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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 10
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन

कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय सजीवों में आनुवंशिक सामग्री के द्विगुणन, कोशिकीय वृद्धि तथा संतति कोशिकाओं के निर्माण के आणविक व कोशिकीय प्रक्रमों का गहन विवरण प्रस्तुत करता है। अध्याय का प्रारंभ यूकेरियोटिक कोशिका चक्र के चक्रीय चरणों—दीर्घकालिक अंतरावस्था (G1, S तथा G2 प्रावस्थाएं) तथा संक्षिप्त M प्रावस्था (विभाजन प्रावस्था)—के विश्लेषण से होता है। वयस्क ऊतकों में कोशिका विभाजन से विलग रहने वाली G0 शांत प्रावस्था के महत्व तथा साइक्लिन व साइक्लिन-निर्भर काइनेज (CDK) द्वारा नियंत्रित तीन प्रमुख चेकपॉइंट्स (G1/S प्रतिबंध बिंदु, G2/M चेकपॉइंट तथा तर्कु संयोजन चेकपॉइंट) की निगरानी क्रियाविधि स्पष्ट की गई है। समसूत्री विभाजन (माइटोसिस) की चार निरंतर प्रावस्थाओं—पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था तथा अंत्यावस्था—तथा जंतु कोशिकाओं में संकुचन खांच व पादप कोशिकाओं में फ्रैग्मोप्लास्ट-निर्मित कोशिका पट्ट द्वारा कोशिकाद्रव्य विभाजन का तुलनात्मक विवरण दिया गया है। अध्याय के द्वितीय भाग में अर्धसूत्री विभाजन (मेयोसिस) के न्यूनकारी स्वरूप, पूर्वावस्था-I की पांच विस्तृत उप-प्रावस्थाओं (तनुपट्ट, युग्मपट्ट में सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र, स्थूलपट्ट में रिकॉम्बिनेज द्वारा जीन विनिमय, द्विपट्ट में काएज्मेटा तथा पारगतिक्रम में उपांतीभवन), पश्चावस्था-I में बिना गुणसूत्रबिंदु विपाटन के समजात गुणसूत्रों के पृथक्करण तथा अर्धसूत्री-II के समतुल्य विभाजन का विश्लेषण किया गया है। अंत में गुणसूत्र संख्या व डीएनए मात्रा की गतिकी तथा आनुवंशिक विभिन्नता व जैव विकास में अर्धसूत्री विभाजन के महत्व का निरूपण किया गया है।

क्या आपने कभी सोचा है?

प्रत्येक बहुकोशिकीय जीव का जीवन केवल एक सूक्ष्म निषेचित अंड—युग्मनज (Zygote)—से प्रारंभ होता है, जिसका आकार सुई की नोक जितना होता है। लगभग 45 समसूत्री विभाजनों के उपरांत वही एकल कोशिका 37 ट्रिलियन से अधिक कोशिकाओं वाले एक वयस्क मानव शरीर में बदल जाती है, और प्रत्येक कोशिका में समान 46 गुणसूत्र होते हैं। परंतु अगली पीढ़ी को जन्म देने के लिए जनन कोशिकाएं ऐसा कौन सा अद्वितीय विभाजन करती हैं जिससे माता-पिता के जीन पुनर्योजित हो जाते हैं और संसार का कोई भी बच्चा अपने सहोदर के बिल्कुल समान नहीं होता?

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

कोशिका चक्र नियंत्रण का विफल होना कैंसर (कर्क रोग) की उत्पत्ति का मुख्य कारण है; जब p53 या रेटिनोब्लास्टोमा (Rb) जैसे ट्यूमर दमनकारी जीन उत्परिवर्तित हो जाते हैं, तो क्षतिग्रस्त डीएनए वाली कोशिकाएं G1/S चेकपॉइंट को पार कर अनियंत्रित विभाजन करने लगती हैं जिससे दुर्दम ट्यूमर बनते हैं। आधुनिक कैंसर कीमोथेरेपी में प्रयुक्त दवाएं कोशिका विभाजन की विशिष्ट प्रावस्थाओं को लक्षित करती हैं; जैसे टैक्सोल और विनका एल्कलॉइड्स तर्कु तंतुओं के निर्माण को रोकते हैं। प्रजनन चिकित्सा में अर्धसूत्री विभाजन के समय पश्चावस्था में गुणसूत्रों का अवियोजन (Non-disjunction) होने से डाउन सिंड्रोम (ट्राइसोमी 21), टर्नर सिंड्रोम और क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम जैसी घातक गुणसूत्रीय असामान्यताएं उत्पन्न होती हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • कोशिका विज्ञान (अध्याय 8): क्रोमैटिन जालिका, न्यूक्लियोसोम, गुणसूत्रबिंदु (सेंट्रोमियर), तारककाय (सेंट्रोसोम) तथा सूक्ष्मनलिकाएं (माइक्रोट्यूब्यूल्स)
  • जैव अणु (अध्याय 9): डीएनए द्विकुंडली, पूरक क्षारक युग्मन तथा प्रोटीन का फॉस्फोराइलेशन
  • सामान्य आनुवंशिकी: समजात गुणसूत्र युग्म, द्विगुणित (2n) तथा अगुणित (n) जीनोम की अवधारणा

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 कोशिका चक्र: अवधारणा, प्रावस्थाएं (...
2 समसूत्री विभाजन (कैरियोकाइनेसिस): प...
3 कोशिकाद्रव्य विभाजन (जंतु बनाम पादप...
4 अर्धसूत्री-I (न्यूनकारी विभाजन): पू...
5 अर्धसूत्री-II (समतुल्य विभाजन), प्र...
6 समसूत्रण बनाम अर्धसूत्रण की तुलना,...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

कोशिका चक्र: अवधारणा, प्रावस्थाएं (G1, S, G2, M), G0 शांत प्रावस्था व चेकपॉइंट्स

1. कोशिका चक्र की संकल्पना एवं चक्र काल

कोशिका विभाजन समस्त सजीवों का आधारभूत लक्षण है। 1855 में रुडोल्फ विरचो ने कहा था—Omnis cellula-e cellula (पूर्ववर्ती कोशिकाओं से ही नई कोशिकाओं की उत्पत्ति होती है)। वह समन्वित एवं सुव्यवस्थित आनुक्रमिक प्रक्रम जिसके द्वारा कोशिका अपने जीनोम का द्विगुणन करती है, अन्य कोशिकीय घटकों का संश्लेषण करती है और अंततः दो संतति कोशिकाओं में विभाजित होती है, कोशिका चक्र (Cell Cycle) कहलाता है।

  • चक्र काल ($T_g$): एक पूर्ण कोशिका चक्र की अवधि विभिन्न जीवों में भिन्न होती है। संवर्धन में मानव कोशिका अपना एक चक्र लगभग 24 घंटे में पूरा करती है। इसके विपरीत, एकल-कोशिकीय यीस्ट (Saccharomyces cerevisiae) मात्र 90 मिनट में चक्र पूरा कर लेती है।
  • दो मुख्य प्रावस्थाएं:
    • अंतरावस्था (Interphase / तैयारी प्रावस्था): दो निरंतर M प्रावस्थाओं के बीच का समय। इस दौरान कोशिका उपापचयी रूप से अत्यधिक सक्रिय रहकर विभाजन की तैयारी करती है और यह कुल चक्र का 95% से अधिक समय (मानव में लगभग 23 घंटे) लेती है।
    • M प्रावस्था (Mitosis / विभाजन प्रावस्था): यह अत्यंत संक्षिप्त व नाटकीय प्रावस्था (लगभग 1 घंटा) है, जिसमें केंद्रक विभाजन (कैरियोकाइनेसिस) व कोशिकाद्रव्य विभाजन (साइटोकाइनेसिस) होता है।
2. अंतरावस्था की उप-प्रावस्थाएं ($G_1, S, G_2$) एवं $G_0$ शांत प्रावस्था
  • $G_1$ प्रावस्था (प्रथम अंतराल प्रावस्था / First Gap):
    • समसूत्री विभाजन की समाप्ति और डीएनए प्रतिकृतियन के प्रारंभ के बीच का अंतराल।
    • कोशिका उपापचयी रूप से अति-सक्रिय रहती है, निरंतर विभिन्न RNA, एंजाइम प्रोटीन बनाती है तथा कोशिकांगों (माइटोकॉन्ड्रिया, राइबोसोम) की संख्या बढ़ाती है।
    • कोशिका का आयतन बढ़ता है। गुणसूत्र संख्या और डीएनए की मात्रा स्थिर ($2n$ तथा $2C$) रहती है।
  • $S$ प्रावस्था (संश्लेषण प्रावस्था / Synthesis Phase):
    • इस प्रावस्था में केंद्रक में डीएनए प्रतिकृतियन (Replication) होता है। डीएनए की मात्रा दोगुनी होकर $2C o 4C$ हो जाती है।
    • अति-महत्वपूर्ण नियम: दोनों प्रतिकृत सहअर्धगुणसूत्र एक ही सामान्य गुणसूत्रबिंदु (Centromere) से जुड़े रहते हैं, अतः गुणसूत्रों की संख्या अपरिवर्तित ($2n$) रहती है। जैसे मानव कोशिका में S प्रावस्था से पहले भी 46 गुणसूत्र होते हैं और S प्रावस्था के बाद भी 46 गुणसूत्र ही रहते हैं।
    • जंतु कोशिकाओं में इसी दौरान कोशिकाद्रव्य में तारककेंद्र (Centriole) का द्विगुणन होता है तथा नए डीएनए को लपेटने के लिए हिस्टोन प्रोटीन संश्लेषित होते हैं।
  • $G_2$ प्रावस्था (द्वितीय अंतराल प्रावस्था / Second Gap):
    • डीएनए प्रतिकृतियन की समाप्ति और समसूत्रण के प्रारंभ के बीच की प्रावस्था।
    • तर्कु तंतु निर्माण हेतु आवश्यक ट्यूबुलिन प्रोटीन तथा ATP का संश्लेषण होता है। कोशिका में $2n$ गुणसूत्र तथा $4C$ डीएनए रहता है।
  • $G_0$ शांत प्रावस्था (Quiescent / Resting Stage):
    • वयस्क जंतुओं की कई कोशिकाएं आगे विभाजित नहीं होतीं (जैसे हृदय पेशी कोशिकाएं, तंत्रिका कोशिकाएं)।
    • ये कोशिकाएं $G_1$ प्रावस्था से बाहर निकलकर एक अक्रियाशील शांत प्रावस्था में चली जाती हैं जिसे $G_0$ शांत प्रावस्था कहते हैं।
    • कोशिकाएं उपापचयी रूप से जीवित व कार्यात्मक रहती हैं, परंतु ऊतक क्षति की मरम्मत या विशिष्ट वृद्धि संकेत के बिना विभाजित नहीं होतीं।
3. आणविक नियमन: साइक्लिन, CDKs एवं तीन प्रमुख चेकपॉइंट्स

