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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 20
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण (Chemical Coordination and Integration) पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद (WBCHSE) कक्षा 11 जीव विज्ञान पाठ्यक्रम की मानव शरीर-क्रिया विज्ञान इकाई का अत्यंत महत्वपूर्ण एवं अंतिम अध्याय है। जटिल बहुकोशिकीय मानव शरीर में आंतरिक वातावरण की स्थिरता या समस्थापन (Homeostasis) बनाए रखने, उपापचय, वृद्धि, विकास और जनन संबंधी दीर्घकालिक प्रक्रियाओं के नियमन हेतु अंतःस्रावी तंत्र, तंत्रिका तंत्र के साथ परस्पर सहयोग से कार्य करता है। तंत्रिका तंत्र जहां तीव्र एवं क्षणिक विद्युत आवेगों द्वारा बिंदु-दर-बिंदु नियंत्रण करता है, वहीं अंतःस्रावी ग्रंथियां वाहिनीविहीन होने के कारण अपने रासायनिक संदेशवाहक या हार्मोन सीधे रक्त परिसंचरण में मुक्त करती हैं, जो दूरस्थ लक्ष्य अंगों पर स्थायी प्रभाव डालते हैं। इस अध्याय में हाइपोथैलेमस-पीयूष अक्ष के सर्वोच्च न्यूरोएंडोक्राइन नियंत्रण, पीनियल, थायरॉइड, पैराथायरॉइड, थाइमस, अधिवृक्क, अग्न्याशय (लैंगरहेंस द्वीपिकाएं) एवं जनद ग्रंथियों के शरीर-रचनात्मक संगठन तथा स्रावों का विस्तृत अध्ययन किया गया है। साथ ही गैर-अंतःस्रावी अंगों जैसे हृदय (ANF), वृक्क (EPO) एवं जठरांत्र मार्ग के हार्मोन तथा द्वितीयक संदेशवाहक (cAMP/IP3) व अंतःकोशिकीय केंद्रकीय जीन अनुलेखन के माध्यम से हार्मोन की दोहरी आण्विक क्रिया-विधि का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

उच्च माध्यमिक बोर्ड परीक्षा और राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा (NEET) दोनों में ही रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण उच्चतम अंक-भार वाले अध्यायों में शामिल है। बोर्ड परीक्षाओं में अक्सर 5 अंक वाले दीर्घ-उत्तरीय प्रश्नों में विरोधी हार्मोन युग्मों (जैसे रक्त कैल्शियम नियमन में PTH बनाम कैल्सीटोनिन अथवा रक्त शर्करा नियंत्रण में इंसुलिन बनाम ग्लूकागन) और द्वितीयक संदेशवाहक कैस्केड के प्रवाह-आरेख पूछे जाते हैं। इसके अतिरिक्त मधुमेह (Diabetes Mellitus), उदकमेह (Diabetes Insipidus), ग्रेव्स रोग, एडिसन रोग, कुशिंग सिंड्रोम और टिटैनी जैसे नैदानिक विकार सैद्धांतिक शरीर-क्रिया विज्ञान को व्यावहारिक चिकित्सा विज्ञान से सीधे जोड़ते हैं।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 Module 1: अंतःस्रावी समन्वय के मूल...
2 Module 2: प्रधान न्यूरोएंडोक्राइन अ...
3 Module 3: उपापचयी एवं खनिज नियामक:...
4 Module 4: तनाव अनुकूलन, शर्करा संतु...
5 Module 5: जनद स्टेरॉयड एवं गैर-अंतः...
6 Module 6: हार्मोन की आण्विक क्रिया-...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

Module 1: अंतःस्रावी समन्वय के मूल सिद्धांत एवं हार्मोन का रासायनिक वर्गीकरण

जटिल बहुकोशिकीय जीवों में समस्त शारीरिक उपापचयी क्रियाओं के बीच सामंजस्य एवं आंतरिक संतुलन अर्थात समस्थापन (Homeostasis) बनाए रखने के लिए दो प्रमुख नियामक तंत्र कार्य करते हैं: तंत्रिका तंत्र (तीव्र, बिंदु-दर-बिंदु विद्युत आवेग, मिलीसेकंड प्रभाव) तथा अंतःस्रावी तंत्र (रासायनिक संदेशवाहकों द्वारा रक्त के माध्यम से व्यापक एवं दीर्घकालिक नियमन)।

हार्मोन की पारंपरिक बनाम आधुनिक वैज्ञानिक परिभाषा

पारंपरिक रूप से हार्मोन को वाहिनीविहीन ग्रंथि से स्रावित रक्त द्वारा परिवहित रासायनिक पदार्थ माना जाता था (स्टारलिंग, 1905)। आधुनिक अंतःस्रावी विज्ञान के अनुसार: "हार्मोन अ-पोषक रासायनिक संदेशवाहक हैं, जो शरीर में अति सूक्ष्म मात्रा (Trace amounts) में उत्पन्न होते हैं, अंतरकोशिकीय संदेशवाहक के रूप में कार्य करते हैं तथा रक्त द्वारा दूरस्थ विशिष्ट लक्ष्य कोशिकाओं में पहुंचकर विशिष्ट ग्राहियों से जुड़कर जैविक प्रभाव उत्पन्न करते हैं।"

हार्मोन का रासायनिक वर्गीकरण

रासायनिक प्रकृति और विलेयता के आधार पर हार्मोन को चार प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है:

  1. पेप्टाइड, पॉलीपेप्टाइड एवं प्रोटीन हार्मोन: जल में घुलनशील अमीनो अम्ल श्रृंखलाओं से निर्मित। उदाहरण: हाइपोथैलेमस के हार्मोन (GnRH, TRH, सोमाटोस्टैटिन), अग्र पीयूष के हार्मोन (GH, TSH, ACTH, PRL, LH, FSH), अग्न्याशयी हार्मोन (इंसुलिन, ग्लूकागन) तथा पैराथायरॉइड हार्मोन (PTH)।
  2. स्टेरॉयड हार्मोन: चिकनी अंतःप्रद्रव्यी जालिका में कोलेस्ट्रॉल से संश्लेषित वसा-घुलनशील हार्मोन। उदाहरण: अधिवृक्क वल्कुट के कॉर्टिकोस्टेरॉयड (कोर्टिसोल, एल्डोस्टेरोन, DHEA) तथा जनद हार्मोन (टेस्टोस्टेरोन, एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन)।
  3. आयोडोथायरोनिन: थायरॉइड पुटिकाओं में टायरोसिन अमीनो अम्ल के साथ सहसंयोजक रूप से बंधे आयोडीन युक्त अणु। उदाहरण: ट्राइआयोडोथायरोनिन (\(T_3\)) तथा टेट्राआयोडोथायरोनिन / थायरोक्सिन (\(T_4\))।
  4. अमीनो अम्ल व्युत्पन्न: एकल अमीनो अम्ल (मुख्यतः टायरोसिन व ट्रिप्टोफैन) से संशोधित अणु। उदाहरण: कैटेकोलामाइन (टायरोसिन से निर्मित एड्रीनेलिन एवं नॉर-एड्रीनेलिन) तथा मेलाटोनिन (पीनियल ग्रंथि में ट्रिप्टोफैन से निर्मित)।
तंत्रिका बनाम अंतःस्रावी समन्वय की तुलना:
तंत्रिका समन्वय: तंत्रिका तंतुओं एवं सिनैप्स द्वारा विद्युत-रासायनिक संवहन; अत्यधिक तीव्र गति (\(100\text{ m/s}\) तक); विशिष्ट लक्ष्य कोशिका तक सीमित; अति-क्षणिक प्रभाव (आवेग रुकते ही प्रभाव समाप्त)।
अंतःस्रावी समन्वय: रक्त परिसंचरण द्वारा रासायनिक अणुओं का संवहन; अपेक्षाकृत धीमी गति (सेकंड से मिनट); पूरे शरीर में फैले लक्ष्य ऊतकों पर व्यापक प्रभाव; दीर्घकालिक प्रभाव (घंटों, दिनों अथवा महीनों तक उपापचयी परिवर्तन बने रहते हैं)।

Module 2: प्रधान न्यूरोएंडोक्राइन अक्ष: हाइपोथैलेमस एवं पीयूष ग्रंथि

हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) अग्र मस्तिष्क के डाइएनसेफेलॉन के आधार पर स्थित प्रधान तंत्रिका-अंतःस्रावी नियामक केंद्र है। इसमें तंत्रिकास्रावी कोशिकाओं के विशिष्ट समूह पाए जाते हैं जिन्हें हाइपोथैलेमिक केंद्रक (Nuclei) कहते हैं (जैसे: सुप्राऑप्टिक, पैरावेन्ट्रिकुलर, आर्कुएट केंद्रक), जो नियामक न्यूरोहार्मोन का संश्लेषण करते हैं।

हाइपोथैलेमस के नियामक हार्मोन
  • मोचक हार्मोन (Releasing Hormones): अग्र पीयूष से विशिष्ट ट्रॉपिक हार्मोन के स्राव को प्रेरित करते हैं। जैसे: GnRH (गोनाडोट्रोपिन मोचक हार्मोन), TRH (थायरोट्रोपिन मोचक हार्मोन), CRH (कॉर्टिकोट्रोपिन मोचक हार्मोन), GHRH (वृद्धि हार्मोन मोचक हार्मोन), एवं PRH (प्रोलैक्टिन मोचक हार्मोन)।
  • निरोधी हार्मोन (Inhibiting Hormones): अग्र पीयूष के स्रावों का संदमन करते हैं। जैसे: सोमाटोस्टैटिन / GHIH (वृद्धि हार्मोन निरोधी हार्मोन) तथा डोपामाइन / PIH (प्रोलैक्टिन निरोधी हार्मोन)।
हाइपोफाइसियल निवाहिका तंत्र एवं तंत्रिका तंतु संबंध

