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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 19
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय मानव शरीर के विभिन्न अंगों एवं तंत्रों की कार्यिकीय गतिविधियों के बीच तीव्र एवं बिंदु-दर-बिंदु विद्युत-रासायनिक संपर्क स्थापित करने वाली प्रणाली है। जहाँ अंतःस्रावी तंत्र रुधिर प्रवाह द्वारा मंद एवं दीर्घकालिक हार्मोनल नियमन प्रदान करता है, वहीं तंत्रिका तंत्र मिली-सेकंड के स्तर पर त्वरित अनुक्रिया प्रदान करता है जो जीवन रक्षा के लिए अनिवार्य है। संरचनात्मक रूप से मानव तंत्रिका तंत्र को केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS - मस्तिष्क एवं मेरुरज्जु) तथा परिधीय तंत्रिका तंत्र (PNS - १२ जोड़ी कपाल तंत्रिकाएं एवं ३१ जोड़ी मेरु तंत्रिकाएं) में विभाजित किया गया है। तंत्रिका तंत्र की आधारभूत संरचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई न्यूरॉन (तंत्रिका कोशिका) है जो न्यूरोग्लिया कोशिकाओं द्वारा समर्थित होती है। विश्राम अवस्था में तंत्रिकाक्ष पटल पर -७० मिलीवोल्ट (mV) का विश्रामी कला विभव (RMP) बना रहता है, जो आयनों की विभेदक पारगम्यता तथा सोडियम-पोटैशियम पंप पर निर्भर है। उद्दीपन मिलने पर थ्रेशहोल्ड विभव पर विसर्पी रूप से +३० mV का क्रियात्मक विभव उत्पन्न होता है और मायेलिनयुक्त तंतुओं में रैनवियर की गांठों के बीच साल्टेटरी संवहन द्वारा अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ता है। सिनैप्स पर न्यूरोट्रांसमीटर विमुक्त होकर संकेत आगे भेजते हैं। मस्तिष्क, मेरुरज्जु, प्रतिवर्ती चाप तथा विशिष्ट ज्ञानेंद्रियों के रूप में नेत्र एवं कर्ण का विस्तृत अध्ययन इस अध्याय का मुख्य केंद्र है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

तंत्रिका कार्यिकी की गहन समझ नैदानिक न्यूरोलॉजी, मनोचिकित्सा तथा नेत्र एवं कर्ण विकारों के उपचार की वैज्ञानिक नींव तैयार करती है। यह मिर्गी (एपिलेप्सी), मल्टीपल स्केलेरोसिस, पार्किंसन रोग, अल्जाइमर रोग, ग्लूकोमा (मोतियाबिंद), कर्ण-बधिरता तथा तंत्रिका संबंधी पक्षाघात जैसे रोगों के आण्विक कारणों को स्पष्ट करती है। पश्चिम बंगाल बोर्ड (WBCHSE) एवं नीट (NEET) परीक्षाओं में क्रियात्मक विभव की आयनिक क्रियाविधि, सोडियम-पोटैशियम पंप, सिनैप्स संचरण, मस्तिष्क के विभिन्न भागों के कार्य, प्रतिवर्ती चाप, दृष्टि का प्रकाश-रासायनिक चक्र तथा कॉकलिया एवं संतुलन अंगों से प्रतिवर्ष सीधे उच्च अंक वाले प्रश्न पूछे जाते हैं।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मानव तंत्रिका तंत्र का संगठन एवं न्...
2 तंत्रिका आवेग संवहन एवं क्रियात्मक...
3 सिनैप्टिक संचरण एवं न्यूरोट्रांसमीट...
4 केंद्रीय तंत्रिका तंत्र: मस्तिष्क,...
5 प्रतिवर्ती क्रिया, प्रतिवर्ती चाप ए...
6 संवेदी अंग: मानव नेत्र एवं कर्ण की...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मानव तंत्रिका तंत्र का संगठन एवं न्यूरॉन की औतिकी

१. मानव तंत्रिका तंत्र का संरचनात्मक एवं कार्यात्मक संगठन

मानव तंत्रिका तंत्र को संरचना एवं कार्य के आधार पर दो प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया गया है:

  • १. केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System - CNS): यह तंत्रिका तंत्र का मुख्य समन्वय एवं नियंत्रण केंद्र है, जो मस्तिष्क (Brain) तथा मेरुरज्जु (Spinal Cord) से मिलकर बनता है।
  • २. परिधीय तंत्रिका तंत्र (Peripheral Nervous System - PNS): यह CNS को शरीर के विभिन्न अंगों से जोड़ने वाली सभी तंत्रिकाओं से मिलकर बनता है। इसमें मस्तिष्क से निकलने वाली १२ जोड़ी कपाल तंत्रिकाएं (Cranial Nerves) तथा मेरुरज्जु से निकलने वाली ३१ जोड़ी मेरु तंत्रिकाएं (Spinal Nerves) शामिल हैं।
PNS का कार्यात्मक वर्गीकरण:
• कायिक तंत्रिका तंत्र (Somatic Nervous System - SNS): यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से ऐच्छिक कंकाल पेशियों तक आवेगों का संवहन करता है।
• स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (Autonomic Nervous System - ANS): यह अनैच्छिक पेशियों (हृद पेशी व चिकनी पेशी) तथा ग्रंथियों की क्रियाओं को नियंत्रित करता है। यह दो परस्पर विरोधी भागों में बंटा है:
- अनुकंपी तंत्रिका तंत्र (Sympathetic System): वक्षीय एवं कटि मेरु खंडों (T1–L2) से निकलता है। यह आपातकाल में "लड़ो या भागो" (Fight-or-Flight) अनुक्रिया उत्पन्न करता है: हृदय स्पंदन बढ़ाना, पुतली फैलाना, श्वसन नलिकाएं चौड़ी करना तथा पाचन क्रिया को मंद करना।
- परानुकंपी तंत्रिका तंत्र (Parasympathetic System): कपाल तंत्रिकाओं (III, VII, IX, X) तथा त्रिक मेरु खंडों (S2–S4) से निकलता है। यह विश्राम की स्थिति में "विश्राम एवं पाचन" (Rest-and-Digest) बनाए रखता है: हृदय गति सामान्य करना, पुतली सिकोड़ना तथा पाचन क्रिया को सक्रिय करना।
२. आदर्श न्यूरॉन की कोशिकीय संरचना एवं प्रमुख भाग

न्यूरॉन तंत्रिका तंत्र की आधारभूत संरचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई है। यह अविभाज्य (सेंट्रोसोम निष्क्रिय) कोशिका है जिसके तीन मुख्य भाग होते हैं:

भागसंरचनात्मक एवं कोशिकीय लक्षणप्रमुख कार्य
कोशिकाकाय (Cell Body / Soma)यह न्यूरॉन का केंद्रीय फूला हुआ भाग है जिसमें एक स्पष्ट केंद्रक, माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जीकाय, न्यूरोफाइब्रिल तथा दानेदार निसल कण (Nissl's Granules) पाए जाते हैं। निसल कण वस्तुतः राइबोसोम युक्त खुरदरी अंतःप्रद्रव्यी जालिका (RER) के समूह हैं।न्यूरॉन का उपापचयी एवं जैव-संश्लेषण केंद्र; प्रोटीनों एवं एंजाइमों का निर्माण करता है।
द्रुमाक्ष्य (Dendrites)कोशिकाकाय से निकले छोटे, बार-बार शाखित होने वाले संवेदी प्रवर्ध। इनके कोशिकाद्रव्य में निसल कण एवं न्यूरोफाइब्रिल उपस्थित होते हैं।संवेदी ग्राही अंगों अथवा अन्य न्यूरॉनों से तंत्रिका आवेग ग्रहण करके कोशिकाकाय की ओर भेजते हैं (अभिवाही संवहन)।
एक्सॉन या तंत्रिकाक्ष (Axon)कोशिकाकाय के एक विशिष्ट शंक्वाकार भाग एक्सॉन हिलॉक (Axon Hillock) से निकलने वाला लंबा, एकल बेलनाकार प्रवर्ध। इसकी झिल्ली को एक्सोलेमा तथा द्रव्य को एक्सोप्लाज्म कहते हैं। एक्सॉन में निसल कण एवं गॉल्जीकाय पूर्णतः अनुपस्थित होते हैं। अंतिम सिरे पर यह शाखित होकर अंतस्थ घुंडी (Synaptic Knob) बनाता है जिसमें न्यूरोट्रांसमीटर की पुटिकाएं होती हैं।कोशिकाकाय से क्रियात्मक विभव (आवेग) को दूरस्थ लक्ष्य कोशिकाओं अथवा अगले न्यूरॉन तक संवहन करता है (अपवाही संवहन)।
३. मायेलिनीभवन एवं न्यूरॉनों का वर्गीकरण

मायेलिन आच्छद की उपस्थिति के आधार पर तंत्रिका तंतु दो प्रकार के होते हैं:

