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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 13
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

पादप वृद्धि एवं परिवर्धन बीज के अंकुरण से लेकर जीर्णता और प्राकृतिक मृत्यु तक संपूर्ण जीवन चक्र में होने वाले जटिल, अत्यधिक सुव्यवस्थित कोशिकीय, संरचनात्मक एवं जैव-रासायनिक प्रक्रमों का एकीकृत परिणाम है। वृद्धि को किसी कोशिका, ऊतक, पादप अंग या उसके भाग के आकार, आयतन, पृष्ठ क्षेत्रफल अथवा शुष्क भार में होने वाले स्थायी और अनुत्क्रमणीय (इररिवर्सिबल) विस्तार के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो उपापचयी ऊर्जा के व्यय पर संपन्न होता है। जंतुओं के सीमित विकास के विपरीत पादपों में वृद्धि विवृत अथवा असीमित (Indeterminate open growth) होती है, जिसे मूल शीर्षस्थ विभज्योतक (RAM), प्ररोह शीर्षस्थ विभज्योतक (SAM) तथा मोटाई बढ़ाने वाले पार्श्वीय विभज्योतक (संवहन एधा व कॉर्क एधा) जीवनपर्यंत संचालित करते हैं। इस अध्याय में विस्तार से विवेचना की गई है वृद्धि के तीन क्रमिक कोशिकीय चरणों (विभज्योतकीय, दीर्धीकरण व परिपक्वन), अंकगणितीय रैखिक वृद्धि (Lt = L0 + rt) बनाम ज्यामितीय सिग्मॉइड एस-आकार वक्र (W1 = W0·e^rt), निरपेक्ष वृद्धि दर (AGR) तथा सापेक्ष वृद्धि दर (RGR) या दक्षता सूचकांक। इसके साथ ही पादपों की विकासीय सुघट्यता या प्लास्टिसिटी (जैसे बटरकप में विषमपर्णता), विभेदन, निर्विभेदन व पुनर्विभेदन तथा पांच प्रमुख पादप वृद्धि नियामकों (PGRs या फाइटोहार्मोन) का गहन अध्ययन शामिल है: वृद्धि प्रवर्तक के रूप में ऑक्सिन (शिखाग्र प्रधानता, जड़ प्रेरण, 2,4-D खरपतवारनाशी), जिबरेलिन (बोल्टिंग, गन्ने की लंबाई वृद्धि, माल्टिंग), साइटोकाइनिन (तीव्र कोशिका विभाजन, रिचमंड-लैंग जीर्णता विलंबन); और वृद्धि संदमक के रूप में एथिलीन (क्लाइमेक्टेरिक फल पकाना, तिहरा प्रभाव) तथा एब्सिसिक अम्ल (तनाव हार्मोन, रंध्र बंद होना, बीज प्रसुप्ति)। अंत में दीप्तिकालिता (फाइटोक्रोम वर्णक तंत्र, फ्लोरिजन परिकल्पना) एवं बसंतीकरण (शीत ताप उपचार द्वारा पुष्पन प्रेरण) की वैज्ञानिक क्रियाविधि स्पष्ट की गई है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पादप वृद्धि एवं परिवर्धन के आणविक व कार्यिकीय सिद्धांतों की समझ आधुनिक कृषि विज्ञान, उद्यान विज्ञान, वानिकी और जैव प्रौद्योगिकी का मूल आधार है। व्यावसायिक बागवानी में कृत्रिम ऑक्सिन (NAA, IBA) का उपयोग कर तने की कलमों में शीघ्र जड़ें विकसित की जाती हैं, तथा 2,4-D का छिड़काव कर गेहूं व धान के खेतों से बिना फसल को नुकसान पहुंचाए चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को पूर्णतः नष्ट किया जाता है। वैश्विक फल व मद्य उद्योग में जिबरेलिक अम्ल (GA3) का छिड़काव कर बीजहीन अंगूरों के गुच्छों के वृंत लंबे किए जाते हैं जिससे सड़न रुकती है, गन्ने के तनों के पर्वों की लंबाई बढ़ाकर प्रति एकड़ 20 टन तक अतिरिक्त उपज प्राप्त की जाती है, और जौ के दानों में अल्फा-एमाइलेज सक्रिय कर माल्टिंग प्रक्रिया तेज की जाती है। केला, आम और टमाटर को मंडियों में बेचने से पूर्व एक समान रूप से पकाने के लिए एथिलीन गैस (इथेफोन) का व्यावसायिक उपयोग अनिवार्य है, जबकि सूखे और लवणता के विरुद्ध एब्सिसिक अम्ल के रंध्र बंद करने के तंत्र का अध्ययन कर वैज्ञानिक जलवायु-अनुकूल सूखा-रोधी फसलों का विकास कर रहे हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • कक्षा 11 पादप शारीर से विभज्योतकीय ऊतक बनाम स्थायी ऊतक, जाइलम व फ्लोएम की मूलभूत समझ।
  • समसूत्री कोशिका विभाजन, सूत्री विभाजन की प्रावस्थाएं व कोशिका चक्र का ज्ञान।
  • पादप आकारिकी से मूल, तना, पत्ती व पुष्प की सामान्य संरचना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 पादप वृद्धि के लक्षण, असीमित वृद्धि...
2 कोशिकीय रूपांतरण: विभेदन, निर्विभेद...
3 पादप वृद्धि नियामक (PGRs): वृद्धि प...
4 वृद्धि संदमक हार्मोन: एथिलीन (गैसीय...
5 दीप्तिकालिता (Photoperiodism), फाइट...
6 बसंतीकरण (Vernalization), संवेदना स...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

पादप वृद्धि के लक्षण, असीमित वृद्धि एवं वृद्धि बलगतिकी (अंकगणितीय बनाम ज्यामितीय)

1. वृद्धि की वैज्ञानिक परिभाषा एवं विवृत या असीमित वृद्धि (Indeterminate Growth)

वृद्धि (Growth) किसी कोशिका, ऊतक, अंग या संपूर्ण जीव के आकार, आयतन, पृष्ठ क्षेत्रफल अथवा शुष्क भार में होने वाला एक स्थायी और अनुत्क्रमणीय (इररिवर्सिबल) विस्तार है, जो उपचयी व अपचयी प्रक्रियाओं द्वारा ऊर्जा व्यय पर संपन्न होता है:

  • विवृत / असीमित वृद्धि (Open / Indeterminate Form): जंतुओं की वृद्धि एक निश्चित आयु में रुक जाती है, किंतु पादप जीवनभर असीमित रूप से बढ़ते रहते हैं। इसका मुख्य कारण पादप शरीर के विशिष्ट सिरों पर जीवनपर्यंत उपस्थित विभज्योतक (Meristems) हैं।
  • प्राथमिक बनाम द्वितीयक विभज्योतक:
    • मूल शीर्षस्थ विभज्योतक (RAM) एवं प्ररोह शीर्षस्थ विभज्योतक (SAM): अक्ष की प्राथमिक लंबाई में वृद्धि (लंबाई में दीर्धीकरण) के लिए उत्तरदायी होते हैं।
    • पार्श्वीय विभज्योतक (संवहन एधा व कॉर्क एधा / फेलोजन): द्विबीजपत्री पादपों में अंग की मोटाई या घेरे में वृद्धि (द्वितीयक वृद्धि) कराते हैं।
  • वृद्धि के मापन योग्य मानक: कोशिकीय स्तर पर वृद्धि मुख्यतः जीवद्रव्य की मात्रा में वृद्धि का परिणाम है। जीवद्रव्य का सीधा मापन कठिन होने के कारण अन्य मानकों से वृद्धि नापी जाती है: शुष्क भार में वृद्धि (सर्वाधिक सटीक), ताजे भार में वृद्धि, लंबाई, क्षेत्रफल, आयतन या कोशिका संख्या में वृद्धि।
    • मक्के का एक मूल शीर्षस्थ विभज्योतक प्रति घंटे 17,500 से अधिक नई कोशिकाएं बना सकता है (संख्या में वृद्धि)।
    • तरबूज की एक कोशिका अपने आरंभिक आकार से 3,50,000 गुना तक बढ़ सकती है (आकार में वृद्धि)।
2. वृद्धि के तीन क्रमिक कोशिकीय चरण

मूल व प्ररोह के शीर्ष अक्ष पर वृद्धि के तीन सुस्पष्ट क्षेत्र पाए जाते हैं:

वृद्धि का चरण कोशिकीय लक्षण व संघटन कोशिका भित्ति व रसधानी कार्यिकीय महत्व
1. विभज्योतकीय चरण (कोशिका विभाजन) कोशिकाएं समव्यासीय, सघन जीवद्रव्य से परिपूर्ण और सुस्पष्ट बड़े केंद्रक वाली होती हैं। प्राथमिक कोशिका भित्ति पतली, सेलुलोस निर्मित व प्रचुर जीवद्रव्यतंतु (प्लाज्मोडेस्मेटा) युक्त; केंद्रीय रसधानी अनुपस्थित। समसूत्री विभाजन द्वारा लगातार नई संतति कोशिकाएं जोड़कर अक्ष का विस्तार करना।
2. दीर्धीकरण चरण (कोशिका विस्तार) विभज्योतकीय क्षेत्र के ठीक पीछे (समीपस्थ) स्थित होता है। छोटी रसधानियां आपस में मिलकर बड़ी रसधानी बनाती हैं; स्फीति दाब बढ़ता है; नए भित्ति घटकों का निक्षेपण होता है। कोशिकाएं अनुदैर्ध्य रूप से तेजी से लंबी होकर मूल व तने की लंबाई बढ़ाती हैं।
3. परिपक्वन चरण (कोशिका विभेदन) दीर्धीकरण क्षेत्र के और पीछे स्थित होता है। कोशिकाएं अपना अंतिम आकार प्राप्त कर लेती हैं; द्वितीयक भित्ति स्थूलन (लिग्निन, सुबेरिन निक्षेपण) होता है। कोशिकाएं विशिष्ट कार्यों के लिए संरचनात्मक व कार्यिकीय रूपांतरण (विभेदन) प्राप्त करती हैं (जैसे मूलरोम, जाइलम व फ्लोएम)।
3. वृद्धि दर एवं गणितीय बलगतिकी (अंकगणितीय बनाम ज्यामितीय वृद्धि)

प्रति इकाई समय में होने वाली वृद्धि को वृद्धि दर (Growth rate) कहते हैं। पादपों में दो प्रमुख वृद्धि प्रारूप देखे जाते हैं:

लक्षण अंकगणितीय वृद्धि (Arithmetic Growth) ज्यामितीय वृद्धि (Geometric Growth)
कोशिका विभाजन की प्रकृति समसूत्री विभाजन के बाद केवल एक संतति कोशिका विभाजन जारी रखती है, जबकि दूसरी विभेदित व परिपक्व हो जाती है। दोनों संतति कोशिकाएं निरंतर विभाजन की क्षमता बनाए रखती हैं ($1 \to 2 \to 4 \to 8 \to 16 \dots$ की दर से)।
गणितीय सूत्र $$L_t = L_0 + rt$$ $$W_1 = W_0 e^{rt}$$
चरों का अर्थ $L_t$: समय $t$ पर लंबाई; $L_0$: आरंभिक लंबाई; $r$: वृद्धि दर या ढाल। $W_1$: अंतिम आकार/भार; $W_0$: आरंभिक आकार; $r$: सापेक्ष वृद्धि दर / दक्षता सूचकांक; $t$: समय; $e$: प्राकृतिक लघुगणक का आधार ($2.718$)।
ग्राफ की प्रकृति एक सरल रेखीय ग्राफ (Linear plot) जिसका ढाल ($r$) स्थिर होता है। एक एस-आकार का सिग्मॉइड वक्र (Sigmoid S-curve)।
प्राकृतिक उदाहरण नियत दर से मूल या प्ररोह शीर्ष की लंबाई में वृद्धि। बीज में भ्रूण का विकास, अंकुरित नवोद्भिद का भार बढ़ना, जीवाणु संवर्धन।
4. सिग्मॉइड वक्र एवं निरपेक्ष बनाम सापेक्ष वृद्धि दर

एक प्राकृतिक सिग्मॉइड वक्र में तीन प्रमुख प्रावस्थाएं होती हैं:

  1. प्रारंभिक या मंद प्रावस्था (Lag Phase): आरंभिक धीमी वृद्धि की अवस्था, जब कोशिकाएं अनुकूलन करती हैं व आवश्यक एंजाइम बनाती हैं।
  2. चरघातांकी या लॉग प्रावस्था (Log / Exponential Phase): सर्वाधिक तीव्र वृद्धि की अवस्था, जहां प्रचुर पोषक तत्वों व स्थान की उपस्थिति में कोशिका विभाजन चरम पर होता है।
  3. स्थिर प्रावस्था (Stationary Phase): सीमित पोषक तत्वों, स्थान के अभाव अथवा आनुवंशिक जीर्णता के कारण वृद्धि मंद होकर समतल हो जाती है।
निरपेक्ष वृद्धि दर बनाम सापेक्ष वृद्धि दर:
  • निरपेक्ष वृद्धि दर (Absolute Growth Rate - AGR): प्रति इकाई समय में कुल वृद्धि का मापन ($AGR = \frac{\Delta W}{\Delta t}$)।
  • सापेक्ष वृद्धि दर (Relative Growth Rate - RGR) या दक्षता सूचकांक: आरंभिक भार के संदर्भ में प्रति इकाई समय में वृद्धि ($RGR = \frac{W_1 - W_0}{W_0 \cdot \Delta t}$)। यह नए पादप पदार्थ उत्पादन की आंतरिक दक्षता को दर्शाती है।

कोशिकीय रूपांतरण: विभेदन, निर्विभेदन, पुनर्विभेदन एवं सुघट्यता (प्लास्टिसिटी)

1. विभेदन, निर्विभेदन एवं पुनर्विभेदन की अवधारणा

पादप परिवर्धन के दौरान शीर्षस्थ विभज्योतक से बनी कोशिकाएं तीन विशिष्ट विकासीय अवस्थाओं से गुजरती हैं:

  • विभेदन (Differentiation): विभज्योतकीय कोशिकाओं द्वारा विशिष्ट स्थायी कार्यों को करने हेतु अपनी कोशिका भित्ति व जीवद्रव्य में संरचनात्मक एवं रासायनिक परिवर्तन कर स्थायी कोशिकाओं में बदलने की प्रक्रिया को विभेदन कहते हैं।
    • उदाहरण: जाइलम वाहिका तत्वों का निर्माण। कोशिकाएं अपना समस्त जीवद्रव्य खो देती हैं तथा अत्यधिक ऋणात्मक तनाव झेलने हेतु मजबूत, लिग्निनयुक्त द्वितीयक भित्ति बनाती हैं।
  • निर्विभेदन (Dedifferentiation): वह प्रक्रिया जिसमें कोई पूर्णतः विभेदित व विभाजन क्षमता खो चुकी जीवित स्थायी कोशिका विशिष्ट कार्यिकीय परिस्थितियों में पुनः समसूत्री विभाजन क्षमता प्राप्त कर लेती है, निर्विभेदन कहलाती है।
    • उदाहरण: स्थायी पैरेन्काइमा कोशिकाओं का विभाजनशील होकर अंतरापूलीय एधा (Interfascicular cambium) तथा कॉर्क एधा (Phellogen) बनाना।
  • पुनर्विभेदन (Redifferentiation): निर्विभेदित विभज्योतक से बनी नई कोशिकाएं जब पुनः अपनी विभाजन क्षमता खोकर किसी विशिष्ट कार्य हेतु स्थायी ऊतक में परिवर्तित हो जाती हैं, तो इसे पुनर्विभेदन कहते हैं।
    • उदाहरण: अंतरापूलीय एधा द्वारा द्वितीयक जाइलम व द्वितीयक फ्लोएम का निर्माण; तथा कॉर्क एधा द्वारा कॉर्क (फेलम) व द्वितीयक वल्कुट (फेलोडर्म) का निर्माण।
2. परिवर्धन एवं सुघट्यता या प्लास्टिसिटी (विषमपर्णता)

परिवर्धन (Development) किसी जीव के संपूर्ण जीवन चक्र में होने वाले सभी संरचनात्मक, कार्यिकीय व आकारिकीय परिवर्तनों का योग है, जो बीज अंकुरण से प्रारंभ होकर जीर्णता व मृत्यु तक चलता है ($परिवर्धन = वृद्धि + विभेदन$)।

सुघट्यता (Plasticity): पादपों द्वारा पर्यावरण के प्रभाव या जीवन चक्र की विभिन्न प्रावस्थाओं के अनुसार विभिन्न संरचनाएं व रूप निर्मित करने की आंतरिक क्षमता को सुघट्यता कहते हैं। इसका सर्वप्रमुख उदाहरण विषमपर्णता (Heterophylly) है (एक ही पौधे पर भिन्न-भिन्न आकार की पत्तियां पाया जाना):

  • 1. पर्यावरणीय विषमपर्णता: बाह्य पर्यावरण माध्यम के अंतर के कारण पत्तियों की संरचना में भिन्नता।
    • उदाहरण: बटरकप (Ranunculus flabellaris)। जल के भीतर डूबी पत्तियां अत्यंत महीन, कटी-फटी व फीते जैसी होती हैं (जो जल प्रवाह का प्रतिरोध कम करती हैं); जबकि उसी पौधे की जल के ऊपर हवा में रहने वाली पत्तियां चौड़ी, अखंड व पालियुक्त होती हैं।
  • 2. विकासीय या प्रावस्थागत विषमपर्णता: पौधे की तरुण अवस्था तथा वयस्क परिपक्व अवस्था की पत्तियों के आकार में अंतर।
    • उदाहरण: कपास (Cotton), धनिया (Coriandrum) तथा लार्कस्पर (Delphinium) में नवोद्भिद की पत्तियां परिपक्व पत्तियों से पूर्णतः भिन्न आकार की होती हैं।