कोशिका चक्र की दिशा एकदिशीय होती है और इसे चेकपॉइंट्स (Checkpoints) द्वारा सख्ती से नियंत्रित किया जाता है:

  1. $G_1/S$ चेकपॉइंट (प्रतिबंध बिंदु / START): साइक्लिन D-CDK4/6 और साइक्लिन E-CDK2 द्वारा नियंत्रित। यह कोशिका आकार, पोषण और डीएनए क्षति की जांच करता है। यदि डीएनए क्षतिग्रस्त है, तो ट्यूमर दमनकारी प्रोटीन p53 कोशिका चक्र को रोक देता है ताकि मरम्मत हो सके; विफल रहने पर कोशिका की ऐपोप्टोसिस (मृत्यु) करा देता है।
  2. $G_2/M$ चेकपॉइंट: साइक्लिन B-CDK1 (परिपक्वता प्रेरक कारक, MPF) द्वारा संचालित। यह सुनिश्चित करता है कि डीएनए प्रतिकृतियन 100% पूर्ण और दोषरहित हुआ है या नहीं।
  3. तर्कु संयोजन चेकपॉइंट (SAC / Spindle Assembly Checkpoint): मध्यावस्था में कार्य करता है। यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक गुणसूत्र का काइनेटोकोर दोनों ध्रुवों के तर्कु तंतुओं से सही ढंग से बंधा है या नहीं, जिससे पश्चावस्था में गुणसूत्र अवियोजन न हो।

समसूत्री विभाजन (कैरियोकाइनेसिस): पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था व अंत्यावस्था

1. समसूत्री विभाजन की प्रकृति (समविभाजन)

1879 में वाल्थर फ्लेमिंग ने समसूत्री विभाजन का विस्तृत अध्ययन किया और 'माइटोसिस' शब्द दिया। इसमें मातृ कोशिका के गुणसूत्रों की संख्या व आनुवंशिक गुण संतति कोशिकाओं में समान बने रहते हैं, इसलिए इसे समविभाजन (Equational Division) कहते हैं ($2n o 2n$)। यह मुख्य रूप से द्विगुणित कायिक कोशिकाओं में होता है।

2. केंद्रक विभाजन की चार निरंतर प्रावस्थाएं
क. पूर्वावस्था (Prophase - संघनन काल)
  • अंतरावस्था के पश्चात यह पहली प्रावस्था है। क्रोमैटिन जालिका का संघनन प्रारंभ होता है और गुणसूत्र स्पष्ट रूप में दिखाई देने लगते हैं।
  • प्रत्येक गुणसूत्र लंबवत दो सहअर्धगुणसूत्रों (Sister chromatids) का बना दिखाई देता है जो गुणसूत्रबिंदु (Centromere) पर जुड़े होते हैं।
  • तारककेंद्र विपरीत ध्रुवों की ओर गति करते हैं। तारककेंद्र से निकलने वाली तारकीय किरणों को एस्टर (Aster) कहते हैं। दो एस्टर और तर्कु तंतु मिलकर तर्कु उपकरण (Mitotic apparatus) बनाते हैं (पादपों में सेंट्रिओल न होने से अनास्ट्रल और जंतुओं में एम्फियास्ट्रल तर्कु होता है)।
  • पूर्वावस्था के अंत में केंद्रिका, केंद्रक झिल्ली, गॉल्जी उपकरण तथा अंतःप्रद्रव्यी जालिका पूर्णतः विलीन हो जाते हैं।
ख. मध्यावस्था (Metaphase - संरेखण काल)
  • केंद्रक झिल्ली के पूर्ण विलोपन से यह प्रावस्था शुरू होती है। गुणसूत्रों का संघनन चरमोत्कर्ष पर होता है; गुणसूत्र सबसे छोटे, मोटे व स्पष्ट दिखते हैं।
  • गुणसूत्रबिंदु की सतह पर काइनेटोकोर (Kinetochore) नामक प्रोटीन चक्रिका बनती है, जिससे दोनों ध्रुवों के तर्कु तंतु जुड़ते हैं।
  • सभी गुणसूत्र कोशिका के मध्य में एक समतल पर व्यवस्थित होकर मध्यावस्था पट्टिका (Metaphase plate) बनाते हैं।
  • आकारिकीय महत्व: गुणसूत्रों के अत्यधिक संघनित होने और एक तल में संरेखित होने के कारण मध्यावस्था गुणसूत्र गणना, लंबाई मापन व कैरियोटाइप के अध्ययन हेतु सर्वोत्तम प्रावस्था है।
ग. पश्चावस्था (Anaphase - गति काल)
  • समसूत्री विभाजन की सबसे छोटी प्रावस्था। प्रत्येक गुणसूत्र का गुणसूत्रबिंदु एक साथ लंबाई में विभाजित हो जाता है।
  • दोनों सहअर्धगुणसूत्र अलग होकर स्वतंत्र संतति गुणसूत्र (Daughter chromosomes) बन जाते हैं।
  • काइनेटोकोर सूक्ष्मनलिकाओं के संकुचन से संतति गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर गति करने लगते हैं।
  • गुणसूत्रबिंदु ध्रुव की ओर आगे रहता है और भुजाएं पीछे छूटती हैं। गुणसूत्रबिंदु की स्थिति के आधार पर गुणसूत्र विशिष्ट आकृतियां बनाते हैं:
    • V-आकृति: मध्यकेंद्री (Metacentric - केंद्र में गुणसूत्रबिंदु, दोनों भुजाएं बराबर)।
    • L-आकृति: उप-मध्यकेंद्री (Sub-metacentric - एक भुजा थोड़ी छोटी, एक बड़ी)।
    • J-आकृति: अग्रकेंद्री (Acrocentric - गुणसूत्रबिंदु सिरे के पास, एक भुजा अत्यंत छोटी)।
    • I-आकृति: अंत्यकेंद्री (Telocentric - गुणसूत्रबिंदु एकदम सिरे पर)।
घ. अंत्यावस्था (Telophase - पुनर्गठन काल)
  • संतति गुणसूत्र ध्रुवों पर पहुंच जाते हैं और जल अवशोषित कर पुनः लंबे, पतले क्रोमैटिन जाल में बदल जाते हैं।
  • दोनों गुणसूत्र समूहों के चारों ओर नई केंद्रक झिल्ली बन जाती है।
  • NOR क्षेत्र से केंद्रिका पुनः प्रकट हो जाती है। गॉल्जी उपकरण व अंतःप्रद्रव्यी जालिका का पुनर्गठन हो जाता है। तर्कु तंतु लुप्त हो जाते हैं।

कोशिकाद्रव्य विभाजन (जंतु बनाम पादप), समसूत्रण का महत्व व सूत्री विष

1. कोशिकाद्रव्य विभाजन: जंतु खांच बनाम पादप कोशिका पट्ट

केंद्रक विभाजन के उपरांत कोशिकाद्रव्य व कोशिकांगों के विभाजन को कोशिकाद्रव्य विभाजन (Cytokinesis) कहते हैं:

प्राचल जंतु कोशिकाद्रव्य विभाजन पादप कोशिकाद्रव्य विभाजन
विभाजन विधि प्लाज्मा झिल्ली में खांच (Cleavage furrow) बनने से। गॉल्जी पुटिकाओं से कोशिका पट्ट (Cell plate) बनने से।
दिशा अभिकेंद्रीय (Centripetal): परिधि से खांच भीतर केंद्र की ओर बढ़ती है। अपकेंद्रीय (Centrifugal): केंद्र से शुरू होकर बाहरी भित्ति की ओर बढ़ता है।
कोशिकीय तंत्र एक्टिन व मायोसिन प्रोटीन का संकुचनशील वलय कार्य करता है। सूक्ष्मनलिकाओं व गॉल्जी पुटिकाओं का फ्रैग्मोप्लास्ट कार्य करता है।
भित्ति का प्रभाव दृढ़ भित्ति नहीं होती, अतः झिल्ली आसानी से अंतर्वलित होती है। अवितान्य दृढ़ सेलूलोज़ भित्ति होने से खांच बनना असंभव है।
निर्मित संरचना खांच गहरी होकर कोशिका को दो स्वतंत्र कोशिकाओं में बांटती है। कोशिका पट्ट पेक्टेटयुक्त मध्य पटलिका (Middle lamella) बनाता है।
2. कोशिकाद्रव्य विभाजन न होने का परिणाम: सिंसीशियम व संकोशिकी

यदि बार-बार केंद्रक विभाजन हो परंतु कोशिकाद्रव्य विभाजन न हो, तो बहुकेंद्रकी संरचना बन जाती है:

  • सिंसीशियम (Syncytium): बहुकेंद्रकी जंतु संरचना (जैसे कंकाल पेशी तंतु)।
  • संकोशिकी (Coenocyte): बहुकेंद्रकी पादप या कवक संरचना (जैसे नारियल का तरल भ्रूणपोष, Rhizopus कवकजाल)।
3. समसूत्री विभाजन का जैविक महत्व
  1. आनुवंशिक स्थिरता: मातृ कोशिका के समान गुणसूत्र संख्या ($2n$) व आनुवंशिक गुण संतति में बनाए रखता है।
  2. कायिक वृद्धि व विकास: एकल युग्मनज से विभाजित होकर खरबों कोशिकाओं वाला वयस्क शरीर बनता है।
  3. ऊतक मरम्मत व पुनर्जनन: घिसी हुई व मृत कोशिकाओं का प्रतिस्थापन (जैसे त्वचा की ऊपरी परत, आंत्र उपकला तथा अस्थिमज्जा में प्रति सेकंड 20 लाख RBC का निर्माण)।
  4. अलैंगिक जनन: एकल-कोशिकीय जीवों (अमीबा) तथा पादपों में कायिक प्रवर्धन का साधन।
4. सूत्री विष (Mitotic Poisons)
  • कोलचिसीन (Colchicine): Colchicum autumnale से प्राप्त क्षारक जो ट्यूबुलिन बहुलकीकरण रोककर तर्कु तंतु निर्माण रोकता है। विभाजन मध्यावस्था में रुक जाता है और गुणसूत्र दोगुने होकर बहुगुणिता ($2n o 4n$) उत्पन्न होती है। पादप प्रजनन में उपयोगी।
  • विनक्रिस्टीन व विनब्लास्टीन: सदाबहार पौधे से प्राप्त कैंसर-रोधी औषधियां जो तर्कु नष्ट कर ट्यूमर विभाजन रोकती हैं।

अर्धसूत्री-I (न्यूनकारी विभाजन): पूर्वावस्था-I की उप-प्रावस्थाएं, पश्चावस्था-I व अंतराभाजन

1. अर्धसूत्री विभाजन की मूलभूत प्रकृति

अर्धसूत्री विभाजन द्विगुणित जनन कोशिकाओं (Meiocytes) में होने वाला विशिष्ट विभाजन है जिससे युग्मक बनते हैं:

  • इसमें एक बार डीएनए प्रतिकृतियन के पश्चात दो निरंतर केंद्रक विभाजन (अर्धसूत्री-I व II) होते हैं।
  • समजात गुणसूत्रों का युग्मन (सिनेप्सिस) तथा जीन विनिमय (क्रॉसिंग ओवर) होता है।
  • गुणसूत्र संख्या आधी ($2n o n$) रह जाती है और चार अगुणित संतति कोशिकाएं बनती हैं।
  • अर्धसूत्री-I वास्तविक न्यूनकारी विभाजन (Reductional Division) है ($2n o n$)।
  • अर्धसूत्री-II एक समतुल्य विभाजन (Equational Division) है ($n o n$)।
2. पूर्वावस्था-I की पांच विस्तृत उप-प्रावस्थाएं
क. तनुपट्ट (Leptotene - पतले धागे की प्रावस्था)
  • क्रोमैटिन जालिका संघनित होकर पतले धागों के रूप में स्पष्ट दिखाई देने लगती है।
  • गुणसूत्रों पर मणिका के समान क्रोमोमियर पाए जाते हैं।
  • जंतु कोशिकाओं में गुणसूत्र तारककाय की ओर झुककर गुलदस्ता अवस्था (Bouquet stage) बनाते हैं।
ख. युग्मपट्ट (Zygotene - युग्मन काल)
  • समजात गुणसूत्र (एक मातृक व एक पैतृक) लंबाई में सटीकता से जोड़ा बनाते हैं, जिसे सिनेप्सिस (Synapsis / युग्मन) कहते हैं।
  • यह त्रिपक्षीय प्रोटीन सम्मिश्र सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र (Synaptonemal Complex) द्वारा संपन्न होता है।
  • इस जोड़े को द्विसंयोजी (Bivalent) या चतुष्क (Tetrad) कहते हैं। द्विसंयोजियों की संख्या अगुणित गुणसूत्र संख्या ($n$) के बराबर होती है।
ग. स्थूलपट्ट (Pachytene - मोटे धागे की प्रावस्था)
  • पूर्वावस्था-I का सबसे लंबा व महत्वपूर्ण चरण। गुणसूत्रों की चारों भुजाएं स्पष्ट दिखाई देती हैं।
  • जीन विनिमय (Crossing Over): समजात गुणसूत्रों के गैर-सहअर्धगुणसूत्रों (Non-sister chromatids) के मध्य आनुवंशिक खंडों की अदला-बदली होती है।
  • यह रिकॉम्बिनेशन नोड्यूल्स पर रिकॉम्बिनेज (Recombinase) एंजाइम द्वारा संपन्न होता है और नए आनुवंशिक पुनर्योजन बनाता है।
घ. द्विपट्ट (Diplotene - दो धागों की प्रावस्था)
  • सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र का विघटन हो जाता है।
  • समजात गुणसूत्र अलग होने लगते हैं, परंतु क्रॉसिंग ओवर वाले स्थानों पर जुड़े रहते हैं।
  • इन X-आकार के जुड़े संगम स्थलों को काएज्मेटा (Chiasmata) कहते हैं।
  • डिक्टियोटीन अवस्था: मानव मादा के अंडक में द्विपट्ट अवस्था भ्रूणावस्था से यौवनारंभ तक कई वर्षों तक सुप्त रह सकती है।
ङ. पारगतिक्रम (Diakinesis - अंतिम चरण)
  • पूर्वावस्था-I का समापन। गुणसूत्र सर्वाधिक संघनित हो जाते हैं।
  • काएज्मेटा का उपांतीभवन (Terminalization): काएज्मेटा मध्य से खिसककर गुणसूत्र के सिरों की ओर चले जाते हैं।
  • केंद्रिका और केंद्रक झिल्ली पूर्णतः विलीन हो जाती है तथा तर्कु उपकरण बन जाता है।
3. मध्यावस्था-I, पश्चावस्था-I, अंत्यावस्था-I व अंतराभाजन
  • मध्यावस्था-I: द्विसंयोजी गुणसूत्र मध्य में दो समानांतर पंक्तियों में संरेखित होकर दोहरी मध्यावस्था पट्टिका बनाते हैं।
  • पश्चावस्था-I (न्यूनकारी घटना):
    • समजात गुणसूत्र अलग होकर विपरीत ध्रुवों की ओर गति करते हैं।
    • मुख्य नियम: गुणसूत्रबिंदु विभाजित नहीं होता! सहअर्धगुणसूत्र जुड़े रहते हैं। इससे गुणसूत्र संख्या $2n o n$ आधी हो जाती है।
  • अंत्यावस्था-I: अगुणित गुणसूत्रों के चारों ओर केंद्रक झिल्ली बनती है। कोशिकाद्रव्य विभाजन से दो अगुणित कोशिकाओं का द्विक (Dyad) बनता है ($n$ गुणसूत्र, $2C$ डीएनए)।
  • अंतराभाजन (Interkinesis): अर्धसूत्री-I व II के बीच का संक्षिप्त विराम काल। तारककेंद्र द्विगुणित होता है परंतु डीएनए प्रतिकृतियन नहीं होता।

अर्धसूत्री-II (समतुल्य विभाजन), प्रावस्थाएं एवं अगुणित चतुष्क निर्माण

1. अर्धसूत्री-II की प्रकृति (समतुल्य विभाजन)

