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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 5
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

पुष्पी पादपों की आकारिकी

पुष्पी पादपों की आकारिकी (Morphology of Flowering Plants) आवृतबीजी (एंजियोस्पर्म) पादपों की बाह्य संरचना, रूपात्मक विविधता तथा उनके विशिष्ट पारिस्थितिकीय अनुकूलनों का सुव्यवस्थित वैज्ञानिक अध्ययन है। पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद (WBCHSE) तथा एनसीईआरटी कक्षा 11 जीव विज्ञान के इस अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय में पादपों के कायिक अंगों (जड़, तना तथा पत्ती) एवं जनन अंगों (पुष्पक्रम, पुष्प, फल तथा बीज) की सूक्ष्म संरचना का विशद विवेचन किया गया है। विद्यार्थी जड़ के विभिन्न क्षेत्रों (मूल गोप, दीर्घीकरण क्षेत्र, परिपक्वता क्षेत्र) और उनके विशिष्ट रूपांतरणों (बरगद के स्तंभ मूल, मक्के के अवस्तंभ मूल, मैंग्रोव के न्यूमैटोफोर); तने की पर्वसंधियों तथा पर्वों और भूमिगत संचयी रूपांतरणों (आलू का कंद, अदरक का प्रकंद, प्याज का शल्ककंद); पत्तियों के शिराविन्यास तथा पर्णविन्यास; पुष्प की सममिति एवं अंडाशय की स्थिति (जायांगधर, परिजायांगी, अधिजायिक); पुष्पदल विन्यास तथा बीजांडन्यास; और तीन प्रमुख पादप कुलों—फैबेसी (Fabaceae), सोलेनेसी (Solanaceae) तथा लिलिएसी (Liliaceae) के पुष्पीय सूत्रों व आर्थिक महत्व का गहन अध्ययन करते हैं। बोर्ड परीक्षाओं तथा नीट (NEET) में पूर्ण अंक प्राप्त करने हेतु यह अध्याय आधारशिला है।

क्या आपने कभी सोचा है?

आलू और शकरकंद दोनों मिट्टी के नीचे भोजन संचित करते हैं, फिर भी वनस्पति विज्ञान में आलू को तना और शकरकंद को जड़ क्यों माना जाता है?

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पादप आकारिकी का ज्ञान कृषि विज्ञान, बागवानी (हॉर्टिकल्चर), वानिकी और औषध निर्माण (फार्माकोग्नोसी) का मूल आधार है। आलू, अदरक, अरबी और शकरकंद के कायिक अंगों की सटीक रूपात्मक समझ किसानों को उनकी उन्नत बुआई और अधिकतम पैदावार प्राप्त करने में सहायता करती है। पुष्पीय सममिति, परागण रणनीतियों और बीजांडन्यास की जानकारी संकर बीजों के उत्पादन और कृत्रिम परागण के लिए अपरिहार्य है। इसके साथ ही, आयुर्वेदिक व एलोपैथिक चिकित्सा में प्रयुक्त महत्वपूर्ण औषधीय पौधों जैसे अश्वगंधा, बेलाडोना, मुलेठी और घृतकुमारी (एलोवेरा) की सही पहचान तथा कच्चे औषधीय घटकों में मिलावट की रोकथाम केवल आकारिकीय लक्षणों के आधार पर ही संभव है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • पादप के मुख्य अंगों: जड़, तना, पत्ती, पुष्प और बीज की आधारभूत समझ।
  • भ्रूण के मूलांकुर (Radicle) से जड़ तथा प्रांकुर (Plumule) से प्ररोह के विकास का ज्ञान।
  • एकबीजपत्री (Monocot) एवं द्विबीजपत्री (Dicot) पादपों का प्राथमिक अंतर।
  • पुष्प के चार प्रमुख चक्रों (बाह्यदलपुंज, दलपुंज, पुमंग तथा जायांग) की सामान्य जानकारी।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मूल तंत्र: आकारिकी, अनुदैर्ध्य क्षे...
2 तना: आकारिकी, शाखन, भूमिगत संचयी रू...
3 पत्ती: आकारिकी, शिराविन्यास, प्रकार...
4 पुष्पक्रम एवं पुष्प की संरचना, सममि...
5 पुष्पदल विन्यास, पुमंग व जायांग का...
6 प्रमुख पादप कुलों का अर्ध-तकनीकी वि...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मूल तंत्र: आकारिकी, अनुदैर्ध्य क्षेत्र तथा अनुकूलनात्मक रूपांतरण

जड़ पादप शरीर का अवरोही (descending), अप्रकाशानुवर्ती (negatively phototropic), धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती (positively geotropic) तथा धनात्मक जलानुवर्ती (positively hydrotropic) अक्षीय भाग है, जिस पर पर्व (nodes), पर्वसंधियाँ (internodes), पत्तियाँ और कलिकाएँ अनुपस्थित होती हैं। जड़ पादप को मिट्टी में दृढ़ता से स्थिर रखती है, जल और खनिज लवणों का अवशोषण करती है, पादप वृद्धि नियंत्रकों का संश्लेषण करती है, तथा संचित खाद्य पदार्थों का भंडारण करती है।

1. मूल तंत्र के प्रमुख प्रकार (Types of Root Systems)
  • मूसला जड़ तंत्र (Tap Root System): अधिकांश द्विबीजपत्री पादपों में, बीज के अंकुरण के समय भ्रूणीय मूलांकुर (radicle) के सीधे दीर्घीकरण से एक प्राथमिक जड़ (primary root) बनती है जो मिट्टी में गहराई तक जाती है। इस प्राथमिक जड़ से द्वितीयक, तृतीयक आदि पार्श्व शाखाएँ निकलती हैं। प्राथमिक जड़ तथा उसकी शाखाएँ मिलकर मूसला जड़ तंत्र बनाती हैं (उदा. सरसों Brassica campestris, चना, सूरजमुखी)।
  • झकड़ा या रेशेदार जड़ तंत्र (Fibrous Root System): एकबीजपत्री पादपों में मूलांकुर से विकसित प्राथमिक जड़ अल्पकालिक (short-lived) होती है और शीघ्र ही नष्ट हो जाती है। इसके स्थान पर तने के आधार से अनेक पतली, धागेनुमा जड़ें एक गुच्छे के रूप में निकलती हैं, जो मिट्टी की ऊपरी सतह में फैलती हैं (उदा. गेहूँ Triticum aestivum, धान, मक्का)।
  • अपस्थानिक जड़ तंत्र (Adventitious Root System): वे जड़ें जो भ्रूणीय मूलांकुर के अतिरिक्त पादप के किसी अन्य भाग —जैसे तने की पर्वसंधि, शाखा या पत्ती से विकसित होती हैं (उदा. घास, मॉन्स्टेरा, बरगद का वृक्ष Ficus benghalensis)।
2. एक प्ररूपी जड़ के अनुदैर्ध्य क्षेत्र (Zonation of a Typical Root)

जड़ के शीर्ष से आधार की ओर निम्नलिखित चार स्पष्ट आकारिकीय क्षेत्र पाए जाते हैं:

  1. मूल गोप क्षेत्र (Root Cap Zone): जड़ के कोमल शीर्ष पर स्थित अंगुस्ताने (thimble) जैसी सुरक्षात्मक टोपीनुमा संरचना। यह कठोर मिट्टी के कणों के घर्षण से शीर्षस्थ विभज्योतक की रक्षा करती है और श्लेष्म (mucilage) स्रावित कर जड़ के आगे बढ़ने का मार्ग सुगम बनाती है। (जलीय पादपों जैसे पिस्टिया व जलकुंभी में मूल गोप के स्थान पर ढीली मूल कोटरिकाएँ / Root Pockets पाई जाती हैं)।
  2. विभज्योतकी सक्रियता का क्षेत्र (Region of Meristematic Activity): मूल गोप से कुछ मिलीमीटर ऊपर स्थित। इसकी कोशिकाएं अत्यंत सूक्ष्म, पतली भित्ति वाली, सघन जीवद्रव्य से युक्त तथा बिना रिक्तिकाओं की होती हैं। ये कोशिकाएं तीव्र समसूत्री विभाजन कर नई कोशिकाएं जोड़ती हैं।
  3. दीर्घीकरण क्षेत्र (Region of Elongation): विभज्योतकी क्षेत्र के ठीक पीछे स्थित। इस क्षेत्र की कोशिकाएं लंबाई में तीव्र वृद्धि और फैलाव करती हैं, जिसके कारण जड़ की लंबाई में तीव्र वृद्धि होती है।
  4. परिपक्वता क्षेत्र (Region of Maturation / Differentiation): दीर्घीकरण क्षेत्र के पीछे का भाग। यहाँ की कोशिकाएं विभेदित होकर विभिन्न प्राथमिक ऊतकों (जाइलम, फ्लोएम, वल्कुट, अंतस्त्वचा) का निर्माण करती हैं। इस क्षेत्र की बाह्यत्वचा (epiblema) की कोशिकाएं पतली, कोमल, एककोशिकीय धागेनुमा संरचनाएं बनाती हैं जिन्हें मूलरोम (Root Hairs) कहते हैं। ये जल तथा खनिज लवणों के अवशोषण हेतु सतही क्षेत्रफल को कई गुना बढ़ा देते हैं।
3. जड़ों के अनुकूलनात्मक रूपांतरण (Modifications of Roots)
  • भोजन संग्रह हेतु रूपांतरण (Storage of Food):
    • शंकुरूप जड़ (Conical root): आधार पर चौड़ी तथा शीर्ष की ओर क्रमशः पतली होती जाती है (उदा. गाजर Daucus carota)।
    • तर्कुरूप जड़ (Fusiform root): मध्य में फूली हुई तथा दोनों सिरों की ओर पतली (उदा. मूली Raphanus sativus)।
    • कुंभीरूप जड़ (Napiform root): आधार पर गोलाकार घड़े जैसी तथा शीर्ष पर अचानक पूँछ के समान पतली (उदा. शलजम Brassica rapa, चुकंदर)।
    • कंदिल अपस्थानिक जड़ (Tuberous adventitious root): बिना किसी निश्चित आकार के अनियमित फूली हुई (उदा. शकरकंद Ipomoea batatas)।
  • यांत्रिक सहारा देने हेतु रूपांतरण (Mechanical Support):
    • स्तंभ मूल (Prop Roots / Pillar Roots): विशाल वृक्ष की भारी क्षैतिज वायवीय शाखाओं से निकलकर लंबवत नीचे की ओर मिट्टी में धँसने वाली मोटी खंभेनुमा जड़ें, जो गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध यांत्रिक सहारा प्रदान करती हैं (उदा. बरगद Ficus benghalensis)।
    • अवस्तंभ मूल (Stilt Roots): मुख्य तने की निचली पर्वसंधियों से तिरछी निकलकर मिट्टी में प्रवेश करने वाली मजबूत जड़ें, जो लंबे, पतले तने को गिरने से बचाती हैं (उदा. मक्का Zea mays, गन्ना Saccharum officinarum)।
  • श्वसन हेतु रूपांतरण (Pneumatophores / Respiratory Roots): मैंग्रोव या लवणोद्भिद् (halophytes) पादप जो दलदली, खारे, ऑक्सीजन-रहित जलभराव वाले क्षेत्रों में उगते हैं, उनमें भूमिगत जड़ों से अनेक शाखाएं लंबवत ऊपर की ओर (ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्ती) निकलकर कीचड़ और जल से बाहर हवा में आ जाती हैं। इन विशिष्ट जड़ों को श्वसन मूल (न्यूमैटोफोर) कहते हैं। इन पर सूक्ष्म वातरंध्र (lenticels / pneumathodes) पाए जाते हैं, जिनके माध्यम से वायुमंडलीय ऑक्सीजन सीधे आंतरिक वात ऊतकों (aerenchyma) में प्रवेश करती है (उदा. राइजोफोरा Rhizophora, एविसीनिया, सोनेरेशिया)।

तना: आकारिकी, शाखन, भूमिगत संचयी रूपांतरण एवं वायवीय अनुकूलन

तना पादप शरीर का आरोही (ascending), धनात्मक प्रकाशानुवर्ती (positively phototropic) तथा ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्ती (negatively geotropic) अक्ष है, जो भ्रूण के प्रांकुर (plumule) से विकसित होता है। इस पर पत्तियाँ, शाखाएँ, पुष्प और फल लगते हैं। तना जड़ों से स्पष्ट रूप से इसलिए भिन्न होता है क्योंकि इस पर नियमित अंतराल पर पर्वसंधियाँ (Nodes) और पर्व (Internodes) पाए जाते हैं, तथा पत्ती के कक्ष में कक्षीय कलिका (Axillary bud) उपस्थित होती है।

1. तने के भूमिगत रूपांतरण (Underground Modifications of Stem)

प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवित रहने, भोजन संचय और कायिक प्रवर्धन (vegetative propagation) हेतु भूमिगत तने रूपांतरित होते हैं:

  • कंद (Stem Tuber): भूमिगत शाखाओं के अंतिम सिरों पर भोजन संचय के कारण फूला हुआ भाग। इस पर पर्वसंधियों के स्थान पर गड्ढे पाए जाते हैं जिन्हें 'आँखें' (Eyes) कहते हैं। प्रत्येक आँख वास्तव में एक शल्क पत्र (scale leaf) के कक्ष में स्थित कक्षीय कलिका होती है जो अंकुरित होकर नया पौधा बना सकती है (उदा. आलू Solanum tuberosum)। (आलू तना है क्योंकि इसमें आँखें/कलिकाएं और पर्वसंधियां होती हैं, जबकि शकरकंद में ये अनुपस्थित होते हैं)।
  • प्रकंद (Rhizome): मृदा की सतह के समानांतर क्षैतिज रूप से बढ़ने वाला मोटा, मांसल, भूरा तना। इस पर स्पष्ट पर्व, पर्वसंधियाँ, शल्क पत्र, कक्षीय कलिकाएँ तथा अपस्थानिक जड़ें पाई जाती हैं (उदा. अदरक Zingiber officinale, हल्दी Curcuma longa)।
  • घनकंद (Corm): मृदा में ऊर्ध्वाधर (vertical) दिशा में बढ़ने वाला अत्यधिक संकुचित, ठोस, फूला हुआ गोल भूमिगत तना। इस पर वृत्ताकार पर्वसंधियाँ, शल्क पत्र तथा बड़ी शीर्षस्थ व कक्षीय कलिकाएं होती हैं (उदा. ज़मीकंद Amorphophallus, अरबी Colocasia, केसर Crocus)।
  • शल्ककंद (Bulb): अत्यधिक लघुकृत (reduced) चपटा या उत्तल तना, जिसके ऊपर कई मांसल व शुष्क शल्क पत्र संकेंद्रित रूप में लगे होते हैं। भोजन मुख्य रूप से मांसल शल्क पत्रों में संचित रहता है (उदा. प्याज Allium cepa, लहसुन Allium sativum)।
2. तने के अर्ध-वायवीय रूपांतरण (Sub-aerial Modifications)
  • उपरिभूस्तारी (Runner): मृदा की सतह पर रेंगकर चलने वाला पतला तना। पर्वसंधियों से नीचे अपस्थानिक जड़ें और ऊपर पत्तियाँ निकलती हैं (उदा. दूब घास Cynodon dactylon, खट्टी बूटी Oxalis)।
  • भूस्तारी (Stolon): मुख्य तने के आधार से निकलने वाली वायवीय पार्श्व शाखा जो कुछ दूर हवा में धनुषाकार मुड़कर जमीन को छूती है और वहाँ नई जड़ें व प्ररोह बनाती है (उदा. चमेली Jasminum, पुदीना Mentha)।
  • भूस्तारिका (Offset): जलीय पादपों में पाया जाने वाला एक पर्व लंबा, मोटा, स्पंजी तना। प्रत्येक पर्वसंधि पर ऊपर पत्तियों का गुच्छा (rosette) और नीचे जड़ों का गुच्छा निकलता है (उदा. जलकुंभी Eichhornia crassipes, पिस्टिया)।
  • अंतःभूस्तारी (Sucker): मुख्य भूमिगत तने से तिरछी निकलकर बाहर आने वाली शाखा (उदा. केला, अनन्नास, गुलदाउदी Chrysanthemum)।
3. तने के वायवीय रूपांतरण (Aerial Modifications)
  • स्तंभ प्रतान (Stem Tendrils): पतली, कुंडलित, धागेनुमा संवेदनशील संरचनाएं जो कक्षीय कलिकाओं से विकसित होकर दुर्बल तने वाले पादपों को सहारे पर चढ़ने में मदद करती हैं (उदा. लौकी, कद्दू, खीरा Cucumis, अंगूर Vitis)।
  • स्तंभ शूल / काँटे (Thorns): कक्षीय कलिकाओं के रूपांतरण से बनी कठोर, सीधी, नुकीली काष्ठीय संरचनाएं। ये वाष्पोत्सर्जन कम करती हैं तथा शाकाहारी पशुओं से पादप की रक्षा करती हैं (उदा. नींबू / सिट्रस Citrus, बोगेनविलिया)।
  • प्रणाभ स्तंभ (Phylloclade): शुष्क मरुद्भिद् (xerophytic) पादपों में तना चपटा या बेलनाकार, हरा तथा मांसल होकर पत्ती के समान प्रकाश संश्लेषण करने लगता है, जबकि पत्तियाँ वाष्पोत्सर्जन रोकने हेतु कांटों में बदल जाती हैं (उदा. चपटा प्रणाभ स्तंभ—नागफनी Opuntia; बेलनाकार प्रणाभ स्तंभ—यूफोर्बिया Euphorbia tirucalli)।
  • प्रणाभ पर्व (Cladode): केवल एक या दो पर्व (internodes) लंबा हरा प्रणाभ स्तंभ (उदा. शतावरी Asparagus, रस्कस Ruscus)।