हाइपोथैलेमस दो सर्वथा भिन्न शारीरिक मार्गों द्वारा पीयूष ग्रंथि पर नियंत्रण रखता है:

  • हाइपोफाइसियल निवाहिका तंत्र (Hypophyseal Portal System): हाइपोथैलेमस के मीडियन एमिनेंस से केशिकाएं मिलकर निवाहिका शिराएं बनाती हैं, जो पीयूष वृंत से होकर अग्र पीयूष (एडीनोहाइपोफाइसिस) के केशिका जाल में खुलती हैं। यह संवहनी मार्ग हाइपोथैलेमिक स्रावों को बिना सामान्य रक्त में घुले सीधे अग्र पीयूष तक पहुंचाता है।
  • प्रत्यक्ष तंत्रिका अक्ष (Axonal Tract): सुप्राऑप्टिक एवं पैरावेन्ट्रिकुलर केंद्रकों के तंत्रिकाक्ष (Axons) सीधे पश्च पीयूष (न्यूरोहाइपोफाइसिस) तक आते हैं। हार्मोन हाइपोथैलेमस में बनते हैं और तंत्रिकाक्ष द्वारा पहुंचकर पश्च पीयूष में केवल संग्रहीत होते हैं।
पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland) की संरचना एवं हार्मोन

स्फिनॉइड अस्थि की सेला टर्सिका (Sella Turcica) नामक गुहा में स्थित पीयूष ग्रंथि के दो प्रमुख भाग होते हैं:

पीयूष का भाग स्रावित हार्मोन प्रमुख शारीरिक कार्य
पार्स डिस्टैलिस (अग्र पीयूष) GH (वृद्धि हार्मोन / सोमाटोट्रोपिन) अस्थियों व उपास्थियों की वृद्धि, यकृत में IGF-1 का निर्माण व प्रोटीन उपचय को प्रेरित करता है।
पार्स डिस्टैलिस (अग्र पीयूष) TSH (थायरॉइड प्रेरक हार्मोन) थायरॉइड ग्रंथि की वृद्धि तथा \(T_3\) व \(T_4\) हार्मोन के संश्लेषण व स्राव को नियंत्रित करता है।
पार्स डिस्टैलिस (अग्र पीयूष) ACTH (एड्रीनोकोर्टिकोट्रोपिक) अधिवृक्क वल्कुट (ज़ोना फैसीकुलेटा) से ग्लूकोकोर्टिकोइड्स (कोर्टिसोल) के स्राव को प्रेरित करता है।
पार्स डिस्टैलिस (अग्र पीयूष) PRL (प्रोलैक्टिन / मैमोट्रोपिन) स्तन ग्रंथियों की वृद्धि एवं प्रसव पश्चात दुग्ध निर्माण को प्रेरित करता है।
पार्स डिस्टैलिस (अग्र पीयूष) LH (ल्यूटिनाइज़िंग हार्मोन) पुरुषों में लेडिग कोशिकाओं से टेस्टोस्टेरोन स्राव; स्त्रियों में अंडोत्सर्ग (Ovulation) व कॉर्पस ल्यूटियम का अनुरक्षण।
पार्स डिस्टैलिस (अग्र पीयूष) FSH (पुटिका प्रेरक हार्मोन) पुरुषों में शुक्राणुजनन (Spermatogenesis); स्त्रियों में डिंबग्रंथि पुटिकाओं की वृद्धि व परिपक्वन।
पार्स इंटरमीडिया (मध्य भाग) MSH (मेलेनोसाइट प्रेरक हार्मोन) त्वचा की मेलेनोसाइट कोशिकाओं में मेलेनिन रंजक का वितरण कर त्वचा का रंग नियंत्रित करता है।
पार्स नर्वोसा (पश्च पीयूष) ऑक्सीटोसिन (संग्रहीत व स्रावित) प्रसव पीड़ा के दौरान गर्भाशय की अनैच्छिक पेशियों का तीव्र संकुचन एवं स्तन ग्रंथियों से दुग्ध निष्कासन।
पार्स नर्वोसा (पश्च पीयूष) वैसोप्रेसिन / ADH (संग्रहीत व स्रावित) वृक्क की दूरस्थ संवलित नलिका व संग्रह नलिका में जल का ऐच्छिक पुनरावशोषण कराकर मूत्र को सांद्र करता है।
पीयूष ग्रंथि संबंधी विकार
  • महाकायता (Gigantism) एवं अग्रतिकायता (Acromegaly): बाल्यावस्था में GH के अतिस्राव से अस्थियों की अत्यधिक लंबाई बढ़ जाती है (महाकायता)। वयस्कों में अस्थि सिरों के जुड़ने के बाद GH के अतिस्राव से चेहरे, जबड़े (प्रोग्नाथिज्म), हाथ एवं पैरों की हड्डियों का असामान्य मोटा होना (अग्रतिकायता) होता है।
  • पीयूष वामनता (Pituitary Dwarfism): बाल्यावस्था में GH की कमी से शारीरिक वृद्धि रुक जाती है और व्यक्ति बौना रह जाता है (परंतु मानसिक विकास सामान्य रहता है)।
  • उदकमेह / बहुमूत्रता (Diabetes Insipidus): ADH की कमी अथवा वृक्क में इसकी अक्रियता से जल का पुनरावशोषण नहीं हो पाता, जिससे प्रतिदिन अत्यधिक मात्रा में (10-20 लीटर) तनु मूत्र उत्सर्जित होता है (पॉलीयूरिया) और तीव्र प्यास लगती है (पॉलीडिप्सिया), किंतु मूत्र में ग्लूकोज नहीं होता।

Module 3: उपापचयी एवं खनिज नियामक: थायरॉइड, पैराथायरॉइड एवं पीनियल ग्रंथि

1. थायरॉइड ग्रंथि (Thyroid Gland)

मानव शरीर की सबसे बड़ी अंतःस्रावी ग्रंथि। यह श्वासनली (Trachea) के दोनों ओर स्थित दो पालियों से बनी होती है, जो बीच में इस्थमस (Isthmus) नामक पतली संयोजी ऊतक पट्टी द्वारा जुड़ी होती हैं। आंतरिक रूप से यह गोलाकार थायरॉइड पुटिकाओं (Follicles) और अंतराली स्ट्रोमा में स्थित पैराफोलिक्युलर या सी-कोशिकाओं से निर्मित है।

  • पुटिकीय कोशिकाएं एवं आयोडोथायरोनिन: पुटिकाओं में टायरोसिन युक्त ग्लाइकोप्रोटीन थायरोग्लोबुलिन का स्राव होता है। रक्त का आयोडीन टायरोसिन से जुड़कर ट्राइआयोडोथायरोनिन (\(T_3\)) एवं थायरोक्सिन (\(T_4\)) बनाता है। \(T_3\) चार गुना अधिक सक्रिय होता है, परंतु रक्त में \(90\%\) स्राव \(T_4\) का होता है, जो ऊतकों में पहुंचकर \(T_3\) में परिवर्तित हो जाता है।
  • \(T_3\) एवं \(T_4\) के शारीरिक कार्य:
    1. आधारी उपापचय दर (BMR) एवं ऊष्मा उत्पादन: माइटोकॉन्ड्रिया में कोशिकीय श्वसन व ऑक्सीजन उपभोग बढ़ाता है तथा \(\text{Na}^+/\text{K}^+\) ATPase पंपों को सक्रिय कर शारीरिक तापमान बनाए रखता है।
    2. वृद्धि एवं विकास: कंकाल के विकास तथा केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के परिपक्वन व मायलिनेशन हेतु थायरोक्सिन अपरिहार्य है।
    3. उपापचय नियमन: ग्लूकोनियोजेनेसिस, ग्लाइकोजन अपघटन तथा प्रोटीन संश्लेषण को संतुलित करता है।
    4. इरिथ्रोपोइसिस: लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण को प्रेरित करता है।
  • थायरॉइड संबंधी विकार:
    • सामान्य घेंघा (Simple Goitre): भोजन में आयोडीन की कमी से थायरोक्सिन कम बनता है, जिससे TSH का स्राव अनियंत्रित होकर थायरॉइड ग्रंथि को अत्यधिक फुला देता है।
    • जड़मानवता (Cretinism): शिशुओं में जन्मजात हाइपोथायरायडिज्म के कारण गंभीर मानसिक मंदता, बौनापन, बहरा-गूंगापन और बाहर निकली हुई जीभ जैसे लक्षण होते हैं।
    • मिक्सिडीमा (Myxedema): वयस्कों में थायरोक्सिन की कमी से BMR में गिरावट, सुस्ती, वजन बढ़ना और त्वचा के नीचे श्लेष्मा जमा होने से चेहरे व आंखों के चारों ओर सूजन आ जाती है।
    • ग्रेव्स रोग (Graves' Disease / नेत्रोत्सेधी गलगंड): यह स्वप्रतिरक्षी अतिथायरायडिज्म है, जिसमें असामान्य एंटीबॉडी TSH ग्राही को निरंतर उत्तेजित करती हैं। इसके प्रमुख लक्षण उच्च BMR, वजन में भारी गिरावट और आंखों की पुतलियों का बाहर उभर आना (Exophthalmos) हैं।
  • पैराफोलिक्युलर कोशिकाएं (C-Cells) एवं कैल्सीटोनिन (TCT): पुटिकाओं के बीच स्थित कोशिकाएं थायरोकैल्सीटोनिन का स्राव करती हैं। यह एक अल्प-कैल्शियमरक्तता कारक (Hypocalcemic) हार्मोन है, जो रक्त में कैल्शियम बढ़ने पर स्रावित होता है और ऑस्टियोक्लास्ट को रोककर अस्थियों में कैल्शियम जमाव बढ़ाता है।
2. पैराथायरॉइड ग्रंथियां एवं कैल्शियम समस्थापन