  • मायेलिनयुक्त (Medullated) तंतु: एक्सॉन के चारों ओर श्वान कोशिकाएं (PNS में) या ऑलिगोडेंड्रोसाइट्स (CNS में) लिपिड युक्त मायेलिन आच्छद बनाती हैं। मायेलिन आवरण के बीच-बीच में छूटने वाले अंतरालों को रैनवियर की गांठ (Nodes of Ranvier) कहते हैं। इनमें आवेग साल्टेटरी संवहन द्वारा अत्यंत तीव्र गति से चलता है।
  • मायेलिनरहित (Non-medullated) तंतु: इनमें सुस्पष्ट मायेलिन आवरण नहीं होता। आवेग निरंतर धीमी गति से संचरित होता है (स्वायत्त तंत्रिका तंत्र में सामान्य)।
प्रवर्धों की संख्या के आधार पर न्यूरॉन के प्रकार:
• एकध्रुवीय (Unipolar): केवल एक प्रवर्ध होता है (भ्रूणीय अवस्था में पाया जाता है)।
• द्विध्रुवीय (Bipolar): एक एक्सॉन तथा एक डेंड्राइट विपरीत सिरों से निकलते हैं (नेत्र की रेटिना, घ्राण उपकला एवं अंतःकर्ण में)।
• बहुध्रुवीय (Multipolar): एक एक्सॉन तथा अनेक डेंड्राइट होते हैं (प्रमस्तिष्क वल्कुट तथा सामान्य प्रेरक न्यूरॉन)।
• कूट-एकध्रुवीय (Pseudounipolar): कोशिकाकाय से निकला एकल प्रवर्ध T-आकार में दो शाखाओं में बंट जाता है (मेरु तंत्रिकाओं के पृष्ठीय मूल गैन्ग्लिया / DRG में)।
४. न्यूरोग्लिया (Glial Cells) सहायक कोशिकाएं

तंत्रिका तंत्र में न्यूरॉनों को सहारा, पोषण एवं सुरक्षा प्रदान करने वाली अ-उत्तेजक कोशिकाएं:

  • एस्ट्रोसाइट्स (Astrocytes): तारे जैसी कोशिकाएं जो केशिकाओं के साथ मिलकर रक्त-मस्तिष्क अवरोध (BBB) बनाती हैं और हानिकारक रसायनों को मस्तिष्क में जाने से रोकती हैं।
  • ऑलिगोडेंड्रोसाइट्स (Oligodendrocytes): केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) के एक्सॉनों पर मायेलिन आच्छद का निर्माण करती हैं।
  • माइक्रोग्लिया (Microglia): मध्यजनस्तर से उत्पन्न भक्षकाणु जो मस्तिष्क के मैक्रोफेज के रूप में मृत कोशिकाओं व रोगाणुओं का भक्षण करते हैं।
  • एपेंडाइमल कोशिकाएं (Ependymal Cells): मस्तिष्क के निलयों तथा मेरुरज्जु की केंद्रीय नाल को आस्तरित करने वाली पक्ष्माभी कोशिकाएं जो CSF का स्राव व प्रवाह कराती हैं।
  • श्वान कोशिकाएं (Schwann Cells): परिधीय तंत्रिका तंत्र (PNS) में मायेलिन आच्छद का निर्माण करती हैं।

तंत्रिका आवेग संवहन एवं क्रियात्मक विभव की जैव-भौतिकी

१. विश्रामी कला विभव (Resting Membrane Potential - RMP) का आयनिक आधार

अउत्तेजित अवस्था में तंत्रिका तंतु की एक्सोलेमा झिल्ली के आर-पार उपस्थित स्थिर विद्युत विभवांतर को विश्रामी कला विभव (RMP) कहते हैं। स्तनधारियों में इसका मान लगभग -७० मिलीवोल्ट (-70 mV) होता है (बाहरी तल की तुलना में आंतरिक तल ऋणात्मक)। यह तीन कारकों पर आधारित है:

१. झिल्ली के दोनों ओर आयनों का असमान वितरण:
• बाह्यकोशिकीय तरल (ECF): सोडियम (Na+) की सांद्रता अत्यधिक (लगभग १४५ mM) तथा क्लोराइड (Cl-) की प्रचुरता होती है।
• एक्सोप्लाज्म (ICF): पोटैशियम (K+) की सांद्रता अत्यधिक (लगभग १४० mM) तथा भारी मात्रा में अविलेय ऋणावेशित प्रोटीन एवं कार्बनिक फॉस्फेट होते हैं।

२. झिल्ली की विभेदक पारगम्यता (Differential Permeability):
• विश्राम अवस्था में एक्सोलेमा में खुले K+ रिसाव चैनल होने के कारण यह Na+ की तुलना में K+ के लिए २० से ३० गुना अधिक पारगम्य होती है।
• इसके फलस्वरूप K+ आयन सांद्रता प्रवणता के अनुसार तेजी से बाहर विसरित होते हैं, परंतु बाहर से Na+ आसानी से भीतर नहीं आ पाते।
• इसके अतिरिक्त विशाल ऋणावेशित प्रोटीन अणु झिल्ली को पार नहीं कर पाते, जिससे आंतरिक सतह पर ऋणात्मक आवेश बढ़ जाता है।

३. सोडियम-पोटैशियम एटीपेज़ पंप (Na+/K+ ATPase Pump):
• यह सक्रिय पंप प्रति चक्र एक ATP अणु का उपभोग करके ३ Na+ आयनों को बाहर निकालता है तथा २ K+ आयनों को भीतर लाता है।
• बाहर ३ धन आयन जाने तथा भीतर २ धन आयन आने से आंतरिक सतह पर ऋणात्मकता (-७० mV) स्थायी रूप से बनी रहती है।
२. क्रियात्मक विभव (Action Potential) की उत्पत्ति एवं विभिन्न चरण

उद्दीपन मिलने पर तंत्रिका कला के विद्युत ध्रुवण में होने वाले तीव्र, क्षणिक एवं उत्क्रमणीय परिवर्तन को क्रियात्मक विभव कहते हैं:

चरणविभव परासआयन चैनलों की स्थिति एवं कार्यिकी
देहली उद्दीपन (Threshold)-70 mV से -55 mVउद्दीपन मिलने पर कुछ वोल्टेज-गेटेड Na+ चैनल खुलते हैं। स्थानीय विध्रुवण जब क्रांतिक देहली विभव (-55 mV) पर पहुँचता है, तो 'पूर्ण या शून्य नियम' (All-or-None) के अनुसार क्रियात्मक विभव प्रारंभ हो जाता है।
विध्रुवण (Depolarization)-55 mV से +30 mVदेहली पर पहुँचते ही हजारों वोल्टेज-गेटेड Na+ चैनल एक साथ खुल जाते हैं। अत्यधिक वेग से Na+ आयनों का अंतर्वाह होता है। आंतरिक सतह तेजी से धनात्मक हो जाती है और विभव +30 mV (अधिव्यापन / Overshoot) तक पहुँच जाता है।
पुनर्ध्रुवण (Repolarization)+30 mV से -70 mV+30 mV पर Na+ चैनलों के इनएक्टिवेशन गेट बंद हो जाते हैं। उसी समय वोल्टेज-गेटेड K+ चैनल पूरी तरह खुल जाते हैं। अत्यधिक वेग से K+ आयनों का बहिर्वाह होता है। धनात्मक आवेश बाहर जाने से आंतरिक सतह पुनः ऋणात्मक होकर -70 mV पर लौटती है।
अतिध्रुवण (Hyperpolarization)-70 mV से -85 mVK+ चैनलों के मंद गति से बंद होने के कारण अतिरिक्त K+ बाहर चला जाता है, जिससे विभव गिरकर लगभग -85 mV हो जाता है। इसके पश्चात Na+/K+ पंप पुनः मूल आयनिक संतुलन स्थापित कर विभव को -70 mV पर लाता है।
३. अप्रतिक्रियाशील काल एवं साल्टेटरी संवहन
  • अनिवार्य अप्रतिक्रियाशील काल (Absolute Refractory Period): विध्रुवण एवं प्रारंभिक पुनर्ध्रुवण के समय Na+ चैनल पहले से खुले या निष्क्रिय रहते हैं, अतः कोई भी नया उद्दीपन दूसरा आवेग पैदा नहीं कर सकता। यह सुनिश्चित करता है कि तंत्रिका आवेग केवल एक ही दिशा में आगे बढ़े।
  • साल्टेटरी संवहन (Saltatory Conduction): मायेलिन आच्छद एक उत्कृष्ट विद्युतरोधी है जो आयन प्रवाह को रोकता है। वोल्टेज-गेटेड Na+ चैनल केवल रैनवियर की गांठों पर अत्यधिक सघन रूप से पाए जाते हैं।
    • इसके फलस्वरूप क्रियात्मक विभव संपूर्ण एक्सॉन पर न चलकर एक गांठ से अगली गांठ पर छलांग लगाते हुए (Saltatory) संचरित होता है।
    • लाभ: संवहन वेग ५० गुना बढ़कर १००–१२० मीटर/सेकंड तक पहुँच जाता है तथा Na+/K+ पंप की ऊर्जा (ATP) की खपत ९०% तक कम हो जाती है।

सिनैप्टिक संचरण एवं न्यूरोट्रांसमीटर की भूमिका

१. सिनैप्स का वर्गीकरण: विद्युत सिनैप्स बनाम रासायनिक सिनैप्स

एक न्यूरॉन से अगले न्यूरॉन अथवा कार्यक अंग तक आवेग संचरण के संधि स्थल को सिनैप्स (Synapse) कहते हैं:

लक्षणविद्युत सिनैप्स (Electrical)रासायनिक सिनैप्स (Chemical)
सिनैप्टिक विदर (Cleft)अत्यंत संकरा (लगभग २–४ nm); नगण्य अंतरालस्पष्ट तरल-युक्त विदर उपस्थित (लगभग २०–३० nm)
भौतिक निरंतरतागैप जंक्शन (कनेक्सॉन) द्वारा दोनों कोशिकाएं सीधे जुड़ी होती हैंसीधा कोई भौतिक संपर्क नहीं होता; रासायनिक माध्यम द्वारा संचरण
संचरण क्रियाविधिआयन सीधे छिद्रों द्वारा एक कोशिका से दूसरी में बहते हैंपुटिकाओं से न्यूरोट्रांसमीटर के स्राव व विसरण द्वारा होता है
विलंब व दिशाविलंब लगभग शून्य (<०.१ ms); प्रायः द्विदिशीय हो सकता हैसिनैप्टिक विलंब उपस्थित (०.५–१.० ms); कड़ाई से एकदिशीय
मानव शरीर में उपस्थितिअत्यल्प; हृद पेशी की अंतर्विष्ट डिस्क एवं कुछ प्रतिवर्ती मार्गों मेंमानव तंत्रिका तंत्र में सर्वाधिक सामान्य सिनैप्स
२. रासायनिक सिनैप्स में संचरण की आण्विक क्रियाविधि

रासायनिक सिनैप्स में आवेग का संचरण चार प्रमुख चरणों में संपन्न होता है:

चरण १: क्रियात्मक विभव आगमन एवं कैल्शियम प्रवेश:
आवेग पूर्व-सिनैप्टिक घुंडी (Synaptic Knob) पर पहुँचता है। विध्रुवण से वोल्टेज-गेटेड कैल्शियम चैनल (VGCC) खुल जाते हैं और बाह्य तरल से तेजी से Ca2+ आयन घुंडी के भीतर प्रवेश करते हैं।

चरण २: पुटिका संलयन एवं न्यूरोट्रांसमीटर विमुक्ति:
Ca2+ आयन पुटिका के सिनैप्टोटैगमीन प्रोटीन से जुड़ते हैं। इससे SNARE प्रोटीन तंत्र सक्रिय होकर सिनैप्टिक पुटिकाओं को पूर्व-सिनैप्टिक झिल्ली से जोड़ देता है। एक्सोसाइटोसिस द्वारा पुटिकाएं फट जाती हैं और न्यूरोट्रांसमीटर (उदा. एसिटिलकोलीन) सिनैप्टिक विदर में मुक्त हो जाता है।

चरण ३: पश्च-सिनैप्टिक ग्राही बंधन एवं विभव निर्माण:
न्यूरोट्रांसमीटर २० nm विदर को पार करके पश्च-सिनैप्टिक झिल्ली के विशिष्ट ग्राहियों से बंधते हैं:
• उत्तेजक पश्च-सिनैप्टिक विभव (EPSP): लिगैंड-गेटेड Na+ चैनल खुलने से Na+ का अंतर्वाह होता है और स्थानीय विध्रुवण बनता है (उदा. एसिटिलकोलीन, ग्लूटामेट)। कई EPSP मिलकर नए क्रियात्मक विभव को जन्म देते हैं।
• अवरोधक पश्च-सिनैप्टिक विभव (IPSP): लिगैंड-गेटेड Cl- या K+ चैनल खुलने से झिल्ली अतिध्रुवित (Hyperpolarized) हो जाती है और आवेग की उत्पत्ति रुक जाती है (उदा. GABA, ग्लाइसिन)।

चरण ४: न्यूरोट्रांसमीटर का विघटन एवं निष्कासन:
संकेत संचरण के पश्चात सिनैप्टिक विदर में उपस्थित एंजाइम (उदा. एसिटिलकोलीन एस्टरेज़ - AChE) एसिटिलकोलीन को एसिटेट व कोलीन में तोड़ देता है, अथवा पूर्व-सिनैप्टिक पंप द्वारा इसका पुनर्गृहण (Reuptake) कर लिया जाता है।

केंद्रीय तंत्रिका तंत्र: मस्तिष्क, मेरुरज्जु एवं निलय तंत्र

१. मस्तिष्कावरण (Cranial Meninges) एवं प्रमस्तिष्क मेरु द्रव (CSF)

मानव मस्तिष्क कपाल गुहा में तथा मेरुरज्जु कशेरुक नाल में तीन सुरक्षात्मक झिल्लियों द्वारा सुरक्षित रहते हैं जिन्हें मस्तिष्कावरण (Meninges) कहते हैं:

  • १. दृढ़तानिका (Dura Mater): सबसे बाहरी मोटी, सुदृढ़, रेशेदार कोलेजन से बनी सुरक्षात्मक परत।
  • २. जालतानिका (Arachnoid Mater): मध्यवर्ती अत्यंत पतली, पारदर्शी, संवहनीहीन मकड़ी के जाले जैसी परत। ड्युरा व अराक्नॉइड के बीच सबड्युরাল अवकाश होता है।
  • ३. मृदुतानिका (Pia Mater): सबसे भीतरी अत्यंत कोमल, पारदर्शी एवं अत्यधिक संवहनी परत जो मस्तिष्क के प्रत्येक उभार व खांच से चिपकी रहती है।
सबरैकनॉइड अवकाश एवं प्रमस्तिष्क मेरु द्रव (CSF):
• जालतानिका तथा मृदुतानिका के बीच स्थित रिक्त स्थान को सबरैकनॉइड अवकाश (Subarachnoid Space) कहते हैं, जो पारदर्शी, क्षारीय प्रमस्तिष्क मेरु द्रव (CSF) से भरा रहता है (कुल मात्रा लगभग १५० मिली)।
• उत्पत्ति: मस्तिष्क के निलयों में स्थित रक्त केशिकाओं के विशेष जाल कोरोइड प्लेक्सस (Choroid Plexus) द्वारा प्रतिदिन लगभग ५०० मिली CSF का निरंतर स्राव होता है।
• प्रवाह मार्ग: पार्श्व निलय → मोनरो का छिद्र → तृतीय निलय → सिल्वियस की प्रमस्तिष्क जलप्रणाली → चतुर्थ निलय → लुश्का व मैगेंडी के छिद्र → सबरैकनॉइड अवकाश → अराक्नॉइड अंकुरों द्वारा शिरापरक रक्त में अवशोषण।
• कार्य: मस्तिष्क को उत्प्लावकता देकर उसका प्रभावी भार १४०० ग्राम से घटाकर मात्र ५० ग्राम कर देता है, झटकों से रक्षा करता है तथा पोषण व अपशिष्ट निष्कासन करता है।
२. मानव मस्तिष्क (Brain / Encephalon) के प्रमुख भाग एवं कार्य
मस्तिष्क का प्रमुख भागसंरचनात्मक घटकप्रमुख कार्यिकीय भूमिकाएं
१. अग्रमस्तिष्क (Prosencephalon)• प्रमस्तिष्क (Cerebrum): मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग (लगभग ८०%)। यह एक गहरे अनुदैर्ध्य विदर द्वारा दो प्रमस्तिष्क गोलार्धों में बंटा होता है, जो कॉर्पस कैलोसम (Corpus Callosum) नामक श्वेत तंत्रिका तंतुओं की पट्टी द्वारा जुड़े होते हैं। बाहरी धूसर भाग को प्रमस्तिष्क वल्कुट (Cortex) कहते हैं जिसमें उभार (जाइरस) तथा खांचें (सल्कस) पाई जाती हैं। चार खंडों में विभाजित:
- फ्रंटल पाली: ऐच्छिक पेशी गति नियंत्रण (मोटर कॉर्टेक्स), ब्रोका का वाक-क्षेत्र (बोलने की क्षमता), तर्क, निर्णय, बुद्धि एवं व्यक्तित्व।
- पैराइटल पाली: संवेदी कॉर्टेक्स (स्पर्श, ताप, दाब व दर्द की पहचान), स्वाद संवेदन।
- टेम्पोरल पाली: प्राथमिक श्रवण कॉर्टेक्स, घ्राण केंद्र तथा वर्निक का भाषा बोध क्षेत्र।
- ऑक्सीपिटल पाली: प्राथमिक दृष्टि कॉर्टेक्स तथा दृश्य विश्लेषण केंद्र।
• थैलेमस (Thalamus): अंडाकार धूसर केंद्र; घ्राण को छोड़कर सभी संवेदी एवं प्रेरक संकेतों के लिए रिले केंद्र (Relay Center) का कार्य करता है।
• हाइपोथैलेमस (Hypothalamus): थैलेमस के आधार पर स्थित। यह शरीर का मुख्य थर्मोस्टेट (ताप नियंत्रण), भूख-प्यास केंद्र, जैविक घड़ी तथा पीयूष ग्रंथि के हार्मोन स्राव का नियंत्रण केंद्र है।
• लिम्बिक तंत्र (Limbic System): हिप्पोकैम्पस (अल्पकालिक स्मृति को दीर्घकालिक स्मृति में बदलना) तथा एमिग्डाला (क्रोध, भय, आनंद व भावनात्मक अनुक्रिया) का केंद्र।
उच्चतर बौद्धिक क्षमता, स्मृति, तर्क, ऐच्छिक गतियां, संवेदी ग्रहण, भावनाएं एवं आंतरिक समस्थापन।
२. मध्यमस्तिष्क (Mesencephalon)थैलेमस तथा पोंस के मध्य स्थित भाग। इसके मध्य से संकरी प्रमस्तिष्क जलप्रणाली (Aqueduct of Sylvius) गुजरती है। इसके पृष्ठ भाग पर चार गोल उभार पाए जाते हैं जिन्हें कॉर्पोरा क्वाड्रीजेमिना (Corpora Quadrigemina) कहते हैं:
- ऊपरी दो उभार (Superior Colliculi): दृष्टि प्रतिवर्ती केंद्र (आंखों व सिर का प्रकाश की ओर घूमना)।
- निचले दो उभार (Inferior Colliculi): श्रवण प्रतिवर्ती केंद्र (ध्वनि की ओर सिर का घूमना)।
दृष्टि एवं श्रवण प्रतिवर्ती क्रियाओं का एकीकरण तथा अग्रमस्तिष्क व पश्चमस्तिष्क के मध्य समन्वय।
३. पश्चमस्तिष्क (Rhombencephalon)• पोंस (Pons Varolii): तंत्रिका तंतुओं का सेतु; इसमें स्थित न्यूमोटैक्सिक केंद्र (Pneumotaxic Center) श्वसन की लयबद्धता को नियंत्रित करता है।
• अनुमस्तिष्क (Cerebellum): दूसरा सबसे बड़ा भाग; इसमें श्वेत तंतु पेड़ की शाखाओं की तरह व्यवस्थित होते हैं जिसे आर्बर विटी (Arbor Vitae) कहते हैं। कार्य: ऐच्छिक गतियों का सूक्ष्म समन्वय, शारीरिक संतुलन एवं पेशी तनाव बनाए रखना (मदिरापान से यह बाधित होता है)।
• मेडुला ऑब्लांगेटा (Medulla Oblongata): मस्तिष्क का अंतिम शंक्वाकार भाग जो महारंध्र से मेरुरज्जु में परिवर्तित होता है। इसमें जीवन रक्षक केंद्र होते हैं:
- श्वसन केंद्र: मूल श्वसन दर व गहराई का नियमन।
- कार्डियोवैस्कुलर केंद्र: हृदय स्पंदन दर व संकुचन का नियंत्रण।
- वैसोमोटर केंद्र: रुधिर वाहिनियों का व्यास व रक्तदाब नियंत्रण।
- प्रतिवर्ती केंद्र: निगलना, वमन (उल्टी), खांसना, छींकना व लार स्राव नियंत्रण।
अनैच्छिक जीवन रक्षक क्रियाएं (हृदय, श्वसन, रक्तदाब) तथा शारीरिक संतुलन।
ब्रेनस्टेम (Brainstem): मध्यमस्तिष्क + पोंस + मेडुला ऑब्लांगेटा मिलकर ब्रेनस्टेम बनाते हैं, जो चेतना एवं जाग्रत अवस्था बनाए रखता है।
३. मेरुरज्जु (Spinal Cord) की आंतरिक संरचना

