसोम उप-इकाइयों का निकास तथा कोशिकाद्रव्य से हिस्टोन व पॉलीमरेज एंजाइमों का प्रवेश।
3. केंद्रिक (Nucleolus): केंद्रक द्रव्य में स्थित एक या अधिक सघन, गोलाकार झिल्लीरहित क्षेत्र। यह राइबोसोमल आरएनए (rRNA) के संश्लेषण तथा राइबोसोम निर्माण का मुख्य सक्रिय स्थल है। प्रोटीन संश्लेषण में सक्रिय कोशिकाओं में यह अत्यंत बड़ा होता है।

(ख) सेंट्रोमियर की स्थिति के आधार पर गुणसूत्रों के प्रकार: [2 अंक]
प्रत्येक समसूत्री गुणसूत्र में एक प्राथमिक संकीर्णन होता है जिसे सेंट्रोमियर कहते हैं, जिसके पार्श्व में तुर्क तंतुओं को जोड़ने वाली डिस्कनुमा काइनेटोकोर प्रोटीन संरचनाएं होती हैं। सेंट्रोमियर की स्थिति के आधार पर गुणसूत्र चार प्रकार के होते हैं:
1. मध्यकेंद्री (Metacentric): सेंट्रोमियर गुणसूत्र के ठीक मध्य में होता है, जिससे दोनों भुजाएं समान होती हैं। ऐनाफेज में यह 'V'-आकार दर्शाता है।
2. उप-मध्यकेंद्री (Sub-metacentric): सेंट्रोमियर केंद्र से थोड़ा हटकर होता है, जिससे एक भुजा थोड़ी छोटी ($p$) और एक लंबी ($q$) होती है। ऐनाफेज में यह 'L'-आकार दर्शाता है।
3. अग्रकेंद्री (Acrocentric): सेंट्रोमियर एक सिरे के अत्यंत समीप (उप-अंत्य) होता है, जिससे एक अत्यंत छोटी और एक बहुत लंबी भुजा बनती है। ऐनाफेज में यह 'J'-आकार दर्शाता है।
4. अंत्यकेंद्री (Telocentric): सेंट्रोमियर बिल्कुल अंतिम सिरे पर स्थित होता है, जिससे केवल एक ही भुजा दिखाई देती है। ऐनाफेज में यह छड़ या 'i'-आकार दर्शाता है।
उदाहरण 6
निम्नलिखित विवरणों से संबंधित वैज्ञानिक, अंगक अथवा संरचना की पहचान कीजिए: (1) जर्मन वनस्पतिशास्त्री जिन्होंने 1838 में निष्कर्ष दिया कि सभी पौधे विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बने हैं। (2) जीवाणु कोशिका झिल्ली का अंतर्वलन जो श्वसन, स्रावण और भित्ति निर्माण में सहायक है। (3) पादप कोशिका की केंद्रीय रसधानी को घेरने वाली एकल चयनात्मक पारगम्य झिल्ली जो प्रवणता के विपरीत आयनों का परिवहन करती है। (4) जॉर्ज पैलाडे द्वारा खोजे गए झिल्लीरहित राइबोन्यूक्लियोप्रोटीन कण जो प्रोटीन संश्लेषण करते हैं। (5) गुणसूत्रबिंदु के दोनों ओर स्थित डिस्कनुमा प्रोटीन संरचनाएं जिनसे तुर्क तंतु जुड़ते हैं। [1 x 5 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
पहचान: [प्रत्येक पर 1 अंक]
1. मैथियास श्लाइडेन (Matthias Schleiden): जर्मन वनस्पतिशास्त्री जिन्होंने 1838 में अनेक पौधों का अध्ययन कर बताया कि पादप ऊतक कोशिकाओं से बने होते हैं और थियोडोर श्वान के साथ क्लासिकल कोशिका सिद्धांत प्रतिपादित किया।
2. मीसोसोम (Mesosome): जीवाणु प्लाज्मा झिल्ली के पुटिका, नलिका अथवा पटलिका रूपी अंतर्वलन जो श्वसन, डीएनए प्रतिकृतियन, स्रावण और पृष्ठीय क्षेत्रफल वृद्धि में सहायक होते हैं।