पत्ती: आकारिकी, शिराविन्यास, प्रकार, पर्णविन्यास एवं कार्यात्मक रूपांतरण

पत्ती तने की पर्वसंधि पर पार्श्व रूप से उत्पन्न होने वाली चपटी, हरी, प्रकाश संश्लेषक अंग है, जो बहिर्जात (exogenous) रूप से प्ररोह शीर्षस्थ विभज्योतक से विकसित होती है। इसके कक्ष में एक कक्षीय कलिका पाई जाती है जो बाद में शाखा में बदल सकती है।

1. पत्ती की संरचना (Parts of a Typical Foliage Leaf)
  1. पर्णाधार (Leaf Base / Hypopodium): पत्ती का वह आधारभूत भाग जिसके द्वारा वह तने की पर्वसंधि से जुड़ी रहती है। पर्णाधार के दोनों ओर दो छोटे पार्श्व उपांग हो सकते हैं जिन्हें अनुपत्र (Stipules) कहते हैं। लेग्यूमिनोसी कुल में पर्णाधार फूला हुआ हो जाता है जिसे पर्णवृंततल्प (Pulvinus) कहते हैं, जो स्पर्श या रात्रि में पत्तियों के झुकने (nyctinasty) में सहायक होता है। एकबीजपत्री पौधों में पर्णाधार तने को आंशिक या पूर्ण रूप से ढकने वाले आच्छदी पर्णाधार (Sheathing leaf base) में बदल जाता है।
  2. पर्णवृंत (Petiole / Mesopodium): पत्ती का डंठल जो पर्णफलक को प्रकाश की ओर उठाए रखता है और हवा में हिलने-डुलने देता है, जिससे फलक ठंडा रहता है और ताजी हवा मिलती है।
  3. पर्णफलक (Lamina / Leaf Blade / Epipodium): पत्ती का चौड़ा, चपटा, हरा भाग जिसमें शिराएं (veins) और शिरिकाएं (veinlets) फैली होती हैं। मध्य में स्थित सबसे प्रमुख मोटी शिरा को मध्यशिरा (Midrib) कहते हैं। शिराएं फलक को दृढ़ता प्रदान करती हैं तथा जल, खनिज लवण और कार्बनिक भोजन के संवहन हेतु नलिकाओं का कार्य करती हैं।
2. शिराविन्यास (Venation)

पर्णफलक पर शिराओं और शिरिकाओं की व्यवस्था को शिराविन्यास कहते हैं:

  • जालिकावत शिराविन्यास (Reticulate Venation): शिरिकाएं आपस में मिलकर फलक पर एक सघन जाल (network) जैसी संरचना बनाती हैं। यह अधिकांश द्विबीजपत्री पादपों का लाक्षणिक लक्षण है (उदा. आम, पीपल Ficus religiosa, सरसों, गुड़हल)।
  • समानांतर शिराविन्यास (Parallel Venation): शिराएं मध्यशिरा के समानांतर अथवा पर्णवृंत से शीर्ष तक समानांतर क्रम में दौड़ती हैं, कोई जाल नहीं बनातीं। यह अधिकांश एकबीजपत्री पादपों का लाक्षणिक लक्षण है (उदा. घास, केला, मक्का, गेहूँ, बाँस)।
3. सरल एवं संयुक्त पत्तियाँ (Simple vs Compound Leaves)
  • सरल पत्ती (Simple Leaf): जब पर्णफलक पूर्णतः अखंडित (entire) हो, अथवा यदि कटाव (incision) हो भी तो वह मध्यशिरा तक न पहुँचे (उदा. आम, अमरूद, पीपल)।
  • संयुक्त पत्ती (Compound Leaf): जब पर्णफलक का कटाव मध्यशिरा तक पहुँचकर उसे कई स्वतंत्र खंडों में बाँट दे, जिन्हें पर्णक (Leaflets) कहते हैं। (संयुक्त पत्ती के पर्णकों के कक्ष में कभी भी कक्षीय कलिका नहीं होती, बल्कि संपूर्ण संयुक्त पत्ती के आधार पर कक्षीय कलिका उपस्थित होती है):
    • पिच्छाकार संयुक्त (Pinnately Compound): पर्णक एक सामान्य अक्ष (रैकिस / rachis) के दोनों ओर पंख के समान व्यवस्थित होते हैं, जो मध्यशिरा का ही रूपांतरण है (उदा. नीम Azadirachta indica, गुलाब, इमली)।
    • हस्ताकार संयुक्त (Palmately Compound): सभी पर्णक एक ही उभयनिष्ठ बिंदु अर्थात् पर्णवृंत के शीर्ष से हथेली की अंगुलियों की तरह जुड़े होते हैं (उदा. सेमल / सिल्क कॉटन Bombax ceiba)।
4. पर्णविन्यास (Phyllotaxy)

तने या शाखा पर पत्तियों के विन्यास के क्रम को पर्णविन्यास कहते हैं, ताकि प्रत्येक पत्ती को अधिकतम सूर्य का प्रकाश मिल सके:

  • एकांतर पर्णविन्यास (Alternate Phyllotaxy): प्रत्येक पर्वसंधि से केवल एक पत्ती निकलती है और अगली पर्वसंधि पर विपरीत दिशा में आती है (उदा. गुड़हल Hibiscus, सरसों Brassica, सूर्यमुखी)।
  • सम्मुख पर्णविन्यास (Opposite Phyllotaxy): प्रत्येक पर्वसंधि से दो पत्तियाँ एक-दूसरे के आमने-सामने निकलती हैं (उदा. मदार/आक Calotropis, अमरूद Psidium guajava)।
  • चक्करदार पर्णविन्यास (Whorled Phyllotaxy): एक ही पर्वसंधि से दो से अधिक पत्तियाँ एक घेरे या चक्र के रूप में निकलती हैं (उदा. सप्तपर्णी Alstonia scholaris, कनेर Nerium)।
5. पत्तियों के अनुकूलनात्मक रूपांतरण (Leaf Modifications)
  • पर्ण प्रतान (Leaf Tendrils): पत्ती या उसके भाग दुर्बल तने को सहारे पर चढ़ाने के लिए पतले कुंडलित प्रतान में बदल जाते हैं (उदा. मटर Pisum sativum में ऊपरी पर्णक प्रतान बनते हैं)।
  • पर्ण शूल (Leaf Spines): वाष्पोत्सर्जन रोकने व शाकाहारी जंतुओं से रक्षा हेतु पत्तियाँ नुकीले कांटों में बदल जाती हैं (उदा. नागफनी Opuntia, कैक्टस, यूफोर्बिया)।
  • प्रणाभ वृंत (Phyllode): कुछ पादपों में पर्णक शीघ्र गिर जाते हैं और पर्णवृंत (petiole) चपटा, हरा, पत्ती जैसा बनकर प्रकाश संश्लेषण करने लगता है (उदा. ऑस्ट्रेलियन बबूल Acacia auriculiformis)।
  • कीटाहारी रूपांतरण: नाइट्रोजन की कमी वाली दलदली मिट्टी में उगने वाले पादपों की पत्तियाँ कीट पकड़ने हेतु रूपांतरित हो जाती हैं (उदा. घटपर्णी Nepenthes में पर्णफलक घड़े में बदल जाता है, ब्लैडरवॉर्ट Utricularia)।

पुष्पक्रम एवं पुष्प की संरचना, सममिति तथा पुष्पासन पर स्थिति

पुष्प आवृतबीजी पादपों का रूपांतरित संघनित प्ररोह (modified condensed shoot) है जो लैंगिक जनन संपन्न करने हेतु विशिष्टीकृत होता है। प्ररोह शीर्षस्थ विभज्योतक पुष्पीय विभज्योतक में बदल जाता है, पर्वों का दीर्घीकरण रुक जाता है और पर्वसंधियाँ अत्यधिक पास-पास आ जाती हैं, जिन पर पत्तियों के स्थान पर पुष्पीय उपांग (पुष्पपत्र) चक्रों में व्यवस्थित होते हैं।