कशेरुक दंड की तंत्रिका नाल में स्थित बेलनाकार भाग। इसकी अनुप्रस्थ काट में दो स्पष्ट क्षेत्र दिखते हैं:

  • आंतरिक धूसर द्रव्य (Grey Matter): मध्य में तितली अथवा 'H' आकार का धूसर द्रव्य होता है जिसके केंद्र में CSF भरी केंद्रीय नाल होती है। इसमें पृष्ठीय श्रृंग (संवेदी आवेग ग्रहण) तथा अधर श्रृंग (प्रेरक न्यूरॉन उपस्थित) पाए जाते हैं।
  • बाह्य श्वेत द्रव्य (White Matter): धूसर द्रव्य के चारों ओर स्थित मायेलिनयुक्त तंतुओं का क्षेत्र, जो संवेदी आरोही एवं प्रेरक अवरोही मार्ग बनाते हैं।

प्रतिवर्ती क्रिया, प्रतिवर्ती चाप एवं प्राथमिक संवेदी अंग (घ्राण व स्वाद)

१. प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex Action) एवं प्रतिवर्ती चाप (Reflex Arc)

मस्तिष्क की सचेत इच्छा के बिना किसी बाह्य उद्दीपन के प्रति होने वाली तीव्र, अनैच्छिक, स्वतःस्फूर्त एवं त्वरित पेशीय अनुक्रिया को प्रतिवर्ती क्रिया कहते हैं। प्रतिवर्ती क्रिया में आवेग जिस निश्चित तंत्रिका मार्ग से गुजरता है, उसे प्रतिवर्ती चाप (Reflex Arc) कहा जाता है। इसके पाँच मूलभूत घटक होते हैं:

प्रतिवर्ती चाप के पाँच घटक:
१. ग्राही अंग (Receptor): पर्यावरण से उद्दीपन ग्रहण कर ग्राही विभव उत्पन्न करता है (उदा. पेशी स्पिंडल, दर्द ग्राही)।
२. अभिवाही या संवेदी न्यूरॉन (Afferent Neuron): आवेग को मेरुरज्जु की ओर ले जाता है; इसका कोशिकाकाय पृष्ठीय मूल गैन्ग्लियन (DRG) में स्थित होता है।
३. समन्यवक केंद्र (Integration Center): मेरुरज्जु के धूसर द्रव्य में स्थित संधि स्थल। यह दो प्रकार का होता है:
- मोनोसिनैप्टिक (Monosynaptic): संवेदी न्यूरॉन सीधे प्रेरक न्यूरॉन से जुड़ता है; कोई मध्यवर्ती अंतरा-न्यूरॉन नहीं होता (उदा. जानु-झटका या नी-जर्क प्रतिवर्ती)।
- पॉलिसिनैप्टिक (Polysynaptic): संवेदी व प्रेरक न्यूरॉन के बीच एक या अधिक अंतरा-न्यूरॉन (Interneuron) होते हैं (उदा. कांटे या गर्म वस्तु से हाथ हटाने की प्रतिवर्ती)।
४. अपवाही या प्रेरक न्यूरॉन (Efferent Neuron): मेरुरज्जु के अधर श्रृंग से आवेग को कार्यक अंग तक ले जाता है।
५. कार्यक अंग (Effector): वह पेशी अथवा ग्रंथि जो संकुचित होकर अंतिम अनुक्रिया दर्शाती है।
२. घ्राण संवेदन (Sense of Smell / Olfaction)

नासागुहा की छत पर स्थित रासायनिक ग्राहियों द्वारा गंध का अनुभव होता है:

  • घ्राण उपकला (Olfactory Epithelium): नासागुहा के ऊपरी भाग में एथमाइड अस्थि की छिद्रित प्लेट के नीचे स्थित पीत रंग की विशेष उपकला। इसमें तीन प्रकार की कोशिकाएं होती हैं: (१) घ्राण ग्राही कोशिकाएं (द्विध्रुवीय न्यूरॉन जिनके रोम श्लेष्मा में तैरते हैं), (२) आलंबन कोशिकाएं (सहारा व पोषण देने वाली), तथा (३) आधारी कोशिकाएं (स्टेम कोशिकाएं जो नष्ट हुए न्यूरॉनों का पुनर्जनन करती हैं)।
  • संवेदन क्रियाविधि: वाष्पशील गंध अणु श्लेष्मा में घुलकर G-प्रोटीन (Golf) से जुड़ते हैं, जिससे cAMP बनकर Na+ व Ca2+ चैनल खुलते हैं और विध्रुवण होता है।
  • तंत्रिका मार्ग: एक्सॉन प्रथम कपाल तंत्रिका (घ्राण तंत्रिका) बनकर घ्राण बल्ब में जाते हैं। यहाँ से आवेग सीधे टेम्पोरल पाली के घ्राण कॉर्टेक्स तथा लिम्बिक तंत्र में पहुँचता है। ध्यान रहे कि घ्राण आवेग थैलेमस से होकर नहीं गुजरता, जिससे गंध पुरानी स्मृतियों व भावनाओं को तुरंत जाग्रत कर देती है।
३. स्वाद संवेदन (Sense of Taste / Gustation)

जिह्वा पर स्थित स्वाद कलिकाओं (Taste Buds) द्वारा रासायनिक स्वाद का बोध होता है:

  • स्वाद कलिकाएं एवं अंकुरक (Papillae): वयस्क में लगभग १०,००० स्वाद कलिकाएं जिह्वा के अंकुरकों पर पाई जाती हैं: (१) परिवृत्त अंकुरक (Circumvallate) - जिह्वा के आधार पर V-आकार में बड़े अंकुरक, (२) कवकरूपी अंकुरक (Fungiform) - अग्रभाग पर लाल छतरीनुमा, तथा (३) पर्णिल अंकुरक (Foliate)। सूत्राकार (Filiform) अंकुरकों में स्वाद कलिकाएं नहीं होतीं।
  • कलिका संरचना: प्रत्येक स्वाद कलिका में ५०–१०० तर्कुरूपी स्वाद ग्राही कोशिकाएं होती हैं जिनके शीर्ष पर स्थित सूक्ष्मरोम स्वाद रंध्र (Taste Pore) से बाहर निकलते हैं।
  • पाँच मूल स्वाद: मीठा (Sweet), नमकीन (Salty - सीधे Na+ अंतर्वाह), खट्टा (Sour - H+ आयन द्वारा), कड़वा (Bitter - एल्केलॉइड्स की पहचान, सबसे कम देहली) तथा उमामी (Umami - ग्लूटामेट का स्वादिष्ट स्वाद)।
  • तंत्रिका आपूर्ति: जिह्वा के अग्र २/३ भाग का स्वाद ७वीं कपाल तंत्रिका (फेशियल) द्वारा तथा पश्च १/३ भाग का स्वाद ९वीं कपाल तंत्रिका (ग्लोसोफैरिंजियल) द्वारा पैराइटल पाली के स्वाद कॉर्टेक्स तक पहुँचता है।