पादप वृद्धि नियामक (PGRs): वृद्धि प्रवर्तक (ऑक्सिन, जिबरेलिन, साइटोकाइनिन)

1. पादप वृद्धि नियामकों का परिचय एवं रासायनिक वर्गीकरण

पादप वृद्धि नियामक (PGRs) या फाइटोहार्मोन अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में संश्लेषित होने वाले सरल कार्बनिक अणु हैं, जो विभिन्न रासायनिक प्रकृति के होते हैं तथा पादपों में विभिन्न कार्यिकीय प्रक्रमों का नियमन करते हैं।

रासायनिक वर्ग विशिष्ट फाइटोहार्मोन कार्यिकीय भूमिका
इन्डोल व्युत्पन्न इन्डोल-3-एसिटिक अम्ल (IAA), इन्डोल ब्यूटाइरिक अम्ल (IBA) वृद्धि प्रवर्तक (ऑक्सिन)
टरपेनॉइड व्युत्पन्न जिबरेलिक अम्ल ($\text{GA}_3$, gibberellane वलय) वृद्धि प्रवर्तक (जिबरेलिन)
एडेनिन प्यूरीन व्युत्पन्न काइनेटिन ($N^6$-furfurylaminopurine), जिएटिन वृद्धि प्रवर्तक (साइटोकाइनिन)
गैसीय हाइड्रोकार्बन एथिलीन ($\text{C}_2\text{H}_4$) वृद्धि संदमक / फल पकाने वाला
कैरोटिनॉयड व्युत्पन्न एब्सिसिक अम्ल (ABA, सेस्क्यूटरपीन) वृद्धि संदमक (तनाव हार्मोन)
2. ऑक्सिन: खोज, कार्यिकीय प्रभाव एवं कृषि अनुप्रयोग
  • खोज: चार्ल्स डार्विन एवं उनके पुत्र फ्रांसिस डार्विन (1880) ने कैनरी घास (Phalaris canariensis) के प्रांकुरचोल (Coleoptile) में प्रकाशानुवर्तन देखा और बताया कि शीर्ष से कोई संचरणीय प्रभाव नीचे की ओर जाता है। बॉयसेन-जेन्सन (1910) ने जिलेटिन व अभ्रक पट्टिका द्वारा सिद्ध किया कि यह एक विसरणशील रासायनिक पदार्थ है। फ्रिट्स वेंट (F.W. Went, 1928) ने जई (Avena sativa) के प्रांकुरचोल शीर्ष से एगार गुटके में ऑक्सिन को पृथक किया और प्रसिद्ध अवेना वक्रता परीक्षण (Avena curvature test) किया। कॉगल व हागेन-स्मिट (1931) ने मानव मूत्र से प्रथम हेटेरोऑक्सिन (IAA) पृथक किया।
  • प्रकार: प्राकृतिक ऑक्सिन: IAA व IBA। कृत्रिम (संश्लेषित) ऑक्सिन: NAA ($\alpha$-नैफ्थलीन एसिटिक अम्ल) तथा 2,4-D (2,4-डाइक्लोरोफीनॉक्सी एसिटिक अम्ल)।
  • प्रमुख कार्यिकीय प्रभाव व अनुप्रयोग:
    • शिखाग्र प्रधानता (Apical Dominance): शीर्ष कलिका की उपस्थिति में पार्श्वीय कक्षस्थ कलिकाओं की वृद्धि संदमित रहती है। शीर्ष कलिका को काट देने पर (शिखाग्र कर्तन / Decapitation) पार्श्व शाखाएं फूट पड़ती हैं (चाय के बागानों व बाड़ संवारने में प्रयुक्त)।
    • कोशिका दीर्धीकरण: कोशिका भित्ति में प्रोटॉन ($\text{H}^+$) पम्प कर अम्लीय दशा बनाता है जिससे एक्सपैन्सिन एंजाइम सक्रिय होकर भित्ति को ढीला व विस्तारित करते हैं।
    • कलमों में जड़ प्रेरण: तने की कलमों के निचले सिरे पर ऑक्सिन (IBA, NAA) लगाने पर प्रचुर अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं।
    • विलगन रोकथाम व प्रेरण: नई पत्तियों व फलों का असमय गिरना रोकता है, किंतु पुरानी जीर्ण पत्तियों का विलगन तेज करता है।
    • अनिषेकफलन (Parthenocarpy): टमाटर में बिना परागण व निषेचन के बीजहीन फल विकसित करता है।
    • चयनात्मक खरपतवारनाशी: 2,4-D का छिड़काव अनाज (गेहूं, धान) की एकबीजपत्री फसलों को हानि पहुंचाए बिना चौड़ी पत्ती वाले द्विबीजपत्री खरपतवारों को नष्ट कर देता है।
3. जिबरेलिन: खोज एवं व्यावसायिक अनुप्रयोग
  • खोज: जापानी वैज्ञानिक इइची कुरोसावा (1926) ने धान के 'बकाने' (मूर्ख नवोद्भिद / Bakanae) रोग के अध्ययन के दौरान जिबरेलिन की खोज की। यह रोग Gibberella fujikuroi (कवक) के संक्रमण से होता था जिससे पौधे असामान्य रूप से लंबे व दुर्बल हो जाते थे। याबुता व सुमिकी (1938) ने कवक से शुद्ध क्रिस्टलीय जिबरेलिन प्राप्त किया। वर्तमान में 100 से अधिक जिबरेलिन ज्ञात हैं, जिनमें $\text{GA}_3$ सर्वाधिक प्रमुख है।
  • प्रमुख कार्यिकीय प्रभाव व अनुप्रयोग:
    • पर्वों का दीर्धीकरण व बोल्टिंग (Bolting): रोसेट पादपों (जैसे पत्तागोभी, चुकंदर) में पुष्पन से ठीक पहले तने के पोरों (पर्वों) का अप्रत्याशित रूप से लंबा होना बोल्टिंग कहलाता है, जो जिबरेलिन द्वारा प्रेरित होता है।
    • गन्ने की उपज वृद्धि: गन्ने के खेतों पर $\text{GA}_3$ छिड़कने से पोरों की लंबाई बढ़ जाती है, जिससे प्रति एकड़ गन्ने की पैदावार 20 टन तक बढ़ जाती है।
    • अंगूर के वृंत की लंबाई वृद्धि: बीजहीन अंगूरों के गुच्छों के डंठल लंबे कर देता है जिससे फल घने नहीं होते और बड़े व फफूंद-मुक्त रहते हैं।
    • माल्टिंग प्रक्रिया तेज करना: शराब उद्योग में अंकुरित जौ के दानों की एल्यूरॉन परत में $\alpha$-एमाइलेज एंजाइम संश्लेषित कराकर स्टार्च को तेजी से शर्करा में बदलता है।
    • जीर्णता विलंबन: फलों को वृक्ष पर अधिक समय तक टिकाए रखकर विपणन अवधि बढ़ाता है।
4. साइटोकाइनिन: कोशिका विभाजन, जीर्णता विलंबन एवं ऊतक संवर्धन
  • खोज: फोक स्कूग व कार्लोस मिलर (1955) ने तंबाकू के तने के मज्जा ऊतक संवर्धन में ऑटोक्लेव किए गए हेरिंग मछली के शुक्राणु डीएनए से कोशिका विभाजन को तीव्र होते देखा और सक्रिय पदार्थ काइनेटिन पृथक किया। लेथम (1963) ने अपरिपक्व मक्के के दानों से प्रथम प्राकृतिक साइटोकाइनिन पृथक किया जिसका नाम जिएटिन (Zeatin) रखा।
  • प्रमुख कार्यिकीय प्रभाव व अनुप्रयोग:
    • कोशिका विभाजन (साइटोकाइनेसिस): प्ररोह शीर्ष, मूल शीर्ष व विकासशील फलों में तीव्र समसूत्री विभाजन को प्रेरित करता है।
    • शिखाग्र प्रधानता पर विजय: ऑक्सिन के विपरीत कार्य करते हुए पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि कराता है।
    • जीर्णता विलंबन (रिचमंड-लैंग प्रभाव / Richmond-Lang Effect): पत्तियों में क्लोरोफिल व प्रोटीन के विघटन को रोकता है तथा पोषकों को आकर्षित कर कटी पत्तियों को लंबे समय तक हरा-भरा रखता है।
    • ऊतक संवर्धन में अंगजनन (Organogenesis): स्कूग व मिलर के अनुसार ऊतक संवर्धन में ऑक्सिन व साइटोकाइनिन का अनुपात अंग निर्माण तय करता है:
      • उच्च ऑक्सिन : निम्न साइटोकाइनिन $\implies$ जड़ निर्माण (Rhizogenesis)।
      • उच्च साइटोकाइनिन : निम्न ऑक्सिन $\implies$ प्ररोह कलिका निर्माण (Caulogenesis)।
      • समान अनुपात $\implies$ अविभेदित कैलस (Callus) वृद्धि।

