Follow Us
माध्यम चुनें / Select Medium:
Eng (English) Beng (বাংলা) Hindi (हिन्दी)
WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 3
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

पादप जगत

पादप जगत पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद (WBCHSE) एवं NCERT कक्षा 11 जीव विज्ञान का अत्यंत महत्वपूर्ण, विस्तृत एवं मूलभूत तीसरा अध्याय है। इस अध्याय में आदिम जलीय शैवाल से लेकर विशालकाय अनावृतबीजी एवं आधुनिक पुष्पी आवृतबीजी पादपों तक के विकासवादी इतिहास, शारीरिक संगठन तथा जीवन चक्रों का गहन वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। लिनियस की कृत्रिम वर्गीकरण प्रणाली से लेकर जॉर्ज बेंथम एवं जोसेफ डाल्टन हूकर की सुप्रसिद्ध प्राकृतिक प्रणाली तथा आधुनिक जातिवृत्तीय, संख्यात्मक, कोशिकीय व रसायन वर्गिकी का क्रमबद्ध अध्ययन कराया गया है। इसके अंतर्गत शैवाल के तीन प्रमुख वर्ग (क्लोरोफाइसी, फियोफाइसी, रोडोफाइसी), पादप जगत के उभयचर ब्रायोफाइटा (लिवरवर्ट व मॉस), प्रथम संवहनी पादप टेरिडोफाइटा व सिलैजिनेला में बीज प्रकृति की पूर्वगामी अवस्था, अत्यधिक मरुद्भिदी अनुकूलन वाले जिम्नोस्पर्म (पाइनस व साइकस का अगुणित भ्रूणपोष), आवृतबीजी पादपों में द्विनिषेचन तथा विभिन्न पादप जीवन चक्रों (अगुणितकी, द्विगुणितकी एवं अगुणित-द्विगुणितकी) का विस्तृत वर्णन किया गया है।

क्या आपने कभी सोचा है?

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पर्यावरण संतुलन, वानिकी, कृषि, चिकित्सा एवं उद्योगों के लिए पादप जगत का वैज्ञानिक ज्ञान अपरिहार्य है। समुद्री शैवाल पृथ्वी के कुल कार्बन डाइऑक्साइड स्थिरीकरण का 50% से अधिक भाग अकेले संपन्न करते हैं। लाल शैवाल से प्राप्त अगर-अगर के बिना प्रयोगशाला में जीवाणु संवर्धन अथवा आइसक्रीम उद्योग में स्थिरीकरण असंभव है। स्फैग्नम पीट मॉस की अत्यधिक जल-धारण क्षमता जीवित पौधों के लंबी दूरी के परिवहन में उपयोगी है। पादपों के जीवन चक्र और पीढ़ी एकांतरण को समझकर उन्नत बीजों और फसलों की उत्पादकता में क्रांतिकारी वृद्धि की जा सकती है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • पादप कोशिका की सामान्य संरचना (सेलूलोज़ भित्ति, रिक्तिका, हरित लवक)।
  • पीढ़ी एकांतरण की बुनियादी समझ (अगुणित n युग्मक बनाम द्विगुणित 2n युग्मनज/बीजाणु)।
  • अध्याय 1 और 2 में पढ़े गए वर्गिकी के आधारभूत सिद्धांत।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 पादप वर्गीकरण की प्रणालियां एवं आधु...
2 शैवाल प्रभाग (Algae): संरचना, जनन ए...
3 ब्रायोफाइटा: पादप जगत के उभयचर
4 टेरिडोफाइटा: प्रथम संवहनी पादप एवं...
5 अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म): नग्न बीज...
6 आवृतबीजी पादप एवं पादप जीवन चक्र: प...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

पादप वर्गीकरण की प्रणालियां एवं आधुनिक वर्गिकी

पादप जगत के क्रमबद्ध अध्ययन हेतु वैज्ञानिकों ने समय-समय पर विभिन्न वर्गीकरण प्रणालियों का प्रतिपादन किया। प्रारंभिक सतही आकारिकी पर आधारित कृत्रिम प्रणालियों से लेकर आंतरिक शारीर पर आधारित प्राकृतिक प्रणालियों तथा विकासवादी जातिवृत्तीय प्रणालियों तक इसका क्रमिक विकास हुआ है।

1. पादप वर्गीकरण की ऐतिहासिक प्रणालियां
  • कृत्रिम वर्गीकरण प्रणाली (Artificial System): यह प्रणाली केवल एक या दो सतही आकारिकीय लक्षणों (जैसे पादप की प्रकृति, पत्तियों का रंग, आकार अथवा पुंकेसरों की संख्या) पर आधारित थी।
    कमियां: कैरोलस लिनियस ने पुंकेसरों की संख्या के आधार पर लैंगिक वर्गीकरण किया। इसने निकट संबंधी जातियों को अलग कर दिया क्योंकि यह केवल कुछ लक्षणों पर टिकी थी। साथ ही कायिक एवं लैंगिक लक्षणों को समान महत्व दिया गया, जबकि कायिक लक्षण पर्यावरण से आसानी से प्रभावित हो जाते हैं।
  • प्राकृतिक वर्गीकरण प्रणाली (Natural System): यह प्रणाली जीवों के बीच संपूर्ण प्राकृतिक समानताओं पर आधारित है। इसमें न केवल बाह्य लक्षणों बल्कि आंतरिक संरचनाओं जैसे सूक्ष्म संरचना (Ultrastructure), शारीर (Anatomy), भ्रूणविज्ञान (Embryology) तथा पादप रसायन (Phytochemistry) का भी ध्यान रखा जाता है।
    बेंथम एवं हूकर की प्रणाली: जॉर्ज बेंथम एवं जोसेफ डाल्टन हूकर ने अपने ग्रंथ Genera Plantarum (1862–1883) में बीजीय पादपों का जो प्राकृतिक वर्गीकरण दिया, वह आज भी भारत और ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के प्रमुख हर्बेरियमों में पादप नमूनों के व्यवस्थापन का मानक आधार है।
  • जातिवृत्तीय वर्गीकरण प्रणाली (Phylogenetic System): विभिन्न जीवों के मध्य विकासवादी एवं पूर्वज संबंधों पर आधारित प्रणाली। प्रतिपादक: एडॉल्फ एंग्लर व कार्ल प्रैंटल (1887–1899) तथा जॉन हचिंसन (1926)।
2. आधुनिक वर्गिकी पद्धतियां

जीवाश्म प्रमाणों के अभाव में पादप वर्गिकी के संशय दूर करने हेतु आधुनिक वैज्ञानिक इन आधुनिक शाखाओं का उपयोग करते हैं:

  1. संख्यात्मक वर्गिकी (Numerical Taxonomy / Phenetics): यह कंप्यूटर द्वारा समस्त प्रेक्षणीय लक्षणों का मूल्यांकन करके की जाती है। प्रत्येक लक्षण को एक कोड और संख्या दी जाती है तथा सैकड़ों लक्षणों का एक साथ समान महत्व देकर विश्लेषण किया जाता है।
  2. कोशिकीय वर्गिकी (Cytotaxonomy): गुणसूत्रों की संख्या, संरचना, आकारिकी तथा अर्धसूत्री विभाजन में गुणसूत्रों के व्यवहार पर आधारित वर्गिकी।
  3. रसायन वर्गिकी (Chemotaxonomy): पादपों के रासायनिक अवयवों जैसे DNA अनुक्रम, अमीनो अम्ल क्रम, एल्केलॉइड्स, फ्लेवोनॉइड्स तथा सुगंधित तेलों के रासायनिक संघटन पर आधारित आधुनिक वर्गिकी।

