Follow Us
माध्यम चुनें / Select Medium:
Eng (English) Beng (বাংলা) Hindi (हिन्दी)
WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 14
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

पाचन एवं अवशोषण

पाचन एवं अवशोषण पश्चिम बंगाल बोर्ड कक्षा 11 जीव विज्ञान के मानव कार्यिकी खंड का आधारभूत अध्याय है। इस अध्याय में आहार नाल की चार संकेंद्री परतों की औतिकी, मानव दंत सूत्र, यकृत व अग्न्याशय का वाहिनी तंत्र, ग्रहणी में एंटेरोकाइनेज सक्रियण कैस्केड, कार्बोहाइड्रेट-प्रोटीन-वसा का रासायनिक पाचन, मिसेल से काइलोमाइक्रोन होकर लैक्टियल में वसा अवशोषण, पाचन का अंतःस्रावी नियंत्रण तथा प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण (क्वाशिओरकोर बनाम मरास्मस) का संपूर्ण प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया गया है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पाचन एवं अवशोषण की कार्यिकी को समझना मानव जीवन के लिए अनिवार्य है क्योंकि यह ग्रहण किए गए बाह्य पोषक पदार्थों को कोशिकीय श्वसन एवं ऊर्जा उत्पादन हेतु उपयुक्त सरल अणुओं में रूपांतरित करता है। यह ज्ञान नैदानिक जठरांत्र विज्ञान (Gastroenterology), आहार विज्ञान, औषधि विज्ञान तथा चयापचयी रोगों के उपचार की आधारशिला है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: आहार नाल की स्थूल संरचना...
2 मॉड्यूल 2: मानव दंत विन्यास, मुखगुह...
3 मॉड्यूल 3: प्रमुख सहयोगी पाचक ग्रंथ...
4 मॉड्यूल 4: पाचन की जैव-रासायनिक क्र...
5 मॉड्यूल 5: अवशोषण की कार्यिकी एवं प...
6 मॉड्यूल 6: जठर-आंत्रीय हार्मोन, कैल...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: आहार नाल की स्थूल संरचना एवं औतिकी (Histology)

मानव पाचन तंत्र एक लंबी (लगभग 8 से 9 मीटर) आहार नाल (Alimentary canal) और उससे जुड़ी सहायक पाचक ग्रंथियों (Digestive glands) से मिलकर बना है। ग्रसिका के मध्य भाग से लेकर मलाशय तक आहार नाल की अनुप्रस्थ काट का अध्ययन करने पर भित्ति में बाहर से भीतर की ओर चार स्पष्ट संकेंद्री ऊतक स्तर दिखाई देते हैं।

स्तर (बाहर से भीतर) औतिकी संघटन विशिष्ट संरचना एवं कार्यिकी महत्व
1. सिरोसा (Serosa) सबसे बाहरी सुरक्षात्मक स्तर। यह एक पतली सरल शल्की मेसोथीलियम (अंतरंग पेरिटोनियम) और कुछ शिथिल संयोजी ऊतक से निर्मित होती है। क्रमाकुंचन गतियों के समय घर्षण को कम करता है। ग्रसिका में सिरोसा के स्थान पर रेशेदार 'एडवेंटिशिया' पाया जाता है।
2. मस्क्युलरिस (पेशी स्तर) अनैच्छिक चिकनी पेशियों से बना होता है। यह बाहर अनुदैर्ध्य पेशियों और भीतर वर्तुल पेशियों में व्यवस्थित होता है (आमाशय में एक अतिरिक्त भीतरी तिर्यक पेशी स्तर होता है)। दोनों पेशी स्तरों के बीच ऑवरबैक तंत्रिका जालक (Auerbach's / Myenteric plexus) स्थित होता है, जो आहार नाल की क्रमाकुंचन (Peristalsis) गति को नियंत्रित करता है।
3. सबम्यूकोसा (अधःश्लेष्मिका) रुधिर वाहिकाओं, लसिका वाहिनियों तथा तंत्रिकाओं से युक्त शिथिल संयोजी ऊतक का स्तर। इसमें मीसनर जालक (Meissner's plexus) होता है जो श्लेष्मीय स्राव को नियंत्रित करता है। सबसे महत्वपूर्ण: ग्रहणी की सबम्यूकोसा में ब्रूनर ग्रंथियां (Brunner's glands) पाई जाती हैं, जो क्षारीय श्लेष्मा स्रावित कर आमाशयी अम्ल को उदासीन करती हैं।
4. म्यूकोसा (श्लेष्मिका) सबसे भीतरी स्तर जो ल्यूमेन के संपर्क में रहता है। यह स्तंभाकार उपकला, लैमिना प्रोप्रिया और मस्क्युलरिस म्यूकोसी से मिलकर बना होता है। आमाशय में यह अनियत वलय रूगी (Rugae) बनाती है और छोटी आंत में अंगुलीनुमा प्रवर्ध रसांकुर (Villi) तथा ब्रश बॉर्डर सूक्ष्मांकुर बनाती है (अवशोषण तल 600 गुना बढ़ जाता है)। इसमें श्लेष्मा स्रावी गॉब्लेट कोशिकाएं तथा रोगाणुरोधी पैनेथ कोशिकाएं होती हैं।

आंत्र रसांकुर (Villus) की सूक्ष्म संरचना

प्रत्येक रसांकुर (लंबाई 0.5–1 मिमी) स्तंभाकार आंत्र कोशिकाओं (एंटेरोसाइट्स) से ढका होता है जिनके शीर्ष पर लगभग 3000 सूक्ष्मांकुर (Microvilli) होते हैं। रसांकुर के केंद्र में एक चौड़ी केंद्रीय लसिका वाहिनी होती है जिसे लैक्टियल (Lacteal) कहते हैं, जो रक्त केशिकाओं के जाल से घिरी रहती है। दो रसांकुरों के आधार पर स्थित नलिकाकार गर्तों को लीबरकुन की प्रगुहिकाएं (Crypts of Lieberkühn) कहते हैं। इनके आधार पर स्थित पैनेथ कोशिकाएं (Paneth cells) रोगाणुरोधी एंजाइम लाइसोजाइम तथा डिफेंसिन स्रावित कर आंत्र के सूक्ष्मजीव संतुलन को बनाए रखती हैं।

मॉड्यूल 2: मानव दंत विन्यास, मुखगुहा एवं लार ग्रंथियां

मुखगुहा में भोजन का यांत्रिक चर्वण एवं रासायनिक पाचन आरंभ होता है। स्तनधारी होने के नाते मानव के दंत विन्यास में तीन प्रमुख विशेषताएं पाई जाती हैं: गर्तदंती (Thecodont), द्विवारदंती (Diphyodont) तथा विषमदंती (Heterodont)।

1. गर्तदंती (Thecodont)

प्रत्येक दांत जबड़े की अस्थियों (मैक्सिला व मैंडिबल) के गहरे गर्तों (एल्वियोली) में मसूड़ों और पीरियोडॉन्टल लिगामेंट द्वारा मजबूती से धंसा रहता है।

2. द्विवारदंती (Diphyodont)

जीवन काल में दांतों के दो समूह निकलते हैं: बाल्यावस्था में अस्थायी दूध के दांत (20 दांत) और उनके स्थान पर निकलने वाले स्थायी दांत (32 दांत)।

3. विषमदंती (Heterodont)

दांत संरचना व कार्य के आधार पर 4 भिन्न प्रकारों में विभाजित होते हैं: कृंतक (I - काटना), रदनक (C - चीरना), अग्रचर्वणक (PM - चबाना), और चर्वणक (M - पीसना)।

अवस्था दंत सूत्र (ऊपरी अर्ध जबड़ा / निचला अर्ध जबड़ा) कुल संख्या महत्वपूर्ण बिंदु
वयस्क मानव $\frac{2.1.2.3}{2.1.2.3} \times 2$ 32 दांत 8 कृंतक, 4 रदनक, 8 अग्रचर्वणक तथा 12 चर्वणक (4 अक्ल दाढ़ सहित) उपस्थित।
बालक (दूध के दांत) $\frac{2.1.0.2}{2.1.0.2} \times 2$ 20 दांत बच्चों में अग्रचर्वणक (Premolars) पूरी तरह अनुपस्थित होते हैं; तीसरा चर्वणक भी नहीं होता। मानव के 12 दांत एकवारदंती (Monophyodont) होते हैं।