1. पुष्पक्रम के प्रकार (Types of Inflorescence)

पुष्पीय अक्ष (Peduncle) पर पुष्पों के लगने की व्यवस्था को पुष्पक्रम कहते हैं:

  • असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence): मुख्य अक्ष अनिश्चित काल तक वृद्धि करता रहता है और कभी भी पुष्प में समाप्त नहीं होता। पुष्प अक्ष के पार्श्व में अग्राभिसारी क्रम (Acropetal succession) में लगते हैं—अर्थात् सबसे पुराने और बड़े पुष्प आधार की ओर तथा सबसे नए और छोटे पुष्प शीर्ष की ओर होते हैं। पुष्पों का खिलना केंद्राभिसारी (centripetal) होता है (उदा. सरसों, मूली, गुलमोहर)।
  • ससीमाक्षी पुष्पक्रम (Cymose Inflorescence): मुख्य अक्ष की वृद्धि शीर्ष पर एक पुष्प बनने से रुक जाती है (सीमित वृद्धि)। पार्श्व शाखाएं नीचे से निकलती हैं और वे भी पुष्प में समाप्त होती हैं। पुष्प तलाभिसारी क्रम (Basipetal succession) में लगते हैं —अर्थात् सबसे पुराना पुष्प शीर्ष पर तथा नए पुष्प आधार की ओर होते हैं। पुष्पों का खिलना केंद्रोपसारी (centrifugal) होता है (उदा. चमेली, बोगेनविलिया, सोलेनम)।
  • विशिष्ट पुष्पक्रम (Special Inflorescences):
    • कटोरिया (Cyathium): प्यालेनुमा चक्र सहपत्रों द्वारा बनता है जिसमें केंद्र में एक नग्न मादा पुष्प और चारों ओर कई नर पुष्प होते हैं (उदा. Euphorbia)।
    • कूटचक्रक (Verticillaster): सम्मुख पत्तियों के कक्ष में संघनित द्विशाखी ससीमाक्षी पुष्पक्रम जो एक चक्र जैसा दिखाई देता है (उदा. तुलसी Ocimum sanctum, लेबिएटी कुल)।
    • हाइपैन्थोडियम या उदुंबरक (Hypanthodium): मांसल पुष्पासन खोखला होकर एक नाशपाती जैसा गड्ढा बना लेता है जिसके अंदर सूक्ष्म पुष्प लगे होते हैं और शीर्ष पर एक छिद्र (ostiole) होता है (उदा. गूलर, अंजीर, बरगद Ficus)।
2. पुष्प की संरचना एवं पुष्पीय चक्र (Structure of a Flower)

एक पूर्ण पुष्प पुष्पासन (Thalamus / Receptacle) पर लगे चार संकेंद्रित चक्रों से बना होता है:

  1. बाह्यदलपुंज (Calyx - $K$): सबसे बाहरी सुरक्षात्मक चक्र, जिसकी इकाइयों को बाह्यदल (Sepals) कहते हैं। ये सामान्यतः हरे होते हैं और कली अवस्था में आंतरिक चक्रों की रक्षा करते हैं। जब बाह्यदल स्वतंत्र हों तो पृथकबाह्यदली (polysepalous) और जब परस्पर जुड़े हों तो संयुक्तबाह्यदली (gamosepalous) कहलाते हैं।
  2. दलपुंज (Corolla - $C$): दूसरा चक्र, जिसकी इकाइयों को दल या पंखुड़ियाँ (Petals) कहते हैं। ये चमकीले, रंगीन और सुगंधित होते हैं जो कीटों को परागण हेतु आकर्षित करते हैं। जब दल स्वतंत्र हों तो पृथकदली (polypetalous) और जुड़े हों तो संयुक्तदली (gamopetalous) कहलाते हैं।
  3. (जब बाह्यदलपुंज और दलपुंज में अंतर न किया जा सके, जैसे प्याज और लिली में, तो इसे परिदलपुंज (Perianth - $P$) कहते हैं और इसकी प्रत्येक इकाई को परिदल (Tepal) कहा जाता है)।
  4. पुमंग (Androecium - $A$): नर जनन चक्र, जिसकी प्रत्येक इकाई को पुंकेसर (Stamen) कहते हैं। प्रत्येक पुंकेसर में एक पतला तंतु (filament) और शीर्ष पर द्विपालिक परागकोश (anther) होता है, जिसमें परागकण बनते हैं।
  5. जायांग (Gynoecium / Pistil - $G$): केंद्रीय मादा जनन चक्र, जिसकी प्रत्येक इकाई को अंडप (Carpel) कहते हैं। अंडप के तीन भाग होते हैं: वर्तिकाग्र (stigma), वर्तिका (style), और आधारीय फूला हुआ अंडाशय (ovary), जिसमें बीजांड स्थित होते हैं।
3. पुष्प की सममिति (Floral Symmetry)
  • त्रिज्यासममित पुष्प (Actinomorphic Flower - $\oplus$): जब पुष्प को किसी भी ऊर्ध्वाधर केंद्रीय अक्ष से काटने पर वह दो समान अर्धांशों में विभाजित हो सके (अरीय सममिति)। (उदा. सरसों Brassica, धतूरा Datura, मिर्च Capsicum)।
  • एकव्याससममित पुष्प (Zygomorphic Flower - $\%$): जब पुष्प केवल एक विशिष्ट ऊर्ध्वाधर तल से ही दो समान बाएं और दाएं अर्धांशों में विभाजित हो सके (द्विपार्श्विक सममिति)। (उदा. मटर Pisum, सेम, गुलमोहर, केसिया)।
  • असममित पुष्प (Asymmetric / Irregular Flower): जब पुष्प किसी भी केंद्रीय ऊर्ध्वाधर तल से दो समान भागों में न बाँटा जा सके (उदा. कैना Canna indica)।
4. पुष्पासन पर पुष्पीय भागों के निवेशन के आधार पर अंडाशय की स्थिति

पुष्पासन पर बाह्यदलपुंज, दलपुंज और पुमंग के सापेक्ष अंडाशय की स्थिति के आधार पर पुष्प तीन प्रकार के होते हैं:

  • जायांगधर पुष्प (Hypogynous Flower): पुष्पासन उत्तल या शंक्वाकार होता है। जायांग सबसे शीर्ष पर स्थित होता है और अन्य तीनों चक्र (बाह्यदल, दल, पुमंग) इसके नीचे से निकलते हैं। इस स्थिति में अंडाशय ऊर्ध्ववर्ती (Superior Ovary - $\underline{G}$) कहलाता है (उदा. सरसों, गुड़हल, बैंगन)।
  • परिजायांगी पुष्प (Perigynous Flower): पुष्पासन चपटा या प्यालेनुमा हो जाता है। जायांग केंद्र में स्थित होता है और अन्य चक्र प्याले के किनारे पर लगभग समान ऊँचाई पर लगे होते हैं। इस स्थिति में अंडाशय अर्ध-अधोवर्ती (Half-inferior Ovary - $-\text{G}-$) कहलाता है (उदा. आलूबुखारा / प्लम, गुलाब, आड़ू / पीच)।
  • अधिजायिक पुष्प (Epigynous Flower): पुष्पासन का किनारा ऊपर की ओर बढ़कर अंडाशय को पूरी तरह घेर लेता है और उससे संलयित हो जाता है। अन्य तीनों चक्र अंडाशय के शीर्ष से निकलते हैं। इस स्थिति में अंडाशय अधोवर्ती (Inferior Ovary - $\bar{G}$) कहलाता है (उदा. अमरूद, खीरा, सूरजमुखी के रश्मि पुष्पक / Ray florets)।

पुष्पदल विन्यास, पुमंग व जायांग का संगठन, बीजांडन्यास, फल तथा बीज

पुष्प के आंतरिक जनन अंगों की संरचना, पुंकेसरों का संसंजन व आसंजन, अंडाशय में बीजांडों के जुड़ने की व्यवस्था (बीजांडन्यास), तथा निषेचन के पश्चात फल और बीज का निर्माण आवृतबीजी पादपों के वर्गीकरण के सबसे प्रामाणिक आधार हैं।

1. पुष्पदल विन्यास (Aestivation)

कली अवस्था में पुष्पीय चक्र के सदस्यों (बाह्यदलों अथवा दलों) की परस्पर सापेक्ष व्यवस्था को पुष्पदल विन्यास कहते हैं:

  • कोरस्पर्शी (Valvate): बाह्यदलों या दलों के किनारे एक-दूसरे को केवल स्पर्श करते हैं, अतिव्याप्त (overlap) नहीं करते (उदा. कैलोट्रोपिस / मदार, सरसों)।
  • व्यावर्तित (Twisted / Contorted): एक दल का एक किनारा अगले दल के किनारे को अतिव्याप्त करता है और उसका दूसरा किनारा पिछले दल द्वारा अतिव्याप्त होता है (नियमित आवर्तन) (उदा. गुड़हल, कपास, भिंडी)।
  • कोरछादी (Imbricate): दलों के किनारे एक-दूसरे को अनियमित रूप से अतिव्याप्त करते हैं, कोई निश्चित दिशा नहीं होती (एक दल पूर्णतः अंदर, एक दल पूर्णतः बाहर और बाकी आंशिक अतिव्याप्त) (उदा. केसिया Cassia, गुलमोहर)।
  • वैक्सिलरी या ध्वजीय (Vexillary / Papilionaceous): इसमें कुल 5 दल होते हैं: सबसे बड़ा पश्च दल मानक या ध्वज (Standard / Vexillum), जो दो पार्श्व दलों पंख (Wings / Alae) को ढकता है, और ये दोनों पंख सबसे आगे स्थित दो संयुक्त नाव जैसे दलों नौतल (Keel / Carina) को ढकते हैं। पुष्पीय संकेत: $C_{1+2+(2)}$ (उदा. मटर, सेम, चना—फैबेसी कुल का विशिष्ट लक्षण)।
2. पुमंग का संसंजन एवं आसंजन (Cohesion and Adhesion of Stamens)
  • संसंजन (Cohesion - पुंकेसरों का आपस में जुड़ना):
    • एकसंघी (Monadelphous): सभी पुंकेसरों के तंतु जुड़कर एक संयुक्त नली बना लेते हैं, जबकि परागकोश स्वतंत्र रहते हैं (उदा. गुड़हल Hibiscus)।
    • द्विसंघी (Diadelphous): पुंकेसरों के तंतु जुड़कर दो बंडलों में विभाजित होते हैं (उदा. मटर में 10 पुंकेसर $(9)+1$ के रूप में व्यवस्थित होते हैं—9 जुड़े हुए और 1 स्वतंत्र)।
    • बहुसंघी (Polyadelphous): तंतु जुड़कर दो से अधिक बंडल बनाते हैं (उदा. सिट्रस / नींबू)।
    • युक्तकोशी (Syngenesious): परागकोश आपस में जुड़े होते हैं परंतु तंतु स्वतंत्र रहते हैं (उदा. सूरजमुखी / कंपोजिटी कुल)।
  • आसंजन (Adhesion - पुंकेसरों का अन्य चक्रों से जुड़ना):
    • दललग्न (Epipetalous): पुंकेसर दलों (पंखुड़ियों) से जुड़े होते हैं (उदा. बैंगन, धतूरा)।
    • परिदललग्न (Epiphyllous): पुंकेसर परिदलपुंज (tepals) से जुड़े होते हैं (उदा. प्याज, लिली)।
  • बंध्य पुंकेसर (Staminode): जननक्षम परागकण उत्पन्न करने में असमर्थ बंध्य (sterile) पुंकेसर।
3. जायांग एवं बीजांडन्यास (Gynoecium and Placentation)

जब एक पुष्प में एक से अधिक अंडप हों और वे परस्पर स्वतंत्र हों तो उन्हें वियुक्तांडपी (Apocarpous) कहते हैं (उदा. कमल, गुलाब)। जब सभी अंडप आपस में जुड़े हों तो उन्हें युक्तांडपी (Syncarpous) कहते हैं (उदा. सरसों, टमाटर)।

अंडाशय के अंदर बीजांडासन (Placenta) पर बीजांडों (Ovules) के लगने की व्यवस्था को बीजांडन्यास (Placentation) कहते हैं:

  • सीमांत बीजांडन्यास (Marginal Placentation): अंडाशय एकांडपी (monocarpellary) होता है। बीजांडासन अंडाशय की अधर सीवनी (ventral suture) के किनारे एक कटक बनाता है और बीजांड दो कतारों में लगे होते हैं (उदा. मटर Pisum, चना)।
  • अक्षीय बीजांडन्यास (Axile Placentation): अंडाशय युक्तांडपी एवं बहुकोष्ठीय (multilocular) होता है। अंडपों की सीवनियाँ केंद्र में मिलकर एक केंद्रीय अक्ष बनाती हैं और बीजांड प्रत्येक कोष्ठक में केंद्रीय अक्ष से जुड़े होते हैं (उदा. टमाटर, नींबू, गुड़हल, प्याज)।
  • भित्तीय बीजांडन्यास (Parietal Placentation): बीजांड एककोष्ठीय अंडाशय की आंतरिक भित्ति या परिधीय भाग पर विकसित होते हैं। सरसों और आर्जीमोन में एक कूटपट (आभासी पट / Replum) बन जाने से अंडाशय द्विकोष्ठीय दिखाई देने लगता है (उदा. सरसों Brassica, आर्जीमोन)।
  • मुक्त-केंद्रीय बीजांडन्यास (Free Central Placentation): बीजांड केंद्रीय अक्ष पर लगे होते हैं और अंडाशय में पट (septa) पूर्णतः अनुपस्थित होते हैं (एककोष्ठीय) (उदा. डायन्थस Dianthus, प्रिमरोज़ Primula)।
  • आधारी बीजांडन्यास (Basal Placentation): बीजांडासन एककोष्ठीय अंडाशय के आधार पर विकसित होता है और इससे केवल एक एकल बीजांड जुड़ा रहता है (उदा. सूरजमुखी Helianthus, गेंदा Tagetes)।
4. फल तथा बीज की आकारिकी (Fruit and Seed Morphology)
  • अष्ठिल फल (Drupe): आम (Mangifera indica) और नारियल (Cocos nucifera) में पाया जाने वाला एकल-बीजीय फल जो एकांडपी ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय से विकसित होता है। इसकी फलभित्ति (Pericarp) तीन स्पष्ट परतों में विभेदित होती है:
    • बाह्यफलभित्ति (Epicarp): सबसे बाहरी पतली त्वचा/छिलका।
    • मध्यफलभित्ति (Mesocarp): आम में यह गूदेदार व खाने योग्य (fleshy and edible) होती है, जबकि नारियल में यह रेशेदार (fibrous) होती है जिससे कॉयर प्राप्त होता है।
    • अंतःफलभित्ति (Endocarp): सबसे भीतरी पथरीली, कठोर गुठली (stony hard), जिसके अंदर बीज सुरक्षित रहता है।
  • बीज की संरचना (Seed Structure): द्विबीजपत्री बीजों (चना, मटर) में दो बीजपत्र होते हैं जिनमें भोजन संचित रहता है और परिपक्व बीज में भ्रूणपोष अनुपस्थित होता है (अभ्रूणपोषी / Non-endospermic)। एकबीजपत्री बीजों (मक्का) में एक बड़ा ढालनुमा बीजपत्र होता है जिसे स्कुटेलम (Scutellum) कहते हैं, तथा भोजन बड़े त्रिगुणित भ्रूणपोष (Endosperm) में संचित रहता है जो प्रोटीनयुक्त एल्यूरॉन परत (Aleurone layer) से घिरा होता है। प्रांकुर एक सुरक्षात्मक आवरण प्रांकुरचोल (Coleoptile) द्वारा और मूलांकुर मूलांकुरचोल (Coleorhiza) द्वारा ढका रहता है।

प्रमुख पादप कुलों का अर्ध-तकनीकी विवरण: फैबेसी, सोलेनेसी तथा लिलिएसी

पादप वर्गीकरण में किसी कुल के वानस्पतिक और पुष्पीय लक्षणों को एक संक्षिप्त वैज्ञानिक भाषा में पुष्पीय सूत्र (Floral Formula) और पुष्पीय चित्र (Floral Diagram) द्वारा निरूपित किया जाता है। पश्चिम बंगाल बोर्ड पाठ्यक्रम में तीन मानक कुलों का अध्ययन अनिवार्य है।