शैवाल प्रभाग (Algae): संरचना, जनन एवं तीन प्रमुख वर्ग

शैवाल (Algae) पर्णहरित युक्त, सरल, थैलॉयड (समकाय), स्वपोषी तथा मुख्यतः जलीय (अलवणीय व समुद्री जल) जीव हैं। इनका आकार एककोशिकीय सूक्ष्मदर्शी (Chlamydomonas), कॉलोनी (Volvox), अशाखित तंतु (Spirogyra, Ulothrix) से लेकर 100 मीटर ऊंचे विशाल समुद्री केल्प (Macrocystis) तक होता है।

1. शैवाल में जनन की विधियां
  • कायिक जनन: विखंडन (Fragmentation) द्वारा; प्रत्येक खंड नए थैलस में विकसित होता है।
  • अलैंगिक जनन: विभिन्न प्रकार के बीजाणुओं द्वारा होता है, जिनमें सबसे सामान्य कशाभिका युक्त गतिशील चलबीजाणु (Zoospores) हैं।
  • लैंगिक जनन: दो युग्मकों के संलयन से होता है:
    1. समयुग्मकी (Isogamous): समान आकार व संरचना वाले युग्मकों का संलयन। यह कशाभिकायुक्त गतिशील (उदा. Chlamydomonas debaryanum, Ulothrix) अथवा कशाभिकारहित अचल (उदा. Spirogyra) हो सकते हैं।
    2. असमयुग्मकी (Anisogamous): दो भिन्न आकार वाले युग्मकों का संलयन (उदा. Eudorina तथा Chlamydomonas की कुछ जातियां)।
    3. विषमयुग्मकी (Oogamous): एक बड़े, अचल मादा युग्मक (अंड) तथा एक छोटे, गतिशील नर युग्मक का संलयन (उदा. Volvox तथा भूरा शैवाल Fucus)।
2. शैवाल के तीन प्रमुख वर्गों की तुलनात्मक तालिका
लक्षण क्लोरोफाइसी (हरे शैवाल) फियोफाइसी (भूरे शैवाल) रोडोफाइसी (लाल शैवाल)
मुख्य प्रकाशसंश्लेषी वर्णक क्लोरोफिल a तथा क्लोरोफिल b क्लोरोफिल a, क्लोरोफिल c तथा फ्यूकोजैंथिन (जैनथिन) क्लोरोफिल a, क्लोरोफिल d तथा r-फाइकोएरिथ्रिन
संचित भोजन स्टार्च (पाइरीनॉइड में प्रोटीन कोर के चारों ओर संचित) लैमिनेरिन अथवा मैनिटॉल (जटिल कार्बोहाइड्रेट/अल्कोहल) फ्लोरिडियन स्टार्च (ग्लाइकोजन व एमाइलोपेक्टिन के समरूप संरचना)
कोशिका भित्ति भीतर सेलूलोज़ तथा बाहर पेक्टोज़ सेलूलोज़ के बाहर एल्जिन (Algin) का जिलेटिनी आवरण सेलूलोज़, पेक्टिन तथा पॉलीसल्फेट एस्टर
कशाभिका की संख्या व स्थिति 2 से 8, समान, शीर्षस्थ (Apical) 2, असमान, पार्श्व (Lateral); नाशपाती के आकार की कोशिकाएं पूर्णतः अनुपस्थित (बीजाणु व युग्मक दोनों अचल)
थैलस संगठन एककोशिकीय, कॉलोनी अथवा तंतुमय होल्डफास्ट (आधार), स्टीप (वृंत) तथा फ्रॉन्ड (पत्ती समान फलक) में विभेदित जटिल बहुकोशिकीय शाखित थैलस
प्रमुख उदाहरण Chlamydomonas, Volvox, Ulothrix, Spirogyra, Chara Ectocarpus, Dictyota, Laminaria, Sargassum, Fucus Polysiphonia, Porphyra, Gracilaria, Gelidium
3. शैवाल का आर्थिक एवं पारिस्थितिक महत्व
  • वैश्विक कार्बन स्थिरीकरण: पृथ्वी पर होने वाले कुल प्रकाशसंश्लेषण का 50% से अधिक भाग समुद्री शैवालों द्वारा संपन्न होता है।
  • व्यापारिक हाइड्रोकोलॉइड्स: जल-धारण करने वाले पॉलीसैकेराइड:
    • एल्जिन (Algin): भूरे शैवाल (जैसे Laminaria) से प्राप्त होता है।
    • कैरागीनन (Carrageenan): लाल शैवाल (Chondrus crispus) से निकाला जाता है।
    • अगर-अगर (Agar): लाल शैवाल Gelidium एवं Gracilaria से प्राप्त होता है, जो सूक्ष्मजीव संवर्धन माध्यम को जमाने तथा आइसक्रीम व जेली बनाने में अनिवार्य है।
  • आहार एवं अंतरिक्ष अनुसंधान: Porphyra तथा Sargassum खाद्य रूप में खाए जाते हैं। एककोशिकीय हरा शैवाल Chlorella प्रोटीन से भरपूर होने के कारण अंतरिक्ष यात्रियों के पूरक आहार के रूप में प्रयुक्त होता है।

ब्रायोफाइटा: पादप जगत के उभयचर

ब्रायोफाइटा में लिवरवर्ट तथा मॉस आते हैं जो प्रायः नम, छायादार पहाड़ियों पर पाए जाते हैं। इन्हें "पादप जगत के उभयचर" (Amphibians of the Plant Kingdom) कहा जाता है, क्योंकि ये भूमि पर जीवित रहते हैं किंतु लैंगिक जनन पूर्ण करने हेतु जल पर अनिवार्य रूप से निर्भर होते हैं (कशाभिकायुक्त नर युग्मक तैरकर स्त्रीधानी तक पहुंचते हैं)।

1. थैलस संगठन एवं पीढ़ी एकांतरण
  • मुख्य पादप शरीर: ब्रायोफाइटा का प्रमुख पौधा अगुणित युग्मकोद्भिद् (Gametophyte, n) होता है। यह स्वतंत्र, प्रकाशसंश्लेषी तथा थैलॉयड अथवा पर्णिल होता है। यह एककोशिकीय अथवा बहुकोशिकीय मूलाभासों (Rhizoids) द्वारा मिट्टी से जुड़ा रहता है। इनमें वास्तविक मूल, तना व पत्तियां नहीं होतीं (इनके स्थान पर मूलाभास, काउलॉइड व फाइलाइड होते हैं)। संवहन ऊतक (जाइलम व फ्लोएम) पूर्णतः अनुपस्थित होते हैं।
  • जननांग: बहुकोशिकीय तथा बंध्य आवरण द्वारा सुरक्षित होते हैं:
    • पुंधानी (Antheridium): द्विकशाभिक गतिशील नर युग्मक (एन्थेरोज़ोइड) उत्पन्न करती है।
    • स्त्रीधानी (Archegonium): फ्लास्क के आकार की होती है, जिसमें एक अचल अंड कोशिका पाई जाती है।
  • आश्रित बीजाणुद्भिद् (Sporophyte, 2n): युग्मनज तुरंत अर्धसूत्री विभाजन नहीं करता; बल्कि समसूत्री विभाजन द्वारा बहुकोशिकीय बीजाणुद्भिद् (2n) बनाता है। यह बीजाणुद्भिद् स्वतंत्र नहीं होता; यह पोषण व आश्रय हेतु प्रकाशसंश्लेषी युग्मकोद्भिद् से जुड़ा रहता है और उस पर पूर्णतः परजीवी होता है। यह तीन भागों में बंटा होता है:
    1. पाद (Foot): युग्मकोद्भिद् से पोषण अवशोषित करने वाला आधार।
    2. सीटा (Seta): कैप्सूल को ऊपर उठाने वाला डंठल।
    3. संपुटिका / कैप्सूल (Capsule): शीर्षस्थ भाग जिसकी बीजाणुजन कोशिकाओं में अर्धसूत्री विभाजन होकर अगुणित बीजाणु ($n$) बनते हैं।
2. ब्रायोफाइटा के दो प्रमुख वर्ग