दांत की संरचना एवं शरीर का सबसे कठोर पदार्थ

दांत के तीन भाग होते हैं: शिखर (Crown), ग्रीवा (Neck), तथा मूल (Root)। दांत के शिखर पर स्थित इनेमल (Enamel) मानव शरीर का सबसे कठोर निर्जीव ऊतक है (96% अकार्बनिक हाइड्रॉक्सीएपेटाइट क्रिस्टल), जो भ्रूणीय एक्टोडर्म की एमीलोब्लास्ट कोशिकाओं द्वारा स्रावित होता है। इनेमल के नीचे सजीव डेंटिन (Dentin) होता है, जो ओडोंटोब्लास्ट कोशिकाओं द्वारा स्रावित होकर केंद्रीय तंत्रिका-युक्त मज्जा गुहा (Pulp cavity) को घेरता है।

तीन जोड़ी लार ग्रंथियां

  • पैरोटिड (कर्णपूर्व) ग्रंथियां: सबसे बड़ी जोड़ी, कान के नीचे स्थित। इसका स्राव स्टेनसन की नलिका (Stensen's duct) द्वारा ऊपरी दूसरे चर्वणक के सामने खुलता है। (मम्प्स वायरस संक्रमण से इसमें सूजन आ जाती है)।
  • सबमैंडिबुलर / सबमैक्सिलरी ग्रंथियां: निचले जबड़े के कोण पर स्थित। इसका स्राव सबसे लंबी नलिका—व्हार्टन की नलिका (Wharton's duct) द्वारा जीभ के नीचे खुलता है।
  • सबलिंगुअल ग्रंथियां: सबसे छोटी जोड़ी, जीभ के नीचे फर्श पर स्थित। इसका स्राव अनेक छोटी रिविनस की नलिकाओं (Ducts of Rivinus) द्वारा खुलता है।
  • लार का संघटन: प्रतिदिन 1.0 से 1.5 लीटर लार स्रावित होती है ($\text{pH } 6.8$)। इसमें 99.5% जल, विद्युत-अपघट्य ($\text{Na}^+, \text{K}^+, \text{Cl}^-, \text{HCO}_3^-$), लार एमाइलेज (टायलिन, $\text{Cl}^-$ द्वारा सक्रिय), जीवाणुरोधी लाइसोजाइम, $\text{IgA}$ एंटीबॉडी तथा म्यूसिन होता है।

मॉड्यूल 3: प्रमुख सहयोगी पाचक ग्रंथियां: यकृत, पित्ताशय एवं अग्न्याशय

पाचन तंत्र से जुड़ी ग्रंथियां भोजन को सीधे मार्ग प्रदान नहीं करतीं, बल्कि वे रासायनिक पाचन हेतु आवश्यक बफर, पायसीकारक तथा शक्तिशाली एंजाइम ग्रहणी में उड़ेलती हैं।

1. यकृत (Liver) एवं पित्ताशय

वयस्क मनुष्य में यकृत शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि तथा आंतरिक अंग है (भार लगभग 1.2 से 1.5 किग्रा)। यह मध्यपट (डायफ्राम) के ठीक नीचे उदर गुहा के ऊपरी दाहिने भाग में स्थित होता है और फाल्सीफॉर्म लिगामेंट द्वारा दो मुख्य पालियों में बंटा होता है।

  • संरचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई: षट्कोणीय यकृत पालिकाएं (Hepatic lobules), जो केंद्रीय शिरा के चारों ओर रज्जु रूप में सजी हेपेटोसाइट्स से बनी होती हैं। प्रत्येक पालिका एक पतली संयोजी ऊतक की झिल्ली से ढकी होती है जिसे ग्लिसन कैप्सूल (Glisson's capsule) कहते हैं।
  • साइनुसॉइड एवं कुप्फर कोशिकाएं: यकृत रज्जुओं के बीच रक्त नलिकाओं में भक्षकाणुक कुप्फर कोशिकाएं (Kupffer cells) पाई जाती हैं, जो रुधिर से रोगाणुओं तथा मृत आरबीसी का भक्षण करती हैं।
  • पित्त स्राव एवं भंडारण: यकृत कोशिकाएं प्रतिदिन 500 से 1000 मिली पित्त ($\text{pH } 7.6-8.6$) बनाती हैं, जो नाशपाती के आकार के पित्ताशय (Gallbladder) में संग्रहित होकर लगभग 10 गुना तक सांद्रित होता है।
  • अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य: पित्त रस में कोई भी पाचक एंजाइम नहीं होता। इसमें पित्त लवण (सोडियम ग्लाइकोकोलेट, सोडियम टौरोकोलेट), पित्त वर्णक (बिलीरुबिन, बिलीवर्डीन), कोलेस्ट्रॉल तथा फॉस्फोलिपिड्स (लेसिथिन) होते हैं। इसका मुख्य कार्य वसा का इमल्सीकरण (पायसीकरण) तथा माध्यम को क्षारीय बनाना है।

यकृत, पित्ताशय एवं अग्न्याशय का वाहिनी तंत्र

परीक्षा की दृष्टि से नलिकाओं का यह संगम क्रम अति महत्वपूर्ण है:

  1. दाहिनी व बायीं यकृत वाहिनियां मिलकर बनाती हैं $\to$ सामान्य यकृत वाहिनी (Common Hepatic Duct)।
  2. सामान्य यकृत वाहिनी और पित्ताशय की सिस्टिक वाहिनी (Cystic Duct) मिलकर बनाती हैं $\to$ सामान्य पित्त वाहिनी (Common Bile Duct / Ductus Choledochus)।
  3. सामान्य पित्त वाहिनी मुख्य अग्न्याशयी वाहिनी (विर्संग की नलिका / Duct of Wirsung) से मिलकर बनाती है $\to$ यकृत-अग्न्याशयी एम्पुला (Ampulla of Vater)।
  4. यह एम्पुला C-आकार की ग्रहणी में खुलता है, जिसका निकास एक चिकनी पेशी की वलय ओडी की अवरोधिनी (Sphincter of Oddi) द्वारा नियंत्रित होता है।

2. अग्न्याशय (Pancreas - मिश्रित ग्रंथि)

ग्रहणी की दोनों भुजाओं के बीच स्थित अग्न्याशय एक संयुक्त विषमस्त्रावी (Heterocrine) ग्रंथि है:

  • बहिःस्रावी भाग (99% भाग): एसिनाई से बना होता है जो प्रतिदिन 1–1.5 लीटर क्षारीय अग्न्याशयी रस ($\text{pH } 7.8-8.2$, प्रचुर $\text{HCO}_3^-$ युक्त) स्रावित करता है। इसमें निष्क्रिय प्रोएंजाइम (ट्रिप्सिनोजेन, काइमोट्रिप्सिनोजेन, प्रोकार्बोक्सीपेप्टिडेस) तथा सक्रिय एंजाइम (अग्न्याशयी एमाइलेज, अग्न्याशयी लाइपेज/स्टीएप्सिन, न्यूक्लिएज) होते हैं।
  • अंतःस्रावी भाग (1% भाग): लैंगरहेंस की द्वीपिकाओं से निर्मित होता है, जिसमें $\alpha$-कोशिकाएं (ग्लूकागॉन), $\beta$-कोशिकाएं (इंसुलिन) तथा $\delta$-कोशिकाएं (सोमेटोस्टैटिन) रुधिर शर्करा का नियमन करती हैं।

मॉड्यूल 4: पाचन की जैव-रासायनिक क्रियाएं एवं एंजाइम कैस्केड

पाचन वह जैव-रासायनिक व यांत्रिक प्रक्रिया है जिसमें जटिल, अघुलनशील पोषक पदार्थों को विभिन्न जल-अपघटनी एंजाइमों (हाइड्रोलेसेज) की सहायता से सरल, घुलनशील तथा अवशोषण-योग्य अणुओं में तोड़ा जाता है।

चरण 1: मुखगुहा में पाचन (Oral Digestion)