थायरॉइड ग्रंथि की पश्च सतह पर चार छोटी बटन जैसी पैराथायरॉइड ग्रंथियां धंसी होती हैं। इनकी मुख्य (Chief) कोशिकाओं से पैराथॉर्मोन (PTH / Collip's Hormone) स्रावित होता है, जो प्रमुख अति-कैल्शियमरक्तता कारक (Hypercalcemic) हार्मोन है।

  • PTH की कार्यप्रणाली:
    1. अस्थि अवशोषण (Bone Resorption): ऑस्टियोक्लास्ट कोशिकाओं को उत्तेजित कर अस्थियों से कैल्शियम व फॉस्फेट को घोलकर रक्त में मुक्त कराता है।
    2. वृक्कीय पुनरावशोषण: वृक्क नलिकाओं में \(\text{Ca}^{2+}\) के पुनरावशोषण को बढ़ाता है तथा फॉस्फेट के उत्सर्जन को प्रेरित करता है।
    3. आंत में कैल्शियम अवशोषण: वृक्क में विटामिन D को सक्रिय रूप कैल्सीट्रिऑल (1,25-dihydroxy Vitamin D) में बदलता है, जो छोटी आंत से भोजन के कैल्शियम अवशोषण को कई गुना बढ़ा देता है।
  • विरोधी समस्थापन: रक्त में कैल्शियम का सामान्य स्तर \(9 - 11\text{ mg/dL}\) पर स्थिर रहता है। कैल्शियम घटने पर PTH बढ़ता है; कैल्शियम बढ़ने पर TCT स्रावित होता है।
  • विकार: PTH की कमी से टिटैनी (Tetany) रोग होता है, जिसमें रक्त कैल्शियम घटने से तंत्रिकाओं की संवेदनशीलता बढ़ जाती है और हाथ-पैरों में तीव्र ऐंठन (Carpopedal spasm) होती है। PTH के अतिस्राव से अस्थियां खोखली होकर ऑस्टियोपोरोसिस हो जाता है।
3. पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland)

अग्र मस्तिष्क के एपीथैलेमस की पृष्ठ सतह पर स्थित छोटी ग्रंथि है। यह ट्रिप्टोफैन से मेलाटोनिन (Melatonin) हार्मोन स्रावित करती है। अंधेरे में मेलाटोनिन का स्राव बढ़ता है और प्रकाश में घटता है। यह शरीर की 24-घंटे की दैनिक जैविक लय (Circadian Rhythm / निद्रा-जागरण चक्र), शारीरिक तापमान, त्वचा के रंग और मासिक धर्म चक्र का नियमन करती है।

Module 4: तनाव अनुकूलन, शर्करा संतुलन एवं प्रतिरक्षा: अधिवृक्क, अग्न्याशय एवं थाइमस

1. अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal / Suprarenal Gland)

प्रत्येक वृक्क के शीर्ष पर स्थित त्रिकोणीय ग्रंथि। इसके दो भ्रूणीय एवं कार्यात्मक भाग होते हैं: बाहरी मीसोडर्मल अधिवृक्क वल्कुट (Adrenal Cortex, 80-90%) तथा भीतरी एक्टोडर्मल अधिवृक्क मध्यांश (Adrenal Medulla, 10-20%)।

अधिवृक्क वल्कुट के तीन स्तर एवं कॉर्टिकोस्टेरॉयड
  1. ज़ोना ग्लोमेरुलोसा (बाहरी स्तर): मिनरलोकॉर्टिकोइड्स, मुख्य रूप से एल्डोस्टेरोन स्रावित करता है। यह वृक्क नलिकाओं में \(\text{Na}^+\) व जल का पुनरावशोषण बढ़ाकर तथा \(\text{K}^+\) का उत्सर्जन कराकर रक्तदाब व इलेक्ट्रोलाइट संतुलन नियंत्रित करता है (RAAS तंत्र)।
  2. ज़ोना फैसीकुलेटा (मध्यवर्ती चौड़ा स्तर): ग्लूकोकॉर्टिकोइड्स, मुख्य रूप से कोर्टिसोल स्रावित करता है। कोर्टिसोल दीर्घकालिक तनाव का सामना करने, ग्लूकोनियोजेनेसिस, वसा व प्रोटीन अपघटन को प्रेरित करने, प्रदाह-रोधी (Anti-inflammatory) प्रभाव दिखाने तथा प्रतिरक्षा दमन में सहायक है।
  3. ज़ोना रेटिकुलेरिस (भीतरी स्तर): अल्प मात्रा में लिंग स्टेरॉयड (DHEA) स्रावित करता है, जो यौवनारंभ में जननांग रोम व द्वितीयक लैंगिक लक्षणों के विकास में योगदान देते हैं।
अधिवृक्क मध्यांश एवं संकटकालीन हार्मोन (3F अनुक्रिया)

न्यूरल क्रेस्ट से उत्पन्न क्रोमैफिन कोशिकाओं से निर्मित। अनुकंपी तंत्रिका तंत्र की प्रेरणा से कैटेकोलामाइन स्रावित करता है: एड्रीनेलिन (80%) तथा नॉर-एड्रीनेलिन (20%)।

इन्हें "संकटकालीन हार्मोन या 3F हार्मोन (Fight, Flight, Fright)" कहते हैं। संकट के समय ये हृदय गति, रक्तदाब, श्वासन दर और पुतलियों का फैलाव बढ़ाते हैं तथा यकृत में ग्लाइकोजन को तोड़कर रक्त में प्रचुर ग्लूकोज उपलब्ध कराते हैं।

अधिवृक्क संबंधी विकार
  • एडिसन रोग (Addison's Disease): वल्कुट के अल्पस्राव से गंभीर हाइपोग्लाइसीमिया, निम्न रक्तदाब, निर्जलीकरण, अत्यधिक दुर्बलता तथा त्वचा पर तांबे जैसे भूरे धब्बे पड़ जाते हैं।
  • कुशिंग सिंड्रोम (Cushing's Syndrome): कोर्टिसोल के अतिस्राव से हाइपरग्लाइसीमिया, पेशी क्षय तथा चेहरे व पीठ पर वसा जमाव से चेहरा चंद्रमा जैसा गोल (Moon face) और पीठ पर Buffalo hump बन जाता है।
2. अंतःस्रावी अग्न्याशय (लैंगरहेंस की द्वीपिकाएं)

अग्न्याशय के कुल भार का केवल 1-2% भाग लैंगरहेंस की 10-20 लाख द्वीपिकाओं से बनता है। इनमें चार प्रकार की कोशिकाएं होती हैं:

  1. \(\alpha\)-कोशिकाएं (Alpha, 20-25%): ग्लूकागन स्रावित करती हैं। यह अतिशर्करा कारक (Hyperglycemic) हार्मोन है, जो यकृत में ग्लाइकोजिनोलिसिस एवं ग्लूकोनियोजेनेसिस को बढ़ाकर रक्त शर्करा स्तर में वृद्धि करता है।
  2. \(\beta\)-कोशिकाएं (Beta, 65-70%): इंसुलिन स्रावित करती हैं। यह मुख्य अल्पशर्करा कारक (Hypoglycemic) हार्मोन है। यह कंकाल पेशियों व वसा ऊतकों में GLUT-4 वाहकों द्वारा ग्लूकोज का अंतर्ग्रहण बढ़ाता है, यकृत में ग्लाइकोजेनेसिस कराता है तथा रक्त शर्करा को सामान्य (\(70-100\text{ mg/dL}\)) बनाए रखता है।
  3. \(\delta\)-कोशिकाएं (Delta, 5-10%): सोमाटोस्टैटिन स्रावित करती हैं, जो पैराक्राइन प्रभाव द्वारा इंसुलिन व ग्लूकागन दोनों के स्राव का नियमन करती हैं।
  4. PP-कोशिकाएं: अग्न्याशयी पॉलीपेप्टाइड स्रावित कर जठरांत्र गतिशीलता का नियमन करती हैं।

डायबिटीज मेलिटस (मधुमेह): इंसुलिन की कमी या प्रतिरोध से रक्त शर्करा वृक्क देहली (\(\sim 180\text{ mg/dL}\)) पार कर जाती है, जिससे मूत्र में ग्लूकोज का निष्कासन (ग्लाइकोसुरिया), अत्यधिक मूत्र विसर्जन (पॉलीयूरिया), अत्यधिक प्यास (पॉलीडिप्सिया) तथा वसा टूटने से हानिकारक कीटोन पिंड बनने से कीटोएसिडोसिस उत्पन्न हो जाता है।

3. थाइमस ग्रंथि एवं कोशिका-माध्यमित प्रतिरक्षा

वक्ष गुहा में हृदय के आगे व स्टर्नम के पीछे स्थित द्विपालिक लसीकाभ ग्रंथि। यह थाइमोसिन (Thymosins) पेप्टाइड हार्मोन स्रावित करती है। थाइमोसिन T-लिम्फोसाइटों के विभेदन व परिपक्वन को प्रेरित कर कोशिका-माध्यमित प्रतिरक्षा (Cell-Mediated Immunity) प्रदान करती है तथा एंटीबॉडी निर्माण को बढ़ावा देती है। वृद्धावस्था में थाइमस का अपह्रास (Involution) हो जाता है, जिससे वृद्धों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अत्यंत क्षीण हो जाती है।