3. टोनोप्लास्ट (Tonoplast): पादप कोशिका की केंद्रीय रसधानी को आवृत करने वाली एकल चयनात्मक पारगम्य झिल्ली, जो सक्रिय पंपों द्वारा कोशिकाद्रव्य से आयनों को खींचकर स्फीति दाब बनाए रखती है।
4. राइबोसोम (पैलाडे कण): 1953 में जॉर्ज पैलाडे द्वारा इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी में खोजे गए झिल्लीरहित राइबोन्यूक्लियोप्रोटीन कण (70S व 80S), जो mRNA के अनुसार प्रोटीन संश्लेषण करते हैं।
5. काइनेटोकोर (Kinetochore): गुणसूत्रबिंदु (सेंट्रोमियर) पर उपस्थित तीन परतों वाली प्रोटीन डिस्क जो कोशिका विभाजन में तुर्क सूक्ष्मनालिकाओं को बांधती है और गुणसूत्रों का ध्रुवों की ओर संचलन कराती है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

माइटोकॉन्ड्रिया, हरितलवक तथा परऑक्सीसोम को अंतःझिल्लिका तंत्र का अंग मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यद्यपि ये झिल्लीयुक्त हैं, फिर भी माइटोकॉन्ड्रिया, हरितलवक और परऑक्सीसोम अंतःझिल्लिका तंत्र के भाग नहीं हैं; क्योंकि इनकी उत्पत्ति, एंजाइम और कार्य ER-गॉल्जी-लाइसोसोम पुटिका तंत्र के साथ समन्वित नहीं होते।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

पादप कोशिका भित्ति और मध्य पटलिका के रासायनिक घटकों को एक समान समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पादप कोशिका भित्ति मुख्य रूप से सेलूलोज़, हेमीसेलूलोज़ और पेक्टिन से बनी होती है। जबकि दो समीपवर्ती भित्तियों को जोड़ने वाली मध्य पटलिका विशेष रूप से कैल्शियम और मैग्नीशियम पेक्टेट से बनी होती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सीलिया के 9+2 विन्यास और तारककेंद्र के 9+0 विन्यास में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यूकैरियोटिक सीलिया और फ्लैजिला के अक्षसूत्र में 9 परिधीय द्विक और 2 केंद्रीय एकल सूक्ष्मनालिकाएं (9+2) होती हैं। जबकि तारककेंद्र और आधारी काय में 9 परिधीय त्रिक होते हैं और केंद्र में कोई सूक्ष्मनालिका नहीं होती (9+0 बैलगाड़ी पहिया)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

लाइसोसोम की तरह राइबोसोम को भी एकल झिल्ली से घिरा हुआ मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

राइबोसोम किसी भी झिल्ली से नहीं घिरे होते; ये पूर्णतः झिल्लीरहित राइबोन्यूक्लियोप्रोटीन (rRNA एवं प्रोटीन) कण हैं जो प्रोकैरियोट (70S) और यूकैरियोट (80S) दोनों में पाए जाते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि परिधीय (पेरिफेरल) प्रोटीन लिपिड द्विपरत के आर-पार फैली होती हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

परिधीय प्रोटीन लिपिड परत की बाहरी या भीतरी सतह पर ढीले रूप में स्थित होती हैं। केवल समाकल (इंटीग्रल) प्रोटीन ही लिपिड परत में आंशिक या पूर्णतः धंसी होती हैं, जिनमें ट्रांसमेमब्रेन प्रोटीन आर-पार फैली होती हैं।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