वृद्धि संदमक हार्मोन: एथिलीन (गैसीय फल पकाने वाला) एवं एब्सिसिक अम्ल (तनाव हार्मोन)

1. एथिलीन: गैसीय पादप हार्मोन एवं क्लाइमेक्टेरिक फल पकाना

एथिलीन ($\text{H}_2\text{C}=\text{CH}_2$) एकमात्र प्राकृतिक गैसीय पादप वृद्धि नियामक है। 1910 में एच.एच. कजिन्स ने देखा कि पके संतरों से निकलने वाली वाष्प पास रखे कच्चे केलों को शीघ्र पका देती है। आर. गेन (1934) ने सिद्ध किया कि पौधे स्वयं एथिलीन गैस बनाते हैं।

  • क्लाइमेक्टेरिक श्वसन उभार: फल पकने के दौरान एथिलीन श्वसन दर में भारी वृद्धि (रेस्पिरेटरी क्लाइमेक्टेरिक) लाती है, जिससे पेक्टिन घुलकर फल को नरम बनाता है और स्टार्च शर्करा में बदल जाता है।
  • नवोद्भिद में तिहरा प्रभाव (Triple Response): अंधेरे में रखे द्विबीजपत्री नवोद्भिदों पर एथिलीन के तीन लक्षण दिखाई देते हैं:
    1. तने की अनुदैर्ध्य वृद्धि का रुकना।
    2. अक्ष का फूलना व क्षैतिज मोटा होना।
    3. शिखाग्र अंकुश (Apical hook) का अत्यधिक मुड़ना।
  • कृषि अनुप्रयोग व इथेफोन (Ethephon): गैस रूप में छिड़काव कठिन होने से जल-घुलनशील इथेफोन (2-क्लोरोएथिलफॉस्फोनिक अम्ल) प्रयुक्त होता है। यह पादप ऊतकों में धीरे-धीरे एथिलीन गैस छोड़ता है:
    • टमाटर, सेब व केलों को तेजी से पकाता है।
    • अनानास व आम में एक साथ पुष्पन व फलन कराता है।
    • खीरे में मादा पुष्पों की संख्या बढ़ाकर उपज बढ़ाता है।
    • मूलरोम निर्माण को व्यापक रूप से प्रेरित कर अवशोषण सतह बढ़ाता है।
2. एब्सिसिक अम्ल (ABA): पादपों का सर्वमान्य तनाव हार्मोन

1960 के दशक के मध्य में तीन शोध दलों ने स्वतंत्र रूप से तीन संदमक पदार्थ खोजे: इनहिबिटर-$\beta$, एब्सिसिन II (एडिकॉट), तथा डॉर्मिन (वेयरिंग)। बाद में सिद्ध हुआ कि ये तीनों समान थे और संयुक्त नाम एब्सिसिक अम्ल (ABA) दिया गया।

  • तनाव हार्मोन की कार्यविधि (सूखे में रंध्र बंद करना): जल संकट के समय पत्तियां भारी मात्रा में ABA बनाती हैं। ABA द्वार कोशिकाओं के ग्राही से जुड़कर पोटैशियम ($\text{K}^+$) व मैलेट आयनों को तेजी से कोशिका से बाहर निकाल देता है। बहिःपरासरण द्वारा जल बाहर निकल जाने से द्वार कोशिकाएं शिथिल हो जाती हैं और रंध्र तत्काल बंद हो जाते हैं, जिससे वाष्पोत्सर्जन रुककर पौधा सूखने से बच जाता है।
  • बीज प्रसुप्ति बनाए रखना: ABA भ्रूण की वृद्धि रोककर बीज प्रसुप्ति बनाए रखता है, जिससे मातृ पौधे पर ही असमय अंकुरण (विविपेरी) नहीं होता।
  • जिबरेलिन का विरोध: अंकुरित बीजों में जिबरेलिन द्वारा $\alpha$-एमाइलेज एंजाइम निर्माण को ABA सीधे अवरुद्ध करता है।
  • विलगन व जीर्णता: पत्तियों व फलों की जीर्णता को तेज कर उन्हें गिराने में मदद करता है।

दीप्तिकालिता (Photoperiodism), फाइटोक्रोम वर्णक तंत्र (Pr / Pfr) एवं फ्लोरिजन परिकल्पना

1. दीप्तिकालिता की खोज एवं संकल्पना

दीप्तिकालिता (Photoperiodism) दिन की अवधि (प्रकाश काल) और रात की अवधि (अंधकार काल) के सापेक्ष अनुपात के प्रति पादपों की कार्यिकीय अनुक्रिया है, जो मुख्य रूप से पुष्पन (Flowering) को नियंत्रित करती है। इसकी खोज डब्ल्यू. डब्ल्यू. गार्नर तथा एच. ए. एलार्ड (1920) ने तंबाकू की 'मैरीलैंड मैमथ' किस्म तथा सोयाबीन में की थी।

2. क्रांतिक दीप्तिकाल के आधार पर पादपों का वर्गीकरण

प्रत्येक पादप के पुष्पन हेतु एक निश्चित क्रांतिक दीप्तिकाल (Critical Photoperiod) होता है:

पादप वर्ग प्रकाश काल की आवश्यकता अंधकार काल की अनिवार्यता प्रतिनिधि पादप
अल्प-प्रदीप्तकाली पादप (SDP) / दीर्घ-निशि पादप दिन की अवधि क्रांतिक दीप्तिकाल से कम होने पर ही पुष्पन होता है ($Light < Critical$)। इन्हें एक निरंतर लंबा अंधकार काल चाहिए। रात के अंधकार में क्षणिक प्रकाश की चमक देने पर पुष्पन पूर्णतः रुक जाता है (Night-break effect)! तंबाकू, सोयाबीन, धान, गुलदाउदी, जैन्थियम।
दीर्घ-प्रदीप्तकाली पादप (LDP) / अल्प-निशि पादप दिन की अवधि क्रांतिक दीप्तिकाल से अधिक होने पर पुष्पन होता है ($Light > Critical$)। रात की अवधि क्रांतिक अंधकार काल से कम होनी चाहिए। रात में प्रकाश की चमक देने से इनमें पुष्पन प्रेरित होता है। गेहूं, मूली, पालक, चुकंदर, हेनबेन।
दिवस-तटस्थ पादप (DNP) पुष्पन प्रकाश काल की अवधि पर निर्भर नहीं करता; पर्याप्त कायिक वृद्धि के बाद स्वतः पुष्पन होता है। प्रकाश या अंधकार की अवधि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। टमाटर, मक्का, सूरजमुखी, खीरा, कपास।
3. फाइटोक्रोम: प्रकाश-उत्क्रमणीय वर्णक तंत्र

प्रकाश काल की पहचान करने वाले नीले-हरे बिलिप्रोटीन वर्णक को फाइटोक्रोम (Phytochrome) कहते हैं। खोजकर्ता: एच. ए. बोर्थविक तथा एस. बी. हेंड्रिक्स (1952)। यह दो परस्पर परिवर्तनीय रूपों में रहता है:

$$P_r \ (660\text{ nm, लाल प्रकाश}) \underset{\text{सुदूर-लाल (730 nm) / अंधकार}}{\overset{\text{लाल प्रकाश (660 nm)}}{\rightleftharpoons}} P_{fr} \ (730\text{ nm, सुदूर-लाल प्रकाश})$$
  • $P_r$ (Phytochrome Red): 660 nm तरंगदैर्घ्य का लाल प्रकाश अवशोषित करता है। यह अक्रिय रूप है।
  • $P_{fr}$ (Phytochrome Far-Red): 730 nm तरंगदैर्घ्य का सुदूर-लाल प्रकाश अवशोषित करता है। यह कार्यिकीय रूप से सक्रिय रूप है जो पुष्पन व बीज अंकुरण कराता है।
  • दिन के प्रकाश में $P_r$ तेजी से $P_{fr}$ में बदलता है; रात के अंधेरे में $P_{fr}$ धीरे-धीरे पुनः $P_r$ में रूपांतरित हो जाता है।
4. संवेदना ग्रहण का स्थल एवं फ्लोरिजन परिकल्पना