Module 5: जनद स्टेरॉयड एवं गैर-अंतःस्रावी अंगों के हार्मोन स्राव

1. जनद ग्रंथियों के अंतःस्रावी कार्य
  • वृषण (Testis): उदर गुहा के बाहर वृषण कोष में स्थित। शुक्रजनक नलिकाओं के बीच स्थित लेडिग कोशिकाएं (Leydig cells) LH के प्रभाव में टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) स्रावित करती हैं। यह पुरुषों में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों (भारी आवाज, दाढ़ी-मूंछ, मजबूत पेशियां) के विकास, शुक्राणुजनन और प्रोटीन उपचय को प्रेरित करता है। सर्टोली कोशिकाएं इन्हिबिन का स्राव करती हैं।
  • अंडाशय (Ovary): मादा की श्रोणि गुहा में स्थित युग्मित ग्रंथि।
    • एस्ट्रोजन (Estrogen): डिंबग्रंथि की विकसित होती पुटिकाओं द्वारा स्रावित होता है। यह स्तनों के विकास, मादा वसा वितरण और मासिक धर्म चक्र के पुटिकीय चरण में एंडोमेट्रियम के पुनर्निर्माण को प्रेरित करता है।
    • प्रोजेस्टेरोन (Progesterone): अंडोत्सर्ग के बाद बनी कॉर्पस ल्यूटियम (पीत पिंड) द्वारा स्रावित होता है। इसे "गर्भावस्था का हार्मोन" कहते हैं, क्योंकि यह गर्भाशय एंडोमेट्रियम को भ्रूण रोपण हेतु तैयार करता है और गर्भावस्था में गर्भाशय संकुचन को रोकता है।
    • रिलैक्सिन: प्रसव के समय श्रोणि स्नायुओं को शिथिल कर प्रसव को सुगम बनाता है।
2. गैर-अंतःस्रावी अंगों के प्रमुख हार्मोन
अंग / ऊतक स्रावित हार्मोन प्रमुख शारीरिक कार्य
हृदय (अलिंद भित्ति) ANF (एट्रियल नैट्रियूरेटिक कारक) रक्तदाब बढ़ने पर अलिंद से स्रावित होता है। यह वाहिकाओं का विस्फारण कराता है, रेनिन व एल्डोस्टेरोन को रोकता है तथा वृक्क द्वारा सोडियम व जल का निष्कासन बढ़ाकर रक्तदाब घटाता है (RAAS का विरोधी)।
वृक्क (JG कोशिकाएं) इरिथ्रोपोइटिन (EPO) ऑक्सीजन की कमी (हाइपोक्सिया) होने पर अस्थि मज्जा में लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण (इरिथ्रोपोइसिस) को तेजी से बढ़ाता है।
वृक्क (JG उपकरण) रेनिन (Renin) रक्तदाब घटने पर एंजियोटेंसिनोजेन को एंजियोटेंसिन में बदलकर RAAS तंत्र द्वारा रक्तदाब बढ़ाता है।
आमाशय (G-कोशिकाएं) गैस्ट्रिन (Gastrin) जठर ग्रंथियों की पैराइटल कोशिकाओं से हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (\(\text{HCl}\)) तथा मुख्य कोशिकाओं से पेप्सिनोजेन स्राव को प्रेरित करता है।
ग्रहणी / ड्युओडिनम (S-कोशिकाएं) सीक्रेटिन (Secretin) सर्वप्रथम खोजा गया हार्मोन (1902)। अग्न्याशय व पित्त वाहिनी से क्षारीय बाइकार्बोनेट युक्त जल स्रावित कराकर आमाशय के अम्लीय काइम को उदासीन करता है।
ड्युओडिनम (I-कोशिकाएं) कोलसिस्टोकाइनिन (CCK) पित्ताशय का संकुचन कराकर पित्त रस छोटी आंत में छोड़ता है तथा अग्न्याशय से पाचक एंजाइमों का स्राव कराता है।
ड्युओडिनम (K-कोशिकाएं) GIP (गैस्ट्रिक इनहिबिटरी पेप्टाइड) जठरीय गतिशीलता व अम्ल स्राव को रोकता है तथा भोजन पश्चात अग्न्याशय से इंसुलिन स्राव को प्रेरित करता है।

Module 6: हार्मोन की आण्विक क्रिया-विधि एवं संकेतन कैस्केड

हार्मोन रक्त द्वारा पूरे शरीर में संचरित होने के बावजूद केवल अपनी लक्ष्य कोशिकाओं (Target cells) पर ही प्रभाव डालते हैं, क्योंकि केवल लक्ष्य कोशिकाओं में ही उनके लिए विशिष्ट पूरक प्रोटीन अणु अर्थात हार्मोन ग्राही (Hormone Receptors) उपस्थित होते हैं। विलेयता के आधार पर हार्मोन क्रिया दो सर्वथा भिन्न आण्विक मार्गों द्वारा संपन्न होती है:

विधि 1: जल-घुलनशील हार्मोन (झिल्ली-बद्ध ग्राही एवं द्वितीयक संदेशवाहक)

पेप्टाइड, प्रोटीन एवं कैटेकोलामाइन हार्मोन जल में घुलनशील होने के कारण कोशिका झिल्ली की लिपिड द्विपरत को पार नहीं कर सकते। इनकी कार्यप्रणाली:

  1. प्रथम संदेशवाहक के रूप में बंधन: हार्मोन अणु कोशिका झिल्ली की बाह्य सतह पर स्थित G-प्रोटीन युग्मित ग्राही (GPCR) से जुड़ता है।
  2. G-प्रोटीन सक्रियण: ग्राही के संरचनात्मक परिवर्तन से G-प्रोटीन का \(\text{G}_{\alpha\text{s}}\) उप-भाग GDP छोड़कर GTP ग्रहण कर सक्रिय हो जाता है।
  3. एडिनाइलेट साइक्लेज का उद्दीपन: सक्रिय G-प्रोटीन झिल्ली-बद्ध एंजाइम एडिनाइलेट साइक्लेज को सक्रिय करता है।
  4. द्वितीयक संदेशवाहक का निर्माण: एडिनाइलेट साइक्लेज कोशिका के ATP को चक्रीय एएमपी (cAMP) में परिवर्तित करता है, जो द्वितीयक संदेशवाहक (Second Messenger) है: \[ \text{ATP} \xrightarrow{\text{एडिनाइलेट साइक्लेज}} \text{cAMP} + \text{PP}_i \]
  5. काइनेज कैस्केड एवं प्रवर्धन: cAMP प्रोटीन काइनेज A (PKA) को सक्रिय करता है। PKA विशिष्ट उपापचयी एंजाइमों का फॉस्फोरिलीकरण कर उन्हें सक्रिय करता है। एक अकेला हार्मोन अणु लाखों एंजाइमों को तुरंत सक्रिय कर सकता है, जिससे सेकंडों से मिनटों में तीव्र शारीरिक अनुक्रिया उत्पन्न होती है।
वैकल्पिक द्वितीयक संदेशवाहक मार्ग (PLC / \(\text{IP}_3\) / DAG / \(\text{Ca}^{2+}\)):
ऑक्सीटोसिन एवं TRH जैसे हार्मोन \(\text{G}_q\) प्रोटीन द्वारा फॉस्फोलाइपेस C (PLC) को सक्रिय करते हैं। PLC कोशिका झिल्ली के \(\text{PIP}_2\) को तोड़कर \(\text{IP}_3\) तथा DAG बनाता है। \(\text{IP}_3\) अंतःप्रद्रव्यी जालिका से \(\text{Ca}^{2+}\) मुक्त कराकर कैल्मोड्युलिन को सक्रिय करता है और DAG प्रोटीन काइनेज C (PKC) को सक्रिय करता है।
विधि 2: वसा-घुलनशील हार्मोन (अंतःकोशिकीय ग्राही एवं जीनोमिक क्रिया)

स्टेरॉयड हार्मोन (कोर्टिसोल, टेस्टोस्टेरोन, एस्ट्रोजन) एवं थायरॉइड हार्मोन (\(T_3, T_4\)) वसा में घुलनशील होने के कारण कोशिका झिल्ली के लिपिड स्तर से सीधे विसरित होकर कोशिका में प्रवेश कर जाते हैं।

  1. अंतःकोशिकीय ग्राही से बंधन: कोशिकाद्रव्य या केंद्रक में स्थित विशिष्ट ग्राही से जुड़कर हार्मोन-ग्राही संकुल (H-R Complex) बनाते हैं।
  2. केंद्रक में स्थानांतरण व DNA बंधन: सक्रिय H-R संकुल केंद्रक में पहुंचकर गुणसूत्र के विशिष्ट विनियामक खंड हार्मोन अनुक्रिया तत्व (HRE) से जुड़ता है।
  3. जीन अनुलेखन का नियमन: यह RNA पॉलीमरेज को प्रभावित कर विशिष्ट जीन का अनुलेखन अर्थात mRNA संश्लेषण कराता है।
  4. प्रोटीन अनुवादन एवं प्रभाव: mRNA राइबोसोम पर जाकर नए संरचनात्मक प्रोटीन या एंजाइम बनाता है, जो दीर्घकालिक शारीरिक परिवर्तन लाते हैं। इस प्रक्रिया के शुरू होने में कुछ घंटे लगते हैं, किंतु इसका प्रभाव दिनों तक स्थायी रहता है।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