कोशिका: जीवन की इकाई (अध्याय 8) - कोशिकीय संरचना एवं अंगक तरल मोज़ेक मॉडल | अंतःझिल्लिका तंत्र | सूत्रकणिका एवं हरितलवक | केंद्रक एवं गुणसूत्र 1. तरल मोज़ेक कला एवं अंतःझिल्लिका Fluid Mosaic Bilayer (পর্দা দ্বিস্তর) CHANNEL फॉस्फोलिपिड द्विपरत + समाकल प्रोटीन सिंगर एवं निकोलसन मॉडल (1972) Endomembrane Trafficking Flow RER Ribosomes GOLGI Cis -> Trans LYSOSOME Hydrolases RER (प्रोटीन) + SER (लिपिड/स्टेरॉयड) गॉल्जी उपकरण: सिस व ट्रांस तल (ग्लाइकोसिलेशन) लाइसोसोम (अम्लीय हाइड्रोलेज) + टोनोप्लास्ट अंतःझिल्लिका प्रवाह तंत्र 2. सूत्रकणिका एवं हरितलवक Mitochondrion: Double Membrane माइटोकॉन्ड्रिया: क्रिस्टी + आधात्री + 70S ATP सिंथेस (F0-F1 कण / ऑक्सीसोम) अर्ध-स्वायत्त अंगक (Semi-autonomous) Chloroplast: Thylakoid Stacks क्लोरोप्लास्ट: ग्रेना थाइलेकोइड + पीठिका रूबिस्को (Rubisco) + वृत्ताकार dsDNA दोहरी झिल्ली एवं अंतःसहजीविता 3. केंद्रक एवं कोशिकीय कंकाल Nucleus & Chromosome Morphology Meta Sub-M Acro Telo केंद्रक छिद्र (परिकेंद्रकीय अवकाश) केंद्रिक (Nucleolus): rRNA निर्माण स्थल गुणसूत्र: मध्यकेंद्री, उप-मध्यकेंद्री... Cilia (9+2) vs Centriole (9+0) पक्ष्माभ/कशाभ: 9+2 अक्षसूत्र (Axoneme) तारककेंद्र: 9+0 त्रिक बैलगाड़ी पहिया काइनेटोकोर + सैटेलाइट गुणसूत्र

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
कोशिका सभी सजीव जीवों की मूलभूत संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है; एककोशिकीय जीव स्वतंत्र अस्तित्व एवं जीवन के सभी आवश्यक कार्य करने में सक्षम होते हैं।
मुख्य बिंदु 2
श्लाइडेन (1838) एवं श्वान (1839) ने कोशिका सिद्धांत प्रस्तुत किया तथा 1855 में रुडोल्फ विरचो ने 'Omnis cellula-e cellula' (सभी नई कोशिकाएं पूर्ववर्ती जीवित कोशिकाओं के विभाजन से बनती हैं) का नियम जोड़कर इसे पूर्ण किया। वायरस इसका प्रमुख अकोशिकीय अपवाद है।
मुख्य बिंदु 3
प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में झिल्लीयुक्त अंगक तथा सुगठित केंद्रक का अभाव होता है; इनका आनुवंशिक पदार्थ नग्न वृत्ताकार dsDNA युक्त केंद्रकाभ, प्लास्मिड, त्रिस्तरीय आवरण (ग्लाइकोकैलिक्स, पेप्टिडोग्लाइकन भित्ति, प्लाज्मा झिल्ली), मीसोसोम एवं 70S राइबोसोम से बना होता है।
मुख्य बिंदु 4
सिंगर एवं निकोलसन (1972) के तरल मोज़ेक मॉडल के अनुसार प्लाज्मा झिल्ली एक अर्ध-तरल (Quasi-fluid) फॉस्फोलिपिड द्विपरत है जिसमें समाकल एवं परिधीय प्रोटीन हिमखंडों की भांति तैरते हैं और पार्श्व विसरण दर्शाते हैं।
मुख्य बिंदु 5
पादप कोशिका भित्ति सेलूलोज़, हेमीसेलूलोज़, पेक्टिन एवं प्रोटीन से निर्मित होती है। समीपवर्ती कोशिकाओं की भित्तियों को कैल्शियम एवं मैग्नीशियम पेक्टेट से बनी मध्य पटलिका जोड़े रखती है तथा प्लाज्मोडेस्मेटा कोशिकाद्रव्यी संपर्क बनाते हैं।
मुख्य बिंदु 6
