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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 12
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

पादप में श्वसन

पादप में श्वसन एक सार्वभौमिक, अपचयी, ऊर्जा-मोची और क्रमिक एंजाइमी ऑक्सीकरण प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव कोशिकाओं के भीतर जटिल कार्बनिक यौगिक (श्वसन क्रियाधार जैसे कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन) विघटित होकर अपनी रासायनिक स्थैतिक ऊर्जा को एटीपी (ATP) के उच्च-ऊर्जा फॉस्फेट बंधों में संचित करते हैं तथा सह-उत्पाद के रूप में कार्बन डाइऑक्साइड एवं जल मुक्त करते हैं। इस अध्याय में विस्तार से विवेचना की गई है कि पादपों में फेफड़े या गलफड़े जैसे विशिष्ट श्वसन अंग न होने पर भी वे रंध्रों (स्टोमेटा) और वातरंध्रों (लेंटिसेल) द्वारा गैसीय विनिमय कैसे करते हैं, कोशिकाद्रव्य में संपन्न होने वाला 10-चरणीय ग्लाइकोलिसिस या ईएमपी परिपथ (जिसकी शुद्ध लब्धि 2 पायरूविक अम्ल, 2 एटीपी और 2 एनएडीएच है), पायरूवेट का अवायवीय रूपांतरण जैसे एल्कोहॉली व लैक्टिक अम्ल किण्वन, माइटोकॉन्ड्रियल मैट्रिक्स में पायरूवेट डिहाइड्रोजिनेस मल्टी-एंजाइम संकुल द्वारा योजक अभिक्रिया (एसिटाइल-CoA का निर्माण), मैट्रिक्स में संपन्न होने वाला 8-चरणीय क्रेब्स चक्र (ट्राईकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र), माइटोकॉन्ड्रियल आंतरिक झिल्ली पर इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (संकुल 1 से 4) एवं अंतिम इलेक्ट्रॉन ग्राही के रूप में ऑक्सीजन की भूमिका, पीटर मिशेल के रसोपरासरणी सिद्धांत अनुसार संकुल 5 (F0-F1 एटीपेस) द्वारा ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण व प्रति ग्लूकोज 36 से 38 एटीपी का निर्माण, श्वसन पथ की उभयचरी (ऐम्फिबोलिक) प्रकृति और विभिन्न श्वसन क्रियाधारों का श्वसन गुणांक (RQ)।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

कोशिकीय श्वसन सभी सजीवों का केंद्रीय ऊर्जा-परिवर्तक केंद्र है, जो एटीपी उत्पन्न कर सभी जैव-संश्लेषण, झिल्लियों के आर-पार सक्रिय परिवहन, कोशिकाद्रव्यी गति और कोशिकीय रख-रखाव को ऊर्जा प्रदान करता है। कृषि एवं कटाई-उपरांत तकनीकी प्रबंधन में फलों (जैसे आम, सेब, केला) के क्लाइमेक्टेरिक श्वसन दर को शीत भंडारण और एथिलीन संदमकों द्वारा नियंत्रित कर वार्षिक लाखों टन खाद्यान्न को सड़ने से बचाया जाता है। औद्योगिक सूक्ष्मजीवविज्ञान में यीस्ट का अवायवीय किण्वन विश्वव्यापी खरबों डॉलर के बेकिंग व मद्य निर्माण उद्योग की आधारशिला है। चिकित्सीय विषविज्ञान में साइनाइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और फ्लोराइड जैसे श्वसन संदमकों की जैव-रासायनिक क्रियाविधि समझना जीवन रक्षक उपचारों में अनिवार्य है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • कक्षा 11 पादप शारीर से रंध्रों व वातरंध्रों की संरचना की आधारभूत समझ।
  • जैव अणु अध्याय से ऑक्सीकरण-अपचयन अभिक्रियाएं, रासायनिक बंध ऊर्जा व ATP की संरचना।
  • कोशिका अध्याय से माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना (बाह्य झिल्ली, क्रिस्टी, मैट्रिक्स व अंतराझिल्ली अवकाश)।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 कोशिकीय श्वसन की अवधारणा, श्वसन क्र...
2 ग्लाइकोलिसिस या ईएमपी पथ (Glycolysi...
3 पायरूवेट की अवायवीय नियति: किण्वन (...
4 वायवीय श्वसन: पायरूवेट का ऑक्सीकारी...
5 माइटोकॉन्ड्रियल इलेक्ट्रॉन परिवहन त...
6 श्वसन की उभयचरी (Amphibolic) प्रकृत...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

कोशिकीय श्वसन की अवधारणा, श्वसन क्रियाधार एवं क्या पादप सांस लेते हैं? (Do Plants Breathe?)

1. कोशिकीय श्वसन की वैज्ञानिक अवधारणा एवं ऊष्मागतिक प्रकृति

कोशिकीय श्वसन (Cellular Respiration) सजीव कोशिकाओं के भीतर संपन्न होने वाला एक अपचयी (Catabolic), ऊर्जा-मोची (Exergonic) और बहु-चरणीय एंजाइमी ऑक्सीकरण प्रक्रम है, जिसमें जटिल कार्बनिक यौगिकों (श्वसन क्रियाधार) के कार्बन-कार्बन ($\text{C}-\text{C}$) बंधों के विखंडन द्वारा मुक्त ऊर्जा को रासायनिक रूप से एडिनोसिन ट्राइफॉस्फेट (ATP) के उच्च-ऊर्जा बंधों में संचित किया जाता है:

$$\text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6 + 6\text{O}_2 \to 6\text{CO}_2 + 6\text{H}_2\text{O} + 36\text{ से }38\text{ ATP } (\sim 2870\text{ kJ/mol})$$
  • क्रमिक ऊर्जा विमोचन: श्वसन की संपूर्ण ऊर्जा एक ही एकल विस्फोटक दहन चरण में ऊष्मा के रूप में मुक्त नहीं होती, अन्यथा उच्च तापमान से कोशिका नष्ट हो जाती; बल्कि यह नियंत्रित एंजाइमी चरणों में मुक्त होकर एटीपी निर्माण में प्रयुक्त होती है।
  • श्वसन क्रियाधार (Respiratory Substrates): वे कार्बनिक यौगिक जिनका श्वसन में ऑक्सीकरण होता है:
    • कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज, फ्रुक्टोज, सुक्रोज, स्टार्च): प्राथमिक और सर्वाधिक प्रयुक्त क्रियाधार (प्लावी श्वसन / Floating Respiration)।
    • वसा (लिपिड): बीजों के अंकुरण के समय संचित क्रियाधार के रूप में प्रयुक्त (जैसे अरंडी बीज), जो सर्वाधिक ऊर्जा (~38 kJ/g) देते हैं।
    • प्रोटीन: दीर्घकालिक भुखमरी या रोगग्रस्त अवस्था में ही जीवद्रव्यीय घटकों से प्रयुक्त होते हैं (जीवद्रव्यी श्वसन / Protoplasmic Respiration), जिससे अमोनिया मुक्त होती है।
    • कार्बनिक अम्ल (मैलिक अम्ल, साइट्रिक अम्ल): मांसल मरुद्भिदी (CAM) पादपों में प्रयुक्त।
2. क्या पादप सांस लेते हैं? पादपों में गैसीय विनिमय की क्रियाविधि

जंतुओं के विपरीत, पादपों में कोई विशिष्ट श्वसन अंग (जैसे फेफड़े या गलफड़े) अथवा रक्त परिसंचरण तंत्र नहीं होता। पादप अपनी बाह्य सतह पर उपस्थित सूक्ष्म छिद्रों द्वारा सरल विसरण से गैस विनिमय करते हैं: पत्तियों व युवा तनों में रंध्र (Stomata) तथा काष्ठीय तनों व जड़ों में वातरंध्र (Lenticels)। पादप विशिष्ट अंगों के बिना भी श्वसन सुगमता से कर पाते हैं क्योंकि:

  • अंगीय स्वायत्तता: पादप का प्रत्येक अंग (पत्ती, तना, जड़) अपनी गैसीय विनिमय आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं करता है। एक अंग से दूसरे अंग में गैसों के व्यापक परिवहन की बहुत कम आवश्यकता होती है।
  • न्यून उपापचयी मांग: तीव्र वृद्धि या पुष्पन की अवधि को छोड़कर पादपों में गैसीय विनिमय की दर बहुत कम होती है। गतिशील जंतुओं की तुलना में पादपों की श्वसन दर अत्यधिक मंद होती है।
  • विशाल अंतराकोशिकीय अवकाश: पत्तियों में पर्णमध्योतक (मीसोफिल) कोशिकाएं ढीली व्यवस्थित होती हैं और उनके बीच विस्तृत अंतराकोशिकीय वायु स्थान होते हैं, जो रंध्रों के माध्यम से सीधे बाह्य वातावरण से जुड़े रहते हैं।
  • अल्प विसरण दूरी: विशालकाय काष्ठीय वृक्षों में भी अधिकांश भीतरी काष्ठ मृत कोशिकाओं से बना होता है। छाल के ठीक नीचे केवल फ्लोएम, कैम्बियम व कॉर्क ऊतक की एक पतली परिधीय परत ही सजीव होती है, जो वातरंध्रों के निकट संपर्क में रहती है।

