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WBB • कक्षा XI • Biology • अध्याय 11
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण

उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण एक मूलभूत भौतिक-रासायनिक, उपचयी एवं जैव-रासायनिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हरे स्वपोषी पौधे सौर विकिरण ऊर्जा को अवशोषित कर जल और कार्बन डाइऑक्साइड की सहायता से कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज) के रूप में रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरित करते हैं तथा उप-उत्पाद के रूप में जीवनदायिनी ऑक्सीजन गैस मुक्त करते हैं। इस अध्याय में प्रीस्टले से लेकर वैन नील तक के ऐतिहासिक मील के पत्थर, हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) के थाइलेकॉइड ग्रैना एवं पीठिका (स्ट्रोमा) का संरचनात्मक श्रम-विभाजन, पेपर क्रोमैटोग्राफी द्वारा वर्णकों का पृथक्करण, अवशोषण एवं क्रिया वर्णक्रम, प्रकाशिक अभिक्रिया की Z-स्कीम, जल का प्रकाश-अपघटन (हिल अभिक्रिया), चक्रीय एवं अचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण, पीटर मिशेल की रसोपरासरणी परिकल्पना द्वारा CF0-CF1 एटीपेस से ATP निर्माण, केल्विन चक्र (C3 पथ), C4 क्रैंज़ शारीर व हैच-स्लैक पथ, व्यर्थ प्रकाश-श्वसन (C2 चक्र) तथा ब्लैकमैन का सीमाकारी कारकों का नियम विस्तृत रूप से समझाया गया है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

प्रकाश-संश्लेषण पृथ्वी पर एकमात्र ऐसी जैविक प्रक्रिया है जो सौर ऊर्जा को संचित कर समस्त जीवमंडल के लिए खाद्य ऊर्जा और ऑक्सीजन का सृजन करती है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के दौर में C3 और C4 प्रकाश-संश्लेषण की तुलना और प्रकाश-श्वसन की ऊर्जा हानि को समझना आधुनिक पादप जैव प्रौद्योगिकी का प्रमुख लक्ष्य है; जहां चावल और गेहूं जैसी C3 फसलों में C4 आनुवंशिक तंत्र को समाहित कर उत्पादकता 50 प्रतिशत तक बढ़ाने के प्रयास जारी हैं। कृषि विज्ञान में डाययूरोन (DCMU) और पैराक्वॉट जैसे शाकनाशी प्रकाशिक इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र को अवरुद्ध करके खरपतवार नियंत्रण करते हैं। इसके अतिरिक्त, वाणिज्यिक ग्रीनहाउस में CO2 संवर्धन तकनीक का उपयोग कर टमाटर और शिमला मिर्च की पैदावार में क्रांतिकारी वृद्धि की जा रही है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • कक्षा 11 की पत्ती की आंतरिक संरचना, मीसोफिल ऊतक एवं रंध्रों का सामान्य ज्ञान।
  • जैव अणु अध्याय से ऑक्सीकरण-अपचयन और ATP की ऊर्जा का ज्ञान।
  • विद्युत चुंबकीय विकिरण और दृश्य प्रकाश वर्णक्रम का प्राथमिक परिचय।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 प्रारंभिक ऐतिहासिक प्रयोग एवं हरितल...
2 प्रकाश-संश्लेषी वर्णक, क्रोमैटोग्रा...
3 प्रकाशिक अभिक्रिया: Z-स्कीम, जल का...
4 पीटर मिशेल की रसोपरासरणी परिकल्पना...
5 अप्रकाशिक अभिक्रिया: केल्विन चक्र (...
6 C4 हैच-स्लैक चक्र, क्रैंज़ शारीर, प...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

प्रारंभिक ऐतिहासिक प्रयोग एवं हरितलवक का संरचनात्मक संगठन

1. प्रकाश-संश्लेषण विज्ञान के ऐतिहासिक मील के पत्थर

प्रकाश-संश्लेषण एक भौतिक-रासायनिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा प्रकाश-संश्लेषी जीव प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करके अकार्बनिक कच्चे माल ($\text{CO}_2$ व जल) से कार्बनिक यौगिकों का संश्लेषण करते हैं तथा आणविक ऑक्सीजन ($\text{O}_2$) मुक्त करते हैं। प्रमुख ऐतिहासिक खोजें निम्नलिखित हैं:

  • जोसेफ प्रीस्टले (1770): उन्होंने एक मोमबत्ती, एक चूहे और पुदीने की टहनी (Mentha) के साथ बेलजार प्रयोग किया। उन्होंने देखा कि बंद बेलजार में जलती मोमबत्ती शीघ्र बुझ जाती है और चूहा दम घुटने से मर जाता है; परंतु पुदीने का पौधा रखने पर मोमबत्ती निरंतर जलती रहती है और चूहा जीवित रहता है। प्रीस्टले ने निष्कर्ष निकाला कि जंतुओं के श्वसन और मोमबत्ती के जलने से दूषित हुई वायु को हरे पौधे पुनः शुद्ध कर देते हैं। प्रीस्टले ने 1774 में ऑक्सीजन की खोज की।
  • यान इन्गेनहाउज़ (1779): उन्होंने सिद्ध किया कि पौधों द्वारा वायु शुद्धिकरण के लिए सूर्य का प्रकाश अनिवार्य है। जलीय पौधे (Hydrilla) के प्रयोग से उन्होंने दिखाया कि तीव्र प्रकाश में पौधे के हरे भागों के चारों ओर छोटे-छोटे बुलबुले बनते हैं, जो अंधेरे में नहीं बनते। बाद में उन्होंने पहचाना कि ये बुलबुले ऑक्सीजन के थे।
  • जूलियस वॉन सैक्स (1854): उन्होंने प्रमाण दिया कि पौधे की वृद्धि के समय ग्लूकोज बनता है, जो प्रायः स्टार्च (मंड) के रूप में संचित होता है। उन्होंने यह भी प्रदर्शित किया कि हरा वर्णक (क्लोरोफिल) कोशिका के विशिष्ट अंगकों (हरितलवक) में स्थित होता है।
  • टी. डब्ल्यू. एंजेलमैन (1888): उन्होंने प्रिज्म द्वारा श्वेत प्रकाश को उसके स्पेक्ट्रमी घटकों में विभक्त करके हरे शैवाल Cladophora को प्रकाशित किया और शैवाल को वायवीय जीवाणुओं (ऑक्सीजन खोजी जीवाणु) के निलंबन में रखा। जीवाणु मुख्यतः नीले और लाल प्रकाश के क्षेत्रों में एकत्र हुए। यह प्रकाश-संश्लेषण का पहला क्रिया वर्णक्रम (Action Spectrum) था।
  • कॉर्नेलियस वैन नील (1930s): बैंगनी और हरे सल्फर जीवाणुओं के तुलनात्मक अध्ययन से उन्होंने सिद्ध किया कि प्रकाश-संश्लेषण मूलतः एक प्रकाश-आश्रित रेडॉक्स अभिक्रिया है, जिसमें किसी ऑक्सीकरण योग्य यौगिक का हाइड्रोजन कार्बन डाइऑक्साइड को अपचयित करता है:
    $$2\text{H}_2\text{A} + \text{CO}_2 \xrightarrow{\text{प्रकाश}} 2\text{A} + \text{CH}_2\text{O} + \text{H}_2\text{O}$$
    हरे पादपों में $\text{H}_2\text{O}$ हाइड्रोजन दाता है जो ऑक्सीकृत होकर $\text{O}_2$ देता है। सल्फर जीवाणुओं में $\text{H}_2\text{S}$ हाइड्रोजन दाता होता है, अतः ऑक्सीजन के स्थान पर सल्फर बनता है। वैन नील ने प्रतिपादित किया कि प्रकाश-संश्लेषण में मुक्त होने वाली $\text{O}_2$ जल से आती है, $\text{CO}_2$ से नहीं। 1941 में रूबेन, रैंडल और कामेन ने भारी समस्थानिक $^{18}\text{O}$ का प्रयोग करके इसे अकाट्य रूप से सिद्ध किया:
    $$6\text{CO}_2^{16} + 12\text{H}_2\text{O}^{18} \xrightarrow{\text{प्रकाश, वर्णक}} \text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6^{16} + 6\text{H}_2\text{O}^{16} + 6\text{O}_2^{18}$$
2. हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) की संरचना एवं कार्यिकीय श्रम-विभाजन