अंतःझिल्लिका तंत्र समन्वित कार्य करने वाले चार अंगकों से बना है: अंतःप्रद्रव्यी जालिका (RER प्रोटीन संश्लेषण, SER लिपिड/स्टेरॉयड संश्लेषण), गॉल्जी उपकरण (पैकेजिंग एवं ग्लाइकोसिलेशन), लाइसोसोम (अम्लीय हाइड्रोलेज द्वारा अंतःकोशिकीय पाचन) एवं रसधानी (टोनोप्लास्ट द्वारा स्फीति बनाए रखना)।
मुख्य बिंदु 7
माइटोकॉन्ड्रिया एवं हरितलवक अर्ध-स्वायत्त, दोहरी झिल्ली वाले अंगक हैं; दोनों में अपना वृत्ताकार dsDNA, 70S राइबोसोम तथा विखंडन की क्षमता होती है, जो अंतःसहजीविता सिद्धांत का समर्थन करती है।
मुख्य बिंदु 8
माइटोकॉन्ड्रिया की आंतरिक झिल्ली मुड़कर क्रिस्टी बनाती है जिस पर ऑक्सीसोम (F0-F1 एटीपी सिंथेस) ऑक्सीडेटिव फॉस्फोराइलेशन करते हैं; हरितलवक की पीठिका में थाइलेकोइड के ग्रेना होते हैं जो प्रकाश-फॉस्फोराइलेशन करते हैं।
मुख्य बिंदु 9
राइबोसोम झिल्लीरहित राइबो-न्यूक्लियोप्रोटीन कण हैं (प्रोकैरियोट में 70S तथा यूकैरियोटिक कोशिकाद्रव्य में 80S), जिनकी खोज जॉर्ज पैलाडे ने की थी।
मुख्य बिंदु 10
कोशिकीय कंकाल सूक्ष्मनालिकाओं (ट्यूबुलिन), सूक्ष्मतंतुओं (एक्टिन) एवं मध्यवर्ती तंतुओं से बना होता है। सीलिया व फ्लैजिला में 9+2 अक्षसूत्र तथा तारककेंद्र में 9+0 त्रिक बैलगाड़ी पहिया विन्यास पाया जाता है।
मुख्य बिंदु 11
यूकैरियोटिक केंद्रक दोहरी केंद्रक झिल्ली, केंद्रक छिद्रों, केंद्रक द्रव्य, केंद्रिक (rRNA निर्माण स्थल) तथा क्रोमैटिन जालिका से निर्मित होता है।
मुख्य बिंदु 12
गुणसूत्रबिंदु (सेंट्रोमियर) की स्थिति के आधार पर गुणसूत्र चार प्रकार के होते हैं: मध्यकेंद्री (मध्य में, V-आकार), उप-मध्यकेंद्री (उप-मध्य, L-आकार), अग्रकेंद्री (उप-अंत्य, J-आकार) तथा अंत्यकेंद्री (प्रशांत/अंत्य, i-आकार)।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
विषाणुओं (वायरस) को क्लासिकल कोशिका सिद्धांत (Cell Theory) का अपवाद क्यों माना जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: वायरस कोशिका सिद्धांत के अपवाद हैं क्योंकि: (1) वे अकोशिकीय (Acellular) होते हैं; उनमें कोशिकाद्रव्य, कोशिका झिल्ली या उपापचयी अंगक नहीं होते, केवल प्रोटीन आवरण के भीतर डीएनए या आरएनए होता है। (2) पोषी कोशिका के बाहर वे पूर्णतः निष्क्रिय एवं निर्जीव कणों की भांति रहते हैं। (3) वे किसी पूर्ववर्ती वायरस कोशिका के विभाजन से नहीं बनते, बल्कि पोषी कोशिका की मशीनरी का उपयोग करके नए घटकों के संयोजन द्वारा स्व-संयोजित होते हैं।
2
फॉस्फोलिपिड द्विपरत की 'अर्ध-तरल' अवस्था जंतु कोशिका को फटने से बचाते हुए कोशिकाद्रव्य विभाजन व एंडोसाइटोसिस में कैसे मदद करती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अर्ध-तरल प्रकृति के कारण फॉस्फोलिपिड अणु अपनी ही परत में आसानी से गति कर सकते हैं और झिल्ली को लचीलापन प्रदान करते हैं। जंतु कोशिकाद्रव्य विभाजन में एक्टिन-मायोसिन वलय झिल्ली को भीतर खींचकर खांच बनाता है, जो बिना टूटे आपस में जुड़कर दो कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है। एंडोसाइटोसिस में जब झिल्ली मुड़कर पुटिका बनाती है, तो जलविरागी पूंछें तुरंत पुनर्व्यवस्थित होकर स्वतः सील हो जाती हैं और कोशिका का आंतरिक द्रव्य लीक नहीं होता।