अर्धसूत्री-II अंतराभाजन के तुरंत बाद प्रारंभ होता है। यह एक समतुल्य विभाजन है जो सामान्य समसूत्रण के समान होता है, परंतु यह एक अगुणित ($n$) कोशिका में होता है। इसका उद्देश्य क्रॉसिंग ओवर द्वारा रूपांतरित सहअर्धगुणसूत्रों को अलग करना है:

2. अर्धसूत्री-II की प्रावस्थाएं
  • पूर्वावस्था-II: केंद्रक झिल्ली व केंद्रिका पुनः विलीन हो जाती हैं। गुणसूत्र संघनित होते हैं और अर्धसूत्री-I के लंबवत नया तर्कु बनता है।
  • मध्यावस्था-II: अगुणित गुणसूत्र मध्य में एकल मध्यावस्था पट्टिका पर व्यवस्थित होते हैं। काइनेटोकोर से तर्कु तंतु जुड़ते हैं।
  • पश्चावस्था-II: प्रत्येक गुणसूत्र का गुणसूत्रबिंदु अनुदैर्घ्य रूप से विभाजित हो जाता है। दोनों सहअर्धगुणसूत्र संतति गुणसूत्र बनकर विपरीत ध्रुवों की ओर चले जाते हैं।
  • अंत्यावस्था-II व कोशिकाद्रव्य विभाजन: चारों गुणसूत्र समूहों के चारों ओर केंद्रक झिल्ली व केंद्रिका बन जाती है। कोशिकाद्रव्य विभाजन द्वारा चार अगुणित ($n$) संतति कोशिकाओं का चतुष्क (Tetrad) बन जाता है, जिनमें प्रत्येक में $1C$ डीएनए होता है।

समसूत्रण बनाम अर्धसूत्रण की तुलना, गुणसूत्र गतिकी व विकासीय महत्व

1. समसूत्री बनाम अर्धसूत्री विभाजन की तुलना
प्राचल समसूत्री विभाजन (Mitosis) अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis)
स्थान कायिक कोशिकाएं (Somatic cells)। जनन मातृ कोशिकाएं (Meiocytes)।
विभाजन संख्या एक बार विभाजन (1 कैरियोकाइनेसिस + 1 साइटोकाइनेसिस)। दो निरंतर विभाजन (अर्धसूत्री-I व अर्धसूत्री-II)।
डीएनए प्रतिकृतियन विभाजन से पूर्व S प्रावस्था में एक बार। अर्धसूत्री-I से पूर्व S प्रावस्था में एक बार (अंतराभाजन में नहीं)।
पूर्वावस्था की जटिलता सरल, संक्षिप्त, कोई उप-प्रावस्था नहीं। पूर्वावस्था-I अत्यंत लंबी और 5 उप-प्रावस्थाओं में विभाजित।
सिनेप्सिस व द्विसंयोजी अनुपस्थित; समजात गुणसूत्र नहीं जुड़ते। युग्मपट्ट में सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र द्वारा जुड़ते हैं।
क्रॉसिंग ओवर व काएज्मेटा सामान्यतः नहीं होता। स्थूलपट्ट में क्रॉसिंग ओवर तथा द्विपट्ट में काएज्मेटा बनते हैं।
पश्चावस्था व्यवहार गुणसूत्रबिंदु विभाजित होता है; सहअर्धगुणसूत्र अलग होते हैं। पश्चावस्था-I में गुणसूत्रबिंदु नहीं टूटता; पश्चावस्था-II में टूटता है।
संतति कोशिकाएं व प्लॉइडी 2 द्विगुणित ($2n$) संतति कोशिकाएं। 4 अगुणित ($n$) संतति कोशिकाएं।
आनुवंशिक समानता संतति कोशिकाएं मातृ कोशिका की हूबहू क्लोन होती हैं। क्रॉसिंग ओवर के कारण संतति कोशिकाएं आनुवंशिक रूप से भिन्न होती हैं।
2. गुणसूत्र संख्या एवं DNA मात्रा गतिकी (मानव कोशिका)
कोशिका चक्र प्रावस्था गुणसूत्र संख्या अर्धगुणसूत्र संख्या प्लॉइडी स्तर डीएनए मात्रा
$G_1$ प्रावस्था 46 46 द्विगुणित ($2n$) $2C$
$S$ प्रावस्था (समाप्ति) 46 92 द्विगुणित ($2n$) $4C$
$G_2$ प्रावस्था 46 92 द्विगुणित ($2n$) $4C$
समसूत्री मध्यावस्था 46 92 द्विगुणित ($2n$) $4C$
समसूत्री संतति कोशिका 46 46 द्विगुणित ($2n$) $2C$
अर्धसूत्री-I मध्यावस्था-I 46 (23 द्विसंयोजी) 92 द्विगुणित ($2n$) $4C$
अर्धसूत्री-I संतति कोशिका 23 46 अगुणित ($n$) $2C$
अर्धसूत्री युग्मक (गैमैट) 23 23 अगुणित ($n$) $1C$
3. अर्धसूत्री विभाजन का विकासीय महत्व
  • गुणसूत्र संख्या की स्थिरता: यदि युग्मक समसूत्रण ($2n$) से बनते, तो प्रत्येक पीढ़ी में गुणसूत्र दोगुने होते जाते ($2n o 4n o 8n$)। अर्धसूत्रण अगुणित युग्मक बनाकर निषेचन उपरांत प्रजाति की गुणसूत्र संख्या ($n + n = 2n$) को अक्षुण्ण रखता है।
  • आनुवंशिक विभिन्नताओं का सृजन: अर्धसूत्रण दो प्रकार से आनुवंशिक विविधता लाता है:
    • क्रॉसिंग ओवर: स्थूलपट्ट में सहलग्न जीनों का पुनर्योजन।
    • स्वतंत्र अपव्यूहन: मध्यावस्था-I में मातृक व पैतृक गुणसूत्रों का यादृच्छिक संरेखण ($2^n = 2^{23} pprox 84$ लाख प्रकार के संभावित युग्मक संयोजन मानव में संभव हैं)।
  • प्राकृतिक वरण व विकास का आधार: अर्धसूत्रण द्वारा उत्पन्न विभिन्नताएं जीवों को बदलते परिवेश में अनुकूलित होने में सहायता करती हैं और नई जातियों की उत्पत्ति (Speciation) का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