1. लिवरवर्ट (Hepaticopsida, उदा. Marchantia):

  • पादप शरीर पृष्ठाधर (Dorsoventral) रूप से चपटा और भूमि से सटा होता है।
  • गेमा द्वारा अलैंगिक जनन: थैलस की ऊपरी सतह पर छोटे प्यालेनुमा गेमा कप (Gemma cups) पाए जाते हैं, जिनमें हरी, बहुकोशिकीय कलिकाएं यानी गेमा (Gemmae) बनती हैं। गेमा अलग होकर नए थैलस का निर्माण करती हैं।
  • कैप्सूल में आर्द्रताग्राही इलेटर (Elaters) पाए जाते हैं जो ऐंठकर बीजाणुओं को बिखेरते हैं।

2. मॉस (Bryopsida, उदा. Funaria, Sphagnum):

  • युग्मकोद्भिद् की दो क्रमिक अवस्थाएं होती हैं:
    1. प्रथम तंतु अवस्था (Protonema stage): बीजाणु के अंकुरण से सीधे बनने वाली विसर्पी, हरी, शाखित, तंतुमय प्राथमिक प्रावस्था।
    2. पत्तीदार अवस्था (Leafy stage): द्वितीयक प्रोटोनेमा से पार्श्व कली के रूप में विकसित होने वाला सीधा तना जिस पर सर्पिलाकार पत्तियां लगी होती हैं।
  • पेरिस्टोम दंत: कैप्सूल के मुख पर 16 बाहरी और 16 भीतरी पेरिस्टोम दांत (Peristome teeth) होते हैं जो वायु की नमी के अनुसार बीजाणुओं का नियंत्रित प्रकीर्णन करते हैं।
3. आर्थिक एवं पारिस्थितिक महत्व
  • पीट ईंधन एवं स्फैग्नम: Sphagnum दलदली क्षेत्रों में जमा होकर पीट (Peat) बनाता है जिसे सुखाकर कोयले के विकल्प रूप में जलाया जाता है।
  • जल-धारण क्षमता व पैकिंग: स्फैग्नम अपने शुष्क भार का 25 गुना जल अपनी मृत कोशिकाओं में रोक सकता है। अतः इसका उपयोग जीवित पौधों और ताजे फूलों के दूरस्थ परिवहन में पैकिंग सामग्री के रूप में किया जाता है।
  • पारिस्थितिक अनुक्रमण: लाइकेन के साथ मॉस नग्न चट्टानों पर मिट्टी की परत बनाकर पादप अनुक्रमण (Lithosere) की नींव रखते हैं और मृदा अपरदन को रोकते हैं।

टेरिडोफाइटा: प्रथम संवहनी पादप एवं बीज प्रकृति का विकास

टेरिडोफाइटा पादप जगत के विकास का प्रथम संवहनी चरण हैं—ये संवहन ऊतक (जाइलम एवं फ्लोएम) धारण करने वाले प्रथम स्थलीय पादप हैं। फर्न एवं हॉर्सटेल इसके अंतर्गत आते हैं। ब्रायोफाइटा के विपरीत, इनका मुख्य एवं स्वतंत्र पौधा द्विगुणित बीजाणुद्भिद् (Sporophyte, 2n) होता है।

1. शारीरिक संरचना एवं संवहन ऊतक
  • अंगों का विभेदन: बीजाणुद्भिद् पौधा वास्तविक जड़, भूमिगत प्रकंद (Rhizome) अथवा वायवीय तने तथा पत्तियों में स्पष्ट विभेदित होता है।
  • संवहन ऊतक: आदिम संवहन बंडल पाए जाते हैं। जाइलम में वाहिकाएं (Vessels) नहीं होतीं (केवल वाहिनिकाएं/Tracheids होती हैं); तथा फ्लोएम में सहकोशिकाएं (Companion cells) नहीं होतीं (केवल चालनी कोशिकाएं होती हैं)।
  • पत्तियों के प्रकार:
    • लघुपर्ण (Microphylls): छोटी पत्तियां जिनमें केवल एक अशाखित शिरा होती है (उदा. Selaginella)।
    • गुरुपर्ण (Macrophylls): बड़ी, संयुक्त पिच्छाकार पत्तियां जिनमें शिराओं का जाल होता है (उदा. फर्न / Dryopteris)।
2. जनन एवं प्रोथैलस (Prothallus)
  • पत्तियों की निचली सतह पर बीजाणुधानियां (Sporangia) पाई जाती हैं। बीजाणुधानी धारण करने वाली पत्तियों को बीजाणुपर्ण (Sporophylls) कहते हैं। Selaginella एवं Equisetum में बीजाणुपर्ण सघन होकर शंकु (Strobili) बनाते हैं।
  • प्रोथैलस (Prothallus, n): बीजाणु अंकुरित होकर एक छोटा, बहुकोशिकीय, स्वतंत्र, हृदयाकार हरा प्रकाशसंश्लेषी युग्मकोद्भिद् बनाता है जिसे प्रोथैलस कहते हैं।
    भौगोलिक सीमा: प्रोथैलस में संवहन ऊतक व क्यूटिकल नहीं होते और इसके कशाभिकायुक्त शुक्राणुओं के निषेचन हेतु जल आवश्यक होता है। अतः टेरिडोफाइटा केवल सीमित नम एवं छायादार क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं।
3. विषमबीजाणुकता एवं बीज प्रकृति की पूर्वगामी अवस्था

उच्च पादपों में बीज निर्माण की नींव टेरिडोफाइटा में ही पड़ी थी:

  1. समबीजाणुक बनाम विषमबीजाणुकता (Heterospory): अधिकांश फर्न समबीजाणुक होते हैं (एक ही प्रकार के बीजाणु बनाते हैं)। किंतु सिलैजिनेला (Selaginella) तथा साल्वीनिया (Salvinia) विषमबीजाणुक होते हैं; ये दो प्रकार के बीजाणु उत्पन्न करते हैं:
    • लघुबीजाणु (Microspores): छोटे बीजाणु जो नर युग्मकोद्भिद् बनाते हैं।
    • गुरुबीजाणु (Megaspores): बड़े, खाद्य संचित बीजाणु जो मादा युग्मकोद्भिद् बनाते हैं।
  2. मादा युग्मकोद्भिद् का जनक पौधे पर बने रहना: सिलैजिनेला में गुरुबीजाणु भूमि पर नहीं गिरता; यह जनक बीजाणुद्भिद् पौधे की गुरुबीजाणुधानी में ही टिका रहता है।
  3. आंतरिक भ्रूण विकास: निषेचन गुरुबीजाणुधानी के भीतर ही होता है और युग्मनज से तरुण भ्रूण का विकास जनक पौधे पर टिके हुए मादा युग्मकोद्भिद् के अंदर ही संपन्न होता है।
  4. निष्कर्ष: मादा युग्मकोद्भिद् का जनक पादप पर प्रतिधारण तथा आंतरिक भ्रूण विकास ही बीज प्रकृति की महत्वपूर्ण पूर्वगामी अवस्था (Precursor to the Seed Habit) मानी जाती है।
4. टेरिडोफाइटा के 4 वर्ग
  • सिलोप्सिडा (Psilopsida): सबसे आदिम जड़विहीन संवहनी पौधे (उदा. Psilotum)।
  • लाइकोप्सिडा (Lycopsida): क्लब मॉस (उदा. Selaginella, Lycopodium)।
  • स्फिनोप्सिडा (Sphenopsida): सिलिकायुक्त पर्वसंधियों वाले हॉर्सटेल (उदा. Equisetum)।
  • टेरोप्सिडा (Pteropsida): वास्तविक फर्न (उदा. Dryopteris, Pteris, Adiantum - वाकिंग फर्न)।

अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म): नग्न बीज एवं मरुद्भिदी अनुकूलन

जिम्नोस्पर्म (Gymnosperms) (ग्रीक: gymnos = नग्न, sperma = बीज) ऐसे बीजीय संवहनी पादप हैं जिनके बीजांड किसी अंडाशय भित्ति से ढके नहीं होते और निषेचन से पूर्व तथा पश्चात सदैव अनावृत (नग्न) रहते हैं। इनमें अंडाशय न होने के कारण फल कभी नहीं बनते।

1. मरुद्भिदी अनुकूलन एवं विशालकाय वृक्ष
  • विशालकाय वृक्ष: ये बहुवर्षीय काष्ठीय वृक्ष अथवा झाड़ियां होते हैं। कैलिफोर्निया का रेडवुड वृक्ष Sequoia sempervirens विश्व के सबसे ऊंचे वृक्षों में से एक है (110 मीटर से अधिक ऊंचा)।
  • विशिष्ट जड़ें: मूसला जड़ तंत्र।
    • पाइनस (Pinus): जड़ों में कवक तंतुओं का अनिवार्य सहजीवी संबंध यानी कवक मूल (Ectomycorrhiza) पाया जाता है (कवक के बिना पाइनस का बीज अंकुरित नहीं हो सकता)।
    • साइकस (Cycas): छोटी विशिष्ट जड़ें भूमि से ऊपर आकर प्रवाल के समान शाखित प्रवालाभ मूल (Coralloid roots) बनाती हैं, जिनमें नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले नील-हरित शैवाल (Anabaena, Nostoc) पाए जाते हैं।
  • मरुद्भिदी अनुकूलन (Xerophytic adaptations): कोनिफर्स में जल हानि रोकने हेतु तीन प्रमुख अनुकूलन पाए जाते हैं:
    1. सुई जैसी पत्तियां (Needle-like leaves): सतही क्षेत्रफल को कम करके वाष्पोत्सर्जन घटाती हैं।
    2. मोटी क्यूटिकल: बाह्यत्वचा पर मोम की जलरोधी परत होती है।
    3. गर्तित रंध्र (Sunken Stomata): रंध्र गड्ढों में धंसे होते हैं जिससे वाष्पोत्सर्जन नगण्य हो जाता है।
2. शंकु एवं जनन

जिम्नोस्पर्म विषमबीजाणुक होते हैं और बीजाणुपर्ण सघन होकर शंकु (Strobili) बनाते हैं:

  • नर शंकु: लघुबीजाणुपर्णों से बने होते हैं, जिनमें लघुबीजाणु यानी पंखयुक्त परागकण (Pollen grains) बनते हैं।
  • मादा शंकु: गुरुबीजाणुपर्णों से बने होते हैं, जिन पर नग्न बीजांड लगे होते हैं।
  • पाइनस उभयलिंगाश्रयी या मोनोइशियस (Monoecious) है (एक ही वृक्ष पर नर व मादा शंकु होते हैं); जबकि साइकस एकलिंगाश्रयी या डायोइशियस (Dioecious) है (नर व मादा पौधे पृथक होते हैं)।
3. जिम्नोस्पर्म के अगुणित भ्रूणपोष की प्रकृति
बोर्ड परीक्षा का अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु: जिम्नोस्पर्म में क्रियाशील गुरुबीजाणु से निषेचन से पूर्व ही मादा युग्मकोद्भिद् बन जाता है जो भ्रूणपोष का कार्य करता है।
चूंकि यह निषेचन से पूर्व निर्मित होता है, अतः जिम्नोस्पर्म का भ्रूणपोष सदैव अगुणित ($n$) होता है! यह आवृतबीजी के त्रिसंलयन पश्चात बनने वाले त्रिगुणित ($3n$) भ्रूणपोष से पूर्णतः भिन्न है।
4. परागण एवं निषेचन
  • वायु परागण (Anemophily): परागकण हवा द्वारा उड़कर बीजांड के बीजांडद्वार पर पहुंचते हैं। पाइनस के परागकणों में दो पंख (Wings) पाए जाते हैं (वसंत ऋतु में पीले परागकणों की 'सल्फर वर्षा' होती है)।
  • नालियुग्मनी (Siphonogamy): परागकण अंकुरित होकर परागनलिका बनाता है जो नर युग्मकों को सीधे स्त्रीधानी तक पहुंचाती है; अतः निषेचन हेतु बाह्य जल की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।

आवृतबीजी पादप एवं पादप जीवन चक्र: पीढ़ी एकांतरण

पादप जगत का सर्वोच्च विकसित प्रभाग आवृतबीजी (Angiosperms - पुष्पी पादप) है, जिनके बीज फल के अंदर बंद रहते हैं। प्रत्येक पादप के जीवन चक्र में अगुणित युग्मक-उत्पादक युग्मकोद्भिद् और द्विगुणित बीजाणु-उत्पादक बीजाणुद्भिद् का चक्रीय एकांतरण होता है जिसे पीढ़ी एकांतरण (Alternation of Generations) कहते हैं।

1. आवृतबीजी का अद्वितीय द्विनिषेचन (Double Fertilization)

1898 में रूसी वैज्ञानिक एस. जी. नवाशिन (S.G. Nawaschin) ने आवृतबीजी में द्विनिषेचन की खोज की:

  1. संयुग्मन (Syngamy): एक अगुणित नर युग्मक ($n$) अंड कोशिका ($n$) से संलयित होकर द्विगुणित युग्मनज ($2n$) बनाता है, जो आगे चलकर भ्रूण बनता है। $$ ext{नर युग्मक } (n) + ext{अंड कोशिका } (n) \longrightarrow ext{युग्मनज } (2n)$$
  2. त्रिसंलयन (Triple Fusion): दूसरा अगुणित नर युग्मक ($n$) भ्रूणकोष के केंद्र में स्थित द्विगुणित द्वितीयक केंद्रक ($2n$) से संलयित होकर त्रिगुणित प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN, $3n$) बनाता है। $$ ext{नर युग्मक } (n) + ext{द्वितीयक केंद्रक } (2n) \longrightarrow ext{PEN } (3n)$$

एक ही भ्रूणकोष में दो बार संलयन होने के कारण इसे द्विनिषेचन कहते हैं।

2. पादपों के 3 प्रकार के जीवन चक्र
जीवन चक्र का प्रकार प्रभावी एवं स्वतंत्र प्रावस्था संक्षिप्त प्रावस्था एवं युग्मनज का भाग्य प्रतिनिधि पादप समूह
अगुणितकी (Haplontic) अगुणित युग्मकोद्भिद् ($n$): स्वतंत्र, प्रकाशसंश्लेषी व प्रभावी। द्विगुणित बीजाणुद्भिद् केवल एककोशिकीय युग्मनज ($2n$) द्वारा निरूपित होता है; युग्मनज में तुरंत अर्धसूत्री विभाजन होता है। अधिकांश शैवाल जैसे Volvox, Spirogyra तथा Chlamydomonas।
द्विगुणितकी (Diplontic) द्विगुणित बीजाणुद्भिद् ($2n$): प्रभावी, स्वतंत्र, संवहनी व प्रकाशसंश्लेषी। अगुणित युग्मकोद्भिद् प्रावस्था अत्यंत संक्षिप्त तथा एक से कुछ कोशिकीय परागकण व भ्रूणकोष तक सीमित होती है। समस्त बीजीय पौधे (जिम्नोस्पर्म एवं एंजियोस्पर्म), तथा भूरा समुद्री शैवाल Fucus!
अगुणित-द्विगुणितकी (Haplodiplontic) दोनों प्रावस्थाएं (युग्मकोद्भिद् $n$ व बीजाणुद्भिद् $2n$) बहुकोशिकीय होती हैं।
  • ब्रायोफाइटा में: युग्मकोद्भिद् ($n$) प्रभावी, बीजाणुद्भिद् ($2n$) परजीवी।
  • टेरिडोफाइटा में: बीजाणुद्भिद् ($2n$) प्रभावी, युग्मकोद्भिद् ($n$) स्वतंत्र प्रोथैलस।
ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, तथा शैवाल जैसे Ectocarpus, Polysiphonia एवं केल्प।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