संवेदी अंग: मानव नेत्र एवं कर्ण की विस्तृत कार्यिकी

१. मानव नेत्रगोलक (Eyeball) की विस्तृत संरचना

मानव नेत्र लगभग गोलाकार (२४ मिमी व्यास) अंग है जो नेत्र कोटर में सुरक्षित रहता है। इसकी भित्ति तीन संकेंद्रीय परतों से बनी होती है:

परतघटक भागसंरचना एवं विशिष्ट कार्य
१. बाह्य रेशेदार स्तर (Fibrous Tunic)• श्वेतपटल (Sclera): पश्च ५/६ भाग में स्थित सघन श्वेत कोलेजन का अपारदर्शी आवरण; नेत्र का आकार बनाए रखता है एवं पेशियों को आधार देता है।
• कॉर्निया (Cornea): अग्र १/६ भाग का पूर्ण पारदर्शी, उत्तल एवं रक्तवाहिनारहित भाग। कार्य: आंख में प्रवेश करने वाले प्रकाश का मुख्य अपवर्तन (लगभग ७०% क्षमता) करता है।
सुरक्षा एवं मुख्य प्रकाश अपवर्तन माध्यम।
२. मध्य संवहनी स्तर (Vascular Uvea)• रक्तकपटल (Choroid): पश्च भाग का अत्यधिक संवहनी एवं मेलेनिन रंजक युक्त स्तर; पोषण देता है तथा आंतरिक परावर्तन रोकता है।
• पक्ष्माभ काय (Ciliary Body): कोरॉइड का अगला मोटा भाग जिसमें सिलियरी पेशियां (लेंस की वक्रता बदलकर समंजन करती हैं) तथा सिलियरी प्रवर्ध होते हैं जो जलीय द्रव (Aqueous Humor) स्रावित करते हैं।
• परितारिका (Iris): कॉर्निया व लेंस के बीच स्थित रंगीन अपारदर्शी पर्दा, जिसके मध्य के छिद्र को पुतली (Pupil) कहते हैं। परितारिका की अरीय एवं वृत्ताकार पेशियां पुतली का व्यास नियंत्रित करके प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करती हैं।
रक्त आपूर्ति, प्रकाश अवशोषण, लेंस समंजन एवं पुतली नियंत्रण।
३. आंतरिक दृष्टिपटल (Retina)नेत्र का सबसे भीतरी संवेदी स्तर। बाहर से भीतर तीन कोशिकीय स्तरों में बंटा होता है:
१. प्रकाशग्राही स्तर: लगभग १२ करोड़ शलाका (Rods) कोशिकाएं (रोडोप्सिन युक्त, मंद प्रकाश में श्वेत-श्याम दृष्टि) तथा ६० लाख शंकु (Cones) कोशिकाएं (आयोडोप्सिन युक्त, तीव्र प्रकाश एवं रंगीन दृष्टि)।
२. द्विध्रुवीय कोशिका स्तर: प्रकाशग्राहियों से आवेग ग्रहण करने वाले मध्यवर्ती न्यूरॉन।
३. गुच्छिका (गैन्ग्लियन) कोशिका स्तर: इनके एक्सॉन मिलकर दृक तंत्रिका (Optic Nerve) बनाते हैं।
• विशिष्ट स्थल:
- पीत बिंदु (Macula Lutea & Fovea Centralis): रेटिना के केंद्र में स्थित पीला बिंदु जिसके मध्य में फोविया होता है। यहाँ केवल सघन शंकु कोशिकाएं होती हैं; यह सर्वाधिक स्पष्ट दृष्टि एवं तीक्ष्णता का केंद्र है।
- अंध बिंदु (Blind Spot / Optic Disc): जहाँ से दृक तंत्रिका बाहर निकलती है। यहाँ कोई शलाका या शंकु कोशिका नहीं होती, अतः यहाँ कोई प्रतिबिंब नहीं बनता।
प्रकाश का ग्रहण, आवेग में रूपांतरण एवं मस्तिष्क तक प्रेषण।
२. नेत्र कक्ष एवं दृष्टि का प्रकाश-रासायनिक चक्र (Wald's Visual Cycle)
  • एक्वियस एवं विट्रियस ह्यूमर: लेंस के आगे का अग्र कक्ष जल जैसे एक्वियस ह्यूमर से भरा रहता है जो स्क्लेम की नाल द्वारा शिराओं में जाता है (रुकावट होने पर ग्लूकोमा होता है)। लेंस के पीछे का विशाल कक्ष जेली जैसे विट्रियस ह्यूमर से भरा रहता है जो रेटिना को यथास्थान रखता है।
दृष्टि की रासायनिक क्रियाविधि:
१. रोडोप्सिन रंजक ऑप्सिन (Opsin) प्रोटीन तथा विटामिन A के एल्डिहाइड व्युत्पन्न 11-सिस रेटिनल (11-cis Retinal) से मिलकर बना होता है।
२. प्रकाश पड़ने पर 11-सिस रेटिनल बदलकर ऑल-ट्रांस रेटिनल (all-trans retinal) में परिवर्तित हो जाता है और ऑप्सिन से अलग हो जाता है (विरंजन / Bleaching)।
३. ऑप्सिन की संरचना बदलती है जिससे ट्रांसड्यूसिन सक्रिय होकर cGMP फॉस्फोडाइएस्टरेज को चालू करता है।
४. cGMP के टूटने से Na+ चैनल बंद हो जाते हैं और प्रकाशग्राही झिल्ली अतिध्रुवित (-70 mV) हो जाती है।
५. इससे अवरोधक ग्लूटामेट का स्राव रुकता है तथा द्विध्रुवीय व गैन्ग्लियन कोशिकाओं में क्रियात्मक विभव उत्पन्न होकर दूसरी कपाल तंत्रिका (दृक तंत्रिका) द्वारा ऑक्सीपिटल पाली के दृष्टि केंद्र में पहुँचता है।
३. मानव कर्ण (Human Ear) की विस्तृत संरचना एवं श्रवण प्रक्रिया

मानव कर्ण श्रवण एवं संतुलन का दोहरा कार्य करता है। यह तीन भागों में विभक्त है:

१. बाह्य कर्ण (External Ear):
• कर्णपल्लव (Pinna): उपास्थि युक्त बाह्य भाग जो ध्वनि तरंगों को एकत्रित करता है।
• बाह्य श्रवण कुहर: एस-आकार की नलिका जिसमें मोम स्रावित करने वाली सेरुमिनस ग्रंथियां धूलिकणों को रोकती हैं।
• कर्णपटह (Tympanic Membrane): मध्यकर्ण व बाह्यकर्ण के बीच तनी हुई पतली झिल्ली जो ध्वनि तरंगों से कंपन करती है।
२. मध्यकर्ण (Middle Ear):
वायु-युक्त गुहा जो यूस्टेशियन नलिका द्वारा ग्रसनी से जुड़कर पर्दे के दोनों ओर वायुदाब संतुलित रखती है।
• तीन लघु कर्णस्थियां (Ear Ossicles): उत्तोलक की तरह कार्य कर ध्वनि तरंगों को लगभग २०–२२ गुना प्रवर्धित करती हैं:
- मैलियस (हथौड़ाकार): कर्णपटह से जुड़ी होती है।
- इंकस (निहाईकार): मैलियस व स्टेपीज के बीच स्थित।
- स्टेपीज (रकाबकार): शरीर की सबसे छोटी अस्थि; इसका पाद अंतःकर्ण की अंडाकार खिड़की (Oval Window) की झिल्ली से जुड़ा होता है। नीचे दबाव मुक्त करने हेतु गोलाकार खिड़की (Round Window) होती है।
३. अंतःकर्ण या लेबिरिंथ (Internal Ear):
बाहरी अस्थीय लेबिरिंथ (जिसमें पेरिलिम्फ होता है) तथा आंतरिक झिल्लीमय लेबिरिंथ (जिसमें K+ युक्त एंडोलिम्फ होता है)। दो भागों में बंटा है:

क. कॉकलिया (श्रवण अंग):
• घोंघे के खोल की तरह कुंडलित (२¾ घेरे) नलिका जो रीसनर तथा बेसिलर झिल्ली द्वारा तीन प्रकोष्ठा में बंटी होती है: स्केला वेस्टिबुली (ऊपर, पेरिलिम्फ), स्केला मीडिया (मध्य, एंडोलिम्फ) तथा स्केला टिम्पैनी (नीचे, पेरिलिम्फ)।
• कॉर्टाई का अंग (Organ of Corti): बेसिलर झिल्ली पर स्थित वास्तविक श्रवण अंग। इसमें संवेदी रोम कोशिकाएं (Hair cells) पाई जाती हैं जिनके रोम ऊपर स्थित जेलीनुमा टेक्टोरियल झिल्ली को छूते हैं।
• श्रवण क्रिया: ध्वनि तरंग → कर्णपटह कंपन → कर्णस्थियों द्वारा प्रवर्धन → अंडाकार खिड़की से पेरिलिम्फ में तरंग → बेसिलर झिल्ली का कंपन → रोम कोशिकाएं टेक्टोरियल झिल्ली से टकराती हैं → रोम कोशिकाएं विध्रुवित होकर ग्लूटामेट छोड़ती हैं → ८वीं कपाल तंत्रिका (श्रवण तंत्रिका) द्वारा टेम्पोरल पाली के श्रवण केंद्र में पहुँचकर ध्वनि सुनाई देती है।