रक्त कैल्शियम समस्थापन अक्ष
[Ca^{2+}]_{रक्त} ≈ 9 - 11 mg/dL ⇔ PTH (कैल्शियम वृद्धि) TCT (कैल्शियम कमी)
पैराथॉर्मोन (PTH) अस्थि अवशोषण व वृक्क में पुनरावशोषण द्वारा कैल्शियम बढ़ाता है; थायरोकैल्सीटोनिन (TCT) अस्थि में निक्षेपण कराकर कैल्शियम घटाता है।
रक्त शर्करा समस्थापन अक्ष
[ग्लूकोज]_{उपवास} ≈ 70 - 100 mg/dL ⇔ इंसुलिन (शर्करा घटाना) ग्लूकागन (शर्करा बढ़ाना)
इंसुलिन GLUT-4 वाहकों द्वारा कोशिकाओं में ग्लूकोज अंतर्ग्रहण व ग्लाइकोजेनेसिस कराता है; ग्लूकागन ग्लाइकोजिनोलिसिस व ग्लूकोनियोजेनेसिस कराता है।
द्वितीयक संदेशवाहक cAMP प्रवर्धन समीकरण
1 हार्मोन अणु 1 GPCR 100 G_ 1,000 cAMP 100,000 सक्रिय एंजाइम
कैस्केड प्रवर्धन के कारण रक्त में हार्मोन की पिकोमोलर अतिसूक्ष्म सांद्रता भी कुछ सेकंडों में विशाल कोशिकीय प्रभाव उत्पन्न कर सकती है।
हाइपोथैलेमस-पीयूष निवाहिका समीकरण
हाइपोथैलेमिक केंद्रक →{मोचक/निरोधी हार्मोन} निवाहिका शिराएं अग्र पीयूष स्राव
निवाहिका शिराओं के माध्यम से हार्मोन सीधे अग्र पीयूष तक पहुंचते हैं, जिससे सामान्य रक्त में तनु हुए बिना उच्च सांद्रता में कार्य करते हैं।
रक्तदाब नियमन में RAAS बनाम ANF अक्ष
निम्न रक्तदाब → रेनिन → एंजियोटेंसिन II → एल्डोस्टेरोन (उच्च रक्तदाब) ⇔ अलिंद फैलाव → ANF (निम्न रक्तदाब)
एल्डोस्टेरोन Na+ व जल संरक्षण कर रक्तदाब बढ़ाता है; हृदय का ANF सोडियम व जल उत्सर्जन कराकर रक्तदाब घटाता है।
जीनोमिक अनुलेखन दर समीकरण
स्टेरॉयड हार्मोन + अंतःकोशिकीय ग्राही [H-R संकुल] →{HRE बंधन} \ mRNA संश्लेषण
स्टेरॉयड एवं थायरॉइड हार्मोन जीन अनुलेखन को नियंत्रित करते हैं; इसका प्रभाव धीरे-धीरे शुरू होता है किंतु लंबे समय तक स्थायी रहता है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
रक्त शर्करा सांद्रता के नियमन में इंसुलिन और ग्लूकागन की विरोधी भूमिका स्पष्ट कीजिए। इंसुलिन की कमी से कौन से नैदानिक लक्षण उत्पन्न होते हैं? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भाग 1: इंसुलिन और ग्लूकागन का विरोधी नियमन [3 अंक]
  • इंसुलिन की भूमिका (हाइपोग्लाइसीमिक हार्मोन): अग्न्याशय की लैंगरहेंस द्वीपिकाओं की \(\beta\)-कोशिकाओं द्वारा स्रावित होता है। भोजनोपरांत रक्त ग्लूकोज बढ़ने पर सक्रिय होता है:
    • कंकाल पेशियों एवं वसा ऊतकों में GLUT-4 ग्लूकोज वाहकों को झिल्ली पर भेजकर कोशिकाओं में ग्लूकोज अंतर्ग्रहण बढ़ाता है।
    • यकृत एवं पेशियों में ग्लाइकोजेनेसिस (ग्लूकोज से ग्लाइकोजन निर्माण) को प्रेरित करता है।
    • वसा ऊतकों में लिपोजेनेसिस कराता है तथा ग्लाइकोजिनोलिसिस व ग्लूकोनियोजेनेसिस को रोककर रक्त शर्करा को \(70-100\text{ mg/dL}\) पर सामान्य करता है।
  • ग्लूकागन की भूमिका (हाइपरग्लाइसीमिक हार्मोन): लैंगरहेंस द्वीपिकाओं की \(\alpha\)-कोशिकाओं द्वारा स्रावित होता है। उपवास या भूख की स्थिति में रक्त ग्लूकोज घटने पर सक्रिय होता है:
    • मुख्यतः यकृत कोशिकाओं पर कार्य कर ग्लाइकोजिनोलिसिस (ग्लाइकोजन तोड़कर ग्लूकोज बनाना) बढ़ाता है।
    • अ-कार्बोहाइड्रेट स्रोतों से ग्लूकोज निर्माण अर्थात ग्लूकोनियोजेनेसिस को उत्तेजित करता है।
    • कोशिकीय ग्लूकोज उपभोग को रोककर यकृत से रक्त में प्रचुर ग्लूकोज छोड़ता है।
भाग 2: इंसुलिन की कमी के लक्षण (डायबिटीज मेलिटस) [2 अंक]
  1. हाइपरग्लाइसीमिया एवं ग्लाइकोसुरिया: रक्त शर्करा वृक्क देहली (\(\sim 180\text{ mg/dL}\)) पार कर जाने से मूत्र के साथ ग्लूकोज उत्सर्जित होने लगता है।
  2. पॉलीयूरिया एवं पॉलीडिप्सिया: मूत्र की सांद्रता बढ़ने से बार-बार पेशाब आता है (पॉलीयूरिया) और अत्यधिक प्यास लगती है (पॉलीडिप्सिया)।
  3. डायबिटिक कीटोएसिडोसिस: कोशिकाएं ग्लूकोज के अभाव में वसा का अत्यधिक अपघटन करती हैं, जिससे रक्त में विषैले कीटोन पिंड (एसिटोएसिटेट) एकत्रित होकर रक्त को अम्लीय बना देते हैं।
उदाहरण 2
जल-घुलनशील पेप्टाइड हार्मोन तथा वसा-घुलनशील स्टेरॉयड हार्मोन की आण्विक क्रिया-विधि की तुलना कीजिए। द्वितीयक संदेशवाहक मार्ग का स्वच्छ प्रवाह-आरेख बनाइए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भाग 1: हार्मोन क्रिया-विधि की तुलना [3 अंक]
लक्षण जल-घुलनशील हार्मोन (पेप्टाइड/प्रोटीन) वसा-घुलनशील हार्मोन (स्टेरॉयड/थायरोक्सिन)
ग्राही की स्थिति कोशिका झिल्ली की बाहरी सतह पर (GPCR)। अंतःकोशिकीय (कोशिकाद्रव्य अथवा केंद्रक में)।
झिल्ली पारगम्यता अपरगामी; लिपिड परत को पार नहीं कर सकते। सरलता से विसरित होकर पार कर जाते हैं।
द्वितीयक संदेशवाहक आवश्यक हैं (cAMP, \(\text{IP}_3\), \(\text{Ca}^{2+}\))। आवश्यक नहीं हैं; सीधे DNA पर कार्य करते हैं।
प्रधान प्रभाव विद्यमान एंजाइमों का फॉस्फोरिलीकरण व सक्रियण। HRE से जुड़कर mRNA अनुलेखन व नए प्रोटीन निर्माण।
गति व स्थायित्व अत्यंत तीव्र (सेकंड/मिनट), अल्पकालिक प्रभाव। धीमी शुरुआत (घंटे/दिन), दीर्घकालिक स्थायी प्रभाव।
भाग 2: द्वितीयक संदेशवाहक मार्ग का प्रवाह-आरेख [2 अंक]
[हार्मोन (प्रथम संदेशवाहक: जैसे एड्रीनेलिन)]
    ↓ (कोशिका झिल्ली ग्राही से बंधन)
[G-प्रोटीन युग्मित ग्राही (GPCR)]
    ↓ (GDP हटकर GTP का जुड़ना)
[सक्रिय \(\text{G}_{\alpha\text{s}}\) उप-भाग]
    ↓ (एंजाइम उद्दीपन)
[एडिनाइलेट साइक्लेज]
    ↓ (\(\text{ATP} \to \text{cAMP}\))
[cAMP (द्वितीयक संदेशवाहक)]
    ↓ (एलोस्टेरिक सक्रियण)
[प्रोटीन काइनेज A (PKA)]
    ↓ (फॉस्फोरिलीकरण कैस्केड: 1,00,000 गुना प्रवर्धन)
[कोशिकीय एंजाइम सक्रियण (जैसे ग्लाइकोजन फॉस्फोराइलेज)]
    ↓
[तीव्र शारीरिक अनुक्रिया (यकृत में ग्लाइकोजन टूटना)]
उदाहरण 3
रक्त कैल्शियम स्तर के नियमन में पैराथॉर्मोन (PTH) तथा थायरोकैल्सीटोनिन (TCT) की भूमिका का वर्णन कीजिए। पैराथायरॉइड टिटैनी क्या है? [3.5 + 1.5 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भाग 1: PTH एवं TCT की भूमिका [3.5 अंक]

रक्त में कैल्शियम का स्तर सामान्यतः \(9 - 11\text{ mg/dL}\) पर स्थिर रखा जाता है। यह दो परस्पर विरोधी हार्मोन द्वारा नियंत्रित होता है:

  1. पैराथॉर्मोन (PTH / Collip's Hormone) — अति-कैल्शियमरक्तता कारक (Hypercalcemic):
    • अस्थि अवशोषण: ऑस्टियोक्लास्ट कोशिकाओं को उत्तेजित कर अस्थियों से कैल्शियम व फॉस्फेट को घोलकर रक्त में मुक्त कराता है।
    • वृक्कीय पुनरावशोषण: वृक्क की दूरस्थ नलिकाओं में \(\text{Ca}^{2+}\) पुनरावशोषण बढ़ाता है तथा फॉस्फेट उत्सर्जन को प्रेरित करता है।
    • आंत्र अवशोषण: वृक्क में विटामिन D को सक्रिय कैल्सीट्रिऑल में परिवर्तित करता है, जो आंत से भोजन के कैल्शियम अवशोषण को कई गुना बढ़ा देता है।
  2. थायरोकैल्सीटोनिन (TCT / कैल्सीटोनिन) — अल्प-कैल्शियमरक्तता कारक (Hypocalcemic):
    • थायरॉइड ग्रंथि की सी-कोशिकाओं से रक्त में कैल्शियम बढ़ने पर स्रावित होता है।
    • अस्थि अवशोषण को रोकता है तथा ऑस्टियोब्लास्ट द्वारा अस्थियों में कैल्शियम का निक्षेपण कराता है।
    • वृक्क में कैल्शियम पुनरावशोषण घटाकर अतिरिक्त कैल्शियम को मूत्र द्वारा उत्सर्जित कराता है।
भाग 2: पैराथायरॉइड टिटैनी [1.5 अंक]