शैवाल वर्णक एवं संचित भोजन पहचान सूत्र
क्लोरोफाइसी (Chl a+b, स्टार्च) | फियोफाइसी (Chl a+c, फ्यूकोजैंथिन, लैमिनेरिन) | रोडोफाइसी (Chl a+d, r-फाइकोएरिथ्रिन, फ्लोरिडियन स्टार्च)
प्रकाशसंश्लेषी वर्णकों, संचित खाद्य एवं कशाभिका की स्थिति के आधार पर शैवाल के तीन मुख्य वर्गों का विशिष्ट पहचान सूत्र।
बेंथम एवं हूकर प्राकृतिक वर्गीकरण संरचना
बीजीय पादप = द्विबीजपत्री (पॉलीपेटली + गेमोपेटली + मोनोक्लेमाइडी) + अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म) + एकबीजपत्री
बेंथम एवं हूकर की जेनेरा प्लैंटेरम प्रणाली में जिम्नोस्पर्म को प्राकृतिक समानताओं के आधार पर डाइकॉट्स और मोनोकॉट्स के मध्य रखा गया है।
बीज प्रकृति की पूर्वगामी अवस्था का प्रमेय
बीज प्रकृति = विषमबीजाणुकता (लघुबीजाणु + गुरुबीजाणु) + जनक पौधे पर गुरुबीजाणु का प्रतिधारण + आंतरिक भ्रूण विकास
सिलैजिनेला जैसे टेरिडोफाइट्स में गुरुबीजाणु का जनक पौधे पर बने रहना उच्च पादपों के बीज निर्माण का प्रत्यक्ष पूर्वगामी लक्षण है।
जिम्नोस्पर्म भ्रूणपोष गुणता समीकरण
जिम्नोस्पर्म भ्रूणपोष = निषेचन से पूर्व निर्मित मादा युग्मकोद्भिद् ऊतक = अगुणित (n)
आवृतबीजी के त्रिसंलयन पश्चात बनने वाले त्रिगुणित (3n) भ्रूणपोष के विपरीत जिम्नोस्पर्म का भ्रूणपोष सदैव अगुणित (n) होता है।
द्विनिषेचन रासायनिक समीकरण
संयुग्मन: नर युग्मक (n) + अंड (n) → युग्मनज (2n) | त्रिसंलयन: नर युग्मक (n) + द्वितीयक केंद्रक (2n) → PEN (3n)
नवाशिन (1898) द्वारा आवृतबीजी में खोजा गया अद्वितीय प्रक्रम जिससे द्विगुणित भ्रूण और त्रिगुणित पोषक भ्रूणपोष बनता है।
शैवाल जीवन चक्र अपवाद नियम
सामान्य शैवाल = अगुणितकी (Volvox, Spirogyra) | अपवाद 1: Fucus = द्विगुणितकी | अपवाद 2: Ectocarpus व Polysiphonia = अगुणित-द्विगुणितकी
बोर्ड परीक्षाओं में शैवाल के पीढ़ी एकांतरण से संबंधित सबसे अधिक पूछा जाने वाला अपवाद।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
(क) प्रकाशसंश्लेषी वर्णकों, संचित भोजन एवं कशाभिका की स्थिति के आधार पर क्लोरोफाइसी, फियोफाइसी और रोडोफाइसी में अंतर स्पष्ट कीजिए। (ख) शैवाल से प्राप्त होने वाले दो व्यापारिक हाइड्रोकोलॉइड्स के नाम व उपयोग लिखिए। [अंक विभाजन: 3 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) शैवाल के तीन वर्गों में तुलना (3 अंक)
लक्षण क्लोरोफाइसी (हरे शैवाल) फियोफाइसी (भूरे शैवाल) रोडोफाइसी (लाल शैवाल)
मुख्य वर्णक क्लोरोफिल a तथा क्लोरोफिल b क्लोरोफिल a, क्लोरोफिल c तथा फ्यूकोजैंथिन क्लोरोफिल a, क्लोरोफिल d तथा r-फाइकोएरिथ्रिन
संचित भोजन स्टार्च (पाइरीनॉइड में प्रोटीन कोर के चारों ओर) लैमिनेरिन अथवा मैनिटॉल फ्लोरिडियन स्टार्च (ग्लाइकोजन के समरूप)
कशाभिका की संख्या व स्थिति 2 से 8, समान, शीर्षस्थ (Apical) 2, असमान, पार्श्व (Lateral) पूर्णतः अनुपस्थित (अचल बीजाणु व युग्मक)
(ख) दो व्यापारिक हाइड्रोकोलॉइड्स (2 अंक)
  1. अगर-अगर (Agar-agar): लाल शैवाल Gelidium एवं Gracilaria से प्राप्त होता है। यह प्रयोगशाला में जीवाणुओं के संवर्धन माध्यम को ठोस बनाने तथा आइसक्रीम व जेली उद्योग में गाढ़ा करने हेतु काम आता है।
  2. एल्जिन (Algin): भूरे समुद्री शैवाल (जैसे Laminaria) से प्राप्त होता है, जो टूथपेस्ट, दवाओं और कपड़ा छपाई में इमल्सीफायर व स्टेबलाइजर के रूप में प्रयुक्त होता है।
उदाहरण 2
(क) ब्रायोफाइटा को 'पादप जगत का उभयचर' क्यों कहा जाता है? (ख) ब्रायोफाइटा के युग्मकोद्भिद् एवं बीजाणुद्भिद् में गुणता, स्वावलंबन तथा संरचना के तीन अंतर लिखिए। [अंक विभाजन: 2 + 3 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) ब्रायोफाइटा को उभयचर कहने का कारण (2 अंक)

ब्रायोफाइटा को दो मुख्य कारणों से पादप जगत का उभयचर कहा जाता है:

  • ये नम, छायादार स्थलीय मिट्टी पर उगते हैं।
  • किंतु लैंगिक जनन पूर्ण करने हेतु इनके जीवन चक्र में जल अनिवार्य होता है। पुंधानी से निकले कशाभिकायुक्त गतिशील नर युग्मक (एन्थेरोज़ोइड) जल की पतली परत में तैरकर स्त्रीधानी तक पहुंचते हैं और अंड कोशिका को निषेचित करते हैं। जल के अभाव में निषेचन असंभव है।
(ख) युग्मकोद्भिद् बनाम बीजाणुद्भिद् (3 अंक)
लक्षण युग्मकोद्भिद् (Gametophyte) बीजाणुद्भिद् (Sporophyte)
गुणता स्तर (Ploidy) अगुणित ($n$) द्विगुणित ($2n$)
स्वावलंबन व जीवनकाल प्रभावी, दीर्घकालिक, स्वतंत्र तथा हरा व प्रकाशसंश्लेषी। अल्पकालिक, पterrाधीन; भोजन व आश्रय हेतु युग्मकोद्भिद् पर पूर्णतः परजीवी।
शारीरिक संरचना थैलस या पर्णिल अक्ष युक्त, जो मूलाभासों द्वारा मिट्टी से जुड़ा रहता है। तीन भागों में विभेदित: पाद (Foot), सीटा (Seta) तथा कैप्सूल (Capsule)।
उदाहरण 3
(क) 'विषमबीजाणुकता' (Heterospory) किसे कहते हैं? इसके दो उदाहरण दीजिए। (ख) सिलैजिनेला में विषमबीजाणुकता किस प्रकार 'बीज प्रकृति' (Seed Habit) की पूर्वगामी अवस्था बनी? [अंक विभाजन: 2 + 3 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) विषमबीजाणुकता की परिभाषा एवं उदाहरण (2 अंक)