यद्यपि फूल प्ररोह शीर्ष पर बनते हैं, किंतु प्रकाश प्रेरणा ग्रहण करने का वास्तविक अंग पत्तियां हैं। मिखाइल चैलाख्यान (1937) ने सिद्ध किया कि उपयुक्त प्रकाश काल मिलने पर पत्तियों में एक संचरणीय पुष्पन हार्मोन बनता है जिसे फ्लोरिजन (Florigen) कहते हैं। यह फ्लोएम द्वारा प्ररोह शीर्ष में जाकर पुष्प कलिकाओं का निर्माण कराता है। आधुनिक आणविक जीवविज्ञान में सिद्ध हुआ है कि फ्लोरिजन वास्तव में FT (Flowering Locus T) प्रोटीन है।

बसंतीकरण (Vernalization), संवेदना स्थल, बीज प्रसुप्ति एवं प्रसुप्ति निवारण

1. बसंतीकरण या शीत उपचार (Vernalization)

बसंतीकरण (Vernalization) कम तापमान (शीत काल, 1°C से 10°C) के उपचार द्वारा पादपों में पुष्पन की क्षमता अर्जित करने अथवा पुष्पन को त्वरित करने की प्रक्रिया है। यह शब्द वैज्ञानिक टी. डी. लैसेन्को (T.D. Lysenko, 1928) ने दिया था।

  • तापमान सीमा: इष्टतम शीत तापमान 1°C से 10°C तथा अवधि कुछ सप्ताह (30 से 60 दिन) होती है।
  • संवेदना स्थल: पत्तियों द्वारा नहीं; बल्कि सक्रिय रूप से विभाजनशील विभज्योतक कोशिकाओं द्वारा—विशेष रूप से प्ररोह शीर्षस्थ विभज्योतक एवं अंकुरित बीज के भ्रूण द्वारा ग्रहण किया जाता है।
  • कृषिगत महत्व एवं उदाहरण:
    • शीतकालीन अनाज (शीतकालीन गेहूं, राई): शरद ऋतु में बोने पर शीतकाल में ठंड पाकर वसंत में पुष्पन करते हैं। वसंत में बोने पर ये फूल नहीं बना पाते। कृत्रिम बसंतीकरण द्वारा शीतकालीन गेहूं को वसंत ऋतु में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।
    • द्विवर्षी पादप (पत्तागोभी, गाजर, चुकंदर): सामान्यतः प्रथम वर्ष कायिक वृद्धि करते हैं और शीत ऋतु के बाद द्वितीय वर्ष पुष्पन करते हैं। प्रथम वर्ष के नवोद्भिदों को कृत्रिम शीत उपचार देकर उसी वर्ष समय से पूर्व पुष्पन कराया जा सकता है।
  • डीबसंतीकरण (Devernalization): शीत उपचार के तुरंत बाद यदि पौधे को उच्च तापमान (35°C-40°C) में रख दिया जाए तो बसंतीकरण का प्रभाव पूर्णतः नष्ट हो जाता है।
2. बीज प्रसुप्ति (Seed Dormancy) एवं प्रसुप्ति निवारण के उपाय

अनुकूल पर्यावरणीय दशाओं (पर्याप्त नमी, उचित ताप व ऑक्सीजन) की उपस्थिति के बावजूद सजीव बीजों के अस्थायी रूप से अंकुरित न होने की अवस्था को बीज प्रसुप्ति (Seed Dormancy) कहते हैं:

प्रसुप्ति का कारण कार्यिकीय क्रियाविधि प्रसुप्ति निवारण की वैज्ञानिक विधि
कठोर व अपारगम्य बीजावरण बीजावरण जल व गैसों के प्रवेश को रोकता है तथा भ्रूण विस्तार में यांत्रिक बाधा डालता है। खुरचना (Scarification): रेगमाल से घिसना, हिलाना अथवा सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल ($\text{H}_2\text{SO}_4$) में डुबोकर बीजावरण को कोमल व छिद्रित करना।
रासायनिक संदमक बीज में एब्सिसिक अम्ल (ABA), फीनॉलिक अम्ल या कौमेरिन की उपस्थिति। पानी से धोना (Leaching) अथवा संदमक-रोधी वृद्धि प्रवर्तक जैसे जिबरेलिन ($\text{GA}_3$) व पोटैशियम नाइट्रेट ($\text{KNO}_3$) का उपचार।
अपरिपक्व भ्रूण बीज विमोचन के समय भ्रूण का पूर्ण विकसित न होना। अनुकूल शुष्क वातावरण में भंडारण कर प्राकृतिक परिपक्वन (After-ripening) कराना।
शीत ताप की आवश्यकता भ्रूण में हार्मोनल संतुलन बदलने हेतु निम्न ताप अनिवार्य होना। स्तरीकरण (Stratification): 1°C से 5°C के निम्न ताप पर नम बालू में बीजों को कुछ सप्ताह रखना।
प्रकाश की अनिवार्यता (प्रकाश-संवेदी बीज) अंकुरण हेतु अक्रिय $P_r$ का सक्रिय $P_{fr}$ में बदलना आवश्यक होना (जैसे सलाद, तंबाकू)। लाल प्रकाश ($\lambda = 660\text{ nm}$) का अनावरण।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

अंकगणितीय वृद्धि बलगतिकी समीकरण
Lt = समय t पर लंबाई; L0 = आरंभिक लंबाई; r = वृद्धि दर; t = समय
स्थिर धनात्मक ढालयुक्त सीधी रेखा के रूप में ग्राफ प्रदर्शित होता है।
ज्यामितीय वृद्धि सिग्मॉइड समीकरण
W1 = अंतिम भार; W0 = आरंभिक भार; r = सापेक्ष वृद्धि दर (दक्षता सूचकांक); e = 2.718
लैग, लॉग तथा स्थिर प्रावस्थाओं से मिलकर संपूर्ण सिग्मॉइड वक्र बनता है।
सापेक्ष वृद्धि दर (RGR) या दक्षता सूचकांक सूत्र
इकाई: समय^-1 (जैसे ग्राम/ग्राम/दिन)
विभिन्न आरंभिक आकार वाले पादप अंगों की वृद्धि दक्षता की सटीक तुलना।
ऊतक संवर्धन में ऑक्सिन-साइटोकाइनिन अनुपात सूत्र
उच्च ऑक्सिन: जड़ प्रेरण; उच्च साइटोकाइनिन: प्ररोह प्रेरण; समान: कैलस
व्यावसायिक सूक्ष्मप्रवर्धन (Micropropagation) का प्रमुख सिद्धांत।
फाइटोक्रोम प्रकाश-उत्क्रमणीय समीकरण
Pfr कार्यिकीय रूप से सक्रिय रूप है; Pr अक्रिय रूप है
रात्रि में लाल प्रकाश की अल्प चमक Pr को Pfr में बदलकर अल्प-प्रदीप्तकाली पादपों में पुष्पन रोक देती है।
क्रांतिक दीप्तिकाल की पुष्पन शर्तें
SDP हेतु निरंतर लंबा अंधकार और LDP हेतु दीर्घ प्रकाश काल अनिवार्य
पत्तियां प्रकाश संकेत ग्रहण कर फ्लोरिजन (FT प्रोटीन) बनाकर प्ररोह शीर्ष में भेजती हैं।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
(क) पादपों में अंकगणितीय वृद्धि और ज्यामितीय वृद्धि के बीच तीन मुख्य अंतर गणितीय समीकरणों व ग्राफ सहित स्पष्ट कीजिए। (ख) सजीवों में सिग्मॉइड वृद्धि वक्र सर्वमान्य क्यों होता है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

बोर्ड अंकन योजना अनुसार आदर्श बिंदुवार उत्तर:

(क) अंकगणितीय व ज्यामितीय वृद्धि में अंतर [3 अंक]:

  1. कोशिका विभाजन की प्रकृति:
    • अंकगणितीय: समसूत्री विभाजन के बाद केवल एक संतति कोशिका विभाजन क्षमता बनाए रखती है, दूसरी परिपक्व स्थायी कोशिका बन जाती है।
    • ज्यामितीय: दोनों संतति कोशिकाएं निरंतर विभाजन क्षमता बनाए रखती हैं ($1 o 2 o 4 o 8 \dots$)।
  2. गणितीय समीकरण:
    • अंकगणितीय: $L_t = L_0 + rt$ (जहां $L_t$ समय $t$ पर लंबाई, $L_0$ आरंभिक लंबाई, $r$ वृद्धि दर है)।
    • ज्यामितीय: $W_1 = W_0 e^{rt}$ (जहां $W_1$ अंतिम भार, $W_0$ आरंभिक भार, $r$ सापेक्ष वृद्धि दर, $t$ समय है)।
  3. ग्राफ की प्रकृति:
    • अंकगणितीय वृद्धि का ग्राफ एक स्थिर ढाल वाली सीधी रेखा (Linear plot) होता है।
    • ज्यामितीय वृद्धि का ग्राफ एक एस-आकार का सिग्मॉइड वक्र (Sigmoid S-curve) बनाता है।