पैराथायरॉइड टिटैनी (Parathyroid Tetany) पैराथायरॉइड ग्रंथि के अल्पस्राव या निष्कासन से उत्पन्न गंभीर अल्पकैल्शियमता (Hypocalcemia: रक्त \(\text{Ca}^{2+} < 7\text{ mg/dL}\)) जनित विकार है।

क्रिया-विधि: बाह्यकोशिकीय कैल्शियम आयन सामान्यतः तंत्रिका झिल्ली के सोडियम चैनलों को स्थिर रखते हैं। कैल्शियम घटने पर सोडियम चैनल अनायास ही खुलने लगते हैं, जिससे प्रेरक तंत्रिकाओं की देहली क्षमता घट जाती है। इससे अनियंत्रित स्वतःस्फूर्त क्रियात्मक विभव उत्पन्न होते हैं, जिससे हाथ-पैरों की पेशियों में निरंतर दर्दनाक ऐंठन (Carpopedal spasm) और स्वरयंत्र की पेशियों में ऐंठन से श्वासावरोध का खतरा उत्पन्न हो जाता है।

उदाहरण 4
अधिवृक्क ग्रंथि की शारीरिक संरचना एवं स्तरों का वर्णन कीजिए। अधिवृक्क वल्कुट तथा अधिवृक्क मध्यांश के हार्मोन के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए। [2.5 + 2.5 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भाग 1: अधिवृक्क ग्रंथि की संरचना एवं स्तर [2.5 अंक]

वृक्कों के शीर्ष पर स्थित युग्मित अधिवृक्क ग्रंथि के दो भाग होते हैं:

  1. अधिवृक्क वल्कुट (मीसोडर्मल उद्भव, 80-90%): तीन सुस्पष्ट स्तरों में विभाजित है:
    • ज़ोना ग्लोमेरुलोसा (बाहरी 15%): एल्डोस्टेरोन स्रावित करता है, जो वृक्क में \(\text{Na}^+\) व जल का पुनरावशोषण कराकर रक्तदाब नियंत्रित करता है।
    • ज़ोना फैसीकुलेटा (मध्य 75%): कोर्टिसोल स्रावित करता है, जो ग्लूकोनियोजेनेसिस, प्रदाह-रोधी क्रिया एवं तनाव अनुकूलन कराता है।
    • ज़ोना रेटिकुलेरिस (भीतरी 10%): एंड्रोजेनिक लिंग स्टेरॉयड स्रावित करता है।
  2. अधिवृक्क मध्यांश (एक्टोडर्मल उद्भव, 10-20%): अनुकंपी तंत्रिका तंतुओं से जुड़ी क्रोमैफिन कोशिकाओं से निर्मित। आपातकालीन कैटेकोलामाइन एड्रीनेलिन (80%) एवं नॉर-एड्रीनेलिन (20%) स्रावित करता है।
भाग 2: वल्कुट एवं मध्यांश के हार्मोन की तुलना [2.5 अंक]
तुलना बिंदु अधिवृक्क वल्कुट (Cortex) अधिवृक्क मध्यांश (Medulla)
भ्रूणीय उद्भव मीसोडर्म (Mesoderm)। एक्टोडर्म (Neural crest)।
रासायनिक प्रकृति स्टेरॉयड (कोलेस्ट्रॉल व्युत्पन्न: वसा-घुलनशील)। कैटेकोलामाइन (अमीनो अम्ल व्युत्पन्न: जल-घुलनशील)।
नियंत्रण तंत्र पीयूष का ACTH एवं RAAS तंत्र। अनुकंपी तंत्रिका तंत्र की सीधी तंत्रिका प्रेरणा।
शारीरिक कार्य दीर्घकालिक उपापचय, खनिज संतुलन व तनाव अनुकूलन। तीव्र आपातकालीन 3F संकटकालीन अनुक्रिया (भय, संघर्ष, पलायन)।
प्रमुख विकार एडिसन रोग (अल्पस्राव) व कुशिंग सिंड्रोम (अतिस्राव)। फियोक्रोमोसाइटोमा (ट्यूमर से स्थायी उच्च रक्तदाब)।
उदाहरण 5
हाइपोथैलेमस की अंतःस्रावी भूमिका का वर्णन कीजिए। यह पीयूष ग्रंथि की अग्र एवं पश्च पालियों का नियमन किस प्रकार करता है? [2.5 + 2.5 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भाग 1: हाइपोथैलेमस की अंतःस्रावी भूमिका [2.5 अंक]

हाइपोथैलेमस प्रधान तंत्रिका-अंतःस्रावी केंद्रक है। इसके तंत्रिकास्रावी केंद्रकों से दो प्रमुख प्रकार के न्यूरोहार्मोन स्रावित होते हैं:

  1. मोचक हार्मोन: अग्र पीयूष के ट्रॉपिक हार्मोन स्राव को प्रेरित करते हैं। जैसे: GnRH (LH व FSH वृद्धि), TRH (TSH वृद्धि), CRH (ACTH वृद्धि), GHRH (GH वृद्धि) तथा PRH (प्रोलैक्टिन वृद्धि)।
  2. निरोधी हार्मोन: पीयूष स्राव को रोकते हैं। जैसे: सोमाटोस्टैटिन (GH व TSH निरोधी) तथा डोपामाइन या PIH (प्रोलैक्टिन निरोधी)।
भाग 2: अग्र बनाम पश्च पीयूष का नियंत्रण [2.5 अंक]
बिंदु अग्र पीयूष (एडीनोहाइपोफाइसिस) पश्च पीयूष (न्यूरोहाइपोफाइसिस)
संवहनी / तंत्रिकीय मार्ग हाइपोफाइसियल निवाहिका शिरा तंत्र (रक्त वाहिकाएं)। सीधे तंत्रिकाक्ष तंतु (Axonal tract)।
हार्मोन निर्माण स्थल अग्र पीयूष की कोशिकाओं में ही नए हार्मोन बनते हैं। हाइपोथैलेमस में बनते हैं; पश्च पीयूष में केवल संग्रहीत होते हैं।
नियंत्रण विधि मोचक एवं निरोधी हार्मोन के रासायनिक बंधन द्वारा। तंत्रिका आवेगों द्वारा एक्सोसाइटोसिस द्वारा स्राव।
मुक्त होने वाले हार्मोन GH, TSH, ACTH, PRL, LH, FSH, MSH। ऑक्सीटोसिन एवं वैसोप्रेसिन (ADH)।
उदाहरण 6
अंतःस्रावी ग्रंथियों के अतिरिक्त मानव शरीर के अन्य अंगों (हृदय, वृक्क, जठरांत्र मार्ग) से स्रावित होने वाले हार्मोन के नाम एवं उनके कार्य लिखिए। [1.5 + 1.5 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
1. हृदय का हार्मोन [1.5 अंक]
  • एट्रियल नैट्रियूरेटिक कारक (ANF / ANP):
    • स्राव स्थल: रक्तदाब एवं रक्त आयतन बढ़ने पर हृदय की अलिंद भित्ति से स्रावित होता है।
    • कार्य: वाहिकाओं का फैलाव कराता है, रेनिन व एल्डोस्टेरोन को रोकता है तथा वृक्क में सोडियम व जल का उत्सर्जन कराकर रक्तदाब घटाता है।
2. वृक्क के हार्मोन [1.5 अंक]
  • इरिथ्रोपोइटिन (EPO): रक्त में ऑक्सीजन की कमी (हाइपोक्सिया) होने पर JG कोशिकाओं से स्रावित होकर लाल अस्थि मज्जा में RBC निर्माण (इरिथ्रोपोइसिस) को तेजी से बढ़ाता है।
  • रेनिन (Renin): एंजाइमी हार्मोन, जो रक्तदाब घटने पर एंजियोटेंसिनोजेन को सक्रिय कर RAAS तंत्र द्वारा रक्तदाब सामान्य करता है।
3. जठरांत्र मार्ग के हार्मोन [2 अंक]
  1. गैस्ट्रिन (Gastrin): आमाशय की G-कोशिकाओं से स्रावित होकर पैराइटल कोशिकाओं से हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (\(\text{HCl}\)) एवं मुख्य कोशिकाओं से पेप्सिनोजेन स्राव कराता है।
  2. सीक्रेटिन (Secretin): ड्युओडिनम से स्रावित होकर अग्न्याशय से क्षारीय जल व बाइकार्बोनेट (\(\text{HCO}_3^-\)) स्रावित कराकर काइम की अम्लता को शांत करता है।
  3. कोलसिस्टोकाइनिन (CCK): ड्युओडिनम से स्रावित होकर पित्ताशय का संकुचन कराता है (पित्त रस छोड़ता है) तथा अग्न्याशय से पाचक एंजाइम स्रावित कराता है।
  4. GIP (गैस्ट्रिक इनहिबिटरी पेप्टाइड): जठरीय स्राव व गतिशीलता को रोकता है तथा भोजन पश्चात अग्न्याशय से इंसुलिन स्राव को प्रेरित करता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि पश्च पीयूष (न्यूरोहाइपोफाइसिस) ऑक्सीटोसिन और वैसोप्रेसिन (ADH) का निर्माण करती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पश्च पीयूष ग्रंथि किसी भी हार्मोन का निर्माण नहीं करती। ऑक्सीटोसिन और वैसोप्रेसिन वास्तव में हाइपोथैलेमस के सुप्राऑप्टिक एवं पैरावेन्ट्रिकुलर केंद्रकों में संश्लेषित होते हैं और तंत्रिकाक्ष द्वारा आकर पश्च पीयूष में केवल संग्रहीत एवं मुक्त होते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