ख. वेस्टिबुलर उपकरण (संतुलन अंग):
१. अर्धवृत्ताकार नलिकाएं (Semicircular Canals - गतिशील संतुलन): तीन परस्पर समकोण पर स्थित नलिकाएं। इनके फूले हुए सिरे (एम्पुला) में क्रिस्टा एम्पुलेरिस होती है जिसके रोम जेलीनुमा क्यूपुला में धंसे रहते हैं। यह सिर के घूर्णन व कोणीय गति को पहचानती है।
२. ओटोलिथ अंग - यूट्रिकल एवं सैक्यूल (स्थिर संतुलन): इनमें मैक्यूला नामक संवेदी गद्दी होती है जिस पर कैल्शियम कार्बोनेट के कण ओटोलिथ या स्टैटोकोनिया पाए जाते हैं। यह गुरुत्वाकर्षण व सीधी रेखीय गति को पहचानकर शरीर की स्थिति बनाए रखते हैं।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

नेर्न्स्ट साम्यावस्था विभव समीकरण
$$E_{\text{K}^+} \approx -90\text{ mV}, \quad E_{\text{Na}^+} \approx +60\text{ mV}$$
विश्राम में एक्सोलेमा K+ के लिए सर्वाधिक पारगम्य होने के कारण विश्रामी विभव (-70 mV) EK (-90 mV) के अत्यंत निकट रहता है।
क्रियात्मक विभव गतिकी अनुक्रम
$$ V_{spike} = 100 mV (-70 mV से +30 mV)$$
एक संपूर्ण स्पाइक क्रियात्मक विभव मात्र १ से २ मिली-सेकंड में संपन्न हो जाता है।
सोडियम-पोटैशियम पंप रससमीकरणमिति
$$3 Na^+_{बहिर्गमन} : 2 K^+_{अंतर्वाह} : 1 ATP$$
मानव केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में बनने वाले कुल ATP का लगभग ४०% केवल इस पंप द्वारा उपयोग किया जाता है।
मायेलिनयुक्त तंतु संवहन वेग नियम
$$v_{अधिकतम} ≈ 120 मी/सेकंड (20\ व्यास वाले तंतुओं में)$$
मायेलिनरहित तंतुओं में वेग व्यास के वर्गमूल के समानुपाती होता है जिससे वेग २ मी/सेकंड से कम रहता है।
मध्यकर्ण ध्वनि प्रवर्धन अनुपात
$$प्रवर्धन गुणांक ≈ 20 से 22 गुना$$
यदि यह प्रवर्धन न हो तो वायु की ध्वनि तरंगों की ९९.९% ऊर्जा आंतरिक कर्ण के तरल से परावर्तित होकर नष्ट हो जाएगी।
प्रमस्तिष्क मेरु द्रव (CSF) आयतनिक संतुलन
$$दैनिक चक्रण = {500 मिली दैनिक स्राव}{150 मिली क्षमता} ≈ 3.3 से 3.5 बार प्रतिदिन$$
विश्राम में सबरैकनॉइड अवकाश में CSF का सामान्य दबाव ७० से १८० मिमी जलस्तंभ होता है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
(क) तंत्रिका तंतु के विश्रामी कला विभव (-70 mV) तथा क्रियात्मक विभव के विध्रुवण चरण के आयनिक कारण समझाइए। (ख) रासायनिक सिनैप्स में तंत्रिका आवेग का संचरण सदैव एकदिशीय ही क्यों होता है? [३ + २ = ५ अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) RMP एवं विध्रुवण का आयनिक आधार: [३ अंक]
१. विश्रामी कला विभव (-70 mV):
- विश्राम में एक्सोप्लाज्म में K+ की सांद्रता अधिक (~140 mM) तथा बाह्य तरल में Na+ की सांद्रता अधिक (~145 mM) होती है।
- खुले K+ रिसाव चैनलों के कारण झिल्ली Na+ की तुलना में K+ के लिए २०–३० गुना अधिक पारगम्य होती है, अतः K+ बाहर निकलता है।
- भीतर के विशाल ऋणावेशित प्रोटीन बाहर नहीं जा पाते, जिससे अंदर ऋणात्मकता बढ़ती है।
- Na+/K+ पंप ३ Na+ बाहर तथा २ K+ भीतर लाकर -70 mV विभव को स्थिर रखता है।
२. विध्रुवण (+30 mV):
- उद्दीपन देहली विभव (-55 mV) पर पहुँचते ही वोल्टेज-गेटेड Na+ चैनल तेजी से खुल जाते हैं।
- भारी मात्रा में Na+ आयन तेजी से भीतर आते हैं, जिससे आंतरिक सतह धनात्मक होकर +30 mV तक पहुँच जाती है।

(ख) रासायनिक सिनैप्स में एकदिशीय संचरण का कारण: [२ अंक]
१. न्यूरोट्रांसमीटर युक्त पुटिकाएं तथा वोल्टेज-गेटेड Ca2+ चैनल केवल पूर्व-सिनैप्टिक घुंडी में उपस्थित होते हैं।
२. न्यूरोट्रांसमीटर को पहचानने वाले ग्राही (रिसेप्टर) केवल पश्च-सिनैप्टिक झिल्ली पर स्थित होते हैं।
३. अतः रासायनिक संकेत केवल पूर्व-सिनैप्टिक सिरे से विमुक्त होकर पश्च-सिनैप्टिक झिल्ली की ओर ही एकदिशीय रूप से जा सकता है।
उदाहरण 2
(क) विद्युत सिनैप्स एवं रासायनिक सिनैप्स के बीच तीन प्रमुख संरचनात्मक एवं कार्यिकीय अंतर लिखिए। (ख) सिनैप्टिक संचरण में कैल्शियम आयन (Ca2+) एवं पुटिका संलयन की भूमिका स्पष्ट कीजिए। [३ + २ = ५ अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) विद्युत बनाम रासायनिक सिनैप्स: [३ अंक]
लक्षणविद्युत सिनैप्स (Electrical)रासायनिक सिनैप्स (Chemical)
सिनैप्टिक विदरअत्यंत संकरा (२–४ nm); गैप जंक्शन द्वारा सीधे जुड़ेस्पष्ट सिनैप्टिक विदर उपस्थित (२०–३० nm)
संचरण का माध्यमआयन सीधे छिद्रों द्वारा प्रवाहित होते हैंरासायनिक न्यूरोट्रांसमीटर (ACh, GABA) द्वारा
विलंब व दिशाविलंब नगण्य (<०.१ ms); द्विदिशीय हो सकता हैसिनैप्टिक विलंब उपस्थित (०.५–१.० ms); कड़ाई से एकदिशीय

(ख) Ca2+ एवं पुटिका संलयन की भूमिका: [२ अंक]
१. कैल्शियम प्रवेश: आवेग पूर्व-सिनैप्टिक घुंडी पर पहुँचते ही वोल्टेज-गेटेड Ca2+ चैनल खुलते हैं और Ca2+ भीतर प्रवेश करता है।
२. पुटिका संलयन: Ca2+ सिनैप्टोटैगमीन से जुड़कर SNARE प्रोटीन को सक्रिय करता है, जिससे पुटिकाएं झिल्ली से जुड़कर एक्सोसाइटोसिस द्वारा न्यूरोट्रांसमीटर को विदर में मुक्त कर देती हैं।
उदाहरण 3
(क) जानु-झटका (Knee-jerk) प्रतिवर्ती चाप के विभिन्न घटकों का क्रमानुसार वर्णन कीजिए। (ख) जानु-झटका प्रतिवर्ती को मोनोसिनैप्टिक तथा हाथ हटाने की प्रतिवर्ती को पॉलिसिनैप्टिक क्यों कहा जाता है? [३ + २ = ५ अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) जानु-झटका प्रतिवर्ती चाप के घटक: [३ अंक]
पटेला के नीचे टेंडन पर हल्का प्रहार करने पर प्रतिवर्ती चाप निम्न प्रकार कार्य करता है:
१. ग्राही: क्वाड्रिसेप्स पेशी के भीतर स्थित पेशी स्पिंडल खिंचाव को पहचानकर आवेग उत्पन्न करते हैं।
२. संवेदी न्यूरॉन (Afferent): संवेदी तंतु पृष्ठीय मूल गैन्ग्लियन (L3–L4) से होते हुए मेरुरज्जु के धूसर द्रव्य में पहुँचते हैं।
३. समन्वय केंद्र: मेरुरज्जु के पृष्ठीय श्रृंग में संवेदी न्यूरॉन सीधे मोटर न्यूरॉन से सिनैप्स बनाता है।
४. प्रेरक न्यूरॉन (Efferent): अधर श्रृंग का मोटर न्यूरॉन फीमोरल तंत्रिका द्वारा संकेत भेजता है।
५. अपवाहक अंग: क्वाड्रिसेप्स पेशी संकुचित होकर टांग को आगे की ओर उछाल देती है।