पत्ती की पर्णमध्योतक (मीसोफिल) कोशिकाओं में प्रति कोशिका 20 से 100 हरितलवक पाए जाते हैं। हरितलवक में झिल्लीदार तंत्र और तरल पीठिका के मध्य स्पष्ट श्रम-विभाजन होता है:

हरितलवक का भाग संरचनात्मक संगठन कार्यिकी एवं अभिक्रिया प्रावस्था
ग्रैना एवं थायलेकॉइड झिल्ली चपटी थैलियों के रूप में सिक्कों के चट्टे जैसी संरचनाएं (10–100 थायलेकॉइड प्रति ग्रैनम)। इसमें PS I, PS II, साइटोक्रोम $b_6f$ एवं ATP सिंथेस अंतर्निहित होते हैं। प्रकाशिक अभिक्रिया (प्रकाश-रासायनिक प्रावस्था): सौर ऊर्जा का अवशोषण, जल का प्रकाश-अपघटन, स्वांगीकारी शक्ति (ATP व NADPH) का निर्माण एवं ऑक्सीजन विमोचन।
थायलेकॉइड अवकाशिका (Lumen) थायलेकॉइड झिल्ली से घिरा आंतरिक जलीय स्थान। प्रकाशिक प्रावस्था में अत्यधिक प्रोटॉन जमाव के कारण इसका pH अम्लीय (~5.0) हो जाता है। OEC द्वारा जल-अपघटन का स्थल तथा रसोपरासरणी प्रवणता हेतु $H^+$ प्रोटॉनों का संचयन।
पीठिका (Stroma) हरितलवक का अर्ध-तरल मैट्रिक्स; इसमें वृत्ताकार dsDNA, 70S राइबोसोम, घुलनशील एंजाइम एवं मैग्नीशियम आयन होते हैं। अप्रकाशिक अभिक्रिया (जैव-संश्लेषण प्रावस्था): रुबिस्को एंजाइम की सहायता से केल्विन चक्र द्वारा $\text{CO}_2$ का अपचयन कर शर्करा का निर्माण।
पीठिका लैमिली (Stroma Lamellae) ग्रैना को परस्पर जोड़ने वाली नलिकाकार झिल्लियां। इनमें PS II और NADP रिडक्टेस एंजाइम अनुपस्थित होते हैं। चक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण का स्थल; केवल PS I ($P_{700}$) सक्रिय रहकर अतिरिक्त ATP का संश्लेषण करता है।

प्रकाश-संश्लेषी वर्णक, क्रोमैटोग्राफी एवं अवशोषण बनाम क्रिया वर्णक्रम

1. पेपर क्रोमैटोग्राफी द्वारा वर्णकों का पृथक्करण

पत्ती का हरा रंग किसी एक वर्णक के कारण नहीं होता, बल्कि चार प्रमुख वर्णकों के मिश्रण से बनता है, जिन्हें पेपर क्रोमैटोग्राफी द्वारा सुगमता से पृथक किया जा सकता है:

  • क्लोरोफिल a ($\text{C}_{55}\text{H}_{72}\text{O}_5\text{N}_4\text{Mg}$): क्रोमैटोग्राम पर चमकीला अथवा नीला-हरा दिखाई देता है। यह मुख्य अभिक्रिया केंद्र वर्णक है जो प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करने में सक्षम है। इसके पोरफाइरिन वलय के तीसरे कार्बन पर मिथाइल ($-\text{CH}_3$) समूह होता है।
  • क्लोरोफिल b ($\text{C}_{55}\text{H}_{70}\text{O}_6\text{N}_4\text{Mg}$): क्रोमैटोग्राम पर पीला-हरा दिखाई देता है। इसके तीसरे कार्बन पर फॉर्मिल ($-\text{CHO}$) समूह होता है। यह एक सहायक वर्णक है जो अतिरिक्त तरंगदैर्घ्य को अवशोषित कर ऊर्जा क्लोरोफिल a को स्थानांतरित करता है।
  • जैंथोफिल ($\text{C}_{40}\text{H}_{56}\text{O}_2$): ऑक्सीजनयुक्त कैरोटीनॉयड (जैसे ल्यूटिन) जो क्रोमैटोग्राम पर पीले रंग के रूप में दिखाई देते हैं।
  • कैरोटीनॉयड ($\text{C}_{40}\text{H}_{56}$): शुद्ध हाइड्रोकार्बन (जैसे $\beta$-कैरोटीन) जो क्रोमैटोग्राम पर पीले से नारंगी दिखाई देते हैं। ये अनिवार्य ढाल वर्णक (Shield Pigments) हैं जो क्लोरोफिल a को अत्यधिक प्रकाश में प्रकाश-ऑक्सीकरण (सोलराइजेशन) से बचाते हैं।
2. अवशोषण वर्णक्रम बनाम क्रिया वर्णक्रम

प्रकाश तरंगदैर्घ्य के साथ वर्णकों की अंतःक्रिया को दो प्रमुख आलेखों द्वारा समझा जाता है:

  • अवशोषण वर्णक्रम (Absorption Spectrum): विभिन्न तरंगदैर्घ्य (400–700 nm, PAR) पर किसी शुद्ध वर्णक द्वारा अवशोषित प्रकाश की मात्रा का आलेख। क्लोरोफिल a मुख्य रूप से नीले क्षेत्र (~430 nm) और लाल क्षेत्र (~660 nm) में अधिकतम अवशोषण प्रदर्शित करता है।
  • क्रिया वर्णक्रम (Action Spectrum): प्रकाश के विभिन्न तरंगदैर्घ्य पर प्रकाश-संश्लेषण की वास्तविक दर (ऑक्सीजन विमोचन की दर) को प्रदर्शित करने वाला आलेख।
  • आलेखों का अतिव्यापन: क्लोरोफिल a का अवशोषण वर्णक्रम प्रकाश-संश्लेषण के क्रिया वर्णक्रम के साथ लगभग पूर्णतः संपाती (overlap) होता है। यह सिद्ध करता है कि क्लोरोफिल a ही प्रकाश-संश्लेषण का मुख्य वर्णक है। मध्यवर्ती तरंगदैर्घ्य (450–600 nm) पर सहायक वर्णक ऊर्जा अवशोषित कर क्लोरोफिल a को प्रदान करते हैं।
3. प्रकाश संग्रहण संकुल (LHC / एंटीना संकुल)

थायलेकॉइड झिल्ली में स्थित प्रत्येक फोटोसिस्टम दो भागों में विभाजित होता है:

  • अभिक्रिया केंद्र (Reaction Centre): एक विशिष्ट क्लोरोफिल a अणु युग्म से बनता है। फोटोसिस्टम-II (PS II) का अभिक्रिया केंद्र $P_{680}$ (680 nm पर अधिकतम अवशोषण) तथा फोटोसिस्टम-I (PS I) का अभिक्रिया केंद्र $P_{700}$ (700 nm पर अधिकतम अवशोषण) कहलाता है।
  • एंटीना या प्रकाश संग्रहण संकुल (LHC): सैकड़ों (200–400) सहायक वर्णक प्रोटीनों से आबद्ध होकर एंटीना की भांति कार्य करते हैं। ये फोटॉनों को अवशोषित कर अनुनाद ऊर्जा स्थानांतरण द्वारा ऊर्जा को केंद्रीय अभिक्रिया केंद्र तक पहुंचाते हैं।

प्रकाशिक अभिक्रिया: Z-स्कीम, जल का प्रकाश-अपघटन व प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण

1. अचक्रीय इलेक्ट्रॉन परिवहन एवं Z-स्कीम

प्रकाशिक अभिक्रिया थायलेकॉइड झिल्ली पर संपन्न होती है। रेडॉक्स विभव पैमाने पर इलेक्ट्रॉन परिवहन का पथ अंग्रेजी के 'Z' अक्षर जैसा दिखाई देता है:

  1. PS II ($P_{680}$) का उत्तेजन: 680 nm की लाल किरणें अवशोषित कर $P_{680}$ उत्तेजित होता है और उच्च ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन त्यागता है।
  2. प्राथमिक इलेक्ट्रॉन ग्राही: उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों को PS II का प्राथमिक ग्राही फियोफाइटिन (Pheophytin) ग्रहण करता है (यह मैग्नीशियम रहित क्लोरोफिल अणु है)।
  3. अधोगामी इलेक्ट्रॉन परिवहन शृंखला: फियोफाइटिन से इलेक्ट्रॉन क्रमिक रूप से आगे बढ़ते हैं:
    • प्लास्टोक्विनोन (PQ): लिपिड-घुलनशील वाहक जो स्ट्रोमा से दो प्रोटॉन लेकर अपचयित प्लास्टोक्विनोल ($\text{PQH}_2$) बनाता है।
    • साइटोक्रोम $b_6f$ संकुल: $\text{PQH}_2$ से इलेक्ट्रॉन लेकर प्रोटॉनों को थायलेकॉइड अवकाशिका में मुक्त करता है।
    • प्लास्टोसायनिन (PC): तांबा-युक्त जल-घुलनशील वाहक जो इलेक्ट्रॉन सीधे PS I के ऑक्सीकृत $P_{700}^+$ केंद्र को प्रदान करता है।
  4. PS I ($P_{700}$) का उत्तेजन: उसी समय PS I 700 nm प्रकाश अवशोषित कर इलेक्ट्रॉन प्राथमिक ग्राही $A_0$ को देता है। PC से आए इलेक्ट्रॉन $P_{700}$ की रिक्ति को भरते हैं।
  5. $\text{NADP}^+$ का अपचयन: फेरेडॉक्सिन (Fd) से इलेक्ट्रॉन थायलेकॉइड के पीठिका पृष्ठ पर स्थित FNR (फेरेडॉक्सिन-$\text{NADP}^+$ रिडक्टेस) तक पहुंचते हैं, जो स्ट्रोमा के प्रोटॉन का उपयोग कर $\text{NADP}^+$ को $\text{NADPH} + H^+$ में अपचयित कर देता है:
    $$\text{NADP}^+ + 2e^- + 2H^+_{\text{पीठिका}} \xrightarrow{\text{FNR}} \text{NADPH} + H^+$$
2. जल का प्रकाश-अपघटन (हिल अभिक्रिया व OEC)

इलेक्ट्रॉन त्यागने के बाद $P_{680}^+$ अत्यंत प्रबल ऑक्सीकारक बन जाता है (+1.25 V)। इस इलेक्ट्रॉन रिक्ति को भरने हेतु थायलेकॉइड झिल्ली की अवकाशिका की ओर स्थित ऑक्सीजन-उत्सर्जक संकुल (OEC) जल का विखंडन करता है:

$$2\text{H}_2\text{O} \xrightarrow{\text{Mn}^{4+}, \text{Ca}^{2+}, \text{Cl}^-} 4H^+_{\text{अवकाशिका}} + 4e^- + \text{O}_2 \uparrow$$
  • 1 अणु ऑक्सीजन विमोचन हेतु जल के 2 अणुओं का टूटना और 4 इलेक्ट्रॉनों व 4 प्रोटॉनों का उत्पन्न होना आवश्यक है।
  • उत्पन्न प्रोटॉन अवकाशिका में संचित होकर रसोपरासरणी प्रवणता का निर्माण करते हैं।
3. तुलना: अचक्रीय बनाम चक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण
लक्षण अचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण चक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण
संबंधित फोटोसिस्टम PS II ($P_{680}$) एवं PS I ($P_{700}$) दोनों एक साथ कार्य करते हैं। केवल PS I ($P_{700}$) कार्य करता है।
स्थान ग्रैना थायलेकॉइड झिल्ली में। पीठिका लैमिली में (जहां PS II व FNR अनुपस्थित होते हैं)।
इलेक्ट्रॉन प्रवाह पथ एकदिशीय खुला पथ: $\text{H}_2\text{O} \to \text{PS II} \to \text{PS I} \to \text{NADP}^+$। बंद चक्रीय पथ: $P_{700}$ से निकला इलेक्ट्रॉन फेरेडॉक्सिन व साइटोक्रोम होकर पुनः $P_{700}$ में लौटता है।
जल विखंडन व $\text{O}_2$ निकास जल का विखंडन होता है तथा $\text{O}_2$ मुक्त होती है। जल विखंडन नहीं होता तथा $\text{O}_2$ मुक्त नहीं होती।
उत्पाद ATP एवं NADPH दोनों बनते हैं। केवल ATP बनता है; NADPH नहीं बनता।
कार्यिकीय महत्व प्रकाश-संश्लेषण का मुख्य ऊर्जा स्रोत। केल्विन चक्र हेतु अतिरिक्त ATP की आवश्यकता पूरी करता है। 680 nm से अधिक तरंगदैर्घ्य पर सक्रिय होता है।

पीटर मिशेल की रसोपरासरणी परिकल्पना एवं ATP संश्लेषण क्रियाविधि

1. रसोपरासरणी सिद्धांत की मूल अवधारणा

1961 में ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर मिशेल ने थायलेकॉइड झिल्ली के आर-पार ATP निर्माण की क्रियाविधि रसोपरासरणी परिकल्पना द्वारा समझाई (नोबल पुरस्कार 1978)। माइटोकॉन्ड्रिया की भांति हरितलवक में भी ATP का संश्लेषण प्रोटॉन विद्युत-रासायनिक प्रवणता ($\Delta\mu_{H^+}$) के टूटने से होता है। अंतर केवल इतना है कि हरितलवक में प्रोटॉन झिल्ली के बाहर नहीं, बल्कि थायलेकॉइड अवकाशिका (Lumen) के भीतर संचित होते हैं।