(ख) सिग्मॉइड वक्र सर्वमान्य होने का कारण [2 अंक]:

  1. प्राकृतिक संसाधनों की सीमा: प्रकृति में किसी भी जीव के लिए पोषक तत्व, स्थान व जल असीमित नहीं होते। वृद्धि प्रारंभ में धीमी गति से शुरू होती है (लैग प्रावस्था); अनुकूल परिस्थितियों में तीव्र हो जाती है (लॉग प्रावस्था); और अंत में स्थान व पोषक तत्वों की कमी अथवा आनुवंशिक जीर्णता के कारण मंद पड़कर स्थिर प्रावस्था में पहुंच जाती है।
  2. सर्वमान्यता: यह एस-आकार वक्र एकल कोशिका, पौधे के अंग से लेकर संपूर्ण जनसंख्या तक प्राकृतिक संतुलन और वहन क्षमता का सार्वभौमिक प्रतीक है।
उदाहरण 2
(क) उपयुक्त वानस्पतिक उदाहरणों सहित विभेदन (Differentiation), निर्विभेदन (Dedifferentiation) और पुनर्विभेदन (Redifferentiation) को परिभाषित कीजिए। (ख) पादपों में सुघट्यता या प्लास्टिसिटी क्या है? बटरकप (Ranunculus) की विषमपर्णता द्वारा इसे समझाइए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(क) विकासीय कोशिकीय रूपांतरण [3 अंक]:

  1. विभेदन: विभज्योतक कोशिकाओं द्वारा विशिष्ट स्थायी कार्यों को करने हेतु संरचनात्मक व रासायनिक परिवर्तन कर स्थायी कोशिकाओं में बदलना। उदाहरण: जाइलम वाहिका तत्वों का बनना (जीवद्रव्य का नष्ट होना व लिग्निनयुक्त द्वितीयक भित्ति का बनना)।
  2. निर्विभेदन: पूर्णतः विभेदित व अविभाजनशील जीवित स्थायी कोशिकाओं द्वारा पुनः समसूत्री विभाजन क्षमता प्राप्त कर लेना। उदाहरण: स्थायी पैरेन्काइमा कोशिकाओं द्वारा अंतरापूलीय एधा तथा कॉर्क एधा (फेलोजन) बनाना।
  3. पुनर्विभेदन: निर्विभेदित कोशिकाओं द्वारा विभाजित होकर पुनः विभाजन क्षमता खो देना और विशिष्ट स्थायी ऊतक में बदल जाना। उदाहरण: अंतरापूलीय एधा द्वारा द्वितीयक जाइलम व द्वितीयक फ्लोएम का निर्माण।

(ख) सुघट्यता एवं बटरकप की विषमपर्णता [2 अंक]:

  1. सुघट्यता (प्लास्टिसिटी): पर्यावरण के प्रभाव अथवा जीवन की विभिन्न प्रावस्थाओं के अनुसार पादपों द्वारा भिन्न-भिन्न संरचनात्मक रूप निर्मित करने की क्षमता को सुघट्यता कहते हैं।
  2. बटरकप (Ranunculus) में विषमपर्णता: जब बटरकप का पौधा जल में डूबा होता है, तो जल प्रवाह के प्रतिरोध को कम करने हेतु पत्तियां अत्यंत बारीक, कटी-फटी व फीते जैसी बनती हैं; किंतु उसी पौधे की हवा में स्थित पत्तियां चौड़ी व पालियुक्त बनती हैं। यह पर्यावरणीय सुघट्यता का सटीक उदाहरण है।
उदाहरण 3
(क) चार्ल्स डार्विन एवं फ्रिट्स वेंट के प्रयोगों का उल्लेख करते हुए ऑक्सिन की खोज का इतिहास संक्षेप में लिखिए। (ख) कृषि एवं बागवानी में ऑक्सिन के चार प्रमुख अनुप्रयोग बताइए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(क) ऑक्सिन की खोज का इतिहास [3 अंक]:

  1. चार्ल्स व फ्रांसिस डार्विन (1880): कैनरी घास के प्रांकुरचोल पर एकतरफा प्रकाश डालकर देखा कि प्रकाश की संवेदना शीर्ष पर ग्रहण होती है और नीचे की ओर संचरित होकर वक्रता उत्पन्न करती है।
  2. बॉयसेन-जेन्सन (1910): शीर्ष के नीचे जिलेटिन रखने पर प्रकाशानुवर्तन हुआ, किंतु अभ्रक पट्टिका रखने पर रुक गया; जिससे सिद्ध हुआ कि यह एक विसरणशील रासायनिक पदार्थ है।
  3. फ्रिट्स वेंट (1928): जई (Avena) के कटे हुए शीर्षों से एगार गुटके में हॉर्मोन को विसरित कराकर पृथक किया और अवेना वक्रता परीक्षण द्वारा सिद्ध किया कि यह पदार्थ असमान वृद्धि कराता है। उन्होंने इसका नाम 'ऑक्सिन' रखा।

(ख) ऑक्सिन के चार कृषि अनुप्रयोग [2 अंक]:

  1. तने की कलमों में जड़ प्रेरण: IBA व NAA लगाकर कलमों में शीघ्र अपस्थानिक जड़ें विकसित की जाती हैं।
  2. चयनात्मक खरपतवारनाशी: 2,4-D का छिड़काव अनाज की फसलों (गेहूं, मक्का) में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को मार देता है।
  3. शिखाग्र प्रधानता हटाना: चाय के बागानों में शीर्ष कलिका की कटाई (प्रूनिंग) कर झाड़ियों को सघन बनाया जाता है।
  4. अनिषेकफलन: टमाटर में बिना निषेचन के बीजहीन फल प्राप्त करने हेतु छिड़काव किया जाता है।
उदाहरण 4
(क) आधुनिक कृषि एवं उद्योग में जिबरेलिन (GA3) के तीन प्रमुख व्यावसायिक उपयोग लिखिए। (ख) साइटोकाइनिन का 'रिचमंड-लैंग प्रभाव' क्या है और पादप ऊतक संवर्धन में ऑक्सिन-साइटोकाइनिन अनुपात का महत्व समझाइए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(क) जिबरेलिन के तीन व्यावसायिक उपयोग [3 अंक]:

  1. गन्ने की उपज में वृद्धि: गन्ने की फसल पर GA3 छिड़कने से तने के पोरों की लंबाई बढ़ जाती है, जिससे प्रति एकड़ पैदावार 20 टन तक बढ़ जाती है।
  2. शराब उद्योग में माल्टिंग को तेज करना: अंकुरित जौ के दानों में GA3 अल्फा-एमाइलेज एंजाइम को सक्रिय कर स्टार्च को किण्वन योग्य शर्करा में तेजी से बदलता है।
  3. अंगूर के गुच्छों का विस्तार: बीजहीन अंगूरों के वृंत लंबे कर देता है जिससे फल बड़े आकार के होते हैं और सड़न से बचते हैं; तथा साइट्रस फलों की जीर्णता विलंबित करता है।

(ख) रिचमंड-लैंग प्रभाव व ऊतक संवर्धन में अनुपात [2 अंक]:

  1. रिचमंड-लैंग प्रभाव: कटी हुई पत्तियों पर साइटोकाइनिन लगाने से क्लोरोफिल व प्रोटीन का क्षरण रुक जाता है और पोषक तत्व उस ओर आकर्षित होते हैं, जिससे पत्तियां लंबे समय तक हरी बनी रहती हैं; इसे रिचमंड-लैंग प्रभाव कहते हैं।
  2. ऊतक संवर्धन में अनुपात (स्कूग व मिलर):
    • उच्च ऑक्सिन : निम्न साइटोकाइनिन $\implies$ जड़ निर्माण (Rhizogenesis)।
    • उच्च साइटोकाइनिन : निम्न ऑक्सिन $\implies$ प्ररोह कलिका निर्माण (Caulogenesis)।
    • समान अनुपात $\implies$ अविभेदित कैलस वृद्धि।
उदाहरण 5
(क) एथिलीन द्वारा नवोद्भिदों में प्रदर्शित 'तिहरा प्रभाव' (Triple Response) क्या है? (ख) एब्सिसिक अम्ल (ABA) को पादपों का 'तनाव हार्मोन' क्यों कहा जाता है? सूखे की स्थिति में यह रंध्रों को कैसे बंद करता है? [2 + 3 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(क) एथिलीन का तिहरा प्रभाव [2 अंक]: अंधेरे में विकसित हो रहे द्विबीजपत्री नवोद्भिद जब एथिलीन गैस के संपर्क में आते हैं, तो तीन लक्षण प्रदर्शित करते हैं:

  1. तने की लंबाई में वृद्धि का रुकना।
  2. तने के अक्ष का असामान्य रूप से फूलना व मोटा होना।
  3. शिखाग्र अंकुश (Apical hook) का अत्यधिक मुड़ना व क्षैतिज वृद्धि।