डायबिटीज इंसिपिडस और डायबिटीज मेलिटस को एक समझना और सोचना कि दोनों में मूत्र में शर्करा होती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

डायबिटीज इंसिपिडस (उदकमेह) केवल ADH की कमी से होता है; इसमें प्रतिदिन 10-20 लीटर तनु मूत्र निकलता है लेकिन इसमें कोई ग्लूकोज नहीं होता। डायबिटीज मेलिटस (मधुमेह) इंसुलिन की कमी से होता है; इसमें रक्त शर्करा बढ़ती है और मूत्र में ग्लूकोज उत्सर्जित होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि सभी हार्मोन कोशिका के भीतर प्रवेश करके सीधे DNA पर कार्य करते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

केवल वसा-घुलनशील स्टेरॉयड हार्मोन और थायरोक्सिन ही कोशिका झिल्ली को पार कर अंतःकोशिकीय केंद्रकीय ग्राही से जुड़ते हैं। जल-घुलनशील पेप्टाइड व प्रोटीन हार्मोन झिल्ली को पार नहीं कर सकते; वे कोशिका सतह ग्राही से जुड़कर द्वितीयक संदेशवाहक (cAMP, IP3) बनाकर कार्य करते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

पैराथॉर्मोन (PTH) और थायरोकैल्सीटोनिन (TCT) के विरोधी कैल्शियम कार्यों में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पैराथॉर्मोन (PTH) अति-कैल्शियमरक्तता कारक है (अस्थियों को घोलकर रक्त कैल्शियम बढ़ाता है)। थायरोकैल्सीटोनिन (TCT) अल्प-कैल्शियमरक्तता कारक है (अस्थियों में कैल्शियम जमाकर रक्त कैल्शियम घटाता है)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

हार्मोन को पोषक तत्व समझना जो कोशिकाओं को सीधे ऊर्जा प्रदान करते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

हार्मोन पूर्णतः अ-पोषक रासायनिक संदेशवाहक हैं जो अति सूक्ष्म मात्रा में उत्पन्न होते हैं। वे कोई कैलोरी या ऊर्जा नहीं देते; वे केवल नियामक संकेत के रूप में जैव रासायनिक अभिक्रियाओं की दर, एंजाइमों की सक्रियता या जीन अनुलेखन का नियमन करते हैं।

मानव अंतःस्रावी तंत्र, समस्थापन चक्र एवं हार्मोन क्रिया की आण्विक विधि

मानव अंतःस्रावी तंत्र एवं हार्मोन की दोहरी आण्विक क्रिया-विधि WBCHSE कक्षा 11 जीव विज्ञान • इकाई 5: मानव शरीर-क्रिया विज्ञान • तंत्रिका-अंतःस्रावी नियंत्रण 1. न्यूरोएंडोक्राइन अक्ष एवं प्रमुख ग्रंथियां हाइपोथैलेमस (सर्वोच्च नियामक ग्रंथि) • मोचक हार्मोन: GnRH, TRH, CRH, GHRH, PRH • निरोधी हार्मोन: सोमाटोस्टैटिन (GHIH), डोपामाइन • तंत्रिकास्रावी केंद्रक: सुप्राऑप्टिक एवं पैरावेन्ट्रिकुलर पोर्टल शिरा एक्सॉन पथ एडीनोहाइपोफाइसिस पार्स डिस्टैलिस: • GH (वृद्धि हार्मोन / सोमाटोट्रोपिन) • TSH (थायरॉइड प्रेरक हार्मोन) • ACTH (एड्रीनोकोर्टिकोट्रोपिक) • PRL (प्रोलैक्टिन / दुग्धस्रावी) • LH एवं FSH (गोनाडोट्रोपिन्स) पार्स इंटरमीडिया: MSH न्यूरोहाइपोफाइसिस पार्स नर्वोसा (भंडारण एवं स्राव): • ऑक्सीटोसिन (पिटोसिन): प्रसव संकुचन एवं दुग्ध निष्कासन • वैसोप्रेसिन (ADH): दूरस्थ नलिका में जल का पुनरावशोषण कमी से रोग: डायबिटीज इंसिपिडस (उदकमेह / बहुमूत्रता) परिधीय अंतःस्रावी ग्रंथियों का विवरण पीनियल ग्रंथि: मेलाटोनिन (24-घंटे की दैनिक जैविक लय / निद्रा चक्र) थायरॉइड ग्रंथि: T3, T4 (BMR नियंत्रण) + TCT (कैल्सीटोनिन) पैराथायरॉइड (4): PTH (हाइपरकैल्सीमिक, अस्थि विघटनकारी) थाइमस ग्रंथि: थाइमोसिन (T-लिम्फोसाइट कोशिका प्रतिरक्षा) अग्न्याशय (द्वीपिकाएं): α: ग्लूकागन, β: इंसुलिन (रक्त शर्करा समस्थापन) अधिवृक्क ग्रंथि: वल्कुट: एल्डोस्टेरोन/कोर्टिसोल | मध्यांश: एड्रीनेलिन जनद एवं अन्य अंग: टेस्टोस्टेरोन, एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन, ANF, EPO 2. समस्थापन फीडबैक एवं विरोधी क्रियाएं कैल्शियम संतुलन नियमन सामान्य: 9 - 11 mg/dL PTH (पैराथायरॉइड हार्मोन) ↑ रक्त कैल्शियम में वृद्धि • अस्थि अवशोषण (ऑस्टियोक्लास्ट सक्रियता) TCT / कैल्सीटोनिन (थायरॉइड) ↓ रक्त कैल्शियम में कमी • अस्थि में कैल्शियम निक्षेपण (ऑस्टियोब्लास्ट) रोग / विकार: हाइपोकैल्सीमिया → टिटैनी | अतिपैराथायरॉइड → ऑस्टियोपोरोसिस • PTH आंत में Ca2+ अवशोषण हेतु विटामिन D को सक्रिय करता है रक्त शर्करा संतुलन नियमन सामान्य: 70 - 100 mg/dL इंसुलिन (β-कोशिकाएं, 70%) ↓ रक्त शर्करा में कमी • कोशिकीय ग्लूकोज उपभोग (GLUT-4) व ग्लाइकोजेनेसिस ग्लूकागन (α-कोशिकाएं, 25%) ↑ रक्त शर्करा में वृद्धि • ग्लाइकोजिनोलिसिस एवं ग्लूकोनियोजेनेसिस रोग / विकार: डायबिटीज मेलिटस (अतिशर्करा, मूत्र में ग्लूकोज, कीटोसिस) • सोमाटोस्टैटिन (δ-कोशिकाएं) दोनों हार्मोन के स्राव का नियमन करती हैं अधिवृक्क ग्रंथि (वृक्क के ऊपर दोहरी ग्रंथि) अधिवृक्क वल्कुट (मीसोडर्म) • ज़ोना ग्लोमेरुलोसा: एल्डोस्टेरोन (Na+) • ज़ोना फैसीकुलेटा: कोर्टिसोल (ग्लूकोकोर्टिकोइड) • ज़ोना रेटिकुलेरिस: लिंग स्टेरॉयड एडिसन रोग (अल्पस्राव) | कुशिंग सिंड्रोम (अतिस्राव) अधिवृक्क मध्यांश (एक्टोडर्म) • क्रोमैफिन कोशिकाएं (न्यूरल क्रेस्ट) • एड्रीनेलिन (एपिनेफ्रीन, 80%) • नॉर-एड्रीनेलिन (नॉर-एपिनेफ्रीन) 3F संकटकालीन: भय, संघर्ष एवं पलायन क्रिया हृदय: ANF (रक्तचाप घटाता है) ⟷ RAAS अक्ष (एल्डोस्टेरोन रक्तचाप बढ़ाता है) वृक्क: इरिथ्रोपोइटिन (EPO हाइपोक्सिया में RBC निर्माण को प्रेरित करता है) 3. हार्मोन की आण्विक क्रिया-विधि एवं संकेतन विधि 1: द्वितीयक संदेशवाहक (Second Messenger) कैस्केड • पेप्टाइड, प्रोटीन, कैटेकोलामाइन (इंसुलिन, TSH, एड्रीनेलिन) • लिपिड परत को पार नहीं कर सकते → कोशिका सतह ग्राही से जुड़ते हैं हार्मोन (प्रथम) + ग्राही संकुल G-प्रोटीन एडिनाइलेट साइक्लेज cAMP / IP3 द्वितीय संदेशवाहक काइनेज कैस्केड एवं एंजाइम सक्रियण: प्रोटीन काइनेज A (PKA) → फॉस्फोरिलीकरण → 1,00,000 गुना प्रवर्धन • वैकल्पिक पथ: फॉस्फोलाइपेस C (PLC) → IP3 + DAG → अंतःकोशिकीय Ca2+ स्राव विधि 2: अंतःकोशिकीय ग्राही एवं जीनोमिक क्रिया • स्टेरॉयड (कोर्टिसोल, लिंग हार्मोन) एवं आयोडोथायरोनिन (T3, T4) • वसा-घुलनशील: कोशिका झिल्ली को पार कर सीधे प्रवेश करते हैं H-R केंद्रक में स्थानांतरण DNA / हार्मोन अनुक्रिया तत्व (HRE) अनुलेखन → mRNA संश्लेषण अनुवादन → विशिष्ट संरचनात्मक एवं एंजाइमी प्रोटीन निर्माण प्रमुख अंतर: धीमी गति (घंटे/दिन), दीर्घकालिक संरचनात्मक प्रभाव • जल-घुलनशील = तीव्र अनुक्रिया (सेकंड/मिनट), अल्पकालिक नियमन