2. अवकाशिका में प्रोटॉन प्रवणता बनने के तीन कारण
  1. अवकाशिका में जल का प्रकाश-अपघटन: जल विखंडन संकुल (OEC) थायलेकॉइड झिल्ली के आंतरिक (अवकाशिका) पृष्ठ पर स्थित होता है, जिससे जल के अपघटन से उत्पन्न प्रोटॉन सीधे अवकाशिका में मुक्त होते हैं।
  2. प्लास्टोक्विनोन (PQ) द्वारा प्रोटॉन स्थानांतरण: प्लास्टोक्विनोन केवल इलेक्ट्रॉन नहीं, बल्कि हाइड्रोजन वाहक है। PS II से इलेक्ट्रॉन लेते समय यह पीठिका (स्ट्रोमा) से दो प्रोटॉन लेता है और साइटोक्रोम $b_6f$ को इलेक्ट्रॉन देते समय इन प्रोटॉनों को अवकाशिका में धकेल देता है।
  3. पीठिका में $\text{NADP}^+$ रिडक्टेस द्वारा प्रोटॉन उपयोग: FNR एंजाइम पीठिका पृष्ठ पर होता है जो $\text{NADP}^+$ के अपचयन में पीठिका के मुक्त प्रोटॉनों का उपभोग करता है, जिससे पीठिका में प्रोटॉन और कम हो जाते हैं।
3. प्रोटॉन प्रेरक बल एवं $CF_0-CF_1$ एटीपेस मोटर

अवकाशिका में प्रोटॉन सांद्रता अत्यधिक बढ़ने से अवकाशिका अम्लीय (pH ~5.0) तथा पीठिका क्षारीय (pH ~8.0) हो जाती है। यह 3 pH इकाई का अंतर (1000 गुना प्रवणता) प्रोटॉन प्रेरक बल (PMF) उत्पन्न करता है:

  • $CF_0$ भाग: थायलेकॉइड झिल्ली में धंसा एक हाइड्रोफोबिक प्रोटॉन चैनल है जिसके माध्यम से प्रोटॉन सुसाध्य विसरण द्वारा पीठिका में लौटते हैं।
  • $CF_1$ शीर्ष: पीठिका की ओर उभरा उत्प्रेरकी सिरा है। जब 3 से 4 प्रोटॉन $CF_0$ से होकर गुजरते हैं, तो $CF_1$ के संरचनात्मक घूर्णन से ADP और अकार्बनिक फॉस्फेट मिलकर ATP का संश्लेषण करते हैं:
    $$\text{ADP} + \text{P}_i \xrightarrow{CF_0-CF_1\text{ ATP Synthase}} \text{ATP}$$

अप्रकाशिक अभिक्रिया: केल्विन चक्र (C3 पथ), रुबिस्को व ऊर्जा बजट

1. जैव-संश्लेषण प्रावस्था (केल्विन चक्र / $C_3$ पथ)

प्रकाशिक अभिक्रिया में निर्मित ATP एवं NADPH का उपयोग करके हरितलवक की पीठिका में $\text{CO}_2$ के अपचयन द्वारा कार्बोहाइड्रेट बनने के चक्रीय पथ को केल्विन चक्र ($C_3$ पथ) कहते हैं। मेल्विन केल्विन और उनके सहयोगियों ने रेडियोधर्मी समस्थानिक $^{14}\text{C}$ और शैवाल (Chlorella) का उपयोग करके इसकी खोज की (नोबेल पुरस्कार 1961)।

2. केल्विन चक्र के तीन प्रमुख चरण
  1. चरण 1: कार्बोक्सीलीकरण (Carboxylation):
    • प्राथमिक $\text{CO}_2$ ग्राही 5-कार्बन युक्त शर्करा राइबुलोज-1,5-बिसफॉस्फेट (RuBP) है।
    • रुबिस्को (RuBisCO) एंजाइम की उपस्थिति में $\text{CO}_2$ व जल RuBP से जुड़कर एक अस्थायी 6C यौगिक बनाते हैं, जो तुरंत टूटकर 3-फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (3-PGA, 3C) के 2 अणु बनाता है:
      $$\text{RuBP (5C)} + \text{CO}_2 + \text{H}_2\text{O} \xrightarrow{\text{RuBisCO}} 2 \times \text{3-PGA (3C)}$$
    • प्रथम स्थायी उत्पाद 3-कार्बन अम्ल होने के कारण इसे $C_3$ पथ कहते हैं।
  2. चरण 2: अपचयन (Reduction):
    • 3-PGA एंजाइमी अभिक्रियाओं द्वारा अपचयित होकर ट्रायोज़ फॉस्फेट (G3P / PGAL) में बदलता है।
    • प्रत्येक $\text{CO}_2$ अणु के स्थिरीकरण हेतु 2 अणु ATP तथा 2 अणु NADPH व्यय होते हैं।
    • 6 $\text{CO}_2$ के चक्रण से 12 ट्रायोज़ फॉस्फेट बनते हैं, जिनमें से 2 अणु चक्र से बाहर निकलकर ग्लूकोज बनाते हैं।
  3. चरण 3: RuBP का पुनरुद्भवन (Regeneration):
    • चक्र को अनवरत चलाने हेतु शेष 10 ट्रायोज़ फॉस्फेट जटिल शर्करा पुनर्गठन द्वारा 6 RuBP अणुओं का पुनर्निर्माण करते हैं।
    • प्रत्येक RuBP के पुनरुद्भवन में 1 अणु ATP व्यय होता है।
3. 1 ग्लूकोज अणु ($\text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6$) निर्माण का सम्पूर्ण ऊर्जा बजट

चूंकि एक चक्र में केवल 1 $\text{CO}_2$ स्थिर होता है, अतः 1 ग्लूकोज (6C) बनाने हेतु केल्विन चक्र के 6 चक्र अनिवार्य हैं:

घटक निवेश / लागत (1 ग्लूकोज हेतु) उत्पाद (1 ग्लूकोज हेतु)
कार्बन डाइऑक्साइड ($\text{CO}_2$) $6\text{ CO}_2$ $1\text{ ग्लूकोज } (\text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6)$
ATP (ऊर्जा) $18\text{ ATP}$ (अपचयन में 12 + पुनरुद्भवन में 6) $18\text{ ADP} + 18\text{ P}_i$
NADPH (अपचायक शक्ति) $12\text{ NADPH}$ (प्रति $\text{CO}_2$ 2 अणु) $12\text{ NADP}^+$

C4 हैच-स्लैक चक्र, क्रैंज़ शारीर, प्रकाश-श्वसन एवं सीमाकारी कारक

1. C4 पथ एवं क्रैंज़ शारीर (Kranz Anatomy)

उष्णकटिबंधीय शुष्क क्षेत्रों के पौधों (जैसे मक्का, गन्ना, ज्वार) में प्रकाश-श्वसन की हानि से बचने हेतु $C_4$ पथ या हैच एवं स्लैक चक्र (1966) पाया जाता है। इनकी पत्तियों में विशेष क्रैंज़ शारीर पाया जाता है:

  • पूल-आच्छद कोशिकाएं (Bundle Sheath Cells): संवहन बंडल के चारों ओर सघन छल्ले (माला) के रूप में विन्यस्त होती हैं। इनकी भित्तियां मोटी व गैसों हेतु अप्रवेश्य होती हैं, अंतरकोशिकीय स्थान नहीं होते, तथा इनमें अग्रैनल हरितलवक प्रचुर रुबिस्को सहित पाए जाते हैं (PEPcase अनुपस्थित)।
  • पर्णमध्योतक कोशिकाएं (Mesophyll Cells): ढीली विन्यस्त होती हैं और इनमें ग्रैनलयुक्त हरितलवक होते हैं। इनमें प्रचुर PEP कार्बोक्सिलेस (PEPcase) होता है, किंतु रुबिस्को पूरी तरह अनुपस्थित होता है। दोनों कोशिकाएं प्लाज्मोडेस्मेटा द्वारा जुड़ी रहती हैं।
2. हैच-स्लैक चक्र के पद
  1. पर्णमध्योतक में प्राथमिक स्थिरीकरण: प्राथमिक ग्राही 3-कार्बन यौगिक फॉस्फोइनोलपाइरूवेट (PEP) है। PEPcase एंजाइम द्वारा $\text{HCO}_3^-$ जुड़कर प्रथम 4-कार्बन अम्ल ऑक्जेलोएसिटिक अम्ल (OAA, 4C) बनाता है:
    $$\text{PEP (3C)} + \text{HCO}_3^- \xrightarrow{\text{PEPcase}} \text{OAA (4C)}$$
    नोट: PEPcase की $\text{CO}_2$ के प्रति बंधुता रुबिस्को से अत्यधिक अधिक है और इसमें कोई ऑक्सीजिनेज सक्रियता नहीं होती।
  2. स्थानांतरण व विकार्बोक्सीलीकरण: OAA मैलिक अम्ल में बदलकर पूल-आच्छद कोशिकाओं में भेजा जाता है, जहां यह टूटकर पाइरूविक अम्ल (3C) और $\text{CO}_2$ मुक्त करता है।
  3. रुबिस्को द्वारा केल्विन चक्र: पूल-आच्छद में मुक्त यह $\text{CO}_2$ रुबिस्को के चारों ओर स्थानीय सांद्रता बहुत बढ़ा देता है, जिससे रुबिस्को केवल कार्बोक्सिलेस के रूप में कार्य करता है और शर्करा बनाता है।
  4. PEP का पुनरुद्भवन: पाइरूवेट वापस पर्णमध्योतक में आकर 2 ATP के तुल्य ऊर्जा खर्च कर पुनः PEP बनाता है। अतः C4 पादपों में 1 ग्लूकोज हेतु 30 ATP एवं 12 NADPH व्यय होते हैं।
3. प्रकाश-श्वसन (व्यर्थ C2 चक्र / ग्लाइकोलेट पथ)

C3 पादपों में रुबिस्को एक दोहरे स्वभाव वाला एंजाइम है। उच्च ताप व कम $\text{CO}_2$ में यह ऑक्सीजन से जुड़ता है:

  • अभिक्रिया: $\text{RuBP (5C)} + \text{O}_2 \xrightarrow{\text{RuBisCO}} \text{3-PGA (3C)} + \text{2-फॉस्फोग्लाइकोलेट (2C)}$।
  • फॉस्फोग्लाइकोलेट को पुनः प्राप्त करने हेतु तीन अंगक मिलकर कार्य करते हैं: हरितलवक $\to$ परऑक्सीसोम $\to$ माइटोकॉन्ड्रिया।
  • व्यर्थ प्रक्रिया: इसमें न तो ATP बनता है, न शर्करा; उल्टे ऊर्जा नष्ट होती है और स्थिर कार्बन $\text{CO}_2$ के रूप में उड़ जाता है। C3 पादपों की उत्पादकता 25% घट जाती है। C4 पादपों में प्रकाश-श्वसन शून्य होता है।
4. प्रकाश-संश्लेषण के कारक एवं ब्लैकमैन का नियम
  • ब्लैकमैन का सीमाकारी कारकों का नियम (1905): "जब कोई कार्यिकीय प्रक्रिया कई पृथक कारकों द्वारा प्रभावित होती है, तो प्रक्रिया की दर उस कारक द्वारा सीमित होती है जो अपने न्यूनतम मान के निकट होता है।"
  • कार्बन डाइऑक्साइड: वायुमंडल में $\text{CO}_2$ की मात्रा केवल 0.03–0.04% है, अतः यह मुख्य सीमाकारी कारक है। C3 पादप ~450 ppm पर संतृप्त होते हैं, जिसका उपयोग ग्रीनहाउस में पैदावार बढ़ाने हेतु किया जाता है।
  • प्रकाश: पूर्ण सूर्य के प्रकाश की केवल 10% तीव्रता पर ही प्रकाश संतृप्ति हो जाती है। अत्यधिक प्रकाश में क्लोरोफिल का सोलराइजेशन (प्रकाश-ऑक्सीकरण) हो जाता है।
  • तापमान: अप्रकाशिक अभिक्रिया एंजाइमी होने के कारण ताप-संवेदनशील होती है। C4 पादपों का अनुकूल ताप अधिक (30°–45°C) तथा C3 पादपों का कम (20°–25°C) होता है।
  • जल: जल की कमी से रंध्र बंद हो जाते हैं, जिससे $\text{CO}_2$ की उपलब्धता घट जाती है और पत्तियां मुरझाने से प्रकाश-संश्लेषण गिर जाता है।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

केल्विन चक्र रससमीकरणमिति ($C_3$ पथ)
18 ATP एवं 12 NADPH / ग्लूकोज
प्रति CO2 अणु 3 ATP व 2 NADPH की आवश्यकता होती है।
हैच एवं स्लैक चक्र ऊर्जा बजट ($C_4$ पथ)
30 ATP एवं 12 NADPH / ग्लूकोज
C3 से अधिक ATP लगने के बावजूद प्रकाश-श्वसन न होने से यह अधिक दक्ष है।
जल का प्रकाश-अपघटन समीकरण (हिल अभिक्रिया)
प्रति O2 4 इलेक्ट्रॉन व 4 प्रोटॉन
मैंगनीज (Mn) और क्लोराइड (Cl) अनिवार्य उत्प्रेरक आयन हैं।
रसोपरासरणी ATP कपलिंग अनुपात
3-4 H+ / ATP
पीटर मिशेल की रसोपरासरणी परिकल्पना।
रुबिस्को की ऑक्सीजिनेज अभिक्रिया (प्रकाश-श्वसन)
1 PGA (3C) + 1 फॉस्फोग्लाइकोलेट (2C)
हरितलवक, परऑक्सीसोम व माइटोकॉन्ड्रिया मिलकर C2 पथ चलाते हैं।
क्वांटम आवश्यकता एवं क्वांटम लब्धि
8-10 क्वांटा प्रति O2
क्वांटम लब्धि अवशोषित प्रकाश प्रति उत्सर्जित O2 का अनुपात है।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
(a) प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाशिक अभिक्रिया में अचक्रीय इलेक्ट्रॉन परिवहन (Z-स्कीम) का क्रमबद्ध वर्णन कीजिए। (b) निरंतर इलेक्ट्रॉन प्रवाह हेतु जल का प्रकाश-अपघटन क्यों आवश्यक है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

WBCHSE मूल्यांकन योजनानुसार विस्तृत उत्तर:

(a) अचक्रीय इलेक्ट्रॉन परिवहन (Z-स्कीम) [3 अंक]:

  1. PS II का उत्तेजन: फोटोसिस्टम-II का अभिक्रिया केंद्र (P680) 680 nm का लाल प्रकाश अवशोषित कर उत्तेजित होता है और उच्च ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित करता है, जिन्हें प्राथमिक ग्राही फियोफाइटिन ग्रहण करता है।
  2. इलेक्ट्रॉन परिवहन शृंखला: फियोफाइटिन से इलेक्ट्रॉन ढालू रेडॉक्स विभव पर प्लास्टोक्विनोन (PQ) -> साइटोक्रोम b6f संकुल -> प्लास्टोसायनिन (PC) में जाते हैं। PQ द्वारा पीठिका से प्रोटॉन अवकाशिका में भेजे जाने से प्रोटॉन प्रवणता बनती है।
  3. PS I उत्तेजन व NADPH निर्माण: इसी समय PS I (P700) प्रकाश अवशोषित कर इलेक्ट्रॉन फेरेडॉक्सिन (Fd) को भेजता है। PC से आए इलेक्ट्रॉन P700 की रिक्ति भरते हैं। अंत में FNR एंजाइम की सहायता से NADP+ अपचयित होकर NADPH + H+ बनाता है।

