जीवन क्या है? जीवन पदार्थों का एक विशिष्ट, सुव्यवस्थित और जटिल आणविक संगठन है जो रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा स्वयं को अभिव्यक्त करते हुए वृद्धि, विकास, संवेदनशीलता, अनुकूलन और जनन प्रदर्शित करता है। आधुनिक जीव विज्ञान में सजीवों के परिभाषित गुणों (Definitive Properties) और अपरिभाषित लक्षणों के मध्य स्पष्ट भेद किया जाता है।
वृद्धि के दो जुड़वां लक्षण हैं: भार में वृद्धि और संख्या में वृद्धि।
- अपरिमित बनाम परिमित वृद्धि: पौधों में विभज्योतक ऊतक (Meristematic tissue) की उपस्थिति के कारण जीवनपर्यंत कोशिका विभाजन द्वारा अपरिमित वृद्धि होती है। जंतुओं में वृद्धि एक निश्चित आयु तक ही होती है (परिमित वृद्धि), जिसके बाद कोशिका विभाजन केवल क्षतिग्रस्त ऊतकों के प्रतिस्थापन के लिए होता है।
- आंतरिक बनाम बाह्य वृद्धि: सजीवों में जीवद्रव्य के संश्लेषण द्वारा आंतरिक वृद्धि (Intrinsic Growth) होती है। इसके विपरीत, निर्जीव वस्तुओं जैसे रेत के टीलों, पत्थरों और पर्वतों में बाह्य सतह पर पदार्थों के संचय (Accretion) द्वारा बाह्य वृद्धि (Extrinsic Growth) होती है।
- निष्कर्ष: चूंकि निर्जीव वस्तुएं भी भार में बढ़ सकती हैं, अतः केवल वृद्धि को सजीवों का निरपेक्ष परिभाषित गुण नहीं माना जा सकता; यद्यपि आंतरिक वृद्धि सजीवों का प्रमुख लक्षण है।
जनन वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीव अपने समान नई संतति उत्पन्न करता है। यह लैंगिक अथवा अलैंगिक (बीजाणु, मुकुलन, विखंडन, पुनरुद्भवन) विधियों से होता है।
- एककोशिकीय जीवों में समानता: जीवाणु, अमीबा और एककोशिकीय शैवालों में वृद्धि और जनन पर्यायवाची हैं, क्योंकि दोनों में ही कोशिकाओं की संख्या बढ़ती है।
- जनन के अपवाद: कई सजीव प्रजनन करने में पूरी तरह असमर्थ होते हैं। जैसे: बंध्य श्रमिक मधुमक्खियां (Sterile worker bees), खच्चर (Mule - नर गधे और मादा घोड़ी का संकर), हिनि (Hinny) तथा अनुर्वर मानव युगल। ये जीव प्रजनन न कर पाने के बावजूद पूर्णतः जीवित हैं।
- निष्कर्ष: जनन किसी निर्जीव में नहीं पाया जाता, फिर भी सभी सजीवों के लिए अनिवार्य न होने के कारण यह जीवन का परिभाषित गुण नहीं है।
शरीर में होने वाली समस्त उपचयी (Anabolic - संश्लेषणात्मक) एवं अपचयी (Catabolic - विखंडनात्मक) रासायनिक क्रियाओं के कुल योग को उपापचय कहते हैं।
- एककोशिकीय सूक्ष्मजीवों से लेकर विशालकाय वृक्षों और स्तनधारियों तक सभी सजीवों में अनवरत हजारों उपापचयी क्रियाएं चलती रहती हैं।
- परखनली में अलग से कराई गई अभिक्रियाएं न तो स्वतंत्र जीव हैं और न ही निर्जीव; वे जैविक अभिक्रियाएं (Living reactions) हैं।
- निष्कर्ष: एक पूर्ण कोशिकीय तंत्र के भीतर होने वाला उपापचय जीवन का शत-प्रतिशत अपवादहीन परिभाषित गुण है।
कोशिका जीवन की आधारभूत संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई है। उप-कोशिकीय घटक कोशिका के बाहर स्वतंत्र जीवन प्रदर्शित नहीं कर सकते। अतः कोशिकीय संगठन जीवन का निश्चित परिभाषित गुण है।
अपने पर्यावरण के भौतिक, रासायनिक अथवा जैविक उद्दीपनों को महसूस करने और उनके प्रति उपयुक्त अनुक्रिया प्रदर्शित करने की क्षमता को चेतना कहते हैं।
- प्रकाशकाल (Photoperiod) मौसमी प्रजनकों में जनन चक्र को सीधे प्रभावित करता है।
- मानव एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसमें आत्म-चेतना (Self-consciousness) पाई जाती है। कोमा में पड़े व्यक्ति के मस्तिष्क की चेतना शिथिल हो जाती है, किंतु उसका कोशिकीय उपापचय निरंतर जारी रहता है।
- निष्कर्ष: चेतना सजीवों का सार्वभौमिक परिभाषित गुण है।