1. कुल फैबेसी (Family Fabaceae / Leguminosae / Papilionoideae)
  • वानस्पतिक लक्षण: शाक, झाड़ी या वृक्ष; जड़ों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले Rhizobium जीवाणु युक्त मूल ग्रंथियां (root nodules); पत्तियाँ एकांतर, पिच्छाकार संयुक्त; पर्णाधार पर्णवृंततल्प (pulvinus); जालिकावत शिराविन्यास।
  • पुष्पीय लक्षण: पुष्पक्रम असीमाक्षी; पुष्प सहपत्री, द्विलिंगी, एकव्याससममित ($\%,$); बाह्यदल 5 संयुक्त ($K_{(5)}$), कोरछादी विन्यास; दल 5 पृथक ($C_{1+2+(2)}$) वैक्सिलरी पुष्पदल विन्यास (1 मानक, 2 पंख, 2 संयुक्त नौतल); पुमंग 10 द्विसंघी ($A_{(9)+1}$), द्विकोष्ठीय परागकोश; जायांग एकांडपी, ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय ($\underline{G}_1$), एककोष्ठीय, सीमांत बीजांडन्यास; फल लेग्यूम / शिम्ब (फली)।
  • पुष्पीय सूत्र (Floral Formula): $\% \; \oint \; K_{(5)} \; C_{1+2+(2)} \; A_{(9)+1} \; \underline{G}_1$
  • आर्थिक महत्व: दालें (चना, अरहर, मूँग, उड़द, मसूर, सोयाबीन); खाद्य तेल (सोयाबीन, मूँगफली); चारा (क्लोवर, सेस्बेनिया); रंजक (नील / Indigofera); रेशे (सनहेम्प); औषध (मुलेठी Glycyrrhiza glabra)।
2. कुल सोलेनेसी (Family Solanaceae - आलू कुल / Potato Family)
  • वानस्पतिक लक्षण: अधिकांशतः शाकीय या झाड़ीनुमा; तना शाकीय, वायवीय, सीधा, शाखित; भूमिगत कंद (आलू); पत्तियाँ एकांतर, सरल, विरल रूप से पिच्छाकार; जालिकावत शिराविन्यास।
  • पुष्पीय लक्षण: पुष्पक्रम एकल, कक्षीय या ससीमाक्षी (साइम); पुष्प द्विलिंगी, त्रिज्यासममित ($\oplus$); बाह्यदल 5 संयुक्त ($K_{(5)}$), कोरस्पर्शी विन्यास, चिरलग्न (persistent) जो फल के साथ भी लगा रहता है (बैंगन, मिर्च, टमाटर); दल 5 संयुक्त ($C_{(5)}$), चक्राकार या घंटाकार, कोरस्पर्शी; पुमंग 5 स्वतंत्र, दललग्न (epipetalous); जायांग द्विअंडपी, युक्तांडपी, ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय ($\underline{G}_{(2)}$), द्विकोष्ठीय, अंडाशय तिरछा स्थित (oblique ovary), बीजांडासन अत्यधिक फूला हुआ (swollen placenta), अक्षीय बीजांडन्यास; फल बेरी (टमाटर, बैंगन) या संपुट/कैप्सूल (धतूरा)।
  • पुष्पीय सूत्र (Floral Formula): $\oplus \; \oint \; K_{(5)} \; \overbrace{C_{(5)} \; A_5} \; \underline{G}_{(2)}$
  • आर्थिक महत्व: भोजन (आलू Solanum tuberosum, टमाटर Lycopersicon esculentum, बैंगन Solanum melongena); मसाले (मिर्च Capsicum annuum); औषध (बेलाडोना Atropa belladonna, अश्वगंधा Withania somnifera); धूम्रपान (तंबाकू Nicotiana tabacum); सजावटी पौधे (पिटूनिया Petunia)।
3. कुल लिलिएसी (Family Liliaceae - लिली कुल / Lily Family)
  • वानस्पतिक लक्षण: बहुवर्षीय शाक, भूमिगत शल्ककंद (प्याज, लहसुन), प्रकंद या घनकंद; पत्तियाँ अधिकांशतः आधारीय (basal), एकांतर, रेखीय, समानांतर शिराविन्यास (एकबीजपत्री लाक्षणिक लक्षण)।
  • पुष्पीय लक्षण: पुष्पक्रम एकल या छत्रक (umbellate cluster - प्याज); पुष्प सहपत्री, द्विलिंगी, त्रिज्यासममित ($\oplus$); बाह्यदल व दल विभेदित नहीं $\rightarrow$ परिदलपुंज (Perianth - $P$) उपस्थित, परिदल 6 दो चक्रों में $3+3$, बहुधा संयुक्त, कोरस्पर्शी विन्यास; पुमंग 6 पुंकेसर $3+3$, परिदललग्न (epiphyllous); जायांग त्रिअंडपी, युक्तांडपी, ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय ($\underline{G}_{(3)}$), त्रिकोष्ठीय, अक्षीय बीजांडन्यास; फल संपुट (capsule) या विरल रूप से बेरी।
  • पुष्पीय सूत्र (Floral Formula): $\oplus \; \oint \; \overbrace{P_{(3+3)} \; A_{3+3}} \; \underline{G}_{(3)}$
  • आर्थिक महत्व: सजावटी पौधे (ट्यूलिप Tulipa, ग्लोरियोसा); औषध (घृतकुमारी / एलोवेरा Aloe vera); सब्जियाँ (शतावरी Asparagus, प्याज Allium cepa, लहसुन Allium sativum); बहुगुणिता प्रेरक रसायन (कोलचिसिन Colchicum autumnale के घनकंद से प्राप्त)।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