(b) जल के प्रकाश-अपघटन की आवश्यकता [2 अंक]:

  1. P680 की रिक्ति की पूर्ति: इलेक्ट्रॉन त्यागने के बाद P680 अत्यंत प्रबल ऑक्सीकारक (P680+) बन जाता है। यदि जल का अपघटन न हो, तो इलेक्ट्रॉन प्रवाह तुरंत रुक जाएगा। OEC जल को तोड़कर (2 H2O -> 4 H+ + 4 e- + O2) इलेक्ट्रॉन P680+ को प्रदान करता है।
  2. प्रोटॉन प्रवणता व ऑक्सीजन मुक्ति: अवकाशिका में मुक्त 4 प्रोटॉन ATP निर्माण हेतु प्रवणता बनाते हैं तथा O2 वायुमंडल में मुक्त होती है।
उदाहरण 2
(a) केल्विन चक्र (C3 पथ) के तीन प्रमुख चरणों को रासायनिक अभिक्रियाओं सहित समझाइए। (b) 1 अणु सुक्रोज (C12H22O11) बनाने हेतु कुल कितने ATP एवं NADPH अणुओं की आवश्यकता होगी? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(a) केल्विन चक्र के तीन प्रमुख चरण [3 अंक]:

  1. कार्बोक्सीलीकरण: 5-कार्बन युक्त RuBP के साथ CO2 व जल रुबिस्को एंजाइम की उपस्थिति में क्रिया कर 3-फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (3-PGA) के 2 अणु बनाते हैं। अभिक्रिया: RuBP + CO2 + H2O -> 2 (3-PGA)।
  2. अपचयन: 3-PGA ATP और NADPH द्वारा अपचयित होकर ट्रायोज़ फॉस्फेट (G3P) बनाता है। प्रति CO2 2 ATP और 2 NADPH व्यय होते हैं।
  3. पुनरुद्भवन: ट्रायोज़ फॉस्फेट से पुनः RuBP का पुनर्निर्माण होता है, जिसमें प्रति RuBP 1 ATP व्यय होता है।

(b) 1 अणु सुक्रोज हेतु ऊर्जा गणना [2 अंक]:

  1. सुक्रोज (C12H22O11) एक डाइसैकेराइड (12 कार्बन) है, जिसे बनाने हेतु केल्विन चक्र के 12 चक्र (12 CO2 का स्थिरीकरण) आवश्यक हैं।
  2. प्रति CO2 आवश्यकता = 3 ATP तथा 2 NADPH।
  3. 12 CO2 हेतु कुल ATP = 12 * 3 = 36 ATP।
  4. 12 CO2 हेतु कुल NADPH = 12 * 2 = 24 NADPH। अतः 1 अणु सुक्रोज संश्लेषण हेतु 36 ATP और 24 NADPH आवश्यक हैं।
उदाहरण 3
(a) क्रैंज़ शारीर क्या है? C4 पत्तियों की पर्णमध्योतक एवं पूल-आच्छद कोशिकाओं की विशेषताएं लिखिए। (b) C4 पादपों में प्रकाश-श्वसन क्यों नहीं होता? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(a) क्रैंज़ शारीर एवं कोशिकीय विशेषताएं [3 अंक]:

  1. परिभाषा: मक्का, गन्ना आदि C4 पादपों की पत्तियों में संवहन बंडलों के चारों ओर बड़ी पूल-आच्छद कोशिकाओं की माला या छल्ले जैसी सघन व्यवस्था को क्रैंज़ शारीर कहते हैं।
  2. पूल-आच्छद कोशिकाएं: कई परतों में सघन, भित्तियां मोटी व गैस-अभेद्य, अंतरकोशिकीय स्थान रहित तथा बड़े अग्रैनल हरितलवक प्रचुर रुबिस्को सहित (PEPcase रहित)।
  3. पर्णमध्योतक कोशिकाएं: पतली भित्ति युक्त, ग्रैनलयुक्त हरितलवक सहित तथा इनमें प्रचुर PEPcase होता है, किंतु रुबिस्को पूरी तरह अनुपस्थित होता है।

(b) प्रकाश-श्वसन न होने का कारण [2 अंक]:

  1. पर्णमध्योतक में PEPcase अत्यधिक कम CO2 में भी केवल CO2 बांधकर OAA व मैलिक अम्ल बनाता है (यह O2 से क्रिया नहीं करता)।
  2. मैलिक अम्ल पूल-आच्छद में जाकर विघटित होता है और प्रचुर मात्रा में CO2 मुक्त करता है।
  3. इस कारण पूल-आच्छद में रुबिस्को के पास CO2 की स्थानीय सांद्रता बहुत अधिक हो जाती है, जिससे रुबिस्को की ऑक्सीजिनेज क्षमता पूर्णतः दब जाती है और यह केवल कार्बोक्सिलेस के रूप में कार्य करता है। अतः C4 पादपों में प्रकाश-श्वसन की कोई हानि नहीं होती।
उदाहरण 4
(a) चार विशिष्ट लक्षणों के आधार पर चक्रीय एवं अचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण में अंतर स्पष्ट कीजिए। (b) किन परिस्थितियों में क्लोरोप्लास्ट चक्रीय पथ अपनाता है? [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(a) चक्रीय बनाम अचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण [3 अंक]:

  1. फोटोसिस्टम: अचक्रीय में PS II व PS I दोनों कार्य करते हैं; चक्रीय में केवल PS I कार्य करता है।
  2. इलेक्ट्रॉन पथ: अचक्रीय में इलेक्ट्रॉन जल से NADP+ तक खुला एकदिशीय गमन करते हैं; चक्रीय में P700 से निकले इलेक्ट्रॉन पुनः P700 में लौटते हैं (बंद चक्र)।
  3. उत्पाद: अचक्रीय में ATP, NADPH व O2 बनते हैं; चक्रीय में केवल ATP बनता है (NADPH या O2 नहीं बनता)।
  4. स्थान: अचक्रीय ग्रैना थायलेकॉइड में होता है; चक्रीय पीठिका लैमिली में होता है जहां PS II व FNR नहीं होते।

(b) चक्रीय पथ की अनुकूल परिस्थितियां [2 अंक]:

  1. दीर्घ तरंगदैर्घ्य का प्रकाश: जब 680 nm से अधिक तरंगदैर्घ्य (लाल/सुदूर लाल) का प्रकाश आपतित होता है, तो केवल PS I सक्रिय होकर चक्रीय पथ चलाता है।
  2. उच्च NADPH/NADP+ अनुपात: जब CO2 स्थिरीकरण धीमा होने से NADP+ की कमी हो जाती है, तो इलेक्ट्रॉन NADP+ में न जाकर साइटोक्रोम संकुल में लौटते हैं और अतिरिक्त ATP बनाते हैं।
उदाहरण 5
(a) ब्लैकमैन का सीमाकारी कारकों का नियम लिखिए। (b) प्रकाश की तीव्रता और कार्बन डाइऑक्साइड सांद्रता मिलकर प्रकाश-संश्लेषण को कैसे प्रभावित करते हैं? [2 + 3 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(a) ब्लैकमैन का नियम (1905) [2 अंक]: 'जब कोई कार्यिकीय प्रक्रिया कई स्वतंत्र कारकों द्वारा नियंत्रित होती है, तो प्रक्रिया की दर उस कारक द्वारा निर्धारित होती है जो अपने न्यूनतम मान पर उपस्थित होता है।'