ग्लाइकोलिसिस या ईएमपी पथ (Glycolysis / EMP Pathway): 10 एंजाइमी चरण व ऊर्जा संतुलन

1. ग्लाइकोलिसिस का परिचय एवं प्रमुख विशेषताएं

ग्लाइकोलिसिस शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द glykys (शर्करा) और lysis (विखंडन) से हुई है। इस संपूर्ण रासायनिक परिपथ की खोज तीन जर्मन वैज्ञानिकों—गुस्ताव एम्बडेन (Gustav Embden), ओटो मेयरहॉफ (Otto Meyerhof), और याकूब पारनास (Jakub Parnas, 1930 के दशक) ने की थी, अतः इसे EMP परिपथ कहा जाता है।

  • स्थान: पृथ्वी की प्रत्येक सजीव कोशिका (प्रोकैरियोट व यूकैरियोट) के कोशिकाद्रव्य (Cytosol) में संपन्न होता है।
  • ऑक्सीजन से स्वतंत्रता: इस परिपथ के लिए आणविक ऑक्सीजन ($\text{O}_2$) की कोई आवश्यकता नहीं होती; यह वायवीय और अवायवीय दोनों परिस्थितियों में समान रूप से चलता है। अवायवीय जीवों में यह श्वसन का एकमात्र पथ है।
  • समग्र अभिक्रिया: ग्लूकोज (6C) का 1 अणु विखंडित होकर पायरूविक अम्ल (3C) के 2 अणु बनाता है।
2. ग्लाइकोलिसिस के 10 एंजाइमी चरणों की सारणी

ग्लाइकोलिसिस को दो स्पष्ट अवस्थाओं में बांटा जाता है: तैयारी अवस्था (ऊर्जा-निवेश) और प्राप्ति अवस्था (ऊर्जा-अर्जन):

चरण अभिक्रिया (क्रियाधार $\to$ उत्पाद) एंजाइम एवं सहकारक जैव-रासायनिक महत्व एवं ऊर्जा
अवस्था 1: तैयारी / ऊर्जा-निवेश अवस्था (चरण 1-5, 2 ATP खर्च)
चरण 1 ग्लूकोज + $\text{ATP} \to$ ग्लूकोज-6-फॉस्फेट (G6P) + $\text{ADP}$ हेक्सोकाइनेस ($\text{Mg}^{2+}$) अनुत्क्रमणीय फॉस्फोरिलीकरण; ग्लूकोज को कोशिका के भीतर आबद्ध करता है। 1 ATP खर्च।
चरण 2 ग्लूकोज-6-फॉस्फेट $\rightleftharpoons$ फ्रुक्टोज-6-फॉस्फेट (F6P) फॉस्फोग्लूको-आइसोमेरेस एल्डोज शर्करा कीटोज शर्करा में समावयवीकृत होती है।
चरण 3 फ्रुक्टोज-6-P + $\text{ATP} \to$ फ्रुक्टोज-1,6-बिसफॉस्फेट + $\text{ADP}$ फॉस्फोफ्रुक्टोकाइनेस-1 (PFK-1) ($\text{Mg}^{2+}$) प्रतिबद्ध चरण एवं पेसमेकर एंजाइम। दूसरा फॉस्फोरिलीकरण। 1 ATP खर्च।
चरण 4 फ्रुक्टोज-1,6-बिसफॉस्फेट $\rightleftharpoons$ DHAP + G3P एल्डोलेस 6-कार्बन शर्करा का दो 3-कार्बन ट्रायोज फॉस्फेट में विखंडन।
चरण 5 डाइहाइड्रॉक्सीएसीटोन फॉस्फेट (DHAP) $\rightleftharpoons$ ग्लिसराल्डिहाइड-3-फॉस्फेट (G3P) ट्रायोज फॉस्फेट आइसोमेरेस DHAP समावयवीकृत होकर G3P बनता है; अतः कुल 2 अणु G3P प्राप्त होते हैं।
अवस्था 2: ऊर्जा-अर्जन अवस्था (चरण 6-10, 4 ATP व 2 NADH निर्मित)
चरण 6 2 G3P + 2 $\text{NAD}^+$ + 2 $\text{P}_i \rightleftharpoons$ 2 (1,3-बिसफॉस्फोग्लिसरेट) + 2 $\text{NADH}$ + 2 $\text{H}^+$ ग्लिसराल्डिहाइड-3-फॉस्फेट डिहाइड्रोजिनेस (GAPDH) ऑक्सीकरण एवं अकार्बनिक फॉस्फेट का जुड़ना। 2 NADH बनते हैं।
चरण 7 2 (1,3-बिसफॉस्फोग्लिसरेट) + 2 $\text{ADP} \rightleftharpoons$ 2 (3-फॉस्फोग्लिसरेट) + 2 $\text{ATP}$ फॉस्फोग्लिसरेट काइनेस ($\text{Mg}^{2+}$) प्रथम क्रियाधार-स्तरीय फॉस्फोरिलीकरण (SLP)। 2 ATP प्राप्त।
चरण 8 2 (3-फॉस्फोग्लिसरेट) $\rightleftharpoons$ 2 (2-फॉस्फोग्लिसरेट) फॉस्फोग्लिसरोम्यूटेस फॉस्फेट समूह का कार्बन 3 से कार्बन 2 पर स्थानांतरण।
चरण 9 2 (2-फॉस्फोग्लिसरेट) $\rightleftharpoons$ 2 फॉस्फोइनोलपायरूवेट (PEP) + 2 $\text{H}_2\text{O}$ इनोलेस ($\text{Mg}^{2+}$) निर्जलीकरण अभिक्रिया; उच्च-ऊर्जा ईनॉल-फॉस्फेट बंध। फ्लोराइड द्वारा संदमित।
चरण 10 2 फॉस्फोइनोलपायरूवेट (PEP) + 2 $\text{ADP} \to$ 2 पायरूवेट + 2 $\text{ATP}$ पायरूवेट काइनेस ($\text{Mg}^{2+}, \text{K}^+$) द्वितीय क्रियाधार-स्तरीय फॉस्फोरिलीकरण (SLP)। अनुत्क्रमणीय। 2 ATP प्राप्त।
3. ग्लाइकोलिसिस का शुद्ध ऊर्जा समीकरण
$$\text{ग्लूकोज} + 2\text{NAD}^+ + 2\text{ADP} + 2\text{P}_i \to 2\text{ पायरूवेट} + 2\text{NADH} + 2\text{H}^+ + 2\text{ ATP} + 2\text{H}_2\text{O}$$
  • कुल निर्मित एटीपी: चरण 7 में 2 + चरण 10 में 2 = 4 ATP (क्रियाधार-स्तर)।
  • व्ययित एटीपी: चरण 1 में 1 + चरण 3 में 1 = 2 ATP।
  • शुद्ध प्रत्यक्ष एटीपी लाभ: $4 - 2 = \mathbf{2\text{ ATP}}$।
  • अपचायक समतुल्य: 2 NADH (जो माइटोकॉन्ड्रिया के ईटीएस में जाकर 3 से 5 एटीपी उत्पन्न कर सकते हैं)।

पायरूवेट की अवायवीय नियति: किण्वन (एल्कोहॉली व लैक्टिक अम्ल किण्वन)

1. ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में किण्वन की आवश्यकता

ऑक्सीजन के अभाव में माइटोकॉन्ड्रिया का इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र कार्य नहीं कर पाता। इससे कोशिकाद्रव्य में $\text{NAD}^+$ की भारी कमी हो जाती है। यदि $\text{NADH}$ को पुनः $\text{NAD}^+$ में ऑक्सीकृत न किया जाए, तो ग्लाइकोलिसिस का छठा चरण (GAPDH) रुक जाएगा और संपूर्ण ऊर्जा उत्पादन ठप हो जाएगा। अतः अवायवीय परिस्थितियों में कोशिका किण्वन (Fermentation) द्वारा $\text{NADH}$ का ऑक्सीकरण कर $\text{NAD}^+$ का पुनर्चक्रण करती है।

2. एल्कोहॉली किण्वन (यीस्ट व पादपों की अवायवीय जड़ों में)

यीस्ट (जैसे Saccharomyces cerevisiae) में पायरूवेट दो चरणों में एथेनॉल और कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित होता है:

  1. विकार्बोक्सिलीकरण: पायरूविक अम्ल कार्बन डाइऑक्साइड त्यागकर एसीटल्डिहाइड बनाता है: $$\text{पायरूवेट (3C)} \xrightarrow{\text{पायरूवेट डिकार्बोक्सिलेस, TPP, } \text{Zn}^{2+}} \text{एसीटल्डिहाइड (2C)} + \text{CO}_2 \uparrow$$
  2. अपचयन: एसीटल्डिहाइड $\text{NADH}$ द्वारा अपचयित होकर एथिल एल्कोहॉल (एथेनॉल) बनाता है: $$\text{एसीटल्डिहाइड} + \text{NADH} + \text{H}^+ \xrightarrow{\text{एल्कोहॉल डिहाइड्रोजिनेस, } \text{Zn}^{2+}} \text{एथेनॉल} + \text{NAD}^+$$
यीस्ट की विषैली सांद्रता सीमा: जब माध्यम में एल्कोहॉल की सांद्रता लगभग 13% तक पहुंच जाती है, तो यीस्ट कोशिकाएं स्वयं के विषैले प्रभाव से मृत हो जाती हैं। इसलिए प्राकृतिक किण्वन से 13% से अधिक सांद्रता का एल्कोहॉल नहीं बनाया जा सकता; व्हिस्की या वोडका जैसे पेय आसवन (distillation) द्वारा बनाए जाते हैं।
3. लैक्टिक अम्ल किण्वन (दही के जीवाणुओं व थकी पेशियों में)

दही जमाने वाले जीवाणुओं (लैक्टोबैसिलस) तथा तीव्र व्यायाम के समय स्तनधारियों की कंकाल पेशियों में ऑक्सीजन की अस्थायी कमी में पायरूवेट सीधे लैक्टिक अम्ल में अपचयित हो जाता है:

$$\text{पायरूविक अम्ल (3C)} + \text{NADH} + \text{H}^+ \xrightarrow{\text{लैक्टेट डिहाइड्रोजिनेस, } \text{FMN, } \text{Zn}^{2+}} \text{लैक्टिक अम्ल (3C)} + \text{NAD}^+$$
  • कार्बन डाइऑक्साइड मुक्त नहीं होती: लैक्टिक अम्ल किण्वन में कोई विकार्बोक्सिलीकरण नहीं होता, अतः कोई $\text{CO}_2$ गैस नहीं निकलती।
  • पेशीय थकान व ऐंठन (Muscle Cramps): तेज दौड़ने के बाद पेशियों में लैक्टिक अम्ल जमने से पीएच कम हो जाता है जिससे दर्द व ऐंठन होती है। विश्राम करने पर रक्त प्रवाह द्वारा लैक्टिक अम्ल यकृत में जाकर कोरी चक्र द्वारा पुनः ग्लूकोज में बदल जाता है।
4. किण्वन की ऊर्जा दक्षता

किण्वन एक अत्यंत अक्षम ऊर्जा प्रक्रिया है। ग्लूकोज में संचित कुल ऊर्जा का 7% से भी कम (<7%) भाग ही मुक्त होता है और प्रति ग्लूकोज अणु केवल 2 ATP का शुद्ध लाभ होता है। शेष अधिकांश ऊर्जा अधूरे ऑक्सीकृत अंत्य उत्पादों (एथेनॉल या लैक्टिक अम्ल) के रासायनिक बंधों में ही फंसी रह जाती है।

वायवीय श्वसन: पायरूवेट का ऑक्सीकारी विकार्बोक्सिलीकरण व क्रेब्स चक्र (TCA चक्र)

1. योजक अभिक्रिया (Link Reaction / Gateway Reaction)

ऑक्सीजन की उपस्थिति में ग्लाइकोलिसिस से बने 2 पायरूवेट अणु कोशिकाद्रव्य से विशिष्ट वाहक द्वारा माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स (धात्री) में प्रवेश करते हैं। वहां पायरूवेट डिहाइड्रोजिनेस मल्टी-एंजाइम संकुल (PDC) द्वारा ऑक्सीकारी विकार्बोक्सिलीकरण होता है:

$$2\text{ पायरूवेट (3C)} + 2\text{CoA-SH} + 2\text{NAD}^+ \xrightarrow{\text{PDC, } \text{Mg}^{2+}} 2\text{ एसिटाइल-CoA (2C)} + 2\text{CO}_2 \uparrow + 2\text{NADH} + 2\text{H}^+$$
  • PDC संकुल के 5 सहकारक: (1) थायमीन पाइरोफॉस्फेट (TPP, विटामिन B1), (2) लिपोइक अम्ल, (3) सहएंजाइम-ए (CoA-SH, विटामिन B5), (4) फ्लैविन एडिनिन डाइन्यूक्लियोटाइड (FAD, विटामिन B2), और (5) निकोटिनामाइड एडिनिन डाइन्यूक्लियोटाइड ($\text{NAD}^+$, विटामिन B3)।
  • योजक अभिक्रिया की लब्धि: प्रति ग्लूकोज 2 एसिटाइल-CoA, 2 $\text{CO}_2$, और 2 $\text{NADH}$ प्राप्त होते हैं (सीधे कोई ATP नहीं बनता)।
2. क्रेब्स चक्र या ट्राईकार्बोक्सिलिक अम्ल (TCA) चक्र

इस चक्र की खोज ब्रिटिश वैज्ञानिक सर हैंस एडॉल्फ क्रेब्स (1937) ने कबूतर की वक्ष पेशियों में की थी (जिसके लिए उन्हें 1953 में नोबेल पुरस्कार मिला)। प्रथम स्थायी उत्पाद साइट्रिक अम्ल में तीन कार्बोक्सिल समूह ($-\text{COOH}$) होने के कारण इसे TCA चक्र या साइट्रिक अम्ल चक्र भी कहा जाता है।

स्थान: माइटोकॉन्ड्रिया का मैट्रिक्स (Matrix)। केवल एक अपवाद एंजाइम—सक्सीनेट डिहाइड्रोजिनेस आंतरिक झिल्ली में धंसा होता है (जो ईटीएस के संकुल II के रूप में कार्य करता है)।

3. क्रेब्स चक्र के 8 क्रमिक एंजाइमी चरण (प्रति चक्र)
  1. संघनन (Condensation): 2-कार्बन एसिटाइल-CoA 4-कार्बन ऑक्सेलोएसिटिक अम्ल (OAA) से जुड़कर 6-कार्बन साइट्रिक अम्ल बनाता है। एंजाइम: साइट्रेट सिंथेस।
  2. समावयवीकरण (Isomerization): साइट्रिक अम्ल एकोनिटेस की उपस्थिति में सिस-एकोनिटिक अम्ल होते हुए आइसोसाइट्रिक अम्ल में बदलता है।
  3. प्रथम ऑक्सीकारी विकार्बोक्सिलीकरण: आइसोसाइट्रेट (6C) ऑक्सीकृत व विकार्बोक्सिलीकृत होकर 5-कार्बन $\alpha$-कीटोग्लूटरिक अम्ल ($\alpha$-KG, 5C) बनाता है। यहां प्रथम $\text{CO}_2$ व 1st $\text{NADH}$ बनता है। एंजाइम: आइसोसाइट्रेट डिहाइड्रोजिनेस।
  4. द्वितीय ऑक्सीकारी विकार्बोक्सिलीकरण: $\alpha$-कीटोग्लूटरेट (5C) सहएंजाइम-ए से जुड़कर 4-कार्बन सक्सिनाइल-CoA (4C) बनाता है। यहां द्वितीय $\text{CO}_2$ व 2nd $\text{NADH}$ बनता है। एंजाइम: $\alpha$-कीटोग्लूटरेट डिहाइड्रोजिनेस संकुल।
  5. क्रियाधार-स्तरीय फॉस्फोरिलीकरण: सक्सिनाइल-CoA जलअपघटित होकर सक्सीनिक अम्ल (4C) बनता है और GDP से 1 GTP (या ATP) का निर्माण होता है। एंजाइम: सक्सिनाइल-CoA सिंथेटेस।
  6. विहाइड्रोजनीकरण (FAD अपचयन): सक्सीनेट ऑक्सीकृत होकर फ्यूमेरिक अम्ल (4C) बनता है। 2 हाइड्रोजन परमाणु निकलकर FAD को अपचयित कर 1 $\text{FADH}_2$ बनाते हैं। एंजाइम: सक्सीनेट डिहाइड्रोजिनेस (मेलोनेट द्वारा प्रतिस्पर्धी रूप से संदमित)।
  7. जलयोजन (Hydration): फ्यूमरेस एंजाइम द्वारा फ्यूमरेट में 1 जल अणु जुड़ने से मैलिक अम्ल (4C) बनता है।
  8. पुनरुत्पादन (Regeneration): मैलिक अम्ल ऑक्सीकृत होकर पुनः ऑक्सेलोएसिटिक अम्ल (OAA, 4C) बनाता है और 3rd $\text{NADH}$ प्राप्त होता है। एंजाइम: मैलेट डिहाइड्रोजिनेस।
4. क्रेब्स चक्र का कुल रासायनिक परिणाम (प्रति ग्लूकोज या 2 चक्रों में)
$$2\text{ एसिटाइल-CoA} + 6\text{NAD}^+ + 2\text{FAD} + 2\text{GDP} + 2\text{P}_i + 4\text{H}_2\text{O} \to 4\text{CO}_2 + 6\text{NADH} + 6\text{H}^+ + 2\text{FADH}_2 + 2\text{GTP} + 2\text{CoA-SH}$$