चर्वण द्वारा भोजन लार के साथ मिलकर एक चिकना निवाला यानी बोलस (Bolus) बनाता है। लार एमाइलेज (टायलिन) $\text{pH } 6.8$ पर स्टार्च का पाचन प्रारंभ करता है:

$$\text{स्टार्च (Starch)} + n\text{H}_2\text{O} \xrightarrow[\text{pH } 6.8, \text{Cl}^-]{\text{टायलिन}} \text{माल्टोज़} + \text{आइसोमाल्टोज़} + \alpha\text{-डेक्सट्रिन}$$

कुल ग्रहण किए गए स्टार्च का लगभग 30% भाग मुखगुहा में पचता है। मुखगुहा में प्रोटीन या वसा का कोई पाचन नहीं होता। बोलस निगलने (Deglutition) के बाद ग्रसिका के क्रमाकुंचन द्वारा आमाशय में पहुंचता है।

चरण 2: आमाशय में पाचन (Gastric Digestion)

भोजन आमाशय में 4–5 घंटे तक रुकता है और अम्लीय जठर रस ($\text{pH } 1.5 - 2.5$) के साथ मंथन गति द्वारा घुलकर अर्ध-तरल लुगदी यानी काइम (Chyme) में बदल जाता है। जठर ग्रंथियों में 3 मुख्य कोशिकाएं होती हैं:

  • श्लेष्मा ग्रीवा कोशिकाएं: क्षारीय श्लेष्मा स्रावित कर आमाशय भित्ति को $\text{HCl}$ से सुरक्षित रखती हैं।
  • पेप्टिक / मुख्य (Chief) कोशिकाएं: निष्क्रिय प्रोएंजाइम पेप्सिनोजेन तथा प्रोरैनिन स्रावित करती हैं।
  • ऑक्सिन्टिक / पैराइटल कोशिकाएं: सांद्र $\text{HCl}$ तथा कैसल नैज कारक (विटामिन $\text{B}_{12}$ के अवशोषण हेतु आवश्यक) स्रावित करती हैं।
$$\text{पेप्सिनोजेन (निष्क्रिय)} \xrightarrow{\text{HCl / पेप्सिन (स्वतःउत्प्रेरण)}} \text{पेप्सिन (सक्रिय)}$$
$$\text{प्रोटीन} \xrightarrow[\text{pH } 1.8]{\text{पेप्सिन}} \text{प्रोटिओज} + \text{पेप्टोन} + \text{पॉलीपेप्टाइड}$$
$$\text{प्रोरैनिन} \xrightarrow{\text{HCl}} \text{रैनिन}; \quad \text{केसिन (दूध प्रोटीन)} + \text{Ca}^{2+} \xrightarrow{\text{रैनिन}} \text{कैल्शियम पैराकेसीनेट (दही)} \xrightarrow{\text{पेप्सिन}} \text{पेप्टोन}$$

शिशुओं के जठर रस में रैनिन एंजाइम दूध को जमाकर थक्का बनाता है ताकि पेप्सिन उसका पाचन कर सके। वयस्कों में रैनिन नहीं पाया जाता।

चरण 3: छोटी आंत में पाचन (अग्न्याशयी रस एवं पित्त की अभिक्रियाएं)

अम्लीय काइम ग्रहणी में प्रवेश करने पर पित्त व अग्न्याशयी रस को प्रेरित करता है। इस चरण का मुख्य स्विच आंत्र म्यूकोसा का एंजाइम एंटेरोकाइनेज (Enterokinase) है:

$$\text{ट्रिप्सिनोजेन} \xrightarrow{\text{एंटेरोकाइनेज}} \text{ट्रिप्सिन (सक्रिय)}$$
$$\text{काइमोट्रिप्सिनोजेन, प्रोकार्बोक्सीपेप्टिडेस} \xrightarrow{\text{ट्रिप्सिन}} \text{काइमोट्रिप्सिन, कार्बोक्सीपेप्टिडेस}$$
$$\text{प्रोटीन, पेप्टोन, प्रोटिओज} \xrightarrow[\text{कार्बोक्सीपेप्टिडेस}]{\text{ट्रिप्सिन, काइमोट्रिप्सिन}} \text{डाइपेप्टाइड}$$
$$\text{शेष स्टार्च (70\%)} \xrightarrow[\text{pH } 7.8-8.2]{\text{अग्न्याशयी एमाइलेज (एमाइलॉप्सिन)}} \text{माल्टोज़} + \text{आइसोमाल्टोज़}$$
$$\text{पायसीकृत वसा} \xrightarrow{\text{अग्न्याशयी लाइपेज (स्टीएप्सिन)}} \text{डाइग्लिसराइड} \to \text{मोनोग्लिसराइड} + \text{वसीय अम्ल}$$
$$\text{DNA / RNA} \xrightarrow{\text{अग्न्याशयी न्यूक्लिएज}} \text{न्यूक्लियोटाइड}$$
चरण 4: आंत्र रस (सक्कस एंटेरिकस) द्वारा अंतिम पाचन

लीबरकुन की प्रगुहिकाओं द्वारा स्रावित सक्कस एंटेरिकस ब्रश बॉर्डर पर अंतिम पाचन पूरा करता है:

$$\text{डाइपेप्टाइड} \xrightarrow{\text{डाइपेप्टिडेस}} 2\text{ अमीनो अम्ल}$$
$$\text{माल्टोज़} \xrightarrow{\text{माल्टेज}} 2\text{ ग्लूकोज}$$
$$\text{लैक्टोज़} \xrightarrow{\text{लैक्टेज}} \text{ग्लूकोज} + \text{गैलेक्टोज़}$$
$$\text{सुक्रोज़} \xrightarrow{\text{सुक्रेज}} \text{ग्लूकोज} + \text{फ्रुक्टोज़}$$
$$\text{न्यूक्लियोटाइड} \xrightarrow{\text{न्यूक्लियोटाइडेस}} \text{न्यूक्लियोसाइड} + \text{P}_i$$
$$\text{न्यूक्लियोसाइड} \xrightarrow{\text{न्यूक्लियोसाइडेस}} \text{नाइट्रोजनी क्षारक} + \text{पेन्टोज़}$$

छोटी आंत में पूर्ण पचित क्षारीय सफेद दूधिया इमल्शन को काइल (Chyle) कहा जाता है।

मॉड्यूल 5: अवशोषण की कार्यिकी एवं परिवहन क्रियाविधि

अवशोषण वह जैव-भौतिकीय प्रक्रिया है जिसके द्वारा पाचन के अंतिम उत्पाद आहार नाल की गुहा से आंत्र उपकला को पार करके रुधिर या लसिका प्रवाह में प्रवेश करते हैं। विभिन्न पोषक तत्वों के भौतिक-रासायनिक गुणों के आधार पर भिन्न-भिन्न अवशोषण तंत्र कार्य करते हैं।

परिवहन विधि ऊर्जा एवं वाहक की आवश्यकता अवशोषित होने वाले प्रमुख पोषक तत्व
1. सरल विसरण (Simple Diffusion) उच्च सांद्रता से निम्न सांद्रता की ओर निष्क्रिय गमन; किसी वाहक या ऊर्जा की आवश्यकता नहीं। अल्प मात्रा में ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, जल तथा क्लोराइड आयन ($\text{Cl}^-$)।
2. सुसाध्य परिवहन (Facilitated Transport) सांद्रता प्रवणता के अनुकूल वाहक प्रोटीन (जैसे GLUT-5) द्वारा निष्क्रिय परिवहन; ATP आवश्यक नहीं। फ्रुक्टोज़ (Fructose) तथा कुछ अमीनो अम्ल।
3. सक्रिय परिवहन (Active Transport) सांद्रता प्रवणता के विरुद्ध ऊर्जा (ATP) खर्च करके सोडियम सह-परिवहन (Symport)। ग्लूकोज, गैलेक्टोज़ (SGLT-1 द्वारा), अधिकांश L-अमीनो अम्ल तथा $\text{Na}^+$ आयन।

वसा (लिपिड) अवशोषण के 5 विशिष्ट चरण

वसीय अम्ल तथा मोनोग्लिसराइड जल में अघुलनशील होने के कारण सीधे रुधिर केशिकाओं में विसरित नहीं हो सकते। इनका अवशोषण निम्न विशेष चरणों में होता है:

  1. मिसेल निर्माण (Micelle Formation): आंत्र गुहा में अघुलनशील वसीय अम्ल और मोनोग्लिसराइड पित्त लवणों तथा लेसिथिन के साथ मिलकर सूक्ष्म गोलाकार बूंदें बनाते हैं जिन्हें मिसेल (व्यास 4–7 nm) कहते हैं। इनका बाहरी भाग जलरागी होता है।
  2. उपकला में प्रवेश: मिसेल आंत्र कोशिकाओं के ब्रश बॉर्डर पर पहुंचते हैं, जहां से लिपिड सरल विसरण द्वारा उपकला कोशिका के भीतर प्रवेश कर जाते हैं (पित्त लवण गुहा में ही रहकर आगे क्षुद्रांत्र में अवशोषित होते हैं)।
  3. ट्राइग्लिसराइड पुनर्संश्लेषण: आंत्र कोशिका की चिकनी अंतःप्रद्रव्यी जालिका (SER) में वसीय अम्ल और ग्लिसरॉल पुनः मिलकर ट्राइग्लिसराइड बना लेते हैं।
  4. काइलोमाइक्रोन का निर्माण: गॉल्जी उपकरण में इन ट्राइग्लिसराइड्स के ऊपर फॉस्फोलिपिड, कोलेस्ट्रॉल तथा एक विशेष प्रोटीन आवरण (ApoB-48) चढ़ जाता है जिससे जल-घुलनशील काइलोमाइक्रोन (Chylomicron) कण बन जाते हैं (व्यास 100–500 nm)।
  5. लैक्टियल में प्रवेश: काइलोमाइक्रोन एक्सोसाइटोसिस द्वारा कोशिका से बाहर निकलते हैं। रुधिर केशिकाओं के संकरे छिद्रों को पार न कर पाने के कारण ये रसांकुर की चौड़ी केंद्रीय लसिका वाहिनी यानी लैक्टियल (Lacteal) में प्रवेश कर जाते हैं। वहां से वक्षीय लसिका वाहिनी द्वारा यह रुधिर परिसंचरण में पहुंचता है।

आहार नाल के विभिन्न अंगों में अवशोषण

  • मुखगुहा: जीभ के नीचे रखी जाने वाली कुछ लिपिड-घुलनशील औषधियां (जैसे सबलिंगुअल नाइट्रोग्लिसरीन) सीधे रक्त केशिकाओं में अवशोषित होती हैं।
  • आमाशय: जल, सरल शर्कराएं, एल्कोहॉल (शराब का तीव्र अवशोषण) तथा एस्पिरिन जैसी औषधियां।
  • छोटी आंत: पोषक तत्वों के अवशोषण का मुख्य अंग (लगभग 90% अवशोषण यहीं होता है)। ग्रहणी व मध्यांत्र में शर्करा, अमीनो अम्ल व वसा; क्षुद्रांत्र (Ileum) में विटामिन $\text{B}_{12}$ तथा पित्त लवण।
  • बड़ी आंत: जल, खनिज लवण तथा आंत्र जीवाणुओं द्वारा संश्लेषित विटामिन K व $\text{B}_{12}$ का अवशोषण।

मॉड्यूल 6: जठर-आंत्रीय हार्मोन, कैलोरी मान एवं पाचक विकार

आहार नाल के कार्यों का नियमन तंत्रिका तंत्र के अतिरिक्त म्यूकोसा में बिखरी एंटेरोएंडोक्राइन कोशिकाओं द्वारा स्रावित पेप्टाइड हार्मोनों द्वारा अत्यंत सटीकता से किया जाता है।

हार्मोन स्रावक कोशिका व स्थल उद्दीपन कारक कार्यिकीय प्रभाव
गैस्ट्रिन (Gastrin) आमाशय के जठरनिर्गमी भाग की G-कोशिकाएं आमाशय का फैलना, पेप्टाइड तथा वेगस तंत्रिका पैराइटल कोशिकाओं से $\text{HCl}$ तथा मुख्य कोशिकाओं से पेप्सिनोजेन स्राव बढ़ाता है; आमाशय की गतिशीलता बढ़ाता है।
सीक्रेटिन (Secretin) ग्रहणी म्यूकोसा की S-कोशिकाएं अम्लीय काइम ($\text{pH} < 4.5$) का ग्रहणी में प्रवेश अग्न्याशय से जल तथा बाइकार्बोनेट ($\text{HCO}_3^-$) का प्रचुर स्राव करवाकर अम्ल को शांत करता है; आमाशय स्राव घटाता है। (खोजा गया प्रथम हार्मोन, 1902)।
कोलसिस्टोकाइनिन (CCK-PZ) ग्रहणी व मध्यांत्र की I-कोशिकाएं काइम में वसीय अम्ल व अमीनो अम्लों की उपस्थिति पित्ताशय में संकुचन कराकर पित्त निकलवाता है, अग्न्याशय से पाचक एंजाइम स्रावित कराता है और ओडी की अवरोधिनी को शिथिल करता है।
गैस्ट्रिक इन्हीबिटरी पेप्टाइड (GIP) ग्रहणी की K-कोशिकाएं ग्रहणी में ग्लूकोज व वसा आमाशय के अम्ल स्राव व गति को रोकता है (एंटेरोगैस्ट्रोन प्रभाव) तथा अग्न्याशय से इंसुलिन स्राव को प्रेरित करता है।

भोजन के पोषक तत्वों के कैलोरी मान

  • स्थूल कैलोरी मान (Gross Calorific Value - बॉम्ब कैलोरीमीटर में दहन): कार्बोहाइड्रेट = 4.1 kcal/g; प्रोटीन = 5.65 kcal/g; वसा = 9.45 kcal/g।
  • कार्यिकीय मान (Physiological Fuel Value - मानव शरीर में वास्तविक ऊर्जा): कार्बोहाइड्रेट = 4.0 kcal/g; प्रोटीन = 4.0 kcal/g; वसा = 9.0 kcal/g।
  • कारण: प्रोटीन के अपूर्ण ऑक्सीकरण के कारण यूरिया बनता है जो उत्सर्जित हो जाता है, अतः प्रोटीन का कार्यिकीय मान स्थूल मान से कम होता है।

प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण (PEM): क्वाशिओरकोर बनाम मरास्मस

अंतर का आधार क्वाशिओरकोर (Kwashiorkor) मरास्मस (Marasmus)
1. पोषक कारण केवल गंभीर प्रोटीन की कमी; आहार में कैलोरी सामान्यतः पर्याप्त होती है। प्रोटीन तथा कुल कैलोरी दोनों की एक साथ भीषण कमी (भुखमरी)।
2. प्रभावित आयु 1 से 5 वर्ष के बच्चों में (दूसरे बच्चे के जन्म पर पहले बच्चे का दूध छुड़ाने पर)। 1 वर्ष से कम आयु के शिशुओं में (स्तनपान के समय से पहले बंद होने पर)।
3. शोथ / ओडीमा (Edema) शोथ उपस्थित होता है (रक्त एल्ब्यूमिन घटने से पैरों, हाथों व चेहरे पर सूजन)। शोथ पूर्णतः अनुपस्थित (शरीर अत्यधिक निर्जलित व सूखा)।
4. अधस्त्वचीय वसा त्वचा के नीचे वसा सुरक्षित रहती है। त्वचा के नीचे की वसा पूरी तरह समाप्त हो जाती है।
5. शारीरिक लक्षण मटका जैसा बाहर निकला पेट ('पॉट बेली'), यकृत में वसा का जमाव, बालों का लाल होना ('ध्वज चिन्ह'), छिलकेदार त्वचा। कंकालनुमा शरीर, पसलियां साफ दिखाई देती हैं, झुर्रीदार ढीली त्वचा, "बूढ़े आदमी जैसा" सूखा चेहरा।

पाचन तंत्र के सामान्य विकार

  • पीलिया (Jaundice): यकृत के प्रभावित होने पर रक्त में पित्त वर्णक बिलीरुबिन के जमाव से आंखें व त्वचा पीली हो जाती हैं।
  • वमन (Vomiting): आमाशय के पदार्थों का मुख से बाहर निकलना; यह मेडुला ऑबलोंगेटा के वमन केंद्र द्वारा नियंत्रित प्रतिवर्ती क्रिया है।
  • अतिसार (Diarrhea): आंत्र की बार-बार पतली मल त्याग की गतिशीलता; इससे पोषक तत्वों व जल का अवशोषण घट जाता है।
  • कब्ज (Constipation): बृहदांत्र में मल का रुक जाना और कठिनाई से निष्कासन, जो रेशेदार भोजन (रफेज) की कमी से होता है।
  • अपच (Indigestion): भोजन का ठीक से न पचना व पेट भारी लगना; यह तनाव, अधिक मसालेदार भोजन या अपर्याप्त एंजाइम स्राव से होता है।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