3
लाइसोसोम को 'आत्मघाती थैली' क्यों कहा जाता है, और सामान्य अवस्था में लाइसोसोम के एंजाइम कोशिका को नष्ट क्यों नहीं करते?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: यदि कोशिका के सभी लाइसोसोम एक साथ फट जाएं (ऑटोलाइसिस), तो उनके अम्लीय हाइड्रोलेज पूरी कोशिका के प्रोटीन, लिपिड व न्यूक्लिक अम्लों को पचाकर कोशिका को नष्ट कर देते हैं, इसलिए इन्हें आत्मघाती थैली कहते हैं। सामान्य अवस्था में कोशिका दो कारणों से सुरक्षित रहती है: (1) लाइसोसोम की झिल्ली मोटी होती है और इसकी भीतरी सतह अत्यधिक ग्लाइकोसिलेटेड होती है जो एंजाइमों के हमले को रोकती है। (2) ये एंजाइम केवल अम्लीय माध्यम (pH 4.5–5.0) में सक्रिय होते हैं; यदि कोई एंजाइम सामान्य उदासीन कोशिकाद्रव्य (pH 7.2) में लीक भी हो जाए, तो वह तुरंत निष्क्रिय हो जाता है।
4
अंतःसहजीविता सिद्धांत (Endosymbiotic Theory) क्या है, और माइटोकॉन्ड्रिया व हरितलवक की संरचना इस सिद्धांत का क्या प्रमाण देती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: लिन मार्गुलिस द्वारा प्रतिपादित अंतःसहजीविता सिद्धांत के अनुसार, प्राचीन अनॉक्सी पूर्वज यूकैरियोटिक कोशिकाओं द्वारा मुक्तजीवी वायवीय जीवाणुओं तथा प्रकाश-संश्लेषी सायनोजीवाणुओं के अंतर्ग्रहण और सहजीविता से क्रमशः माइटोकॉन्ड्रिया और हरितलवक की उत्पत्ति हुई। प्रमाण: (1) दोनों दोहरी झिल्ली से घिरे हैं जिनकी आंतरिक झिल्ली जीवाणु झिल्ली जैसी होती है। (2) दोनों में जीवाणुओं के समान नग्न वृत्ताकार dsDNA होता है। (3) दोनों में 70S राइबोसोम होते हैं जो जीवाणुरोधी एंटीबायोटिक (क्लोरैम्फेनिकॉल) से अवरुद्ध होते हैं। (4) दोनों कोशिका के भीतर जीवाणुओं की तरह द्विविखंडन द्वारा विभाजित होते हैं।
5
समसूत्री पश्चावस्था में सेंट्रोमियर और काइनेटोकोर कैसे कार्य करते हैं, और सेंट्रोमियर रहित गुणसूत्र खंड का क्या भविष्य होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सेंट्रोमियर गुणसूत्र का प्राथमिक संकीर्णन है जो दोनों अर्धगुणसूत्रों को जोड़े रखता है। काइनेटोकोर सेंट्रोमियर के हेटरोक्रोमैटिन पर स्थित त्रिस्तरीय प्रोटीन डिस्क है जिससे तुर्क तंतु जुड़ते हैं। पश्चावस्था में काइनेटोकोर के मोटर प्रोटीन सूक्ष्मनालिकाओं को विघटित करते हुए अर्धगुणसूत्रों को विपरीत ध्रुवों की ओर खींचते हैं। यदि किसी गुणसूत्र खंड में सेंट्रोमियर न हो (असेंट्रिक खंड), तो उस पर काइनेटोकोर नहीं बन पाता, वह तुर्क तंतुओं से नहीं जुड़ पाता और कोशिका विभाजन के समय कोशिकाद्रव्य में छूटकर नष्ट हो जाता है।
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