(ख) मोनोसिनैप्टिक बनाम पॉलिसिनैप्टिक: [२ अंक]
१. जानु-झटका (मोनोसिनैप्टिक): इसमें संवेदी न्यूरॉन एवं प्रेरक न्यूरॉन के बीच कोई अंतरा-न्यूरॉन नहीं होता; केवल एक केंद्रीय सिनैप्स होता है।
२. हाथ हटाना (पॉलिसिनैप्टिक): दर्दनाक उद्दीपन में संवेदी व प्रेरक न्यूरॉन के बीच एक या अधिक अंतरा-न्यूरॉन जुड़े होते हैं, जो फ्लेक्सर को उत्तेजित एवं एक्सटेंसर को अवरोधित करते हैं, अतः इसमें अनेक सिनैप्स होते हैं।
उदाहरण 4
(क) मानव मस्तिष्क के तीन प्रमुख भागों के नाम लिखिए तथा प्रमस्तिष्क, हाइपोथैलेमस, अनुमस्तिष्क एवं मेडुला ऑब्लांगेटा का एक-एक प्रमुख कार्य बताइए। (ख) लिम्बिक तंत्र किन संरचनाओं से मिलकर बनता है और इसके प्रमुख कार्य क्या हैं? [३ + २ = ५ अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) मस्तिष्क के भाग एवं कार्य: [३ अंक]
मस्तिष्क के तीन भाग: अग्रमस्तिष्क (Forebrain), मध्यमस्तिष्क (Midbrain), तथा पश्चमस्तिष्क (Hindbrain)।
१. प्रमस्तिष्क (Cerebrum): बुद्धि, विचार, ऐच्छिक गतियों, सचेत संवेदन एवं निर्णय लेने का केंद्र।
२. हाइपोथैलेमस: ताप नियंत्रण (थर्मोस्टेट), भूख-प्यास केंद्र एवं पीयूष ग्रंथि का नियंत्रण।
३. अनुमस्तिष्क (Cerebellum): शारीरिक संतुलन, गतियों का समन्वय एवं पेशी तनाव का नियमन।
४. मेडुला ऑब्लांगेटा: श्वसन लय, हृदय गति, रक्तदाब तथा निगलने, उल्टी व छींकने का प्रतिवर्ती केंद्र।

(ख) लिम्बिक तंत्र एवं कार्य: [२ अंक]
१. घटक: प्रमस्तिष्क के आंतरिक भाग में स्थित हिप्पोकैम्पस, एमिग्डाला तथा हाइपोथैलेमस के कुछ भाग।
२. कार्य: इसे "भावनात्मक मस्तिष्क" कहते हैं; यह भय, क्रोध, आनंद, कामेच्छा व प्रेरणा को नियंत्रित करता है तथा हिप्पोकैम्पस नई स्मृतियों को स्थायी दीर्घकालिक स्मृति में बदलता है।
उदाहरण 5
(क) मानव दृष्टिपटल (रेटिना) के तीन कोशिकीय स्तरों के नाम बाहर से भीतर के क्रम में लिखिए। (ख) प्रकाश की उपस्थिति में शलाका कोशिकाओं में दृष्टि के प्रकाश-रासायनिक चक्र (Wald's Visual Cycle) को समझाइए। [३ + २ = ५ अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) रेटिना के तीन कोशिकीय स्तर: [३ अंक]
बाहर (कोरॉइड की ओर) से भीतर (विट्रियस की ओर) क्रम:
१. प्रकाशग्राही स्तर: शलाका (रोडोप्सिन युक्त, मंद प्रकाश दृष्टि) तथा शंकु (आयोडोप्सिन युक्त, रंगीन दृष्टि)।
२. द्विध्रुवीय कोशिका स्तर: मध्यवर्ती न्यूरॉन जो प्रकाशग्राहियों से आवेग ग्रहण करते हैं।
३. गुच्छिका (गैन्ग्लियन) कोशिका स्तर: सबसे भीतरी स्तर जिसके एक्सॉन दृक तंत्रिका बनाते हैं।

(ख) दृष्टि की रासायनिक क्रियाविधि: [२ अंक]
१. विरंजन: रोडोप्सिन ऑप्सिन प्रोटीन एवं 11-सिस रेटिनल से बनता है। प्रकाश पड़ने पर 11-सिस रेटिनल बदलकर ऑल-ट्रांस रेटिनल बन जाता है और ऑप्सिन से अलग हो जाता है।
२. अतिध्रुवण: मुक्त ऑप्सिन ट्रांसड्यूसिन व cGMP फॉस्फोडाइएस्टरेज को सक्रिय करता है। cGMP टूटने से Na+ चैनल बंद होते हैं और झिल्ली अतिध्रुवित (-70 mV) हो जाती है।
३. आवेग प्रेषण: अवरोधक ग्लूटामेट का स्राव रुकने से द्विध्रुवीय व गैन्ग्लियन कोशिकाओं में क्रियात्मक विभव उत्पन्न होकर दृक तंत्रिका द्वारा मस्तिष्क के दृष्टि केंद्र में पहुँचता है।
उदाहरण 6
(क) कर्णपल्लव से प्रारंभ कर मस्तिष्क के श्रवण केंद्र तक ध्वनि तरंगों के संवहन का संपूर्ण मार्ग लिखिए। (ख) अंतःकर्ण के गतिशील संतुलन एवं स्थिर संतुलन अंगों के मध्य दो प्रमुख अंतर स्पष्ट कीजिए। [२.५ + २.५ = ५ अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) ध्वनि तरंग संवहन का मार्ग: [२.५ अंक]
१. ध्वनि संग्रहण: कर्णपल्लव ध्वनि एकत्र कर बाह्य कुहर से भेजता है और कर्णपटह कंपित होता है।
२. प्रवर्धन: कर्णस्थियां (मैलियस → इंकस → स्टेपीज) कंपन को लगभग २० गुना प्रवर्धित करती हैं।
३. तरल तरंग: स्टेपीज अंडाकार खिड़की पर कंपन कर कॉकलिया के पेरिलिम्फ में तरंगें उत्पन्न करती है।
४. रोम कोशिका उत्तेजन: पेरिलिम्फ की तरंगें बेसिलर झिल्ली को हिलाती हैं, जिससे कॉर्टाई के अंग की रोम कोशिकाएं टेक्टोरियल झिल्ली से टकराती हैं और विध्रुवित होकर ग्लूटामेट छोड़ती हैं।
५. मस्तिष्क तक संवहन: श्रवण तंत्रिका (८वीं कपाल तंत्रिका) द्वारा आवेग टेम्पोरल पाली के श्रवण केंद्र में पहुँचकर ध्वनि का अनुभव कराता है।

(ख) गतिशील बनाम स्थिर संतुलन अंग: [२.५ अंक]
लक्षणगतिशील संतुलन अंगस्थिर संतुलन अंग
संवेदी अंग का नामतीन अर्धवृत्ताकार नलिकाओं के एम्पुला में स्थित क्रिस्टा एम्पुलेरिसओटोलिथ अंगों (यूट्रिकल व सैक्यूल) में स्थित मैक्यूला
संरचनात्मक विशेषतारोम कोशिकाएं जेलीनुमा क्यूपुला में धंसी होती हैं; ओटोलिथ नहीं होतेरोम कोशिकाओं पर कैल्शियम कार्बोनेट के कण ओटोलिथ (स्टैटोकोनिया) होते हैं
पहचान कार्यसिर के घूर्णन एवं कोणीय त्वरण को पहचानकर संतुलन बनाता हैगुरुत्वाकर्षण एवं सीधी रेखीय गति को पहचानकर शरीर की स्थिर मुद्रा बनाता है

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि एब्सोल्यूट रिफ्रैक्टरी पीरियड में एक्सॉन अतिध्रुवित रहता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

एब्सोल्यूट रिफ्रैक्टरी पीरियड विध्रुवण एवं प्रारंभिक पुनर्ध्रुवण के समय होता है जब Na+ चैनल पहले से खुले या निष्क्रिय रहते हैं। अतिध्रुवण (-85 mV) रिलेटिव रिफ्रैक्टरी पीरियड में होता है जब अति-तीव्र उद्दीपन से दूसरा आवेग उत्पन्न हो सकता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

ऑलिगोडेंड्रोसाइट्स और श्वान कोशिकाओं के स्थल में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

दोनों ही मायेलिन आच्छद बनाती हैं, परंतु ऑलिगोडेंड्रोसाइट्स केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS - मस्तिष्क व मेरुरज्जु) में तथा श्वान कोशिकाएं परिधीय तंत्रिका तंत्र (PNS) में मायेलिन बनाती हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि आंख के अंध बिंदु पर केवल शलाका कोशिकाएं होती हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

अंध बिंदु (ऑप्टिक डिस्क) पर कोई भी प्रकाशग्राही कोशिका नहीं होती—न शलाका और न ही शंकु। यहाँ से दृक तंत्रिका बाहर निकलती है, अतः यहाँ कोई दृष्टि नहीं होती।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि ध्वनि का प्रवर्धन कॉकलिया के भीतर होता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ध्वनि दाब का भौतिक प्रवर्धन (२०–२२ गुना) मध्यकर्ण में तीन कर्णस्थियों की उत्तोलक क्रिया से होता है। कॉकलिया प्रवर्धन नहीं करता, बल्कि ध्वनि तरंगों को तंत्रिका आवेग में रूपांतरित करता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

कॉर्पोरा क्वाड्रीजेमिना के सुपीरियर व इन्फीरियर कॉलिकुली के कार्यों को परस्पर बदलना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ऊपरी दो सुपीरियर कॉलिकुली दृष्टि प्रतिवर्ती क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं तथा निचले दो इन्फीरियर कॉलिकुली श्रवण प्रतिवर्ती क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