कोशिका चक्र में गुणसूत्र संख्या एवं DNA मात्रा गतिकी
G1: 2n/2C, S: 2n/4C, G2: 2n/4C, Mitosis: 2n/2C, Meiosis I: n/2C, Meiosis II: n/1C
DNA प्रतिकृतियन केवल S प्रावस्था में होता है; समसूत्री पश्चावस्था में गुणसूत्रबिंदु के विपाटन से गुणसूत्र संख्या क्षणिक रूप से 4n हो जाती है।
समसूत्री कोशिका विभाजन संख्या वृद्धि सूत्र
$$N = 2^n$$
एक एकल कोशिका से N कोशिकाएं बनाने के लिए कुल ठीक (N - 1) समसूत्री विभाजनों की आवश्यकता होती है।
आवृतबीजी पादपों में बीज/अनाज निर्माण हेतु अर्धसूत्री विभाजन गणना
Divisions = N (Megaspores) + N/4 (Microspores) = 5N/4
1 पराग मातृ कोशिका से 4 परागकण बनते हैं; परंतु 1 गुरुबीजाणु मातृ कोशिका से केवल 1 सक्रिय अंड बनता है (3 नष्ट हो जाते हैं)।
अर्धसूत्री द्विसंयोजी (बाइवैलेंट) एवं अर्धगुणसूत्र गणना
Bivalents = 2n / 2 = n; Total Tetrad Chromatids = 4n
मानव कोशिका में 2n = 46 होने पर युग्मपट्ट में 23 द्विसंयोजी (कुल 92 अर्धगुणसूत्र) बनते हैं।
पश्चावस्था में गुणसूत्रबिंदु स्थिति एवं गुणसूत्र आकृति
Metacentric = V, Sub-metacentric = L, Acrocentric = J, Telocentric = i
गति के समय गुणसूत्रबिंदु ध्रुव की ओर आगे रहता है और भुजाएं कोशिकाद्रव्य के घर्षण से पीछे छूटती हैं।
कोशिका चक्र प्रावस्थाओं की समय अवधि गणना
$$t_phase = (N_phase / N_total) * T_g$$
मानव कोशिका के 24 घंटे में: G1 लगभग 10-12 घंटे, S लगभग 6-8 घंटे, G2 लगभग 4 घंटे, M प्रावस्था लगभग 1 घंटा।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
(क) अर्धसूत्री-I की पूर्वावस्था-I की पांचों उप-प्रावस्थाओं के नाम क्रमानुसार लिखिए तथा प्रत्येक की मुख्य विशेषता बताइए। (ख) समसूत्री विभाजन की पश्चावस्था और अर्धसूत्री विभाजन की पश्चावस्था-I में अंतर स्पष्ट कीजिए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) पूर्वावस्था-I की पांच उप-प्रावस्थाएं: [3 अंक]
अर्धसूत्री-I की पूर्वावस्था-I अत्यंत लंबी व जटिल होती है, जो पांच निरंतर चरणों में विभाजित है:
1. तनुपट्ट (Leptotene): क्रोमैटिन जालिका का निर्जलीकरण व संघनन होता है, जिससे गुणसूत्र पतले लंबे धागे के समान दिखाई देने लगते हैं। इन पर मणिका के समान क्रोमोमियर पाए जाते हैं। जंतु कोशिकाओं में गुणसूत्र तारककाय की ओर एक ध्रुव पर झुककर 'गुलदस्ता अवस्था' (Bouquet stage) बनाते हैं।
2. युग्मपट्ट (Zygotene): समजात गुणसूत्रों (एक पैतृक व एक मातृक) की जोड़ियां लंबाई के साथ सटीकता से युग्मित होती हैं—इस क्रिया को सिनेप्सिस (Synapsis / युग्मन) कहते हैं। यह त्रिपक्षीय प्रोटीन सीढ़ीदार सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र (Synaptonemal Complex) द्वारा स्थिर होता है। इस युग्मित संरचना को द्विसंयोजी (Bivalent) या चतुष्क (Tetrad) कहते हैं।
3. स्थूलपट्ट (Pachytene): गुणसूत्र अधिक मोटे व स्पष्ट हो जाते हैं और चतुष्क की चारों भुजाएं स्पष्ट दिखाई देती हैं। समजात गुणसूत्रों के गैर-सहअर्धगुणसूत्रों (Non-sister chromatids) के मध्य आनुवंशिक खंडों का पारस्परिक आदान-प्रदान होता है, जिसे जीन विनिमय (Crossing Over) कहते हैं। यह क्रिया रिकॉम्बिनेज (Recombinase) एंजाइम द्वारा उत्प्रेरित होती है और नए आनुवंशिक पुनर्योजन उत्पन्न करती है।
4. द्विपट्ट (Diplotene): सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र का विघटन हो जाता है। समजात गुणसूत्र एक-दूसरे से दूर हटने लगते हैं (डिसिनेप्सिस), परंतु क्रॉसिंग ओवर वाले स्थानों पर वे आपस में जुड़े रहते हैं। इन X-आकार के संगम स्थलों को काएज्मेटा (Chiasmata) कहते हैं। कशेरुकी जंतुओं के अंडकों में यह अवस्था कई वर्षों तक सुप्त रह सकती है (डिक्टियोटीन अवस्था)।
5. पारगतिक्रम (Diakinesis): गुणसूत्र अत्यधिक संघनित हो जाते हैं। काएज्मेटा गुणसूत्रों के मध्य से खिसककर सिरों (टीलोमियर) की ओर चले जाते हैं, जिसे काएज्मेटा का उपांतीभवन (Terminalization) कहते हैं। केंद्रिका और केंद्रक झिल्ली पूर्णतः विलीन हो जाती है और तर्कु उपकरण तैयार हो जाता है।

(ख) समसूत्री पश्चावस्था बनाम अर्धसूत्री पश्चावस्था-I: [2 अंक]
लक्षणसमसूत्री पश्चावस्था (Mitotic Anaphase)अर्धसूत्री पश्चावस्था-I (Anaphase I)
गुणसूत्रबिंदु का विपाटनप्रत्येक गुणसूत्र का गुणसूत्रबिंदु अनुदैर्घ्य रूप से विभाजित होता है।गुणसूत्रबिंदु विभाजित नहीं होता; अक्षत रहता है।
पृथक्करण इकाईसहअर्धगुणसूत्र (Sister chromatids) अलग होकर संतति गुणसूत्र बनते हैं।समजात गुणसूत्रों के युग्म अलग होकर विपरीत ध्रुवों पर जाते हैं।
गुणसूत्र संख्यागुणसूत्र संख्या क्षणिक रूप से $4n$ हो जाती है; संतति कोशिकाओं में $2n$ रहती है (समविभाजन)।गुणसूत्र संख्या आधी ($2n \to n$) रह जाती है (न्यूनकारी विभाजन)।
आनुवंशिक संगठनअलग होने वाले गुणसूत्र आनुवंशिक रूप से हूबहू समान होते हैं।क्रॉसिंग ओवर के कारण अलग होने वाले गुणसूत्र आनुवंशिक रूप से पुनर्योजित व भिन्न होते हैं।
उदाहरण 2
(क) अंतरावस्था की तीनों प्रावस्थाओं (G1, S, G2) का वर्णन कीजिए तथा शांत प्रावस्था (G0) को स्पष्ट कीजिए। (ख) यदि एक द्विगुणित कोशिका में G1 प्रावस्था में गुणसूत्र संख्या 2n = 16 तथा DNA की मात्रा 20 pg है, तो निम्नलिखित में गुणसूत्र संख्या व DNA की मात्रा कितनी होगी: (i) S प्रावस्था में, (ii) G2 प्रावस्था में, (iii) समसूत्री मध्यावस्था में, तथा (iv) समसूत्रण के पश्चात प्रत्येक संतति कोशिका में? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) अंतरावस्था की उप-प्रावस्थाएं एवं G0 शांत अवस्था: [3 अंक]
अंतरावस्था कोशिका चक्र की सबसे लंबी तैयारी प्रावस्था है जो कुल समय का 95% से अधिक हिस्सा लेती है:
1. $G_1$ प्रावस्था (प्रथम अंतराल प्रावस्था): समसूत्री विभाजन और डीएनए प्रतिकृतियन के बीच का काल। कोशिका उपापचयी रूप से अत्यंत सक्रिय रहती है, निरंतर विभिन्न RNA, एंजाइम प्रोटीन बनाती है, माइटोकॉन्ड्रिया व राइबोसोम की संख्या बढ़ाती है तथा आकार में वृद्धि करती है। गुणसूत्र संख्या $2n$ और DNA मात्रा $2C$ रहती है।
2. $S$ प्रावस्था (संश्लेषण प्रावस्था): इस प्रावस्था में केंद्रक में डीएनए का प्रतिकृतियन होता है जिससे DNA की मात्रा $2C \to 4C$ दोगुनी हो जाती है। परंतु नव-निर्मित दोनों सहअर्धगुणसूत्र एक ही गुणसूत्रबिंदु से जुड़े रहने के कारण गुणसूत्र संख्या कठोरता से अपरिवर्तित ($2n$) रहती है। जंतु कोशिकाओं में साथ ही कोशिकाद्रव्य में तारककेंद्र (Centriole) का द्विगुणन होता है।
3. $G_2$ प्रावस्था (द्वितीय अंतराल प्रावस्था): डीएनए प्रतिकृतियन और समसूत्रण के बीच की तैयारी प्रावस्था। तर्कु तंतु निर्माण हेतु आवश्यक ट्यूबुलिन प्रोटीन तथा ATP का संश्लेषण होता है। कोशिका में $2n$ गुणसूत्र और $4C$ DNA होता है।
- $G_0$ शांत प्रावस्था (Quiescent Stage): वयस्क जीवों की जो कोशिकाएं आगे विभाजित नहीं होतीं (जैसे हृदय पेशी कोशिकाएं, तंत्रिका कोशिकाएं), वे $G_1$ प्रावस्था से बाहर निकलकर एक निष्क्रिय प्रावस्था में चली जाती हैं जिसे $G_0$ शांत प्रावस्था कहते हैं। ये कोशिकाएं उपापचयी रूप से पूर्णतः जीवित व सक्रिय रहती हैं, परंतु चोट लगने या विशिष्ट वृद्धि कारकों के उद्दीपन के बिना विभाजित नहीं होतीं।