(ख) तनाव हार्मोन के रूप में ABA व रंध्र बंद होने की क्रियाविधि [3 अंक]:

  1. तनाव हार्मोन कहने का कारण: सूखा, जल अभाव, अत्यधिक लवणता व ठंड जैसी प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों में पादपों में ABA का तीव्र संश्लेषण होता है, जो पादप को प्रतिकूलताओं से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।
  2. रंध्र बंद होने की क्रियाविधि:
    • मिट्टी में जल की कमी होने पर जड़ों से संकेत पाकर पत्तियों में भारी मात्रा में ABA संश्लेषित होता है।
    • ABA द्वार कोशिकाओं की प्लाज्मा झिल्ली के विशिष्ट ग्राही से बंध जाता है।
    • इससे द्वार कोशिकाओं से पोटैशियम आयन (K+) और मैलेट आयन तेजी से बाहर (एपोप्लास्ट में) निकलने लगते हैं।
    • विलेय कम होने के कारण बहिःपरासरण द्वारा जल बाहर निकल जाता है और द्वार कोशिकाओं का स्फीति दाब समाप्त हो जाता है।
    • शिथिल (Flaccid) द्वार कोशिकाएं आपस में सट जाती हैं और रंध्र तत्काल बंद हो जाते हैं, जिससे वाष्पोत्सर्जन पूर्णतः रुक जाता है।
उदाहरण 6
(क) क्रांतिक दीप्तिकाल व अंधकार काल के संदर्भ में अल्प-प्रदीप्तकाली (SDP) एवं दीर्घ-प्रदीप्तकाली (LDP) पादपों में अंतर स्पष्ट कीजिए। (ख) बसंतीकरण (Vernalization) क्या है? इसका संवेदना स्थल क्या है और इसके दो कृषिगत लाभ लिखिए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(क) SDP व LDP में तुलना [3 अंक]:

  1. प्रकाश काल की शर्त:
    • अल्प-प्रदीप्तकाली (SDP): दिन की अवधि एक निश्चित क्रांतिक दीप्तिकाल से कम होने पर पुष्पन करते हैं (जैसे तंबाकू, सोयाबीन)।
    • दीर्घ-प्रदीप्तकाली (LDP): दिन की अवधि क्रांतिक दीप्तिकाल से अधिक होने पर पुष्पन करते हैं (जैसे गेहूं, मूली)।
  2. अंधकार काल की भूमिका (Night Length):
    • SDP वास्तव में 'दीर्घ-निशि पादप' हैं; इन्हें एक निरंतर लंबी रात की आवश्यकता होती है।
    • LDP 'अल्प-निशि पादप' हैं; इनकी रात क्रांतिक काल से छोटी होनी चाहिए।
  3. रात्रि में प्रकाश की चमक का प्रभाव (Night-break effect):
    • SDP में रात के अंधकार में क्षणिक लाल प्रकाश देने पर पुष्पन पूर्णतः संदमित हो जाता है।
    • LDP में रात में प्रकाश की चमक देने से पुष्पन त्वरित हो जाता है।

(ख) बसंतीकरण एवं इसके लाभ [2 अंक]:

  1. परिभाषा: कम तापमान (शीत काल, 1°C से 10°C) के उपचार द्वारा पादपों में पुष्पन की क्षमता अर्जित करने या पुष्पन को तेज करने की प्रक्रिया बसंतीकरण कहलाती है।
  2. संवेदना स्थल: सक्रिय रूप से विभाजनशील विभज्योतक कोशिकाएं—मुख्यतः प्ररोह शीर्षस्थ विभज्योतक व अंकुरित बीज का भ्रूण (पत्तियां नहीं)।
  3. दो कृषिगत लाभ:
    • शीतकालीन गेहूं की किस्मों को शीत उपचार देकर वसंत ऋतु में भी उगाया जा सकता है।
    • द्विवर्षी पादपों (पत्तागोभी, चुकंदर) को शीत उपचार देकर पहले ही वर्ष में समय पूर्व पुष्पन कराकर बीज प्राप्त किया जा सकता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि दीप्तिकालिता का प्रकाश संकेत सीधे प्ररोह शीर्ष द्वारा ग्रहण किया जाता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

दीप्तिकालिता का प्रकाश संकेत पत्तियों द्वारा ग्रहण किया जाता है; पत्तियां फ्लोरिजन बनाकर फ्लोएम द्वारा प्ररोह शीर्ष में भेजती हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि अल्प-प्रदीप्तकाली पादप (SDP) दिन की लंबाई नापते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

SDP वास्तव में रात की लंबाई नापते हैं; इन्हें एक निरंतर लंबी रात चाहिए होती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि बसंतीकरण का शीत संकेत पत्तियों द्वारा ग्रहण किया जाता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

बसंतीकरण का शीत तापमान केवल विभाजनशील विभज्योतक (प्ररोह शीर्ष व भ्रूण) द्वारा ग्रहण होता है, पत्तियों द्वारा नहीं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

शिखाग्र प्रधानता में ऑक्सिन और साइटोकाइनिन की भूमिका में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ऑक्सिन शिखाग्र प्रधानता उत्पन्न करता है (पार्श्व कलिकाओं को रोकता है); जबकि साइटोकाइनिन शिखाग्र प्रधानता को समाप्त करता है (पार्श्व शाखाएं बढ़ाता है)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि एब्सिसिक अम्ल (ABA) जिबरेलिन के साथ मिलकर काम करता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ABA जिबरेलिन का पूर्ण विरोधी (Antagonistic) हार्मोन है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

WBCHSE कक्षा 11 जीव विज्ञान • इकाई 4: पादप कार्यिकी पादप वृद्धि एवं परिवर्धन: वृद्धि बलगतिकी, पादप हार्मोन (PGRs), दीप्तिकालिता व बसंतीकरण अध्याय 13 / टॉपिक 179 1. वृद्धि बलगतिकी व कोशिकीय चरण वृद्धि के तीन क्रमिक चरण: • 1. विभज्योतकीय चरण: सघन जीवद्रव्य, पतली प्राथमिक भित्ति • 2. दीर्घीकरण चरण: रसधानी निर्माण, कोशिका दीर्धीकरण • 3. परिपक्वन चरण: अधिकतम भित्ति स्थूलन, विशेषीकरण अंकगणितीय बनाम ज्यामितीय वृद्धि समय (t) ➔ आकार/भार Lt = L0 + rt (रैखिक) W1 = W0·e^rt (सिग्मॉइड) लैग लॉग/चरघातांकी स्थिर चरण कोशिकीय रूपांतरण व सुघट्यता (प्लास्टिसिटी): • विभेदन: विभज्योतक $ o$ वाहिनी तत्व (स्थायी ऊतक) • निर्विभेदन: पैरेन्काइमा $ o$ एधा (पुनः विभाजनशील) • पुनर्विभेदन: द्वितीयक जाइलम व फ्लोएम निर्माण • सुघट्यता (विषमपर्णता): कपास, धनिया तथा बटरकप (जल में कटी-फटी व वायु में अखंड पत्तियां) सापेक्ष वृद्धि दर (RGR) = (W1 - W0) / (W0 · Δt) 2. पादप वृद्धि नियामक (PGRs) ऑक्सिन (IAA, IBA, NAA, 2,4-D): • डार्विन (1880), वेंट का जई वक्रता परीक्षण; शिखाग्र प्रधानता • कलमों में जड़ प्रेरण, टमाटर में अनिषेकफलन (पार्थेनोकार्पी) • 2,4-D: द्विबीजपत्री चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारनाशी के रूप में जिबरेलिन (GA3 / टरपेनॉइड): • कुरोसावा (1926) बकाने रोग; बोल्टिंग (पर्वों का दीर्धीकरण) • अंगूर के वृंत की लंबाई वृद्धि; माल्टिंग प्रक्रिया को तेज करना • गन्ने के तने की लंबाई वृद्धि (+20 टन/एकड़ उपज वृद्धि) साइटोकाइनिन (जिएटिन, काइनेटिन / एडेनिन व्युत्पन्न): • स्कूग व मिलर (1955); तीव्र कोशिका विभाजन प्रेरण • शिखाग्र प्रधानता पर विजय; जीर्णता विलंब (रिचमंड-लैंग प्रभाव) • अंगजनन: उच्च ऑक्सिन ➔ जड़; उच्च साइटोकाइनिन ➔ प्ररोह एथिलीन (C2H4 / गैसीय हार्मोन - इथेफोन): • कजिन्स (1910); क्लाइमेक्टेरिक फल पकाना तेज करता है • तिहरा प्रभाव: क्षैतिज वृद्धि, अक्ष का फूलना, शिखाग्र अंकुश • प्रसुप्ति भंग; मूलरोम निर्माण बढ़ाकर अवशोषण क्षेत्र वृद्धि एब्सिसिक अम्ल (ABA / तनाव हार्मोन): • इनहिबिटर-बी / डॉर्मिन; जल तनाव में संश्लेषित • रंध्रों को बंद करना (K+ निष्कासन) ➔ वाष्पोत्सर्जन रोकता है • बीज प्रसुप्ति बनाए रखता है; जिबरेलिक अम्ल का विरोधी वृद्धि, अंकुरण व उपापचय का सामान्य संदमक 3. दीप्तिकालिता एवं बसंतीकरण गार्नर व एलार्ड: क्रांतिक दीप्तिकाल अल्प-प्रदीप्तकाली (SDP): रात्रि > क्रांतिक काल (तंबाकू, सोयाबीन) दीर्घ-प्रदीप्तकाली (LDP): प्रकाश > क्रांतिक काल (गेहूं, मूली, चुकंदर) दिवस-तटस्थ (DNP): प्रकाश अवधि पर अनाश्रित (टमाटर, मक्का) रात्रि में प्रकाश की अल्प चमक SDP में पुष्पन रोक देती है! फाइटोक्रोम प्रकाश-उत्क्रमणीय वर्णक तंत्र: Pr (660nm) लाल प्रकाश (660nm) सुदूर-लाल प्रकाश (730nm) Pfr (730nm) Pfr सक्रिय रूप है; अंधेरे में धीरे-धीरे निष्क्रिय Pr में बदलता है बसंतीकरण एवं फ्लोरिजन संकेत: • बसंतीकरण (Vernalization): अल्प ताप उपचार (1–10°C) द्वारा शीतकालीन गेहूं व द्विवर्षी पादपों (पत्तागोभी, गाजर, चुकंदर) में समय पूर्व पुष्पन को प्रेरित करना। • संवेदना स्थल: प्ररोह शीर्ष विभज्योतक व भ्रूण। • फ्लोरिजन (FT प्रोटीन): प्रकाश प्रेरणा पत्तियों में ग्रहण होती है और फ्लोएम द्वारा प्ररोह शीर्ष में पहुंचकर पुष्पन कराती है। प्रसुप्ति निवारण: बीजावरण खुर्चन, शीत स्तरीकरण, GA3 उपचार

