कोशिकीय श्वसन (Cellular Respiration) सजीव कोशिकाओं के भीतर संपन्न होने वाला एक अपचयी (Catabolic), ऊर्जा-मोची (Exergonic) और बहु-चरणीय एंजाइमी ऑक्सीकरण प्रक्रम है, जिसमें जटिल कार्बनिक यौगिकों (श्वसन क्रियाधार) के कार्बन-कार्बन ($\text{C}-\text{C}$) बंधों के विखंडन द्वारा मुक्त ऊर्जा को रासायनिक रूप से एडिनोसिन ट्राइफॉस्फेट (ATP) के उच्च-ऊर्जा बंधों में संचित किया जाता है:
- क्रमिक ऊर्जा विमोचन: श्वसन की संपूर्ण ऊर्जा एक ही एकल विस्फोटक दहन चरण में ऊष्मा के रूप में मुक्त नहीं होती, अन्यथा उच्च तापमान से कोशिका नष्ट हो जाती; बल्कि यह नियंत्रित एंजाइमी चरणों में मुक्त होकर एटीपी निर्माण में प्रयुक्त होती है।
- श्वसन क्रियाधार (Respiratory Substrates): वे कार्बनिक यौगिक जिनका श्वसन में ऑक्सीकरण होता है:
- कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज, फ्रुक्टोज, सुक्रोज, स्टार्च): प्राथमिक और सर्वाधिक प्रयुक्त क्रियाधार (प्लावी श्वसन / Floating Respiration)।
- वसा (लिपिड): बीजों के अंकुरण के समय संचित क्रियाधार के रूप में प्रयुक्त (जैसे अरंडी बीज), जो सर्वाधिक ऊर्जा (~38 kJ/g) देते हैं।
- प्रोटीन: दीर्घकालिक भुखमरी या रोगग्रस्त अवस्था में ही जीवद्रव्यीय घटकों से प्रयुक्त होते हैं (जीवद्रव्यी श्वसन / Protoplasmic Respiration), जिससे अमोनिया मुक्त होती है।
- कार्बनिक अम्ल (मैलिक अम्ल, साइट्रिक अम्ल): मांसल मरुद्भिदी (CAM) पादपों में प्रयुक्त।
जंतुओं के विपरीत, पादपों में कोई विशिष्ट श्वसन अंग (जैसे फेफड़े या गलफड़े) अथवा रक्त परिसंचरण तंत्र नहीं होता। पादप अपनी बाह्य सतह पर उपस्थित सूक्ष्म छिद्रों द्वारा सरल विसरण से गैस विनिमय करते हैं: पत्तियों व युवा तनों में रंध्र (Stomata) तथा काष्ठीय तनों व जड़ों में वातरंध्र (Lenticels)। पादप विशिष्ट अंगों के बिना भी श्वसन सुगमता से कर पाते हैं क्योंकि:
- अंगीय स्वायत्तता: पादप का प्रत्येक अंग (पत्ती, तना, जड़) अपनी गैसीय विनिमय आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं करता है। एक अंग से दूसरे अंग में गैसों के व्यापक परिवहन की बहुत कम आवश्यकता होती है।
- न्यून उपापचयी मांग: तीव्र वृद्धि या पुष्पन की अवधि को छोड़कर पादपों में गैसीय विनिमय की दर बहुत कम होती है। गतिशील जंतुओं की तुलना में पादपों की श्वसन दर अत्यधिक मंद होती है।
- विशाल अंतराकोशिकीय अवकाश: पत्तियों में पर्णमध्योतक (मीसोफिल) कोशिकाएं ढीली व्यवस्थित होती हैं और उनके बीच विस्तृत अंतराकोशिकीय वायु स्थान होते हैं, जो रंध्रों के माध्यम से सीधे बाह्य वातावरण से जुड़े रहते हैं।
- अल्प विसरण दूरी: विशालकाय काष्ठीय वृक्षों में भी अधिकांश भीतरी काष्ठ मृत कोशिकाओं से बना होता है। छाल के ठीक नीचे केवल फ्लोएम, कैम्बियम व कॉर्क ऊतक की एक पतली परिधीय परत ही सजीव होती है, जो वातरंध्रों के निकट संपर्क में रहती है।