(ख) गुणसूत्र संख्या व DNA मात्रा की गणना: [2 अंक]
दिया गया है: $G_1$ प्रावस्था में गुणसूत्र संख्या $= 2n = 16$; DNA मात्रा $= 2C = 20\text{ pg}$।
1. S प्रावस्था में (प्रतिकृतियन के उपरांत):
- गुणसूत्र संख्या $= 16$ ($2n$, गुणसूत्रबिंदु विभाजित नहीं हुआ)।
- DNA मात्रा $= 20\text{ pg} \times 2 = 40\text{ pg}$ ($4C$, DNA द्विगुणित)।
2. $G_2$ प्रावस्था में:
- गुणसूत्र संख्या $= 16$ ($2n$)।
- DNA मात्रा $= 40\text{ pg}$ ($4C$)।
3. समसूत्री मध्यावस्था में:
- गुणसूत्र संख्या $= 16$ ($2n$, प्रत्येक में दो सहअर्धगुणसूत्र)।
- DNA मात्रा $= 40\text{ pg}$ ($4C$)।
4. समसूत्रण के पश्चात प्रत्येक संतति कोशिका में:
- गुणसूत्र संख्या $= 16$ ($2n$, समविभाजन के कारण समान)।
- DNA मात्रा $= 20\text{ pg}$ ($2C$, मूल कायिक स्तर पर पुनः प्राप्त)।
उदाहरण 3
(क) समसूत्री विभाजन की मध्यावस्था व पश्चावस्था का वर्णन कीजिए। मध्यावस्था को गुणसूत्र आकारिकी के अध्ययन की सर्वोत्तम प्रावस्था क्यों माना जाता है? (ख) जंतु व पादप कोशिकाओं में कोशिकाद्रव्य विभाजन की तुलना कीजिए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) मध्यावस्था, पश्चावस्था एवं आकारिकीय महत्व: [3 अंक]
- मध्यावस्था (Metaphase):
1. केंद्रक झिल्ली पूर्णतः विलीन हो जाती है और गुणसूत्र कोशिका के मध्य में संरेखित होकर मध्यावस्था पट्टिका (Metaphase plate) बनाते हैं।
2. प्रत्येक गुणसूत्र के गुणसूत्रबिंदु की सतह पर स्थित प्रोटीन निर्मित चक्रिका काइनेटोकोर (Kinetochore) से दोनों ध्रुवों के तर्कु तंतु जुड़ते हैं।
3. आकारिकी अध्ययन हेतु सर्वोत्तम प्रावस्था क्यों: इस अवस्था में गुणसूत्र सर्वाधिक संघनित, छोटे व मोटे होते हैं और मध्यावस्था पट्टिका पर बिना एक-दूसरे के ऊपर चढ़े एक तल में फैले रहते हैं; अतः सूक्ष्मदर्शी में गुणसूत्र गणना, लंबाई मापन व कैरियोटाइप विश्लेषण के लिए यह सर्वोत्तम प्रावस्था है।
- पश्चावस्था (Anaphase):
1. प्रत्येक गुणसूत्र का गुणसूत्रबिंदु एक साथ लंबाई में विभाजित हो जाता है, जिससे दोनों सहअर्धगुणसूत्र अलग होकर स्वतंत्र संतति गुणसूत्र बन जाते हैं।
2. काइनेटोकोर सूक्ष्मनलिकाओं के संकुचन से संतति गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर गति करने लगते हैं।
3. गति के समय गुणसूत्रबिंदु आगे तथा भुजाएं पीछे छूटती हैं, जिससे वे गुणसूत्रबिंदु की स्थिति के अनुसार V (मध्यकेंद्री), L (उप-मध्यकेंद्री), J (अग्रकेंद्री) तथा I (अंत्यकेंद्री) आकृति बनाते हैं।

(ख) जंतु बनाम पादप कोशिकाद्रव्य विभाजन: [2 अंक]
प्राचलजंतु कोशिकाद्रव्य विभाजनपादप कोशिकाद्रव्य विभाजन
प्रक्रियाप्लाज्मा झिल्ली में खांच (Cleavage furrow) बनने से होता है।गॉल्जी पुटिकाओं द्वारा कोशिका पट्ट (Cell plate) बनने से होता है।
दिशाअभिकेंद्रीय (Centripetal): खांच परिधि से केंद्र की ओर बढ़ती है।अपकेंद्रीय (Centrifugal): पट्ट केंद्र से शुरू होकर बाहरी भित्ति की ओर बढ़ता है।
कोशिकीय घटकझिल्ली के नीचे एक्टिन व मायोसिन का संकुचनशील वलय कार्य करता है।गॉल्जी पुटिकाएं व सूक्ष्मनलिकाएं मिलकर फ्रैग्मोप्लास्ट बनाती हैं।
अंतिम संरचनाखांच गहरी होकर कोशिका को दो संतति कोशिकाओं में विभाजित कर देती है।कोशिका पट्ट पेक्टेटयुक्त मध्य पटलिका (Middle lamella) बन जाता है।
उदाहरण 4
(क) सिनेप्सिस (युग्मन) तथा क्रॉसिंग ओवर (जीन विनिमय) क्या हैं? ये अर्धसूत्रण की किन उप-प्रावस्थाओं में होते हैं तथा क्रॉसिंग ओवर में कौन सा एंजाइम भाग लेता है? (ख) काएज्मेटा क्या हैं? पारगतिक्रम में इनमें क्या परिवर्तन होता है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) सिनेप्सिस एवं क्रॉसिंग ओवर: [3 अंक]
- सिनेप्सिस (युग्मन): अर्धसूत्री-I की पूर्वावस्था-I के युग्मपट्ट (Zygotene) में समजात गुणसूत्रों (एक मातृक व एक पैतृक) का लंबाई के साथ परस्पर सटीक रूप से जोड़ा बनाना सिनेप्सिस कहलाता है। यह सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र नामक प्रोटीन सीढ़ी द्वारा संपन्न होता है। इस युग्मित जोड़े को द्विसंयोजी (Bivalent) या चतुष्क कहते हैं।
- क्रॉसिंग ओवर (जीन विनिमय): अर्धसूत्री-I के स्थूलपट्ट (Pachytene) में समजात गुणसूत्रों के गैर-सहअर्धगुणसूत्रों (Non-sister chromatids) के मध्य आनुवंशिक खंडों के पारस्परिक विनिमय को क्रॉसिंग ओवर कहते हैं।
- एंजाइम: यह प्रक्रिया एक बहु-एंजाइम सम्मिश्र रिकॉम्बिनेज (Recombinase) द्वारा उत्प्रेरित होती है, जिसमें एंडोन्यूक्लियेज व डीएनए लाइगेज सक्रियताएं होती हैं। इससे आनुवंशिक पुनर्योजन बनता है।

(ख) काएज्मेटा एवं उपांतीभवन: [2 अंक]
- काएज्मेटा (Chiasmata): द्विपट्ट (Diplotene) में सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र के घुल जाने पर समजात गुणसूत्र अलग होने लगते हैं, परंतु क्रॉसिंग ओवर वाले बिंदुओं पर जुड़े रहते हैं। इन X-आकार के जुड़े हुए संपर्क स्थलों को काएज्मेटा कहते हैं।
- पारगतिक्रम में परिवर्तन: पूर्वावस्था-I के अंतिम चरण पारगतिक्रम (Diakinesis) में काएज्मेटा गुणसूत्रों के मध्य से खिसककर सिरों (टीलोमियर) की ओर चले जाते हैं। इस प्रक्रिया को काएज्मेटा का उपांतीभवन (Terminalization of Chiasmata) कहते हैं, जिससे गुणसूत्र मध्यावस्था-I पट्टिका पर जाने के लिए तैयार हो जाते हैं।
उदाहरण 5
(क) कोलचिसीन क्या है? यह विभाजित होती कोशिका पर क्या प्रभाव डालता है और इसे 'सूत्री विष' क्यों कहा जाता है? (ख) लैंगिक जनन करने वाले जीवों में अर्धसूत्री विभाजन के तीन प्रमुख जैविक महत्व लिखिए। [2 + 3 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
(क) कोलचिसीन एवं सूत्री विष: [2 अंक]
- स्रोत एवं प्रकृति: कोलचिसीन एक प्राकृतिक विषैला क्षारक है जो लिलिएसी कुल के पौधे शरद क्रोकस (Colchicum autumnale) के घनकंदों व बीजों से निकाला जाता है।
- क्रियाविधि: कोलचिसीन कोशिकाद्रव्य में उपस्थित मुक्त $\alpha$- व $\beta$-ट्यूबुलिन प्रोटीन से जुड़कर उनके बहुलकीकरण को रोक देता है, जिससे तर्कु तंतु नहीं बन पाते।
- प्रभाव: कोशिकाएं पूर्वावस्था पार कर मध्यावस्था में गुणसूत्र संघनित तो कर लेती हैं, परंतु तर्कु तंतुओं के अभाव में पश्चावस्था में नहीं जा पातीं और मध्यावस्था में विभाजन रुक जाता है। कोशिकाद्रव्य विभाजन न होने से एक ही केंद्रक में गुणसूत्र दोगुने हो जाते हैं, जिससे कृत्रिम बहुगुणिता (Polyploidy, $2n \to 4n$) उत्पन्न होती है। समसूत्रण को अवरुद्ध करने के कारण इसे सूत्री विष (Mitotic poison) कहते हैं।