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
पादप वृद्धि कोशिकाओं या अंगों के आकार, आयतन व शुष्क भार में होने वाली स्थायी व अनुत्क्रमणीय वृद्धि है, जो विभज्योतकों द्वारा संचालित असीमित वृद्धि है।
मुख्य बिंदु 2
वृद्धि के तीन स्पष्ट कोशिकीय चरण हैं: विभज्योतकीय चरण (तीव्र विभाजन), दीर्धीकरण चरण (कोशिका विस्तार), तथा परिपक्वन चरण (भित्ति स्थूलन व विभेदन)।
मुख्य बिंदु 3
अंकगणितीय वृद्धि में एक कोशिका विभाजनशील रहती है और रैखिक ग्राफ देती है (Lt = L0 + rt); ज्यामितीय वृद्धि में सभी कोशिकाएं विभाजित होकर सिग्मॉइड एस-वक्र बनाती हैं (W1 = W0·e^rt)।
मुख्य बिंदु 4
विकासीय कोशिकीय रूपांतरणों में विभेदन (जाइलम निर्माण), निर्विभेदन (एधा निर्माण) तथा पुनर्विभेदन (द्वितीयक ऊतक निर्माण) शामिल हैं।
मुख्य बिंदु 5
सुघट्यता या प्लास्टिसिटी के कारण पादप पर्यावरण के अनुसार भिन्न पत्तियां बनाते हैं, जिसका उत्कृष्ट उदाहरण बटरकप (Ranunculus) की विषमपर्णता है।
मुख्य बिंदु 6
ऑक्सिन शिखाग्र प्रधानता उत्पन्न करता है, कलमों में जड़ें निकालता है तथा कृत्रिम 2,4-D चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों का चयनात्मक विनाश करता है।
मुख्य बिंदु 7
जिबरेलिन (GA3) रोसेट पादपों में बोल्टिंग कराता है, गन्ने के पोरों को लंबा कर पैदावार 20 टन/एकड़ बढ़ाता है, तथा जौ की माल्टिंग तेज करता है।
मुख्य बिंदु 8
साइटोकाइनिन तीव्र कोशिका विभाजन कराता है, शिखाग्र प्रधानता समाप्त करता है, रिचमंड-लैंग प्रभाव द्वारा जीर्णता टालता है और ऊतक संवर्धन में अंगजनन कराता है।
मुख्य बिंदु 9
एथिलीन गैसीय हार्मोन है जो फलों में क्लाइमेक्टेरिक उभार व नवोद्भिदों में तिहरा प्रभाव दिखाता है; जबकि एब्सिसिक अम्ल तनाव हार्मोन है जो रंध्र बंद करता है व प्रसुप्ति लाता है।
मुख्य बिंदु 10
दीप्तिकालिता की प्रेरणा पत्तियां फाइटोक्रोम द्वारा ग्रहण कर फ्लोरिजन को शीर्ष में भेजती हैं तथा बसंतीकरण में विभज्योतक शीत संकेत ग्रहण कर पुष्पन को प्रेरित करते हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
ताजे भार की तुलना में पादप अंग के शुष्क भार को वृद्धि का अधिक विश्वसनीय मापदंड क्यों माना जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: ताजे भार में उपस्थित जल की मात्रा वाष्पोत्सर्जन, आर्द्रता और कोशिकाओं के सामयिक स्फीति दाब के अनुसार बदलती रहती है। इसके विपरीत ओवन में पूर्ण जल सुखाने के बाद प्राप्त शुष्क भार पौधे द्वारा वास्तविक रूप से संश्लेषित कार्बनिक पदार्थों, प्रोटोप्लाज्म और सेलुलोस की स्थायी मात्रा को दर्शाता है।
2
यदि एक अल्प-प्रदीप्तकाली पादप (जैसे जैन्थियम) को 10 घंटे प्रकाश और 14 घंटे अंधकार में रखा जाए, किंतु अंधकार के बीच में 5 मिनट के लिए लाल प्रकाश की चमक दे दी जाए, तो क्या होगा और क्यों?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पौधे में पुष्पन नहीं होगा। अल्प-प्रदीप्तकाली पादप वास्तव में दीर्घ-निशि पादप होते हैं जिन्हें एक निरंतर लंबा अंधकार काल चाहिए होता है। लाल प्रकाश की चमक अक्रिय Pr को सक्रिय Pfr में बदल देती है, जिससे पौधे की जैविक घड़ी बाधित हो जाती है और फ्लोरिजन का संश्लेषण रुक जाता है।
3
व्यावसायिक चाय बागानों में किसान नियमित अंतराल पर चाय के पौधों के प्ररोह शीर्ष की कटाई (Pruning) क्यों करते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: प्ररोह शीर्ष पर अत्यधिक मात्रा में ऑक्सिन बनता है जो नीचे उतरकर पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि को रोके रखता है (शिखाग्र प्रधानता)। शीर्ष काट देने से ऑक्सिन का स्रोत हट जाता है, जिससे अंतर्जात साइटोकाइनिन पार्श्व कलिकाओं को तेजी से विकसित कर कोमल पत्तियों की सघन झाड़ी बना देता है, जिससे चाय की उपज बढ़ जाती है।
4
ताजे तोड़े गए आलू को नम व अनुकूल मिट्टी में रखने पर भी वह तुरंत अंकुरित क्यों नहीं होता, और इस प्रसुप्ति को कैसे दूर किया जा सकता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सद्यः तोड़े गए आलू के कंदों में एब्सिसिक अम्ल (ABA) का स्तर बहुत ऊंचा होता है, जो कलिकाओं को प्रसुप्त रखता है। आलू के कंदों पर जिबरेलिक अम्ल (GA3) या एथिलीन क्लोरोहाइड्रिन का उपचार करने से ABA का प्रभाव नष्ट हो जाता है, एमाइलेज एंजाइम सक्रिय होता है और कलिकाएं शीघ्र अंकुरित हो जाती हैं।
5
गेहूं के खेत में 2,4-D का छिड़काव करने पर गेहूं की फसल को हानि पहुंचे बिना खरपतवार कैसे नष्ट हो जाते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 2,4-D एक चयनात्मक खरपतवारनाशी है जो विशेष रूप से चौड़ी पत्ती वाले द्विबीजपत्री खरपतवारों के संवहन ऊतकों को क्षतिग्रस्त कर उन्हें मार देता है। गेहूं और धान जैसे एकबीजपत्री अनाज 2,4-D को तेजी से उपापचयी रूप से निष्क्रिय कर देते हैं और उनकी पत्तियों की आंतरिक संरचना भिन्न होने से वे सुरक्षित रहते हैं।
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कक्षा 11 Biology के सभी अध्याय

अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

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