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
अंतःस्रावी तंत्र वाहिनीविहीन ग्रंथियों से स्रावित हार्मोन के माध्यम से शरीर के उपापचय, समस्थापन, वृद्धि और दीर्घकालिक शारीरिक समन्वय का नियमन करता है।
मुख्य बिंदु 2
रासायनिक संरचना के आधार पर हार्मोन को जल-घुलनशील पेप्टाइड/प्रोटीन हार्मोन, वसा-घुलनशील स्टेरॉयड हार्मोन, आयोडोथायरोनिन तथा अमीनो अम्ल व्युत्पन्नों में वर्गीकृत किया जाता है।
मुख्य बिंदु 3
हाइपोथैलेमस प्रधान तंत्रिका-अंतःस्रावी केंद्र है, जो मोचक एवं निरोधी न्यूरोहार्मोन द्वारा हाइपोफाइसियल निवाहिका तंत्र के माध्यम से अग्र पीयूष का नियंत्रण करता है।
मुख्य बिंदु 4
पीयूष ग्रंथि के अग्र भाग (पार्स डिस्टैलिस) से GH, TSH, ACTH, PRL, LH तथा FSH स्रावित होते हैं और पश्च भाग (पार्स नर्वोसा) हाइपोथैलेमस में बने ऑक्सीटोसिन व ADH का भंडारण व निष्कासन करता है।
मुख्य बिंदु 5
थायरॉइड ग्रंथि आधारी उपापचय दर (BMR) व शारीरिक वृद्धि नियमन हेतु T3 व T4 स्रावित करती है और इसकी सी-कोशिकाएं कैल्शियम घटाने वाला थायरोकैल्सीटोनिन (TCT) स्रावित करती हैं।
मुख्य बिंदु 6
पैराथायरॉइड ग्रंथियों से स्रावित पैराथॉर्मोन (PTH) अस्थि अवशोषण तथा वृक्कीय पुनरावशोषण द्वारा रक्त कैल्शियम बढ़ाकर TCT के विपरीत कार्य करता है।
मुख्य बिंदु 7
अधिवृक्क वल्कुट खनिज संतुलन हेतु एल्डोस्टेरोन तथा तनाव अनुकूलन हेतु कोर्टिसोल स्रावित करता है, जबकि अधिवृक्क मध्यांश आपातकालीन 3F अनुक्रिया हेतु एड्रीनेलिन व नॉर-एड्रीनेलिन स्रावित करता है।
मुख्य बिंदु 8
अग्न्याशय की लैंगरहेंस द्वीपिकाओं की बीटा-कोशिकाओं से स्रावित इंसुलिन रक्त शर्करा घटाता है और अल्फा-कोशिकाओं से स्रावित ग्लूकागन रक्त शर्करा बढ़ाकर संतुलन बनाए रखता है।
मुख्य बिंदु 9
अंतःस्रावी ग्रंथियों के अतिरिक्त हृदय (ANF रक्तदाब घटाने वाला), वृक्क (EPO लाल रक्त कोशिका निर्माण प्रेरक व रेनिन) तथा जठरांत्र मार्ग (गैस्ट्रिन, सीक्रेटिन, CCK व GIP) महत्वपूर्ण हार्मोन स्रावित करते हैं।
मुख्य बिंदु 10
हार्मोन क्रिया दो आण्विक मार्गों द्वारा होती है: जल-घुलनशील हार्मोन कोशिका झिल्ली ग्राही से जुड़कर द्वितीयक संदेशवाहक (cAMP, IP3) कैस्केड द्वारा तीव्र प्रवर्धन करते हैं, और वसा-घुलनशील हार्मोन कोशिका में प्रवेश कर अंतःकोशिकीय केंद्रकीय ग्राही द्वारा DNA के HRE से जुड़कर जीन अनुलेखन व प्रोटीन निर्माण को नियंत्रित करते हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
एक रोगी प्रतिदिन लगभग 15 लीटर तनु मूत्र विसर्जित करता है और उसे अत्यधिक प्यास लगती है, किंतु मूत्र परीक्षण में कोई ग्लूकोज या कीटोन पिंड नहीं मिलता। इस रोग का नाम क्या है और यह किस हार्मोन की कमी से होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: इस रोग का नाम डायबिटीज इंसिपिडस (Diabetes Insipidus या उदकमेह) है। यह हाइपोथैलेमस/पश्च पीयूष से वैसोप्रेसिन या एंटीडाइयूरेटिक हार्मोन (ADH) के अल्पस्राव अथवा वृक्क में इसकी अक्रियता के कारण होता है। ADH की अनुपस्थिति में वृक्क की संग्रह नलिकाएं जल का पुनरावशोषण नहीं कर पातीं, जिससे अत्यधिक मात्रा में तनु मूत्र उत्सर्जित होता है।
मीठे मूत्र (मेलिटस) और स्वादहीन मूत्र (इंसिपिडस) के अंतर पर विचार करें। वृक्क में जल पुनरावशोषण नियंत्रित करने वाले हार्मोन को स्मरण करें।
2
थायरॉइड शल्यक्रिया के बाद यदि रोगी की पैराथायरॉइड ग्रंथियां गलती से निकल जाएं, तो तीव्र पेशीय ऐंठन (टिटैनी) क्यों हो जाती है? कैल्शियम की कमी से पक्षाघात न होकर पेशी संकुचन क्यों बढ़ जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पैराथायरॉइड ग्रंथियां निकल जाने से रक्त में PTH समाप्त होकर गंभीर अल्पकैल्शियमता (Hypocalcemia) हो जाती है। बाह्यकोशिकीय कैल्शियम आयन सामान्यतः प्रेरक तंत्रिका झिल्ली के वोल्टेज-गेटेड सोडियम चैनलों को स्थिर रखते हैं। कैल्शियम घटने पर सोडियम चैनल अनायास ही खुलने लगते हैं, जिससे विश्रामी विभव देहली विभव के अत्यंत निकट आ जाता है। इससे प्रेरक तंत्रिकाओं में स्वतः अनियंत्रित क्रियात्मक विभव उत्पन्न होते हैं, जो पेशियों में तीव्र दर्दनाक ऐंठन (टिटैनी) उत्पन्न करते हैं।
तंत्रिका झिल्ली के सोडियम चैनलों पर बाह्य कैल्शियम आयनों के स्थिरीकरण प्रभाव पर विचार करें।
3
आपातकालीन स्थिति में एड्रीनेलिन द्वारा उत्पन्न अनुक्रिया और दीर्घकालिक तनाव में कोर्टिसोल द्वारा उत्पन्न अनुक्रिया की समय-सीमा और आण्विक विधि में क्या अंतर है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: एड्रीनेलिन (जल-घुलनशील कैटेकोलामाइन) कोशिका झिल्ली के GPCR से जुड़कर सेकंडों में cAMP बनाता है और पूर्व-उपस्थित एंजाइमों का फॉस्फोरिलीकरण कर तुरंत आपातकालीन प्रतिक्रिया (हृदय गति व रक्त शर्करा में तीव्र वृद्धि) देता है। इसके विपरीत कोर्टिसोल (वसा-घुलनशील स्टेरॉयड) झिल्ली को पार कर अंतःकोशिकीय केंद्रकीय ग्राही से जुड़ता है और DNA के HRE से जुड़कर नए mRNA व प्रोटीन का निर्माण कराता है। इस जीनोमिक विधि में कई घंटे से दिन लगते हैं, जो दीर्घकालिक तनाव का मुकाबला करने में सक्षम बनाती है।
पूर्व-विद्यमान एंजाइमों के तात्कालिक फॉस्फोरिलीकरण बनाम नए प्रोटीन निर्माण के समय की तुलना करें।
4
एट्रियल नैट्रियूरेटिक कारक (ANF) को रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन तंत्र (RAAS) का प्राकृतिक विरोधी क्यों कहा जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: रक्तदाब घटने पर RAAS अक्ष सक्रिय होता है: रेनिन व एंजियोटेंसिन II एल्डोस्टेरोन का स्राव कराते हैं, जो वृक्क में सोडियम व जल का पुनरावशोषण कराकर रक्तदाब बढ़ाता है। इसके विपरीत रक्तदाब व रक्त आयतन बढ़ने पर हृदय का अलिंद ANF स्रावित करता है। ANF वाहिकाओं का विस्फारण करता है, रेनिन व एल्डोस्टेरोन को रोकता है तथा वृक्क में सोडियम (नैट्रियूरेसिस) व जल का निष्कासन बढ़ाकर रक्तदाब को घटाकर सामान्य करता है।
रक्तदाब वृद्धि बनाम कमी में वृक्क द्वारा सोडियम व जल के संरक्षण और निष्कासन के परस्पर विरोधी कार्यों को देखें।
5
एक नवजात शिशु यदि जन्मजात आयोडीन की कमी से पीड़ित हो, तो कौन सा विकार उत्पन्न होगा और उसकी शारीरिक वृद्धि के साथ-साथ मानसिक विकास भी गंभीर रूप से क्यों अवरुद्ध हो जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: शिशु में जड़मानवता (Cretinism या जन्मजात हाइपोथायरायडिज्म) रोग उत्पन्न होगा। थायरॉइड हार्मोन (T3 व T4) भ्रूणावस्था व नवजात काल में मस्तिष्क के प्रमस्तिष्क वल्कुट के विकास, तंत्रिका तंतुओं के शाखन तथा मायलिनेशन हेतु नितांत आवश्यक हैं; इनके अभाव में अपूरणीय मानसिक मंदता व मूक-बधिरता आ जाती है। इसके साथ ही कंकाल की अस्थियों की वृद्धि पट्टिकाओं के परिपक्वन हेतु थायरोक्सिन आवश्यक है, जिसकी कमी से शिशु गंभीर रूप से बौना रह जाता है।
मस्तिष्क के तंत्रिका विकास, मायलिनेशन एवं अस्थि वृद्धि पट्टिकाओं के परिपक्वन में थायरॉइड हार्मोन की भूमिका याद करें।
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अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

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