जब किसी संवहनी पादप में आकार एवं कार्यिकी में भिन्न दो प्रकार के बीजाणु उत्पन्न होते हैं, तो इसे विषमबीजाणुकता (Heterospory) कहते हैं:

  1. लघुबीजाणु (Microspores): छोटे आकार के असंख्य बीजाणु जो नर युग्मकोद्भिद् बनाते हैं।
  2. गुरुबीजाणु (Megaspores): बड़े आकार के खाद्य संचित बीजाणु जो मादा युग्मकोद्भिद् बनाते हैं।

दो टेरिडोफाइटा: Selaginella तथा Salvinia (एवं Marsilea)।

(ख) सिलैजिनेला में बीज प्रकृति की पूर्वगामी अवस्था (3 अंक)

उच्च पादपों (जिम्नोस्पर्म व एंजियोस्पर्म) में बीज निर्माण के मूल चरण सर्वप्रथम सिलैजिनेला में विकसित हुए:

  • गुरुबीजाणु का पोषण भंडार: बड़े गुरुबीजाणु में प्रचुर खाद्य संचित रहता है जो विकासशील मादा युग्मकोद्भिद् को पोषण देता है।
  • जनक पौधे पर गुरुबीजाणु का प्रतिधारण: सिलैजिनेला में गुरुबीजाणु झड़कर मिट्टी में नहीं गिरता; यह जनक बीजाणुद्भिद् पौधे की गुरुबीजाणुधानी में ही टिका रहता है।
  • आंतरिक भ्रूण निर्माण: निषेचन गुरुबीजाणुधानी के भीतर ही होता है तथा युग्मनज से प्रारंभिक भ्रूण का विकास जनक पौधे पर टिके हुए मादा युग्मकोद्भिद् के भीतर संपन्न होता है।
  • महत्व: मादा युग्मकोद्भिद् का जनक पादप पर बने रहना तथा अंदर भ्रूण का विकास होना ही बीज प्रकृति की अनिवार्य पूर्वगामी अवस्था (Precursor to the Seed Habit) मानी जाती है।
उदाहरण 4
(क) अनावृतबीजी पाइनस वृक्ष के तीन मरुद्भिदी अनुकूलन बताइए। (ख) जिम्नोस्पर्म का भ्रूणपोष अगुणित (n) और एंजियोस्पर्म का भ्रूणपोष त्रिगुणित (3n) क्यों होता है? [अंक विभाजन: 3 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) पाइनस के मरुद्भिदी अनुकूलन (3 अंक)

पाइनस शीत, शुष्क एवं बर्फीले पहाड़ी वातावरण में जल की कमी को रोकने हेतु निम्नलिखित अनुकूलन दर्शाता है:

  1. सुई जैसी पत्तियां (Needle-like leaves): पत्तियां सुई के समान पतली होती हैं जिससे सतही क्षेत्रफल बहुत घट जाता है और वाष्पोत्सर्जन कम होता है।
  2. मोटी क्यूटिकल (Thick Cuticle): बाह्यत्वचा पर मोम की मोटी जलरोधी परत होती है जो जल का वाष्पीकरण रोकती है।
  3. गर्तित रंध्र (Sunken Stomata): रंध्र बाह्यत्वचा के गड्ढों में धंसे होते हैं जिससे रंध्रों के मुख पर नम हवा बनी रहती है और वाष्पोत्सर्जन की दर नगण्य हो जाती है।
(ख) भ्रूणपोष की गुणता में अंतर (2 अंक)
  • जिम्नोस्पर्म का भ्रूणपोष अगुणित ($n$): जिम्नोस्पर्म में क्रियाशील गुरुबीजाणु ($n$) से निषेचन से पूर्व ही मादा युग्मकोद्भिद् ऊतक बनता है जो भ्रूणपोष का कार्य करता है। चूंकि यह निषेचन से पूर्व बिना किसी संलयन के बनता है, अतः यह अगुणित ($n$) होता है।
  • एंजियोस्पर्म का भ्रूणपोष त्रिगुणित ($3n$): आवृतबीजी में भ्रूणपोष निषेचन के बाद त्रिसंलयन (Triple Fusion) द्वारा बनता है। एक अगुणित नर युग्मक ($n$) भ्रूणकोष के द्विगुणित द्वितीयक केंद्रक ($2n$) से संलयित होकर त्रिगुणित प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN, $3n$) बनाता है।
उदाहरण 5
(क) आवृतबीजी पादपों के 'द्विनिषेचन' (Double Fertilization) प्रक्रम को समीकरण सहित समझाइए। (ख) निषेचन के पश्चात युग्मनज तथा प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN) का क्या भविष्य होता है? [अंक विभाजन: 3 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) द्विनिषेचन की क्रियाविधि (3 अंक)

1898 में रूसी वनस्पतिशास्त्री एस. जी. नवाशिन ने द्विनिषेचन की खोज की थी। परागनलिका भ्रूणकोष में दो नर युग्मक मुक्त करती है, जिससे दो स्वतंत्र संलयन संपन्न होते हैं:

  1. संयुग्मन (Syngamy): पहला अगुणित नर युग्मक ($n$) अंड कोशिका ($n$) से संलयित होकर द्विगुणित युग्मनज ($2n$) बनाता है। $$ ext{नर युग्मक } (n) + ext{अंड कोशिका } (n) \longrightarrow ext{युग्मनज } (2n)$$
  2. त्रिसंलयन (Triple Fusion): दूसरा अगुणित नर युग्मक ($n$) भ्रूणकोष के केंद्र में स्थित द्विगुणित द्वितीयक केंद्रक ($2n$) से संलयित होता है। तीन अगुणित केंद्रकों के संलयन को त्रिसंलयन कहते हैं, जिससे प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN, $3n$) बनता है। $$ ext{नर युग्मक } (n) + ext{द्वितीयक केंद्रक } (2n) \longrightarrow ext{PEN } (3n)$$