वयस्क मानव का स्थायी दंत सूत्र
32 दांत (8 कृंतक, 4 रदनक, 8 अग्रचर्वणक, 12 चर्वणक)
ऊपरी व निचले जबड़े के प्रत्येक आधे भाग में उपस्थित दांतों के प्रकार व संख्या को दर्शाने वाला सूत्र।
बाल्य अवस्था का दूध के दांतों का सूत्र (Deciduous Formula)
20 दांत (8 कृंतक, 4 रदनक, 0 अग्रचर्वणक, 8 चर्वणक)
बच्चों में अग्रचर्वणक पूरी तरह अनुपस्थित होते हैं। मानव के 12 दांत जीवन में केवल एक बार निकलते हैं।
लार एमाइलेज (टायलिन) द्वारा स्टार्च पाचन अभिक्रिया
मुखगुहा में कुल स्टार्च का लगभग 30% भाग जल-अपघटित होता है
लार का टायलिन स्टार्च के अल्फा-1,4 ग्लाइकोसिडिक बंधों को तोड़कर डाइसैकेराइड में बदलता है।
आमाशय में दूध का स्कंदन (रैनिन की क्रिया)
तरल दूध को ठोस थक्के में बदलकर पेप्सिन के पाचन हेतु रोकता है
शिशुओं के आमाशय में रैनिन दूध को जमाता है ताकि वह शीघ्र आमाशय से बाहर न निकले।
पोषक तत्वों का कार्यिकीय कैलोरी मान
कार्बोहाइड्रेट: 4 kcal/g | प्रोटीन: 4 kcal/g | वसा: 9 kcal/g
मानव शरीर के भीतर जैविक ऑक्सीकरण से प्राप्त होने वाली शुद्ध प्रभावी ऊर्जा।
ग्रहणी में एंटेरोकाइनेज प्रोएंजाइम सक्रियण कैस्केड
अग्न्याशयी प्रोएंजाइमों को सक्रिय करने वाला मुख्य ट्रिगर
ग्रहणी का एंटेरोकाइनेज ट्रिप्सिन को सक्रिय करता है, जो स्वतःउत्प्रेरण से अन्य सभी को सक्रिय करता है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
मानव आहार नाल भित्ति के चार संकेंद्री स्तरों की सूक्ष्म संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए। ब्रूनर ग्रंथियों एवं पैनेथ कोशिकाओं का कार्य बताइए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

भाग 1: आहार नाल के चार संकेंद्री स्तर (3 अंक):
ग्रसिका से मलाशय तक आहार नाल भित्ति 4 स्तरों में व्यवस्थित होती है:

  1. सिरोसा (Serosa): सबसे बाहरी पतला स्तर, जो सरल शल्की मेसोथीलियम (अंतरंग पेरिटोनियम) तथा कुछ संयोजी ऊतक से बना होता है। यह क्रमाकुंचन के समय अंगों के घर्षण को रोकता है।
  2. मस्क्युलरिस (Muscularis): अनैच्छिक चिकनी पेशियों से बना होता है। इसमें बाहर अनुदैर्ध्य तथा भीतर वर्तुल पेशियां होती हैं। इनके बीच ऑवरबैक जालक (Auerbach's plexus) होता है जो क्रमाकुंचन गति को नियंत्रित करता है।
  3. सबम्यूकोसा (Submucosa): रक्त वाहिनियों, लसिका वाहिनियों तथा तंत्रिकाओं से युक्त शिथिल संयोजी ऊतक। इसमें मीसनर जालक होता है जो श्लेष्मीय स्राव नियंत्रित करता है।
  4. म्यूकोसा (Mucosa): सबसे भीतरी स्तर जो ल्यूमेन के संपर्क में रहता है। छोटी आंत में यह लाखों अंगुलीनुमा प्रवर्ध रसांकुर (Villi) बनाती है जो अवशोषण तल 600 गुना बढ़ाते हैं। इसमें गॉब्लेट कोशिकाएं तथा लीबरकुन की प्रगुहिकाएं पाई जाती हैं।

    भाग 2: ब्रूनर ग्रंथियां एवं पैनेथ कोशिकाएं (2 अंक):
    • ब्रूनर ग्रंथियां (Brunner's Glands): ये केवल ग्रहणी की सबम्यूकोसा में पाई जाती हैं। ये प्रचुर क्षारीय श्लेष्मा व बाइकार्बोनेट ($\text{HCO}_3^-$) स्रावित करती हैं जो आमाशय से आने वाले अम्लीय काइम को उदासीन कर ग्रहणी की भित्ति को अल्सर से बचाती हैं।
    • पैनेथ कोशिकाएं (Paneth Cells): ये छोटी आंत की लीबरकुन की प्रगुहिकाओं के आधार पर स्थित होती हैं। ये जीवाणुरोधी एंजाइम लाइसोजाइम तथा डिफेंसिन स्रावित कर आंत्र के हानिकारक रोगाणुओं को नष्ट करती हैं।
उदाहरण 2
मानव दंत विन्यास के संदर्भ में गर्तदंती, द्विवारदंती एवं विषमदंती को स्पष्ट कीजिए। एक वयस्क तथा 5 वर्ष के बालक का दंत सूत्र लिखिए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

भाग 1: मानव दंत विन्यास के लक्षण (3 अंक):

  1. गर्तदंती (Thecodont): जबड़े की अस्थियों (मैक्सिला व मैंडिबल) के पृथक गर्तों (Alveoli) में प्रत्येक दांत का पीरियोडॉन्टल लिगामेंट द्वारा मजबूती से धंसे होना गर्तदंती कहलाता है।
  2. द्विवारदंती (Diphyodont): संपूर्ण जीवन काल में दांतों के दो क्रमिक समूह निकलने को द्विवारदंती कहते हैं। शैशवावस्था में 20 'दूध के दांत' (अस्थायी) निकलते हैं, जो गिरकर बाद में 32 'स्थायी दांतों' द्वारा प्रतिस्थापित होते हैं।
  3. विषमदंती (Heterodont): जबड़े में भिन्न-भिन्न आकार व कार्यों के चार प्रकार के दांतों का पाया जाना विषमदंती कहलाता है: कृंतक (Incisor - काटना), रदनक (Canine - चीरना), अग्रचर्वणक (Premolar - चबाना), तथा चर्वणक (Molar - पीसना)।

    भाग 2: दंत सूत्र (2 अंक):
    ऊपरी व निचले जबड़े के प्रत्येक आधे भाग के दांतों का अनुपात:
    • वयस्क मानव का दंत सूत्र: $\frac{2.1.2.3}{2.1.2.3} \times 2 = 32\text{ दांत}$
    • 5 वर्ष के बालक का दंत सूत्र: $\frac{2.1.0.2}{2.1.0.2} \times 2 = 20\text{ दांत}$
    विशेष टिप्पणी: बालक के दूध के दांतों में अग्रचर्वणक (Premolars) पूरी तरह अनुपस्थित होते हैं ($\text{PM} = 0$) तथा तीसरा चर्वणक भी नहीं होता। मानव के 12 दांत जीवन में केवल एक बार निकलते हैं (एकवारदंती)।
उदाहरण 3
ग्रहणी में एंटेरोकाइनेज अग्न्याशयी रस के निष्क्रिय प्रोएंजाइमों को कैसे सक्रिय करता है? छोटी आंत में प्रोटीन पाचन की चरणबद्ध अभिक्रियाएं लिखिए। [2 + 3 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

भाग 1: एंटेरोकाइनेज की भूमिका एवं कैस्केड सक्रियण (2 अंक):
अग्न्याशय के ऊतकों को आत्म-पाचन से बचाने हेतु प्रोटीयोलाइटिक एंजाइम निष्क्रिय जाइमोजेन के रूप में स्रावित होते हैं। ग्रहणी में इनका सक्रियण निम्न प्रकार होता है:

  1. प्राथमिक ट्रिगर: ग्रहणी की म्यूकोसा के ब्रश बॉर्डर से स्रावित एंटेरोकाइनेज (Enterokinase) एंजाइम सबसे पहले निष्क्रिय ट्रिप्सिनोजेन को सक्रिय ट्रिप्सिन में बदलता है।
  2. स्वतःउत्प्रेरण कैस्केड: सक्रिय ट्रिप्सिन स्वयं मास्टर एक्टिवेटर बन जाता है और स्वतःउत्प्रेरण द्वारा शेष ट्रिप्सिनोजेन तथा अन्य सभी प्रोएंजाइमों को सक्रिय करता है:
    • ट्रिप्सिनोजेन $\xrightarrow{\text{एंटेरोकाइनेज}}$ ट्रिप्सिन
    • काइमोट्रिप्सिनोजेन $\xrightarrow{\text{ट्रिप्सिन}}$ काइमोट्रिप्सिन
    • प्रोकार्बोक्सीपेप्टिडेस $\xrightarrow{\text{ट्रिप्सिन}}$ कार्बोक्सीपेप्टिडेस

    भाग 2: छोटी आंत में प्रोटीन पाचन की रासायनिक अभिक्रियाएं (3 अंक):
  3. अग्न्याशयी एंडोपेप्टिडेस की क्रिया (भीतरी पेप्टाइड बंध तोड़ते हैं):

$$\text{प्रोटीन, पेप्टोन, प्रोटिओज} \xrightarrow[\text{pH } 7.8-8.2]{\text{ट्रिप्सिन, काइमोट्रिप्सिन}} \text{पॉलीपेप्टाइड} + \text{डाइपेप्टाइड}$$

  1. अग्न्याशयी एक्सोपेप्टिडेस की क्रिया (C-टर्मिनल पेप्टाइड बंध तोड़ते हैं):

$$\text{पॉलीपेप्टाइड} \xrightarrow{\text{कार्बोक्सीपेप्टिडेस}} \text{डाइपेप्टाइड} + \text{मुक्त अमीनो अम्ल}$$

  1. आंत्र रस (सक्कस एंटेरिकस) की ब्रश-बॉर्डर क्रिया:

$$\text{डाइपेप्टाइड} \xrightarrow{\text{डाइपेप्टिडेस}} 2\text{ मुक्त अमीनो अम्ल}$$

अमीनोपेप्टिडेस N-टर्मिनल सिरे से अमीनो अम्ल मुक्त करके पूर्ण अवशोषण योग्य सरल अमीनो अम्ल बनाते हैं।

उदाहरण 4
मानव आहार नाल में वसा के पाचन एवं अवशोषण के चरण समझाइए। अवशोषित वसा रुधिर केशिकाओं में न जाकर रसांकुरों की लैक्टियल में क्यों जाती है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

भाग 1: वसा पाचन एवं अवशोषण के चरण (3 अंक):
वसा जल में अघुलनशील होने के कारण इसका पाचन व अवशोषण विशेष क्रियाविधि द्वारा होता है:

  1. पित्त लवणों द्वारा इमल्सीकरण: ग्रहणी में पित्त लवण (सोडियम ग्लाइकोकोलेट व टौरोकोलेट) वसा का पृष्ठ तनाव घटाकर बड़ी वसा बूंदों को अति सूक्ष्म बूंदों में तोड़ देते हैं (पायसीकरण), जिससे लाइपेज की कार्य सतह बढ़ जाती है।
  2. अग्न्याशयी लाइपेज की क्रिया: अग्न्याशयी लाइपेज (स्टीएप्सिन) पायसीकृत वसा को तोड़ता है:

$$\text{ट्राइग्लिसराइड} \xrightarrow{\text{लाइपेज}} \text{डाइग्लिसराइड} \to \text{मोनोग्लिसराइड} + \text{वसीय अम्ल}$$

  1. मिसेल निर्माण: वसीय अम्ल व मोनोग्लिसराइड पित्त लवणों के साथ मिलकर जल-घुलनशील मिसेल (व्यास 4–7 nm) बनाते हैं जो वसा को आंत्र उपकला तक पहुंचाते हैं। वहां से लिपिड सरल विसरण द्वारा उपकला में प्रवेश करते हैं।
  2. काइलोमाइक्रोन निर्माण: उपकला की चिकनी ER में पुनः ट्राइग्लिसराइड बनते हैं तथा गॉल्जी में प्रोटीन आवरण चढ़ने से काइलोमाइक्रोन (व्यास 100–500 nm) बनते हैं।

    भाग 2: रुधिर केशिकाओं के बजाय लैक्टियल में प्रवेश का कारण (2 अंक):
    • आकार का अवरोध: काइलोमाइक्रोन बहुत बड़े लिपोप्रोटीन कण (100–500 nm) होते हैं। रुधिर केशिकाओं की आधार कला (Basement membrane) निरंतर होती है और उनके एंडोथीलियम के सूक्ष्म छिद्र (50–100 nm) इतने संकरे होते हैं कि काइलोमाइक्रोन सीधे रुधिर में प्रवेश नहीं कर सकते।
    • लैक्टियल की पारगम्यता: इसके विपरीत, रसांकुर के केंद्र में स्थित लसिका वाहिनी लैक्टियल की आधार कला अपूर्ण होती है तथा उसकी एंडोथीलियम कोशिकाओं के बीच बड़े-बड़े अंतराकोशिकीय अंतराल (फेंडेस्ट्रा) होते हैं। अतः बड़े काइलोमाइक्रोन आसानी से लैक्टियल में चले जाते हैं और वक्षीय लसिका वाहिनी द्वारा परिसंचरण में पहुंचते हैं।
उदाहरण 5
पोषक कारण, आयु, बाह्य लक्षण, शोथ (ओडीमा) तथा अधस्त्वचीय वसा के आधार पर क्वाशिओरकोर तथा मरास्मस में अंतर स्पष्ट कीजिए। [5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण (PEM) के दो प्रमुख रूपों में तुलनात्मक अंतर तालिका:
तुलना का आधार क्वाशिओरकोर (Kwashiorkor) [प्रत्येक सही बिंदु पर 1 अंक] मरास्मस (Marasmus)
1. पोषक कारण केवल गंभीर प्रोटीन की कमी; भोजन में कैलोरी (ऊर्जा) की मात्रा सामान्यतः पर्याप्त होती है। भोजन में प्रोटीन तथा कुल कैलोरी दोनों की एक साथ भीषण कमी (भुखमरी)।
2. प्रभावित आयु सामान्यतः 1 से 5 वर्ष के बच्चों में (दूसरे बच्चे के जन्म पर मातृ दुग्ध से वंचित होने पर)। सामान्यतः 1 वर्ष से कम के दुधमुंहे शिशुओं में (स्तनपान के अकाल बंद होने पर)।
3. शोथ / ओडीमा (Edema) शोथ (सूजन) उपस्थित होती है (रक्त में एल्ब्यूमिन घटने से ऊतकों में जल भर जाता है)। शोथ पूर्णतः अनुपस्थित (शरीर अत्यधिक निर्जलित व सूखा होता है)।
4. अधस्त्वचीय वसा त्वचा के नीचे वसा का स्तर सुरक्षित रहता है। त्वचा के नीचे की वसा पूरी तरह समाप्त हो जाती है।
5. शारीरिक बाह्य लक्षण बाहर निकला मटका पेट ('पॉट बेली'), यकृत में वसा संचय, बालों का लाल-भूरा होना ('ध्वज चिन्ह'), छिलकेदार त्वचा। कंकालनुमा शरीर, पसलियां स्पष्ट दिखाई देती हैं, ढीली झुर्रीदार त्वचा, "बूढ़े आदमी जैसा" चेहरा।
उदाहरण 6
मानव आहार नाल के अंतःस्रावी हार्मोनल नियंत्रण की व्याख्या कीजिए। गैस्ट्रिन, सीक्रेटिन, CCK-PZ तथा GIP हार्मोनों के स्रोत व कार्य लिखिए। [1 + 4 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

भाग 1: आहार नाल का हार्मोनल नियमन (1 अंक):
आहार नाल के विभिन्न भागों की म्यूकोसा में उपस्थित एंटेरोएंडोक्राइन कोशिकाएं पेप्टाइड हार्मोन स्रावित करती हैं जो भोजन के संचरण के अनुरूप पाचक रसों के स्राव और आंत्र गतियों का समन्वय करती हैं।