मूल अनुदैर्ध्य क्षेत्र क्रम (Sequence of Root Apex Zones)
मूल गोप -> विभज्योतकी क्षेत्र -> दीर्घीकरण क्षेत्र -> परिपक्वता क्षेत्र (मूलरोम)
मूलरोम (Root hairs) केवल परिपक्वता क्षेत्र की बाह्यत्वचीय कोशिकाओं से निकलते हैं; यह जल व खनिज अवशोषण का विशिष्ट क्षेत्र है।
पुष्पासन पर अंडाशय की स्थिति सूत्र (Ovary Insertion and Thalamus Formula)
जायांगधर (ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय) | परिजायांगी (अर्ध-अधोवर्ती अंडाशय) | अधिजायिक (अधोवर्ती अंडाशय)
सरसों व बैंगन में ऊर्ध्ववर्ती (G_); आलूबुखारा व गुलाब में अर्ध-अधोवर्ती (-G-); अमरूद व खीरे में अधोवर्ती (G¯) अंडाशय होता है।
वैक्सिलरी पुष्पदल विन्यास सूत्र (Vexillary / Papilionaceous Formula)
दल 1 मानक + 2 पक्ष + (2) नौतल (संयुक्तांडप)
कुल फैबेसी (मटर, चना) का विशिष्ट पुष्पीय दल लक्षण। पश्च दल सबसे बड़ा होता है।
कुल फैबेसी का पुष्पीय सूत्र (Floral Formula of Fabaceae)
एकव्याससममित, द्विलिंगी, बाह्यदल (5) संयुक्त, दल 1+2+(2) वैक्सिलरी, पुमंग (9)+1 द्विसंघी, जायांग 1 ऊर्ध्ववर्ती
पहचान लक्षण: द्विसंघी पुमंग (9 जुड़े हुए + 1 स्वतंत्र), एकांडपी सीमांत बीजांडन्यास तथा लेग्यूम फल।
कुल सोलेनेसी का पुष्पीय सूत्र (Floral Formula of Solanaceae)
त्रिज्यासममित, द्विलिंगी, बाह्यदल (5) चिरलग्न, दल (5) संयुक्त, पुमंग 5 दललग्न, जायांग (2) तिरछा अंडाशय ऊर्ध्ववर्ती
पहचान लक्षण: दललग्न पुंकेसर, चिरलग्न बाह्यदल, तिरछा अंडाशय (oblique ovary) तथा फूला हुआ बीजांडासन।
कुल लिलिएसी का पुष्पीय सूत्र (Floral Formula of Liliaceae)
त्रिज्यासममित, द्विलिंगी, परिदल (3+3), पुमंग 3+3 परिदललग्न, जायांग (3) त्रिअंडपी ऊर्ध्ववर्ती अक्षीय
पहचान लक्षण: बाह्यदल व दल के स्थान पर 6 परिदल (Tepals), परिदललग्न पुंकेसर, त्रिअंडपी अंडाशय, प्याज, लहसुन, एलोवेरा।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
आलू एक भूमिगत तना (कंद) है जबकि शकरकंद एक रूपांतरित जड़ है—इस कथन की सप्रमाण तुलना कीजिए। साथ ही एक प्ररूपी जड़ के चार अनुदैर्ध्य क्षेत्रों का कार्य सहित उल्लेख कीजिए। [अंक विभाजन: 3 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
आलू में पर्व, पर्वसंधियां, शल्क पत्र तथा कक्षीय कलिकाएं ('आंखें') उपस्थित होती हैं जो तने का अकाट्य प्रमाण हैं। शकरकंद में ये अनुपस्थित होते हैं और यह एक अपस्थानिक कंदिल जड़ है। जड़ के चार क्षेत्र मूल गोप, विभज्योतकी क्षेत्र, दीर्घीकरण क्षेत्र और परिपक्वता क्षेत्र (मूलरोम युक्त) हैं।
उदाहरण 2
असीमाक्षी (रेसीमोस) तथा ससीमाक्षी (साइमोस) पुष्पक्रम में चार प्रमुख अंतर लिखिए। पादपों में श्वसन मूल (न्यूमैटोफोर) किस आवास में और क्यों विकसित होते हैं? [अंक विभाजन: 3 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
असीमाक्षी पुष्पक्रम में असीमित वृद्धि व अग्राभिसारी क्रम होता है, जबकि ससीमाक्षी में सीमित वृद्धि व तलाभिसारी क्रम होता है। न्यूमैटोफोर मैंग्रोव दलदली भूमि में ऑक्सीजन की कमी के कारण ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्ती होकर हवा में निकलते हैं और वातरंध्रों द्वारा श्वसन करते हैं।
उदाहरण 3
पुष्पासन पर अंडाशय की स्थिति के आधार पर जायांगधर, परिजायांगी तथा अधिजायिक पुष्पों की उपयुक्त उदाहरण सहित तुलना कीजिए। [अंक विभाजन: 2.5 + 2.5 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
जायांगधर पुष्प में अंडाशय शीर्ष पर (ऊर्ध्ववर्ती G_), परिजायांगी में प्याले के केंद्र में समान स्तर पर (अर्ध-अधोवर्ती -G-), तथा अधिजायिक में पुष्पासन द्वारा पूर्ण संलयित होकर नीचे (अधोवर्ती G¯) स्थित होता है।
उदाहरण 4
बीजांडन्यास (Placentation) किसे कहते हैं? इसके पाँच प्रमुख प्रकारों—सीमांत, अक्षीय, भित्तीय, मुक्त-केंद्रीय तथा आधारी—का नामांकित विवरण एवं प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए। [अंक विभाजन: 1 + 4 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
बीजांडन्यास अंडाशय में बीजांडों के जुड़ने की व्यवस्था है। इसके 5 प्रकार हैं: सीमांत (मटर), अक्षीय (टमाटर, गुड़हल), भित्तीय व कूटपट रेप्लम (सरसों), मुक्त-केंद्रीय (डायन्थस), तथा आधारी (सूर्यमुखी)।
उदाहरण 5
कुल सोलेनेसी (Solanaceae) के निम्नलिखित लक्षणों का वैज्ञानिक विवरण दीजिए: (i) पुष्पीय सूत्र, (ii) पुमंग व जायांग के विशिष्ट लक्षण, (iii) चार आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पादपों के वानस्पतिक नाम व उपयोग। [अंक विभाजन: 1 + 2 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
सोलेनेसी का सूत्र ⊕ ⚥ K(5) C(5)~A5 G(2) है। इसके प्रमुख लक्षण दललग्न पुंकेसर, चिरलग्न बाह्यदल, तिरछा अंडाशय और फूला हुआ अक्षीय बीजांडासन हैं। महत्वपूर्ण पादप: आलू, टमाटर, अश्वगंधा और बेलाडोना हैं।
उदाहरण 6
कुल फैबेसी (Fabaceae) के पुष्पीय लक्षणों का सविस्तार वर्णन कीजिए। वैक्सिलरी पुष्पदल विन्यास का सूत्र क्या है? मुलेठी तथा नील का वानस्पतिक नाम व महत्व लिखिए। [अंक विभाजन: 2.5 + 1 + 1.5 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
फैबेसी में एकव्याससममित पुष्प, वैक्सिलरी दलपुंज C1+2+(2), द्विसंघी पुमंग A(9)+1, एकांडपी जायांग और लेग्यूम फल होता है। मुलेठी (Glycyrrhiza glabra) खांसी की औषधि है और नील (Indigofera tinctoria) प्राकृतिक नीला रंजक प्रदान करता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मान लेना कि आलू और शकरकंद दोनों एक ही प्रकार के रूपांतरण (जड़ अथवा तना) हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

आलू (Solanum tuberosum) एक भूमिगत स्तंभ कंद (Stem tuber) है क्योंकि इस पर पर्वसंधियां, शल्क पत्र और कलिकाएं ('आंखें') पाई जाती हैं। इसके विपरीत शकरकंद (Ipomoea batatas) एक अपस्थानिक कंदिल जड़ (Tuberous root) है जिस पर कोई पर्वसंधियां या आंखें नहीं होतीं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मूलरोम (Root hairs) का उद्गम दीर्घीकरण क्षेत्र या विभज्योतकी क्षेत्र से बताना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मूलरोम केवल परिपक्वता क्षेत्र (Region of Maturation) की बाह्यत्वचा (epiblema) से निकलने वाले एककोशिकीय प्रवर्ध हैं। दीर्घीकरण क्षेत्र में केवल लंबाई बढ़ती है और विभज्योतकी क्षेत्र में केवल कोशिकाएं विभाजित होती हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

नागफनी के चपटे हरे भाग को पत्ती समझ लेना और कांटों को तना कहना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

नागफनी (Opuntia) में चपटा हरा भाग वास्तव में प्रणाभ स्तंभ (Phylloclade - रूपांतरित तना) है जो प्रकाश संश्लेषण करता है, जबकि कांटे (spines) रूपांतरित पत्तियाँ हैं जो वाष्पोत्सर्जन को कम करने के लिए रूपांतरित हुई हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सरसों के अंडाशय को आरंभ से ही द्विकोष्ठीय मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सरसों (Brassica) में बीजांडन्यास भित्तीय (Parietal) होता है और अंडाशय मूलतः एककोष्ठीय होता है। बाद में एक कूटपट (आभासी पट / Replum) बन जाने के कारण यह द्विकोष्ठीय दिखाई देने लगता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सोलेनेसी कुल के पुष्पीय सूत्र में पुमंग और दलपुंज के संबंध को सामान्य लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सोलेनेसी में पुंकेसर दलों से जुड़े होते हैं अर्थात् दललग्न (Epipetalous) होते हैं। अतः पुष्पीय सूत्र में $C_{(5)}$ और $A_5$ के ऊपर जोड़ती हुई चाप (arch / $\overbrace{C_{(5)} \; A_5}$) लगाना अनिवार्य है, अन्यथा अंक काट लिए जाते हैं।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

MFP पुष्पी पादपों की आकारिकी: मूल, तना, पत्ती, पुष्प एवं कुल WBCHSE कक्षा 11 जीव विज्ञान — इकाई 2: पादपों में संरचनात्मक संगठन (अध्याय 5) 1. मूल एवं तने के रूपांतरण (Root & Stem Modifications) • मूल रूपांतरण: सहारा देने वाली स्तम्भ मूल (बरगद) | अवस्तम्भ मूल (मक्का, गन्ना) | श्वसन मूल (राइजोफोरा) • भूमिगत तना: कंद (आलू - आँखें) | प्रकंद (अदरक, हल्दी) | घनकंद (ज़मींकंद) | शल्ककंद (प्याज, लहसुन) • वायवीय तना: पर्णाभ स्तंभ (Phylloclade - नागफनी, प्रकाशसंश्लेषण) | कंटक (नींबू, बोगेनविलिया - सुरक्षा) 2. पुष्प संरचना, बीजांडन्यास एवं दलविन्यास (Flower & Placentation) • पुष्प सममिति: त्रिज्या सममित (Actinomorphic: सरसों, मिर्च) | एकव्यास सममित (Zygomorphic: मटर, गुलमोहर) • अंडाशय स्थिति: अधोजायांगी (Hypogynous - ऊर्ध्ववर्ती) | अधिजायांगी (Epigynous - अधोवर्ती - अमरूद, खीरा) • बीजांडन्यास (Placentation): सीमांत (मटर) | अक्षीय (गुड़हल, टमाटर) | भित्तीय (सरसों - रेप्लम) | मुक्तस्तंभीय (डायन्थस) • दलविन्यास (Aestivation): कोरस्पर्शी (Valvate) | व्यावर्तित (Twisted) | कोरछादी (Imbricate) | ध्वजीय/वैक्सिलरी (मटर) 3. प्रमुख पादप कुल एवं पुष्प सूत्र (Diagnostic Plant Families) • Fabaceae (मटर कुल): % ⚥ K(5) C1+2+(2) A(9)+1 G1 [द्विसंघी पुंकेसर, सीमांत बीजांडन्यास, लेग्यूम फल] • Solanaceae (आलू कुल): ⊕ ⚥ K(5) C(5) A5 G(2) [दललग्न पुंकेसर, फूला हुआ बीजांडासन, तिरछा अंडाशय, बेरी] • Liliaceae (लिली कुल): ⊕ ⚥ P(3+3) A3+3 G(3) [परिदलपुंज (Tepals), परिदललग्न पुंकेसर, त्रिकोष्ठकीय] WBCHSE • आकारिकी

