वृद्धि (Growth) किसी कोशिका, ऊतक, अंग या संपूर्ण जीव के आकार, आयतन, पृष्ठ क्षेत्रफल अथवा शुष्क भार में होने वाला एक स्थायी और अनुत्क्रमणीय (इररिवर्सिबल) विस्तार है, जो उपचयी व अपचयी प्रक्रियाओं द्वारा ऊर्जा व्यय पर संपन्न होता है:
- विवृत / असीमित वृद्धि (Open / Indeterminate Form): जंतुओं की वृद्धि एक निश्चित आयु में रुक जाती है, किंतु पादप जीवनभर असीमित रूप से बढ़ते रहते हैं। इसका मुख्य कारण पादप शरीर के विशिष्ट सिरों पर जीवनपर्यंत उपस्थित विभज्योतक (Meristems) हैं।
- प्राथमिक बनाम द्वितीयक विभज्योतक:
- मूल शीर्षस्थ विभज्योतक (RAM) एवं प्ररोह शीर्षस्थ विभज्योतक (SAM): अक्ष की प्राथमिक लंबाई में वृद्धि (लंबाई में दीर्धीकरण) के लिए उत्तरदायी होते हैं।
- पार्श्वीय विभज्योतक (संवहन एधा व कॉर्क एधा / फेलोजन): द्विबीजपत्री पादपों में अंग की मोटाई या घेरे में वृद्धि (द्वितीयक वृद्धि) कराते हैं।
- वृद्धि के मापन योग्य मानक: कोशिकीय स्तर पर वृद्धि मुख्यतः जीवद्रव्य की मात्रा में वृद्धि का परिणाम है। जीवद्रव्य का सीधा मापन कठिन होने के कारण अन्य मानकों से वृद्धि नापी जाती है: शुष्क भार में वृद्धि (सर्वाधिक सटीक), ताजे भार में वृद्धि, लंबाई, क्षेत्रफल, आयतन या कोशिका संख्या में वृद्धि।
- मक्के का एक मूल शीर्षस्थ विभज्योतक प्रति घंटे 17,500 से अधिक नई कोशिकाएं बना सकता है (संख्या में वृद्धि)।
- तरबूज की एक कोशिका अपने आरंभिक आकार से 3,50,000 गुना तक बढ़ सकती है (आकार में वृद्धि)।
मूल व प्ररोह के शीर्ष अक्ष पर वृद्धि के तीन सुस्पष्ट क्षेत्र पाए जाते हैं:
| वृद्धि का चरण | कोशिकीय लक्षण व संघटन | कोशिका भित्ति व रसधानी | कार्यिकीय महत्व |
|---|---|---|---|
| 1. विभज्योतकीय चरण (कोशिका विभाजन) | कोशिकाएं समव्यासीय, सघन जीवद्रव्य से परिपूर्ण और सुस्पष्ट बड़े केंद्रक वाली होती हैं। | प्राथमिक कोशिका भित्ति पतली, सेलुलोस निर्मित व प्रचुर जीवद्रव्यतंतु (प्लाज्मोडेस्मेटा) युक्त; केंद्रीय रसधानी अनुपस्थित। | समसूत्री विभाजन द्वारा लगातार नई संतति कोशिकाएं जोड़कर अक्ष का विस्तार करना। |
| 2. दीर्धीकरण चरण (कोशिका विस्तार) | विभज्योतकीय क्षेत्र के ठीक पीछे (समीपस्थ) स्थित होता है। | छोटी रसधानियां आपस में मिलकर बड़ी रसधानी बनाती हैं; स्फीति दाब बढ़ता है; नए भित्ति घटकों का निक्षेपण होता है। | कोशिकाएं अनुदैर्ध्य रूप से तेजी से लंबी होकर मूल व तने की लंबाई बढ़ाती हैं। |