भाग 2: चार प्रमुख हार्मोनों के स्रोत एवं कार्य (4 अंक, प्रत्येक पर 1 अंक):

  1. गैस्ट्रिन (Gastrin):
    • स्रोत: आमाशय के जठरनिर्गमी भाग की G-कोशिकाएं।
    • कार्य: पैराइटल कोशिकाओं से हाइड्रोक्लोरिक अम्ल ($\text{HCl}$) तथा मुख्य कोशिकाओं से पेप्सिनोजेन स्राव को बढ़ाता है; आमाशय की गतिशीलता को बढ़ाता है।
  2. सीक्रेटिन (Secretin - खोजा गया प्रथम हार्मोन, 1902):
    • स्रोत: ग्रहणी म्यूकोसा की S-कोशिकाएं।
    • कार्य: अम्लीय काइम से प्रेरित होकर अग्न्याशय से क्षारीय जल व प्रचुर बाइकार्बोनेट ($\text{HCO}_3^-$) स्रावित कराता है जिससे अम्लता शांत हो; आमाशय के अम्ल स्राव को रोकता है।
  3. कोलसिस्टोकाइनिन-पैन्क्रियाजाइमिन (CCK-PZ):
    • स्रोत: छोटी आंत (ग्रहणी व मध्यांत्र) की I-कोशिकाएं।
    • कार्य: वसायुक्त भोजन की उपस्थिति में पित्ताशय को संकुचित कर पित्त निकलवाता है; अग्न्याशय से एंजाइम-युक्त रस स्रावित कराता है और ओडी की अवरोधिनी को शिथिल करता है।
  4. गैस्ट्रिक इन्हीबिटरी पेप्टाइड (GIP / एंटेरोगैस्ट्रोन):
    • स्रोत: ग्रहणी की K-कोशिकाएं।
    • कार्य: आमाशय के अम्ल स्राव व क्रमाकुंचन को रोकता है; अवशोषित होने वाले ग्लूकोज की प्रत्याशा में अग्न्याशय से इंसुलिन स्राव को प्रेरित करता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि पित्त रस में वसा को पचाने वाले एंजाइम पाए जाते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि काइलोमाइक्रोन सीधे रुधिर केशिकाओं में अवशोषित होते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

क्वाशिओरकोर और मरास्मस के लक्षणों तथा शोथ (ओडीमा) को आपस में मिला देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि पेप्सिनोजेन केवल हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) द्वारा ही सक्रिय होता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

बालक के दूध के दांतों के सूत्र में अग्रचर्वणक (Premolars) लिखना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

14 पाचन एवं अवशोषण: आहार नाल की औतिकी, एंजाइम कैस्केड तथा अवशोषण क्रियाविधि पश्चिम बंगाल बोर्ड कक्षा 11 जीव विज्ञान • इकाई 5: मानव कार्यिकी • संपूर्ण वैचारिक संकल्पना मानचित्र 1. आहार नाल की औतिकी एवं दंत सूत्र मानव दंत विन्यास (गर्तदंती, विषमदंती, द्विवारदंती) वयस्क सूत्र: (I 2/2, C 1/1, PM 2/2, M 3/3) = 32 बाल्य सूत्र: 2102 / 2102 = 20 (अग्रचर्वणक अनुपस्थित) आहार नाल भित्ति के 4 संकेंद्री स्तर (बाहर से भीतर): 1. सिरोसा (Serosa - सबसे बाहरी स्तर) आंतरांगी पेरिटोनियम • पतली मेसोथीलियम + संयोजी ऊतक 2. पेशी स्तर (Muscularis - चिकनी पेशियां) बाहरी अनुदैर्ध्य + भीतरी वर्तुल (आमाशय में तिर्यक पेशी स्तर) ऑवरबैक जालिका (Auerbach) → क्रमाकुंचन का नियंत्रण 3. अधःश्लेष्मिका (Submucosa) शिथिल संयोजी ऊतक • रुधिर, तंत्रिकाएं एवं लसिका वाहिनियां ग्रहणी में ब्रूनर ग्रंथियां (Brunner's) • मीसनर जालिका 4. श्लेष्मिका (Mucosa - सबसे भीतरी स्तर) आमाशय में रूगी (Rugae) • छोटी आंत में रसांकुर एवं सूक्ष्मांकुर गॉब्लेट कोशिकाएं (श्लेष्मा) • पैनेथ कोशिकाएं (लाइसोजाइम) लीबरकुन की प्रगुहिकाएं → आंत्र रस (सक्कस एंटेरिकस) रसांकुर (Villus) की आंतरिक संरचना: केंद्रीय लसिका वाहिनी लैक्टियल (Lacteal) + केशिका जाल 2. रासायनिक पाचन एवं एंजाइम कैस्केड मुखगुहा (लार एमाइलेज / टायलिन, pH 6.8) स्टार्च (30%) + H₂O → माल्टोज़ + आइसोमाल्टोज़ बोलस (Bolus) निर्माण • लाइसोजाइम (जीवाणुरोधी) आमाशय (जठर रस, pH 1.5 - 2.5) ऑक्सिन्टिक कोशिकाएं → HCl + कैसल नैज कारक (B₁₂) पेप्सिनोजेन + HCl → सक्रिय पेप्सिन प्रोटीन → प्रोटिओज + पेप्टोन (काइन / Chyme) अग्न्याशयी रस एवं पित्त (ग्रहणी, pH 7.8-8.2) एंटेरोकाइनेज एंजाइम कैस्केड सक्रिय करता है: ट्रिप्सिनोजेन → ट्रिप्सिन (स्वतःउत्प्रेरक सक्रियक) काइमोट्रिप्सिनोजेन → काइमोट्रिप्सिन • प्रोकार्बोक्सी → कार्बोक्सी पित्त लवण (एंजाइमहीन): वसा का इमल्सीकरण (पायसीकरण) एमाइलॉप्सिन (स्टार्च) • स्टीएप्सिन (अग्न्याशयी लाइपेज) ओडी की अवरोधिनी (Sphincter of Oddi) द्वारा नियंत्रित नली सक्कस एंटेरिकस (आंत्र रस के अंतिम एंजाइम) • माल्टोज़ → ग्लूकोज + ग्लूकोज (माल्टेज) • लैक्टोज़ → ग्लूकोज + गैलेक्टोज़ (लैक्टेज) • सुक्रोज़ → ग्लूकोज + फ्रुक्टोज़ (सुक्रोज) • डाइपेप्टाइड → अमीनो अम्ल (डाइपेप्टिडेस) • न्यूक्लियोटाइड → न्यूक्लियोसाइड → क्षारक + शर्करा अंतिम क्षारीय पचित तरल: काइल (Chyle) 3. अवशोषण क्रियाविधि एवं कुपोषण (PEM) अवशोषण के प्रकार (आंत्र कोशिकाएं) 1. सरल विसरण: ग्लूकोज (अल्प), अमीनो अम्ल, Cl⁻ 2. सुसाध्य परिवहन: फ्रुक्टोज़ (वाहक प्रोटीन Na⁺) 3. सक्रिय परिवहन: ग्लूकोज, गैलेक्टोज़, Na⁺ (ATP) सोडियम के साथ द्वितीयक सक्रिय सह-परिवहन वसा का अवशोषण: मिसेल से लैक्टियल तक 1. वसीय अम्ल + ग्लिसरॉल + पित्त लवण → मिसेल (Micelle) 2. मिसेल आंत्र उपकला कोशिकाओं में विसरित 3. चिकनी ER में पुनः ट्राइग्लिसराइड का निर्माण 4. प्रोटीन आवरण चढ़ने पर → काइलोमाइक्रोन (Chylomicron) 5. लैक्टियल में प्रवेश → वक्षीय लसिका वाहिनी → रुधिर प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण (PEM) क्वाशिओरकोर (केवल प्रोटीन की कमी) • आयु: > 1 वर्ष • शोथ (Edema) उपस्थित • बाहर निकला पेट (मटका पेट), वसीय यकृत, अधस्त्वचीय वसा सुरक्षित • रक्त एल्ब्यूमिन की कमी से जल भराव (ओडीमा) मरास्मस (प्रोटीन + कैलोरी दोनों की भीषण कमी) • आयु: < 1 वर्ष (शिशु) • शोथ (Edema) अनुपस्थित • अत्यधिक दुर्बलता, अधस्त्वचीय वसा पूर्णतः समाप्त, झुर्रीदार त्वचा • पसलियां स्पष्ट दिखाई देती हैं, बूढ़े जैसा सूखा चेहरा