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
मूल तंत्र तीन प्रमुख प्रकारों में वर्गीकृत है: मूसला जड़ तंत्र (द्विबीजपत्री), झकड़ा/रेशेदार जड़ तंत्र (एकबीजपत्री), और अपस्थानिक जड़ तंत्र (मूलांकुर के अतिरिक्त अन्य भागों से विकसित)।
मुख्य बिंदु 2
एक प्ररूपी जड़ के चार क्रमिक क्षेत्र होते हैं: मूल गोप (शीर्ष सुरक्षा), विभज्योतकी क्षेत्र (सक्रिय कोशिका विभाजन), दीर्घीकरण क्षेत्र (लंबाई में तीव्र वृद्धि), और परिपक्वता क्षेत्र (जल अवशोषक एककोशिकीय मूलरोम)।
मुख्य बिंदु 3
जड़ों के अनुकूलन में भोजन संग्रह (गाजर-शंकुरूप, शलजम-कुंभीरूप, मूली-तर्कुरूप, शकरकंद), यांत्रिक सहारा (बरगद के स्तंभ मूल, मक्का-गन्ना के अवस्तंभ मूल), और श्वसन (मैंग्रोव पादप राइजोफोरा के न्यूमैटोफोर या श्वसन मूल) प्रमुख हैं।
मुख्य बिंदु 4
तने पर पर्व और पर्वसंधियाँ पाई जाती हैं; भूमिगत खाद्य संचयी रूपांतरणों में कंद (आलू), प्रकंद (अदरक), घनकंद (ज़मीकंद) और शल्ककंद (प्याज) शामिल हैं; वायवीय रूपांतरणों में प्रणाभ स्तंभ (नागफनी), प्रतान और शूल प्रमुख हैं।
मुख्य बिंदु 5
पत्ती में पर्णाधार, पर्णवृंत और पर्णफलक होते हैं; शिराविन्यास जालिकावत (द्विबीजपत्री) या समानांतर (एकबीजपत्री) होता है; पर्णविन्यास एकांतर, सम्मुख या चक्करदार होता है; रूपांतरणों में प्रतान, शूल और प्रणाभ वृंत (अकेशिया) शामिल हैं।
मुख्य बिंदु 6
पुष्पक्रम दो प्रकार का होता है: असीमाक्षी या रेसीमोस (असीमित वृद्धि, अग्राभिसारी पुष्प क्रम) और ससीमाक्षी या साइमोस (सीमित वृद्धि, तलाभिसारी पुष्प क्रम)।
मुख्य बिंदु 7
पुष्पीय सममिति: त्रिज्यासममित (सरसों, मिर्च) या एकव्याससममित (मटर, गुलमोहर); पुष्पासन पर अंडाशय की स्थिति के आधार पर जायांगधर (ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय), परिजायांगी (अर्ध-अधोवर्ती) और अधिजायिक (अधोवर्ती अंडाशय)।
मुख्य बिंदु 8
पुष्पदल विन्यास (Aestivation) कोरस्पर्शी, व्यावर्तित, कोरछादी या वैक्सिलरी/ध्वजीय (मटर कुल) हो सकता है।
मुख्य बिंदु 9
पुंकेसर एकसंघी (गुड़हल), द्विसंघी (मटर (9)+1), बहुसंघी (नींबू); दललग्न (बैंगन) या परिदललग्न (लिलिएसी) हो सकते हैं।
मुख्य बिंदु 10
बीजांडन्यास के प्रमुख प्रकार: सीमांत (मटर), अक्षीय (टमाटर, नींबू), भित्तीय (सरसों, जिसमें कूटपट रेप्लम होता है), मुक्त-केंद्रीय (डायन्थस), और आधारी (सूर्यमुखी)।
मुख्य बिंदु 11
अष्ठिल (Drupe) फल आम और नारियल में पाया जाता है, जिसकी फलभित्ति बाह्यफलभित्ति, मध्यफलभित्ति और कठोर अंतःफलभित्ति में विभाजित होती है।
मुख्य बिंदु 12
कुल फैबेसी: एकव्याससममित पुष्प, वैक्सिलरी दलपुंज, द्विसंघी पुमंग (9)+1, एकअंडपी ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय, सीमांत बीजांडन्यास तथा लेग्यूम फल।
मुख्य बिंदु 13
कुल सोलेनेसी: त्रिज्यासममित पुष्प, चिरलग्न बाह्यदल, दललग्न पुंकेसर, तिरछा द्विअंडपी ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय जिसमें फूला हुआ बीजांडासन तथा अक्षीय बीजांडन्यास होता है, बेरी या संपुट फल।
मुख्य बिंदु 14
कुल लिलिएसी: एकबीजपत्री लिलिएसी कुल; 6 परिदल P(3+3), परिदललग्न पुंकेसर A3+3, त्रिअंडपी युक्तांडपी ऊर्ध्ववर्ती अंडाशय, अक्षीय बीजांडन्यास तथा संपुट फल।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
प्रणाभ स्तंभ (Phylloclade) और प्रणाभ वृंत (Phyllode) में मुख्य अंतर क्या है? प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्रणाभ स्तंभ (Phylloclade) संपूर्ण तने का रूपांतरण है जो चपटा, हरा, मांसल होकर पत्ती का कार्य करता है और कई पर्व व पर्वसंधियाँ रखता है (उदा. नागफनी Opuntia)। प्रणाभ वृंत (Phyllode) पत्ती के पर्णवृंत (petiole) का चपटा, हरा रूपांतरण है जो पर्णकों के झड़ने के बाद प्रकाश संश्लेषण करता है (उदा. ऑस्ट्रेलियन बबूल Acacia auriculiformis)।
2
कुल सोलेनेसी में अंडाशय की तिरछी स्थिति (oblique ovary) और फूले हुए बीजांडासन (swollen placenta) का क्या महत्व है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: यह सोलेनेसी (आलू कुल) का सबसे प्रमुख वर्गीकीय नैदानिक लक्षण है। अंडाशय पुष्प के मध्य-अक्ष से लगभग 45° के कोण पर तिरछा स्थित होता है और इसका बीजांडासन अत्यधिक फूला हुआ होता है जिस पर अक्षीय बीजांडन्यास में असंख्य बीजांड जुड़े होते हैं। यह इसे अन्य कुलों से स्पष्ट रूप से अलग करता है।
3
ड्रुप (Drupe / अष्ठिल) फल में कौन सी परत कठोर गुठली बनाती है? आम और नारियल में कौन सी परतें भिन्न कार्य करती हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: ड्रुप में अंतःफलभित्ति (Endocarp) पथरीली और कठोर होकर गुठली बनाती है। आम में मध्यफलभित्ति (Mesocarp) रसीली, गूदेदार और खाने योग्य होती है, जबकि नारियल में मध्यफलभित्ति रेशेदार (fibrous) होती है जिससे रस्सियाँ व कॉयर बनते हैं और खाने योग्य भाग इसका भ्रूणपोष (endosperm) व जल होता है।
4
द्विसंघी पुमंग (Diadelphous Androecium) से क्या तात्पर्य है? इसका पुष्पीय सूत्र प्रतीक क्या है और यह किस कुल में मिलता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: द्विसंघी पुमंग में पुंकेसरों के तंतु आपस में जुड़कर दो बंडल बनाते हैं। कुल फैबेसी (मटर) में 10 पुंकेसर (9)+1 के रूप में व्यवस्थित होते हैं—9 पुंकेसरों के तंतु जुड़कर एक संयुक्त नली बनाते हैं और 1 पश्च पुंकेसर स्वतंत्र रहता है। इसका सूत्र A(9)+1 है।
5
कुल लिलिएसी (Liliaceae) में बाह्यदलपुंज और दलपुंज के स्थान पर क्या पाया जाता है? इसका पुष्पीय सूत्र लिखिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: कुल लिलिएसी में बाह्यदलपुंज और दलपुंज पृथक नहीं होते, बल्कि 6 परिदलों (Tepals) से बना परिदलपुंज (Perianth - P) पाया जाता है जो 3+3 के दो चक्रों में व्यवस्थित होता है। इसका पुष्पीय सूत्र ⊕ ⚥ P(3+3) A3+3 G(3) है, जहाँ पुंकेसर परिदललग्न (epiphyllous) होते हैं।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

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