| 3. परिपक्वन चरण (कोशिका विभेदन) | दीर्धीकरण क्षेत्र के और पीछे स्थित होता है। | कोशिकाएं अपना अंतिम आकार प्राप्त कर लेती हैं; द्वितीयक भित्ति स्थूलन (लिग्निन, सुबेरिन निक्षेपण) होता है। | कोशिकाएं विशिष्ट कार्यों के लिए संरचनात्मक व कार्यिकीय रूपांतरण (विभेदन) प्राप्त करती हैं (जैसे मूलरोम, जाइलम व फ्लोएम)। |
प्रति इकाई समय में होने वाली वृद्धि को वृद्धि दर (Growth rate) कहते हैं। पादपों में दो प्रमुख वृद्धि प्रारूप देखे जाते हैं:
| लक्षण | अंकगणितीय वृद्धि (Arithmetic Growth) | ज्यामितीय वृद्धि (Geometric Growth) |
|---|---|---|
| कोशिका विभाजन की प्रकृति | समसूत्री विभाजन के बाद केवल एक संतति कोशिका विभाजन जारी रखती है, जबकि दूसरी विभेदित व परिपक्व हो जाती है। | दोनों संतति कोशिकाएं निरंतर विभाजन की क्षमता बनाए रखती हैं ($1 \to 2 \to 4 \to 8 \to 16 \dots$ की दर से)। |
| गणितीय सूत्र | $$L_t = L_0 + rt$$ | $$W_1 = W_0 e^{rt}$$ |
| चरों का अर्थ | $L_t$: समय $t$ पर लंबाई; $L_0$: आरंभिक लंबाई; $r$: वृद्धि दर या ढाल। | $W_1$: अंतिम आकार/भार; $W_0$: आरंभिक आकार; $r$: सापेक्ष वृद्धि दर / दक्षता सूचकांक; $t$: समय; $e$: प्राकृतिक लघुगणक का आधार ($2.718$)। |
| ग्राफ की प्रकृति | एक सरल रेखीय ग्राफ (Linear plot) जिसका ढाल ($r$) स्थिर होता है। | एक एस-आकार का सिग्मॉइड वक्र (Sigmoid S-curve)। |
| प्राकृतिक उदाहरण | नियत दर से मूल या प्ररोह शीर्ष की लंबाई में वृद्धि। | बीज में भ्रूण का विकास, अंकुरित नवोद्भिद का भार बढ़ना, जीवाणु संवर्धन। |
एक प्राकृतिक सिग्मॉइड वक्र में तीन प्रमुख प्रावस्थाएं होती हैं:
- प्रारंभिक या मंद प्रावस्था (Lag Phase): आरंभिक धीमी वृद्धि की अवस्था, जब कोशिकाएं अनुकूलन करती हैं व आवश्यक एंजाइम बनाती हैं।
- चरघातांकी या लॉग प्रावस्था (Log / Exponential Phase): सर्वाधिक तीव्र वृद्धि की अवस्था, जहां प्रचुर पोषक तत्वों व स्थान की उपस्थिति में कोशिका विभाजन चरम पर होता है।
- स्थिर प्रावस्था (Stationary Phase): सीमित पोषक तत्वों, स्थान के अभाव अथवा आनुवंशिक जीर्णता के कारण वृद्धि मंद होकर समतल हो जाती है।
- निरपेक्ष वृद्धि दर (Absolute Growth Rate - AGR): प्रति इकाई समय में कुल वृद्धि का मापन ($AGR = \frac{\Delta W}{\Delta t}$)।
- सापेक्ष वृद्धि दर (Relative Growth Rate - RGR) या दक्षता सूचकांक: आरंभिक भार के संदर्भ में प्रति इकाई समय में वृद्धि ($RGR = \frac{W_1 - W_0}{W_0 \cdot \Delta t}$)। यह नए पादप पदार्थ उत्पादन की आंतरिक दक्षता को दर्शाती है।