एक ही भ्रूणकोष में दोनों संलयन होने के कारण इसे द्विनिषेचन कहते हैं।

(ख) भविष्य व परिणति (2 अंक)
  • युग्मनज ($2n$): समसूत्री विभाजनों द्वारा भ्रूण (Embryo) में विकसित होता है, जिसमें भ्रूणीय अक्ष (प्रांकुर व मूलांकुर) तथा एक अथवा दो बीजपत्र बनते हैं।
  • प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक या PEN ($3n$): बारंबार विभाजित होकर पोषक त्रिगुणित भ्रूणपोष (Endosperm, $3n$) बनाता है, जो विकसित हो रहे भ्रूण को पोषण प्रदान करता है।
उदाहरण 6
(क) पादपों के अगुणितकी, द्विगुणितकी तथा अगुणित-द्विगुणितकी जीवन चक्रों में मुख्य प्रावस्था एवं युग्मनज के भाग्य के आधार पर अंतर लिखिए। (ख) द्विगुणितकी जीवन चक्र दर्शाने वाले एक शैवाल तथा अगुणित-द्विगुणितकी जीवन चक्र दर्शाने वाले दो शैवालों के नाम लिखिए। [अंक विभाजन: 3 + 2 = 5]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) पादप जीवन चक्रों की तुलना (3 अंक)
लक्षण अगुणितकी (Haplontic) द्विगुणितकी (Diplontic) अगुणित-द्विगुणितकी (Haplodiplontic)
प्रभावी स्वतंत्र प्रावस्था अगुणित युग्मकोद्भिद् ($n$): स्वतंत्र, हरा व प्रभावी। द्विगुणित बीजाणुद्भिद् ($2n$): प्रभावी, संवहनी व स्वतंत्र। दोनों प्रावस्थाएं (युग्मकोद्भिद् $n$ व बीजाणुद्भिद् $2n$) बहुकोशिकीय होती हैं।
युग्मनज का भाग्य व बीजाणुद्भिद् बीजाणुद्भिद् केवल एककोशिकीय युग्मनज ($2n$) तक सीमित; युग्मनज में तुरंत अर्धसूत्री विभाजन होता है। युग्मनज विभाजित होकर विशाल बीजाणुद्भिद् बनाता है; बीजाणुधानी में अर्धसूत्री विभाजन होता है। ब्रायोफाइटा में बीजाणुद्भिद् परजीवी होता है; टेरिडोफाइटा में बीजाणुद्भिद् स्वतंत्र संवहनी होता है।
प्रतिनिधि पादप अधिकांश शैवाल (Volvox, Spirogyra) समस्त बीजीय पादप (जिम्नोस्पर्म व एंजियोस्पर्म) ब्रायोफाइटा एवं टेरिडोफाइटा
(ख) शैवाल के जीवन चक्र अपवाद (2 अंक)
  1. द्विगुणितकी जीवन चक्र वाला शैवाल: भूरा समुद्री शैवाल फ्यूकस (Fucus)।
  2. अगुणित-द्विगुणितकी जीवन चक्र वाले दो शैवाल:
    • एक्टोकार्पस (Ectocarpus) (भूरा शैवाल)
    • पॉलिसिफोनिया (Polysiphonia) (लाल शैवाल)

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

जिम्नोस्पर्म के भ्रूणपोष को पुष्पी पौधों की भांति त्रिगुणित (3n) समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

जिम्नोस्पर्म का भ्रूणपोष सदैव अगुणित (n) होता है क्योंकि यह निषेचन से पूर्व मादा युग्मकोद्भिद् द्वारा निर्मित होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि लाल शैवाल (Rhodophyceae) में अलैंगिक जनन हेतु कशाभिकायुक्त चलबीजाणु पाए जाते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

लाल शैवाल के पूरे जीवन चक्र में किसी भी अवस्था में कशाभिका पूर्णतः नहीं पाई जाती। इनके बीजाणु और नर युग्मक दोनों अचल होते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सभी शैवालों का जीवन चक्र अगुणितकी (Haplontic) मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

अधिकांश शैवाल अगुणितकी होते हैं, किंतु भूरा शैवाल फ्यूकस (Fucus) द्विगुणितकी तथा एक्टोकार्पस व पॉलिसिफोनिया अगुणित-द्विगुणितकी होते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

ब्रायोफाइटा के बीजाणुद्भिद् को स्वतंत्र एवं प्रकाशसंश्लेषी पौधा मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ब्रायोफाइटा का बीजाणुद्भिद् (पाद, सीटा, कैप्सूल) स्वतंत्र नहीं होता, बल्कि पोषण व सहारे हेतु हरे युग्मकोद्भिद् पर पूर्णतः परजीवी होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सभी फर्नों को विषमबीजाणुक (Heterosporous) समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

अधिकांश फर्न (Dryopteris, Pteris) समबीजाणुक होते हैं। केवल सिलैजिनेला, साल्वीनिया व मार्सिलिया ही विषमबीजाणुक होते हैं।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