अतः 1 ग्लूकोज अणु से क्रेब्स चक्र में कुल लब्धि: 4 $\text{CO}_2$, 6 $\text{NADH}$, 2 $\text{FADH}_2$, तथा 2 ATP (GTP)।

माइटोकॉन्ड्रियल इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (ETS) एवं रसोपरासरणी एटीपी संश्लेषण

1. इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (ETS) एवं इसके 5 प्रोटीन संकुल

ग्लाइकोलिसिस, योजक अभिक्रिया व क्रेब्स चक्र में बने अपचयित सहएंजाइमों ($\text{NADH}$ व $\text{FADH}_2$) में संचित इलेक्ट्रॉन व प्रोटॉन माइटोकॉन्ड्रिया की आंतरिक झिल्ली (Inner Membrane) पर स्थित वाहकों की श्रृंखला से गुजरते हुए अंत में आणविक ऑक्सीजन से मिलकर जल बनाते हैं। इसे इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (ETS) या श्वसन श्रृंखला कहते हैं।

प्रोटीन संकुल एंजाइमी नाम व संघटक प्रोटॉन पम्पिंग क्षमता विशिष्ट संदमक (Inhibitor)
संकुल I NADH डिहाइड्रोजिनेस (FMN एवं कई Fe-S केंद्र) मैट्रिक्स से अंतराझिल्ली अवकाश में 4 $\text{H}^+$ पम्प करता है रोटेनोन (Rotenone), एमाइटल
संकुल II सक्सीनेट डिहाइड्रोजिनेस (FAD, Fe-S केंद्र) कोई प्रोटॉन पम्प नहीं करता ($0\text{ H}^+$) मेलोनेट (Malonate - प्रतिस्पर्धी संदमक)
यूबिक्विनोन (UQ/CoQ) लिपिड-घुलनशील गतिशील वाहक (संकुल I व II से संकुल III तक इलेक्ट्रॉन ले जाता है) - -
संकुल III साइटोक्रोम $bc_1$ संकुल (साइटोक्रोम $b$, साइटोक्रोम $c_1$, Fe-S रीस्के प्रोटीन) अंतराझिल्ली अवकाश में 4 $\text{H}^+$ पम्प करता है एंटीमाइसिन-ए (Antimycin A)
साइटोक्रोम $c$ आंतरिक झिल्ली की बाहरी सतह पर ढीला जुड़ा छोटा जल-घुलनशील प्रोटीन (संकुल III से IV तक वाहक) - -
संकुल IV साइटोक्रोम $c$ ऑक्सीडेस (साइटोक्रोम $a$, साइटोक्रोम $a_3$, दो तांबा केंद्र $\text{Cu}_A$ व $\text{Cu}_B$) अंतराझिल्ली अवकाश में 2 $\text{H}^+$ पम्प करता है साइनाइड ($\text{CN}^-$), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), सोडियम एजाइड ($\text{N}_3^-$)
संकुल V $\text{F}_0-\text{F}_1$ एटीपी सिंथेस (एटीपेस) प्रोटॉन चैनल ($\text{F}_0$) एवं उत्प्रेरकीय शीर्ष ($\text{F}_1$) ओलिगोमाइसिन (Oligomycin)
2. अंतिम इलेक्ट्रॉन ग्राही एवं उपापचयी जल निर्माण

वायवीय श्वसन में आणविक ऑक्सीजन ($\text{O}_2$) इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र का अंतिम या चरम इलेक्ट्रॉन ग्राही (Terminal Electron Acceptor) है। संकुल IV से इलेक्ट्रॉन प्राप्त कर ऑक्सीजन प्रोटॉनों से मिलकर उपापचयी जल बनाती है:

$$\frac{1}{2}\text{O}_2 + 2\text{H}^+ + 2e^- \to \text{H}_2\text{O}$$
3. पीटर मिशेल की रसोपरासरणी परिकल्पना एवं ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण

इलेक्ट्रॉन प्रवाह से मुक्त ऊर्जा द्वारा संकुल I, III और IV माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स से प्रोटॉनों ($\text{H}^+$) को अंतराझिल्ली अवकाश (Intermembrane Space) में पम्प करते हैं। इससे:

  • अंतराझिल्ली अवकाश में उच्च प्रोटॉन सांद्रता (अम्लीय pH व धनात्मक आवेश) हो जाती है।
  • मैट्रिक्स में निम्न प्रोटॉन सांद्रता (क्षारीय pH व ऋणात्मक आवेश) रह जाती है।
  • इस विद्युत-रासायनिक प्रवणता को प्रोटॉन चालक बल (Proton Motive Force - PMF) कहते हैं।
  • आंतरिक झिल्ली प्रोटॉन के लिए अपारगम्य होने के कारण प्रोटॉन केवल संकुल 5 के $\text{F}_0$ चैनल से होकर ही मैट्रिक्स में लौट सकते हैं। प्रोटॉनों के इस प्रवाह से $\text{F}_1$ शीर्ष में घूर्णन होता है और ADP व अकार्बनिक फॉस्फेट मिलकर ATP बनाते हैं: $\text{ADP} + \text{P}_i \to \text{ATP}$।
4. एक ग्लूकोज अणु के पूर्ण वायवीय श्वसन की कुल एटीपी बैलेंस शीट
अवस्था एवं स्थान प्रत्यक्ष ATP (SLP) निर्मित अपचायक सहएंजाइम ईटीएस से प्राप्त ATP (आधुनिक P/O: NADH=2.5, FADH2=1.5)
ग्लाइकोलिसिस (कोशिकाद्रव्य) $2\text{ ATP}$ (शुद्ध) $2\text{ NADH}$ मैलेट शटल में $2 \times 2.5 = 5\text{ ATP}$ (ग्लिसरॉल में $3\text{ ATP}$) [पारंपरिक: $6\text{ या }4\text{ ATP}$]
योजक अभिक्रिया (मैट्रिक्स) $0\text{ ATP}$ $2\text{ NADH}$ $2 \times 2.5 = 5\text{ ATP}$ (पारंपरिक: $2 \times 3 = 6\text{ ATP}$)
क्रेब्स चक्र (मैट्रिक्स) $2\text{ ATP (GTP)}$ $6\text{ NADH} + 2\text{ FADH}_2$ $(6 \times 2.5) + (2 \times 1.5) = 15 + 3 = 18\text{ ATP}$ (पारंपरिक: $18 + 4 = 22\text{ ATP}$)
कुल शुद्ध एटीपी उत्पादन $4\text{ ATP}$ $10\text{ NADH} + 2\text{ FADH}_2$ 36 से 38 ATP (पारंपरिक बोर्ड मान) / 30 से 32 ATP (आधुनिक संशोधित)

श्वसन की उभयचरी (Amphibolic) प्रकृति एवं श्वसन गुणांक (Respiratory Quotient - RQ)

1. श्वसन एक उभयचरी या ऐम्फिबोलिक पथ (Amphibolic Pathway)

पारंपरिक रूप से श्वसन को केवल एक अपचयी पथ (Catabolic pathway) माना जाता था, क्योंकि इसमें ग्लूकोज टूटकर $\text{CO}_2$ व $\text{H}_2\text{O}$ में बदलता है। किंतु आधुनिक जैव-रसायन में यह सिद्ध हो चुका है कि श्वसन मूलतः उभयचरी या ऐम्फिबोलिक है, क्योंकि यह अपचय (विघटन) और उपचय (जैव-संश्लेषण) दोनों के संगम के रूप में कार्य करता है:

  • जब कोशिका को ऊर्जा चाहिए होती है, तो कार्बोहाइड्रेट, वसा व प्रोटीन विघटित होकर श्वसन पथ में प्रवेश करते हैं और एटीपी बनाते हैं (अपचय)।
  • किंतु जब कोशिका को वृद्धि, मरम्मत या नए पदार्थों के संश्लेषण की आवश्यकता होती है, तो श्वसन पथ के मध्यवर्ती यौगिक बाहर निकलकर संश्लेषी पूर्वगामी बनते हैं (उपचय):
    • एसिटाइल-CoA (Acetyl-CoA): श्वसन पथ से बाहर निकलकर वसीय अम्ल, स्टेरॉल, टरपीन व कैरोटिनॉयड वर्णक बनाता है।
    • $\alpha$-कीटोग्लूटरेट ($\alpha$-KG): अमोनिया के साथ ट्रांसएमीनीकरण द्वारा ग्लूटामिक अम्ल बनाता है, जो अनेक अमीनो अम्लों का पूर्वगामी है।
    • ऑक्सेलोएसिटिक अम्ल (OAA): ट्रांसएमीनीकरण द्वारा एस्पार्टिक अम्ल व पिरिमिडीन क्षार बनाता है।
    • सक्सिनाइल-CoA (Succinyl-CoA): क्लोरोफिल, साइटोक्रोम व फाइटोक्रोम के पॉरफायरिन वलय के संश्लेषण का मुख्य प्रारंभिक पदार्थ है।
    • डाइहाइड्रॉक्सीएसीटोन फॉस्फेट (DHAP): अपचयित होकर ग्लिसरॉल बनाता है, जो वसा संश्लेषण में प्रयुक्त होता है।
  • चूंकि यह परिपथ विघटन और संश्लेषण दोनों के चौराहे पर स्थित है, अतः इसे विशुद्ध अपचयी न कहकर उभयचरी या ऐम्फिबोलिक पथ कहना ही वैज्ञानिक दृष्टि से सही है।
2. श्वसन गुणांक या श्वसन अनुपात (Respiratory Quotient - RQ)

श्वसन के दौरान मुक्त हुई कार्बन डाइऑक्साइड के आयतन और प्रयुक्त ऑक्सीजन के आयतन के अनुपात को श्वसन गुणांक (Respiratory Quotient या RQ) कहते हैं:

$$\text{RQ} = \frac{\text{मुक्त }\text{CO}_2\text{ का आयतन}}{\text{उपभुक्त }\text{O}_2\text{ का आयतन}}$$

श्वसन गुणांक का मान इस बात पर निर्भर करता है कि किस रासायनिक प्रकृति के क्रियाधार का ऑक्सीकरण हो रहा है:

क्रियाधार का प्रकार संतुलित रासायनिक समीकरण RQ का मान शारीरिक कारण
कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज) $\text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6 + 6\text{O}_2 \to 6\text{CO}_2 + 6\text{H}_2\text{O}$ $\mathbf{1.0}$ (इकाई / Unity) अणु में हाइड्रोजन व ऑक्सीजन का अनुपात जल के समान ($H:O = 2:1$) होता है; अतः प्रयुक्त $\text{O}_2$ व मुक्त $\text{CO}_2$ का आयतन बराबर होता है ($6/6 = 1.0$)।
वसा / लिपिड (ट्राइपामिटिन) $2\text{C}_{51}\text{H}_{98}\text{O}_6 + 145\text{O}_2 \to 102\text{CO}_2 + 98\text{H}_2\text{O}$ $\mathbf{0.7}$ ($< 1$) वसा में ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम तथा कार्बन-हाइड्रोजन अधिक होते हैं; अतः पूर्ण ऑक्सीकरण में बहुत अधिक $\text{O}_2$ लगती है ($102/145 \approx 0.7$)।
प्रोटीन अमीनो अम्लों का जटिल एंजाइमी ऑक्सीकरण $\mathbf{0.8\text{ से }0.9}$ ऑक्सीजन की मात्रा मध्यम होती है; औसत मान $0.85$ से $0.9$ रहता है।
कार्बनिक अम्ल (मैलिक अम्ल) $\text{C}_4\text{H}_6\text{O}_5 + 3\text{O}_2 \to 4\text{CO}_2 + 3\text{H}_2\text{O}$ $\mathbf{1.33}$ ($> 1$) कार्बनिक अम्ल पहले से ही ऑक्सीजन-समृद्ध होते हैं; अतः ऑक्सीकरण में कम $\text{O}_2$ लगती है ($4/3 = 1.33$)। ऑक्सेलिक अम्ल का $\text{RQ} = 4.0$।
अवायवीय श्वसन $\text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6 \to 2\text{C}_2\text{H}_5\text{OH} + 2\text{CO}_2$ $\mathbf{\infty}$ (अनंत / Infinity) बिना किसी ऑक्सीजन उपभोग के $\text{CO}_2$ निकलती है ($2/0 = \infty$)।
मांसल पादप (CAM) रात्रि में $2\text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6 + 3\text{O}_2 \to 3\text{C}_4\text{H}_6\text{O}_5 + 3\text{H}_2\text{O}$ $\mathbf{0.0}$ (शून्य) रात्रि में अधूरा ऑक्सीकरण होकर मैलिक अम्ल बनता है, कोई $\text{CO}_2$ नहीं निकलती ($0/3 = 0.0$)।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

वायवीय कोशिकीय श्वसन का समग्र संतुलित समीकरण
36 से 38 ATP (या आधुनिक 30-32 ATP) प्रति ग्लूकोज
मानक मुक्त ऊर्जा परिवर्तन डेल्टा G = -2870 kJ/mol (-686 kcal/mol)।
ग्लाइकोलिसिस (EMP पथ) का शुद्ध समीकरण
शुद्ध 2 ATP + 2 NADH प्रति ग्लूकोज
क्रियाधार-स्तरीय फॉस्फोरिलीकरण से 4 ATP बनते हैं, किंतु चरण 1 व 3 में 2 ATP निवेश होते हैं।
पायरूवेट डिहाइड्रोजिनेस योजक अभिक्रिया समीकरण
2 एसिटाइल-CoA + 2 CO2 + 2 NADH प्रति ग्लूकोज
यह ग्लाइकोलिसिस को क्रेब्स चक्र से जोड़ने वाली एकदिशीय प्रवेशद्वार अभिक्रिया है।
क्रेब्स चक्र का शुद्ध समीकरण (प्रति ग्लूकोज 2 चक्र)
4 CO2 + 6 NADH + 2 FADH2 + 2 ATP (GTP)
माइटोकॉन्ड्रिया में कुल मुक्त CO2 = 2 (योजक) + 4 (क्रेब्स) = 6 CO2।
रसोपरासरणी P/O अनुपात एवं एटीपी समतुल्य
2.5 ATP प्रति NADH एवं 1.5 ATP प्रति FADH2
पारंपरिक शास्त्रीय मान 1 NADH = 3 ATP तथा 1 FADH2 = 2 ATP बोर्ड परीक्षाओं में भी मान्य हैं।
श्वसन गुणांक (RQ) का गणना सूत्र
कार्बोहाइड्रेट = 1.0; वसा = 0.7; प्रोटीन = 0.9; कार्बनिक अम्ल > 1.0
गैनॉन्ग के रेस्पाइरोमीटर उपकरण से प्रयोगात्मक रूप से मापा जाता है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
(क) ग्लाइकोलिसिस (EMP पथ) के सभी 10 चरणों को एंजाइमों व ATP के उपयोग/उत्पादन सहित क्रमबद्ध लिखिए। (ख) फॉस्फोफ्रुक्टोकाइनेस-1 (PFK-1) को ग्लाइकोलिसिस का 'पेसमेकर' एंजाइम क्यों कहा जाता है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

बोर्ड अंकन योजना अनुसार आदर्श बिंदुवार उत्तर:

(क) ग्लाइकोलिसिस के चरण [3 अंक]:

  1. तैयारी अवस्था (2 ATP का निवेश):
    • चरण 1: ग्लूकोज + ATP -> ग्लूकोज-6-फॉस्फेट + ADP (हेक्सोकाइनेस, Mg2+)। 1st ATP खर्च।
    • चरण 2: ग्लूकोज-6-P <-> फ्रुक्टोज-6-फॉस्फेट (फॉस्फोग्लूको-आइसोमेरेस)।
    • चरण 3: फ्रुक्टोज-6-P + ATP -> फ्रुक्टोज-1,6-बिसफॉस्फेट + ADP (फॉस्फोफ्रुक्टोकाइनेस-1, Mg2+)। 2nd ATP खर्च।
    • चरण 4: फ्रुक्टोज-1,6-बिसफॉस्फेट <-> DHAP + G3P (एल्डोलेस)।
    • चरण 5: DHAP <-> G3P (ट्रायोज फॉस्फेट आइसोमेरेस)। कुल 2 अणु G3P बनते हैं।
  2. प्राप्ति अवस्था (4 ATP व 2 NADH का निर्माण):
    • चरण 6: 2 G3P + 2 NAD+ + 2 Pi <-> 2 (1,3-बिसफॉस्फोग्लिसरेट) + 2 NADH + 2 H+ (GAPDH)।
    • चरण 7: 2 (1,3-बिसफॉस्फोग्लिसरेट) + 2 ADP <-> 2 (3-फॉस्फोग्लिसरेट) + 2 ATP (फॉस्फोग्लिसरेट काइनेस)। प्रथम SLP (2 ATP प्राप्त)।
    • चरण 8: 2 (3-फॉस्फोग्लिसरेट) <-> 2 (2-फॉस्फोग्लिसरेट) (फॉस्फोग्लिसरोम्यूटेस)।
    • चरण 9: 2 (2-फॉस्फोग्लिसरेट) <-> 2 फॉस्फोइनोलपायरूवेट + 2 जल (इनोलेस, Mg2+; फ्लोराइड द्वारा संदमित)।
    • चरण 10: 2 फॉस्फोइनोलपायरूवेट + 2 ADP -> 2 पायरूवेट + 2 ATP (पायरूवेट काइनेस)। द्वितीय SLP (2 ATP प्राप्त)। शुद्ध समीकरण: ग्लूकोज + 2 NAD+ + 2 ADP + 2 Pi -> 2 पायरूवेट + 2 NADH + 2 H+ + 2 ATP + 2 जल।