(ख) अर्धसूत्री विभाजन के तीन प्रमुख जैविक महत्व: [3 अंक]
1. विशिष्ट गुणसूत्र संख्या का संरक्षण: अर्धसूत्रण द्विगुणित ($2n$) जनन कोशिकाओं में गुणसूत्र संख्या को आधा ($n$) कर अगुणित युग्मक बनाता है। निषेचन पर दो अगुणित युग्मकों के संलयन से संतति में पुनः द्विगुणित ($n + n = 2n$) संख्या बहाल हो जाती है, जिससे पीढ़ियों में गुणसूत्र संख्या स्थिर रहती है।
2. आनुवंशिक विभिन्नताओं का सृजन: अर्धसूत्रण में दो क्रियाएं नई आनुवंशिक किस्में बनाती हैं: (i) स्थूलपट्ट में क्रॉसिंग ओवर, तथा (ii) मध्यावस्था-I व पश्चावस्था-I में समजात गुणसूत्रों का स्वतंत्र अपव्यूहन। ये विभिन्नताएं ही प्राकृतिक वरण और जैव विकास का मुख्य आधार बनती हैं।
3. युग्मकों व बीजाणुओं का निर्माण: पौधों में बीजाणु तथा जंतुओं में शुक्राणु व अंडाणु का निर्माण कर यह प्रजाति की जनन निरंतरता को सुनिश्चित करता है।
उदाहरण 6
निम्नलिखित में से प्रत्येक के लिए एक शब्द अथवा विशिष्ट वैज्ञानिक पद लिखिए: (i) गुणसूत्रबिंदु पर स्थित प्रोटीन की चक्रिका जिससे तर्कु तंतु जुड़ते हैं। (ii) कोशिका चक्र की वह प्रावस्था जिसमें जंतु कोशिकाद्रव्य में तारककेंद्र का द्विगुणन होता है। (iii) युग्मपट्ट में समजात गुणसूत्रों के मध्य बनने वाला सीढ़ीनुमा प्रोटीन सम्मिश्र। (iv) पादप कोशिकाद्रव्य विभाजन में गॉल्जी पुटिकाओं से बनने वाली प्राथमिक संरचना। (v) अर्धसूत्रण की वह उप-प्रावस्था जिसमें काएज्मेटा का उपांतीभवन होता है। [1 x 5 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:
विशिष्ट वैज्ञानिक पद: [प्रत्येक 1 अंक]
1. काइनेटोकोर (Kinetochore): गुणसूत्रबिंदु की बाहरी सतह पर स्थित त्रिस्तरीय प्रोटीन निर्मित चक्रिका जिससे तर्कु तंतु जुड़ते हैं।
2. S प्रावस्था (संश्लेषण प्रावस्था / Synthesis Phase): अंतरावस्था की प्रावस्था जिसमें केंद्रक में DNA प्रतिकृतियन के साथ जंतु कोशिकाद्रव्य में तारककेंद्र का द्विगुणन होता है।
3. सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र (Synaptonemal Complex): युग्मपट्ट में समजात गुणसूत्रों को जोड़कर रखने वाला त्रिपक्षीय प्रोटीन सीढ़ीदार सम्मिश्र।
4. फ्रैग्मोप्लास्ट (Phragmoplast / कोशिका पट्ट): पादप कोशिकाद्रव्य विभाजन में गॉल्जी पुटिकाओं व सूक्ष्मनलिकाओं द्वारा केंद्र में बनने वाली संरचना जो मध्य पटलिका बनाती है।
5. पारगतिक्रम (Diakinesis): अर्धसूत्री-I की पूर्वावस्था-I का अंतिम चरण जिसमें काएज्मेटा का उपांतीभवन संपन्न होता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि S प्रावस्था में डीएनए के साथ-साथ गुणसूत्रों की संख्या भी दोगुनी हो जाती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

S प्रावस्था में डीएनए की मात्रा 2C से 4C में दोगुनी होती है, परंतु गुणसूत्रों की संख्या कठोरता से 2n ही रहती है। दोनों प्रतिकृत सहअर्धगुणसूत्र एक ही गुणसूत्रबिंदु से जुड़े रहते हैं, अतः वे पश्चावस्था में अलग होने तक एक ही गुणसूत्र माने जाते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

समसूत्री विभाजन की पश्चावस्था और अर्धसूत्री-I की पश्चावस्था-I के बीच भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

समसूत्री पश्चावस्था में गुणसूत्रबिंदु विभाजित होता है और दोनों सहअर्धगुणसूत्र अलग होते हैं। अर्धसूत्री पश्चावस्था-I में गुणसूत्रबिंदु कभी विभाजित नहीं होता; केवल समजात गुणसूत्रों के युग्म अलग होकर विपरीत ध्रुवों पर जाते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि पादप और जंतु कोशिकाओं में कोशिकाद्रव्य विभाजन एक ही विधि से होता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

जंतु कोशिकाओं में दृढ़ भित्ति न होने से एक्टिन-मायोसिन वलय द्वारा अभिकेंद्रीय (बाहर से भीतर) खांच बनती है। पादप कोशिकाओं में दृढ़ सेलूलोज़ भित्ति होने से गॉल्जी पुटिकाओं के फ्रैग्मोप्लास्ट पर संलयन से अपकेंद्रीय (भीतर से बाहर) कोशिका पट्ट बनता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि अर्धसूत्री-I और अर्धसूत्री-II के मध्य अंतराभाजन (Interkinesis) में डीएनए प्रतिकृतियन होता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

अंतराभाजन एक अत्यंत संक्षिप्त विराम प्रावस्था है जिसमें तारककाय का द्विगुणन तो होता है, परंतु डीएनए प्रतिकृतियन (S प्रावस्था) पूर्णतः अनुपस्थित रहता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि क्रॉसिंग ओवर एक ही गुणसूत्र के दो सहअर्धगुणसूत्रों (Sister chromatids) के बीच होता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

स्थूलपट्ट में क्रॉसिंग ओवर सदैव समजात गुणसूत्रों के गैर-सहअर्धगुणसूत्रों (Non-sister chromatids) के बीच होता है। सहअर्धगुणसूत्र आनुवंशिक रूप से समरूप होते हैं, अतः उनके बीच आदान-प्रदान से कोई नई विभिन्नता उत्पन्न नहीं होती।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन (Cell Cycle & Division) WBCHSE Class 11 Biology • Unit III: अध्याय 10 • आणविक क्रियाविधि एवं प्रावस्थाएं 1. कोशिका चक्र प्रावस्थाएं (Cell Cycle Clock) INTERPHASE >95% Time G₀ Stage G₁ प्रावस्था (वृद्धि, RNA/प्रोटीन संश्लेषण) S प्रावस्था (DNA प्रतिकृतियन 2C→4C) G₂ प्रावस्था (ट्यूबुलिन, विभाजन तैयारी) M प्रावस्था (सूत्री विभाजन + कोशिकाद्रव्य विभाजन) 🚨 MOLECULAR CHECKPOINTS: • G₁/S चेकपॉइंट (साइक्लिन D/E-CDK) • G₂/M चेकपॉइंट (MPF / साइक्लिन B-CDK1) • तर्कु चेकपॉइंट (SAC / काइनेटोकोर) 2. समसूत्री विभाजन (Mitosis - समविभाजन) 1. PROPHASE (আদ্যদশা / पूर्वावस्था) • पूर्वावस्था: क्रोमैटिन संघनन, तर्कु निर्माण • Nuclear membrane, nucleolus, ER & Golgi dissolve 2. METAPHASE (মধ্যদশা / मध्यावस्था) • मध्यावस्था: मध्यावस्था पट्टिका (काइनेटोकोर) • Kinetochores attach to bipolar spindle fibers 3. ANAPHASE (পশ্চাদ্দশা / पश्चावस्था) • पश्चावस्था: गुणसूत्रबिंदु विभाजन, ध्रुवीय गति • Daughter chromosomes assume V, L, J, I shapes 4. TELOPHASE & CYTOKINESIS • अंत्यावस्था व कोशिकाद्रव्य विभाजन (खांच/पट्ट) • Animal: Cleavage furrow | Plant: Cell plate 🔬 MITOSIS EQUATIONAL VALUE: • परिणाम: 2 आनुवंशिक रूप से समान द्विगुणित (2n) संतति • Colchicine drug arrests cells at Metaphase (polyploidy) 3. अर्धसूत्री-I पूर्वावस्था-I एवं जीन विनिमय 1. Leptotene (লেপ্টোটিন / तनुपट्ट) • तनुपट्ट (Leptotene): क्रोमैटिन संघनन 2. Zygotene (জাইগোটিন / युग्मपट्ट) • युग्मपट्ट (Zygotene): युग्मन / सिनेप्सिस (द्विसंयोजी) • Synaptonemal Complex forms zipper 3. Pachytene (প্যাকাইটিন / स्थूलपट्ट) ★ • स्थूलपट्ट (Pachytene): जीन विनिमय व रिकॉम्बिनेज • Non-sister chromatids exchange alleles via Recombinase 4. Diplotene (ডিপ্লোটিন / द्विपट्ट) • द्विपट्ट (Diplotene): काएज्मेटा (X-आकृति) • Dissolution of synaptonemal complex; Dictyotene 5. Diakinesis (ডায়াকাইনেসিস / पारगतिक्रम) • पारगतिक्रम (Diakinesis): काएज्मेटा का उपांतीभवन 🧬 MEIOTIC REDUCTION & VARIATION: • परिणाम: 4 आनुवंशिक रूप से भिन्न अगुणित (n) युग्मक • Conservation of chromosome species number (2n→n) • Generates raw material for evolution via crossing over