PK पादप जगत: शैवाल, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म एवं जीवन चक्र WBCHSE कक्षा 11 जीव विज्ञान — इकाई 1: जीव जगत में विविधता (अध्याय 3) 1. शैवाल के 3 प्रमुख वर्ग (Algae Classes) • Chlorophyceae: क्लोरोफिल a+b, पाइरीनॉइड (स्टार्च), 2-8 समान कशाभ (Chlamydomonas, Spirogyra) • Phaeophyceae: क्लोरोफिल a+c, फ्यूकोजैंथिन, लैमिनेरिन/मैनिटॉल, एल्जिन, पार्श्व कशाभ (Fucus, Kelp) • Rhodophyceae: r-फाइकोएरिथ्रिन, फ्लोरिडियन स्टार्च, कशाभ पूर्णतः अनुपस्थित (Polysiphonia, Gelidium) 2. ब्रायोफाइटा एवं टेरिडोफाइटा: संवहन ऊतक व बीज प्रकृति • Bryophytes: पादप जगत के उभयचर; युग्मकोद्भिद् (n) प्रभावी, बीजाणुद्भिद् (2n) परजीवी; स्फैग्नम (पीट मॉस) • Pteridophytes: प्रथम संवहनी (जाइलम/फ्लोएम) पादप; बीजाणुद्भिद् (2n) प्रभावी, स्वतंत्र प्रोथैलस (n) • Seed Habit: सिलैजिनेला व साल्वीनिया में विषमबीजाणुकता (Heterospory) 3. अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म): नग्न बीज एवं मरुद्भिदी अनुकूलन • Naked Seeds: अंडाशय अनुपस्थित, बीजांड अनावृत; फल नहीं बनते; सिकोया (विशाल रेडवुड वृक्ष >110 मी.) • Xerophytic Traits: सुई जैसी पत्तियां, मोटी क्यूटिकल, गर्तित रंध्र (Sunken stomata); पाइनस व साइकस • Endosperm (n): निषेचन से पूर्व मादा युग्मकोद्भिद् से बनता है (आवृतबीजी के 3n भ्रूणपोष के विपरीत) 4. पादप जीवन चक्र एवं पीढ़ी एकांतरण (Alternation of Generations) • Haplontic: युग्मकोद्भिद् (n) प्रभावी; बीजाणुद्भिद् केवल एककोशिकीय युग्मनज (2n); स्पाइरोगाइरा • Diplontic: बीजाणुद्भिद् (2n) प्रभावी; सभी बीज वाले पादप तथा फ्यूकस शैवाल • Haplodiplontic: दोनों प्रावस्थाएं बहुकोशिकीय; ब्रायोफाइटा (n प्रभावी) व टेरिडोफाइटा (2n प्रभावी) • Angiosperm: आवृतबीजी का अनूठा लक्षण; संयुग्मन (2n) + त्रिसंलयन (3n भ्रूणपोष)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
पादप जगत क्लोरोफिल युक्त, प्रकाशसंश्लेषी, सेलूलोज़ कोशिका भित्ति वाले बहुकोशिकीय यूकैरियोट्स का समूह है, जिसमें शैवाल, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म एवं एंजियोस्पर्म सम्मिलित हैं।
मुख्य बिंदु 2
कृत्रिम वर्गीकरण प्रणाली केवल कुछ सतही आकारिकीय लक्षणों (जैसे पुंकेसरों की संख्या) पर आधारित थी, जिससे निकट संबंधी जातियां अलग हो जाती थीं।
मुख्य बिंदु 3
जॉर्ज बेंथम एवं जोसेफ डाल्टन हूकर ने बीज वाले पादपों की प्रसिद्ध प्राकृतिक प्रणाली प्रस्तुत की, जो आंतरिक शारीर, भ्रूणविज्ञान तथा पादप रसायन पर आधारित थी।
मुख्य बिंदु 4
आधुनिक वर्गिकी पद्धतियों में संख्यात्मक वर्गिकी (कंप्यूटर आधारित फेनेटिक्स), कोशिकीय वर्गिकी (गुणसूत्र संख्या व आकार), तथा रसायन वर्गिकी शामिल हैं।
मुख्य बिंदु 5
शैवाल सरल, थैलॉयड, पर्णहरित युक्त, स्वपोषी जलीय पादप हैं जो तीन प्रमुख वर्गों में बंटे हैं: क्लोरोफाइसी, फियोफाइसी तथा रोडोफाइसी।
मुख्य बिंदु 6
क्लोरोफाइसी (हरे शैवाल) में क्लोरोफिल a व b होता है, पाइरीनॉइड में स्टार्च संचित होता है और 2 से 8 समान शीर्षस्थ कशाभ पाए जाते हैं (Chlamydomonas, Spirogyra)।
मुख्य बिंदु 7
फियोफाइसी (भूरे शैवाल) में फ्यूकोजैंथिन रंजक, लैमिनेरिन/मैनिटॉल संचित भोजन, एल्जिन भित्ति तथा 2 असमान पार्श्व कशाभ होते हैं (Fucus, Laminaria)।
मुख्य बिंदु 8
रोडोफाइसी (लाल शैवाल) में r-फाइकोएरिथ्रिन वर्णक, फ्लोरिडियन स्टार्च संचित भोजन होता है तथा इनके पूरे जीवन चक्र में कशाभ पूर्णतः अनुपस्थित होते हैं।
मुख्य बिंदु 9
ब्रायोफाइटा को पादप जगत के उभयचर कहा जाता है क्योंकि ये नम भूमि पर उगते हैं किंतु निषेचन हेतु नर युग्मकों के तैरने के लिए जल अनिवार्य होता है।
मुख्य बिंदु 10
ब्रायोफाइटा में मुख्य पादप शरीर अगुणित युग्मकोद्भिद् (n) होता है; द्विगुणित बीजाणुद्भिद् (2n) भोजन व आश्रय हेतु युग्मकोद्भिद् पर पूर्णतः परजीवी होता है।
मुख्य बिंदु 11
स्फैग्नम (पीट मॉस) अपने मृत कोशिकाओं में अत्यधिक जल धारण कर सकता है, इसलिए इसका उपयोग जीवित पौधों और कट फ्लावर्स के परिवहन में किया जाता है।
मुख्य बिंदु 12
टेरिडोफाइटा प्रथम संवहनी (जाइलम ट्रैकिएड्स व फ्लोएम सीव कोशिकाएं) स्थलीय पादप हैं; इनका मुख्य स्वतंत्र पौधा द्विगुणित बीजाणुद्भिद् (2n) होता है।
मुख्य बिंदु 13
टेरिडोफाइटा के बीजाणु अंकुरित होकर एक छोटा, बहुकोशिकीय, स्वतंत्र प्रकाशसंश्लेषी थैलस बनाते हैं जिसे प्रोथैलस (Prothallus) कहते हैं।
मुख्य बिंदु 14
सिलैजिनेला व साल्वीनिया में विषमबीजाणुकता (Heterospory - लघुबीजाणु व गुरुबीजाणु) तथा मादा युग्मकोद्भिद् का जनक पादप पर बने रहना बीज प्रकृति की पूर्वगामी अवस्था है।
मुख्य बिंदु 15
अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म) में बीजांड अंडाशय भित्ति से ढके नहीं होते, अतः बीज नग्न होते हैं; सिकोया विश्व के सबसे ऊंचे वृक्षों में से एक है।
मुख्य बिंदु 16
पाइनस की सुई जैसी पत्तियां, मोटी क्यूटिकल तथा गर्तित रंध्र (Sunken stomata) जल हानि रोकते हैं; पाइनस में कवक मूल (माइकोराइजा) तथा साइकस में प्रवालाभ मूल पाई जाती हैं।
मुख्य बिंदु 17
जिम्नोस्पर्म का भ्रूणपोष निषेचन से पूर्व मादा युग्मकोद्भिद् से बनता है, अतः यह सदैव अगुणित (n) होता है, जो आवृतबीजी के 3n भ्रूणपोष के विपरीत है।
मुख्य बिंदु 18
आवृतबीजी (एंजियोस्पर्म) का अनूठा लक्षण द्विनिषेचन है: संयुग्मन द्वारा 2n युग्मनज और त्रिसंलयन द्वारा 3n प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN) बनता है।
मुख्य बिंदु 19
पादपों में अगुणितकी (स्पाइरोगाइरा), द्विगुणितकी (जिम्नोस्पर्म, एंजियोस्पर्म, फ्यूकस), तथा अगुणित-द्विगुणितकी (ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, एक्टोकार्पस) जीवन चक्र पाए जाते हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
बेंथम एवं हूकर के बीजीय पादप वर्गीकरण को 'प्राकृतिक' क्यों कहा जाता है, 'जातिवृत्तीय' क्यों नहीं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि यह बाह्य व आंतरिक शारीर, ऊतकविज्ञान, भ्रूणविज्ञान तथा पादप रसायन पर आधारित है। किंतु यह जातिवृत्तीय नहीं है क्योंकि इसमें पादपों को उनके विकासवादी क्रम में नहीं रखा गया (जैसे जिम्नोस्पर्म को डाइकॉट्स और मोनोकॉट्स के बीच रखा गया जो विकासवादी दृष्टि से अनुचित है)।
2
बीजाणु प्रकीर्णन में मॉस लिवरवर्ट की तुलना में अधिक उन्नत क्यों हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मॉस के कैप्सूल के मुख पर 16 बाहरी व 16 भीतरी पेरिस्टोम दांत होते हैं जो वायुमंडलीय नमी के अनुसार संवेदनशील रूप से खुलते-बंद होते हैं और बीजाणुओं को धीरे-धीरे दूर तक बिखेरते हैं, जबकि लिवरवर्ट में केवल इलेटर द्वारा एक झटके में विस्फोट होता है।
3
सर्सिनेट वर्नेशन (कुंडलित विन्यास) क्या है और यह किन पादपों में पाया जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: कोमल तरुण पत्तियों का घड़ी के स्प्रिंग की भांति आधार से शीर्ष की ओर कुंडलित रहने का विन्यास सर्सिनेट वर्नेशन कहलाता है, जो कोमल वर्धनशील शीर्ष को क्षति से बचाता है। यह फर्न तथा साइकस में स्पष्ट दिखाई देता है।
4
टेरिडोफाइटा पादप विश्व के विस्तृत भूभाग पर व्यापक रूप से क्यों नहीं फैल सके?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि इनके युग्मकोद्भिद् प्रोथैलस में क्यूटिकल व संवहन ऊतक नहीं होते जिससे वे शुष्कता सहन नहीं कर सकते। सबसे बड़ा कारण यह है कि इनके कशाभिक शुक्राणुओं को तैरकर स्त्रीधानी तक पहुंचने हेतु जल की बाह्य परत अनिवार्य होती है।
5
पाइनस के बीज अंकुरण हेतु कवक मूल (Mycorrhiza) का होना क्यों अनिवार्य है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पाइनस की जड़ों में मूलरोम नहीं होते या विरल होते हैं। कवक तंतु मिट्टी से जल व खनिजों (विशेषकर फास्फोरस) का अवशोषण कर पौधे को देते हैं; कवक के बिना पाइनस का बीज अंकुरित ही नहीं हो सकता।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

ऑनलाइन CBT टेस्ट देकर तैयारी का मूल्यांकन करें

झारखण्ड बोर्ड परीक्षा पैटर्न पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्नों का ऑनलाइन टेस्ट दें। तुरंत परिणाम, समय विश्लेषण और प्रत्येक प्रश्न का विस्तृत हल प्राप्त करें।

कक्षा 11 Biology के सभी अध्याय

अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

AI अध्ययन मित्र

त्वरित शंका समाधान

पादप जगत में कोई संदेह या प्रश्न है? हमारे AI अध्ययन मित्र से तुरंत समझें।