(ख) PFK-1 को पेसमेकर कहने का कारण [2 अंक]:

  1. प्रतिबद्ध चरण (Committed Step): फ्रुक्टोज-6-फॉस्फेट से फ्रुक्टोज-1,6-बिसफॉस्फेट का बनना ग्लाइकोलिसिस का पहला अनुत्क्रमणीय और केवल इसी परिपथ के लिए विशिष्ट चरण है।
  2. एलोस्टेरिक नियंत्रण: कोशिका में ATP व साइट्रेट की प्रचुरता होने पर वे PFK-1 को संदमित कर ग्लाइकोलिसिस की गति धीमी कर देते हैं; वहीं ADP व AMP इसे उत्तेजित कर गति बढ़ा देते हैं। अतः यह पूरे परिपथ की गति निर्धारित करता है।
उदाहरण 2
(क) क्रेब्स चक्र (TCA चक्र) में विकार्बोक्सिलीकरण (CO2 विमोचन) और विहाइड्रोजनीकरण (NADH/FADH2 निर्माण) वाले चरणों का विवरण दीजिए। (ख) क्रेब्स चक्र का वह एकमात्र एंजाइम कौन सा है जो आंतरिक माइटोकॉन्ड्रियल झिल्ली में स्थित होता है और इसका प्रतिस्पर्धी संदमक क्या है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(क) क्रेब्स चक्र के विकार्बोक्सिलीकरण व विहाइड्रोजनीकरण चरण [3 अंक]:

  1. विकार्बोक्सिलीकरण चरण (जहां CO2 निकलती है):
    • चरण 3: आइसोसाइट्रेट (6C) -> alpha-कीटोग्लूटरेट (5C) + CO2 (एंजाइम: आइसोसाइट्रेट डिहाइड्रोजिनेस; साथ ही NADH बनता है)।
    • चरण 4: alpha-कीटोग्लूटरेट (5C) + CoA -> सक्सिनाइल-CoA (4C) + CO2 (एंजाइम: alpha-कीटोग्लूटरेट डिहाइड्रोजिनेस; साथ ही NADH बनता है)।
  2. विहाइड्रोजनीकरण चरण (सहएंजाइमों का अपचयन):
    • आइसोसाइट्रेट -> alpha-KG (NADH बनता है)।
    • alpha-KG -> सक्सिनाइल-CoA (NADH बनता है)।
    • सक्सीनेट -> फ्यूमरेट (एंजाइम: सक्सीनेट डिहाइड्रोजिनेस; FADH2 बनता है)।
    • मैलेट -> ऑक्सेलोएसिटेट (एंजाइम: मैलेट डिहाइड्रोजिनेस; NADH बनता है)।
  3. क्रियाधार-स्तरीय फॉस्फोरिलीकरण:
    • सक्सिनाइल-CoA -> सक्सीनेट + GTP (ATP) (सक्सिनाइल-CoA सिंथेटेस)।

(ख) झिल्ली-बद्ध एंजाइम व संदमक [2 अंक]:

  1. एंजाइम: सक्सीनेट डिहाइड्रोजिनेस (Succinate Dehydrogenase)। क्रेब्स चक्र के अन्य सभी 7 एंजाइम मैट्रिक्स में विलेय होते हैं, केवल यही आंतरिक झिल्ली में धंसा होता है और ईटीएस के संकुल II के रूप में कार्य करता है।
  2. प्रतिस्पर्धी संदमक: मेलोनेट (मेलोइक अम्ल / Malonate)। इसकी संरचना सक्सीनेट के सदृश होने के कारण यह एंजाइम के सक्रिय स्थल से जुड़कर चक्र को अवरुद्ध कर देता है।
उदाहरण 3
(क) पीटर मिशेल की रसोपरासरणी परिकल्पना (Chemiosmotic Hypothesis) द्वारा माइटोकॉन्ड्रिया में एटीपी संश्लेषण की क्रियाविधि समझाइए। (ख) क्रियाधार-स्तरीय फॉस्फोरिलीकरण और ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण में दो मुख्य अंतर लिखिए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(क) रसोपरासरणी परिकल्पना द्वारा ATP निर्माण [3 अंक]:

  1. प्रोटॉन पम्पिंग: आंतरिक झिल्ली पर ईटीएस संकुल I, III और IV से इलेक्ट्रॉन प्रवाह के दौरान मुक्त ऊर्जा से मैट्रिक्स से प्रोटॉनों (H+) को अंतराझिल्ली अवकाश में पम्प किया जाता है।
  2. विद्युत-रासायनिक प्रवणता: अंतराझिल्ली अवकाश में प्रोटॉन अधिक होने से एक तीव्र विद्युत-रासायनिक प्रवणता या प्रोटॉन चालक बल (PMF) उत्पन्न होता है।
  3. संकुल V (ATP सिंथेस) द्वारा संश्लेषण: आंतरिक झिल्ली प्रोटॉन के लिए अपारगम्य है; अतः प्रोटॉन केवल F0 चैनल से होकर ही मैट्रिक्स में लौटते हैं। इस प्रवाह से F1 शीर्ष में घूर्णन होता है और ADP + Pi से ATP का संश्लेषण होता है।

(ख) दोनों प्रकार के फॉस्फोरिलीकरण में अंतर [2 अंक]:

  1. क्रियाविधि: क्रियाधार-स्तरीय फॉस्फोरिलीकरण (SLP) में एक उच्च-ऊर्जा फॉस्फेट युक्त क्रियाधार से सीधे ADP को फॉस्फेट स्थानांतरित होकर ATP बनता है (जैसे ग्लाइकोलिसिस में PEP -> पायरूवेट); इसके लिए ईटीएस या ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती। जबकि ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण ईटीएस द्वारा उत्पन्न प्रोटॉन प्रवणता पर निर्भर एक परोक्ष प्रक्रिया है।
  2. स्थान: SLP कोशिकाद्रव्य और मैट्रिक्स दोनों में होता है; जबकि ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण केवल माइटोकॉन्ड्रिया की आंतरिक झिल्ली पर संपन्न होता है।
उदाहरण 4
(क) श्वसन गुणांक (RQ) की परिभाषा एवं गणितीय सूत्र लिखिए। (ख) ग्लूकोज, ट्राइपामिटिन और मैलिक अम्ल के श्वसन गुणांक (RQ) की संतुलित समीकरणों सहित गणना कीजिए। [2 + 3 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(क) श्वसन गुणांक की परिभाषा व सूत्र [2 अंक]: श्वसन की प्रक्रिया में निष्कासित कार्बन डाइऑक्साइड के आयतन और अवशोषित ऑक्सीजन के आयतन के अनुपात को श्वसन गुणांक (Respiratory Quotient - RQ) कहते हैं: RQ = (निष्कासित CO2 का आयतन) / (अवशोषित O2 का आयतन)।

(ख) विभिन्न क्रियाधारों के RQ की गणना [3 अंक]:

  1. ग्लूकोज (कार्बोहाइड्रेट): C6H12O6 + 6 O2 -> 6 CO2 + 6 H2O + ऊर्जा RQ = 6 CO2 / 6 O2 = 1.0 (इकाई / Unity)। अणु में जल के समान H व O का अनुपात होने से समान मात्रा में O2 लगती है और CO2 निकलती है।
  2. ट्राइपामिटिन (वसा / लिपिड): 2 C51H98O6 + 145 O2 -> 102 CO2 + 98 H2O + ऊर्जा RQ = 102 CO2 / 145 O2 = 0.703 (~0.7)। वसा में ऑक्सीजन अत्यंत कम होती है, अतः पूर्ण ऑक्सीकरण में अधिक O2 लगती है जिससे RQ < 1 होता है।
  3. मैलिक अम्ल (कार्बनिक अम्ल): C4H6O5 + 3 O2 -> 4 CO2 + 3 H2O + ऊर्जा RQ = 4 CO2 / 3 O2 = 1.33 (> 1.0)। कार्बनिक अम्ल में पहले से ऑक्सीजन अधिक होने से ऑक्सीकरण में कम O2 लगती है, जिससे RQ > 1 होता है।
उदाहरण 5
(क) चार विशिष्ट लक्षणों के आधार पर एल्कोहॉली किण्वन और लैक्टिक अम्ल किण्वन में अंतर स्पष्ट कीजिए। (ख) वायवीय श्वसन की तुलना में किण्वन को ऊर्जा दृष्टि से अत्यंत अक्षम क्यों माना जाता है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(क) एल्कोहॉली व लैक्टिक अम्ल किण्वन में अंतर [3 अंक]:

  1. अंतिम उत्पाद: एल्कोहॉली किण्वन में एथेनॉल (2C) और CO2 बनते हैं; लैक्टिक अम्ल किण्वन में केवल लैक्टिक अम्ल (3C) बनता है।
  2. कार्बन डाइऑक्साइड विमोचन: एल्कोहॉली किण्वन में विकार्बोक्सिलीकरण होता है और CO2 गैस निकलती है; लैक्टिक अम्ल किण्वन में कोई CO2 नहीं निकलती।
  3. संबंधित एंजाइम: एल्कोहॉली में पायरूवेट डिकार्बोक्सिलेस व एल्कोहॉल डिहाइड्रोजिनेस आवश्यक हैं; लैक्टिक अम्ल में केवल लैक्टेट डिहाइड्रोजिनेस चाहिए।
  4. जीव: एल्कोहॉली किण्वन यीस्ट (सैकेरोमाइसिस) व पादप जड़ों में होता है; लैक्टिक अम्ल किण्वन लैक्टोबैसिलस जीवाणु व थकी हुई स्तनधारी कंकाल पेशियों में होता है।

(ख) किण्वन की ऊर्जा अक्षमता के कारण [2 अंक]:

  1. अधूरा ऑक्सीकरण: किण्वन में ग्लूकोज का आंशिक विखंडन होता है; अधिकांश रासायनिक ऊर्जा अंत्य उत्पादों (एथेनॉल या लैक्टिक अम्ल) के बंधों में ही फंसी रह जाती है।
  2. अल्प एटीपी लब्धि: प्रति ग्लूकोज अणु केवल 2 ATP का शुद्ध लाभ होता है (ग्लूकोज की कुल ऊर्जा का 7% से भी कम); जबकि पूर्ण वायवीय श्वसन में 36 से 38 ATP प्राप्त होते हैं।
उदाहरण 6
(क) श्वसन पथ को विशुद्ध 'अपचयी' न कहकर 'उभयचरी या ऐम्फिबोलिक पथ' क्यों कहा जाता है? दो ठोस जैव-रासायनिक उदाहरण दीजिए। (ख) एक ग्लूकोज अणु के पूर्ण वायवीय श्वसन की समग्र एटीपी बैलेंस शीट दर्शाइए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(क) श्वसन की उभयचरी (ऐम्फिबोलिक) प्रकृति [3 अंक]:

  1. परिभाषा: वह उपापचयी पथ जो अपचय (विखंडन) और उपचय (संश्लेषण) दोनों क्रियाओं को एक साथ समन्वित करता है, ऐम्फिबोलिक पथ कहलाता है।
  2. अपचयी भूमिका: ऊर्जा की आवश्यकता पर कार्बोहाइड्रेट, वसा व प्रोटीन टूटकर श्वसन पथ में प्रवेश करते हैं और CO2, जल व ATP बनाते हैं।
  3. उपचयी पूर्वगामी भूमिका: नए पदार्थों के संश्लेषण हेतु श्वसन के मध्यवर्ती यौगिक बाहर निकल जाते हैं:
    • उदाहरण 1: योजक अभिक्रिया का एसिटाइल-CoA बाहर निकलकर वसीय अम्ल व लिपिड का संश्लेषण करता है।
    • उदाहरण 2: क्रेब्स चक्र का alpha-कीटोग्लूटरिक अम्ल ट्रांसएमीनीकरण द्वारा ग्लूटामिक अम्ल (अमीनो अम्ल) बनाता है।
    • उदाहरण 3: सक्सिनाइल-CoA पॉरफायरिन वलय बनाता है जिससे क्लोरोफिल व साइटोक्रोम का निर्माण होता है।

(ख) प्रति ग्लूकोज कुल एटीपी बैलेंस शीट [2 अंक]:

  1. ग्लाइकोलिसिस: 2 ATP (SLP) + 2 NADH (ईटीएस में 5 या 3 ATP) = 5 से 7 ATP।
  2. योजक अभिक्रिया: 2 NADH (ईटीएस में 5 या 6 ATP) = 5 से 6 ATP।
  3. क्रेब्स चक्र: 2 ATP (GTP) + 6 NADH (15 या 18 ATP) + 2 FADH2 (3 या 4 ATP) = 20 से 24 ATP। कुल शुद्ध एटीपी लब्धि = 36 से 38 ATP (पारंपरिक) या 30 से 32 ATP (आधुनिक संशोधित P/O मान)।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि पादप जंतुओं की भांति किसी विशिष्ट श्वसन अंग (जैसे फेफड़े) से सांस लेते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पादपों में कोई विशिष्ट श्वसन अंग नहीं होता; वे रंध्रों और वातरंध्रों द्वारा सरल विसरण से गैसीय विनिमय करते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि ग्लाइकोलिसिस के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है या यह माइटोकॉन्ड्रिया में होता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ग्लाइकोलिसिस पूर्णतः ऑक्सीजन-निरपेक्ष है और यह सभी कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य (Cytosol) में संपन्न होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि लैक्टिक अम्ल किण्वन में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) गैस मुक्त होती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

लैक्टिक अम्ल किण्वन में कोई CO2 गैस मुक्त नहीं होती; 3-कार्बन पायरूवेट सीधे 3-कार्बन लैक्टिक अम्ल में अपचयित होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि क्रेब्स चक्र के सभी एंजाइम माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में घुले होते हैं।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सक्सीनेट डिहाइड्रोजिनेस मैट्रिक्स में नहीं होता; यह आंतरिक झिल्ली में धंसा होता है और ईटीएस के संकुल II के रूप में कार्य करता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि वसा (लिपिड) के लिए श्वसन गुणांक (RQ) 1.0 से अधिक होता है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वसा का श्वसन गुणांक लगभग 0.7 (सदैव 1.0 से कम) होता है।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