(b) प्रकाश व CO2 की अंतःक्रिया [3 अंक]:

  1. कम प्रकाश तीव्रता: कम प्रकाश में प्रकाश-संश्लेषण की दर सीधे प्रकाश के समानुपाती होती है। इस समय प्रकाश ही सीमाकारी कारक होता है।
  2. प्रकाश संतृप्ति व CO2 सीमा: पूर्ण सूर्य के प्रकाश की लगभग 10% तीव्रता पर ही प्रकाश संतृप्ति आ जाती है। इसके बाद प्रकाश बढ़ाने पर भी दर नहीं बढ़ती, तब CO2 सांद्रता सीमाकारी कारक बन जाती है।
  3. CO2 वृद्धि का प्रभाव: यदि CO2 को सामान्य (0.035%) से बढ़ाकर 0.05% कर दिया जाए, तो प्रकाश-संश्लेषण की दर में भारी वृद्धि होती है। ग्रीनहाउस में इस सिद्धांत से फसलों का उत्पादन बढ़ाया जाता है।
उदाहरण 6
(a) थायलेकॉइड झिल्ली पर ATP निर्माण की पीटर मिशेल की रसोपरासरणी परिकल्पना संक्षेप में लिखिए। (b) प्रकाशिक अभिक्रिया के दौरान थायलेकॉइड अवकाशिका में प्रोटॉन संचित होने के दो कारण बताइए। [3 + 2 = 5 अंक]
विस्तृत समाधान / उत्तर:

(a) रसोपरासरणी परिकल्पना [3 अंक]:

  1. मूल सिद्धांत: थायलेकॉइड झिल्ली के आर-पार प्रोटॉन विद्युत-रासायनिक प्रवणता या प्रोटॉन प्रेरक बल (PMF) बनने से ही ATP का संश्लेषण होता है।
  2. प्रवणता निर्माण: प्रकाशिक अभिक्रिया में प्रोटॉन स्ट्रोमा से थायलेकॉइड अवकाशिका में संचित होते हैं, जिससे अवकाशिका अम्लीय (pH ~5.0) व स्ट्रोमा क्षारीय (pH ~8.0) हो जाता है (1000 गुना प्रवणता)।
  3. उत्प्रेरकी ATP निर्माण: थायलेकॉइड झिल्ली प्रोटॉनों के लिए अप्रवेश्य है; प्रोटॉन केवल CF0 चैनल से होकर स्ट्रोमा में लौट सकते हैं। प्रोटॉनों के इस प्रवाह से CF1 शीर्ष में घूर्णन परिवर्तन होते हैं और ADP व Pi जुड़कर ATP बनाते हैं।

(b) अवकाशिका में प्रोटॉन संचय के दो कारण [2 अंक]:

  1. जल का प्रकाश-अपघटन: OEC अवकाशिका की ओर स्थित होने से जल के टूटने पर 4 प्रोटॉन सीधे अवकाशिका में मुक्त होते हैं।
  2. प्लास्टोक्विनोन प्रोटॉन पंप: प्लास्टोक्विनोन स्ट्रोमा से प्रोटॉन ग्रहण करता है और साइटोक्रोम b6f को इलेक्ट्रॉन देते समय प्रोटॉनों को अवकाशिका में विसर्जित करता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह समझना कि प्रकाश-संश्लेषण में निकलने वाली ऑक्सीजन कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) से आती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

प्रकाश-संश्लेषण में विमोचित ऑक्सीजन पूर्णतः जल (H2O) के प्रकाश-अपघटन से आती है, CO2 से नहीं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह मानना कि अप्रकाशिक अभिक्रिया (केल्विन चक्र) केवल रात में अंधेरे में होती है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

अप्रकाशिक अभिक्रिया दिन के समय ही हरितलवक की पीठिका में होती है, क्योंकि यह प्रकाशिक अभिक्रिया में बने अल्पकालिक ATP व NADPH पर तुरंत निर्भर करती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

C3 और C4 पादपों के प्राथमिक CO2 ग्राही में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

C3 पादपों में प्राथमिक CO2 ग्राही 5-कार्बन शर्करा RuBP है। C4 पादपों की पर्णमध्योतक में प्राथमिक ग्राही 3-कार्बन यौगिक PEP है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यह सोचना कि C4 पादपों में केल्विन चक्र नहीं होता।

सही वैज्ञानिक तथ्य

C4 पादपों में हैच-स्लैक पथ और केल्विन चक्र दोनों होते हैं; केल्विन चक्र पूल-आच्छद कोशिकाओं के हरितलवक में संपन्न होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

प्राकृतिक अवस्था में सूर्य के प्रकाश को मुख्य सीमाकारी कारक मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

प्रकृति में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) मुख्य सीमाकारी कारक है, प्रकाश नहीं।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