WBCHSE कक्षा 11 • जीवविज्ञान इकाई 5: मानव कार्यिकी • अध्याय 19 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय — न्यूरॉन, मस्तिष्क एवं ज्ञानेंद्रियां 1. न्यूरॉन संरचना एवं तंत्रिका आवेग संवहन सोमा, एक्सॉन, मायेलिन एवं क्रियात्मक विभव कोशिकाकाय (सोमा) + निसल कण रैनवियर की गांठ (साल्टेटरी संवहन) मायेलिन आच्छद (श्वान कोशिका) अंतस्थ घुंडी (न्यूरोट्रांसमीटर) Saltatory Direction (100 m/s) एक्सॉन हिलॉक (आवेग उत्पत्ति) क्रियात्मक विभव (Action Potential): +30 mV 0 mV -55 mV -70 mV -90 mV • विश्रामी विभव (-70 mV) • विध्रुवण (+30 mV) [Na+ अंतर्वाह] • पुनर्ध्रुवण [K+ बहिर्वाह] • Na+/K+ पंप: 3 Na+ बाहर : 2 K+ अंदर 2. सिनैप्स एवं मानव मस्तिष्क संरचना रासायनिक संचरण एवं केंद्रीय तंत्रिका तंत्र रासायनिक सिनैप्स (20 nm विदर) Ca2+ Ca2+ 20 nm Cleft Ca2+ प्रवेश एवं पुटिका संलयन न्यूरोट्रांसमीटर (ACh) ग्राही बंधन मानव मस्तिष्क एवं मेरुरज्जु (CNS): • अग्रमस्तिष्क: प्रमस्तिष्क (Cerebrum) • कॉर्पस कैलोसम (तंतु पट्टी) • थैलेमस (रिले केंद्र) + हाइपोथैलेमस • मध्यमस्तिष्क: कॉर्पोरा क्वाड्रीजेमिना • पोंस (श्वसन केंद्र) + मेडुला ऑब्लांगेटा & अनुमस्तिष्क (Cerebellum - संतुलन) 3. दृष्टि एवं श्रवण ज्ञानेंद्रियों की कार्यिकी नेत्रगोलक एवं कर्ण की सूक्ष्म संरचना मानव नेत्रगोलक की अनुदैर्ध्य काट: Cornea Lens Fovea Optic Nerve रेटिना (शलाका एवं शंकु कोशिकाएं) मानव कर्ण एवं अंतःकर्ण (कॉकलिया): CN VIII • Tympanum (Eardrum) • कर्णस्थियां: मैलियस, इंकस, स्टेपीज • कॉकलिया (कॉर्टाई का अंग - श्रवण) • अर्धवृत्ताकार नलिकाएं (शारीरिक संतुलन) TargetExams • WBCHSE कक्षा 11 जीवविज्ञान

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
मानव तंत्रिका तंत्र केंद्रीय (मस्तिष्क व मेरुरज्जु) एवं परिधीय (१२ जोड़ी कपाल व ३१ जोड़ी मेरु तंत्रिकाएं) में विभाजित है; कार्यात्मक रूप से कायिक एवं स्वायत्त (अनुकंपी व परानुकंपी)।
मुख्य बिंदु 2
न्यूरॉन के मुख्य भाग: कोशिकाकाय (निसल कण युक्त), ग्राही डेंड्राइट एवं संवाहक एक्सॉन जो एक्सॉन हिलॉक से शुरू होकर अंतस्थ घुंडी पर समाप्त होता है।
मुख्य बिंदु 3
विश्रामी कला विभव (-70 mV) झिल्ली की विभेदक पारगम्यता (K+ >> Na+) तथा सक्रिय Na+/K+ एटीपेज़ पंप (३ Na+ बाहर : २ K+ अंदर) द्वारा निरंतर बना रहता है।
मुख्य बिंदु 4
क्रियात्मक विभव की उत्पत्ति: देहली विभव (-55 mV) पर वोल्टेज-गेटेड Na+ चैनल खुलने से Na+ अंतर्वाह द्वारा विध्रुवण (+30 mV) होता है; फिर K+ बहिर्वाह से पुनर्ध्रुवण होता है।
मुख्य बिंदु 5
मायेलिनयुक्त तंतुओं में मायेलिन के विद्युतरोधी गुण के कारण आवेग रैनवियर की गांठों के बीच कूद-कूदकर तीव्र वेग (१००–१२० मी/से) से साल्टेटरी संवहन द्वारा चलता है।
मुख्य बिंदु 6
रासायनिक सिनैप्स में २० nm विदर होता है; Ca2+ प्रवेश से पुटिकाओं द्वारा न्यूरोट्रांसमीटर (ACh, GABA) मुक्त होकर अगली झिल्ली पर EPSP या IPSP उत्पन्न करते हैं।
मुख्य बिंदु 7
मस्तिष्क तीन भागों में बंटा है: अग्रमस्तिष्क (प्रमस्तिष्क, कॉर्पस कैलोसम, थैलेमस, हाइपोथैलेमस, लिम्बिक तंत्र), मध्यमस्तिष्क (कॉर्पोरा क्वाड्रीजेमिना), तथा पश्चमस्तिष्क (पोंस, अनुमस्तिष्क, मेडुला)।
मुख्य बिंदु 8
प्रतिवर्ती चाप स्वतःस्फूर्त अनुक्रिया का मार्ग है: ग्राही -> संवेदी न्यूरॉन -> मेरुरज्जु केंद्र -> प्रेरक न्यूरॉन -> कार्यक अंग।
मुख्य बिंदु 9
नेत्र के तीन स्तर: रेशेदार, संवहनी व रेटिना; रेटिना में शलाका व शंकु होते हैं; प्रकाश पड़ने पर 11-सिस रेटिनल व ऑप्सिन अलग होकर अतिध्रुवण द्वारा दृष्टि संवेदना उत्पन्न करते हैं।
मुख्य बिंदु 10
कर्ण की अस्थियां ध्वनि को २० गुना प्रवर्धित करती हैं, कॉकलिया का कॉर्टाई अंग ध्वनि विश्लेषण करता है, तथा अर्धवृत्ताकार नलिकाएं (गतिशील) व ओटोलिथ मैक्यूला (स्थिर) संतुलन बनाए रखते हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
निसल कण क्या हैं, न्यूरॉन में ये कहाँ पाए जाते हैं और कहाँ पूर्णतः अनुपस्थित होते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: निसल कण राइबोसोम युक्त खुरदरी अंतःप्रद्रव्यी जालिका (RER) के घने क्षारकप्रिय पिंड हैं जो प्रोटीन संश्लेषण करते हैं। ये न्यूरॉन के कोशिकाकाय (सोमा) एवं डेंड्राइट्स में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, परंतु एक्सॉन तथा उसके उद्गम स्थल एक्सॉन हिलॉक में पूर्णतः अनुपस्थित होते हैं।
2
सोडियम-पोटैशियम एटीपेज़ पंप का परिवहन अनुपात क्या है और यह विश्रामी विभव कैसे बनाए रखता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: Na+/K+ एटीपेज़ पंप प्रति चक्र एक ATP खर्च करके ३ Na+ आयनों को एक्सोप्लाज्म से बाहर निकालता है और २ K+ आयनों को भीतर लाता है (३ Na+ बाहर : २ K+ अंदर)। बाहर अधिक धन आवेश भेजने से आंतरिक सतह ऋणात्मक बनी रहती है और आयनिक प्रवणता स्थिर रहकर -70 mV विश्रामी विभव सुनिश्चित होता है।
3
साल्टेटरी संवहन किसे कहते हैं और इसका जैविक महत्व क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मायेलिनयुक्त तंत्रिका तंतुओं में मायेलिन आच्छद के विद्युतरोधी गुण के कारण क्रियात्मक विभव का एक रैनवियर की गांठ से दूसरी गांठ पर छलांग लगाते हुए चलने की प्रक्रिया को साल्टेटरी संवहन कहते हैं। इसका महत्व है: यह संवहन वेग को ५० गुना बढ़ाकर १००–१२० मी/सेकंड तक कर देता है और Na+/K+ पंप की ऊर्जा खपत को ९०% घटा देता है।
4
लिम्बिक तंत्र मस्तिष्क की किन संरचनाओं से मिलकर बनता है और यह किन व्यवहारों को नियंत्रित करता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: लिम्बिक तंत्र मुख्य रूप से हिप्पोकैम्पस, एमिग्डाला, सिंगुलेट जाइरस एवं हाइपोथैलेमस के कुछ भागों से मिलकर बनता है। इसे 'भावनात्मक मस्तिष्क' कहते हैं; यह प्राथमिक भावनाओं (क्रोध, भय, आनंद, कामेच्छा, आक्रामकता) को नियंत्रित करता है तथा हिप्पोकैम्पस की सहायता से नई स्मृतियों को स्थायी दीर्घकालिक स्मृति में संचित करता है।
5
दृष्टिपटल (रेटिना) के पीत बिंदु (फोविया) तथा अंध बिंदु (ऑप्टिक डिस्क) में स्पष्ट अंतर बताइए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पीत बिंदु के मध्य स्थित फोविया में केवल सघन शंकु कोशिकाएं पाई जाती हैं और शलाका कोशिकाएं नहीं होतीं; यह आंख का सर्वाधिक स्पष्ट दृष्टि तीक्ष्णता एवं वर्ण दृष्टि का केंद्र है। जबकि अंध बिंदु वह स्थान है जहाँ से दृक तंत्रिका बाहर निकलती है; इसमें कोई भी प्रकाशग्राही (न शलाका, न शंकु) नहीं होता, अतः यह पूर्णतः दृष्टिहीन होता है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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कक्षा 11 Biology के सभी अध्याय

अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

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