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
आहार नाल भित्ति में बाहर से भीतर 4 संकेंद्री स्तर होते हैं: सिरोसा (पेरिटोनियम), मस्क्युलरिस (अनुदैर्ध्य व वर्तुल पेशियां), सबम्यूकोसा (ग्रहणी में ब्रूनर ग्रंथियां) तथा म्यूकोसा (रसांकुर व गॉब्लेट कोशिकाएं)।
मुख्य बिंदु 2
आहार नाल के तंत्रिका तंत्र में मस्क्युलरिस के बीच ऑवरबैक जालक क्रमाकुंचन को और सबम्यूकोसा में मीसनर जालक ग्रंथियों के स्राव को नियंत्रित करता है।
मुख्य बिंदु 3
मानव दंत विन्यास गर्तदंती (गर्तों में स्थित), द्विवारदंती (दूध के व स्थायी दांत) तथा विषमदंती (कृंतक, रदनक, अग्रचर्वणक, चर्वणक) होता है। वयस्क सूत्र 2123/2123 (32 दांत); बाल्य सूत्र 2102/2102 (20 दांत, अग्रचर्वणक अनुपस्थित)।
मुख्य बिंदु 4
इनेमल शरीर का सबसे कठोर निर्जीव ऊतक है जो एमीलोब्लास्ट द्वारा स्रावित होता है; डेंटिन ओडोंटोब्लास्ट द्वारा स्रावित सजीव भाग है।
मुख्य बिंदु 5
तीन जोड़ी लार ग्रंथियां: पैरोटिड (स्टेनसन नलिका), सबमैंडिबुलर (व्हार्टन नलिका) तथा सबलिंगुअल (रिविनस नलिका)। लार का टायलिन pH 6.8 पर स्टार्च को माल्टोज़ में बदलता है।
मुख्य बिंदु 6
यकृत पालिकाएं ग्लिसन कैप्सूल से ढकी होती हैं और कुप्फर कोशिकाएं जीवाणु नष्ट करती हैं। पित्त रस में कोई एंजाइम नहीं होता; यह पित्त लवणों से वसा का इमल्सीकरण करता है।
मुख्य बिंदु 7
सामान्य पित्त वाहिनी व अग्न्याशयी वाहिनी मिलकर यकृत-अग्न्याशयी एम्पुला बनाती हैं, जो ओडी की अवरोधिनी द्वारा नियंत्रित होकर ग्रहणी में खुलती है।
मुख्य बिंदु 8
ग्रहणी में एंटेरोकाइनेज ट्रिप्सिनोजेन को सक्रिय ट्रिप्सिन में बदलकर एंजाइम कैस्केड शुरू करता है; आंत्र रस के एंजाइम पाचन को पूर्ण करते हैं।
मुख्य बिंदु 9
ग्लूकोज व अमीनो अम्ल सक्रिय सह-परिवहन द्वारा अवशोषित होते हैं; वसा मिसेल बनाकर कोशिका में जाती है और काइलोमाइक्रोन बनकर केंद्रीय लैक्टियल में अवशोषित होती है।
मुख्य बिंदु 10
प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण में क्वाशिओरकोर (केवल प्रोटीन की कमी, आयु >1 वर्ष, शोथ व मटका पेट उपस्थित) तथा मरास्मस (प्रोटीन व कैलोरी दोनों की कमी, आयु <1 वर्ष, शोथ अनुपस्थित, अत्यधिक कंकालनुमा दुर्बलता)।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
कौन सी ग्रंथि केवल ग्रहणी की सबम्यूकोसा में पाई जाती है और इसके स्राव का कार्यिकीय महत्व क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: ब्रूनर ग्रंथियां (Brunner's glands) केवल ग्रहणी की सबम्यूकोसा में पाई जाती हैं। ये क्षारीय व श्लेष्मा युक्त द्रव स्रावित करती हैं जिसमें प्रचुर बाइकार्बोनेट आयन होते हैं। यह आमाशय से आने वाले अत्यधिक अम्लीय काइम को उदासीन करता है, ग्रहणी की भित्ति को अल्सर से बचाता है और अग्न्याशयी व आंत्र एंजाइमों के लिए आवश्यक क्षारीय माध्यम (pH 7.8–8.2) उपलब्ध कराता है।
2
पित्त रस में कोई पाचक एंजाइम न होने पर भी इसे पाचक रस क्यों माना जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पित्त रस में कोई पाचक एंजाइम नहीं होता, फिर भी इसमें उपस्थित पित्त लवण (सोडियम ग्लाइकोकोलेट व टौरोकोलेट) वसा का पृष्ठ तनाव घटाकर उसे अति सूक्ष्म बूंदों में तोड़ देते हैं (इमल्सीकरण/पायसीकरण)। इससे अग्न्याशयी लाइपेज (स्टीएप्सिन) के कार्य करने हेतु विशाल सतह उपलब्ध होती है। इसके अतिरिक्त पित्त का क्षारीय माध्यम लाइपेज को सक्रिय करता है।
3
रुधिर केशिका तथा लैक्टियल की संरचना के वे दो मुख्य अंतर क्या हैं जो वसा अवशोषण मार्ग को निर्धारित करते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पहला अंतर: रुधिर केशिकाओं की आधार कला निरंतर होती है और उनके एंडोथीलियम के छिद्र बहुत संकरे (50–100 nm) होते हैं, जिससे बड़े काइलोमाइक्रोन (100–500 nm) सीधे रक्त में नहीं जा सकते। दूसरा अंतर: लैक्टियल (केंद्रीय लसिका वाहिनी) में निरंतर आधार कला नहीं होती और कोशिकाओं के बीच बड़े अंतराल होते हैं, जिससे काइलोमाइक्रोन आसानी से इसमें प्रवेश कर जाते हैं।
4
यदि किसी रोगी का आमाशय शल्य क्रिया द्वारा पूरी तरह निकाल दिया जाए तो क्या गंभीर परिणाम होंगे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: आमाशय निकलने से भोजन भंडारण क्षमता समाप्त होने के साथ-साथ पैराइटल (ऑक्सिन्टिक) कोशिकाएं भी समाप्त हो जाएंगी। इससे कैसल के नैज कारक का स्राव बंद हो जाएगा। नैज कारक के बिना छोटी आंत में विटामिन B12 का अवशोषण नहीं हो पाएगा, जिससे रोगी में परनिशियस एनीमिया (घातक रक्ताल्पता) तथा तंत्रिका संबंधी विकार उत्पन्न हो जाएंगे।
5
अग्न्याशयी प्रोटीएज सक्रियण में एंटेरोकाइनेज की भूमिका बाद के सक्रियण चरणों से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: एंटेरोकाइनेज एक प्रारंभिक बाह्य उत्प्रेरक है जो आंत्र म्यूकोसा के ब्रश बॉर्डर पर होता है और यह केवल निष्क्रिय ट्रिप्सिनोजेन को सक्रिय ट्रिप्सिन में बदलता है। इसके बाद के सभी चरण स्वयं सक्रिय ट्रिप्सिन द्वारा स्वतःउत्प्रेरण (Autocatalysis) से संपन्न होते हैं जो अन्य ट्रिप्सिनोजेन, काइमोट्रिप्सिनोजेन तथा प्रोकार्बोक्सीपेप्टिडेस को सक्रिय करता है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

ऑनलाइन CBT टेस्ट देकर तैयारी का मूल्यांकन करें

झारखण्ड बोर्ड परीक्षा पैटर्न पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्नों का ऑनलाइन टेस्ट दें। तुरंत परिणाम, समय विश्लेषण और प्रत्येक प्रश्न का विस्तृत हल प्राप्त करें।

कक्षा 11 Biology के सभी अध्याय

अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

AI अध्ययन मित्र

त्वरित शंका समाधान

पाचन एवं अवशोषण में कोई संदेह या प्रश्न है? हमारे AI अध्ययन मित्र से तुरंत समझें।