WBCHSE कक्षा 11 जीव विज्ञान • इकाई 4: पादप कार्यिकी पादप में श्वसन: ग्लाइकोलिसिस, योजक अभिक्रिया, क्रेब्स चक्र, ETS एवं ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण अध्याय 12 / टॉपिक 178 1. ग्लाइकोलिसिस (कोशिकाद्रव्य) सार्वभौमिक 10-चरणीय अवायवीय पथ ग्लूकोज (6C) ऊर्जा-निवेश प्रावस्था (चरण 1-5) व्यय: 2 ATP (हेक्सोकाइनेज व PFK-1) उत्पाद: 2 × ग्लिसरेल्डिहाइड-3-फॉस्फेट (3C) ऊर्जा-अर्जन प्रावस्था (चरण 6-10 × 2) • ऑक्सीकरण (GAPDH): +2 NADH + 2 H+ • क्रियाधार-स्तर: +4 ATP (PGK व PK) • इनोलेज निर्जलीकरण: -2 H2O (फ्लोराइड संदमन) उत्पाद: 2 × पाइरूविक अम्ल (3C) प्रति ग्लूकोज शुद्ध लाभ: 2 पाइरूवेट + 2 ATP (शुद्ध) + 2 NADH ETS सहित कुल ATP = 7 ATP (शटल अनुसार 5) अवायवीय किण्वन (Fermentation): • यीस्ट: 2 एथेनॉल + 2 CO2 (13% पर विषाक्त) • पेशी/जीवाणु: 2 लैक्टिक अम्ल (CO2 नहीं बनती) 2. योजक अभिक्रिया व क्रेब्स चक्र (मैट्रिक्स) योजक अभिक्रिया (पाइरूवेट डिहाइड्रोजिनेस / PDC): 2 पाइरूवेट + 2 CoA + 2 NAD+ ──> 2 एसीटाइल-CoA (2C) + 2 CO2 + 2 NADH 5 सहकारक: TPP, लिपोएट, CoA, FAD, NAD+ TCA चक्र साइट्रेट (6C) α-KG (5C) सक्सीनेट (4C) OAA (4C) प्रति ग्लूकोज क्रेब्स उत्पाद (2 चक्र): 4 CO2 + 6 NADH + 2 FADH2 + 2 ATP (GTP) योजक सहित = 6 CO2 + 8 NADH + 2 FADH2 + 2 ATP सक्सीनेट DH आंतरिक झिल्ली में स्थित (संकुल-II) 3. ETS, रसोपरासरण व श्वसन गुणांक (RQ) आंतरिक झिल्ली के 5 संकुल: • संकुल I: NADH डिहाइड्रोजिनेस (4 H+ पम्प) • संकुल II: सक्सीनेट DH / FADH2 (0 H+ पम्प) • संकुल III: साइटोक्रोम bc1 संकुल (4 H+ पम्प) • संकुल IV: साइटोक्रोम c ऑक्सीडेस (2 H+ पम्प) अंतिम ग्राही: 1/2 O2 + 2 H+ + 2 e- ➔ H2O साइनाइड (CN-) व कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) द्वारा संदमित संकुल V: F0-F1 एटीपेस • अंतराझिल्ली स्थान से प्रोटॉन मैट्रिक्स में आते हैं 1 NADH ➔ 2.5 (3) ATP | 1 FADH2 ➔ 1.5 (2) ATP कुल शुद्ध ATP उत्पादन = 36 से 38 ATP (संशोधित: 30-32) श्वसन गुणांक (RQ = CO2 विमोचन / O2 उपयोग): • कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज): RQ = 6/6 = 1.0 • वसा (ट्राइपामिटिन): RQ = 102/145 = 0.7 • प्रोटीन: RQ = ~0.9 • कार्बनिक अम्ल (मैलिक अम्ल): RQ = 4/3 = 1.33 • अवायवीय = ∞ (अनंत) | मांसल (CAM) रात में = 0.0 श्वसन की उभयचरी (Amphibolic) प्रकृति: मध्यवर्ती जैव-संश्लेषण में प्रयुक्त (एसिटाइल-CoA ➔ लिपिड; α-KG ➔ अमीनो अम्ल; सक्सिनाइल-CoA ➔ क्लोरोफिल)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
कोशिकीय श्वसन जटिल कार्बनिक क्रियाधारों का क्रमिक एंजाइमी ऑक्सीकरण है, जिससे मुक्त रासायनिक ऊर्जा एटीपी के बंधों में संचित होती है।
मुख्य बिंदु 2
पादपों में कोई विशिष्ट श्वसन अंग नहीं होता; वे रंध्रों और वातरंध्रों द्वारा अल्प उपापचयी मांग व छोटी विसरण दूरी के कारण सरलता से गैस विनिमय करते हैं।
मुख्य बिंदु 3
कोशिकाद्रव्य में संपन्न होने वाला ऑक्सीजन-निरपेक्ष ग्लाइकोलिसिस (EMP पथ) 1 ग्लूकोज से 2 पायरूवेट, शुद्ध 2 ATP और 2 NADH उत्पन्न करता है।
मुख्य बिंदु 4
फॉस्फोफ्रुक्टोकाइनेस-1 (PFK-1) ग्लाइकोलिसिस का प्रमुख पेसमेकर नियामक एंजाइम है जो ATP व साइट्रेट द्वारा एलोस्टेरिक रूप से संदमित होता है।
मुख्य बिंदु 5
ऑक्सीजन के अभाव में किण्वन NAD+ का पुनर्चक्रण करता है; यीस्ट में एथेनॉल व CO2 बनता है, जबकि पेशियों में बिना CO2 के लैक्टिक अम्ल बनता है।
मुख्य बिंदु 6
माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में पायरूवेट डिहाइड्रोजिनेस संकुल 5 सहकारकों की सहायता से पायरूवेट का ऑक्सीकारी विकार्बोक्सिलीकरण कर एसिटाइल-CoA बनाता है।
मुख्य बिंदु 7
क्रेब्स चक्र (TCA चक्र) मैट्रिक्स में प्रति ग्लूकोज 2 चक्रों में 4 CO2, 6 NADH, 2 FADH2 और 2 ATP (GTP) उत्पन्न करता है।
मुख्य बिंदु 8
सक्सीनेट डिहाइड्रोजिनेस क्रेब्स चक्र का एकमात्र झिल्ली-बद्ध एंजाइम है जो ईटीएस के संकुल II के रूप में कार्य करता है और मेलोनेट द्वारा संदमित होता है।
मुख्य बिंदु 9
इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र में इलेक्ट्रॉन आंतरिक झिल्ली से गुजरकर ऑक्सीजन तक पहुंचते हैं और प्रोटॉन प्रवणता बनाकर F0-F1 द्वारा 36-38 एटीपी संश्लेषित करते हैं।
मुख्य बिंदु 10
श्वसन पथ अपचय व उपचय दोनों में संलग्न होने के कारण उभयचरी (ऐम्फिबोलिक) है और इसका श्वसन गुणांक शर्करा में 1.0, वसा में 0.7 व कार्बनिक अम्ल में 1 से अधिक होता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
अवायवीय परिस्थितियों में भी ग्लाइकोलिसिस जारी रहता है किंतु क्रेब्स चक्र पूरी तरह क्यों रुक जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: ग्लाइकोलिसिस में ऑक्सीजन की प्रत्यक्ष आवश्यकता नहीं होती और यह किण्वन द्वारा आवश्यक NAD+ का पुनर्चक्रण कर लेता है। इसके विपरीत क्रेब्स चक्र में बने NADH व FADH2 को पुनः ऑक्सीकृत करने हेतु माइटोकॉन्ड्रियल ईटीएस और अंतिम इलेक्ट्रॉन ग्राही के रूप में ऑक्सीजन अनिवार्य है; अतः ऑक्सीजन के अभाव में सहएंजाइमों की कमी से क्रेब्स चक्र रुक जाता है।
2
रक्त शर्करा परीक्षण के दौरान रक्त के नमूने में सोडियम फ्लोराइड मिलाने का जैव-रासायनिक महत्व क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सोडियम फ्लोराइड ग्लाइकोलिसिस के 9वें चरण के एंजाइम इनोलेस (Enolase) को प्रतिस्पर्धी रूप से संदमित करता है। इससे लाल रक्त कोशिकाएं रक्त में उपस्थित ग्लूकोज का उपभोग नहीं कर पाती हैं और प्रयोगशाला में रक्त शर्करा का बिल्कुल सटीक मान प्राप्त होता है।
3
माइटोकॉन्ड्रिया की आंतरिक झिल्ली के एंजाइम सक्सीनेट डिहाइड्रोजिनेस का अद्वितीय महत्व क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सक्सीनेट डिहाइड्रोजिनेस क्रेब्स चक्र का एकमात्र ऐसा एंजाइम है जो घुलनशील मैट्रिक्स में नहीं होता; यह आंतरिक झिल्ली में धंसा रहकर एक साथ क्रेब्स चक्र के सक्सीनेट को फ्यूमरेट में बदलता है और ईटीएस के संकुल II के रूप में FADH2 से इलेक्ट्रॉन यूबिक्विनोन को स्थानांतरित करता है।
4
पोटैशियम साइनाइड कोशिकीय स्तर पर तत्काल श्वसन अवरोध और मृत्यु कैसे उत्पन्न करता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: साइनाइड आयन (CN-) माइटोकॉन्ड्रिया के इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र के संकुल IV (साइटोक्रोम c ऑक्सीडेस) के साइटोक्रोम a3 के हीम लोहे (Fe3+) से अत्यधिक दृढ़ता से बंध जाता है। इससे ऑक्सीजन को इलेक्ट्रॉन स्थानांतरण रुक जाता है, पूरी श्वसन श्रृंखला ठप हो जाती है और एटीपी न बनने से कोशिका तुरंत मर जाती है।
5
अंकुरित अरंडी के बीजों का श्वसन गुणांक (RQ) 1.0 से काफी कम (लगभग 0.7) क्यों होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अरंडी के बीजों में मुख्य संचित भोजन वसा (लिपिड / ट्राइपामिटिन) होता है। वसा अणुओं में कार्बन और हाइड्रोजन की तुलना में ऑक्सीजन की मात्रा अत्यंत कम होती है। अतः इनके पूर्ण ऑक्सीकरण हेतु निष्कासित कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में बहुत अधिक मात्रा में ऑक्सीजन का उपभोग होता है, जिससे RQ का मान लगभग 0.7 आता है।
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अध्याय 1: जीव जगत अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय 3: पादप जगत अध्याय 4: प्राणी जगत अध्याय 5: पुष्पी पादपों की आकारिकी अध्याय 6: पुष्पी पादपों का शारीर अध्याय 7: प्राणियों में संरचनात्मक संगठन अध्याय 8: कोशिका: जीवन की इकाई अध्याय 9: जैव अणु अध्याय 10: कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन अध्याय 11: उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण अध्याय 12: पादप में श्वसन अध्याय 13: पादप वृद्धि एवं परिवर्धन अध्याय 14: पाचन एवं अवशोषण अध्याय 15: श्वसन और गैसों का विनिमय अध्याय 16: शरीर द्रव और परिसंचरण अध्याय 17: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय 18: गमन एवं संचलन अध्याय 19: तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय अध्याय 20: रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

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