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
कोशिका चक्र आनुक्रमिक घटनाओं की एक सुव्यवस्थित शृंखला है जिसके द्वारा कोशिका अपने जीनोम का द्विगुणन करती है, कोशिकीय घटकों का संश्लेषण करती है और अंततः दो संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है। मानव संवर्धन कोशिका में एक चक्र में लगभग 24 घंटे लगते हैं, जिसका 95% से अधिक समय अंतरावस्था (Interphase) में बीतता है।
मुख्य बिंदु 2
अंतरावस्था की तीन उप-प्रावस्थाएं हैं: G1 (प्रथम अंतराल, वृद्धि, RNA व एंजाइम संश्लेषण), S (संश्लेषण, डीएनए प्रतिकृतियन 2C→4C लेकिन गुणसूत्र संख्या 2n रहती है; जंतु कोशिकाद्रव्य में तारककेंद्र द्विगुणन), तथा G2 (द्वितीय अंतराल, ट्यूबुलिन प्रोटीन व माइटोसिस की तैयारी)।
मुख्य बिंदु 3
जो कोशिकाएं आगे विभाजित नहीं होतीं वे G1 से बाहर निकलकर शांत G0 प्रावस्था में प्रवेश करती हैं; वे उपापचयी रूप से सक्रिय रहती हैं परंतु आवश्यकता पड़ने पर ही विभाजित होती हैं।
मुख्य बिंदु 4
कोशिका चक्र की प्रगति साइक्लिन तथा साइक्लिन-निर्भर काइनेज (CDK) द्वारा तीन प्रमुख चेकपॉइंट्स पर नियंत्रित होती है: G1/S चेकपॉइंट (प्रतिबंध बिंदु), G2/M चेकपॉइंट तथा तर्कु संयोजन चेकपॉइंट (SAC)।
मुख्य बिंदु 5
समसूत्री विभाजन (Mitosis) कायिक कोशिकाओं में होने वाला समविभाजन है जिसमें चार निरंतर प्रावस्थाएं होती हैं: पूर्वावस्था (संघनन), मध्यावस्था (मध्यावस्था पट्टिका पर संरेखण), पश्चावस्था (गुणसूत्रबिंदु विपाटन व ध्रुवीय गति) तथा अंत्यावस्था (पुनर्गठन)।
मुख्य बिंदु 6
मध्यावस्था में गुणसूत्र अत्यधिक संघनित, स्पष्ट व निरक्षीय पट्टिका पर स्थित होते हैं, अतः यह गुणसूत्रों की बाह्य आकृति, माप व कैरियोटाइप के अध्ययन हेतु सर्वोत्तम प्रावस्था है।
मुख्य बिंदु 7
पश्चावस्था में गुणसूत्रबिंदु के विपाटन से दोनों सहअर्धगुणसूत्र अलग होकर संतति गुणसूत्र बन जाते हैं और गुणसूत्रबिंदु की स्थिति के अनुसार V, L, J अथवा I आकृति बनाते हुए ध्रुवों की ओर गति करते हैं।
मुख्य बिंदु 8
कोशिकाद्रव्य विभाजन (Cytokinesis): जंतु कोशिकाओं में एक्टिन-मायोसिन वलय द्वारा खांच निर्माण से अभिकेंद्रीय (बाहर से भीतर) विधि द्वारा; पादप कोशिकाओं में फ्रैग्मोप्लास्ट पर गॉल्जी पुटिकाओं के संलयन से कोशिका पट्ट निर्माण द्वारा अपकेंद्रीय (भीतर से बाहर) विधि द्वारा होता है।
मुख्य बिंदु 9
अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) द्विगुणित जनन कोशिकाओं का न्यूनकारी विभाजन है, जिसमें एक बार डीएनए प्रतिकृतियन के पश्चात दो निरंतर केंद्रक विभाजन (अर्धसूत्री-I व II) होते हैं और चार आनुवंशिक रूप से भिन्न अगुणित (n) संतति युग्मक बनते हैं।
मुख्य बिंदु 10
अर्धसूत्री-I की पूर्वावस्था-I अत्यंत विस्तृत होती है और 5 उप-प्रावस्थाओं में विभाजित है: तनुपट्ट (संघनन), युग्मपट्ट (सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र द्वारा समजात गुणसूत्रों का युग्मन/सिनेप्सिस), स्थूलपट्ट (रिकॉम्बिनेज द्वारा गैर-सहअर्धगुणसूत्रों के मध्य जीन विनिमय/क्रॉसिंग ओवर), द्विपट्ट (काएज्मेटा का प्रकटीकरण), तथा पारगतिक्रम (काएज्मेटा का उपांतीभवन)।
मुख्य बिंदु 11
पश्चावस्था-I में समजात गुणसूत्र अलग होते हैं परंतु गुणसूत्रबिंदु विभाजित नहीं होता (गुणसूत्र संख्या 2n→n रह जाती है)। अर्धसूत्री-II एक समविभाजन है जिसमें पश्चावस्था-II में गुणसूत्रबिंदु विभाजित होकर सहअर्धगुणसूत्रों को अलग करता है।
मुख्य बिंदु 12
महत्व: समसूत्री विभाजन कायिक वृद्धि, ऊतक मरम्मत व आनुवंशिक स्थिरता बनाए रखता है; अर्धसूत्री विभाजन पीढ़ियों में गुणसूत्र संख्या की स्थिरता रखता है तथा जीन विनिमय व स्वतंत्र अपव्यूहन द्वारा नई विभिन्नताएं उत्पन्न कर जैव विकास का आधार बनता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
अर्धसूत्री-I को 'न्यूनकारी विभाजन' परंतु अर्धसूत्री-II को 'समतुल्य विभाजन' क्यों कहा जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अर्धसूत्री-I में बिना गुणसूत्रबिंदु विभाजित हुए समजात गुणसूत्रों के जोड़े अलग होते हैं, जिससे संतति कोशिकाओं में गुणसूत्र संख्या मातृ कोशिका की तुलना में आधी (2n से n) रह जाती है; इसलिए यह न्यूनकारी विभाजन है। इसके विपरीत, अर्धसूत्री-II में सामान्य समसूत्रण की भांति गुणसूत्रबिंदु विभाजित होकर सहअर्धगुणसूत्रों को अलग करता है और गुणसूत्र संख्या अगुणित (n) ही बनी रहती है; इसलिए यह समतुल्य विभाजन है।
2
यदि किसी कोशिका में केंद्रक विभाजन (Karyokinesis) के पश्चात कोशिकाद्रव्य विभाजन (Cytokinesis) न हो, तो क्या परिणाम होगा?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: यदि केंद्रक विभाजन के बाद कोशिकाद्रव्य का विभाजन न हो, तो संतति केंद्रक एक ही कोशिकाद्रव्य में रह जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप एक बहुकेंद्रकी कोशिका बनती है, जिसे जंतु ऊतकों में सिंसीशियम (Syncytium) तथा पादपों व कवकों में संकोशिकी (Coenocyte) कहते हैं। जैसे नारियल का तरल भ्रूणपोष।
3
तर्कु संयोजन चेकपॉइंट (SAC) समसूत्री विभाजन में जीनोम की शुद्धता कैसे सुनिश्चित करता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: तर्कु संयोजन चेकपॉइंट मध्यावस्था से पश्चावस्था के संक्रमण काल में कार्य करता है। यह निगरानी करता है कि प्रत्येक गुणसूत्र का काइनेटोकोर दोनों ध्रुवों के तर्कु तंतुओं से संतुलित तनाव के साथ जुड़ा है या नहीं। यदि एक भी काइनेटोकोर ढीला या अंसयुक्त रह जाता है, तो SAC एनाफेज-प्रमोटिंग कॉम्प्लेक्स (APC/C) को अवरुद्ध कर देता है, जिससे कोहेसिन का विखंडन रुक जाता है और गुणसूत्रों का अवियोजन व असंतुलन (Aneuploidy) रुक जाता है।
4
सहअर्धगुणसूत्रों (Sister chromatids) के बीच जीन विनिमय होने से नए आनुवंशिक पुनर्योजन क्यों नहीं बनते?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सहअर्धगुणसूत्र S प्रावस्था में एक ही मूल डीएनए रज्जुक के हूबहू प्रतिकृतियन द्वारा बनते हैं; अतः उनके प्रत्येक जीन लोकस पर समान एलील उपस्थित होते हैं। दो सहअर्धगुणसूत्रों के बीच खंड विनिमय होने से केवल दो समरूप डीएनए खंड ही आपस में बदलते हैं जिससे कोई नया एलील संयोजन नहीं बनता। केवल गैर-सहअर्धगुणसूत्रों के मध्य विनिमय से ही मातृक व पैतृक एलीलों का नया संयोजन बनता है।
5
मानव शरीर में शांत G0 प्रावस्था की क्या भूमिका है? दो भिन्न ऊतकों के उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: G0 प्रावस्था कोशिकाओं को ऊर्जा-खपत वाले निरंतर विभाजन से मुक्त रखकर अपने विशिष्ट ऊतक कार्य करने देती है। उदाहरण: (1) हृदय पेशी कोशिकाएं तथा केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के न्यूरॉन्स विभेदन के पश्चात स्थायी रूप से G0 में चले जाते हैं और वयस्कों में विभाजित नहीं होते। (2) यकृत की हेपेटोसाइट कोशिकाएं प्रतिवर्ती G0 अवस्था में रहती हैं; सामान्यतः वे विभाजित नहीं होतीं, परंतु यकृत कट जाने या क्षतिग्रस्त होने पर वे पुनः G1 में प्रवेश कर विभाजन द्वारा नष्ट हुए अंग की मरम्मत करती हैं।
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अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

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