WBCHSE कक्षा 11 जीव विज्ञान • इकाई 4: पादप कार्यिकी उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण: प्रकाशिक अभिक्रिया, Z-स्कीम, केल्विन चक्र, C4 क्रैंज़ शारीर व प्रकाश-श्वसन अध्याय 11 / टॉपिक 177 1. प्रकाशिक अभिक्रिया व Z-स्कीम (थायलेकॉइड) थायलेकॉइड झिल्ली: अवकाशिका (Lumen) [उच्च H+] ⇄ पीठिका (Stroma) PS II P680 जल का अपघटन 2H2O → 4H+ + 4e- + O2 (Mn2+, Cl-) Pheo Cyt b6f PQ → PC PS I P700 Fd NADP+ अपचयन → NADPH रसोपरासरणी ATP संश्लेषण (पीटर मिशेल): • प्रोटॉन अवकाशिका (Lumen) में संचित होते हैं (pH ~5.0) • स्ट्रोमा क्षारीय (pH ~8.0), प्रोटॉन प्रवणता उत्पन्न होती है • CF0-CF1 एटीपेस के माध्यम से प्रोटॉन स्ट्रोमा में आते हैं ADP + Pi ──[ATP Synthase]──> ATP निर्माण अचक्रीय पथ: ATP + NADPH + O2 का विमोचन चक्रीय पथ (केवल PS I, स्ट्रोमा लैमिली): केवल ATP निर्माण 2. केल्विन चक्र (C3 पथ) चरण 1: कार्बोक्सिलीकरण RuBP (5C) + CO2 + H2O ──[रुबिस्को / RuBisCO]──> 2 × 3-PGA चरण 2: अपचयन (Reduction) 2 × 3-PGA ──> 2 × ट्रायोज़ फॉस्फेट उपयोग: प्रति CO2 2 ATP + 2 NADPH 1 ग्लूकोज हेतु: 12 ATP + 12 NADPH उत्पाद: ग्लूकोज / स्टार्च निर्माण चरण 3: RuBP का पुनरुद्भवन ट्रायोज़ फॉस्फेट ──> RuBP पुनर्चक्रण उपयोग: प्रति CO2 1 अतिरिक्त ATP 1 ग्लूकोज (C6H12O6) का कुल बजट: निवेश: 6 CO2 + 18 ATP + 12 NADPH निर्गत: 1 ग्लूकोज + 18 ADP + 12 NADP+ केल्विन चक्र के 6 चक्र आवश्यक हैं 3. C4 क्रैंज़ शारीर व प्रकाश-श्वसन C4 क्रैंज़ शारीर (मक्का, गन्ना): • पर्णमध्योतक: PEP + CO2 ──> OAA (4C) • मैलिक अम्ल पूल-आच्छद कोशिकाओं में जाता है • विकार्बोक्सीलीकरण द्वारा रुबिस्को के पास CO2 बढ़ाता है ऑक्सीजिनेज सक्रियता पूरी तरह समाप्त! प्रकाश-श्वसन (C2 चक्र) - C3 पादपों में: • उच्च ताप व O2 की अधिकता में रुबिस्को O2 जोड़ता है: RuBP + O2 ──> 3-PGA + 2-फॉस्फोग्लाइकोलेट • व्यर्थ प्रक्रिया: न ATP, न शर्करा का निर्माण • 3 अंगक शामिल: हरितलवक ➔ परऑक्सीसोम ➔ माइटोकॉन्ड्रिया C3 पादपों की प्रकाश-संश्लेषण क्षमता 25% घट जाती है ब्लैकमैन का सीमाकारी कारकों का नियम (1905): अभिक्रिया की दर न्यूनतम मान वाले कारक द्वारा निर्धारित: • वायुमंडलीय CO2 (0.03-0.04%): मुख्य सीमाकारी कारक • प्रकाश संतृप्ति पूर्ण सूर्य के केवल 10% पर हो जाती है 1 हेक्सोज़ निर्माण में ऊर्जा व्यय तुलना: C3 पादप: 18 ATP + 12 NADPH (प्रकाश-श्वसन की हानि) C4 पादप: 30 ATP + 12 NADPH (शून्य प्रकाश-श्वसन)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
प्रकाश-संश्लेषण एक प्रकाश-चालित उपचयी प्रक्रिया है जो सौर ऊर्जा को ग्लूकोज में रासायनिक ऊर्जा के रूप में संचित करती है तथा जल के अपघटन से ऑक्सीजन मुक्त करती है।
मुख्य बिंदु 2
प्रीस्टले, इन्गेनहाउज़, सैक्स, एंजेलमैन एवं वैन नील के ऐतिहासिक प्रयोगों ने प्रकाश-संश्लेषण की वैज्ञानिक नींव रखी।
मुख्य बिंदु 3
हरितलवक में स्पष्ट कार्य-विभाजन होता है: थायलेकॉइड ग्रैना में प्रकाशिक अभिक्रिया तथा पीठिका (स्ट्रोमा) में अप्रकाशिक अभिक्रिया होती है।
मुख्य बिंदु 4
चार प्रमुख वर्णक (क्लोरोफिल a, b, जैंथोफिल, कैरोटीनॉयड) प्रकाश अवशोषित करते हैं, जिनमें क्लोरोफिल a प्रमुख अभिक्रिया केंद्र P680 व P700 बनाता है।
मुख्य बिंदु 5
अचक्रीय Z-स्कीम में जल से इलेक्ट्रॉन PS II, प्लास्टोक्विनोन, साइटोक्रोम b6f, प्लास्टोसायनिन व PS I होकर NADP रिडक्टेस तक जाते हैं और ATP, NADPH व O2 बनाते हैं।
मुख्य बिंदु 6
चक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण केवल PS I द्वारा पीठिका लैमिली में होता है तथा बिना NADPH व O2 के केवल अतिरिक्त ATP बनाता है।
मुख्य बिंदु 7
पीटर मिशेल की रसोपरासरणी परिकल्पना अनुसार अवकाशिका में प्रोटॉन संचय से बनी प्रवणता CF0-CF1 एटीपेस को चलाकर ATP का संश्लेषण करती है।
मुख्य बिंदु 8
केल्विन चक्र के तीन चरण हैं: कार्बोक्सीलीकरण (रुबिस्को द्वारा), अपचयन तथा RuBP पुनरुद्भवन; 1 ग्लूकोज हेतु 18 ATP व 12 NADPH लगते हैं।
मुख्य बिंदु 9
C4 पादपों में क्रैंज़ शारीर, पर्णमध्योतक में PEPcase स्थिरीकरण व पूल-आच्छद में रुबिस्को द्वारा CO2 सांद्रित होती है, जिससे प्रकाश-श्वसन शून्य हो जाता है।
मुख्य बिंदु 10
ब्लैकमैन के नियमानुसार प्रकाश-संश्लेषण की दर न्यूनतम मान वाले कारक द्वारा सीमित होती है तथा वायुमंडलीय CO2 मुख्य सीमाकारी कारक है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
ग्रैना थायलेकॉइड के स्थान पर पीठिका लैमिली में चक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण क्यों होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पीठिका लैमिली झिल्ली में फोटोसिस्टम-II (PS II) और फेरेडॉक्सिन-NADP+ रिडक्टेस (FNR) एंजाइम दोनों अनुपस्थित होते हैं। अतः PS I से निकले इलेक्ट्रॉन NADP+ में नहीं जा पाते और साइटोक्रोम b6f में लौटने को बाध्य होते हैं, जिससे केवल चक्रीय फॉस्फोरिलीकरण होता है।
2
C3 एवं C4 पादपों में कार्बोक्सीलीकरण के पश्चात बनने वाले प्रथम स्थायी उत्पाद कौन से हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C3 पादपों में कार्बोक्सीलीकरण का प्रथम स्थायी उत्पाद 3-कार्बन युक्त 3-फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (3-PGA) है। C4 पादपों की पर्णमध्योतक में प्रथम उत्पाद 4-कार्बन युक्त ऑक्जेलोएसिटिक अम्ल (OAA) है।
3
ऑक्सीजन-उत्सर्जक संकुल (OEC) रसोपरासरणी प्रोटॉन प्रवणता बनाने में कैसे सहायता करता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: OEC थायलेकॉइड झिल्ली की आंतरिक (अवकाशिका) सतह पर स्थित होता है। जब यह 2 जल अणुओं को तोड़ता है, तो मुक्त होने वाले 4 प्रोटॉन सीधे थायलेकॉइड अवकाशिका में जाते हैं, जिससे अवकाशिका की अम्लीयता और प्रोटॉन प्रवणता बढ़ जाती है।
4
रुबिस्को को दोहरा एंजाइम क्यों कहते हैं और इसकी ऑक्सीजिनेज सक्रियता कब प्रारंभ होती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: रुबिस्को के सक्रिय स्थल पर CO2 (कार्बोक्सीलेस क्रिया) और O2 (ऑक्सीजिनेज क्रिया) दोनों जुड़ सकते हैं। उच्च तापमान, तीव्र प्रकाश और कम CO2:O2 अनुपात में (जैसे जल संकट में रंध्र बंद होने पर) इसकी ऑक्सीजिनेज सक्रियता शुरू होकर प्रकाश-श्वसन कराती है।
5
वाणिज्यिक ग्रीनहाउस में टमाटर और शिमला मिर्च की पैदावार बढ़ाने हेतु वातावरण में CO2 क्यों बढ़ाई जाती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: टमाटर और शिमला मिर्च C3 पादप हैं, जिनका CO2 संतृप्ति बिंदु लगभग 450 ppm है, जो वायुमंडलीय स्तर (380-400 ppm) से अधिक है। कृत्रिम रूप से CO2 बढ़ाने पर सीमाकारी कारक समाप्त हो जाता है और प्रकाश-संश्लेषण बढ़कर अधिक पैदावार देता है।
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